शनिवार, 13 दिसंबर 2014

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का एक यादगार उपन्यास - दूसरा ताजमहल

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रचनाकार में जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास "पी कहाँ" आप पढ़ चुके हैं. प्रस्तुत है उनका एक और लोकप्रिय उपन्यास - दूसरा ताजमहल.

इस उपन्यास को प्रस्तुत करने में सर्वश्री वीरेन्द्र शर्मा तथा  रमाकान्त मिश्रा का अप्रतिम सहयोग प्राप्त हुआ है.

सूचना : कॉपीराइट - सर्वाधिकार सुरक्षित.   बिना पूर्व अनुमति के इस उपन्यास के किसी भी हिस्से का किसी भी प्रयोजन हेतु उपयोग अवैध होगा.

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उपन्यास : दूसरा ताजमहल

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

- संदीप प्रिन्टर्स, मेरठ द्वारा मुद्रित आरती पाकेट बुक्स मेरठ : 250001

लखनऊ : '

 

. सन् १७७५ ईसवी !'

सर्दी का मौसम विदा ले रहा था। ठंडी हवाओं में अब बासंती मादकता छा गई थी। नबाव आसफ्‌उद्दौला आज नौका- बिहार के लिए अपने खास मुसाहिबों और दरबारी शायर मीर तकी 'मीर' के साथ गोमती के किनारे आ पहुंचे थे। नौकाएं फूलों से सजाई जा रही थी। शाही खेमे में नवाब अपने मुसाहिबों के साथ हंसी और कहकहों में डूबे हुए थे

 

यकायक नवाब चौंके।

दूर से आती हुई गाने की आवाज। शायद ढपली बजाकर कोई फकीर गा रहा था -

 

पैसे ही का अमीर के दिल में ख्याल है,

पैसे ही का फकीर भी करता सवाल है।

पैसा ही फौज, पैसा ही जाहोजलाल है,

पैसे ही का तमाम ये दंगो दवाल है।

पैसा ही रूप रंग है, पैसा ही माल है,

पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है।

 

दूर से आती आवाज को नवाब साहब बड़े गौर से सुनते रहे। फिर उन्होंने चमत्कृत सी मुखमुद्रा से अपने शायर मीर को देखा।

-'सुना मीर साहेब...।'

- जी हुजूर, सुना।' मीर ने संक्षिप्त जवाब दिया।

परन्तु गीत ने, गीत के इन वेबाक शब्दों ने नवाब पर जादू का सा असर किया था।

-कोई है ? नवाब साहब ने पुकारा।

एक साथ कई हथियारबन्द अंगरक्षक खेमे में दौड़े आए।

 

उन्हीं में से ऊंचे कद के एक व्यक्ति को नवाब साहब ने सम्बोधित किया--'गाने की आवाज सुन रहे हो?

घबराहट सी में पदाधिकारी अंगरक्षक बोला--'मैं अभी बन्द कराता हूं सरकारे आली।

-‘पूरी बात सुन लिया करो पहले। उस गाने वाले को बुलाकर लाओ और सुनो-. सिपाही की सी हेंकड़ी से नहीं, इन्सान की सी मुलायमियत से बुलाकर लाना।

-‘जो हुक्म। '

 

खयाल सही था।

गाने वाला एक गरीब मांगने वाला ही था। उसके कपड़े मैले ओर तार-तार थे। कंधे पर झोली टंगी थी। हाथ में ढपली थी। वह अधेड़ आयु का था।

बेचारा घबराया सा था।

सहज और शांत स्वर में नवाब ने आदेश दिया ‘हम तुम्हारे गाने से बहुत खुश हुए फकीर। हमें सुनाओ, ईनाम देंगे।'

उस घबराए हुए व्यक्ति ने इधर-उधर अन्य व्यक्तियों पर दृष्टिपात किया। मुसाहिबों के सहज चेहरे देखकर वह कुछ आश्वस्त हुआ।

फिर भी ढपली सम्भालते हुए उसने पूछा- ‘इजाजत है क्या बंदा परवर?

-‘इजाजत है?’

 

ढपली की ताल पर उसने गाना आरम्भ किया-

पैसे का ढेर होने से सब सेठ साठ है,

पैसे के जोर शोर हैं पैसे के ठाठ हैं?

पैसे के कोठे कोठियां छ: सात आठ हैं,

पैसा न हो तो पैसे के फिर साठ-साठ हैं।

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है,

पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है।

 

नवाब ने दाद दी।

नवाब के बाद और मुसाहिबों ने भी दाद दी।

 

वह गा रहा था-

पैसा न हो तो बाग कुएं-फिर कहां से हों,

खाने को पूरी और पूवे फिर कहां से हों।

सामान ऐश के भजन के फिर कहां से हों,

हलवा कचौरी मालपूवे फिर कहां से हों।

पैसा ही रूप रंग है पैसा ही माल है,

पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है।

 

-बहुत खूब...। नवाब ने दाद देते हुए कहा ---क्या यह तुम्हारा कलाम है?

-'नहीं बन्दा परवर। एक राह चलना फकीर गाता था. उसी से सीख लिया।'

नवाब ने एक सौ एक रुपए की थैली तलब की और अपने हाथों से फकीर को दे दी। दुआएं देता हुआ फकीर चला गया। नवाब ने दरबारी शायर मीर की ओर दृष्टिपात किया- 'मीर साहब।'

-'जी हुजूर।'

-.'क्या आप बता सकेंगे कि ऐसा खरा और बेबाक कलाम किसका हो सकता है?'

-'आगरा का एक नौजवान शायर है हुजूर। नाम है नजीर।'

--'बहुत खूब। हमें उस शायर के बारे में कुछ और भी बताइए। '

मैं सिर्फ इतना ही जानता हूं हुजूर।'

 

अब मजबूरी थी।

नवाब मीर तकी मीर के स्वभाव से भली भांति परिचित थे। उनके दरबार का यह बुलन्द शायर बहुत ही तुनक मिजाज था।

तब बात समाप्त हो गई।

परन्तु इसके बाद के नौका-विहार में नवाब पूर्ण आनन्द नहीं ले सके।

 

नजीर!

आगरा!!

महल लौटने के बाद भी नवाब आगरा और नजीर के बारे में सोच रहे थे।

अभी कुछ महीने पहने ही की तो बात है...!

खबर मिली थी कि जाटों ने आगरा को बुरी तरह लूटा।

तो क्या वह शायर जिन्दा होगा ?

अगर वह शायर जिन्दा है तो उसके कयाम की सही जगह आगरा नहीं लखनऊ है।

उसे लखनऊ के दरबार की ही रौनक होनी चाहिए।

लेकिन उस शायर के बारे में कैसे पता लगाया जाए? कैसे उसके और कलाम के बारे में जानकारी हो?

 

बेगमें चकित हुईं .।

नवाब जैसे दस्तरखान पर बैठे थे वैसे ही उठ गए। उन्होंने एक कौर भी नहीं तोड़ा।

वह महल के मर्दाने में पहुंचे। महल के दारोगा को तलब किया।

दरोगा ने आकर सलाम बजाया।

-'सुनो...।'

-'जी आलमपनाह.।'

-'मिर्जा असगर अली की हवेली जानते हो न ?'

-'जी आलम पनाह. .।'

-'दामाद को उन्होंने घर जवांई रखा है। उनका दामाद आगरा का है। शायरी का भी शौक है.. मिर्जा असगर से कहना कि खास जरूरी बात है, अभी दूल्हा मियां को साथ लेकर हाजिर हों। हम इन्तजार कर रहे हैं..।

- .जो हुक्म आलमपनाह .. .।'

 

नवाब मर्दाने में असगरअली और- उसके दामाद का इन्तजार कर रहे थे।

और शहर लखनऊ में.. .। वह फकीर जिसे नवाब के हाथों से एक सौ एक रुपए की थैली मिली थी, अपने कुछ अन्य भिखारी साथियों के साथ जश्न मना रहा था और लखनऊ में उस रात एक कहावत बन रही थी-

‘जिसे न दे मौला, उसे दे आसफुद्दौला’

असगर अली के दामाद नईम खां के आदाब के उत्तर में नवाब ने उनके चेहरे पर आशीष का हाथ रखा और फिर औपचारिकता छोड़कर उसे गले से लगाया।

-'तशरीफ रखिए दूल्हे मियां। खास वजह से आपको बुलवाया है। सुना है आगरा शहर में नजीर नाम का एक शायर है... ?'

असगरअली और नईम खां को नवाब साहब ने अपने पास ही बैठाया था।

नईम खां ने उत्तर में कहा -'मैं आपकी पसन्द का कायल हो गया खुदाबन्द। आगरा के शायर सचमुच हीरा हैं और हीरे की कद्र जौहरी ही जानता है।'

. -.हां, आज एक फकीर के मुंह से हमने उसकी बेबाक शायरी सुनी, पैसा ही रूपरंग है...। तभी से हम नजीर साहब के बारे में जानने के लिए बेचैन हैं। क्या नजीर बूढ़े शायर हैं?

 

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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