बुधवार, 10 दिसंबर 2014

गीता दुबे की लघुकथा - उसके सात हजार रुपए

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गीता दुबे

              उसके सात हजार रूपए

आज मंगलवार है, दिन के बारह बज चुके हैं और मेरी आँखें उसका इन्तजार कर रहीं हैं| वह आ रही होगी... वह जरुर आ रही होगी....अचानक वह दूर से अपनी धीमी चाल चलती हुई आती दिखी| धीरे-धीरे वह करीब आने लगी| अब वह साफ-साफ दिखने लगी थी| हमेशा की तरह नीले पाड़ की सफेद साड़ी बंगाली तरीके से बदन में लपेटे, सिर को आँचल से ढके हुए एक बड़ा सा टीन का डब्बा अपने दाहिने हाथ से बगल में दबाये हुए चली आ रही थी| उसे देखकर यह कहने की जरुरत नहीं पड़ती कि वह एक विधवा बंगालिन है| पचास-बावन से ज्यादा की अवस्था न होगी उसकी| स्वाभाव से बेहद शांत, बस एक ही बुरी आदत थी उसमें पान खाने की| अपने मुंह में हमेशा पान दबाए रहती| ऐसा लगता मानो बहुत कम समय से ही उसे यह लत लग गई थी, क्योंकि उसके सारे दांत बिलकुल काले हो चुके थे| हरेक मंगलवार को वह इस मोहल्ले में आती| सभी जानते थे कि इस मोहल्ले में बस सुधा ही उससे मूढ़ी लेती है, इसलिए वह सीधे सुधा के घर ही जाती| सुधा उसकी मूढ़ी तो लेती ही थी साथ में उसे वहां एक प्याला चाय नमकीन के साथ जरुर मिलती, जिसका इन्तजार उसे ज्यादा रहता|

   एक दिन वह सुबह-सुबह सुधा के दरवाजे पर आ खड़ी हो गई| उसे देख सुधा ने कहा---‘क्या है?’ आज इतनी जल्दी क्यों आई हो? कल ही तो तुमसे मूढ़ी ली थी मैंने, आज नहीं लेनी है| और यह कैसी सूरत बना रखी है?और यह माथे पर निशान कैसे हैं? उसने धीरे से कहा----‘ आज मूढ़ी बिकने नहीं आया है| बेटा-बोऊ मारा है रात को, हम भागकर दूसरा का घर चला गया, नेई तो मार-मारके हमको शेष कर देता|’फिर उसने थोड़ी देर रूककर कहा--- ‘हमको काज दो काज| हम काज करेगा मूढ़ी नेई बिकेगा| सारा दिन इधर ही काज करेगा, घर नेई जाएगा|’

“ क्या काम करोगी तुम?”

‘ऐई झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन,और क्या?’

“ठीक है”, कहकर सुधा ने उसे पांच सौ रूपए प्रति माह पर अपने यहाँ काम पर रख लिया| कुछ ही दिनों बाद उसे अपनी सहेली रीना के यहाँ भी पांच सौ रूपए प्रति माह पर काम दिलवा दिया| अब वह सुबह सात बजे चली आती और शाम सात बजे तक वापस घर चली जाती| घर से सिर्फ सोने भर का ही रिश्ता था| महीना पूरा होने पर सुधा ने उसे पैसे देते हुए कहा---‘यह लो अपनी तनख्वाह|’

“ हम पैसा नेई लेगा|”

‘क्यों?’

“ तुम ही रखो अपना पास| घर ले जायेगा तो बेटा-बोऊ पैसा छीन लेगा|”

‘ अरे तो तुम इसे बैंक में रख दिया करो न!’कल ही चलो मेरे साथ, तुम्हारा एकाउंट खुलवा देती हूँ|’

“नेई हम नेई जायेगा बाबा|”उसने डरते हुए कहा| उसने फिर कहा---- बेटा को पता चलेगा तो वो हमको मार-मारके बैंक का खाता भी छीन लेगा और सब पैसा भी ले लेगा|

मैंने कहा---‘ अरे उसे पता चलेगा तब न!’

“ऊह, उसको पता नेई चलेगा? सारा दिन रोड में घूमता रहता है| मेरा पैसा हम तुम्हारा पास ही रखेगा| जब जरुरत होगा हम तुम्ही से ले लेगा|”

हारकर सुधा ने कहा---‘ठीक है|’

रीना के घर से मिले पैसे भी वह हरेक महीने सुधा को रखने के लिए दे दिया करती| दिन बीतने लगे और धीरे-धीरे इसी तरह सात महीने बीत गये| सात महीने के सात हजार रूपए हो गये थे सुधा के पास| एक दिन मूढ़ीवाली ने सुधा से कहा---“ तुम्हारा घर में काम करते-करते हमको  सात महीना हो गया,अगला महीना से मेरा पैसा बढ़ा दो|”

‘तुम तो पैसे लेती नहीं हो,पैसे बढाकर क्या होगा?’

“लेगा,लेगा बाबा, जब जरुरत होगा तो जरुर लेगा|”

सुधा ने फिर कहा—‘ठीक है|’और उसके सौ रूपए बढ़ा दिए| पैसे बढाने के बाद अभी दो ही दिन बीते थे कि एक दिन सुबह के दस बज चुके थे और वह नहीं आई थी| क्या हुआ? वह अब तक क्यों नहीं आई?यही सोच सुधा ने सोचा चलकर रीना के यहाँ देखती हूँ,हो सकता है आज वहां पहले चली गई हो| तब तक उसने देखा, रीना उसी के यहाँ चली आ रही है| आते ही रीना ने घबराई हुई आवाज में कहा---“सुना तुमने सुधा”

‘क्या’

“मौसी नहीं रही”--- रीना उसे मौसी ही कहकर पुकारती थी|

‘अरे नहीं, कल शाम के वक्त तो यहाँ से अच्छी-भली खा-पीकर गई थी|’

“हाँ, कल ही यहाँ से घर जाते समय रास्ते में किसी ट्रक वाले ने उसे कुचल डाला, वहीँ उसकी मौत हो गई|”सुनकर सुधा सन्न रह गई| धरे रह गये उसके वह सात हजार रुपए जस के तस, बस वही चली गई| यही हैं हम, यही है हमारी जिन्दगी,बिलकुल अनिश्चित| इन्ही सब विचारों में खोई सुधा ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाकर अपनी अलमारी में से उसके पैसों वाला बैग निकाला, गाड़ी की चाबी ली और चली उसके घर की ओर|

              गीता दुबे          

2 blogger-facebook:

  1. सुन्दर कृति , साधुवाद स्वीकार करें । सच में ज़िन्दगी बहुत अनिश्चित है। हम जाने कितने वर्षों तक का प्लान बना कर रख लेते हैं लेकिन ज़िन्दगी के आगे सब धरे के धरे रह जाते हैं । आपने इसे बेहद मर्मस्पर्शी तरीके से कहानी में उकेरा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. गीता दुबे12:21 pm

    विकास जी खानी पढकर टिप्पणी करने के लिए अनेकों आभार|

    उत्तर देंहटाएं

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