बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (अंतिम भाग)

पिछले अंक 9 से जारी..

ठीक दस बजे कलेक्टर ने बैठक ली। बैठक में ज़मीन से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी- एस.डी.एम., तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी -ज़रूरी काग़ज़ात के साथ उपस्थित हुए।

कलेक्टर मंत्री से बात करने में व्यस्त है। कलेक्टर जब कुर्सी पर बैठा और सारे अधिकारियों-कर्मचारियों पर एक नज़र डालकर मुस्कुराया जैसे कह रहा हो जल्द से जल्द काम करवा लो, आज भारी व्यस्तता है, ठीक उसी वक़्त मंत्री का फ़ोन आ गया। आधे घण्टे से मोबाइल पर बात चल रही है, कलेक्टर ‘जी सर’, ‘जी सर’ जैसे सम्बोधनों से सभी बातें निपटाता जा रहा है और बीच में एस.डी.एम. से संकेत में कह चुका है कि वो कुम्हार वाला मामला है न, उसे सामने रखो। हो चुकी है चर्चा, कितनी बार करेंगे आप लोग बात। हाँ, ये कुम्हार का शपथ-पत्र है, उसने स्वेच्छा से दिया है। और लोगों का नहीं है न कुछ। कोई बात नहीं। सारी बस्ती घेरनी है, ज़मीन उनकी नहीं है, कब्जे की है, होने दो कब्जे की, अपन सब घेर लेते हैं। काग़ज़ में ये है कि सिर्फ़ कुम्हार की जगह घेरी जा रही है, ठीक है...

सभी अधिकारी-कर्मचारी विनीत भाव से सिर हिलाते जा रहे हैं। कलेक्टर बात के बीच काग़ज़ देखता जा रहा है, बार-बार पलटता जाता है, सारे अधिकारी-कर्मचारी झुके खड़े हुए एक-एक काग़ज़ दिखला रहे हैं। रह-रह कलेक्टर कुर्सी से उठ खड़ा होता है, बैठ जाता है।

कलेक्टर यकायक मुस्कुराता है। मोबाइल मेज़ पर रख देता है। सबको देखता है और कहता है- ये मंत्री काम नहीं करने देगा तभी बंगले से पत्नी का मोबाइल। कलेक्टर कान पर मोबाइल लगाकर बोला- हाय स्वीटी! यार, मीटिंग में हूँ, तीन बजे लंच पे आऊँगा, अभी आना है, यार, -अधिकारियों-कर्मचारियों को इशारा करता है कि आप लोग बैठो, मैं आया...

कलेक्टर चला गया है। चार बजने को हैं, सारे लोग इंतज़ार में हैं, कलेक्टर साहब अभी लौटे नहीं। सभी हैरान-परेशान और भूखे हैं। किसी ने दोपहर का खाना भी नहीं खाया है।

पटवारी पेशाब करने के बहाने बाहर आ गया है। कुम्हार को उसने इशारे से अपने पास बुला लिया है। बताया कि साहब कहीं चले गए हैं। जैसे ही आएँगे, तुम्हें पेश होना है। कुछ खाया या नहीं? पानी? यार, यहाँ कहाँ पानी? बाहर चाय के ठेलों पे मिलेगा, पी आओ। अपन तो हिल नहीं सकते। इधर गए उधर साहब आए तो हो गया चक्कर। इसलिए हम यहीं डटे हैं। तू जा, कुछ खा ले। समोसा खा ले। ये चिल्लर... नहीं चाहिए, कोई बात नहीं। यार, ऐसई है, ऐसी की तैसी कराना इसे ही कहते हैं। हम लोगों की तरफ़ से कोई देर नहीं, साहब बैठे और हुआ काम। कोई चक्कर ही नहीं, सारी पिक्चर साफ़ है...

कुम्हार ने जब हाथ जोड़कर झुककर कहा कि हुजूर, हम ग़रीब लोग... वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया कि पटवारी बोला- हम लोग तो तुमसे ग़रीब और परेशान हैं। तुम तो टैम पर खा-पी लेते हो, यहाँ आठ-नौ बजे से डटे हैं, अब यही देखो कि पाँच बजने को आए मीटिंग के चक्कर में चाय-पानी नसीब नहीं। ये है किस्मत। साहब कब आते हैं- भरोसा नहीं। सारे अफ़सरान अंदर बैठे हैं। मैं तो पेशाब के बहाने बाहर निकल आया। जान रहा था कि तुम बाहर होगे -लेकिन ये देख, तुम्हारे साथ के लोग, मैंने कहा था न कि कोई झँकेगा नहीं -हुआ न यही! अब बताओ, ऐसे में कौन उनके साथ खड़ा होगा। अगर खड़ा भी हो जाए कोई तो उल्टे अपमान झेलना पड़ेगा -ये मामला है! इसलिए मैंने कहा था तुम इनका चक्कर छोड़ो, अपना देखो, आगे बढ़ो, भाड़ में जाएँ सब।

अँधेरा घिरने लगा था। सब ओर बत्तियाँ जल उठीं। एक क्षण के लिए पटवारी अंदर गया, लौटा तो ख़बर दी कि कलेक्टर साहब कल मिलेंगे।

कुम्हार भारी क़दमों से घर की ओर बढ़ा।

***

दूसरा दिन भी निकल गया, साहब नहीं आए। इस तरह तीसरा-चौथा दिन भी निकल गया। दूसरा और तीसरा हफ़्ता भी निकल गया। पटवारी ने बताया कि कहीं मीटिंगों में फँसे हैं लेकिन कभी भी किसी भी वक़्त आ सकते हैं। इस तरह इंतज़ार में एक माह बीत गया। कुम्हार रोज़ आ-आकर निराश लौट जाता। अब वह परेशान हो गया है। हाथ के काम नहीं कर पा रहा है, इसलिए रोटी की दिक़्क़त आ खड़ी हुई है।

कुम्हारिन ने एक शाम चिढ़कर उससे कहा -कब आएगा जानहार? इस तरह तो हम कब तक उसको अगोरते रहेंगे? काम-दंद सब ठप्प हो गया है- अन्न एक दाना नहीं। क्या करें? ये तो अच्छा रोना आ खड़ा हुआ। हमसे तो अच्छे बच्चू, श्यामल के बाबू, परसादे हैं- हाथ का काम तो नहीं छूटा, दोनों जून की रोटी तो कमा रहे हैं।

कुम्हार गहरे अफ़सोस में है -अब क्या जवाब दे उसका?

-पटवारी का ही किया-धरा है सब! -कुम्हारिन बोली- पहले भी मुँहजले ने इतना छकाया हमें कि कई दिनों परेशान रहे, अब फिर वही नाटक! तभी साथ के लोग छिटक गए।

कुम्हार ने गहरी साँस छोड़ी -क्या करूँ बता?

-मैं क्या बताऊँ। तू सोच?

-क्या सोचूँ? कुछ समझ नहीं आता। अवध से अनबन हो गई, नहीं बड़े मियां को मंडी पहुँचा देते।

-श्यामल की माँ होती तो ज़रूर ऐसे वक़्त में मदद करती, अब वो यहाँ है भी नहीं - कुम्हारिन ने गीली आवाज़ में कहा।

सहसा बड़े मियां डुगरते दोनों के सामने आ खड़े हुए। गरदन झटकार कर वह दोनों को देखने लगे जैसे कह रहे हों कि रिश्तों में अनबन होती रहती है, कहो तो मैं अवध के पास जाऊँ और मण्डी का काम शुरू करूँ, कब तक चूल्हा नहीं जलेगा?

अनबन के बाद भी अवध के मन में कहीं यह बात गहरे में थी कि इस बखत बहन परेशानी में है, हमें उसके पास चलना चाहिए।

और यह संयोग ही था कि वह इस वक़्त बहन के झोपड़े के बाहर खड़ा बहन को हाँक लगा रहा था।

***

एक-दो माह नहीं बल्कि तीन माह हो गए, कलेक्टर साहब बैठ नहीं रहे थे। कहीं अन्यत्र व्यस्त थे। पटवारी ही था जो आस-पर-आस दिये जा रहा था। हालाँकि उसका आस देना एक झूठा खेल था- डूबते आदमी को भरोसा दे के, आवाज़ लगा के बचाने की जुगत जैसा जिसे कुम्हार अंदर से महसूस कर रहा था। वह रोज़ पटवारी से न मिलने की ठानता लेकिन सुबह होते ही पता नहीं क्या होता, वह तैयार होने लगता और उसके क़दम अपने आप उसकी तरफ़ बढ़ने लग जाते।

ऐसी ही एक सुबह जब वह तैयार होकर झोपड़े के बाहर आ खड़ा हुआ, पटवारी के पास जाने के लिए और उसके पीछे पत्नी उसका कलेवा कपड़े में बाँधकर और एक बोतल पानी उसे देने के लिए आ खड़ी हुई कि पाँच-छः लोग पास आते दिखे।

ये लोग कलेक्टर ऑफ़िस से आए थे। इनके पास कलेक्टर का आदेश था जो एक काग़ज़ में दर्ज़ था। उनमें से एक आदमी ने गोंद लगाकर आदेश को नीम पर अच्छे-से चिपका दिया।

पलभर को कुम्हार निश्चेष्ट खड़ा रह गया-उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि मामला क्या है। सहसा कुम्हारिन ने साहस बटोरकर एक आदमी से विनीत स्वर में पूछा कि भैया, यह सब क्या है?

उस आदमी ने बताया कि कलेक्टर का आदेश है कि बस्ती की सारी ज़मीन सरकारी है, लिहाजा समूची बस्ती ख़ाली कराई जाएगी। लोग अपने आप ख़ाली कर दें तो अच्छा नहीं, उन्हें यहाँ से जबरन हँकाला जाएगा... झोपड़े मकान जो भी हैं सब गिराए जाएँगे...

आगे की बात कुम्हारिन सुन न सकी। वह गश खाकर गिर पड़ी।

***

मैना उदास है और कातर-दृष्टि से सामने जो कुछ भी घट रहा है, देख रही है :

कुम्हारिन सड़क के किनारे कंकरीली ज़मीन पर अचेत-सी चित्त पड़ी है। उसे तेज़ बुखार है, बदन तप रहा है। बुखार उतारने के लिए कुम्हार ठण्डे पानी का कपड़ा उसके सिर पर रह-रह रखता जाता है। बुखार है कि उतरने का नाम नहीं ले रहा है। बढ़ता ही जाता है। सिरहाने, कुम्हार के बग़ल गोपी खड़ा है- उदास, अनमना। गोपी को कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। उसका मन बार-बार हो रहा है कि बाप से पूछे कि वह सड़क किनारे क्यों आ पड़ा हुआ है? झोपड़े में अब नहीं रह सकेगा क्या? एक दिन क्या सभी के साथ ऐसा होता है कि घर से उन्हें हँकाल दिया जाता है। और फिर बिरादरी या बस्ती के लोग जो सालों-साल साथ रहे, वे कभी साथ नहीं रह सकेंगे?- माँ को बुखार और बाप को चिंता में डूबा देख, वह कुछ पूछ नहीं पा रहा है।

जिस वक़्त कुम्हारिन ग़श खाकर गिरी थी, ठीक उसी क्षण कुम्हार के दिमाग़ पर हथौड़े जैसी चोट पड़ी थी और वह सन्न-सा रह गया था कि एक पल को उसे समझ में न आया कि क्या हो गया, फिर धीरे-धीरे चैतन्य हुआ तो एक अफ़सोस ने घेर लिया उसे। भरोसा न था कि पटवारी उसे कहीं का न छोड़ेगा! मीठी पुचकार से उसे घेरेगा और अंत में सीधे जिबह कर डालेगा! हे भगवान! क्या से क्या हो गया? किसी तरह हाड़-तोड़ मेहनत करके पेट पाल रहा था कि उसे घर-द्वार से बेदख़ल कर दिया गया। उसी की ज़मीन और उसी को उससे महरूम कर दिया गया। उसे अपनी बात रखने का मौक़ा भी नहीं दिया गया - और एकतरफ़ा फ़ैसला हो गया! कैसी नाइंसाफी है- लूट, अंधेर और ढीठपन! ऐसा तो कहीं देखा-सुना नहीं। क्या ज़माना आ गया है? किसके पास जाएँ, अपना दुख बताएँ- कौन सुनेगा? हम ग़रीब ही बचे थे लूटे-हँकाले जाने के लिए? और ऐसा क्यों किया जा रहा है? हमने तो किसी की सूत भर, ज़मीन नहीं दाबी, किसी को दबाया- सताया नहीं, उल्टे जो संभव मदद थी, की; तो क्या यह इसी का फल हमें दिया गया? ग़रीब- मेहनतक़श होने का यह ख़ामियाजा है या सीधे-सरल होने का दण्ड?

वह एक तरफ़ को गिरा पड़ा था। गोपी की चीख़-गुहार से उसे होश आया तो देखा- पत्नी ज़मीन पर अचेत पड़ी है।

दौड़कर वह पानी लाया और पत्नी के मुँह पर पानी के छींटे मारने लगा।

जब वह छींटे मार रहा था, उसी वक़्त उसके दिमाग़ में एक बवण्डर-सा उठा। उसका मन फट-सा गया। लूट लो! उजाड़ दो!! तहस-नहस कर दो जो मन में आए, कर डालो!!! इससे अलग कोई उम्मीद भी नहीं क्योंकि तुम्हारा धरम ही यही बचा है! हमें धोखा देके, कहीं का न रख के अगर तुम ख़ुश होते हो तो हो लो! लेकिन सचमुच में क्या तुम ख़ुश हो पाओगे?

कुम्हार ने सोच लिया कि वह झोपड़े में पाँव तक नहीं रक्खेगा! पटवारी भाई, बाबू, कलेक्टर साहब, ले लो, सब अपने नाम कर लो! झोपड़ा उजाड़ दो, चाक उखाड़ दो, नीम का पेड़ तहस-नहस कर दो, खेत लूट लो - जो मन आए कर दो... और ख़ुश हो जाओ...

बड़बड़ाते हुए उसने अचेत पत्नी को दोनों हाथों से उठाया और धीरे-धीरे चलता सड़क किनारे आ खड़ा हुआ। धीरे से, सम्हालकर उसने पत्नी को ज़मीन पर लिटा दिया। और सूनी आँखों चारों ओर देखने लगा, फिर आँखें मींच लीं।

क्षणभर के बाद जब उसने आँखें खोलीं- उसके मन पर तनिक बोझ न था। लम्बे समय से जिस यातना से ग़ुजर रहा था लगा जैसे उससे मुक्ति पा गया हो।

उसके मन में एक नए विचार का अंकुरण हो गया था!

थोड़ी देर बाद एक विशालकाय जेसीबी कुम्हार के झोपड़े के सामने तीखी आवाज़ करती आ खड़ी हुई- कुम्हार ने उसे देखा तक नहीं।

आस-पास ऐलानिये रिक्शे घूम रहे थे जिनके बाजुओं और सिर पर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर बँधे थे जो तेज आवाज़ में जनता से अपना घर ख़ाली करने, सामान हटा लेने और शांति बनाए रखने की गुहार लग रहे थे। यह गुहार ऐसी थी कि कान के पर्दे फट जाएँ।

कुम्हार ने कानों में उँगलियाँ घुसेड़ लीं। यह जलती आवाज़ इसलिए है कि यहाँ, सड़क किनारे भी पड़े रहने की ज़रूरत नहीं, भागो यहाँ से! भागो!!

कुम्हार ने गहरी साँस ली- हे भगवान!!!

गोपी ने कानों पर हथेलियाँ जमा लीं, फिर हटा लीं मानो कह रहा हो कि कैसी भी तीख़ी, बर्छी जैसी धारदार आवाज़ हो, वह डरने वाला नहीं, न भागने वाला!

सहसा कुम्हार पत्नी के गालों को थपथपाता, उसके कान के पास मुँह ले जाकर बुदबुदाया - कैसी तबियत है? आँख तो खोल। देख, मैं हूँ, गोपी है, देख तो सई...

पत्नी है कि ज़ोरों से बड़बड़ा उठती है- मार डाल मुझे! मार डाल! जला दो सब! फूँक डालो!

सहसा गाड़ी का शोर उठा। कुम्हार ने सामने देखा- एक लारी थी जो शोर करती, धूल उड़ाती जेसीबी के पीछे आ लगी। लारी में पुलिस के जवान भरे थे जो गाड़ी के रुकते ही नीचे उतरने लगे। पुलिस के जवान सिर पर लोहे के टोप चढ़ाए, सुरक्षा के सामानों के साथ हाथों में बड़े-बड़े लट्ठ लिए थे। जवान लट्ठ पटकते जैसे उसकी मज़बूती की जाँच कर रहे हों, जेसीबी के बग़ल खड़े हो गए। कुछ ही देर में फायरब्रिगेड की लाल रंग की चार गाड़ियाँ एक के पीछे एक शोर करती लॉरी के आस-पास आ लगीं।

सहसा सड़क की तरफ़ ज़ोरों का शोर उठा। जैसे हज़ारों की तादाद में लोग एक कण्ठ से चीखे हों। कुम्हार ने पलटकर पीछे देखा तो पचास-साठ लोगों का हुजूम चीखता-चिल्लाता ज़ोरों की आवाज़ लगाता पास आता दिखा- ये बस्ती के लोग थे। जवान, बूढ़े औरत-मर्द सभी। सबसे आगे लाल रंग की पग्गड़ बाँधे बच्चू था जो हाथ लहराता, चीख़ता चला आ रहा था।

हुजूम कुम्हार के पास आकर रुक गया। पुलिस-जेसीबी और फायरब्रिगेड की गाड़ियाँ देखकर तो लोग भड़क-से उठे। बेकाबू होने लगे। बच्चू सबको सम्हालता-सा बोला- डरने की कोई बात नहीं, भाइयो, हम वकील के पास से आए हैं। अभी हाल में हमें कोर्ट से स्टे मिल जाएगा। बस थोड़ा-सा सब्र करो। कोई कुछ नहीं कर पाएगा। अंधेर थोड़ै है!

भीड़ में से रास्ता बनाते लाठी डगडगाते बूढ़े काका कुम्हार के पास आए, बोले- काय भोला, तुम ऐसे काय पड़े हो, लुटे-पिटे! और ये परबतिया...

कुम्हार ने काका को कठोर दृष्टि से देखा जैसे कह रहा हो कि हमें कौन लूटेगा काका? और लूट के कोई खुश होता है तो हो ले!

-हम तो सोच रहे थे ऐसई थोथी बात है, लेकिन यहाँ तो संगीन मामला दीखता है- ये पुलिस-जेसीबी काहे के लाने जमा हैं... काका बोले।

-ये क्या कर लेंगे हमारा- काकी चूड़ियों से भरा हाथ लहराते ज़ोरों से चीखीं- चढ़ाओ जेसीबी। लहास गिरा दी जाएगी जानहारों की। हमारी ही ज़मीन मिली थी दफन होने को। सत्यानाश हो इनका। हम लेटे जात हैं चढ़ा दो जेसीबी, नासपीटे, हत्यारो!!!

नवयुवक जिसने पटवारी का गला मसका था, अपने मजबूत पंजों को उठाता बोला- मैं तो पटवारी को ढूँढ़ रहा हूँ। घर गया था मिला नहीं, पता नहीं कहाँ छुप गया है। मिल जाए तो सीधे ऊपर पहुँचा दूँ इन पंजों से...

श्यामल का बाबू बोला - लीला, गुड्डू बस आने ही वाले हैं, वो तो सीधे वकील के साथ कोर्ट चले गए हैं। देखते जाओ, पूरा समाज इकट्ठा हो जाएगा अभी। ले लें ये लोग ज़मीन। अपनी ज़मीन के लिए हम लोग जान दे देंगे!!!

कुम्हार के दिमाग़ में कुछ दूसरी ही बात थी। सारी बातें सुनते हुए भी वह सुन नहीं रहा था। जैसे कोई वास्ता ही न रहा हो। इस वक़्त वह सिर्फ़ यही चाह रहा था कि उसकी घरवाली ठीक हो जाए, आँखें खोल ले, उठके बैठ जाए...

सहसा उसने कुम्हारिन के गालों को थपथपाया और करुणार्द्र स्वर में बोला - कैसी तबियत है रानी? आँखें खोल, देख, गोपी है, तुझे बुला रहा है...

गोपी उसके कान से मुँह सटाता गीली आवाज़ में बोला- अम्मा आँखें तो खोलो, देखो, अपना झोपड़ा कोई नहीं लेगा, तुम मेरी बात तो मानों...

सहसा कुम्हारिन की पलकें फड़कीं। धीरे-धीरे उसने आँखें खोलीं। थोड़ी देर बाद वह उठकर बैठ गई।

***

कुम्हारिन को उठकर बैठता देख मैना मुस्कुराई, लेकिन तुरंत ही उदास हो गई क्योंकि सामने जो दृश्य था वह बहुत ही भयानक था। अपना हक़ माँगती जनता के ख़िलाफ़ पुलिस किसी भी क्षण बेरहमी पर उतर सकती थी।

पुलिस ने कँटीले तारों की बाड़ लगा दी थी। तारों के पीछे लट्ठ और संगीने लिए पुलिस के जवान थे। उनके पीछे फायरब्रिगेड की गाड़ियाँ थीं और उसके पीछे दैत्य का-सा पंजा उठाये जेसीबी मशीन। इस तरफ़ अपने हक ़की गुहार लगाते बस्ती के लोग थे जिनके हाथों में अत्याचार बंद करो, हमारी ज़मीन मुक्त करो, के नारों की पट्टियाँ थीं। लोग ऐसे चीख़ रहे थे मानो हक़ के लिए अपनी जान तक दे देंगे।

पुलिस का एक अफ़सर एक छोटे-से लाउडस्पीकर के चोगे को मुँह पर लगाए ज़ोरों से चीखता कह रहा था- आप लोग शांति बनाए रक्खें, नहीं हमें लट्ठ बरसाने को विवश होना पड़ेगा।

लोग गगनभेदी आवाज़ बुलंद करते हैं- लट्ठ बरसाओ! हमें इसकी चिंता नहीं!!! हमें हमारी ज़मीन चाहिए!!!

सहसा पुलिस की तीखी सीटी के साथ ज़ोरों का शोर उठा मानो जेसीबी ने अपनी हैवानी चीख़ निकाली हो, मैना ने देखा- हरकत में आए जेसीबी ने एक ही झटके में नीम का विशाल पेड़ किसी हाथी की तरह ज़मीन पर पटक दिया, इसी के साथ कुम्हार का झोपड़ा चिड़िया के घोंसले की तरह उजड़ गया - कुम्हार ने अपने अंदर धसकते पहाड़ को यकायक दृढ़ता से रोका। जिस नए विचार का अंकुरण उसके मन में हुआ था, उसके बहाव में उसने कुम्हारिन और गोपी का हाथ पकड़ा, बड़े मियाँ को इशारा किया और अनजान सड़क पर, वीराने इलाके की ओर बढ़ने लगा। शोर-चीख़-गुहार हल्ला- सब पीछे छूट गए।

वह जंगल में आ गया था।

मैना से रहा नहीं गया, वह उसके पीछे-पीछे उड़ती आई।

सामने स्वच्छ, ताम्बई रंग का चाक जितना बड़ा, थरथराता चाँद जिसे कुम्हार ने ज़िन्दगी में शायद पहली बार देखा था- पेड़ों के ऊपर उठ रहा था- कुम्हार का मन प्रसन्न हो उठा।

मैना ने पूछा - भोला, तुम कहाँ जंगल में भागे चले आए। क्या सोचते हो, दुश्मन तुम्हें यहाँ चैन से बैठने देंगे?

-नहीं बैठने देंगे तो और आगे चला जाऊँगा!

- और जो वहाँ भी टिकने न दें, हँकाल दें तो?

- कोई कितनी बार हमें उजाड़ेगा? हर बार हम बस जाएँगे। जब तक साँसा, तब तक आसा! - भोला हँसा और दृढ़ता से आगे बोला - हमें तो चिकनी - चिकनी माटी काढ़नी है, सुन्दर, सुन्दर बर्तन बनाने हैं। और हाँ, वह घड़ा बनाना है जिसके ठण्डे पानी से तुम्हारा प्यासा कण्ठ तृप्त हो सके!

मैना अवाक् थी। बिल्कुल उसके मैना जैसे दृढ़ विचारवाला आदमी है यह!

थोड़ी देर बाद वह मीठे स्वर में गा उठी।

कुम्हार लोकगीत की यह कड़ी गा उठा :

 

अधरतिया हो राजा

कर ले शिकार

गोरी तो हिरनिया हो गई आज!

**

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(समाप्त)

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