मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

महावीर सरन जैन का आलेख - भाषा-व्यवस्था (Language System) एवं भाषा-व्यवहार (Language transaction or Language communication)

भाषा-व्यवस्था (Language System) एवं भाषा-व्यवहार (Language transaction or Language communication)

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार के अंतर के बीज स्विटजरलैण्ड निवासी सोस्यूर (1857-1913) द्वारा प्रतिपादित 'लॉ लांग´ (La langue) एवं ´ले परोल' (Le parole) में निहित हैं। ´ले परोल' व्यष्टिगत व्यवहार है और 'लॉ लांग´ की समष्टिगत सत्ता है। ´ले परोल' वक्ता का विशिष्ट वाक्-व्यवहार है जबकि 'लॉ लांग´ सामाजिक वस्तु है। इसे स्वन (Phone) और ध्वनि (Sound) के अन्तर से समझा जा सकता है। ध्वनि का प्रत्येक उच्चार स्वन है। इस दृष्टि से किसी भी ध्वनि के स्वन असंख्य हैं। स्वन की यथार्थ सत्ता तो है किन्तु उसका विवरण सम्भव नहीं है। ध्वनिवैज्ञानिक ध्वनि की विवेचना करता है। भाषा-व्यवस्था में किसी भाषा की पूरक वितरण एवं/ अथवा स्वतंत्र-परिवर्तन में वितरित ध्वनियों के समूह (ध्वनिग्राम अथवा स्वनिम) का अध्ययन करते हैं जो ध्वनि के धरातल पर भाषा-व्यवस्था की इकाई होती है। ध्वनिग्राम अथवा स्वनिम भाषिक-व्यवस्था की इकाई है। यह भौतिक यथार्थ नहीं है; भाषिक रूपपरक इकाई है। भाषा के समस्त वक्ता एवं प्रयोक्ता के मानस में ध्वनि ही रहती है जबकि यथार्थ में वह ध्वनि का नहीं अपितु स्वन का उच्चारण करता है। ´ले परोल' की संकल्पना भाषा-व्यवहार का आधार है। 'लॉ लांग´ की संकल्पना भाषा-व्यवस्था का आधार है। भाषा-व्यवस्था एवं भाषा-व्यवहार की संकल्पनाओं के अंतर को भाषाविज्ञान में प्रयुक्त अन्य युग्मों से भी समझा जा सकता है। ये हैं –

(1)'भाषा की मानसिक सत्ता´ (Psychological reality of Language) बनाम 'भाषिक-प्रतिफलन´ (Realization of Language)

(2)'भाषिक-सामर्थ्य´ (Linguistic competence) बनाम 'भाषिक-निष्पादन´ (Linguistic performance)

(3) भाषा की संरचना (Conformation of a language) बनाम भाषिक प्रकार्य (Functional language) अथवा संरचनात्मक भाषाविज्ञान (Structural linguistics) बनाम प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान (Functional linguistics)

भाषा-व्यवस्था भाषा की मानसिक सत्ता एवं भाषिक-सामर्थ्य की संकल्पनाओं के निकट है। भाषा-व्यवहार भाषिक-प्रतिफल एवं भाषिक-निष्पादन की संकल्पनाओं के निकट है। भाषा-व्यवस्था भाषा की संरचना के निकट है। भाषा-व्यवहार भाषिक प्रकार्य के निकट है।

प्रस्तुत आलेख में हम भाषा-व्यवस्था और भाषा-व्यवहार के बारे में विचार करेंगे।

भाषा-व्यवस्था अमूर्त एवं रूपपरक अधिक है जबकि भाषा-व्यवहार मूर्त एवं अभिव्यक्तिपरक अधिक है। किसी भाषा के व्याकरण में उस भाषा की व्यवस्थाओं एवं संरचनाओं के नियमों का निर्धारण होता है। भाषा का प्रयोक्ता व्याकरणिक नियमों का भले ही जानकार नहीं होता किन्तु वह अपनी भाषा का प्रयोग करता है। व्याकरणिक नियमों के निर्धारण करने वाले तथा भाषा का प्रयोग करनेवाले का पतंजलि-महाभाष्य में रोचक प्रसंग मिलता है। वैयाकरण तथा रथ चलानेवाले के बीच शब्द प्रयोग को लेकर वाद-विवाद होता है। प्रासंगिक अंश उद्धृत है-

वैयाकरण ने पूछा – इस रथ का 'प्रवेता´ कौन है?

सारथी का उत्तर – आयुष्मान्, मैं इस रथ का 'प्राजिता´ हूँ।

(प्राजिन् = सारथी, रथ-चालक, गाड़ीवान)

वैयाकरण – प्राजिता अपशब्द है।

सारथी का उत्तर – (देवानां प्रिय) आप केवल 'प्राप्तिज्ञ´ हैं; 'इष्टिज्ञ´ नहीं।

('प्राप्तिज्ञ´ = नियमों का ज्ञाता; 'इष्टिज्ञ´ = प्रयोग का ज्ञाता)

(डॉ. उदयनारायण तिवारी : भाषाविज्ञान का संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठ 16)

भाषा-व्यवस्था सामान्य भाषा की संरचना के नियमों का निर्धारण करती है। प्रयोक्ता की मानसिक स्थितियों, अनुभूतियों एवं सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप भाषा का प्रयोग किस प्रकार होता है अथवा होना चाहिए – यह भाषा-व्यवहार का विषय है। भाषा-व्यवहार का अध्येता इस पर भी विचार करता है कि प्रयोक्ता की मानसिक स्थितियों, अनुभूतियों एवं सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप भाषा किस प्रकार ढलती बदलती है। भाषा को बोलना आना तथा उपयुक्त भाषा बोलकर अपनी सामाजिक पहचान एवं प्रतिष्ठा स्थापित करने में अन्तर है।

भाषा-व्यवस्था तथा भाषा-व्यवहार के अन्तर को संगीत के राग के उदाहरण से समझा जा सकता है। भारतीय संगीत में प्रत्येक राग का निश्चित एवं निर्धारित रूप है। आरोह में प्रयुक्त स्वरों , अवरोह में प्रयुक्त स्वरों तथा संवादी स्वर आदि के नियम निश्चित होते हैं। इसी प्रकार पाश्चात्य संगीत में प्रत्येक धुन की स्वरलिपि निश्चित होती है। संगीतज्ञ इन्हीं को ध्यान में रखकर अपने गायन अथवा वाद्य यंत्र की प्रस्तुति करते हैं। एक राग को विभिन्न संगीतज्ञ निष्पादित करते हैं जो समान नहीं अपितु भिन्न-भिन्न होते हैं। एक ही संगीतज्ञ की एक ही राग की जितनी बार प्रस्तुतियाँ होती हैं उनमें भेद होते हैं। इन भेदों को सामान्य श्रोता भले ही न पहचान पाए मगर संगीतज्ञ इन भेदों को जान पाता है। भाषा-व्यवस्था राग के निर्धारित रूप की तरह है। भाषा-व्यवहार एक राग की विभिन्न संगीतज्ञों की विभिन्न प्रस्तुतियों की तरह है।

भाषा-व्यवस्था के नियमों को सर्वसमावेशी, संक्षिप्त एवं तर्कसंगत बनाने के दुराग्रह अथवा व्यामोह के कारण जब भाषा-विश्लेषण की रूपात्मक एवं संरचनात्मक प्रविधियों का इतना अतिरेक हो गया कि भाषिक इकाइयों के भाषा-विशेष में ´अर्थ निर्पेक्ष' वितरणगत स्थितियों को मूल आधार मानकर अमूर्त एवं जटिल नियमों को बनाने में सारा जोर लगा दिया गया तो इसकी प्रतिक्रिया हुई। यह माना गया कि भाषा केवल अमूर्त एवं रूपात्मक व्यापार नहीं है अपितु प्रयोक्ता के स्तर पर वह मूर्त एवं अभिव्यक्तिपरक व्यापार है जिसका उद्देश्य संप्रेषण है। संप्रेषण में एक छोर पर वक्ता है, दूसरे छोर पर श्रोता है। वक्ता संदेश व्यक्त करता है। श्रोता संदेश ग्रहण करता है। भाषा-व्यवहार का यही प्रयोजन है। भाषा-व्यवहार का यही उद्देश्य है। भाषा-व्यवहार की यही सार्थकता है। भाषा-व्यवहार वैविध्यपूर्ण होता है। इसका कारण यह है कि भाषा-व्यवहार एक आयामी नहीं अपितु बहुआयामी होता है। भाषा-व्यवहार के इन आयामों को संक्षेप में सूत्र शैली में इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है-

(1) वक्ता भेद – वक्ता का स्तर, वक्ता की आयु, वक्ता का लिंग, वक्ता का शैक्षणिक स्तर, वक्ता का सामाजिक संवर्ग आदि

(2) श्रोता भेद - श्रोता का स्तर, श्रोता की आयु, श्रोता का लिंग, श्रोता का शैक्षणिक स्तर, श्रोता का सामाजिक संवर्ग आदि

(3) वक्ता और श्रोता अथवा श्रोता-समूह का पारस्परिक सम्बंध

(इनके सम्बंध में विस्तार से 'भाषाविज्ञान एवं समाजविज्ञान´ तथा 'समाजभाषाविज्ञान´ शीर्षक अध्यायों में विचार किया जाएगा)

(4) भाषिक-व्यवहार का स्थान एवं परिवेश

(5) वक्ता का प्रयोजन। वह किस उद्देश्य अथवा प्रयोजन की सिद्धि करना चाहता है। इस दृष्टि से कथन की अनेक प्रयुक्तियाँ (Registers) एवं शैलियाँ (Styles) हो जाती हैं। इनके सम्बंध में आगे ´भाषिक-प्रकार्य' एवं ‘प्रकार्यात्मक भाषाविज्ञान’ के संदर्भ में विचार किया जाएगा।

(6) माध्यम भेद- बोलकर, लिखकर, मोबाइल अथवा कम्प्यूटर द्वारा। बोलने की भाषा, लिखित भाषा, मोबाइल पर टैक्स्ट मैसेज, कम्प्यूटर पर ईमेल की भाषा आदि के स्वरूपों में तदनुकूल एवं तदनुरूप अंतर होता है।

(7) बोलने का अवसर अथवा संदर्भ - इसके सम्बंध में आगे ´भाषिक-प्रकार्य' के संदर्भ में विचार किया जाएगा।

भाषा-व्यवस्था संरचना के निश्चित नियमों का निर्धारण करती है जो अमूर्त होते हैं। अपनी प्रकृति में वह निश्चित, निर्धारित, परिगणनीय एवं समरूपी होती है। भाषा-व्यवहार प्रयोक्ता के द्वारा होता है। भाषा-व्वहार कौन, किससे, कहाँ, किस विषय पर, कैसे और क्यों कर रहा है – इस कारण भाषा-प्रयोग के रूप बहुविध एवं बहुरूपी हो जाते हैं। किसी भाषा का व्यवहार वक्ता करता है। व्यक्तिगत होने के कारण भाषा-व्वहार का यह वैयक्तिक-पक्ष है। वक्ता भाषा-व्यवहार शून्य में नहीं करता, समाज में करता है। समाज में वैविध्य होता है। समाज अनेक स्तरों में बँटा होता है। सामाजिक स्तरीकरण समाज की सुनिश्चित वास्तिवकता है। समाज वर्ग, आय, आयु, लिंग, शिक्षा, व्यवसाय आदि विविध परिवर्तों के आधार पर स्तरीकृत होता है। जिस समाज में अनेक धर्मों, जातियों, वर्णों के समूह निवास करते हैं, उस समाज में इनके कारण भी सामाजिक संवर्ग हो जाते हैं। इनके भाषिक-रूप भी समरूपी नहीं होते। एक ही भाषा के अनेक एवं बहुविध रूप हो जाते हैं। इस कारण भाषा-व्यवहार बहुविध एवं बहुरूपी होता है।

भाषा-व्यवहार एवं भाषा-प्रयोग की इस प्रकृति के कारण सामान्य भाषाविज्ञान जहाँ किसी भाषा की व्यवस्था एवं संरचना के नियमों का निर्धारण करने के लिए अध्ययन की प्रविधियों की तलाश करता है वहीं सामान्य भाषाविज्ञान के इतर अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अनेक अध्ययन विभागों तथा ज्ञानानुशासन के अन्य अनुशासनों से अन्तः सम्बंध होने के कारण अनेक नए अध्ययन विषयों पर भी कार्य सम्पन्न हो रहे हैं जिनके सम्बंध में आगे विचार किया जाएगा।

उपर्युक्त विवेचन के सार को तालिका में सूत्र शैली में इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं –

भाषा-व्यवस्था

भाषा-व्यवहार

बीज- लॉ लांग

बीज – ले पेरोल

समष्टिगत सत्ता

व्यष्टिगत व्यवहार

भाषा की मानसिक सत्ता की संकल्पना के निकट

भाषिक-प्रतिफलन की संकल्पना के निकट

भाषिक-सामर्थ्य की संकल्पना के निकट

भाषिक-निष्पादन की संकल्पना के निकट

उद्देश्य- व्याकरणिक नियमों का निर्धारण

उद्देश्य - भाषा-प्रयोगों का अध्ययन

स्वरूप – अमूर्त एवं रूपपरक

स्वरूप – मूर्त एवं अभिव्यक्तिपरक

प्रकृति – निश्चित, निर्धारित, परिगणनीय एवं समरूपी

प्रकृति – वैविध्यपूर्ण, बहुआयामी एवं बहुरूपी

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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