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January 2014
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कलम की देवी - महाश्वेतादेवी

डॅा. लता सुमन्त

भारतीय साहित्यकारों में मूर्धन्य एवं यशस्वी लेखिका महाश्वेतादेवी वर्तिका के संपादक श्रेष्ठ कवि मनीष घटक की सुपुत्री हैं.14जनवरी 1926 में जन्मी,सशक्त साहित्यिक परंपरा में पली -बढी जीवन के यथार्थ तथा कटु अनुभवों को गले लगाने वाली लेखिका के साहित्य में मिट्टी की सोंधी -सोंधी खुश्बू आती है जो हमारी चेतना को बनाए रखती है.उनके साहित्य में निरुपित जीवन की वास्तविकता हमारे मन को ,हमारी भावनाओं को झकझोर देती है.उनके - नीलछबि उपन्यास की नायिका मॉडर्न स्त्री है.वह संबंधों को खुलकर जीने में मानती है.किसी भी रिश्ते को घसीटना उसके स्वभाव में नहीं है.अभ्र के साथ वह अपने आप को बाँधकर नहीं रख पाती और वरुण के साथ जुड़ जाती है.मगर अभ्र फिर भी उसके साथ जुड़ा रहता है.महत्वाकांक्षी होने के कारण वह अपने आपको सफलता की उँचाइयों पर देखना चाहती थी.शायद यही वजह थी जो वह अपनी बेटी को वेतनभोगी नौकर , अबाध स्वाधीनता और अपार पैसा दे पाती है मगर माँ की ममता नहीं.इस कहानी के व्दारा लेखिका ने समाज की उन युवतियों का चित्रण किया है जो अपने माता - पिता की अनुशासनहीनता तथा उनकी व्यस्तता का भोग बनती हैं.जिसके कारण वह समाज के उन दरिन्दों के हाथ लग जाती हैं जो उन्हें नशीली दवाओं का भोग बनाकर उनकी मजबूरी और बेबसी का फायदा उठाकर उनकी मासूमियत को ब्लू फिल्मों के व्दारा बाजारवाद का हिस्सा बना देते हैं. सुद्क्षिणा अपने पति कि तथाकथित राजनीति की कट्टर समर्थक है. खुद भी शासक दल व्दारा समर्थित सांस्कृतिक जगत् की एक प्रमुख व्यक्ति . वह जुलूस निकालती है, सभा में भाषण देती है. इसके अलावा लेखिका ने समाज के उस वर्ग का भी चित्रण किया है जो बदनाम है और कानून की नजरों में गुनहगार. कलकत्ता के जेबकतरों के बादशाह ने अभ्र से कहा - दादा , मैंने धंधा छोड़ दिया है. अब इस धंधे में इज्जत नहीं है.फिर जिस धंधे में भले घर की औरतें पडी हों , वहाँ अब हम जैसों का काम नहीं और फिर सस्ते और नकली गहने पहनने लगे हैं लोग.जान पर खेलकर नकली गहने नहीं चुराने हैं.

कलकत्ते की विख्यात वेश्या सावित्री ने कहा था -भद्र घरों की लड़कियाँ अब कोठी लेकर पेशा कर रही हैं ऐसे में हम अपना पेशा कैसे चलायें? पहले हमारी लाइन के भी कुछ नियम थे. वेश्या होने के लिये सधवा होना जरूरी था. चाहे तुम किसी पेड़ से शादी कर लो या सिल पत्थर से , बिना शादी किये तुम इस लाइन में नहीं आ सकतीं. पर अब हमारा सबकुछ चला गया.इनकी तलाक कहानी की नायिका कूलसम ने अपने पैंतीस वर्ष के वैवाहिक जीवन में आसगर के अलावा और किसी को नहीं जाना था.वहीं आसगर जब उसे तलाक दे देता है तब वह सब कुछ छोड़कर केवल पैसे लेकर अपनी बहन के पास चली जाती है.लंबे समय के बाद वक्त जब एक - दूसरे को सामने लाकर खडा कर देता है तब दोनों एक -दूसरे के बिना टूट चुके होते हैं. आसगर से दूर रहकर उसने समाज का तथा समाज के लोगों का कलुषित चेहरा पहचान लिया था. पैर की तकलीफ के कारण आसगर कूलसम का हाथ थामना चाहता है, परन्तु कूलसम अपने हाथ की लकडी उसे थमाकर अपने मार्ग पर आगे बढ जाती है.अब वह पुराने रिश्ते को फिर से संवारने के लिये तथा मुड़कर वापस लौटने के लिये तैयार न थी.रूपसी मान्ना -कहानी में समाज व्दारा प्रताडित नारी का चित्रण किया गया है.इनकी नारियाँ कठिन परिस्थितियों का मुँह तोड़ जवाब देती हैं तथा अपने जीवन समस्याओं का हल खुद ही ढूँढ लेती है.जवान रुपसी सोलह वर्ष की अवस्था में ही खून के इल्जाम में जेल चली जाती है.मियाद पूरी करके जब वह वापिस लौटती है तब विधवा रूपसी पति की तस्वीर के साथ गृहप्रवेश करती है. अपने लिये - कहानी की नायिका विधवा मुक्ति अडसठ वर्ष की अवस्था में आकर अपने बारे में सोचती है.समाज की ठोकरें तथा अपनों के परायेपन के एहसास ने उसे अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने के काबिल बना दिया था.उसका एक प्रेमी उसे बहत्तर वर्ष की अवस्था में मिलता है तो कहता है - तुम्हारा भी कोई नहीं है मेरा भी कोई नहीं है.अगर आओगी तो सिर पर बिठाकर रखूँगा.परंतु हिचकिचाता हूँ.मुक्ति अभयदान देकर प्रसन्न मन से उसके एक कमरे के घर में प्रवेश करती है.इनकी यशोवन्ती - कहानी में बंगाल कि एक विशिष्ट प्रथा क्षेत्रज प्रथा का निरुपण हुआ है.उस समय ठाकुर घराने तथा राजघरानों से संबंध स्थापित किये जाते थे. उनके खानदान की बहू कुँवरसाहब का दिल लुभा लेती है.उसके साथ संबंध स्थापित कर कुँवरसाहब पुत्र की प्राप्ति करते हैं.ऐसी क्षेत्रज संतान को जन्म देनेवाली माता को उच्चकुलों में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था तथा परिवार के सदस्य के रूप में उसे कुछ विशेष अधिकार भी प्राप्त होते थे.मगर वही यशोवन्ती अपने पति तथा परिवार केसाथ किस तरह का जीवन व्यतीत करती है तथा किस तरह की मानसिक यातनाओं का भोग बनती है.इस तरह से लेखिका ने यशोवन्ती की नारी व्यथा का सुन्दर निरुपण किया है.

महाश्वेतादेवी के लिये लेखन केवल धन उपार्जन का साधन नहीं है और ना ही वे इसके व्दारा यश की प्राप्ति करना चाहती हैं.जीने के लिये जरूरी केवल दो - जून की रोटी का जुगाड हो जाए इसके अलावा वे कुछ नहीं चाहती.लेखन उनके लिये जीवन की लडाई लड़ने का तथा आनेवाली मुसीबतों का सामना करने का कारगर साधन है.इसीलिए.वे शब्दों को कल्पना और सौन्दर्य के रंग में न रंगकर कटु - जीवन संघर्षों के साँचे में ढालती हैं.

वे सामाजिक कार्यों विशेषकर आदिवासियों ,सर्वहारा और स्त्रियों की समस्याओं को लेकर रचनात्मक कार्यों और आन्दोलनों में जी जान से जुटी रहती हैं. अपने कहानीसंग्रह -पंचाशटि गल्पो (1996) की भूमिका में महाश्वेतादेवी लिखती हैं ----- बाहर के कामों के लिये कितनी भी भाग दौड क्यों न करुँ, लिखने के लिये समय निकाल ही लेती थी.रचनाएँ सिर पर सवार हो जाती थी. स्तनदायिनी, द्रौपदी बिछन, तीन कहानियाँ प्रतिदिन एक कहानी के हिसाब से मैंने लिखी. सवेरे लिखने बैठती तो रात के डेढ दो बजे तक लिखती ही रहती. वह भी एक समय था . हजार चुराशीर माँ -उपन्यास चार दिन में लिख डाला. ऑपरेशन बसाई टुडु - उपन्यास डेढ से दो दिन में पूरा कर लिया. अब वह क्षमता नहीं है. जाहिर है 71 वर्ष की आयु में डायबिटीज जैसी इंसान को कमजोर बना देनेवाली बीमारी के साथ आज भी वे अपने आपको सक्रिय बनाए हुए हैं. इस छोटे कद की दुबली पतली महिला में आज भी कर्म के प्रति जितनी तत्परता और उर्जा है, वह हमें आश्चर्य में डाल देती है.

एक इन्टरव्यू में महाश्वेता देवी ने बताया कि - मेदनीपुर के लोध और पुरुलिया के खेडिया ,शबर जातियों के लिए वे पिछले 15 वर्षो से काम कर रही हैं. जिन शबरों को अंग्रेज सरकार ने 1871 में अपराधी जाति घोषित कर दिया था.एक ओर संपन्न वर्ग उन्हें आखेट केलिए उकसाते हैं तो दूसरी ओर उन्हीं अपराधों के लिये पुलिस और अन्य जातियों का उनसे शिकार करवाते हैं.आज भी जब वे अपनी जमीन के लिए आवाज उठाते हैं या उस पर किसी प्रकार का अधिकार जताने की कोशिश करते हैं तो उनके हाथ -पैर काट दिये जाते हैं. ऐसे निरीह,गरीब और कमजोर जाति के लोगों के पुनरुत्थान के लिये कर्मठ महिला जुड़ी हुई है. ब्याधखंड -उपन्यास लिखकर एक ओर वे उनके पुरखों की गौरव पूर्ण परंपरा को फिर से स्थापित करने की कोशिश करती हैं.दूसरी ओर वन संरक्षण कर ,कुँए और तालाब खुदवाना, मछलीपालन और अनेक गृहउद्योगों के काम सिखाकर उन्हें स्वनिर्भर बनाने की कोशिश करती हैं. शबर समिति के पंद्रह हजार लोगों के विकास कार्य में लगी महाश्वेताजी कहती हैं - मैं सरकार के पास अपनी योजना जमा करती हूँ और सरकार जो स्कीम देती है उस पर काम करती हूं.दयालु लोगों से चंदा मिलता रहता है.मैं उन लोगों के लिये फिशरी की व्यवस्था करना चाहती हुँयदि मुझे किसी तरह 25 लाख रुपये का फंड मिल जाता, मुझे तो आयकर छूट भी मिली हुई है,तो मुझे दर -ब -दर चक्कर न काटना पडतामुझे एंबुलेंस वैन की जरुरत है,लेकिन किसी ने सहयोग का हाथ नहीं बढाया..मुझे साठ मील का सफर तय करना पडता है.कुछ दूर बस या जीप से , उसके बाद पैदल ही जाती हूँ.(रविवारी जनसत्ता,10 अगस्त 1997)

महाश्वेता देवी का दावा है कि बांगला में वे अकेली लेखिका हैं जिसकी जीविका का एकमात्र आधार लेखन है. व्यावसायिक पत्रिकाओं में उन्होंने 1954 में ही लिखना शुरु कर दिया था.लघु और अव्यावसायिक पत्रिकाओं में बहुत बाद में लिखने लगी. अव्यावसायिक पत्रिकाओं में निकलनेवाली सामग्री लोग चाव से पढते हैं.मगर इसके अलावा वे आम पाठक तक पहुँचाना चाहती हैं. आदिवासियों के मानवीय अधिकारों की लडाई तथा लेखकीय स्वातंत्र्य तथा गरिमा को बनाए रखने के लिये आनेवाली हर बाधा एवं अंतर्विरोधों को सहजता से परे कर अपने मार्ग पर अग्रसर रहती हैं. वे कहती हैं - मैं सिर्फ अपने काम पर विश्वास करती हूँ.मैं हमेशा जमीन की ओर देखने में आस्था रखती हूँ. मैं बडी - बडी बातों में यकीन नहीं रखती.मेरा सारा विश्वास खत्म हो चुका है.( जनसत्ता 10 अगस्त 1997)

भारत की वनवासी संस्कृति के इतिहास और उनके जीवन के दुःख दर्द, दैन्य, अभाव, साहस ,उत्साह, परंपराएँ आदि को लेखिका ने अपनी संवेदनशील फिर भी तटस्थ लेखनी से चित्रित किया है.इन आदिवासियों का वर्तमान और बीता कल दोनों इनकी कृतियों के अभिन्न अंग हैं.इनके लेखन में इन आदिजातियों के प्रति गहरा ममत्व एवं उनके अधिकारों के प्रति लड़ने की दैवी शक्ति एवं तीव्र जुनुन की भावना दृष्टिगत् होती है.उनके आदिवासियों के जीवन पर आधारित कहानियों एवं उपन्यासों में -जगमोहनेर मृत्यु ,रुदाली ,शिशु नून आदि हैं.अपनी रचनाओं व्दारा वे बार -बार एक ही अंचल (पालामऊ वीरभूम ) की ओर लौटती हैं.यहि अंचल उनके लिये भारतवर्ष है.केवल अंचल ही नहीं कई चरित्र भी उनकी रचनाओं में बार - बार लौट कर आते हैं.उनका मानना है --चरित्रों के प्रति भी मेरी प्रतिबद्धता है.इसीलिए बिछन कहानी के प्रमुख चरित्र दूलन गंजु को लेकर मैंने आजकल की शारदीया में दो कहानियाँ लिखी.मैं समझती हूँ - कुछ मनुष्य अज्ञात महादेश की तरह हैं.जितना मैं उनका आविष्कार करुँगी , उतनी ही विनम्र और मुग्ध होऊँगी. चूकि इतिहास की चल मानता और अग्रगति में मेरा विश्वास है, इसलिये कुछ चरित्र घूम -घूमकर वापिस आते हैं. आज सत्तर पार करके मैं अच्छी तरह समझ रही हूँ कि यशोदा , द्रोपदी दूलन, बुलाकी, तथा दूसरे अन्य चरित्र आज के परिप्रेक्ष्य में लौट आना चाहते हैं अपने मन के दरवाजे पर मैं उनकी दस्तक सुन रही हूँ. दरवाजा खोलना ही होगा.मगर इसके लिए समय चाहिये.लिखने का समय.(पंचाशटि गल्पो पृ.10,11) अपनी प्रथम पुस्तक झाँसी की रानी से ही लेखिका ने ख्याति पा ली थी मगर 1084 की माँ -की जीवन दृष्टि और शैली अन्य लेखकों की तुलना में अलग थी.नक्सली आंदोलन से उपजी क्रांतिधर्मिता और उसके विरुध्द फैलाए गए अनेक दुर्विचारों को चीर इस रचना ने पाठक को नई जमीन दी.मुंडा, संथाल, शबर आदि जनजातियों के विद्रोहों को वाचा देते हुए भी उन्होंने स्त्री की भूमिका को कभी नजरअंदाज नहीं किया.उनकी रचनात्मकता का एक गुण और है उनकी प्रामाणिकता. झांसी की रानी, चोटी मुंडा, उसका तीर या वीरसा भगवान के विद्रोह की कथा,बिरसा मुंडा या नक्सली विद्रोह पर आधारित 1084 की माँ,सुजाता, रूपसी व्रती आदि अत्यंत प्रामाणिक हैं.

महाश्वेताजी कहती हैं -आदिवासी अंचल के आदमी को अपनी आँखों से जितना देखा या जाना है उससे कहीं अधिक मन की आँखों से देखा है.रोज की निकटता होने पर लिखना कठिन है मेरे काम ,मन और सत्ता के साथ खेडिया शबर इतना अधिक जुडे हुए हैं कि उनके बारे में लिख नहीं पाती.(पंचाशटि गल्पो भूमिका पृ.10)

महाश्वेता देवी की रचनाओं में उनके आसपास के जीवन में घटित घटनाऐं, आदिवासी क्षेत्रों में कार्य के व्दारा प्राप्त अनुभव , इतिहास, पुराण,किवदंतियो। पुराकथाओं आदि से प्राप्त सामग्री तथा अनेक समस्याओं कुप्रथाओं,अंधविश्वासों के व्दारा समाज के हर क्षेत्र में झाँका है.अशिक्षा,शोषण,अनीति के बढ़ते प्रमाण को देखते हुए उन्हें लगता है कि आज भी इसके लिए लड़ते रहना जरूरी है.उनकी व्ंयंजना पूर्ण, तत्सम प्रधान फिर भी सहज ग्राहय भाषा,उनके वैविध्य पूर्ण क्षेत्रों का ज्ञान,विविध भाषाओं पर उनका एकाधिकार सहज ही झलकता है. महाश्वेता देवी कहती हैं -जो नहीं जानती उसे जान लेने की कोशिश करती हूँ.यह भी जानती हूँ कि कितनी भी कोशिश करूँ,बहुत कुछ अजाना ही रह जाएगा.(पंचाशटि गल्पो पृ. 11).

आदिवासियों, गरीबों , शोषितों और अभाव ग्रस्त लोगों के लिए कुछ कर गुजरने का जोश और प्रतिबद्धता भारतीय भाषाओं में केवल प्रेमचन्दजी में देखने को मिलता है.महाश्वेताजी ने केवल उनका प्रतिनिधित्व किया है. जो आज भी संघर्षरत हैं और अपने अधिकारों के प्रति प्रयत्नशील.

महाश्वेता देवी को बंगाल के शरतचंद्र पदक, भुवनमोहिनी पदक, जगततारिणी पदक, और अमृत पुरस्कार से नवाजे जाने और पद्मश्री तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने के बाद भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से समादृत होकर, मेगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है.

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डॅा. लता सुमन्त

AssociateprofessorinHindi

ठण्‍ड में गरम राजनीति

यशवन्‍त कोठारी

अमेरिेका से लगाकर ठेठ जयपुर में तेज ठण्‍ड पड़ रही है। बाहर बरफ गिर रही है, हाड़ कम्‍पाती सर्दी में तेज ठण्‍डी हवा चल रही है मगर राजनीति गरम गरम चल रही है। आप की सरकार धरने पर बैठकर रजाई ओढ़ कर जनता की समस्‍याएं हल करने के असफल प्रयास कर रही है। आप तो आप है सबकी बाप है मगर सड़क छाप है। कभी कभी लगता है खाप है जो सरकार के गले में लटका साँप है। चेतन भगत ने इसे राजनीति की आइटम गर्ल कह दिया है मगर राखी सावंत ने स्‍पष्‍ट कर दिया कि वह आप से ज्‍यादा बेहतर सरकार चला सकती है। वैसे भी एक बुजुर्ग राजनेता राजनीति को वेश्‍याओं का पेशा कह चुके हैं ऐसी गरमागरम राजनीति के झोंके हरतरफ से आ रहे है। तीन तीन प्रधान मंत्री इन वेटिंग चल रहे है और एक पूर्व पी․एम․ इन वेटिंग शीत समाधि में चले गये हैं। शीत समाधि भी ठण्‍ड में ही होती है। राजनीति के इस कीचड़ में कमल खिलेगा या झाडू निकलेगी या हाथ का पंजा अपना जौहर दिखलायेगा ये कौन जानता है। राजनीति का भाग्‍य तो देवता भी नहीं जान सकते। राजनीति के इस मूल्‍य हीन दौर में सब कुछ गड़बड़ हो गया है। एक प्रदेश में तो सरकार की लुटिया एसी डूबी कि बस ढूंढते रह गये पुरानी सरकार कहाँ गई ?

जनता को गुस्‍सा क्‍यों आता है। यह कोई नहीं जानना चाहता। सरकार का गुस्‍सा जनता पर चलता है। गरीब मध्‍यमवर्गीय कर्मचारी निलम्‍बित हो जाता है। सरकार चलाने वाले मुख्‍यमंत्री का कुछ नहीं बिगड़ता। सरकार का स्‍वाद जिसने चखलिया वो इस स्‍वाद को और ज्‍यादा स्‍वादिष्‍ट बनाने में लग जाता है। स्‍वादिष्‍ट सरकार सुवासित सरकार पर कब्‍जा जमाने के लिए ठण्‍ड में जनता के दरबार में जाने के बजाय लोग टिकट के लिए राजनीति पार्टियों के दफ्‌तर में चक्‍कर लगा रहे हैं। कोई अनशन की धमकी दे रहा है और एक पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जा रहा है। प्रजातन्‍त्र के लड्‌डू, बरफी, सब खाना चाहते है। हलवाई कोई नहीं बनना चाहता। सवालों के घेरे के बाहर खडे होकर तमाशा देखना अलग बात है और ठण्‍ड में सवालों से रुबरु होना अलग बात है। कविता करते करते राजनीति करना और राजनीति करते करते कविता करना भी बिलकुल अलग है राजनीति में फटे में टांग अड़ाने से कविता भी हाथ से निकल जाती है। वैसे भी फणीश्‍वनाथ रेणु ने कहा था यदि राजनीति और साहित्‍य में एक को चुनना पड़े तो लेखक को साहित्‍य चुन लेना चाहिये।

इस ठण्‍ड में लाख टके का प्रश्‍न यही है कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री। मगर दोस्‍तो हम तो परोसी हुई थाली को लुढ़काने में विश्‍वास रखते हैं। बाहर अभी भी ठण्‍ड पड़ रही है। ठण्‍डी हवाँए चल रही है मगर दिल्‍ली में राजनीति की गरम हवाँए सबको झुलसा रही है केजरी वाल से लगाकर आम आदमी को।

बयानवीर लगातार बयान दे रहे हैं, ज्‍यादा बड़े बयानवीर बयानों से पलटकर मीडिया पर दोषारोपण कर रहे हैं और भी ज्‍यादा महावीर, परमवीर बयानवीर बयानों की बाजीगरी दिखाने के लिए चेले-चेलियां पाल रहे हैं। बयानों से इस भयानक जंगल में आग लगी हुई है, जो ठण्‍ड में गरमी का अहसास करा रही है। वरना सरकारे धक्‍के से चल रही है बूढ़ा प्रजातन्‍त्र कम्‍बल की तलाश में ठण्‍ड में भटक रहा है। नेता प्रजातन्‍त्र के लड्‌डू, पे‌डे, बरफी, काजू खा रहे हैं। तेज ठण्‍ड में और वे बेचारे कर भी क्‍या सकते हैं ?

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यशवन्‍त कोठारी

86-लक्ष्‍मीनगर, ब्रहमपुरी बाहर जयपुर

महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के शान्ति-पर्व में महात्मा भीष्मजी ने राजा युधिष्ठिर को राज-धर्म और राजा के कर्तव्यों आदि के बारे में विस्तार से समझाया था. इस आलेख में उसे सादर प्रस्तुत किया जा रहा है. पाँच हजार वर्ष पूर्व प्रचलित राजधर्म और राजा के कर्तव्यों की व्याख्या, आज के संदर्भ में कितनी कारगर और उपयोगी सिद्ध हो सकती है, इस पर पाठक स्वयं विचार करे और उसकी मीमांसा करे.

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राजधर्म और राजा के कर्तव्य

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. भीष्म पितामह बाणॊं की शैय्या पर पडॆ हुए उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे. सूर्य के उत्तरायण होने पर वे देह त्यागने वाले थे. एक दिन भगवान श्री कृष्ण ने उनसे मिलने का निश्चय किया और धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल आदि मुख्य वीरों को लेकर कुरुक्षेत्र में जा पहुँचे. इस समय भीष्म ध्यानावस्थित होकर भगवान श्री कृष्ण की स्तुति कर रहे थे. सभी लोगों को निकट आया हुआ देखकर वे गदगद हो उठे. इसी समय श्रीकृष्ण भीष्म से मधुर वाणी में बोले- हे भीष्मजी ! आपको शर-शय्या पर पडॆ-पडॆ महान कष्ट हो रहा होगा. फ़िर भी आपकी तरह मृत्यु को इस तरह वश में करने वाला मैंने तीनों लोकों में आज तक नहीं देखा. ये धर्मराज ! अपने कुटुम्ब के नाश हो जाने से महान दुखी हो रहे हैं. अब आप जैसे भी हो इनके दुख दूर करें. आप महान राजनीतिज्ञ हैं. कृपा करके आप इन्हें राज-धर्म की अच्छी तरह समझा दें.

श्री कृष्ण की बात सुनकर भीष्म ने उनकी स्तुति करते हुए कहा-“हे मधुसूदन...हे माधव..आप तो स्वयं धर्म के सभी मर्मों को समझने वाले हैं. फ़िर आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं ?. मैं तो आपका शिष्य हूँ. अच्छा हो कि आप स्वयं धर्मराज को इसके बारे में समझायें. इस समय मेरे शरीर में अत्यन्त दाह और पीडा है. मुझमें बोलने के शक्ति भी नहीं रह गयी है, फ़िर मैं धर्मोपदेश किस प्रकार दे सकूँगा”

श्री कृष्णजी भीष्मजी के कथन को सुनकर बोले-“ हे भीष्मजी ! संसार में जितने भी सत-असत पदार्थ हैं, वे मुझसे ही उत्पन्न हैं. अतः मैं तो यश से परिपूर्ण हूँ ही. किन्तु मैं आप जैसे भक्तों का यश बढाने हेतु आपके ही मुख से युधिष्ठिर को उपदेश करना चाहता हूं., जिससे संसार में आपका सम्मान और भी बढे. आपके मुख से निकला हुआ हर वाक्य वेद-वाक्य होगा. आप दोष से मुक्त और ज्ञानी हैं. अतएव आप ही धर्मराज को उपदेश देने की कृपा करें. इसके लिए मैं आपको वरदान देता हूँ कि अब से आपको कोई पीडा दाह या व्यथा न रह जाएगी और आपकी स्मरण-शक्ति भी पहले से भी करोड गुनी तेज हो जाएगी.

दूसरे दिन श्रीकृष्ण पुनः पाण्डवों के साथ रथ पर आरूढ होकर भीष्मजी के पास जा पहुँचे. वहाँ उन्होंने देखा कि ऋषि-मण्डली पहले से ही विराजमान है. धर्मराज युधिष्ठर ने पितामह सहित सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम किया और भीष्म से बोले- हे पितामह ! आप मुझे राजधर्म के बारे में विस्तार से बतलाने की कृपा करें.

भीष्मजी ने कहा”-“ हे धर्मराज ! मैं भगवान श्रीकृष्ण एवं सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम कर तुमसे राजधर्म कहता हूँ, उसे सुनिये. हे कुरुराज ! राजा ऎसा होना चाहिए जो प्रजा को प्रसन्न रख सके. राजा को सदैव पुरुषार्थी होना चाहिए. उसे दैव के भरोसे होकर कभी पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना चाहिए. हे वत्स ! कार्य में असफ़लता होने पर राजा को खिन्न नहीं होना चाहिए. उसे सत्यवादी होना चाहिए. राजा का स्वभाव न कोमल हो न कठोर हो, क्योंकि कोमल स्वभाव वाले राजा की आज्ञा कोई नहीं मानता और कठोर स्वभाव वाले राजा से प्रजा बहुत दुःख उठाती है. ब्राह्मणॊं को प्राणदण्ड नहीं देना चाहिए, उसे देश-निकाले का दण्ड पर्याप्त है..अग्नि जल से, क्षत्रिय ब्राह्मण से तथा लोहा पत्थर से नष्ट हो जाता है. ये सारे ही अपने उत्पन्न कर्ता से संघर्ष करने पर नष्ट हो जाते हैं. जैसे जल अग्नि को नष्ट कर देता है, पत्थर से लोहा कुंद पड जाता है. लेकिन यदि ब्राहमण युद्ध के लिए ललकारता हो तब उसके वध से पाप नहीं लगता. राजा को न कभी अपने धर्म का त्याग करना चाहिये और न ही उसे अपराधियों को दण्ड देने में संकोच करना चाहिए, क्योंकि इस तरह से सेवक मुँह चढे हो जाते है और राजकाज में अवरोध उत्पन्न करने लगते हैं. हे राजन ! हर राजा को परिश्रमी एवं उद्दोगी होना चाहिए. जिस प्रकार बिल में रहने वाले चूहों को सर्प निगल लेता है, उसी प्रकार दूसरे राजाओं से लडाई न करने वाले राजा तथा घर न छॊड़ने वाले ब्राह्मण को पृथ्वी निगल जाती है.

“राजा के सात अंग होते हैं- (१) राज्य (२) मंत्री, (३) मित्र (४) कोष,(५) देश (६) किला और ७ वां सेना. राजा को इनकी रक्षा और सदुपयोग करना चाहिए. राजा के समस्त धर्मों का सार उसका प्रजा-पालन करना चाहिए. राजा को राज्य प्रबन्ध को सुचारु रुप से चलाने के लिए गुप्तचर रखना चाहिए , जो राजा को देश के समाचारों से अवगत कराता रहे. राजा को चाहिए कि वह अन्य देश के राजाओं के साथ सन्धि करके उन देशों में अपना राजदूत रखे. प्रजा को बिना कष्ट दिये, कर इस प्रकार वसूलना चाहिए जैसे गाय को बिना कष्ट दिये उससे दूध ले लिया जाता है. सेवकों को कभी गुटबन्दी में न पड़ने देना चाहिए. राजा का कर्तव्य है कि वह निरन्तर अपने कोष को बढ़ता रहे. साथ ही निर्बल शत्रु को भी कम न समझे. जैसे थॊडी सी आग जंगल को जला देती है, उसी प्रकार छॊटा सा शत्रु भी विनाश कर सकता है.”

भीष्मजी के वचनॊं को सुनकर सभी उपस्थित ऋषियों ने उनकी प्रशंसा की. फ़िर संध्या होने के कारण सभी लोग वापिस हस्तिनापुर लौट आए.

दूसरे दिन पाण्डव तथा श्रीकृष्णजी नित्य कर्म से निवृत्त होकर फ़िर कुरुक्षेत्र में भीष्मजी के निकट जा पहुँचे और प्रणाम करने के बाद उनसे पूछा-“ हे पितामह ! कृपा करके बताएं कि राजा शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई?

उन्होंने कहा-“हे धर्मराज ! सत्ययुग में राजा नाम की कोई चीज ही नहीं थी. क्योंकि उस समय न कोई दण्ड था और न ही कोई अपराध करने वाला ही था. उसके बाद लोग मोह के वशीभूत होने लगे. मोह से काम की उत्पत्ति हुई और काम से राग पैदा हुआ.और राग से सभी प्रमादी हो गए और अपने-अपने कर्तव्यों को भूल गए. कर्म भूलने से धर्म का ह्रास होने लगा. तब ब्रह्माजी ने एक लाख अध्यायों का नीति शास्त्र बनाया. वह ग्रन्थ त्रिवर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ. हे धर्मराज ! इन शास्त्रों में साम-दाम-दन्ड, भेद तथा उपेक्षा इन पाँचों का पूर्ण वर्णन है.”

धर्मराज युधिष्ठर ने पूछा-“चारों वर्ण, चारों आश्रम तथा राजाओं के कौन-कौन से धर्म श्रेष्ठ माने गए हैं.

ने कहा-“हे धर्मराज ! धर्म की महिमा ही अपरम्पार है. उसे ध्यान से सुनो. सच बोलना, क्रोधित न होना, धन को बाँटकर उसका प्रयोग करना, क्षमा करना, अपनी स्त्री से सन्तान उत्पन्न करना, शौच करना, किसी से बैर न रखना. ये सभी वर्गों के लिए समान है. ब्राह्मणॊं का धर्म है, इन्द्रिय दमन, स्वाध्याय करना. क्षत्रियों का धर्म है दान देना तथा किसी से कुछ माँगना नहीं, यज्ञ करना तथा कराना नहीं. वेदादि का अध्ययन करना, लुटेरों को दण्ड देना तथा प्रजा का पालन करना. वैश्यों का धर्म है, दान, अध्ययन, यज्ञ करना व पवित्र उपायों से धन कमाना, खेती कराना और पशुओं का पालन करना. शूद्र का धर्म है इन चारों की सेवा करना.”

युधिष्ठिर ने फ़िर पूछा- हे पितामह ! राष्ट्र का क्या कर्तव्य है ?

भीष्मजी ने उत्तर दिया- हे धर्मराज ! राजा का राज्याभिषेक करना राष्ट्र का कर्तव्य है. बिना राजा के प्रजा नष्ट हो जाती है. राज्य में उपद्रव होने लगता है तथा चोरी एवं हिंसा की घटना बढ़ने लगती है. बिना राजा के सबल निर्बल को खाने लगता है.”

युधिष्ठर ने पूछा-हे पितामह ! कृपा करके बतायें कि राजा के क्या कर्तव्य हैं उसे अपने देश की रक्षा कैसे करनी चाहिए?

भीष्मजी ने कहा- “ हे धर्मराज ! राजा को पहले अपने मन को जीत कर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए. उसे राज्य के प्रमुख स्थानों पर सेना का प्रबन्ध करना चाहिए. साम-दाम-दण्ड, भेद से धन प्राप्त करना चाहिए तथा प्रजा की आय का छटवाँ भाग, कर के रुप में प्राप्त करना चाहिए. राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को पुत्र की भाँति माने तथा मित्रों और मंत्रियों की सलाह से काम करे. जो राजा दण्ड-नीति का पूरा-पूरा प्रयोग करता है, उसके राज्य में सत्ययुग आ जाता है.

“ हे युधिष्ठिर ! राजा के छत्तीस गुण हैं. जो इनका पालन करता है, वही स्वर्ग का अधिकारी होता है.

युधिष्ठिर ने कहा – हे पितामह ! शासन बिना मित्र और मन्त्री की सहायता से नहीं चल सकता. कृपया बताएं कि उसके मित्र और मन्त्री कैसे होने चाहिए ?

भीष्मजी ने कहा;- हे धर्मराज ! मित्र चार प्रकार के होते हैं---सहार्थ, यजमान, सहज, तथा कृत्रिम. इसके अतिरिक्त धर्मात्मा मित्र भी होता है. ऎसा मित्र किसी का पक्ष न लेकर केवल धर्म का पक्ष लेता है. उक्त चार मित्रों में पहले के दो मित्र श्रेष्ठ होते हैं और अन्त के मित्र उत्तम नहीं होते. लेकिन कार्य साधन अपने सभी मित्रों से करना चाहिए. बुद्धिमान राजाओं को किसी मित्र पर पूरा-पूरा भरोसा नहीं करना चाहिए. ऎसा करने वालों की अकाल मृत्यु हो जाती है. हे युधिष्ठिर ! कुटुम्बियों से सदा सावधान रहना चाहिए. एक कुटुम्बी दूसरे कुटूम्बी की उन्नति सहन नहीं कर सकता. लेकिन कुटुम्बियों की अवहेलना कभी नहीं करनी चाहिए. क्योंकि दूसरों के दबाने पर कुटुम्बी ही सहायता करता है.”

“ हे राजन ! जो मन्त्री खजाने की चोरी करता हो और राज्य के गुप्त भेदों को खोलता हो, ऎसे मन्त्रियों को नहीं रखना चाहिए. कोष के स्वामी की सदा रक्षा करते रहना चाहिए, क्योंकि धन के लोभ से लोग मरवा भी सकते हैं. मन्त्री के पद पर शीलवान, सत्यवादी, सदाचारी तथा दयालु व्यक्ति को ही रखना चाहिए.”

“शत्रु से मित्रता करने वाले को शत्रु ही समझना चाहिए. उसे गुप्त भेद कभी नही बताना चाहिए. सदाचारी एवं विचारशील व्यक्ति ही गुप्त सलाह सुनने के अधिकारी हैं. “

युधिष्ठिर ने पूछा’- हे पितामह ! राष्ट्र की रक्षा तथा उसका प्रबन्ध किस प्रकार करना चाहिए?

भीष्मजी ने समझाया;-“ धर्मराज ! राजा को चाहिए कि वह एक ग्राम का एक-एक अधिकारी अलग-अलग रखे. एक ग्राम वाले अधिकारी का कर्त्तव्य होगा कि वह अपने ग्राम की सब सूचनाएँ दस ग्रामों के अधिकारी के पास भेजे. उसी प्रकार दस ग्राम वाला सौ अधिकारी के पास उक्त सूचना को भेज दे. फ़िर सहस्त्र ग्रामों वाला अधिकारी उसकी सूचना राजा के पास देगा. इस प्रकार राजा को हर सूचना मिलती रहेगी. ग्रामों की पैदावार ग्रामों के अधिकारियों के पास ही रहनी चाहिए. वे वेतन के रूप मे नियत उपज का प्रयोग कर सकते हैं. हर नीचे का अधिकारी अपने ऊपर वाले अधिकारी को कर देता रहे. सौ गाँव के मालिक को उसके खर्च के लिए एक ग्राम की आमदनी देनी चाहिए. सहत्र ग्रामों वाले अधिकारी के पास युद्ध सम्बन्धी सामग्री रहनी चाहिए तथा उनके पास राजा का एक पदाधिकारी रखना चाहिए. बडॆ-बडॆ नगरों के प्रबन्ध के लिए एक-एक अध्यक्ष रखना चाहिए. प्रत्येक नगराध्यक्ष के पास सेना तथा गुप्तचर हों.”

युधिष्ठिर ने फ़िर प्रश्न किया;- हे पितामह ! यदि कोई राजा चढाई कर दे तो उसके साथ किस प्रकार युद्ध करना चाहिए ?

भीष्मजी ने कहा;-“ हे कुरु नन्दन ! बिना कवच वाले से युद्ध नहीं करना चाहिए. जब कोई कवच धारण कर अस्त्र-शत्र सम्हाले सामने आये, तो राजा को तुरन्त उसके साथ युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाना चाहिए. एक वीर के साथ एक ही वीर का युद्ध होना चाहिए. राजा धर्म-युद्ध में धर्म का आचरण करे एवं कपट युद्ध में कपट का. संकट में पडॆ हुए शत्रु पर अथवा अस्त्र त्यागे हुए योद्धा पर तथा रथ से नीचे उतरने वाले या शरण में आने पर कभी कोई चोट न करे. शिविर मे आने वाले की भली-भाँति चिकित्सा करा कर उसे घर भिजवा देना चाहिए.

------------------------------------------------------------------------------------------------------- १०३, कावेरी नगर, छिन्दवाडा(म.प्र.) ४८०००१ गोवर्धन यादव

जैकपॉट

जिंदगी बड़े मजे में चल रही थी संजीत और संगीता की․ दोनों ही कमाते थे․ संजीत वकालत करता था, साग-सब्‍जी भर पैसे रोज कमा लेता था और संगीता एक स्‍कूल में पढ़ाती थी․ संजीत के पिता को पेंशन मिलता था, वे भी घर चलाने में संजीत और संगीता की मदद कर देते थे․

संजीत और संगीता खुश थे अपने बेटे पप्‍पु और बेटी सोनी के साथ․ लेकिन अपने वर्तमान परिस्‍थिति से कौन संतुष्‍ट और खुश रहता है सो संजीत और संगीता भी अपने खुशहाल जिंदगी में और खुशी चाहते थे और खुशी आज पैसे के सिवाए किसी और चीज के पाने में नहीं․ आज के युग में खुशी का पर्याय पैसा ही बन चुका है․

संजीत और पैसे कमाने की लालसा में जमीन बेचने का दलाली भी दबे छुपे करता रहता पर जीमन की दलाली का तो आज हाल यह है कि बच्‍चे तक दलाल बन गए है․ बच्‍चे से लेकर बूढ़े तक जिसे कुछ समझ में नहीं आता जमीन की दलाली करने लगते है․

दूसरी तरफ संगीता सरकारी स्‍कूल में किसी तरह भी घुसने की जुगत बैठाती रहती․ एक बार सरकारी स्‍कूल में नौकरी हो गयी फिर क्‍या, मासिक वेतन की तो गारंटी हो जाएगी और काम कुछ भी नहीं रह जाएगा पर सात-आठ सालों से संगीता कोशिश ही करती रही है अभी तक उसकी मनोकामना पूरी नहीं हुई थी․

संजीत एक दिन अपने लैपटॉप पर बैठा इंटरनेट पर पैसे कमाने की जुगत भीड़ा रहा था․ अपने मेल चेक करता हुआ जब उसने स्‍पैम हुए मेल को चेक किया तो उसे लगा जैसे उसकी किस्‍मत ही खुल गयी․ उसने तुरंत संगीता को आवाज दी और संगीता जब आयी तो संजीत ने उसे एक करोड़ रूपए का जैकपॉट जीतने वाला मेल दिखाया․ दोनों पति-पत्‍नी खुशी से झूम उठे․ मेल में लिखा था कि आपने डायलिंग कंपनी की ओर से एक करोड़ का जैकपॉट जीता है, कंपनी के डायरेक्‍टर मिस्‍टर राबिन्‍सन से आप निम्‍न फोन नंबर पर संपर्क कर ईनामी राशि लेने की प्रक्रिया शुरू कर सकते है․

संजीत ने तुंरत मिस्‍टर राबिन्‍सन को फोन लगाया, दूसरे तरफ से अंग्रेजी में आवाज आयी, हैलो राबिन्‍सन स्‍पीकिंग․ संजीत ने टूटी-फूटी अंग्रेजी में मिस्‍टर राबिन्‍सन से बात की․ राबिन्‍सन न जाने क्‍या-क्‍या कहा पर संजीत को इतना समझ में आ गया कि उसे एक लाख रूपए दिए गए बैक अकाउंट में पंद्रह दिनों के अंदर जमा करवाने है तभी कंपनी जैकपॉट का एक करोड़ रूपया उसे देगी․

संजीत और संगीता दोनों गहरे सोच में पड़ गए कि इतनी बड़ी रकम कहां से लायी जाए․ दूसरे दिन संजीत अपने कई मित्रों से एक-एक कर संपर्क किया और बिना जैकपॉट वाली बात बताए एक लाख रूपए उधार लेने की जुगत भिड़ाने लगा․ हालांकि संजीत के दो मित्र इतने संपन्‍न थे कि जो एक लाख रूपए उधार दे सकते थे पर पैसे रहने से ही कोई दानवीर नहीं हो जाता सो वे दोनों बात को टाल गए․ शेष मित्रों में सभी निम्‍न मध्‍यवर्गीय परिवार से थे पर संजीत की बातों को गंभीरता से लेते हुए अपने बचत खाते से कोई दस हजार तो कोई पंद्रह हजार देने को तैयार हो गए․ पैंतालीस हजार का इंतजाम संजीत ने अपने मित्रों से उधार लेकर कर लिया था पर अभी भी पचपन हजार का इंतजाम करना बाकी था․ दस हजार रूपए संगीता ने अपने वचत खाते से दिए․ अब पति-पत्‍नी दोनों इस सोच में पड़ गए कि शेष पैंतालीस हजार का इंतजाम कैसे किया जाए․ पिताजी से पैसे मांगने की हिम्‍मत संजीत नहीं जुटा पा रहा था․ पति की वेचैनी संगीता से देखी नहीं जा रही थी․ दो दिन ही बची थी कंपनी के अकाउंट में रूपए जमा कराने के लिए․ अंततः जो भारतीय नारी करती है ऐसे मौके पर, संगीता ने भी वही किया․ अपने ब्‍याह में मिले सोने के कंगन, कान की बाली और गले का हार संजीत को दिया कि इसे बेच दिजीए․ जैकपॉट के एक करोड़ जब मिल जाएंगे तब नये खरीद लूंगी․ संजीत शुरू में तो तैयार नहीं हुआ पर पत्‍नी के समझाने-बुझाने पर सोने के जेवरात गिरवी रखने को तैयार हो गया․ गिरवी रखने पर उसे साठ हजार मिल गए, कुल मिलाकर एक लाख पांच हजार रूपए का इंतजाम हो गया․ चौदह दिन बित चुके थे, पंद्रहवे दिन संजीत ने खुशी-खुशी बैंक जाकर दिए गए बैंक अकाउंट में एक लाख रूपए डाल आया और मिस्‍टर राबिन्‍सन को फोन कर इतिला कर दिया․ मिस्‍टर राबिन्‍सन ने संजीत को धन्‍यवाद दिया और कहा कि जल्‍द ही जैकपॉट का एक करोड़ रूपया उसके अकाउंट में डाल दिया जाएगा․

संजीत घर पहुंचा, बच्‍चे और उसकी पत्‍नी घर पर नहीं थे․ संजीत अपने कमरे में जाकर अभी बैठा ही था कि करोड़ के सपने में खो गया․ बड़ी इम्‍पोटेड़ कार, मेड इन अमेरिका की सूट, आलीशान बंगला, कई नौकर-चाकर के सपने देखता उसे पता ही नहीं चला कि कब शाम हो गयी और संगीता और बच्‍चे आकर कोलाहल मचाने लगे․ सपने से जागने के बाद संजीत ने संगीता को बताया कि बस अब कुछ दिनों की बात है उसके बाद वह संगीतापति के साथ-साथ करोड़पति भी हो जाएगा․

पंदह दिन बित जाने के बाद संजीत ने सोचा कि मिस्‍टर राबिन्‍सन से बात कर लेनी चाहिए और उसने मिस्‍टर राबिन्‍सन को फोन लगाया पर यह क्‍या फोन से आवाज आ रही थी कि नंबर डज नॉट एकजिस्‍ट, दो बार, तीन बार और लगभग दस बार फोन लगाने के बाद भी जब नंबर डज नॉट एकजिस्‍ट ही आता रहा था तब एक अज्ञात भय से संजीत कां पांव कांपने लगा, उसे महसूस होने लगा था कि कहीं वह छला तो नहीं गया ? बेतहाशा संजीत बैंक की ओर दौड़ा, आधे घंटे बाद संजीत बैंक पहुंचा और अपने बैंक अकाउंट का स्‍टेटमेंट लिया और स्‍टेटमेंट के एक-एक हर्फ को मंत्र की तरह पढ़ गया․ एक करोड़ की तो बात ही क्‍या एक रूपया भी उसके अकाउंट में नहीं भेजा गया था․ संजीत ने जिस अकाउंट नंबर पर एक लाख रूपए पंदह दिन पहले जमा करवाये थे उस अकाउंट के संबंध में जब बैंक में पता लगाया तब उसे पता चला कि उस बैंक अकाउंट का कोई अतापता नहीं चल रहा है․

संजीत की तो जैसे कमर ही टूट चुकी थी․ एक लाख रूपया उसके जैसे वकील के लिए बहुत बड़ी रकम थी․ उसे जो बात खायी जा रही थी वह थी संगीता के ब्‍याह के जेवरात जिसे उसने गिरवी रख छोड़ा था और फिर मित्रों से लिया गया कर्ज․ संजीत के आखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा था․

बिना मेहनत के रातोंरात करोड़पति बनने की लालसा संजीत को कहीं का नहीं छोड़ा था․

 

मातृत्‍व

बजारवाद, उपभोक्‍तावाद और विज्ञापन की दुनिया में पल-बढ़ रहा एक स्‍कूली बच्‍चा ‘सेक्‍स' के बारे में जानने के लिए रेडालाइट एरिया में पहुंच गया․ अपने-अपने खिड़कियों और दरवाजे से झांकती उस बच्‍चे को जो सबसे खुबसूरत और प्‍यारी लगी, उसके पास चला गया․ उस बच्‍चे में टीवी और सिनेमा के कामुक स्‍त्रियों को देखकर सेक्‍स के बारे में जानने की इतनी उत्‍सुकता थी कि उसने 100 रूपए उस तवायफ को दिए और पूछा, मुझे सेक्‍स समझाओगी ?

मम्‍मी-डैडी या स्‍कूल टीचर उस बच्‍चे की सेक्‍स के प्रति उत्‍सुकता को अगर समझा कर शांत कर दिए होते तो उसे आज रेडलाइट एरिया में जाने की जरूरत नहीं पड़ती․ आज का बच्‍चा रेडियो पर सिलोन या विविध भारती नहीं सुनता है बल्‍कि टीवी और इंटरनेट पर कामुकता से भरे विज्ञापन और कामुक स्‍त्रियों को देखता है, बच्‍चे में सेक्‍स को जानने की उत्‍सुकता होगी ही․

उस बच्‍चे को देखकर तवायफ को बोर्डिंग में पढ़ते अपने बेटे की याद आयी․ अपने बेटे के उम्र के लड़के के साथ यौन संबंध बनाना उसे अच्‍छा नहीं लगा और उसने बच्‍चे को डांट कर कहा, जा अपने बाप को भेज दे, उसे सेक्‍स समझा दूंगी․

बच्‍चा हालांकि सरपट वहां से भागा सो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा․

 

हार की जीत

मिल्‍खा सिंह को अपनी प्रेरणा मानने वाला रोहित शायद ही कभी अपने स्‍कूल द्वारा आयोजित खेल प्रतियोगिता में द्वितीय आया हो․ रोहित की विशेषता यह थी कि वह खेल में जितना तेज था पढ़ने-लिखने में भी वो उतना ही तेज था․

रोहित के माता-पिता साहित्‍यकार थे इसलिए रोहित को अपने वर्ग यानी 12वीं कक्षा की पुस्‍तकों के अलावा कई तरह के उत्‍कृष्‍ट साहित्‍यिक पुस्‍तकें एवं पत्रिकाओं के पढ़ने का शौक जाग गया था․ रोहित की माँ अच्‍छी कहानियां, कविताएं, निबंध वगैरह लिखा करती थी, जिसे रोहित बड़े ध्‍यान से पढ़ता और रोहित के पिता उसे यदा-कदा साहित्‍य के उद्देश्‍य, साहित्‍य सृजन के तरीके बताते रहते थे․

जहीन होने की वजह से रोहित अपने पिता से एक दिन पूछा कि पापा हमारे जीने का मकसद क्‍या है ?

रोहित के पिता खुश हुए अपने बेटे के प्रश्‍न से, साहित्‍यकार तो वे थे ही, उन्‍होंने अपने बेटे रोहित को बताया कि एक जर्मन नाटककार वर्तोल्‍त ब्रेख्‍त हुआ करता था जिन्‍होंने जीने के उद्देश्‍य के संबंध में बड़ी अच्‍छी बात कही थी कि ‘‘तुम्‍हारा उद्देश्‍य यह न हो कि तुम एक बेहतर इंसान बनो बल्‍कि यह हो कि तुम एक बेहतर समाज से विदा लो․''

रोहित समझ गया था, उसने कहा इसका मतलब तो यही हुआ न पापा कि हम एक अच्‍छे समाज का निर्माण करें और शुरूआत खुद अच्‍छे बनने से करें․

एक्‍जेक्‍टली रोहित, पापा ने उसका हौसला अफजाई किया․

स्‍कूल में दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था․ स्‍कूल में सभी जानते थे कि रोहित तो अव्‍वल आएगा ही․ रोहित से दौड़ में सिर्फ उसका मित्र विवेक ही होड़ ले सकता था․ रोहित, विवेक और मंयक दौड़ में क्रमशः पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर आते रहे थे․ दौड़ का आयोजन नियत समय पर किया गया․ दौड़ में पूर्व की भांति रोहित सबसे आगे भाग रहा था परंतु यह क्‍या रोहित अचानक रूक गया․ रोहित के साये की तरह विवेक को पीछे न पाकर रोहित रूका था, विवेक गिर पड़ा था, रोहित उसके मदद के लिए रूक गया परिणाम यह हुआ कि मंयक दौड़ में प्रथम आ गया था․

स्‍कूल के टीचर, अभिभावक सभी अवाक थे लेकिन रोहित के पिता बहुत खुश हुए उन्‍होंने पुरस्‍कार वितरण समारोह में दो शब्‍द कहे कि रोहित अगर विवेक की मदद के लिए नहीं रूकता तो वह निसंदेह प्रथम पुरस्‍कार हासिल करता परंतु रोहित जीतने की इच्‍छा से अधिक विवेक के जीवन को महत्‍व दिया․ समारोह में रोहित के हार की जीत के लिए सबसे ज्‍यादा तालियां बजी․ पुरस्‍कार रोहित को नहीं मिला पर पुरस्‍कार जीतने से बड़े मकसद को रोहित हासिल कर लिया था․ रोहित के इस छोटे से कार्य ने समाज को थोड़ा और अच्‍छा बनाया दिया था․

राजीव आनंद

प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरगंड़ा

गिरिडीह-815301

झारखंड़

साहित्‍य जगत में दलित साहित्‍य विशेष दर्जा प्राप्‍त कर लिया है क्‍योंकि दलित साहित्‍य स्‍वान्‍त सुखाय के वशीभूत होकर नहीं लिखा जाता है। दलित साहित्‍य में आत्‍मवत्‌ से पर का सद्‌भाव होता है । दलित साहित्‍य भोगा हुआ यथार्थ होता है,जिसमें मानव वेदना और संवेदना के स्‍वर सुने जा सकते हैं। दलित साहित्‍य मानव का उत्‍थान और मानवता को समृद्ध बनाये रखने का माध्‍यम है। दलित साहित्‍य सिर्फ कल्‍पना के उड़नखटोले पर बैठकर नहीं लिखा जा रहा है। यह साहित्‍य सच्‍चाई की कसौटी पर खरा उतरता है। दलित साहित्‍य का उद्‌देश्‍य शिक्षा,मानवीय समानता,सामाजिक,आर्थिक सम्‍पन्‍नता और राजनीति में भागीदारी सुनिश्‍चित करने को भी प्रेरित करता है। दलित साहित्‍य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय और विश्‍वबन्‍धुव सद्‌भाव का द्योतक है। संघर्षरत्‌ जीवन,गरीबी, भूमिहीनता का दंश, छुआदूत, शोषण उत्‍पीड़न वेदना संवेदना ,तिरस्‍कार एवं समाजिक बुराईयों को दलित साहित्‍य प्रमुखता से उठा रहा है। दलित साहित्‍य को किसी न किसी रूप में पेरियार की प्रेरणा से ऊर्जावान है । डांतुलसीराम, डासोहनपाल सुमनाक्षर, डापूरन सिंह, कालीचरण प्रेमी, जयप्रकाश कर्दम, डारमा पांचाल,अनीता भारती डांओमप्रकाश वाल्‍मिक, कंवल भारती, भगवानदास, मोहनदास नैमिशराय, कौशल्‍या बैसन्‍ती, लक्ष्‍मण गायकवाड, माताप्रसाद, सूरजपाल, डाडीआरजाटव, श्रवण कुमार, श्‍योराज सिंह बेचैन, राजमल राज, प्रदीप मौर्य,जीपीपचोरिया, आचार्य गुरू प्रसाद, आरजीकुरील आदि साहित्‍यकार अपने लेखन को सभ्‍य समाज के सामने बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के सद्‌भव के दृढ़ता से रख रहे हैं, रखने का प्रयास कर रहे हैं। दलित लेखल चाहे वह किसी भी विधा-कहानी, लघुकथा, कविता, उपन्‍यास में सामने आया है वह ब्राह्‌मणवाद पर वज्रपात ही किया है।

दलित प्रतिबंधेा/ विरोधों के बीच संघर्षरत्‌ जीने का अभ्‍यस्‍त रहा है परन्‍तु उसकी लेखनी के सामने भारतीय जनमानस ही नहीं विश्‍वसमुदाय भी उद्वेलित हुआ है। दलित विमर्श करते हुए सामाजिक राजनैतिक एवं साहित्‍यिक संदर्भ तलाशने पर सामने मुख्‍य धारा से दूर रहने की छटपटाहट उभर कर सामने आती है जिसके लिये ब्राहमण्‍वाद ही जिम्‍मेदार है। ब्राहमणवाद ही तो है जो दलित समुदाय को हाशिये पर रखा जिसके परिणाम स्‍वरूप भारतीय समाज का बहुत बड़ा हिस्‍सा दलित/ अछूत घोषित कर दिया गया । यह घोषणा ब्राह्‌मणवाद के चक्‍करव्‍यूह से उपजा जहर ही तो है परन्‍तु दलित साहित्‍य ने सदियों से तिरस्‍कृत दलितों को मुख्‍य धारा से जोड़ने की अहम्‌ भूमिका निभा रहा है। भारतीय दलित साहित्‍यिक परिदृश्‍य में पेरियार ईवीरामास्‍वामी को दलित साहित्‍य का ज्‍योर्तिपुंज कहा जा सकता है। ब्राह्‌मणवाद का प्रतिकार और द्रविड़वाद का शंखनाद करने वाले पेरिया का जन्‍म 17 सितम्‍बर 1879 हुआ था। जीव का गुण चेतना से होता है जिस देह में यह चेतना प्रबल रूप से प्रकट हो जाती है,वह नर नरोत्‍तम हो जाता है। ऐसी ही प्रबल चेतना पेरियार ईवीरामास्‍वामी में थी जिसने विषमतावादी अर्थात बाह्‌मणवादी को चुनौती दे दिया। पेरियार आधुनिक युग के विज्ञान बोध और तार्किकता के एक ऐसे क्रान्‍तिकारी विचारक,समाजसुधारक थे जिन्‍होंने सादियों से उपेक्षित दलित समाज को शिखर पर विराजित कर दिया। दलित और पिछड़े समाज को सम्‍मान से जीने का और भारतीय समाज में बराबर का अधिकार पाने का मार्गप्रशस्‍त कर दिया। पेरियार ने दक्षिण भारत की राजनीति से ब्राह्‌मणवाद की जड़े खोद दिये। तमिलनाडु में पेरियार की परिकल्‍पना साकार हो चुकी है। पेरियार ने कहा है,

मुझे ईश्‍वर तथा दूसरे देवी-देवताओं में कोई आस्‍था नहीं है,शास्‍त्र-पुराण और उनमें दर्ज-देवी-देवताओं में मेरी कोई आस्‍था नहीं है क्‍योंकि वे सारे दोषी है और उनको जलाने तथा नष्‍ट करने के लिये जनता से अपील करता हूं। यह अमृत वचन ब्राह्‌मणवाद का प्रतिकार ही तो है। पेरियार के वचन सत्‍य की कसौटी पर खरे भी है,जो धर्मग्रन्‍थ आदमी को दुखी बनाने का कारण हो, आदमी को कुत्‍ते बिल्‍ली से निम्‍न स्‍तर का समझता हो,ऐसे धर्म से देश और समाज का क्‍या भला हो सकता है। जिस धर्मग्रंथ में लिखा हो - शूद्र ढोल गंवार पशु और नारी ये ताड़न के अधिकारी, क्‍या ऐसे धर्मग्रन्‍थ और धर्म के अंधभक्‍त शूद्र और नारी को मानव होने के सुख की अनूभूति करने देंगे नहीं कभी नहीं। यही बा्रह्‌मणवाद है जिसका प्रतिकार पेरियार ने किया। इसी प्रतिकार का प्रतिफल है कि आधुनिक युग में शूद्र और नारी को तनिक सम्‍मान मिल रहा है। पेरियार के कार्य और उपलब्‍धियां अधिक और बहुयामी है,समाज संस्‍कृति शिक्षा धर्म राजनीति और प्रशासन सहित जीवन के हर क्षेत्र में व्‍याप्‍त है। धर्म के पथ पर अग्रसर होने का प्रथम लक्षण प्रफुल्‍लित होना है। विषादयुक्‍त विवादयुक्‍त होना कट्‌टरवाद, अनावश्‍यक पाखण्‍ड युक्‍त वातावरण निर्मित करना अथवा वैचारिक भेद पैदा करना नहीं । धर्म का रहस्‍य आचरण से जाना जाता है । मनुष्‍य में जो स्‍वाभाविक बल ही है उसकी अभिव्‍यक्‍ति ही धर्म है। धर्म का उद्‌देश्‍य मनष्‍य को सुखी बनाये रखना होता है न कि उसे बिखण्‍डित कर अपना उल्‍ल्‍ूा सीधा करना,सत्‍ता हासिल करना । मनुष्‍य में पाशविक,मानवीय और दैवी गुण होते हैं। वह गुण जो व्‍यक्‍ति में पशुता के भाव का संचार करता है वह पाप है, जो गुण व्‍यक्‍ति में समानता का गुण बढ़ाता है वही पुण्‍य है । व्‍यक्‍ति को पाशविक गुणों पर विजय प्राप्‍त कर मनुष्य बनना ही मनुष्यता के प्रति न्‍याय है ।

मनुष्‍य में जो स्‍वाभावकि बल है उसकी अभिव्‍यक्‍ति ही धर्म है। आज के युग में जहां चारों ओर चोरी डकैती,लूटपाट,आतंकवाद जातिवाद फैला हुआ हैं । ऐसे वातावरण में बात चाहे जितनी बडी से बडी क्‍यों न की जाये पर चाहत तो ऐशोआराम की चीजें इक्‍ट्‌ठा करने और जल्‍दी से जल्‍दी अमीर बनने की चाह ने आम आदमी को झकझोर कर रख दिया है । आज के आदमी को धर्म की अफीम की खुराक को तिलांजलि देकर भगवान भगवान बुद्ध के बताये रास्‍ते पर चलना होगा । धर्म का उद्‌देश्‍य तो जीवन को उत्‍सव बनाना होता है ।सुखी बनाना होता है,जो धर्म आदमी आदमी के बीच दीवार खीचे ,बिखण्‍डित समाज की स्‍थापना को बल दे। स्‍व-धर्मावलम्‍बियों के बीच नातेदारी की मनाही करे क्‍या धर्म का उपहास नहीं।

व्‍यक्‍ति की आत्‍मा परमात्‍मा का अंश है यदि किसी की आत्‍मा को धर्म की वजह से अथवा अन्‍य कारणो से दुख पहुंचता है तो निश्‍चित रूप से इसका एहसास परमात्‍मा को होगा । धर्म का रहस्‍य आचरण से जाना जा सकता है,व्‍यर्थ के मतवादों अथवा आडम्‍बरो,रूढियों से नहीं ।सत्‍य आतंकित आंसू बह रहा है । न्‍याय विवादित होने लगा है। अनाचार जातिवाद, व्‍यभिचार साम्‍प्रदायिकता का आतंक बढने लगा है । गुरू और शिष्‍य का सम्‍बन्‍ध ग्राहक और दुकानदार जैसा हो गया है । आदमी आदमियत को भूलता जा रहा है । क्‍या कोई धर्म ऐसी शिक्षा कभी दे सकता है ? जो दीन है दलित है,उसकी मदद करना, उसे आत्‍मबल प्रदान करना,उसके हितार्थ कार्य करना ही धर्म है । धर्म तो सद्‌भावना,समानता का पोषक होता है। सर्वकल्‍याणकारी और मंगलकारी होता है । धर्म की छावं आदमी को सुखी बनाने का माध्‍यम है । वर्तमान समय में मानवीय एकता, समानता,सद्‌भावना और समृध्‍दि के लिये प्रयास की जरूरत है। वर्तमान का सबसे बड़ा धर्म आदमियत का दर्द ,इस धर्म को निभाने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। पेरियार का मूल उद्‌देश्‍य वर्ण और शोषण से मुक्‍त समाज की स्‍थापना था। इसी नेक उद्‌देश्‍य के कारण पेरियार को आत्‍म सम्‍मान आन्‍दोलन का जनक कहा जाता है। इतना ही नहीं सामाजिक समानता के इस क्रान्‍तिकारी सन्‍त को सुकरात और भारत भाग्‍य विधाता तक कहा गया है। दलित साहित्‍य के संदर्भ में भी इस महामानव को देखा जाना चाहिये। यकीनन इस महापुरूष ने दलित साहित्‍य को स्‍वर्णिम युग की तरफ मोड दिया है।

रामायण काल में भी मानवीय समानता के उद्‌देश्‍य से दबे कुचले शिक्षा से वंचित लोगों को शिक्षित करने का प्रयास शम्‍भुख ऋषि द्वारा किया गया था परन्‍तु ब्राहमणवाद ने उनकी हत्‍या राम के हाथों करवा दी गयी थी। शम्‍भुख ऋषि का हत्‍या तो हो गयी पर आज भी उनका नाम बड़े सम्‍मान से लिया जाता है । मध्‍यकाल के सन्‍तों जैसे तुकाराम, नरसी मेहता, गुरूनानक, कबीर और सन्‍तशिरोमणि सन्‍तशिरोमणिा रविदास ने सामाजिक समानता का विगुल बजा दिया था। सन्‍त रविदास ने मन चंगा कठौती में गंगा का उद्‌घोघ कर आन्‍तरिक पवित्रता का मर्मस्‍पर्शी मन्‍त्र देकर शोषित वर्ग को ऊपर उठाने में बड़ी भूमिका अदा किया था। रविदास ने आत्‍मानुभमत सत्‍य का प्रतिपादन कर भक्‍ति भावना जागृत किया जिससे आत्‍म कल्‍याण और भक्‍ति का मार्ग प्रशस्‍त हुआ। रविदास को जातिवाद अथवा ब्राहमणवाद का विरोधी कहा जा सकता है। रविदास ने सामाजिक भेदभाव और उंच-नीच को समाप्‍त कर परस्‍पर प्रेम भाई चारे और सौहार्द का संदेश दिया । आधुनिक युग में भी रविदास का संदेश पथप्रदर्श, उद्‌बोधक और प्रेरणादायी है।

पेरियार अर्थात सम्‍मानित व्‍यक्‍ति, बींसवी सदी के तमिलनाडु के प्रमुख राजनेता एवं समाज सुधारक थे। पेरियार ने रूढि़वादी हिन्दुत्‍व के विरोध के सिद्धान्‍त पर जस्‍टिस पार्टी का गठन किया था । भारतीय शोषित समाज खासकर दक्षिण भारत के शोषित समाज के लोगों की स्‍थिति को सुधारने में पेरियार अर्थात आधुनिक भारत भाग्‍य विधाता का नाम गर्व के साथ लिया जाता है। पेरियार औपचारिक शिक्षा प्राप्‍त कर पैतृक व्‍यवसाय में लग गये थे। उनके घर में पूजापाठ, भजन-कीर्तन,उपदेश चलता रहता था । वे उपदेशों में कही बातों की प्रमाणिकता पर वे सवाल करते रहते थे। हिन्‍दू महाकाव्‍य और पुराणों की विरोधी तथा बेतुका बातों का मजाक बनाने से भी नहीं चूकते थे। बाल विवाह देवदासी प्रथा स्‍त्रियों तथा दलितों के शोषण के घोर विरोधी थे। वे हिन्‍दू वर्ण व्‍यवस्‍था के बहिष्‍कार की हिम्‍मत भी कर दिखाये थे। उन्‍हें झूठ पसन्‍द नहीं था,जिसके कारण एक बा्रहमण को गिरफतार करवाकर न्‍यायालय की मदद किये थे परन्‍तु पेरियार का यह कार्य उनके पिता को नहीं भाया जिसका उन्‍हें दण्‍ड मिला था। इससे कुपित होकर वे घर छोड़कर काशी चले गये थे।काशी में निः शुल्‍क भोजन में जाने के इच्‍छा उन्‍हें अपमानित होना पड़ा फिर क्‍या आधुनिक सुकरात ने हिन्‍दुत्‍व के विरोध की ठान लिये थे।पेरियार ने धर्मानान्‍तरण तो नहीं किया पर वे नास्‍तिकता की राह पर चल पड़े जिस राह पर वे सदैव चले । ये बात अलग है कि इस नास्‍तिक सुकरात को एक मंदिर का न्‍यासी बनाया गया जिसका पदभार भी वे संभाले।इसके बाद वे नगरपालिका के प्रमुख बनाये गये थे। चक्रवर्ती राजगोपालचारी के कहने पर वे कांग्रेस की सदस्‍यता भी लिये और जल्‍दी ही कांग्रेस की तमिलनाडु इकाई के प्रमुख बनाये गये। केरल के कांग्रेस नेताओं के अनुरोध पर वे वाईकांम आन्‍दोलन का नेत्‌त्‍व भी स्‍वीकार कर लिया था। यह आन्‍दोलन मंदिरों की ओर जाने वाली सड़कों पर अछूतों के चलने की मनाही को हटाने के लिये कार्य कर रहा था।काग्रेस षरा संचालित शिविर में ब्राहमण प्रशिक्षक द्वारा गैर ब्राहमण के साथ भेदभाव को देखकर कांग्रसे से उनका मोह भंग होने लगा। पेरियार कांग्रेस नेताओं के सामने दलितों शोषितों के लिये आरक्षण की मांग कर बैठे थे जिसे पार्टी ने खारिज कर दिया। आखिर में वे कांग्रेस छोड़ने का फैसला कर लिया। सोवियत रूस के दौर पर उन्‍हें साम्‍यवाद की सफलता ने बहुत प्रभावित किया वापस आकर वे आर्थिक साम्‍यवादी नीति बनाने की घोषणा कर दिये। खैर बाद में किन्‍हीं कारणोंवश उन्‍हें अपना विचार बदलना पड़ा था पर इस सुकरात ने अपने को सज की राजनीति से अलग रखकर आजीवन दलितों तथा स्‍त्रियों की दशा सुधारने का कार्य करता रहा। अन्‍ततः आधुनिक भारत भाग्‍य विधाता बनकर गैर ब्राहमणों खासकर शोषितो- दलितों की धड़कन बन गया। पेरियार का कृतित्‍व और व्‍यक्‍तित्‍व गैर ब्राहमणों और दलित साहित्‍य के संदर्भ में धरोहर बन चुका है।

आधुनिक युग में मानवतावादी पेरियार ने 1925 आत्‍मसम्‍मान आन्‍दोलन प्रारम्‍भ कर सत्‍य साबित कर दिया वे दलितों को उनका हक दिला देंगे। यह आन्‍दोलन चार दशक से अधिक चला था। इस दौरान दक्षिण भारत में ही नहीं पूरे भारत में समाज सुधार के बड़े कार्य हुए। पेरियार ने अंधविश्‍वास और रूढि़वादी रीतिरिवाजो अर्थात ब्राहमणवादी रिवाजों के उन्‍मूलन पर जोर दिया। जाति व्‍यवस्‍था पर प्रहार किया। दलितों और स्‍त्री शिक्षा के लिये आन्‍दोलित किया। इसी आन्‍दोलन के दौरान पेरियार कांग्रेस छोड़ जस्‍टिस पार्टी के नेता बन गये । इसी दौरान उनका मतभेद रामगोपालचारी और अन्‍ना दुराई से भी हुआ । इसी दौरान पेरियार ने वैकुम सत्‍याग्रह के माध्‍यम से वैकुम मंदिर के पट अछूतों के लिये खुलवाने में कामयाब रहे हैं। 1944 में पेरियार ने द्रविड़कड़गम पार्टी की स्‍थापना किये जो द्रविड़वाद का द्योतक तो था ही इस पार्टी का उद्‌देश्‍य ब्रिट्रिश सरकार से देश को आजाद भी करवाकर स्‍वतन्‍त्र द्रविड़ राज्‍य की स्‍थापना भी था जो द्रविड़वाद की दृष्‍टि से बड़ी पहल थी।

ब्राहमणवाद के विरूद्ध पेरियार ने सभाओं / गोष्‍ठियों द्वारा बड़ा जनमत जुटा लिये थे। उनका मानना था कि ब्राहमणवाद ही समाज के लिये खतरा है,उनकी मानना भी सत्‍य था क्‍योंकि ब्राह्‌मणवाद का दिया जख्‍म तो आज भी शोषित दलित समाज ढो रहा है। इस जख्‍म के दर्द से चाह कर भी उबर नहीं पा रहा है। जातिवाद,छुआछूत ब्राहमणवाद की विषैली खेती है जो भारतीय समाज में आज भी जहर बो रही है। विज्ञान के युग में भी हैण्‍ड पाइप से पानी लेने पर शोषित प्रतिबन्‍धित है। दलितों की बस्‍ती तक के कुएं का पानी तो अपवित्र था ही। दलित वर्ग के लोगों को आज भी उनका हक नहीं मिल रहा है,दलित आज भी भूमिहीन,गरीब,शोषित पीडि़त है, तरक्‍की से दूर पड़े बाट जोह रहे हैं, ये पीड़ा कहां से उपजी है यकीनन ब्राहमणवाद से। इन्‍हीं पीड़ाओं से कराह कर पेरियार ने ब्राहमणवाद को जड़ से खत्‍म करने का बीड़ा उठाया था। ब्राहमणवाद अर्थात छुआछूत एक बड़े वर्ग को गुलाम बनाये रखने की साजिश जो स्‍वतन्‍त्र भारत में भी जीवित है। ब्राहमणवाद तथाकथित उच्‍च वर्णिक समाज के लिये एक विचारधारा के साथ संस्‍कृति भी बन चुका है। ब्राहमणवाद की जड़े वेद-पुराणों से होते हुए जातिवाद तक पहुंचती है। यही कारण है कि हिन्‍दू धर्म जातिवाद का पर्याय बन चुका है। जाति हर वर्ग की पहचान बन चुकी है, हिन्‍दू ही ऐसा धर्म है जहां आदमी धर्म के नाम से नहीं जाति के नाम से पहचाना जाता है।

इतिहास गवाह है प्राचीन काल से ब्राहमणवाद की ही वर्चस्‍व रहा है चाहे सामाजिक ठेकेदारी की बात हो या राजनैतिक आर्थिक अथवा शिक्षा पर कब्‍जा सब कुछ ब्राहमणवाद के अधीनस्‍थ रहा है। इसी ठेकेदारी को ध्‍वस्‍त करने के लिये पेरियार ने महाअभियान छेड़ रखा था और आज भी जारी है पर अभी भी बहुत कुछ ब्राहमणवाद के कब्‍जे में है। हिन्‍द धर्म में जातीय विसंगतियां इतने व्‍यापक स्‍तर पर पाई जाती है कि पत्‍थर को दूध पिलाया जाता है और आदमी को अछूत मानकर कुत्‍ते-बिल्‍ली जैसा व्‍यवहार किया जाता है। ब्राहमणवाद ने छुआछूत, जातिवाद को हिन्‍दू धर्म की पहचान बना दिया है। ब्राहमणवाद ही मनुष्‍य को मनुष्‍य में भेद करने को विवश किया है। ब्रहामणवाद ने उलितों का ही नहीं हिन्‍दुत्‍व का भी सत्‍यानाश कर दिया है। ब्राहमणवाद से ग्रसित लोगों ने अपने को सदैव उपर रखने का प्रयास किया निचले तबके के लोगों का आदमी तक भी नहीं समझा। इसी ब्राहमणवाद से उबरने के नेक उद्‌देश्‍य ने आधुनिक युग के सुकरात ने ब्राहमणवाद का प्रतिकार किया और देवी देवताओं को जलाने तक की बात किये देश-दुनिया के सामने। ब्राहमणवाद हिन्‍दू मंदिरों में ही नहीं बौद्ध मंदिरों तक में कब्‍जा कर रखा है। ये कैसा ढीठ ब्राहमणवाद है कि विज्ञान के युग में भी भ्रमित कर रहा है। इसी भ्रम से बचाकर इंसानियत की राह पर समानता के साथ चलना सीखाना पेरियार के सामाजिक सुधारों और जाति उन्‍मूलन के आन्‍दोलनों का मुख्‍य उद्‌देश्‍य था।

पेरियार ने सामाजिक आन्‍दोलन को और गति प्रदान करने के लिये कड़गम जो कि राजनीतिक पार्टी थी का नाम बदल कर जस्‍टिस पार्टी रख दिया था। पेरियार का बुद्धिवाद आन्‍दोलन,स्‍वाभिमान आन्‍दोलन ये आन्‍दोलन सफल भी हुए। पेरियार ने अपने वक्‍तव्‍यों में कहा है कि मैंने सब कुछ किया और गणेश आदि सभी ब्राहमण देवी देवताओं की मूर्तियां तोड़ डाली है। राम आदि के चित्र भी जला दिये हैं। मेरे इन कार्यों के बावजूद भी,मेरी सभाओं में मेरे भाषण सुनने के लिये हजारों की गिनती में लोग इक्‍ट्‌ठा हो रहे हैं तो यह स्‍पष्‍ट है कि स्‍वाभिमान तथा बुद्धि होना जनता में जागृति का संदेश है। द्रविड़वाद का उद्‌देश्‍य भी यही था कि आर्य ब्राहमणवादी वर्णव्‍यवस्‍था खत्‍म हो। वे देवी-देवताओं पर कटाक्ष करते हुए कहते थे देखो ब्राहमण देवी -देवताओं को एक देवता से हाथ में भाला उठाकर खड़ा है और दूसरा धुनष बाण,अन्‍य दूसरे देवी-देवता कोई खंजर कोई ढाल के साथ सुशोभित हो रहा है। एक देवता अपनी अगुंली पर चक्‍कर चलाता है ये सब क्‍यों जबकि ईसाई,मुस्‍लिम और बुद्ध धर्म के संस्‍थापक सेवा,दया,करूणा के द्योतक है। हिन्‍दू देवी-देवताओं के हाथों में अस्‍त्र शस्‍त्र बा्रहमणवाद की तस्‍वीर को जीवन्‍तता प्रदान कर डर पैदा करने के उद्‌देश्‍य ये किरदार रचे गये है। सार में कहा जाये तो ब्राहमणवाद चौथे वर्ण को गुलाम बनाने का प्राचीन से हथियार रहा है। इसी हठधर्मिता को तोड़ने के लिये पेरियार को देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ने और जलाने का उद्यम करना पड़ा होगा। सच ब्राहमणवाद भारतीय समाज के वर्णिक क्रम में चौथे स्‍थान के लोगों के लिये धरती पर नरक लोक का दुख की चीखती तस्‍वीर रहा है। इस चीखती तस्‍वीर को समानता और मानवीय समरसता की तस्‍वीर में बदलना पेरियार का सपना था। यह लोक कल्‍याण के लिये जरूरी भी है।

द्रविडवाद सही मायने में द्रविड़ भारत के मूलनिवासियों को पहचान देना है। जैसाकि तमिल/द्रविड़ अनार्य है दलितों,आदिवासियों,वनवासियों की तरह जो आज भी अपने अधिकार के लिये सदियों से बा्रहमणवाद से संघर्षरत्‌ है। जैसाकि विदित है कि तमिल,दमित और दलित ये शब्‍द मूल निवासियों के सम्‍बोधित किये जाते हैं। मूल निवासी अनार्य पहले से ही कुशल कारीगर,हस्‍तशिल्‍पी,इंजीनियर रहे हैं,मोहनजोदड़ों हड़प्‍पा इसके उदाहरण है चाहे वे तमिल,दमित और दलित के नाम से जाने जाते रहे हो । द्रविड़वाद सद्‌भावना,समानता का संदेश आम आदमी तक पहुंचाने का माध्‍यम रहा होगा। अंधविश्‍वास, छूआछूत, कुप्रथाओं, रूढिवादिता जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाना शिक्षा और सामाजिक सुधार के कार्यों को गति प्रदान करना ही द्रविड़वाद का उद्‌देश्‍य रहा है। द्रविडवाद दलित साहित्‍य की लोकप्रियता से जोडकर देखे जाने की आवश्‍यकता है। दलित साहित्‍य के संदर्भ में द्रविड़वाद को धार्मिक एवं सामजिक सुधार का आन्‍दोलन कहा जाना उचित होगा,जिसके प्रेरणास्रोत क्रान्‍तिकारी आधुनिक विचारक पेरियार ही है।

पेरियार आधुनिक विचारक,साामाजिक सुधारक तो थे ही स्‍पष्‍टवादिता के लिये भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि आजादी के सवाल पर एक रूसी पत्रकार से उन्‍होंने दो टूक कहा था हमारे देश को स्‍वतन्‍त्र हुए 17 साल बीत चुके है लेकिन सच यह है कि यह आजादी सिर्फ ब्राहमणों को मिली है। उन्‍होंने अपने वक्‍तव्‍य में कहा था भारत की लगभग 97․25 प्रतिशत आबादी गैर ब्राहमणों की है। सभी धर्मों के अनुयायी परस्‍पर भाई-बहन माने जाते हैं परन्‍तु हिन्‍दू धर्म ही ऐसा है जिसमें सब बराबर नहीं है। उंची-नीची जाति के लोग माने जाते हैं। इस तरह का सामाजिक अपमान कब तक झेलते रहेंगे। ईश्‍वर की समाप्‍ति, काग्रेस का बहिष्‍कार,ब्राहमणें का बहिष्‍कार पेरियार के सामाजिक सिद्धान्‍त है जो शोषित समाज की सोच में परिवर्तन और उनके उद्धार में मील के पत्‍थर साबित हुए है हां बा्रहमणवाद का वर्चस्‍व पूर्णतः खत्‍म तो नहीं हुआ है पर बहुत कम हुआ है दलित समाज सम्‍मान के साथ जीने का सपना भी सजोने लगे है जिसके प्रेरणास्रेात पेरियार को माना जा सकता है। पेरियार के सिद्धान्‍त ईश्‍वर की समाप्‍ति का ही प्रभाव था कि पहली बार तमिलनाडु की विधान सभा में सदस्‍यों ने ईश्‍वर के नाम पर शपथ नहीं लिया था। पेरियार की ही प्रेरणा से तमिलनाडु सरकार ने आदेश जारी किया कि सरकारी दफ्‌तरों में देवी देवताओं की तस्‍वीरें न लगायी जाये। पेरियार ने अपने चिन्‍तन से ईश्‍वर को चुनौती दे डाला यकीनन इससे बा्रहमणवाद की जड़े हिल चुकी है। ब्राहमणवाद पूर्णतः खत्‍म करने के लिये एक और पेरियार जैसे आधुनिक चिन्‍तक की देश को जरूरत है।

पेरियार आधुनिक क्रान्‍तिकारी विचारक और दलित,पिछड़ेवर्ग के उत्‍थान की दूरदृष्‍टि रखने वाले महामानव थे। पेरियार की दृष्‍टि विश्‍व व्‍यापी थी।वे पूरी दुनिया का भ्रमण कर लिये थे। वे अथक समाजसेवी शोषितवर्ग के दुखाहर्ता थे,सुखकर्ता थे। अपने आन्‍दोलन के आखिरी चरण में इतने बीमार हो गये थे कि चलने फिरने में दिक्‍कत आ रही थी इसके बावजूद भी सभाओं,गोष्‍ठियों ,सम्‍मेलनों में भाग ले रहे थे। वे चाहते थे कि उनके जीते जी सारे मिशन पूरे हो जाये। आपने जीवन के अन्‍तिम दिनों में भी बुद्धिवाद,स्‍वाभिमान,महिलाओं के अधिकार,सामाजिक सुधार,जाति तमिल राष्‍ट्रवाद और ब्राहमणवाद उन्‍मूलन आन्‍दोलन के कार्य करते हुए स्‍वनामधन्‍य महानायक क्रान्‍तिकारी पेरियार ईवीरामास्‍वामी 25 दिसम्‍बर को दुनिया को अलविदा कह दिये ।

भारतीय समाज के दलित शोषित और पीडि़तों में स्‍व-मान की भावना जगाने के लिये आधुनिक युग के सुकरात और भारत भाग्‍य विधाता के कार्य सदैव विश्‍व के इतिहास में कीर्ति स्‍तम्‍भ बने रहेंगे।

पेरियार एक व्‍यक्‍ति नहीं अपने आप में एक संस्‍था थे । अन्‍ना दुराई आधुनिक युग के सुकरात पेरियार को एक युग मानते थे। अन्‍ना दुराई ने कहा था पेरियार ने दो सौ वर्षो का काम बीस वर्ष में कर दिखाया। फूले,अम्‍बेडकर और पेरियार तीनों शोषित समाज के लिये जीये तीनों महामनवों में समानता यह थी कि ये तीनों महामानव दलित पिछड़ी जनता और स्‍त्रियों के कल्‍याण के लिये प्रतिबद्ध थे। जातीय असमानता और शोषित समाज की समस्‍याओं से आजीवन लड़ते रहे। फूले,अम्‍बेडकर और पेरियार भारतीय दर्शन,राजनीति और सामाजिक जीवन को बहुत गहराई से प्रभावित किये हैं। इन तीनों मसीहाओं का लगाव बौद्ध दर्शन की ओर था। डां अम्‍बेडकर ने तो बौद्ध धर्म स्‍वीकार कर लिया। पेरियार बौद्ध धर्म सम्‍मेलनों में भाग लिया करते थे। इस आधुनिक सुकरात ने अर्न्‍तराष्‍ट्रीय बौद्ध सम्‍मेलन भी करवाया था जो ब्राहमणवाद के प्रतिकार का द्योतक था। आधुनिक युग के सुकरात के व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व ने ब्राह्‌मणवाद का प्रतिकार कर शोषित समाज को सम्‍मान से जीने की दृष्‍टि प्रदान की है, द्रविड़वाद को सुदृढ़ता भी। दलित साहित्‍य के संदर्भ आधुनिक युग के सुकरात पेरियार का व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व कालजयी उपलब्धि बना रहेगा। दलित रचनाकारों को दायित्‍वबोध एवं नित नई ऊर्जा प्रदान करता रहेगा और दलित साहित्‍य को विश्‍वव्‍यापी कैनवास ।

डॉनन्‍दलाल भारती

एम।समाजशास्‍त्र। एलएलबी। आनर्स ।

पीजीडिप्‍लोमा-एचआरडी

सिन्धी कहानी

यह भी कोई कहानी है ?

मूल: गोविंद माल्ही

अनुवाद: देवी नागरानी

मोहन ने मुझे अपने घर पर मिलने और उसके पास रात रहने की सलाह दी, और मैं फौरन रज़ामंद हो गया ।

एक ज़माना था जब हम दोनों का उठना, बैठना, खाना-पीना, घूमना-फिरना और लिखना-पढ़ना साथ में ही होता था । वह न सिर्फ़ मेरी उम्र का था पर मेरा पड़ोसी भी था, बचपन से लेकर मैट्रिक तक दोनों साथ रहे थे । मैट्रिक पास करने के पश्चात् मैं जाकर कराची में कॉलेजी दुनिया में दाख़िल हो गया । उसका बाप दाल-रोटी वाला ज़रूर था, पर कॉलेज के कमर तोड़ते ख़र्च भर सके ऐसी उसकी हैसियत न थी !

मोहन कुछ वक़्त बेरोज़गार रहने के बाद पी॰ डब्ल्यू.डी॰ में मुलाज़िम बन गया । हम एक दूसरे से जुदा होकर, न मिलने वाली राहों पर आगे बढ़ते रहे । सालों बाद हम एक दूजे के साथ गले मिले तो सिन्ध में नहीं, बल्कि अहमदाबाद के गाँधी चौक में मिले । हमारे बिछड़ने के लम्बे अरसे में दुनिया न जाने कितनी करवटें बदल चुकी थी । वह डिपार्टमेंटल परीक्षा पास करके ‘रोड डिवीज़न’ का हेड क्लर्क बन गया और मैं... मैं साहित्य और सेवा के चक्कर में फँसकर न घर का रहा न घाट का ।

उसका घर मणी नगर में था, उसने बस में मेरे बगल में बैठते हुए पूछा - ‘तुमने शादी की है ?’

मैंने हँसते हुए कहा - ‘मैं ज़िन्दगी में अभी तक ख़ुद को बसा हुआ नहीं समझता । किसी की कन्या को राहों में भटकाना मुझे पसंद नहीं !’

वह विस्मय में पड़ गया, कुछ और मुझसे पूछे उसके पहले मैंने अपना सवाल उसके सामने रखा - ‘तुमने तो ज़रूर शादी की होगी ?’

उसके चेहरे पर एक अजीब ख़ुशी का भाव उभर आया । उसने मुस्कराते हुए कहा - ‘मेरी एक बेटी भी है रेखा, जो पाँच-छः सालों की हुई है ।’

बात ख़त्म होने के पश्चात् भी वह मुस्कराता रहा ।

‘मैं तुम्हें शादी पर आने का निमंत्रण ज़रूर देता, पर देशांतर गमन के दौरान यह होश बरक़रार रखना कि कौन कहाँ है, ज़रा कठिन था ।’

मैंने हैरत भरे अंदाज़ में पूछा - ‘मतलब ?’

‘तुम्हें लिखने और तक़रीरें करने से फ़ुर्सत ही कहाँ रहती है ?’ वह हँसा और मैंने मुस्कराने की कोशिश की ।

हम उसके घर के बरामदे में दाख़िल होने को थे, तो रेखा आकर अपने पिता से लिपटते हुए कहने लगी - ‘दादा, तुम पाकिस्तान से गाएँ लाए क्या ?

मोहन ने मेरी तरफ़ मुड़ते हुए कहा - ‘हमारे पड़ोसी ने कल एक गाय ली है ।’

रेखा ने कहा - ‘मुझे भी गाय चाहिए ।’

मैंने उसे टालने के लिये कहा - ‘हमारी गायें पाकिस्तान में हैं ।

कहने लगी - ‘पाकिस्तान से गायें ले आओ ।’

मुझे हँसी आ गई ।

रेखा ने फिर सवाल दोहराया ‘तुम पाकिस्तान से गायें ले आए क्या ?’

बाप ने नीचे बैठकर बेटी की बाहें अपने गले के चारों ओर मोड़ते हुए कहा - ‘कल ज़रूर लाऊँगा । आज तुम अपने चाचा से मिलो, नमस्ते करो बेटे !’

रेखा ने अपनी नाज़ुक बाहें मोहन के गले से आज़ाद कराते हुए अपने कोमल हाथ मेरी ओर जोड़ते हुए कहा - ‘चाचा नमस्ते !’

मेरे हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद उसकी ओर बढ़े, मैंने उसे गोद में उठा लिया और स्नेह से पूछा - ‘तुम्हारा नाम क्या है ?’

उसने कहा - ‘रेखा...मम्मी मुझे रेखा रानी कह कर बुलाती है ।’

मैंने बेअख़्तियार ही उसका दायाँ हाथ अपने गले के पीछे मोड़ते हुए, खींचकर उसे छाती से लगाया ।

मोहन ने हँसते हुए कहा - ‘लेखक महोदय, शादी बंधन सही, पर उसकी अपनी नियामतें है ।’

मुझमें उसकी बात काटने की हिम्मत न थी । चुपचाप निहायत ही नज़ाकत के साथ रेखा को ज़मीन पर उतार दिया । वह दौड़ती हुई घर के भीतरी भाग के गई । मैं एकटक उसी ओर देखता रहा ।

मोहन ने मेरे मन की अवस्था समझकर बात का रुख़ बदलते हुए कहा - ‘पिताजी कहा करते थे, जब मक्खन था तब दाँत नहीं थे, अब दाँत है तो मक्खन नहीं है ।’

मैं अभी भी उसी दरवाज़े को ताक रहा था। पर मोहन ने जब मुझे भीतर चलने को कहा, तब मैंने ख़ुश्क आवाज़ में जवाब देते हुए कहा - ‘मैं यहीं बैठता हूँ’ ऐसा कहते हुए मैं बरामदे में पड़ी सन की रस्सी से बुनी खाट की ओर बढ़ा । मैं खाट तक पहुँचा, उससे पहले घूँघट ओढ़े एक नारी चादर हाथ में थामे हुए खाट के पास पहुँची ।

मोहन ने उससे चादर लेते हुए कहा - ‘मुँह क्यों ढक लिया है ? यह मेरा दोस्त है, भाई से बढ़कर ।’

नारी ने कोई जवाब नहीं दिया और न ही घूँघट ऊपर उठाया । चुपचाप मोहन को चादर बिछाने में मदद करती रही ।और फिर मेरी ओर मुख़ातिब रेखा से तकिया लेकर खाट के सिरहाने रखा और फिर भीतर चली गई ।

रेखा को देखते ही मैं यह जान गया था कि मोहन की पत्नी सुडौल और अच्छे नयन-नक़्श वाली होगी । नारी के हाथ और पाँवों को देखकर जाना कि वह गोरी भी थी।

मैं खाट पर बैठा और मोहन कपड़े बदलने अंदर चला गया । रेखा धीरे-धीरे, रुक-रुक कर मेरी ओर बढ़ी मेरे पास पहुँचकर पूछा - ‘मैं अपनी गुड़िया दिखाऊँ !’

मैंने झट से कहा - ‘हाँ, हाँ ले आओ ।’

रेखा जब वापस आई तो उसके हाथों में गुड़िया नहीं, मिठाई की प्लेट थी । घूँघट ओढ़े पीछे से उसकी माँ तिपाई ले आई । मोहन ने टवाल मेरी ओर बढ़ाया । मैं हाथ-मुँह धोकर फिर खाट पर बैठा तो रेखा हाथ में गुड़िया ले, इठलाती बलखाती मेरे पास आई । मैंने उससे गुड़िया लेते हुए कहा - ‘बहुत सुन्दर है ।’

रेखा ने पूछा - ‘मुझसे भी सुन्दर है ?’ मैं एक पल के लिये तो लाजवाब हो गया ।

मैंने मिठाई का एक टुकड़ा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा - ‘तुम उससे बहुत अच्छी हो ।’ रेखा मिठाई न लेकर पीछे की ओर खिसकती रही ।

‘ले लो बेटे, यह तुम्हारा चाचा है ना ?’ मोहन ने उससे कहा ।

रेखा ने मिठाई ली, गुड़िया मेरे पास ही छोड़कर घर के भीतर चली गई ।

जब वह बाहर आई तब दूर से ही पूछती आई - ‘तुम मुझे कहानी सुनाओगे ?’

मैंने उसका हाथ थामकर उसे अपनी तरफ़ खींचते हुए कहा - ‘मुझे कहानी आती ही नहीं ।’

‘मम्मी कहती है तुम्हें बहुत कहानियाँ आती हैं ।’

‘तुम्हारी मम्मी को कैसे मालूम हुआ ?’ मैंने आश्चर्य से पूछा ।

जवाब मोहन ने दिया - ‘मेरी श्रीमती किताब पढ़ने का शौक रखती है । मैंने तेरी इतनी कहानियाँ नहीं पढ़ी होंगी, जितनी उसने पढ़ी हैं ।’

मैंने हँसकर कहा - ‘फिर भी मुझसे पर्दा करती है ।’

‘कहती है अगली बार ज़रूर घूंघट हटाएगी और आप से कहानियों के बारे में कुछ सवाल भी पूछेगी’, मोहन ने उत्तर दिया ।

मेरी ज़बान से बेअख़्तियार निकल गया - ‘आज क्यों नहीं पूछती ?’

रेखा ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा - ‘कहानी सुनाओगे !’

‘ज़रूर !’

‘तो फिर सुनाओ ।’

‘सोते वक़्त सुनाऊँगा ।’

‘सोते वक़्त तो मम्मी मुझे कहानी सुनाती है, तुम अभी सुनाओ ।’

‘आज तुम मम्मी की बजाय मुझसे कहानी सुनना ।’

‘फिर मैं तुम्हारे साथ सो जाऊँ ?’

मैं अब बगलें हांकने लगा पर मोहन मददगार बना - ‘यह रोज़ माँ से कहानी सुनती है और फिर माँ के पास ही ढेर बनकर पड़ी रहती है ।’

मैंने हँसते हुए रेखा के बालों पर हाथ फेरते हुए कहा - ‘तुम मेरे साथ सो जाना ।’

रह-रहकर रेखा मुझे कहानी सुनाने का वादा याद कराती रही । रेखा की माँ खाना खाते वक़्त मेरे सामने आई पर पहले से भी लम्बा घूँघट निकालकर । मुझे एक तरफ़ उसका घूँघट खटक रहा था कि उसमें छुपी एक सुन्दर नारी... नहीं... एक श्रद्धालू पाठक से रू-ब-रू होने की आतुरता भी दूसरी तरफ़ बढ़ रही थी । पर ज़बान इतनी हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी कि मैं उससे कुछ बतिया सकूँ !

खाना खाने के पश्चात् मोहन ने कहा - ‘खाना खाने के बाद, पान खाने की आदत तो ज़रूर अपनाई होगी ?’

‘अभी नहीं !’ मैंने मुख़्तसर जवाब दिया ।

‘हमें तो आदत है, पान न खाएँ तो खाना हज़म नहीं होता ।’

यूँ कहकर वह बरामदे से नीचे उतरने लगा ।

‘कहाँ जा रहे हो ?’ मैंने पूछा ।

उसने उत्तर दिया ‘चलो तो पान भी खाएँ और दो चार क़दम भी चल आएँ ।’

रेखा ने दौड़कर पिता की उँगली थामी और कहा - ‘दादा मैं भी चलूँगी !’

मैंने बरामदे वाली खाट की ओर बढ़ते हुए कहा - ‘तुम जाओ, मैं बैठा हूँ । रात के खाने के बाद मुझे घूमने की आदत नहीं ।’

रेखा ने पिता को खींचते हुए कहा - ‘तुम्हारे लिये पान लाऊँ ?’

‘ज़रूर’ ! मैंने खाट पर बैठते हुए कहा ।

उनके जाने के बाद मेरा दिल उस श्रद्धालु पाठक का चेहरा देखने और दो शब्द बतियाने के लिए आतुर हो उठा । मैं खाट से उठकर, घर के भीतरी हिस्से की ओर बढ़ा, अचानक.... पीछे से आवाज़ आई - ‘मीठा पान खाओगे या सादा ?’

मैंने चौंककर पीछे देखा, रेखा आधे रास्ते से दौड़ती, हाँफती आई थी । मैंने हड़बड़ाहट में कहा - ‘मीठा... मीठा पान लाना ।’

रेखा जैसे आई थी वैसे दौड़ती हुई चली गई । अब घर में भीतर जाने की मेरी हिम्मत जवाब दे गई ।

मैं बरामदे के पास ईंटों के बने चबूतरे पर टहलता रहा ।

रेखा की माँ एक बार फिर मेरे सामने आई, हाथ में दूध का गिलास लिये हुए । उसका घूँघट क़ायदे से क़ायम रहा ।

मैंने उसके हाथ से दूध का गिलास न लेते हुए कहा - ‘मैं दूध नहीं पीता ।’ वह मुड़कर लौटने को हुई । मैंने हँसते हुए कहा - ‘भाभी, आपको मेरी कौन-सी कहानी पसंद है ?’

‘भाभी’ लफ़्ज पर वह रुकी, पर और कुछ न सुनकर जवाब देने की बजाय वह जल्दी-जल्दी भीतर चली गई ।

सोते वक़्त रेखा मेरे बिस्तर पर आ बैठी । मैं हाथ के सिरहाने एक बाजू लेटा था । मेरी कमर पर चढ़ने की कोशिश करते हुए कहने लगी - ‘चाचा, कहानी सुनाओ ।’

‘फिर तुम मेरे साथ सो जाओगी ?’

‘हाँ, मैं मम्मी से पूछकर आई हूँ !’

मैं सीधा होकर सो गया और वह कोहनियाँ मेरी छाती पर रखकर अपना चेहरा अपनी ही हथेलियों पर टिकाकर मेरा चेहरा तकने लगी ।

मैंने शुरू किया, ‘एक था राजा...’

‘फिर ?’

‘खाता था काजू...’

उसने बात आधे में ही काटते कहा - ‘ऊँहूँ, ये कहानी मैंने कई बार सुनी है ।’

मैंने थोड़ा सोच-विचार करके कहा - ‘एक था राजा, उसकी औलाद ही नहीं थी..!’

‘यह कहानी मम्मी ने मुझे सुनाई है !’

मैं फिर सोच में पड़ गया, उसने मुझे झंझोड़ते हुए कहा - ‘चाचा कहानी सुनाओ ना।’

मैंने गला साफ़ करते हुए कहा - ‘एक था राजा, उसकी सात बेटियाँ थीं ।’

वह खफ़ा होते हुए बोली, ‘यह कहानी भी सुनी हुई है ।’

मैंने हार मानते हुए कहा - ‘मुझे और कोई कहानी नहीं आती ।’

मम्मी तो कहती है - ‘तुम कहानियाँ बनाते हो...।’

‘मुझे राजाओं की कहानियाँ नहीं आती है ।’

अचानक उसने कहा - ‘मैं कहानी सुनाऊँ ?’

‘सुनाओ’

‘यह कहानी मम्मी ने आज मुझे सुनाई है ।’

‘सुनाओ तो सही !’

‘पाकिस्तान के एक गाँव में एक लड़की रहती थी । चाचा, पाकिस्तान बहुत दूर है न ?’

‘हाँ, तुम कहानी सुनाओ ।’

‘वहाँ एक लड़का आया, उस गाँव में उसके नाना-नानी का घर था ।’

थोड़ी देर रुककर उसने फिर कहा - ‘वो दोनों साथ खेलते थे । अधड़न-दादड़न खेल खेला करते थे । अधड़न-दादड़न खेल क्या होता है चाचा?’

‘तुमने अपनी मम्मी से नहीं पूछा ?’

‘उसने कहा अपने चाचा से पूछना !’

‘जैसे तुम गुड्डे-गुड़ियों के साथ खेला करती हो, वैसे ही पहले गाँवों में लड़के-लड़कियाँ गुड्डा-गुड्डी बना करते थे ।’

‘लड़के-लड़कियाँ गुड्डा-गुड्डी बना करते थे ? फिर क्या होता था ?’

‘तुम अपनी कहानी सुनाओ...’

उसने कुछ पल रुककर कहा - ‘लड़का लड़की का दूल्हा बना । लड़के ने लड़की से कहा मैं बड़ा होकर तुमसे शादी करूँगा । शादी क्या होती है चाचा?’

‘अपनी मम्मी से पूछकर आओ ।’

‘मम्मी नहीं बताती है ।’

‘तुम पहले अपनी कहानी सुनाओ, फिर बताऊँगा ।’

‘लड़का जब वहाँ जाता था तब लड़की को ऐसे कहता था ।’

मेरे मुँह से बे-अख़्तियार निकल गया - ‘फिर क्या हुआ ?

‘वह कॉलेज में गया, कॉलेज क्या होता है ?’

मैंने उतावलेपन में कहा - ‘तुम कहानी सुनाओ ।’

‘लड़के ने लड़की को भुला दिया ।’

‘फिर ?’

‘लड़की आस लगाए बैठी रही, आस क्या होती है चाचा ?’ मेरे चेहरे पर पसीना तर आया । मैंने पसीना पोंछते हुए कहा - ‘फिर आख़िर क्या हुआ ?’

उसने लफ़्जों के उच्चारण पर ज़ोर देते हुए कहा - ‘लड़का फिर नहीं लौटा, और लड़की के माँ-बाप ने उसकी शादी दूसरी जगह कर दी ।’

मैं ठगा-सा रह गया, मेरी ज़ुबान को ताले लग गए । उसने शरारती अंदाज़ में कहा - ‘कहानी ख़तम हुई, अब एक आना दो’ (आना रुपये का दसवां हिस्सा होता है)

मैंने हँसने की कोशिश करते हुए कहा - ‘ये भी कोई कहानी है ?’

‘मैंने भी मम्मी को यही कहा, मम्मी ने पहली बार ऐसी कहानी सुनाई है जिसमें लड़के-लड़की की शादी नहीं हुई । मैंने मम्मी से पूछा - ‘लड़के का क्या हुआ ?’

‘क्या कहा ?’ मैंने घुटन भरे आवाज़ में पूछा ।

‘कहा, पहले लड़का बहुत दूध पीता था, अब बिलकुल नहीं पीता ।’

मैं बेअख़्तियार उठ बैठा, मेरी हालत उस आदमी की तरह थी जिसे सांप ने डसा हो और ज़हर उसकी रग-रग में फैलकर उसके सभी अंगों को पीड़ा दे रहा हो ।

उसी वक़्त मोहन बाहर निकला । मुझे परेशान देखकर कहा - ‘रेखा ने तुझे काफ़ी परेशान किया है ।’

मैंने रूमाल से चेहरा पोंछते हुए पूछा - ‘गांधी चौक की तरफ़ बस चलती होगी ?’

उसने घड़ी देखते हुए कहा - ‘साढ़े दस बज गए हैं, बंद हो गई होगी, पर क्यों ?’

मैंने खाट छोड़ी और उठकर खड़ा हो गया, कहा - ‘टैक्सी मिलेगी ? मुझे किसीसे ज़रूरी मिलना है !’

मोहन ने गंभीर स्वर में कहा - ‘तुम यहाँ रात रहने का वादा करके आए हो ।’

‘सुबह वह बड़ोदा चला जाएगा’ मैंने खड़े-खड़े कहा ।

रेखा ने रोती-सी आवाज़ में कहा - ‘चाचा, तुम जा रहे हो ? मेरे साथ नहीं सो पाओगे ?’

मोहन ने कहा - ‘लेखक होना भी मुसीबत है ।’

मैंने रेखा से कहा - ‘तुम मेरे साथ चलोगी ?’

उसने बेधड़क होकर कहा - ‘मम्मी चलेगी तो मैं भी चलूँगी ।’

मेरा मन ख़राब हो गया, मोहन ने कहा - ‘मैं कपड़े बदल कर आता हूँ । स्टेशन रोड से शायद कोई टैक्सी मिल जाए’ कहते हुए वह भीतर चला गया । मैंने रेखा को गोद में लेते हुए कहा - ‘मम्मी से कहना कि लड़की लड़के से शादी करके दुखी होती, अब वह बहुत सुखी है ।’

बरामदे के दरवाज़े की ओट में से ज़नानी आवाज़ आई, गोया वह ख़ुद से बात करते हुए कह रही थी - ‘स्त्री के सुख को नापने का अंदाज़ मर्दों का न्यारा है !’

मेरे पास कोई जवाब नहीं था । मोहन कपड़े बदल कर आया और साथ में मेरी वेस्टकोट भी लेता आया । मैं उसे पहनते हुए बरामदे से नीचे उतरा ।

मोहन ने हँसते हुए कहा - ‘सुबह को उससे मिल न सकोगे ।’

‘नहीं’ कहते हुए मैं आगे बढ़ा, मेरे पीछे आते-आते मोहन कहता रहा - ‘छुटपन वाली ज़िद की आदत आज भी तुम में मौजूद है ।’

पीछे से रेखा की आवाज आई - ‘चाचा, टाटा !! फिर कब आओगे ?’

मैंने बिना मुड़े हाथ के इशारे से उसे अलविदा कर दी !!

clip_image002 अनुवाद: देवी नागरानी

जन्म: 1941 कराची, सिन्ध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी, 2 भजन-संग्रह, 2 अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिन्धी में परस्पर अनुवाद। राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय संस्थाओं में सम्मानित , न्यू जर्सी, न्यू यॉर्क, ओस्लो, तमिलनाडू अकादमी व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से सम्मानित / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुसकृत

संपर्क 9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050॰ फोन:9987928358

clip_image004.गोविन्द माल्ही (१९२१-२००१)

ठारूशाह, सिंध (पाकिस्तान), उपन्यास - २४, कहानी सं. - ४, एकांकी सं. - ३, अन्य ६ पुस्तकें । आत्मकथा, सफ़रनामा, लेख इत्यादि प्रकाशित । ‘उपन्यास-सम्राट’ के तौर पर ख्याति प्राप्त । विभाजन (१९४७) के पहले ही सिंध में लेखन कार्य । प्रगतिशील धारा के पक्के हिमायती । सिंधी गायन और संगीत को लोकप्रिय बनाने में बेजोड़ योगदान। ‘मुर्क’ पत्रिका के संपादक, ‘प्यार जी प्यास’ उपन्यास पर १९७६ साहित्य अकादमी एवं महाराष्ट्र सरकार द्वारा गौरव पुरस्कार से सम्मानित

 

युवावर्ग और रचनात्‍मकता एक दूसरे के पूरक हैं, युवा संरक्षक है तो रचना अथवा साहित्‍य विरासत/धरोहर। भारतीय समाज में इस साहित्‍यिक विरासत का विशेष महत्‍व प्रारम्‍भ से रहा है। भारतीय समाज को साहित्‍यिक पाठशाला कहा जाता है। इसी पाठशाला से दीक्षित होकर बच्‍चा बड़ा होकर हिन्‍दी साहित्‍यिक रचनात्‍मकता से जुड़ जाता है। वह समझ जाता है कि साहित्‍यकार समाज अथवा युग की उपेक्षा नहीं कर सकता क्‍योंकि साहित्‍यकार की दृष्‍टि में साहित्‍य ही अपने समाज का स्‍वर और संगीत होता है। इसी उद्‌देश्‍य को जीवन्‍तता प्रदान करने के लिये वह लेखन से जुड़ जाता है। यही लगाव रचनात्‍मकता और पुस्‍तक संस्‍कृति की विरासत बन जाता है। वर्तमान समय में भी युवावर्ग की जुडा़व रचनात्‍मकता से है। रचनात्‍मकता की कई विधायें हो सकती है परन्‍तु मैं हिन्‍दी साहित्‍य के परिपेक्ष्‍य में विचार साझा कर रहा हूं। आधुनिक व्‍यावसायिकता की दौर में युवावर्ग का हिन्‍दी लेखन से मोहभंग हो रहा है क्‍योंकि हिन्‍दी रचनाकारों को वह सब कुछ यानि शोहरत और दौलत नहीं मिल रहा है, सम्‍भवतः जो अंग्रेजी के लेखकों को मिल रहा है।

यही वजह है कि युवावर्ग को हिन्‍दी साहित्‍य लेखन आकर्षित नहीं कर पा रहा है। कुछ उत्‍साही युवा हिन्‍दी साहित्‍य से जुड़ने का जोखिम उठा रहे है,जिसके कारण वर्तमान समय में पुस्‍तक संस्‍कृति जीवित है। पुस्‍तकें भी छप रही है परन्‍तु आलमारी में सजने तक ही समिति है। इसके कई कारण है वर्तमान समय दूरसंचार क्रान्‍ति का दौर है,युवावर्ग अर्न्‍तजाल के गिरफ्त में है,पाठकों की कमी है। दूसरी तरफ वैश्‍वीकरण एवं भूमण्‍डलीयकरण के वर्तमान दौर में सामाजिक ,सांस्‍कृतिक एवं नैतिक मूल्‍य झंझावतों के शिकार हो गये हैं। युवावर्ग नैतिक मूल्‍यों एवं पढ़ने की आदत से दूर,अनिश्‍चितता तथा बेचैनी के दौर से गुजर रहा है। सामाजिक तथा चारित्रिक मापदण्‍डों में भी बदलाव आने लगे हैं। ऐसे समय में विवेकानन्‍दजी की सोच-हमें ऐसी शिक्षा-दीक्षा की आवश्‍यकता है, जिससे चरित्र-निर्माण हो,मानसिक शक्‍ति बढ़े, बुध्‍दि विकसित हो और मनुष्‍य अपने पैरों पर खड़ा होना सीखे और शिक्षा पुस्‍तक संस्‍कृति ही दे सकती है। यह तभी सम्‍भव होगा जब युवावर्ग हिन्‍दी साहित्‍य और पुस्‍तक संस्‍कृति के महत्‍व को समझेगा और कल्‍पनाशीलता और रचनात्‍मकता के साथ साहित्‍य सृजन से जुड़ेगा।

युवा वर्ग में बढ़ती हिंसक प्रवृति पर विचार करने पर यह जरूर उभर कर आता है कि युवा वर्ग/छात्रों का साहित्‍यिक पुस्‍तकों से दूर जाना अथवा दूर रखने में संयुक्‍त परिवार की टूटन और रिश्‍तों में सिकुड़न काफी हद तक जिम्‍मेदार हैं। कुछ दशक पूर्व बच्‍चे दादी-दादी,नाना-नानी एवं नजदीकी रिश्‍तेदारों के सान्निध्‍य में पलते बढ़ते और पढ़ते थे। आज बच्‍चों को न लोककथाओं पर आधारित कहानी किस्‍से एवं लोरियां सुनने को मिल रहे हैं और ना ही पारम्‍परिक खेल खिलौने की वस्‍तुयिं। वर्तमान दौर में हिन्‍दी की उपेक्षा देश की उपेक्षा है। आजादी के बाद हिन्‍दी की जो राजनैतिक स्‍तर पर जो दुर्दशा हुई है,वह तो जगजाहिर है,इसके बाद भी हिन्‍दी विश्‍वपटल पर ग्राह्‌य हुई है परन्‍तु हिन्‍दी को अपने ही देश में राष्‍ट्रभाषा होने का अधिकारिक दर्जा नहीं प्राप्‍त हुआ है । संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की अधिकारिक भाषाओं में शामिल करना विश्‍वस्‍तरीय संगठन संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ द्वारा किया जाना है। देश में हिन्‍दी को राष्‍ट्रभाषा का अधिकारिक दर्जा न मिलना सचमुच आश्‍चर्य का विषय है। यह हिन्‍दी लेखन एवं साहित्‍य से विमुख करने का कारण भी है।

भारतीय समाज की रचनात्‍मकता आदिकाल से ही सम्‍वृद्ध है,इस साहित्‍यिक सम्‍पन्‍नता के उदाहरण के तौर पर पौराणिक कथायें और ग्रन्‍थ है। भारतीय साहित्‍य में आजादी के आन्‍दोलन के प्रारम्‍भिक काल से साहित्‍यिक संगठनों को बढावा मिला क्‍योंकि संगठनों के माध्‍यम से भारतीय समाज ,राष्‍ट्रीय एकता और गुलामी की जंजीरे तोड़ने के लिये लेखक निडर लिख रहे थे और उनका साहित्‍यिक योगदान भारतीय मानव-मन को स्‍वाभिमान की आक्‍सीजन से उत्‍साहित कर उर्जावान बना रहा था । आजादी के दीवाने विजय पथ पर निरन्‍तर आगे बढ़ रहे थे । कहा जाता है कि तलवार से अधिक ताकतवर कलम होती है। इस मान्‍यता में विश्‍वास रखने वालों ने साहित्‍यिक संगठनों को मजबूत कर स्‍वराज के लिये खूब लिखा और काल के गाल पर अमर हुए । भारतीय स्‍वतन्‍त्रता संग्राम के प्रारम्‍भ से आजादी के बाद तक साहित्‍यिक योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । नामचीन लेखकों को छोड़ दिया जाये तो और भी ऐसे अनजान युवा लेखक आजादी के लिये लेखनी की ताकत देश पर न्‍यौछावर किये, वे तमिल, मराठी, बंगाली, गुजराती ,पंजाबी या अन्‍य भाषा-भाषी होकर भी संगठनात्‍मक रूप से जुड़े रहे और उन्‍हें हिन्‍दी आजादी के भाषा और राष्‍ट्र की भाषा के रूप में मान्‍य थी परन्‍तु व्‍यावसायिककरण के इस दौर में हिन्‍दी साहित्‍य हाशिये पर आ चुका है,जिसके लिये प्रकाशक,पाठकभारतीय समाज और सरकारें जिम्‍मेदार है।

भारतीय समाज में अनेक युवा लेखन कर रहे हैं परन्‍तु हिन्‍दी लेखन से युवावर्ग का जुड़ाव कम होता जा रहा है। जाहिर है बिना वजह यह नहीं हो रहा है,इसके पीछे कई कारण भी है। वर्तमान शिक्षा पद्धति जो अंग्रेजी को पोषित कर रही है,को प्रमुख कारण माना जा सकता है। इस कारण हिन्‍दी लेखन के प्रति युवावर्ग का जुड़ाव कम हो रहा है। इसे हिन्‍दी भाषा और साहित्‍य पर अतिक्रमण के रूप में देखा जाना चाहिये। पाश्‍चात्‍य प्रवृति की बढ़ती देखा-देखी के अनुसरण के कारण रहन-सहन,आचार-विचार के साथ ही हिन्‍दी साहित्‍य को भी हाशिये पर रख दिया है,इसमें बड़ी भागीदारी युवावर्ग की है। कैरिअर में बढ़ती प्रतिस्‍पर्धा भी कारण है परन्‍तु माता मातृभूमि और मातृभाषा को रोजगार के तराजू पर तौलना उचित तो नहीं लगता। कई भाषाओं में विशेषज्ञता हासिल करना विद्वता की परिचायक है परन्‍तु स्‍वयं की मातृभाषा-राष्‍ट्रभाषा को नजरअंदाज कर देना आर्थिक एवं दिखावे की पाश्‍चात्‍य सांस्‍कृतिक सम्‍पन्‍नता का द्योतक तो हो सकता है परन्‍तु राष्‍ट्र और राष्‍ट्र भाषा के प्रति न्‍याय तो नहीं कहा जा सकता। इसके लिये दोषी कोई और नहीं भारतीय शिक्षा पद्धति और नीतियां ही है। अंग्रेजी को रोजगार की भाषा घोषित कर देने की वजह से अंग्रेजी शिक्षा की ओर रूझान इतनी बढ़ गया है कि हिन्‍दी पद्धति से शिक्षा प्राप्‍त युवा स्‍वयं को पिछड़ा हुआ पाता है। यकीनन इस वजह से हिन्‍दी साहित्‍य से युवावर्ग का मोह शनै-शनै कम होता जा रहा है।

रचनात्‍मकता अथवा लेखन की जहां तक बात है युवा वर्ग जिस भाषा में शिक्षा प्राप्‍त करता है,उनकी विचार प्रक्रिया,रचनात्‍मकता,सृजनात्‍मकता क्षमता उसी भाषा में कुसुमित होने लगती है। बोलचाल की भाषा हो या लेखन की सामान्‍यतः अपनी मातृभाषा में ज्‍यादा अनुकूलता के साथ व्‍यवहार सम्‍भव होता है। हिन्‍दी भाषा सम्‍पन्‍न एंव विश्‍वबन्‍धुत्‍व की भाषा है,ऐसा कदापि नहीं है कि हिन्‍दी भाषी क्षेत्रों में योग्‍यता की कमी है परन्‍तु अंग्रेजी को सिरमौर्य साबित करने का प्रयास ही घातक साबित हो रहा है। इसी वजह से पठन-पाठन की रूचि में कमी आने लगी है। संक्षेप में कहा जाये तो इसके लिये भारतीय समाज,प्रकाशक और काफी हद तक इसके लिये सरकारें जिम्‍मेदार हैं। आज युवावर्ग अपने भविष्‍य को लेकर ज्‍यादा चिन्‍तित है,इस चिन्‍ता को घोटालेबाज और बढ़ा रहे है, मध्‍य प्रदेश का पी․एम․टी․फर्जीवाड़ा इसका ज्‍वलन्‍त उदाहरण है,पी․एम․टी․के फर्जीवाड़े के जिम्‍मेदारों को फांसी की सजा भी कम लगती है। इस तरह के फर्जीवाड़े युवावर्ग के सामने संकट पैदा कर देते है। युवावर्ग कैसे रचनात्‍मक कार्यों से जुड़ सकेगा कहीं ना कहीं भारतीय समाज भाषा,जाति,क्षेत्र एवं अन्‍य मुद्‌दों से जुड़े रहकर युवावर्ग को दिशाहीन बना रहा है। लेखन एवं साहित्‍यिक पुस्‍तक संस्‍कृति की ओर न उत्‍प्रेरित कर भटकाव पैदा कर रहे हैं।

होना तो ये चाहिये कि रोजगारोन्‍मुखी शिक्षा के साथ युवावर्ग को साहित्‍यिक,सांस्‍कृतिक एवं नैतिकमूल्‍यों को पोषित करने वाली पुस्‍तकें पढ़ने के लिये प्रेरणा दी जानी चाहिये,ऐसा नहीं होने की उपज ही तो है अनाथ आश्रम,वृद्धाश्रम एवं अन्‍य उद्धारगृह। आज रंग बदलते परिवेश में सब कुछ कैरिअर के ऐनक से देखा जा रहा है। जैसाकि मान्‍य है कि साहित्‍य में अन्‍य क्षेत्रों की तुलना स्‍थापित होने में ज्‍यादा समय लगता है क्‍योंकि यहां भी कुर्सी मोह पालथी मारे रहता है,सम्‍भवतः इसलिये भी युवावर्ग इस ओर ध्‍यान देने की बजाये दूसरे क्षेत्रों की चकाचौध की तरफ सरपट भागने लगा है।

वर्तमान में साहित्‍य क्षेत्र भी बाजारवाद एंव स्‍वार्थ की भेंट चढ़ चुका है लेख है कि लीक से हटना भी नहीं चाह रहे हैं। इन ढेर सारी मुश्‍किलों के बाद भी हिन्‍दी साहित्‍य वीरान नहीं हुआ है,अभी भी सम्‍वृद्ध एवं सम्‍पन्‍न है परन्‍तु इसे युवावर्ग के साथ की जरूरत है और युवावर्ग को समर्थ हिन्‍दी रचनाकारों के सहयोग की तभी युवावर्ग हिन्‍दी रचनात्‍मकता को नया क्षितिज प्रदान कर जीवन्‍तता प्रदान कर सकेगा। वर्तमान में अनेक युवालेखकों द्वारा रचनात्‍मक हिन्‍दी साहित्‍य लिखा जा रहा है परन्‍तु उन्‍हें मंच नहीं मिल रहा है,उनकी पुस्‍तकों को प्रकाशक नहीं मिल रहे,प्रकाशक मिल रहे हैं तो लेखक से पूरी कीमत वसूल रहे है,यह जोखिम हर लेखक उठा नहीं सकता है,अखबारों में हिन्‍दी साहित्‍यिक पन्‍ने खत्‍म हो गये हैं या नहीं के बराबर हो गये हैं परिणाम स्‍वरूप पाठकों तक पुस्‍तकें/रचनायें पहुंच नहीं पा रही है। इससे युवावर्ग की रचनात्‍मकता को ग्रहण लग रहा है। दूसरी ओर जो पुस्‍तकें आ रही हैं अधिकतर उनकी विषय वस्‍तु स्‍त्री-पुरूष सम्‍बन्‍धों एवं शहरी जीवन के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है। वर्तमान में आ रही पुस्‍तकों से ग्राम्‍यजीवन कोसों दूर हो गया है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारतीय साहित्‍यिक,सांस्‍कृतिक विरासत को संरक्षित रखना है तो युवावर्ग और उसकी रचनात्‍मकता को पहचान देने के भारतीय समाज और सरकार को आगे आना होगा।

डां नन्‍दलाल भारती

 

 

डॉनन्‍दलाल भारती 08․12․2013

एम।समाजशास्‍त्र। एलएलबी। आनर्स ।

पीजीडिप्‍लोमा-एचआरडी

बिलारी के भाग से शिकहर टूट गयल-यह भोजपुरी कहावत धूरत प्रसाद जंगली पर बिल्‍कुल सही बैठती थी। धूरत प्रसाद जंगली निहायत स्‍वार्थी किस्‍म का आदमी था। धूरत प्रसाद जंगली के मां बाप बड़े नेक इंसान थे । धूरत प्रसाद जंगली के मां-बाप पहाड़ी जीवन को त्‍याग कर मैदानी इलाके के शहर में आकर बस गये वही घिसौनी कर बेटे को स्‍नातक तक पढ़ाये। बेटवा की पढ़ाई की चिन्‍ता में वे अपनी बुढ़ौती के लिये कुछ नहीं जोड़ पाये। हां स्‍लम इलाके में एक झुग्‍गी जोड़ लिये थे जो बाद में सरकारी नीतियों के कारण भवन में बदल गयी थी यही उनकी सबसे कीमती पूंजी थी। खैर सबसे बड़ी पूंजी तो वे अपने बेटे धूरत प्रसाद जंगली को मानते थे । धूरत प्रसाद जंगली अच्‍छे समय में स्‍नातक तक की शिक्षा पा लिया था,स्‍नातक होते ही उसे नौकरी मिल गयी। बीकामपास खूबसूरत बेटवा को नौकरी मिलते ही मां-बाप ने सजातीय खूब सूरत लड़की से ब्‍याह कर दिया। नौकरी धूरत प्रसाद जंगली के पुश्‍तैनी घर-आंगन में बसन्‍त गमक उठा पर क्‍या कुछ ही महीनों में मां-बाप का सपना चकनाचूर हो गया। कुछ ही दिनों में वह अपने मां-बाप को बोझ समझने लगा था। मां-बाप बेटवा धूरत प्रसाद जंगली की तरक्‍की अपने श्रम की सार्थकता पर भगवान को मूड़ पटक-पटक कर धन्‍यवाद देते नहीं थकते थे।

मां-बाप की दुआयें असरदार रही कुछ बरसों की नौकरी में उसने ऐसी तरक्‍की की बड़े-पढ़े लिखे फेल हो गये। धूरत प्रसाद जंगली की भूख बढ़ती जा रही थी। साम दाम दण्‍ड और भेद से काम निकालना इतनी चतुराई से सीख गया था कि तरक्‍की की रेस में बहुत आगे निकल गया। इस जंगली मामूली सी बाबूगिरी से नौकरी शुरू किया था। चम्‍मचागीरी के औजार के सहारे धूरत प्रसाद जंगली जोनल मैनजर साहब का खास बन गया था । वह साहब के कुत्‍ते को घुमाने की जिम्‍मेदारी उठा लिया। साहब भी इतने निरकुंश नहीं थे उन्‍होंने इस वफादारी का बड़ा प्रतिफल दिया। मामूली टाइपिस्‍ट मुख्‍य मैनेजर बन गया। अब क्‍या शेर के मुंह खून लग गया,उसने छोटे कर्मचारियों का दमन और बड़े अधिकारियों का जूता सिर पर लेकर चलने लगा। धूरत प्रसाद जंगली साहब लोगों को खुश करने की कला में माहिर था । रोटी-बोटी,शबाब-कबाब के साथ खोखा अथवा कार्टून तक का इन्‍तजाम कर देता था। धूरत प्रसाद जंगली इस करतूत ने उसे नौकरी में सफलता के झण्‍डे गड़वा दिये। धूरत प्रसाद जंगली छोटे कर्मचारियों के लिये खासकर निचले तबके के कर्मचारियों को तो अपना दुश्‍मन समझता था। ना जाने उसे इतनी चिढ़ क्‍यों थी वह कहता छोटे लोगों से दूरी बनाकर रखना चाहिये,इनकी तरफ हाथ बढ़ाया तो सिर पर चढ़कर मूतने लगते हैं। रूढ़िवादी मानसिकता के लोग धूरत प्रसाद जंगली का साथ भी देते थे। धूरत प्रसाद जंगली छोटे कर्मचारियों के साफ-सुथरे अथवा नये कपड़े जूते को इतनी बारीकी से देखता जैसे थानेदार चोर को देखता है। छोटे कर्मचारी का अच्‍छा कपड़ा पहनना उसे पसन्‍द न था वह छोटे कर्मचारी को गुलाम की तरह देखता था। धूरत प्रसाद जंगली का शिकार सेवानन्‍द जो उच्‍चशिक्षित परन्‍तु टाइपिस्‍ट क्‍लर्क था दुर्भाग्‍यवश वह निचले तबके से भी था।

सेवानन्‍द की तरक्‍की धूरत प्रसाद जंगली को तनिक ना पसन्‍द थी।वह सेवानन्‍द के भविष्‍य को घुन की तरह चट करने पर तुला हुआ थी। धूरत प्रसाद जंगली ने सेवानन्‍द की सीआरइतनी खराब कर दी थी उसको कम्‍पनी का हर अधिकारी थानेदार की निगाह से देखता था। सेवानन्‍द के योग्‍यता जातीय तराजू पर तौले जाने की परम्‍परा धूरत प्रसाद जंगली ने शुरू करवा दिया था। सेवानन्‍द की दो बार डीपीसी हुई दोनो बार जातीय निम्‍नता की तुला पर सेवानन्‍द श्रेष्‍ठ साबित नहीं हो सका । अन्‍ततः उसे नौकरी करना था तो टाइपिस्‍ट से उपर सोचना भी अपराध बन गया था। धूरत प्रसाद जंगली स्‍वयं और उच्‍च अधिकारियों से भी कहवा चुका था कि सेवानन्‍द अफसर बनने की तुम्‍हारी इच्‍छा इस कम्‍पनी में पूरी नहीं हो सकती है। बस एक ही तरीका है कम्‍पनी की नौकरी से इस्‍तीफा दे दो या गले में अफसर की पट्‌टी बांध लो। सेवानन्‍द अपने भविष्‍य के दुश्‍मनों की शिनाख्‍त तो कर चुका था परन्‍तु नौकरी छोड़ने के बाद नौकरी नहीं मिली तो परिवार के भूखों मरने और बच्‍चों की पढ़ाई छूटने के डर से उसका कलेजा मुंह को आ जाता था। वह इसी उधेड़-बुन में बूढ़ा हुए जा रहा था। चिन्‍ता की चिता ने उसे कई बीमारियों के चक्रव्‍यूह में उलझा दिया। सेवानन्‍द सेवानन्‍द के रफ को टाइप कर रहा था, इसी बीच एक अजनबी आ गया। सेवानन्‍द से बोला हेलो सेवानन्‍द।

सेवानन्‍द -आप कौन ․․․․․․․?

रसूख खिलवी ।

कहां से आये हो ।

इसी कम्‍पनी की सिस्‍टर कंसर्न कम्‍पनी में काम करता हूं। रहीस मुझे जानता है। कहां है रहीस ।

पोस्‍ट आफिस गया है।

आपके विष पुरुष।

कौन․․․․․․․․․․․?

अरे जनाब आपके बांस डीपीजे

क्‍या․․․․․․․․․․․?

ठीक सुने माई डियर कहां है ।

दौरे पर गये हैं।

हमने इनका नाम रखा था दोगला प्रसाद जंगली एक पुरुष। तनिक बड़ा नाम है ना। चलो छोटा कर देते हैं दोगला एक विष पुरुष। कितने साल की नौकरी हो गयी जनाब । अरे बेसिक बात तो पूछा ही नहीं आपका नाम सेवानन्‍द ही है ना। सोचोगे कैसे जाना सब जानता हूं ।मेरा भी दफ्तर पास में ही है,ये बात अलग है कि मेरी पोस्‍टिंग दूसरे शहर में थी। महीना भर पहले ही ज्‍वाइन किया हुआ । सोचा चलो दोगला एक विष पुरुष के घिनौना चेहरा देख लूं। पुराना घाव ताजा कर लूं।

सेवानन्‍द-कैसी बात कर रहे हो रसूख खिलवी भाई।

दिल टूटने के बाद आह ही निकलती है। मैं समझता हूं जनाब आपका दिल ही नहीं तोड़ा होगा। भविष्‍य भी इस विष पुरुष कुचल दिया होगा ।जानते हैं भविष्‍य कुचलने का दर्द अपने आश्रितों तक को आंसू देता रहता है।

सेवानन्‍द-ऐसा आपके साथ कौन सा गुनाह कर दिया बांस ने ।

रसूख खिलवी-ये गोरा काला अंग्रेज है। हमारे दादाजी कहते कहते मर गये बेटा अंग्रेज आज के इन काले अंग्रेजों से बेहतर थे। गोरों का हौसला किसने बढाया । अपने देश के दुश्‍मनों ने ही ना अपनी रियासत पर कब्‍जा और शोषितों का खून पीने के लिये। ये देश के दुश्‍मन इतने गिर गये कि अपनी बहन बेटियों तक को परोसने लगे थे। आज इन काले अंग्रेजों की काली करतूतें देखकर अपना खून देकर देश को आजादी दिलाने वाले अमर शहीदों की आत्‍मायें विलाप कर रही होगी कि क्‍या सोचा था क्‍या हो गया। कैसी आजादी है,जातिवाद, भूमिहीनता, गरीबी, अशिक्षा, नक्‍सवाद अब तो भ्रष्‍टाचार का ऐसा राक्षसी दौर चल पड़ा है कि आमआदमी के जीवन तबाह होने लगा है और देश बदनाम । क्‍या ये सब देखकर लगता है कि हम आजाद देश में रहते हैं ?इतने में रहीस अन्‍दर आते हुए बोला सच भाई हम आजाद देश के गुलाम हो गये हैं।

रसूख खिलवी-दोगला विष पुरुष साइलेण्‍ट किलर है।

रहीस-कहां की दुश्‍मनी लाकर हमारे बांस के उपर पटक दिये।

रसूख खिलवी-आज मैं भी फुर्सत में हूं । आया तो था विष पुरुष को अपना चेहरा दिखाने ताकि उसका घिनौनी कार्यवाही जीवित हो उठे उसके मन में और मेरा घाव ताजा।

रहीस-किस घाव की बात कर रहे हो रसूख खिलवी।

रसूख खिलवी-इस विष पुरुष ने पांच साल पीछे कर दिया।

सेवानन्‍द-कैसे ․․․․․․․

रसूख खिलवी- जिस सिस्‍टर कम्‍पनी में काम कर रहा हूं। उसी कम्‍पनी में ये विष पुरुष जोनल मैनेजर के पीहुआ करते थे। देखो एक विष पुरुष कुत्‍ता को बिस्‍किट खिला कर बड़ा साहब बन बैठा है जबकि इससे उच्‍च डिग्रीधारी इस कम्‍पनी में चपरासी तक है।

रहीस-दूर कहां जा रहे हो आपके सामने ही बैठे है सेवानन्‍द। एजुकेशन के मामले में हमारे साहब तो सेवानन्‍द के सामने बच्‍चा है पर तरक्‍की देखो आसमान छू रहे हैं। बेचारे सेवानन्‍द की सारी डिग्रियां इस विभाग में बेकार हो गयी है।

सेवानन्‍द-हम तो गांव के ठहरे सीधे-साधे,साफ-सुथरा ईमानदारी-वफादारी से काम करने वाले दोगली नीति का हमसे तो कोसों तक कोई रिश्‍ता नहीं रहा है। चम्‍मचागीरी साहब लोगों का जूता सिर पर कैसे लेकर चल सकता था।

रहीस-झूठ बोल रहे हो सेवानन्‍द।

कैसे मैं झूठा हो गया रहीस․․․․․․․․ सेवानन्‍द बोला ।

रहीस- तुम्‍हारी बस्‍ती के कुएं का पानी जातीय श्रेष्‍ठ लोगों के लिये अपवित्र है तो वे उच्‍च जातीय लोग तुम्‍हारे हाथ का पानी कैसे पी सकते हैं। सेवा-सत्‍कार तो उन्‍हीं का स्‍वीकार्य होता है जो इसके योग्‍य होते हैं। आप तो जातीय अयोग्‍य हो। ये बात अलग है कि मैं आपको चाय-पानी पिला देता हूं। उसी कप-गिलास में जिस में ये उच्‍च जातीय कर्मचारी-अफसर पीते हैं।

रसूख खिलवी-क्‍या शिड्‌यूल्‍ड कास्‍ट के हो ?

रहीस-तभी तो ये हाल है। आपके एक्‍स बास ने ही नहीं जितने अफसर आये सब जातीय दुश्‍मनी निकाल गये हैं। विष पुरुष निकाल रहे हैं।

रसूख खिलवी-चचाजान वो कैसे?

रहीस-सीआर खराब कर दी गयी है। प्रमोशन के सारे रास्‍ते बन्‍द कर दिये गये हैं। बस इतना है कि नौकरी से नहीं निकाले जा सके है। खैर इसके भी बहुत प्रयास हो चुके हैं।

रसूख खिलवी-मतलब सेवानन्‍द अपनी काबिलियत की वजह से टिके हुए है वरना ये मुर्दाखोर किस्‍म के लोग हजम कर गये होते।

रहीस-खिलवी भाई सही कह रहे हो। आपके विष पुरुष तो अपने मां-बा पके नहीं हुए अछूत के बेटा का क्‍या होंगे। मेरा तो डायरेक्‍टर साहब की वजह से कोई अफसर कुछ नहीं बिगाड़ सका।

खिलवी-कौन डायरेक्‍टर साहब ?

रहीस-तुम्‍हारी सिस्‍टर कन्‍सर्न कम्‍पनी में एरिया मैनेजर थे ना डांविषम प्रताप साहब।

खिलवी-अच्‍छा वो शराब,कबाब और शबाब के शौकीन। उनमें तो जमींदारी का भाव भी कूट-कूट कर भरा था। नीची जाति वालों को तो गुलाम समझते थे। अब ना जाने कोई उनमें सुधार हुआ कि नहीं। वे भी विष पुरुष ही थे।

रहीस-रहीस मरे नहीं है।अभी जिन्‍दा है,दौरे पर गये हैं। रही बात विष पुरुष की तो अपने विभाग में एक से बढ़कर एक विष पुरुष है। खिलवी के साथ डीपीजे साहब ने नाइंसाफी की तो वे इनके लिये विष पुरुष है। अब हमारे सेवानन्‍द के लिये तो विभाग में दीया लेकर खोजने पर भी कोई आदमी हितैषी नहीं मिलेगा। सभी अफसर विष पुरुष साबित हुए है। ये बात सभी जानते हैं। सभी अफसर मंदिर के घण्‍टा की तरह सेवानन्‍द को बजाये ही है। कराह निकलने की सजा भी इस उच्‍चशिक्षित अछूत के बेटे को मिली है। परन्‍तु टाइपिस्‍ट से साहब बने डीपीजे साहब से ऐसी उम्‍मीद नहीं थी।

खिलवी-ऐसी क्‍या खासियत सेवानन्‍द में है।

रहीस-डीपीजे साहब भी टाइपिस्‍ट थे और सेवानन्‍द भी परन्‍तु इस विष पुरुष ने ज्‍यादा घाव दिया है।

खिलवी-डीपीजे विष पुरुष अपने मां -बा पके नहीं हुए हैं तो ये सेवानन्‍द किस खेत की मूली है।

रहीस-मां-बाप कैसे नहीं हुए।

खिलवी-तुम तो चचाजान ऐसे पूछ रहे हो जैसे तुमको कोई खबर ही नहीं हो।

रहीस-वाकई खिलवी।

खिलवी-दाई से पेट छिपाने से नहीं छिपता। तुम सब जानते हो। क्‍या तुमको पता नहीं है। विष पुरुष की काली करतूतें। मां-बाप को बेघर कर दिये। उनके जीते जी उनका बनाया घर बेंच दिये। मां-बाप खून के आंसू बहाते रहे। ये विष पुरुष अपने पास में भी उन्‍हें रखने में शरमाते थे,उनके आते ही दूसरे रिश्‍तेदारों के यहां भेजने की बन्‍दोबस्‍त में लग जाता था। चार-चार महलनुमा का मालिक है पर मां-बाप को रहने का ठिकाना नहीं था। मेमसाहब को बूढ़े सास-ससुर की सूरत तक पसन्‍द नहीं थी।

रहीस-सच खिलवी तुम तो बहुत जानते हो साहब के बारे में।

खिलवी-अरे अभी तो बहुत कुछ जानता हूं। ये आदमी सचमुच का विष पुरुष दो परिवारों की इज्‍जत तक को नीलाम कर चुका है,तरक्‍की के लिये। जितनी सूरत से अच्‍छे हैं उतने की दिल के काले हैं ये जनाब जो विष पुरुष। इनकी वजह से साल भर जूनियर हो गया इतना ही नहीं प्रमोशन में पांच साल पिछड़ गया। ना जाने मुझसे इस विष पुरुष को कौन सी दुश्‍मनी थी कि मेरा एप्‍वाइण्‍टमेण्‍ट लेटर दबाकर रख दिया था। इस विष पुरुष का दिया घाव हमेशा हरा रहता है। घाव को और हरा करने के लिये आया था पर विष पुरुष से मुलाकात नहीं हुई। मिलता तो ऐसा बोलता जैसे सगा हो। कहता और क्‍या हाल है भाई। ये ऐसा जहरीला इंसान है काट ले तो अगली पीढ़ी तक जहर पहुंच जाये भोपाल गैस त्रासदी जैसे।?

रहीस-यार हद कर दी तुमने भोपाल गैसे त्रासदी की तुलना विषपुरुष डीपीजे साहब से कर दिये।

खिलवी-मेरा लूटा हुआ भविष्‍य वापस आ सकता है। तुम ही बता रहे थे सेवानन्‍द के भविष्‍य को कब्रस्‍तान बनाने में विष पुरुष का हाथ है। क्‍या इस उच्‍च शिक्षित आदमी को लूटा हुआ भाग्‍य वापस आ सकता है,चार छः साल में टाइपिस्‍ट के पद पर रिटायर हो जायेगा। इसका भविष्‍य क्‍यों तबाह किया गया क्‍योंकि छोटी कौम का बन्‍दा है। मैं तो सामान्‍य था पर गैरधर्मी ये मेरा कसूर तो नही, तो क्‍या ये तुम्‍हारे डीपीजे हमारे लिये विष पुरुष नहीं।

सेवानन्‍द-क्‍यों नहीं। ऐसे ही विष पुरूषों की वजह से आम-आदमी ,शोषित वंचित कमेरी दुनिया और हाशिये के लोग पिछड़ेपन के दलदल में ढ़केले जा रहे हैं। जातिवाद नफरत का जहरीला वातावरण निर्मित कर रहे हैं जो सभ्‍य समाज के लिये उचित तो नहीं कहा जा सकता । इन विष पुरुष और ऐसे लोग का ही षडयन्‍त्र ही कि वे तरक्‍की के शिखर पर चढ़ते जा रहे हैं हाशिये के लोग भय-भूख भेद के शिकार है।

रहीस-यही देखो अपने विभाग में सेवानन्‍द के खिलाफ क्‍या-क्‍या नहीं किया है,प्रमोशन के रास्‍ते बन्‍द कर दिये गये,लाभ के सारे रास्‍ते बन्‍द कर दिये गये। मई से तो स्‍थानीय भत्‍ता और दौरा कार्यक्रम भी बन्‍द करवा दिया गया है जबकि दूसरे विष पुरूषों की राह पर चलने वालों को बिना किये दस-दस हजार रूपये से ज्‍यादा अतिरिक्‍त लाभ दिया जा रहा है। सेवानन्‍द के तनख्‍वाह के अलावा सारे फायदे के रास्‍ते बन्‍द करवा दिये हैं विष पुरूषों ने। इतने में सेवानन्‍द के चलितवार्ता की घण्‍टी बज गयी।

खिलवी-सेवानन्‍द बात कर लो हो सकता है डीपीजे का ही फोन न हो।

सेवानन्‍द-नया नम्‍बर है।

रहीस-बात तो कर लो ।

खिलवी-कौन था ?

सेवानन्‍द-कुलपति।

खिलवी-कुलपति मतलब यूनिवर्सिटी से।

सेवानन्‍द-जी ।

रहीस-देखो क्‍या बिडम्‍बना है विभाग में अछूत माने जाने वाले आदमी को कुलपति फोन कर रहे हैं। चहुंओर से मान-सम्‍मान मिल रहा है और विभाग में दण्‍ड। कैसी है विष पुरूषों की सेवानन्‍द विरोधी नीति ? बढ़ते जा नेककर्म की राह मेरे यार।

खिलवी-तुम्‍हारे सद्‌कर्म को सलाम सेवानन्‍द

 

डॉनन्‍दलाल भारती 08․12․2013

एम।समाजशास्‍त्र। एलएलबी। आनर्स ।

पीजीडिप्‍लोमा-एचआरडी

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ग़ज़ल 1
हाथ बाँध लो, चिल्‍लाओ मत, ये भी कैसी मुश्‍किल है,
झण्‍डे, परचम, लहराओ मत, ये भी कैसी मुश्‍किल है।

सच,इर्मान, वफ़ा, सीधापन, नेकी, प्‍यार, सयानापन,
इनको अपने घर लाओ मत, ये भी कैसी मुश्‍किल है।

बारिश, बून्‍दें, बादल, जुगनू और हवा भी उनकी है,
दिल को अपने धड़काओं मत ये भी कैसी मुश्‍किल है।

अपने हक़ के उजियारे को जिसने मेरे नाम किया,
उसको अपना बतलाओ मत, ये भी कैसी मुश्‍किल है।

रूख़ पर पर्दा, नज़रें नीची, लब ख़ामोश रहें हरदम,
जब वे बोलें तब मुस्‍काओ, ये भी कैसी मुश्‍किल है।

रूठी खुश्‍बू, उलझे धागे, बिगडे रिश्‍ते, दर्द बढ़े,
अब आशीष सुनाओ ये मत, ये भी कैसी मुश्‍किल है।

ग़ज़ल 2
झूठ की पगडंडियों पर चल रहा है आदमी,
बोलता है सच यहाँ वो खल रहा है आदमी।

आपने उसकी हँसी को खैरियत समझा मग़र,
देखिए, भीतर ही भीतर जल रहा है आदमी।

आज दुनिया को तिमिर के जाल में उलझा रहा,
यूँ किसी की आँख का काजल रहा है आदमी।

आपसी विश्‍वास की बुनियाद तक हिलने लगी,
यूँ जो हर पल आदमी केा छल रहा है आदमी।

जब कभी दुःखती रगों पे हाथ उसने धर दिया,
बस उसी पल से सभी को खल रहा हैं आदमी।

उसने जब आशीष अपने दिल का सौदा कर लिया,
तो किसी भी प्रश्‍न का ना हल रहा हैं आदमी

ग़ज़ल 3
लोग तिरछे हैं, चाल तिरछी हैं,
अब मुहब्‍बत कहाँ पे मिलती है।

कोई मेहनत करे भला अब क्‍यूं ?,
आज कुर्सी यहाँ पे बिकती है।

अब अंधेरा दिलों पे छाया है,
अब सियासत यहाँ पे बदली है।

मेरे हमदम तू कैसा रहबर है,
क्‍या तेरा प्‍यार भी ये नकली है?

एक सोचूं तो लाख आएँगी,
तेरी ख्‍वाहिश बहुत ही पगली है।

तेरी दुनिया अजीब है आशीष,
क्‍यूँ परिन्‍दे पे वार करती है ?
                                                          
                                                            ग़ज़ल 4

बीते पल की यादों में ही खोयी रहती अक्‍सर दादी,
बैठी हैं आँचल में अपने अरमानों को रखकर दादी।

दुनिया की हर एक खबर को आँख गड़ाकर पढ़ती है,
सोती है तकिये के नीचे अपनी दुनिया धरकर दादी।

अपने सपने, अपने रिश्‍ते, आँखों में आ जाते हैं,
अपनी यादों के जलसे में खुश होती है चलकर दादी।

चेहरे की हर एक लिखावट, दिखलाती है रूप नया,
गुमसुम, चंचल, नटखट, नाज़ुक, शोख-सलोनी, सुंदर दादी।

अपने पन की आहट सिमटी, दीवारों के दर्द बढ़े,
ऊपर तो है खुश्‍बू जैसी, तन्‍हा-तन्‍हा भीतर दादी।

कभी नसीहत, कभी प्‍यार से समझाती दुनियादारी,
देती है आशीष सदा ही, अपनों को जी भरकर दादी।

       ग़ज़ल 5           
बहने लगा है वक्‍त के धारों में आज तू,
करता है गुफ्‍तगू भी इशारों में आज तू।

गुमनामियों का ग़म यहाँ करता है किसलिए,
मशहूर है नसीब के मारों में आज तू।

तारीफ तेरे ज़र्फ की जितनी करूं है कम,
सच बोलता है कैसे हज़ारों में आज तू।

अच्‍छा नहीं है सब्र के दामन को छोड़कर,
उलझा है इंतिकाम के खारों में आज तू।

कश्‍ती अभी हयात की बेशक भंवर में हैं,
खुद को न कर शुमार सितारों में आज तू।

आशीष दी हुई ये अमानत किसी की हैं,
साँसे जो ले रहा है, बहारों में आज तू


                                        गजल 6

य़ाद करती है तुझे माँ की बलैय्‍या आजा,
ज़िन्‍दगी हैं यहाँ इक भूल-भुलैय्‍या आजा।

ये चमक झूठ की तुझको नहीं बढ़ने देगी,
छोड़ अभियान, अहम और रूपैय्‍या आजा।

सर झुकाने को मुनासिब है यही संगे-दर,
यहीं होंगे तेरे अरमान सवैय्‍या आजा।

अपने अहसास की पतवार मुझे तू दे दे,
इन दिनों डोल रही है मेरी नैय्‍या आजा।

लोग फिर दामने-अबला के पड़े हैं पीछे,
चाहे जिस रूप में आए तू कन्‍हैय्‍या आजा।

दिल में ग़म इतने हैं जितने कि फलक पे तारे,
भर गई अश्‍क से आशीष तलैय्‍या आजा।

ग़ज़ल 7

सिमटा है सारा मुल्‍क ही कोठी या कार में,
आशीष तो खड़ा हुआ कब से कतार में।

बाज़ार दे रहा यहाँ ऑफर नए-नए,
ख्‍वाबों की मंजिलें यहाँ मिलती उधार में।

मिलते रहे हैं रोज ही यूँ तो हज़ार लोग,
मिलता नहीं है आदमी लेकिन हजार में।

पल भर में मंजिलें यहाँ हसरत की चढ़ गए,
संभले कहाँ है आदमी अक्‍सर उतार में।

जिसने ज़मी के वास्‍ते अपना लहू दिया,
गुमनाम कर दिये गए जश्‍ने-बहार में।

छू कर हवा गुज़र गई परछाईं आपकी,
खुशबू तमाम घुल गई कैसी बयार में।

जज़्‍बात को निगल लिया मैसेज ने यहाँ,
आती कहाँ है ख्‍वाहिशें चिठ्ठी या तार में।

आशीष क्‍या अजीब है मेरे नगर के लोग,
अम्‍नो-अमा को ढूंढते खंजर की धार में।
           
        गजल 8
लफ्‍ज़ आए होंठ तक हम बोलने से रह गए,
इक अहम रिश्‍ते को हम यूँ जोड़ने से रह गए।

अब शिकारी आ गया बाज़ार के ऑफर लिए,
फिर परिन्‍दे अपने पर को खोलने से रह गए।

हर कहीं देखी निगाहें आँसुओं से तरबतर,
खुद के आँसू इसलिए हम पोंछने से रह गए।

बारिशें तो थीं मग़र बस्‍ते का भारी बोझ था,
कश्‍तियाँ काग़ज की बच्‍चे छोड़ने से रह गए।

बेरहम दुनिया के जुल्‍मों की हदें ना पूछिए,
शाख पर वे फल बचे जो तोड़ने से रह गए।             
आज फिर देखी किताबे-ज़िन्‍दगी आशीष तो,
पृष्‍ठ कुछ ऐसे मिले जो मोड़ने से रह गए।
                     
                    गजल 9

ये ग़म ये सितम और ये सदमा नहीं होता,
मुँह फेर के वो मुझसे जो गुज़रा नहीं होता।

तहरीर ज़माने की कई ऐब लिये है,
बिन्‍दी नहीं होती कहीं नुक्‍ता नहीं होता।

दुनिया जो अगर अम्‍न का गुलज़ार सजाती,
अंगारों से लबरेज ये रस्‍ता नहीं होता।

मंज़िल का कोई ख्‍वाब भी आँखों में न होता,
आईने को रहबर जो बनाया नहीं होता।

कीमत अदा न कर सके हम माँ के दूध की,
ये कर्ज़ ही ऐसा है जो चुकता नहीं होता।

परवाज़ के सौदे वही करते हैं ज़मी पर,
अपने परों पे जिनको भरोसा नहीं होता।

                             पत्‍थर तुझे भी बोलते आशीष सब यहां,
                             फूलों को देख दिल तेरा धड़का नहीं होता।

ग़ज़ल 10
    बेहतरी पर ये नज़र जाती नहीं है,
साथ में अच्‍छाइयां लाती नहीं है।
तीरगी को देख मुफलिस पूछता है,
रोशनी इस ओर क्‍यूं आती नहीं है।
कल के ज़ख्‍मों को भुलाया है यहां पर
दिल की धड़कन भी यहां गाती नहीं है।
है मेरे शे‘रों में दिल के दर्द भी,
ये मेरे अशआर जज़्‍बाती नहीं है।
भाव के बढ़ने से बढ़ी हैं धड़कनें
दाल-रोटी भी मुझे भाती नहीं है।
आएगा सूरज यक़ीऩन आसमां पर,
मेरी जिद यूं मात भी खाती नहीं है।
                        सौंपती है पोटली आशीष की जब,
                       मां किसी बच्‍चे को बहलाती नहीं है।

ग़ज़ल 11
ज़माना यूं नहीं करता यहां गुणगान चिड़ियां का,
परिन्‍दों में है क्‍या रूतबा कभी पहचान चिड़ियां का।
इसे धन की नहीं चाहत मकानों की नहीं हसरत,
बना है क्‍यूं भला दुश्‍मन यहां इन्‍सान चिड़ियां का।
इमारत ,गाड़ियां पा ली , कटी डाली,जले जंगल,
सभी मसरूफ हैं खुद में ,किसे है ध्‍यान चिड़ियां का।
नहीं रहती कोई ताकत यहां उसकी उड़ानों में,
अगर करता नहीं कोई कभी सम्‍मान चिड़ियां का।
कभी घर में फुदकती,गुनगुनाती,पास आती थी,
हमारी नस्‍ल ने लेकिन किया अपमान चिड़ियां का।
किये कितने करम हमपे यहां आशीष चिड़ियां ने,
मगर हमने ही माना कब यहां अहसान चिड़ियां का।


-आशीष दशोत्‍तर
39, नागर वास, रतलाम

                                                  रतलाम (म.प्र.) 457001
                        

                                  E-mail-ashish.dashottar@yahoo.com

छटपटाहट

राजेश्वरी आज एक नहीं दोनों पुत्रों पर बिफर पड़ी. उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके पुत्र इतने स्वार्थी हो जायेगे. सामने पिता की लाश पड़ी थी. पुत्रों को पिता के मरने की दुख नहीं अपितु धन बांटने की चिंता खायी जा रही थी. गांव वाले समझाते रहे पर दोनों पुत्र लड़ते अड़े रहे कि धन का बंटवारा हो जाये तो पिता के खात खवाई में कौन क्या खर्च करेगा इसका निश्चय कर लिया जायेगा. गांव वालों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया - लाश का अग्नि संस्कार कर दो फिर बैठ कर बांटा - हिस्सा के साथ कौन क्या करेगा इसका निर्णय कर लेना. पर दोनों पुत्र गांव वालों की भी बात मानने को तैयार नहीं थे. राजेश्वरी से रहा नहीं गया. वह बौखला गयी. घर के भीतर से कुल्हाड़ी उठा लायी. दोनों पुत्रों पर चिल्लाकर बोली - लो कुल्हाड़ी और मेरा दो भाग कर एक एक भाग बांट लो. . . ।

राजेश्वरी के तेवर को देखकर न केवल दोनों पुत्र अपितु गांव वाले भी सन्न रह गये. आज तक राजेश्वरी का ऐसा रुप किसी ने नहीं देखा था. राजेश्वरी तो साक्षात त्याग की मूरत थी. कभी किसी से कोई गिला शिकवा नहीं की. जैसे मिला उसने जीवन जीया. गांव वालों को यह जरा भी भनक नहीं होने दिया कि उसके परिवार में भी वाद विवाद होते रहता है. कभी उसके पुत्रों ने उससे अदावटी की या फिर बहुओं ने उसे सताया. उसने कभी महिलाओं की चौपाल में बैठकर बुराई नहीं की. जब कभी कोई महिला अपने घर की बुराई चौपाल में करती तो वह कहती - घर की बात घर में ही रहने देना चाहिए. दूसरों के घर के महाभारत में सबको मजा आता है. . . ।

इस पर महिलाएं कहती - बहन, कभी तुम्हारे घर भी महाभारत होगा न तो तुम भी हमारे बीच रोकर बताओगी. तुम्हारे घर खटपट होती ही नहीं तो फिर क्यों किसी की पीड़ा को समझोगी.

घर में खटपट होती भी थी या नहीं यह तो राजेश्वरी ही जानती थी. वह हंस कर कह देती - चार बर्तन घर में रहे और आपस में न टकराये यह संभव है क्या ? लेकिन ध्यान रखना चाहिए उसकी खनक बाहर नहीं जाना चाहिए.

महिलाओं को राजेश्वरी की यह बात किसी उपदेश से कम नहीं लगती थी. एक तो वह चारी - चुगली में रहती नहीं थी और कभी इत्फाकन सुनना पड़ जाता तो वह एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देती थी.

अभी कुछ दिनों से उसके घर का वातावरण बिगड़ गया था. दिन भर घर में तनाव की स्थिति निर्मित रहती. बहुएं मुंह फुलाएं रहती. बेटे सीधे मुंह बातें नहीं करते थे. बात - बात पर विवाद होने लगता. राजेश्वरी समझाने का प्रयास करती तो दोनों लड़के उस पर भड़क उठते - अब बहुत हो गया. तुम अपनी सीख अपने पास रखो. तुमने अपने जीवन जी लिया अब हमें अपनी तरह से अपना जीवन जीने दो. हमें बंटवारा चाहिए मतलब चाहिए.

जिन पुत्रों को उसने आंचल मे छिपाकर दूध पिलाया था. उनके मुंह से ऐसे शब्द सुनकर राजेश्वरी आहत हो जाती. वह अपने पति रामधन से कहती - सुना जी, क्या कहा आपके लड़के ने. . . ?

- मैं तो रोज सुन रहा हूं. तुम नहीं सुनी हो तो सुनो. . . । राजेश्वरी को सांत्वना के स्थान पर ताना सुनना पड़ता. रामधन कहता - बेटा. . बेटा. . बेटा. . खूब मनौतियां की थी न. बच्चे उद्दण्ड न हो जाये सोचकर डांटता था तो तुम्हें मैं बच्चों का दुश्मन लगता था. अब आंसू बहाने से मतलब नहीं. वे समझदार हो गये हैं. अब रोने धोने से काम नहीं बनेगा. इनका मुंह खुल गया है. उसे पूरा करा कर ही दम लेगे. उन्हें तुम्हारी जज्बातों की नहीं बंटवारे की चिंता है. अपनी - अपनी संपत्ति पाना चाहते हैं. बंटवारा पाये बगैर उन्हें चैन नहीं.

- कौन मां अपने पुत्रों को नहीं पालती. उसके पुत कपूत निकलेगा ऐसा क्या कोई मां जानती है. मैंने तो मां का फर्ज निभाया है.

- तुमने बहुत अच्छी तरह मां का फर्ज अदा किया है. अरी, तुमने मां का फर्ज अदा करते समय उन्हें पुत्रों का भी दायित्व मां - पिता के लिए होता क्या है क्यों नहीं समझायी ?

- तुम तो सदैव मुझे ताने ही देते हो. अपनी पीड़ा कम करने तुमसे सहानुभूति बटोरने आती हूं तो उल्टा पीड़ित कर देते हो.

राजेश्वरी रो पड़ती. रामधन कहता - अब रोने के अलावा है ही क्या तुम्हारे पास. . . . । इतना कह कर रामधन निकल जाता. राजेश्वरी आखिरी आंसू तक रोती पर उसे न कोई चुप कराने आता और न ही कोई उसके आंसू को सहेजने. . . . ।

घर में कदम रखते ही पुत्र अपने पिता से जमीन जायजाद के बंटवारे की बात शुरु कर देते. रामधन इससे उब गया था. वह अक्सर अब घर से गायब रहने लगा था. खास कर उस समय घर से गायब रहता जब उनके दोनों पुत्र के काम से वापस आने का समय होता. देर रात तक वह घर लौटता और राजेश्वरी उसके हिस्से का जो भी खाना बचा होता उसे दे देती. उसे खा कर वह सो जाता. उस दिन दोनों लड़कों ने चिल्लाकर कहा - हमारे घर आने के समय घर से गायब होकर हमें अपने अधिकार से वंचित रखा जा रहा है. यह उचित नहीं. मां, आज संध्या हम काम से लौटे तो उन्हें कह दीजियेगा कि वे घर पर ही रहे वरना हम बर्दाश्त नहीं करेंगे.

राजेश्वरी ने चुप सुना, पुत्रों के कटु वाक्यों से रामधन की भी नींद उजड़ चुकी थी. उसने भी पुत्रों की बातों को भरपूर कान भर सुना. वह पुत्रों के सामने नहीं आया. दोनों लड़के काम पर चले गये. रामधन उठा तो बहुओं ने उसे हिकारत की द्य्ष्टि से देखकर नाक भौहें सिकोड़ी. रामधन से सहा नहीं गया. कहा - पराये घर से आयी हो तो तुम लोग ऐसे व्यवहार करोगी ही. अरे, जब घर बच्चा जिसे हमने जन्म दिया. पाला - पोंसा वही हमारा सम्मान नहीं कर सकते तो तुम लोगों से भला कैसे और क्यों कर आशा किया जाये. गलती तुम लोगों की नहीं. गलती के अधिकार तो हमारे सुपुत्र है. उन सुपुत्रों की जिसे हमने अपने बुढ़ापे का लाठी समझ बैठे थे.

बहुएं क ो जब रामधन खरी - खोटी सुना रहा था. राजेश्वरी बीच बचाव के लिए आ गयी. बोली - तुम बहुओं को क्यों सुनाते हो ? क्यों नहीं समझाते अपने लड़कों को ? ये तो वही करेंगी जो लड़के करेंगे. . . ।

इतना कुछ होने के बाद भी तुम इनके हितैषी बनना चाहती हो. तुम्हारी इच्छा लातें खाने की ही है तो खाते रहो. मैं तो बर्दाश्त नहीं कर सकता. . . ।

इतना कहकर रामधन घर से निकल गया. राजेश्वरी फफक कर रोने लगी. बहुएं आयी. नाक मुंह सिकोड़कर चली गयी. दोनों बहुओं में से किसी ने भी हमदर्दी के दो शब्द कहने की आवश्यकता नहीं समझी. राजेश्वरी आखिरी आंसू तक रोती रही फिर चुप हो गई.

राजेश्वरी का छोटा लड़का महेश आया. उसने पूछा - पिता जी कहां हैं. . । राजेश्वरी चुप रही. वह झल्लाकर अपने कमरे में चला गया. बड़ा लड़का शिशुपाल आया. उसने भी पूछा पर राजेश्वरी निरुत्तर रही. वह भी अपने कमरे में चला गया.

संघ्या रात्रि में बदलने लगी. धीरे - धीरे रात गहराने लगी. रामधन के आने का समय गुजरा जा रहा था पर रामधन के आगमन का कहीं कोई चिन्ह नहीं था. राजेश्वरी अब तक भोजन नहीं करी थी. वह अक्सर रामधन के आने के बाद ही भोजन किया करती थी पर रात अधिक होने के बावजूद रामधन नहीं आया तो उसके मानस पटल में तरह - तरह के विचार उठने लगे. वह चाह तो रही थी कि पुत्रों के कमरे में जाकर अब तक रामधन के नहीं आने के कारणों का पता लगाने जाने कहे, पर वह जानती थी - पुत्रों को इससे कोई मतलब नहीं. वह मनमसोस कर रह गयी. रात गहराती गयी और राजेश्वरी का मन भयाक्रांत होता गया. पिता के अब तक न आने की चिंता न बड़का को थी और न छोटका को. इधर राजेश्वरी करवटें बदलती छटपटा रही थी उधर बच्चे नींद में खर्राटे भर रहे थे.

पूस की रात. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. जैसे - जैसे रात गहरा रही थी. ठण्ड अपनी यौवन पर आती गयी. सारी रात गुजर गयी. पहट का समय आया पर रामधन न आया और न ही राजेश्वरी की आंखों में नींद आयी. वह बार बार बच्चों के कमरे की ओर झांक कर इसलिए देखती थी कि किसी के कमरे का दरवाजा खुलेगा. उसे वह रामधन के रात भर नहीं आने की खबर देगी. सूर्य चढ़ने लगा था. लेकिन न बड़े लड़के के कमरे का दरवाजा खुला न छोटे लड़के का. अब राजेश्वरी से रह नहीं गया. उसने बड़े लड़के के दरवाजे की कुण्डी खटखटा दिया. बड़ी बहू आंख मलती दरवाजा खोली. सामने अपनी सास को देखकर बोली - क्या बात है. . . ?

-शिशुपाल जागा नहीं है क्या ?

- अगर नींद में नहीं होते तो पलंग पर पड़े रहते क्या ? बहू ने कर्कश आवाज में कहा.

- बात यह नहीं है बहू. . . ।

- तो और क्या बात है, सुबह - सुबह नींद में दखल देने आ गयी ?

- दरअसल तुम्हारे ससुर अब तक घर नहीं आये है.

- तो इसमें वे क्या करेंगे. रात भर नहीं आये तो दिन में आ जायेगें.

शिशुपाल की नींद टूट चुकी थी. उसने सास - बहू में हो रही बात को सुन लिया. वह बाहर आया. पूछा - क्या रात भर पिता घर नहीं आये ?

- हां रे, इतनी ठण्ड पड़ रही है, पता नहीं कहां गये होंगे. . पता तो करो. . ।

- उन्हें किसने कहा, रात भर घर से गायब रहे. उन्हें स्वयं की चिंता नहीं तो फिर हम क्यों करें ? वे जैसे गये हैं आ भी जायेंगे.

पुत्र शिशुपाल ने बड़ी निर्ममता पूर्वक कहा. दूसरे पुत्र से भी उसे कोई आशा नहीं थी. वह स्वयं अपने पति की खोज में निकलने लगी कि हांफते हुए कैलाश आया. सुबह - सुबह कैलाश को अपने घर देखकर राजेश्वरी के भीतर शंकाएं सिपचने लगी. उसने कैलाश से पूछा - कैलाश, तुम कहां से दौड़ लगाते आ रहे हो ?

- चाची, शिशुपाल कहां है. . ।

- क्या बात है, तुम मुझे तो बताओ.

- मैं शिशुपाल से मिलना चाहता हूं.

- वह अपने कमरे में है. . . . ।

कैलाश शिशुपाल के कमरे की ओर दौड़ा. राजेश्वरी पति को खोजने जाने वाली थी पर कैलाश के आगमन ने उसे आगे जाने से रोक दिया. उसका ध्यान शिशुपाल के कमरे की ओर बंट गया. शिशुपाल कैलाश के साथ महेश के कमरे की ओर दौड़ा. महेश अभी तक सो कर नहीं उठा था. कुण्डी खटखटाने से उसकी नींद उचट गयी. उसने अपनी पत्नी को देखने के लिए कहा. उसकी पत्नी ने दरवाजा खोल दी. सामने शिशुपाल को देखकर इसकी सूचना महेश को दी. महेश ने सोचा - सुबह - सुबह लड़ाई करने आ रहा है. वह पूरी मुस्तैदी के साथ उठा. शिशुपाल केा भीतर बुलाया. शिशुपाल कैलाश के साथ भीतर आया. महेश ने शिशुपाल से कहा - सुबह - सुबह लड़ाई करने का विचार है क्या ?

- मैं लड़ाई करने नहीं, यह बताने आया हूं. . . . . ।

- क्या बताने आये हो, यही न कि तुम्हें बहेरानार वाली खेत चाहिए. पर याद रखो मैं उस जमीन को अपने हिस्से में लूंगा.

- तुमसे बांटा हिस्सा की बात करने नहीं, यह बताने आया हूं कि पिता जी का स्वर्गवास हो गया. . . . ।

क्षण भर महेश शून्य हो गया फिर पूछा - कैसे . . . ?

- कैलाश बता रहा है कि उनकी लाश खेत में पड़ी है.

दोनों लड़के खेत की ओर दौड़े. राजेश्वरी उनसे पूछती रही - आखिर बात क्या है, मुझे कोई कुछ बताते क्यों नहीं ? पर उसकी बात को किसी ने नहीं सुनी.

जब दोनों पुत्र गांव वालों के साथ घर आये तब सारा माजरा राजेश्वरी को समझ आया. वह अपने पति के शव से लिपटकर फफककर रो पड़ी.

रामधन के शव का अंतिम संस्कार किया गया. उसके मृत कार्यक्रम में मेहमान आने लगे. अभी कार्यक्रम का दूसरा ही दिन था कि दोनों भाइयों में बंटवारे को लेकर फिर विवाद शुरु हो गया. मेहमानों ने समझाने का प्रयास किया कि कार्यक्रम को निपटने दो फिर एक साथ बैठकर बांटे हिस्से की बात कर लेना. पर दोनों बेसब्र थे. उन्हें दुख इस बात का नहीं था कि उनके पिता जी स्वर्ग सिधार गये अपितु उन्हें चिंता इस बात की थी - वे जिस जमीन को चाह रहे हैं उनके हिस्से में वह जमीन आयेगी कि नहीं. राजेश्वरी ने भी समझाने का प्रयास किया. वह चाह रही थी कि शांति पूर्वक उनके पति के कार्यक्रम निपट जाये. जिससे उनकी आत्मा को शांति मिले. पर उसके बेटे तो अशांति पैदा करने में माहिर थे. वे बात - बात पर उलझ जाते.

तीसरे दिन रामधन की अस्थि को घर लाया गया. उनकी अस्थि को विसर्जन करने गंगा ले जाने की चर्चा चलने लगी. बड़े लड़के ने मुखाग्नि दिया था अतः गंगा जाने के लिए छोटे लड़के से कहा गया. इसी बात को लेकर दोनों भइयों में तकरार हो गयी. बड़ा लड़का चाहता था कि वही गंगा जाये पर समाज के कहने पर वह रुक गया. वाद - विवाद के मध्य रामधन का कार्यक्रम निपटा. किसने कितना खर्चा किया इसका हिसाब किताब किया गया और इसी बात को लेकर दोनों भइयों में एक बार फिर लड़ाई शुरु हो गई. पूरे तेरह दिनों से राजेश्वरी पुत्रों के कृत्यों को समोखती आ रही थी पर आज उसका गुस्सा उससे रोके नहीं रोका गया. वह कुल्हाड़ी उठा लायी. पुत्रों की ओर बढ़ाती बोली - तुम्हें बंटवारा चाहिए न, कल कर लेना बंटवारा. पहले इस कुल्हाड़ी से मेरा दो भाग करके एक - एक भाग का बंटवारा कर लो. फिर जमीन जायजाद का जैसे चाहे बंटवारा कर लेना. . . . ।

अचानक शांति स्वरुपा राजेश्वरी का बदला रुप देखकर दोनों लड़के सकपका गये. बहुएं सन्न रह गयी. उनसे कुछ कहते नहीं बन रहा था. राजेश्वरी ने कहा - मैंने बहुत किया, घर की खनक बाहर न जाये. तुम लोग हो कि यही चाहते हो. तुम लोग जो करना चाहो करते रहना, पर मुझे पहले मुक्ति दो. . . हां, मुझे मुक्ति दे दो. . . . ।

और राजेश्वरी फफक कर रो पड़ी. दोनों लड़के सिर झुकाकर खड़े हो गये. गांव - समाज के लोग थूं - थूं करते चले गये. किसी ने कहा - कहते हैं पुत्र बिना मोक्ष संभव नहीं पर यह गलत लगता है. मोक्ष की अभिलाषा में व्यक्ति पुत्र पैदा करने उतावले होते हैं पर उन्हें क्या मालूम कि वह पुत्र उसे मोक्ष नहीं दिला सकता सिवाय नरक में ढकेलने के. . . . . . ।

पीड़ा

त्नप्रकाश और एकांत की मित्रता शीघ्र ही गाढ़ी हो गई । रत्नप्रकाश इस शहर में पूर्व से रहता था । एकांत पहली बार इस शहर में आया था । रत्नप्रकाश और एकांत एक ही स्थान पर काम करते थे । लेकिन आज तक एकांत ने कभी रत्नप्रकाश को आभास नहीं होने दिया था कि उसका भी भरा पूरा परिवार था । अतः रत्नप्रकाश ही नहीं अपितु उसकी पत्नी क्षमा भी यही समझती थी कि एकांत अभी तक अविवाहित है ।

जिस दिन उनकी छुट्टी रहती दोनों मित्र बैठकर घंटों गप्पें उड़ाते ।क्षमा अक्सर मजाक कर बैठती । पूछती - एकांत, तुम शादी कब कर रहे हो ?

क्षमा का प्रश्न एकांत पर वज्रपात करता लेकिन वह सफेद मुस्कान ओठ पर लाता, कह देता - इतनी जल्दी भी क्या है ?

- क्या वृद्धावस्था में करोगे ?

क्षमा के प्रश्न का उत्तर एकांत के पास रहता पर वह कुछ नहीं कहता था । वह चुपचाप वहां से खिसक लेता ।

जब भी क्षमा उससे प्रश्न करती तो उसकी आँखों के सामने उसकी पत्नी जाहनवी का चेहरा घूम जाता । जाहनवी उससे बहुत प्यार करती थी । घर का कार्य तो पलक झपकते ही कर लेती । ऊपर से खेती बाड़ी में हाथ बंटाती । समय पड़े मजदूरी करने भी चली जाती । एकांत जाहनवी की याद में सारा जीवन जी लेना चाहता था ।

आज छुट्टी थी । एकांत, रत्नप्रकाश के घर आया । क्षमा अपने कार्य में व्यस्त थी । एकांत के पैर क्षमा के पास ठिठके फिर आगे बढ़ गये ।बैठक में रत्नप्रकाश अखबार पढ़ रहा था । एकांत को सामने देखकर उसने खाली कुर्सी की ओर संकेत किया । एकांत उस खाली कुर्सी में बैठ गया । रत्नप्रकाश ने अखबार टेबिल पर रखा । कहा - क्या बताऊं यार, मैं तो नून - तेल - लकड़ी को लेकर हताश हूं । मंहगाई आसमान छू रही है ।

- ओहो, बंद भी करो अपना रोना - धोना . . . . ? एकांत ने कहा ।

- तुम समझते क्यों नहीं ?

- क्या समझूं . . . ?

- हां, समझकर करोगे भी क्या ?अगर तुम पर भी दो - चार लोगों का भार होता तो समझ आ जाता । पारिवारिक झंझट क्या होती है ? रत्नप्रकाश थोड़ा रुका और फिर आगे कहा - कभी - कभी मन में आता है - तुम्हारे समान अकेला होता । हंसता - मुस्कुराता मगर ये विचार व्यर्थ जाता है । मैं सदैव उलझन में उलझा रहता हूं । तुम सदैंव मुस्कराते रहते हो । आखिर तुम्हारे आगे - पीछे उलझनें जो नहीं है ।

रत्नप्रकाश अपने माथे को टटोलने लगा , मानो चिंताएं गिनने का प्रयास कर रहा हो ।

एकांत को पुरानी घटना याद हो आयी । उसकी मां को कैंसर हो गया था । चिकित्सा कराते - कराते गहने बिक चुके थे । शेष रह गयी थी तो मां की गले में पड़ी चांदी की सुतिया । एक दिन मां उसे भी उतार दी । एकांत ने सुतिया को न बेचने की सलाह दी। मां ने कहा -एकांत जरा सोच, घर में खाने को दाना नहीं । मेरा उपचार की बात छोड़। मैं तो मर ही रही हूं । तुम जीवित लोगों को जीने के लिए तो दाना चाहिए ही न ? अंततः एकांत को मां की बात माननी पड़ी । उसने सुतिया को व्यापारी छलशत्रु के पास रेहन रख दिया । पैसा लाया उससे घर का आवश्यक सामान लाया । शेष बचे रुपए से मां का उपचार करवाया । जितनी सेवा वह अपनी मां क ा कर रहा था उससे कहीं अधिक सेवा उसकी पत्नी जाहनवी कर रही थी । दुर्भाग्य ऐसा था कि उस वर्ष पानी भी नहीं गिरा । अकाल की स्थिति निर्मित हो गई ।

वह शाम मां की जिन्दगी की आखिरी शाम थी । सूर्य पहाड़ की ओट में विलीन हो गया था । अंधेरे का जाल चारों ओर बिछ चुका था ।रात गहरा चुकी थी । आवारा कुत्ता भौंककर रात्रि को और भी भयावह बनाने उतारु थे ।

घर की घोर कालिमा को भगाने का प्रयास टिमटिमाती लालटेन कर रही थी ।अचानक हवा का एक झोंका आया और उसने लालटेन को बुझा दिया । एकांत माचिस की तीली जलाता कि एक हिचकी के साथ मां की आत्मा शरीर से मुक्त हो गई । मां के क्रिया कर्म के लिए रुपयों की आवश्यकता थी । उसने खेत को गिरवी रख दिया ।

बहुत दिनों तक घर सूना - सूना लगता रहा, हरा भरा तो तब लगने लगा जब जाहनवी गर्भवती हुई ।

जाहनवी के प्रसव का समय आया । जाहनवी प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी । दाई उसे हिम्मत बंधवा रही थी । उसकी तकलीफ बढ़ती गयी ।पड़ोसी औरतें आयी । उनमें से कुछ ने सलाह दी कि डाक्टर बुला लाओ । पुनः वित्त समस्या आ खड़ी हुई ।एकांत व्यापारी छलशत्रु के पास गया । कहा - सेठजी, मुझे कुछ रुपए और दे दीजिए, वरना पत्नी भी मर जायेगी ।

- मैंने कब अस्वीकारा है . . . . । व्यापारी छलशत्रु ने कहा ।

- जल्दी कीजिए न, डाक्टर को बुला लाने में भी समय लगेगा ।

- क्या लाये हो ?

- वो मां की सुतिया आपके पास गिरवी है न, उसे खरीद ले ।

- वह तो कब की डूब चुकी है ।

- क्या ?

एकांत ने आश्चर्य के साथ प्रश्न किया । लेकिन उसे तत्काल अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया । उसने सुतिया छह माह में छुड़ाने का वचन दिया था । जबकि पूरे दस माह हो चुके थे । अंततः उसे जमीन बेचनी पड़ी ।

एकांत डाक्टर के पास गया ।उसे लेकर वापस आया ।घर के बाहर औरतें खड़ी थी ।सभी शांत थीं ।स्थिति ने स्पष्ट कर दिया था कि अप्रिय घटना घटी है । एकांत ने घर भीतर प्रवेश किया । पत्नी की लाश जमीन पर पड़ी थी । उसके ठीक बाजू में एक बच्चा था । दृश्य देख एकांत व्यथा से छटपटा कर चीख उठा - नहीं . . . . ।

एकांत के चीखने से रत्नप्रकाश हड़बड़ा गया । आवाज क्षमा तक पहुंची । वह भी दौड़कर आ गयी । रत्नप्रकाश ने पूछा - क्या हुआ एकांत . . . . ?

एकांत निःशब्द हो गया । वह कभी रत्नप्रकाश को तो कभी उसकी पत्नी क्षमा को देखता रहा . . . . ।

 

भ्रम यात्रा

मैं पुस्तक पढ़ते बैठा था कि एक काला बिच्छू पैर पर गिरा. मैं चीख उठा - अरे बाप रे, मुझे बिच्छू ने डंक मार दिया. खूब जलन हो रही है. विष चढ़ रहा है. शरीर में शून्यता छाने लगी है. आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा है. . . अब क्या करुं. किसे आवाज दूं. कंठ अवरुद्ध. अरे, सर्वांग पसीने से सराबोर. लगता है विष प्रभावशील हो रहा है.

मैं चीखने - चिल्लाने लगा. मेरी आवाज सुन अमित दौड़ा चला आया. पूछा - तुम्हें क्या हुआ. तुम कांप क्यों रहे हो. . . ?

- मुझे बिच्छू ने डंक मार दिया.

- तुम्हारी स्थिति स्पष्ट करती है कि तुम्हें भंयकर विषैला बिच्छू ने डंक मारा. मैं गजेन्द्र को बुला लाता हूं. . . ।

अमित चला गया. मैं खाट तक पहुंचने का प्रयास करने लगा पर पग बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा था. मेरी शक्ति क्षीण होती जा रही थी.

अमित, गजेन्द्र को बुला ले आया. उनके साथ और भी लोग थे. गजेन्द्र तो मुझसे अधिक घबराया हुआ था. उसने पूछा - बिच्छू का डंक कहां पर लगा है. . . . ?

मैंने पैर की ओर इशारा कर दिया. गजेन्द्र मंत्रोच्चार के साथ पैर का मालिश करने लगा. थोड़ी देर बाद उसने पूछा - विष कहां तक चढ़ा है. घुटने तक तो नहीं. . . ?

उससे से भी ऊपर, कमर तक चढ़ गया है. मैंने कहा.

गजेन्द्र पुनः मालिश करने लगा. उसने फिर पूछा -अब तो विष उतर रहा है न ! घुटने तक तो उतर ही गया होगा ?

- हां, उतर गया है. . ।

- सच - सच बताओ, विष उतर रहा है न ?

- खाक उतर रहा है. यहां तो पूरे शरीर में आग लगी है. मैं झल्ला गया.

- तब तो मुझसे सुधर पाना संभव नहीं. काला बिच्छू खतरनाक होता है. तुम डॉक्टर को बुला लाओ.

गजेन्द्र भी पसीने से तरबतर हो गया. वीरेन्द्र डॉक्टर को बुलाने गया.

गांव का डॉक्टर आया. उसने मुझे सिर से पांव तक देखा. कहा - तुम लोगों को किसी के जीवन की चिंता कतई नहीं. केस बहुत सीरियस है. मैं बचा पाने में असमर्थ हूं. इसे तत्काल जिला चिकित्सालय ले जाओ. देर करोगे तो डॉक्टर क्या, ईश्वर भी नहीं बचा पायेगा.

हां, डॉक्टर ने सत्य ही कहा है. वास्तव में मेरा बचना मुश्किल है. अब मेरी पत्नी श्वेता विधवा हो जायेगी. वह माथे पर सिन्दूर और हाथ में चूड़ियां नहीं पहन पायेगी. मरने से पूर्व उसे कुछ समझा देना मेरा फर्ज है.

मैंने श्वेता को बुलाया. कहा - श्वेता, अब मैं बच नहीं पाऊंगा. इन छोटे - छोटे बच्चों का भार तुम्हें सौंपता हूं. तुम चाहो तो दूसरा विवाह कर लेना मगर इन बच्चों को अपने साथ रखना. इन्हें पढ़ाना - लिखाना योग्य व्यक्ति बनाना.

पास ही उमेश खड़ा था. कुछ दिन पूर्व उससे मेरी लड़ाई हुई थी. मैंने कहा - उमेश, मुझे तुमसे बैर करने का दंड मिल गया. तुमने कहा था न कि सांप - बिच्छू काटे लो तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो गयी. तुम्हारी आत्मा को शांति मिलेगी.

- शशांक, तुम मुझ पर दोषारोपण न करो. तुम्हें कुछ नहीं होगा. हम तुम्हें अभी मुख्य चिकित्सालय राजनांदगांव ले जायेंगे. तुम्हारा उपचार करायेंगे. फिर देखना, भले चंगे हो जाओगे. . . . । उमेश ने सांत्वना दी.

- यह मात्र सांत्वना है. शत्रु इसे तुम भी जानते हो. मेरा मरना लगभग तय है. जब डॉक्टर ने मुझे बचाने असमर्थता जाहिर कर दिया है तो फिर बचूंगा कैसे ? अब तो तुम भी मुझे श्रद्धाजंलि दोगे. मेरी तेरहवीं पर पूड़ी बड़ा खाओगे. . . ।

अरे, यमदूत आ ही गये. ये मोटे - ताजे और काले हैं. ये रस्सी का फंदा मेरे गले में डाल रहे हैं. ये मेरे प्राण लेकर ही दम लेंगे. . ।

नहीं. . नहीं, अरे, यमदूत कहां अदृश्य हो गये. मेरे सामने तो उमेश ही खड़ा है. यह मुझसे मोटर साइकिल में बैठने का आग्रह कर रहा है.

तो मुझे राजनांदगांव मोटर साइकिल से ले जायेंगे. पर क्या उस पर बैठ पाऊंगा. मोटर साइकिल में हिचकोले पड़ेंगे. उससे शरीर हिलेगा और जहर फैलेगा. हे प्रभु, मैं क्या करुं ?

उमेश मुझे पकड़कर मोटर साइकिल तक ले गया. इतने में पिता जी आये. मैंने कहा - पिता जी,अब बच पाना मुश्किल है. मैं आपको कंधा देता पर अब आप मुझे कंधा देंगे. कैसा विपरीत समय आ गया है ?

- अपने कंठ से अशुभ वाक्य क्यों निकालता है. तुम्हें कुछ नहीं होगा. पिता जी ने कहा.

- खाक कुछ नहीं होगा. अपनी आंखों से मेरी हालात देख रहे हो. फिर भी कुछ न होने का आश्वासन ? मेरी मृत्यु के समय भी मजाक कर रहे हो. मां बीमार थी तो तुमने कहा था - अनुराधा, मैं यमदूतों से भी लड़कर तुम्हें बचाऊंगा. पर क्या वह बच सकी. तुम सब चाहते हो मैं मर जाऊं. . . . ?

दो - तीन लोगों ने मुझे पकड़ा. दीपक ने मोटर साइकिल की हैंडल सम्हाली. मुझे मोटर साइकिल पर लोगों ने बिठाया. मेरे पीछे उमेश बैठा. वह मुझे कंसकर पकड़ा था. गाड़ी चलने हुई कि खाली गुंडी दिख पड़ी. . . ।

हाय राम,यह अपशगुन. अब निश्चय ही बीच रास्ते में मेरे प्राणांत होंगे. नहीं. . नहीं, लोग करैत के काटने से बच जाते हैं तो फिर मैं एक बिच्छू के काटने से कैसे मर जाऊंगा ?

मोटर साइकिल चल पड़ी. मुझे लगा - गाड़ी भाग रही नहीं बल्कि मैं उड़ रहा हूं. स्वयं को सम्हालने असमर्थ हूं. उमेश की पकड़ और जोरदार हो गई है. कहीं मैं उछलकर गिर न जाऊं. मुझे डॉक्टर के पास पहुंचने की जल्दी है पर रास्ता लंबा लग रहा है.

सामने नीलकंठ दिखा. यानी शुभ. अब मुझ पर बम भी गिर जाये या कोई रायफल से दाग दे मगर मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा. . . . ।

हम राजनांदगांव पहुंचे. अस्पताल में मुझे टेबल पर लिटाया गया. मैं हड़बड़ा न जाऊं अतः मुझे पांच युवकों ने दबोच रखा था. डॉक्टर को देखा तो वह यमदूत से कम नहीं दिख रहा था. यमदूत ने कहीं डॉक्टर का रुप तो नहीं ले लिया. . उसने इंजेक्शन लगा दिया.

अरे, अब तो मुझे अच्छा लग रहा है. मैं बिलकुल स्वस्थ हूं. बिच्छू का विष उतर चुका है. यानी मृत्यु से मैंने बाजी मार ली. वास्तव में डॉक्टर प्रशंसा के लायक हैं. इसने मुझे जीवनदान दिया है.

हम वापस होने लगे कि संदीप दिखा. वह पत्रकार था. उसने कहा -अरे यार शशांक, तुम यहां. . . ?

- हां, मैं यह कहने आया हूं कि तुम अपने कार्यालय में बैठकर गांव के विकास से संबंधित झूठी रिपोर्ट छापो. पुरस्कार हथियाओ । शशांक, संदीप पर बरस पड़ा.

- तुम तो नाराज हो गये. . . ।

- और नहीं तो क्या ? तुम्हें पता है कि हम ग्रामीणों पर क्या बीतती है. कैसी - कैसी मुसीबतें आती है. वहां हमें सांप डंसते हैं. बिच्छू डंक मारते है. ग्रामीण बेमौत मरते हैं. वहां उपचार का कोई प्रबंध नहीं. क्या इस पर कभी तुम्हारी कलम ने क्रांति की. जाओ मित्र जाओं, ग्रामीण रिर्पोटिंग पर कोई पुरस्कार हड़पने कोई तिकड़म भिड़ाओ.

हम वहां से चल पड़े. गाड़ी तेज दौड़ने लगी. ठंडी हवा बह रही थी. इससे मेरे शरीर को ठंडक मिल रही थी. हम घर पहुंचे. घर में अब तक भीड़ है. वहां पहुंचते ही लोग हमारे इर्द गिर्द मंडराने लगे. सहारा देकर मुझे गाड़ी से उतारने का प्रयास किया गया मगर मैं तो स्वयं को पूर्ण स्वस्थ महसूस रहा था मैं गाड़ी से बिना सहारा के उतर गया.

विष्णु आगे आया. उसने मेरे शरीर को स्पर्श किया. कहा - अरे, तुम्हारा शरीर तो बर्फ के समान ठेडा है. लगता है तुम्हें सन्निपात हो गया. . . ?

मैं हड़बड़ाया - क्या मुझे सन्निपात हो गया. सन्निपात है या डॉक्टर की सुई का रियेक्शन ?अब क्या होगा. एक काल से बचा तो महाकाल ने दबोच लिया. हे प्रभु, अब तुम ही रक्षक हो. . ।

विष्णु ने श्वेता से कहा - श्वेता इसे कंबल उढ़ाओ,गुड़ - नारियल खिलाओ. इसके शरीर को गर्मी मिलनी चाहिए.

मैंने अपने शरीर को छूआ - हां. . . हां, मुझे सन्निपात हो गया है. तभी तो अभी तक ठंड लग रही है. अभी भी तो मैं कांप रहा हूं. नाक से पानी निकल रहा है.

श्वेता कंबल ले आयी. उसे ओढ़कर मैंने कहा - अलमारी में रखा नारियल तो ले आओ. . . ।

- पर उसे मैंने संतोषी मां के लिए रखा है. . . । श्वेता ने कहा.

यहां मेरा प्राणांत होने जा रहा है और तुम्हें संतोषी मां की भक्ति की पड़ी है. अच्छा,रहने दो. मुझे नारियल नहीं चाहिए. . । मैं नाराज हो गया.

श्वेता सकपका गयी. वह गुड़ और नारियल ले आयी. मैंने उन्हें खाया और चाय भी पी.

अब मुझे अच्छा लगने लगा है. भीड़ छंट चुकी है. मैं मृत्यु से एक बार फिर जीत गया हूं.

मैं निश्चिंत टहल रहा था कि मेरी पुत्री पिंकी आयी. उसने कहा - पापा, मेरा काला बिच्छू कहां है. . ?

बिच्छू का नाम सुनते ही भय के कारण मैं कूद पड़ा. मेरे हृदय की धड़कन बढ़ गयी. घबराहट में पूछा - कैसा बिच्छू, कौन सा बिच्छू. . . ।

पिंकी ने कहा - आप पुस्तक पढ़ रहे थे न,उसमें ही मैंने काले बिच्छू को दबा कर रख दिया था. वह तो प्लास्टिक का था.

मैं उछल पड़ा - ऐं. . . , तो क्या वह नकली बिच्छू था. उसे तो मैंने असली ही बिच्छू समझा था.

मैं वहां पर जाकर देखा जहां पर मुझे बिच्छू काटा था. वहां पर अब तक बिच्छू पड़ा था. पिंकी ने उसे दौड़ कर उठा लिया. इसका मतलब न ही मुझे बिच्छू ने काटा था और न ही मुझे सन्निपात हुआ था. मैं पूर्व में स्वस्थ और अब भी स्वस्थ हूं. . . ।

 

वृद्धावस्था

म्र की ढलान के साथ ही उसका शरीर कमान की तरह हो गया. अस्सी बरस की उस बुढ़िया का नाम था सुनयना. एक मात्र लाठी ही उसके शरीर का सहारा बनी हुई थी. जब से बुढ़ापे ने उसके शरीर का ग्रहण किया था. बिना लाठी के वह कहीं नहीं जाती थी. उसने घुटनों पर बल देकर छपरी में बैठ गयी. अपनी उस लाठी को दीवाल से सटा कर रख दी जो एक प्रकार से उसका एक अंग का रुप धारण कर ली थी. टूटा चश्मा नाक के ऊपर था. उसने चश्मे के भीतर धंसी कमजोर पड़ गयी आंखों में बल दिया और आंगन पर उतर आयी धूप को देखा. उसने अनुमान लगाया - ग्यारह साढ़े ग्यारह बज गये होंगे.

छपरी से लगी थी रसोई. वहां उसकी पुत्रवधू प्रियंका भोजन बनाने व्यस्त थी. मसाले की गंध उड़ रही थी. गंध इतनी जर्बदस्त थी कि सुनयना उससे ही सब्जी का स्वाद लेने लगी. बूढ़ापे की लालची प्रवृत्ति उसे छू गयी थी. वह चाह रही थी - उसे थोड़ी सब्जी मिल जाये तो वह चटखारे ले कर खा ले मगर सब्जी तो अभी अधपकी थी और फिर वह सब्जी उसे नहीं मिलेगी ऐसी भी बात नहीं थी पर सब्र नहीं था उस बुढ़िया को. अभी उसे बैठे क्षण दो क्षण हुआ था मगर उसे ऐसा लग रहा था मानों घण्टों से वह बैठी हो. अब वह सब्जी का चटखारा ले ही लेना चाहती थी. उसने कहा - बहू, भोजन तैयार हो गया हो तो मुझे परोस देती. . . . ।

- कुछ समय और लगेगा मां जी. . . . . . । बहू का जवाब था.

प्रियंका की बात से सुनयना को तो लगा कि वह बहाना बना रही है मगर सच क्या था यह वह भी जानती थी. अब उससे वहां बैठे रहना नहीं हो पा रहा था. वह लाठी उठायी. उसके सहारे अपने शरीर को उठाकर आंगन से होते हुए अपने कमरे में आ गयी. प्रियंका अपने काम में ही व्यस्त रही. जब भोजन तैयार हो गया तो प्रियंका पाकगृह से बाहर आयी. उसने देखा, छपरी में उसकी सासू मां नहीं है. वह उसके कमरे की ओर गयी. उसकी सासू मां खाट पर पड़ी थी. सुनयना ने कहा - मां जी, चलो भोजन तैयार हो चुका है .

सुनयना चुप रही. प्रियंका को लगा उसकी नींद लग गयी होगी. उसने पुनः कहा - मां जी, ऐ मां जी. . . चलो, भोजन तैयार हो चुका है.

अब बुढ़िया कसमसायी. बोली - अभी मुझे भूख नहीं है.

- अभी तो आप भोजन मांग रही थी . बहू ने प्रश्न किया.

- तब भूख थी, अब मर गयी.

बहू समझ गयी उसकी नाराजगी. उसने कहा - अभी तो साढ़े ग्यारह ही बजे हैं . और फिर सुबह नास्ता भी तो की थी. रोज तो इसी समय भोजन करती है. चलिए. . . . . ।

- तो क्या नास्ता अब तक पेट मे पड़ा रहेगा. मुझे नहीं करना है अभी भोजन. . . . . . ।

बुढ़िया उठी. लाठी पकड़ी और टेकती बाहर की ओर निकल गयी. प्रियंका पुनः अपने काम में लग गयी.

जब से सुनयना वृद्धावस्था में पहुंची थी. वह चिड़चिड़ी बन गयी थी. वह जो मांग करती तत्काल मिल गया तब तो ठीक नहीं तो पूरा घर सिर पर उठा लेती थी. लाख विनय अनुनय का उस पर कोई असर नहीं होता था. यह एक दिन की बात होती तो अलग बात थी. ऐसा तो रोज रोज होता था इसलिए बहू भी मनाते तक मनाती नहीं मानने पर वह अपने काम में लग जाती थी.

सुनयना भी कभी - कभी स्वयं कोसती. कहती - उसे मौत क्यों नहीं आती ? लेकिन खाट पकड़ते ही बवाल मचा देती. चिल्लाने लगती - मुझ पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. मेरा उपचार कराने से सब कतरा रहे हैं. सबकी चाहत यही है कि मैं मर जाऊं. . . . . । उसके मुंह में जो आता कहती चली जाती.

जब भी वह रुष्ट होती. अपने मन की भड़ास निकालने पहुंच जाती पड़ोसन दीपिका के घर. दीपिका एक ऐसी महिला थी जिसे अपने घर की कम पड़ोसियों के घर की चिंता अधिक रहती थी. उसके पास जहां पड़ोसी की बड़ी बूढ़ी सांसे अपनी बहुओं की भर्त्सना करती वहीं बहुएं सास की. दीपिका दोनों पक्षों में साझी बनती. ऐसी पचड़े में रहने की वह आदी हो चुकी थी. उसे उसके पति देवेश ने कई बार ऐसा करने से रोका मगर वह अपनी आदत से बाज नहीं आयी. चुगलखोरी की इस आदत ने उसकी कई से दोस्ती करायी तो कई से दुश्मनी. बिना झमेले में पड़े उसका भोजन नहीं पचता था.

दीपिका में एक खूबी यह थी कि वह पीड़ित को बातों का मरहम तो लगाती साथ ही कभी कभार भोजन भी परोस देती मगर वसूल भी लेती सूद समेत कभी दूध तो कभी शक्कर मांग कर. सुनयना भी कई बार उसके घर भोजन कर चुकी है और सूद समेत उतार भी चुकी है. आज भी सुनयना इसी विश्वास के साथ दीपिका के घर गयी कि दीपिका उसके दुख में सहभागी बनेगी और उसे भोजन परोस देगी. सुनयना को आयी देखकर दीपिका ने खाट डालते हुए कहा - आओ बुआ,आओ बैठो. भोजन तो हो गया होगा ?

खाट पर बैठती सुनयना ने कहा - अरी बहू, मेरी किस्मत ही कहां कि इतनी जल्दी भोजन मिल जाये. मेरी बहू प्रियंका ने समय पर भोजन न देने की कसम खा रखी है. सुनयना ने अपनी बहू की शिकायत कर दी. दीपिका को तो आग लगाने के लिए अवसर मिलना चाहिए था. उसे अवसर मिल गया था. उसने कहा - बारह बज गये, अब तक भोजन नहीं. नास्ता तो किया होगा बुआ ?

- ऊंहूक, नास्ता तो दूर अब तक चाय नहीं मिली है.

सुनयना सफेद झूठ बोल गयी. उसने सोचा था कि दीपिका उसे भोजन के लिए कहेगी. लेकिन वह कहने लगी - बुआ, आपकी बहू बड़ी मुंह चढ़ी औरत है. बूढ़ी और असक्त सास को सताते उसे जरा भी दया नहीं आती. देख लेना बुआ- इसका फल उसे उसके बहू के आने के बाद मिलेगा ही ? मैं तो कामना करती हूं ऐसी बहू किसी और को न मिले. . . . . । उसने बात पल्टी कहा -अरी बुआ, इस मंहगाई के युग का कहना ही क्या ? ऊपर से समय पर वेतन नहीं मिलता. हम पर तो पहाड़ ही टूट पड़ा है. . . . आज बीस तारीख है अब तक वेतन नहीं मिला है. व्यापारी उधारी देने से कतरा रहा है. हाथ तंग है. अमरौती से दस रुपये मांग लाये थे सो सब्जी में ही स्वाहा हो गया. मुझे तो चांवल चटनी के साथ खाना पड़ा. . . . चांवल रखा है. यदि नमक मिर्च की चटनी के साथ खाना हो तो बोलो. परोस देती हूं. . . . . ।

सुनयना कुढ़ गयी. उसके मन में तो आया कह दें - भेड़ बकरी तो नहीं , जो मिला खा लिया.

वह अभी - अभी आलू गोभी की सब्जी छोड़कर आयी थी. उसकी सुगंध अब भी उसके नाक में भरी थी. प्रियंका अगर यह कहती तो सुनयना उसके सिर चढ़ जाती. यह दीपिका थी. मुंहफट महिला. यद्यपि सुनयना चिढ़ गयी थी लेकिन उसने शांत स्वर में कहा - नहीं दीपिका, घर जाकर खा लूंगी. अभी भूख नहीं है. . . ।

- कैसी बातें करती हैं बुआ,सूर्य सीधे हो आये है और आपको भूख नहीं. स्पष्ट क्यों नहीं कहती सूखा भोजन गले के नीचे नहीं उतरेगा.

दीपिका ने व्यंग्य कसा. सुनयना तिलमिला कर रह गयी. कहना तो बहुत कुछ चाहती थी मगर कह नहीं सकी.

अभी कुछ क्षण ही सरका था कि अमित आया. वह वह प्रियंका का पुत्र था. उसने कहा - दादी, मां खाना खाने बुला रही है.

- जा अपनी मां से कहना - पहले वह पेट भर खा ले फिर बच जाए तब मुझे बुलाये.

- दादी, चना चबाओगी. . . . ?

अमित ने चने से भरी मुठ्ठी उसके सामने खोल दी. सुनयना कुढ़ गयी कि यह मेरे पोपले मुंह की हंसी उड़ा रहा है. उसके मन तो एक बार आया कि वह उसके हाथ को मार दे ताकि सारे चने धरती में बिखर जाये लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने अमित को गोद में ले लिया. अमित चना चबा चबा कर खाने लगा. सुनयना ने उसके बाल पर हाथ फेरा फिर उसके कोमल गाल को छुआ. उसे उस दिन का स्मरण हो आया. . . . . . . . ।

रसगुल्ले बन रहे थे. उसके सुगंध सुनयना के नाक तक पहुंच रही थी. उसके लार टपक गयी. उसने मन ही मन रसगुल्लों के स्वाद का आनंद लिया पर उसका मन नहीं भरा.

प्रियंका ने उसे भोजन के पूर्व तीन रसगुल्ले दिये. उन्हें सुनयना ने बचा - बचा कर खाया ताकि देर तक यह कार्यक्रम चले. पर तीन रसगुल्ले चले तो कब तक ! उसने फिर प्रियंका से रसगुल्ले मांगे. प्रियंका ने कहा - मां जी, मैंने अधिक नहीं बनाये है.

फिर क्या था सुनयना कुढ़ गयी. उसके सामने दाल भात रोटी परोसी गयी. भोजन छोड़ देने की उसकी इच्छा हुई लेकिन भूख तो लगी थी उसने रोटी खायी और आकर अपने कमरे तें लेट गयी.

उसका दिमाग अब तक रसगुल्लों में अटका था. तीन रसगुल्लों से उसका मन तृप्त नहीं हो पाया था. उसने प्रियंका से पुनः रसगुल्ले मांगने चाहे लेकिन नकारात्मक शब्द सुनने की आशंका ने उसे रोक दिया.

सुनयना कामना करने लगी - प्रियंका कहीं बैठने जाये और वह रसगुल्ले चुराकर खाये . लेकिन प्रियंका अपने काम में व्यस्त थी. रसोई से निकलने का नाम नहीं ले रही थी. कुछ समय बाद वैभव आया. वह उसका पुत्र था. उसे प्रियंका ने भोजन दिया. वह भोजन कर अपने काम पर पुनः चला गया. प्रियंका गृहकार्य से निवृत होकर पड़ोसन के घर चली गयी. सुनयना जिस अवसर की तलाश में था वह सामने खड़ा था. वह शीघ्रता से खाट से जमीन पर उतर आयी. लाठी सम्हाली और अमित को ढूंढ लायी. वह इस कार्य में अमित को सहभागी बनाना चाहती थी. उसने अमित के कान में कुछ कहा जिसे अमित ने स्वीकृति दे दी.

प्रियंका को रसगुल्लों को आलमारी में रख दिया था. अमित ने इधर रसोई मे प्रवेश किया उधर सुनयना अपने कमरे में चली गयी.

अमित रसगुल्लों से भरे बर्तन को उतार ही रहा था कि प्रियंका पहुंच गयी. उसने दरवाजा खुला देखा तो रसोई की ओर लपकी. अमित ने मां को आया देखा तो भय से थर्रथर्र कांपने लगा. भयभीत अमित के हाथ से रसगुल्लों का पात्र धरती पर गिर पड़ा. प्रियंका ने अमित की शरारत को पकड़ ली. उसने अमित को पकड़ा बिना पूछताछ के उसके गाल पर कई थप्पड़ जड़ दिये.

सुनयना भीतर से भयभीत थी कि अमित यह न बता दें कि दादी के कहने पर उसने ऐसा किया. लेकिन रोते सिसकते अमित ने क्या क्या कहा किसी की समझ में नहीं आया. रोते - रोते ही अमित सो गया.

जब नींद से जागा तो अमित सब भूल चुका था. वह मित्रों के संग खेलने लगा. सुनयना ने उसे अपने पास बुलाया. उसके गाल को देखा - थप्पड़ के निशान अब तक शेष थे. अमित पर सुनयना को स्नेह हो आया. उसने साड़ी की पल्लू से एक रुपये का सिक्का निकाला. और अमित की हथेली पर रख दिया. . . . . ।

सुनयना अतीत से निकली. अमित से कहा - चलो बेटा अमित, घर चलें. . . ।

- अरी बुआ, इतनी जल्दी भी क्या है , थोड़ा समय और बैठो न ?

दीपिका ने रोका मगर सुनयना ने लाठी सम्हाली और अपने घर जाने अमित के साथ निकल गयी.

घर में प्रवेश किया तो उसकी बहू प्रियंका ने कहा - आप कहां चली गयी थी. कब से भोजन तैयार है , चलो, बैठ जाओ भोजन करने. . . . ।

सुनयना ने मुंह बिचकाकर कहा - मुझे नहीं करना है भोजन. . . . . ।

प्रियंका फटे कपड़े सीने बैठ गयी. सुनयना अपने कमरे तक आयी. भूख तो लगी थी वह वापस हो गयी. रसोई में गयी. भोजन निकाली और लगी खाने. प्रियंका मुस्करा पड़ी.

 

उसी बिंदु पर लौटते हुए

लाजवंती बैठी रही. सोचती रही - महीना पूरा हो गया है. आज मेहनताना मिल जायेगा. घड़ी की सुई घूम रही थी. घंटी बजी. लाजवंती पढ़ी - लिखी तो थी नहीं. उसने घड़ी की घंटी सुनी. गिनती की - एक . . दो. . तीन. . आठ . . । यानी आठ बज गये. घर की याद सताने लगी. बच्चों के चेहरे आंखों के सामने नाचने लगे. वह दो रुपये छोड़ आयी थी. कुल दो रुपये ही बच पाये थे. कह आयी थी बड़की से सब्जी खरीद कर रख लेना. मैं आऊंगी तब बनाऊंगी. सोचा था -जल्दी मेहनताना मिल जायेगा. मगर प्रतिमाह का यही हाल था. लाजवंती रोज छह बजे लौट जाती थी. लेट - लतीफ तब होती जब उसे मेहनताना लेना होता.

मोटी मालकिन की इस आदत से लाजवंती को चिढ़ थी पर कह नहीं पाती थी. देर से आने पर मालकिन चिल्लाती लाजवंती तब का क्रोध चेहरे पर आ जाता. कहना चाहती - महीना खत्म होता है तब मुझे भी तो मेहनताना कि लिए घंटों बिठाती हो. . . पर जीभ मुंह में लपलपाकर रह जाती. मस्तिष्क में विचार कौंधते पर शब्द रुप में प्रकट करने का साहस नहीं कर पाती.

लाजवंती के मौन का पूरा - पूरा लाभ मालकिन उठाती. जब जी में आता सुना देती. कई बार लाजवंती की इच्छा हुई - कह दें, आप मुझे ज्यादा न सुनायें. मेहनताना लेने जब देर रात तक बैठती तब सोचती - मेहनताना लेकर कह दूंगी - कल से काम पर नहीं आऊंगी. सौ - सौ के पांच नोट हाथ में आते ही उसके विचार में परिवर्तन आ जाता. वह सब कुछ भूल काम में तैनात हो जाती.

मोटी मालकिन आयी देखा - लाजवंती अब तक बैठी है. लाजवंती के बैठने का उद्देश्य वह समझ चुकी थी. आज उसे लाजवंती के मेहनताना का हिसाब भी करना था. बावजूद उसने कहा - अरी, तुम अब तक बैठी हो.

यह उसकी आदत थी. लाजवंती न चाहते हुए भी मुस्कराती. भारी - भरकम देह वाली मालकिन ने ऐसे कहा मानो उसे यह पता ही न हो कि महीना पूरा हो गया है. उसने कहा - अरी,आज तुम्हारा महीना पूरा हो गया न ?

लाजवंती ने कुछ नहीं कहा. मौन स्वीकृति पर्याप्त थी. मोटी भीतर गयी. लौटी तो उसके हाथ में सौ - सौ के पांच नोट थे. लाजवंती की ओर बढ़ाते हुए बोली - मैं तो भूल ही गयी थी. तुम नाहक परेशान होती बैठी रही. मुझसे कह दिया होता.

क्या कहती ? क्यों कहती ? वह भुक्तभोगी थी. एक - दो बार उसने मेहनताना मांगा था, तब भी उसे इंतजार करना पड़ा था.

न जाने ये उच्च वर्ग क्यों कामवाली की विवशता नहीं समझता ? क्या मिलता है किसी को व्यर्थ इंतजार करवाने में ? शायद यह उच्चता की निशानी है. . . ओछी उच्चता की. . ।

रुपये ले लाजवंती जाने हुई. मोटी ने कहा - अरी, चार जूठे बर्तन निकल आये हैं. उन्हें मल दें. फिर चली जाना. महीना भर का मेहनताना हाथ में था. कल से फिर गिनती शुरु होती मगर आज ही उसे बर्तन मलना पड़े. यानी यह काम मुफ्त खाते में जायेगा.

कोई महीना ऐसा नहीं गया होगा जब मोटी ने मेहनताना देने के बाद काम न सौंपा हो. रुपये देकर वह अहसास दिलाना चाहती है कि उसने कामवाली पर एहसान किया है. लाजवंती ने जल्दी - जल्दी काम समाप्त किया और घर की ओर भागने लगी कि मोटी ने कहा - कल थोड़ा जल्दी आ जाना. . . ।

लाजवंती ने सिर हिला दिया और घर की ओर दौड़ पड़ी. घर पहुंची तो बड़की जाग रही थी. मां को देखते ही कह उठी - मां पप्पू रोते - रोते ही सो गया है.

लाजवंती जानती थी - पप्पू भूख से रोया होगा. थकान में सोया होगा. बड़की से तो उम्मीद नहीं की जा सकती. वह खाना पकाकर पप्पू को खिला दे. अभी उसकी उमर ही क्या थी - छह वर्ष. . बच्ची ही तो है वह. . . . ।

बिजली कौंधने के साथ ही बड़की के पिता का चेहरा आंखों के सामने झूल गया - शराब पीने में उसने थोड़ी भी कोताही नहीं बरती. कितनी बार लाजवंती ने उसे शराब पीने से मना किया लेकिन पत्नी की बात नहीं माननी थी , नहीं मानी. अंतिम समय मे उसे पत्नी के निवेदन का महत्व समझ आया. तब तक बहुत समय हो चुका था. मृत्यु उसे निगलने के लिए तैयार थी. वह मृत्यु से छुटकारा नहीं पा सका.

उन दिनों लाजवंती गर्भावस्था में थी. परिवार वालों ने गर्भपात करा कर पुर्नविवाह की सलाह दी. उसने न गर्भपात कराया न ही पुर्नविवाह को स्वीकार किया. यहीं से पारिवारिक तनाव शुरु हुआ और उसने पेट के बच्चे के साथ बड़की को लेकर अलग घर बसा लिया, जहां उसने पप्पू को जन्म दिया.

बच्चे की सूरत - शक्ल पिता पर गयी थी. लाजवंती को संतोष था कि पति ही पुत्र के रुप में अवतरित हुआ है .

वह विचारों से मुक्त हुई और कपड़े बदले बिना रसोई में जुट गई. बड़की ने भी सहयोग दिया. भोजन तैयार कर सोये हुए पुत्र को जगाने लगी. भूख और रोने से बच्चा पस्त हो चुका था. मां ने कहा - उठ पप्पू बेटा, खाना तैयार हो चुका है. खाना खा ले .

उसने आज निश्चय किया - चाहे कुछ भी हो जाये, वह मजदूरी करेगी. बर्तन मलने नहीं जायेगी. भवन बनाने का काम कर लेगी, सड़क बनाने का काम कर लेगी.

उस रात उसे ढंग से नींद नहीं आयी. सुबह उठते ही बच्चों के लिए निवाला तैयार करने लगी. निवाला बनाकर वह चौक में जाकर खड़ी हो गई. शाम को लौटी तो उसे संतोष था. यद्यपि हाथ में फफोले पड़ गये थे मगर उसे आज का काम पसंद था. एक तो समय पर लौट आयी थी. ऊपर से मेहनताना भी दुगुना मिला था.

पूरे आठ दिन बीत गये. लाजवंती, मोटी के घर काम पर नहीं गयी थी. परेशान मोटी लाजवंती के घर की ओर दौड़ी. लाजवंती घर पर ही थी. उसे देख समझ गई कि यह क्यों आयी है ? मोटी ने कहा - लाजवंती तुम काम पर क्यों नहीं आ रही हो ? कहीं तुम्हारी तबीयत तो खराब नहीं ?

- मेरी तबीयत भला क्यों खराब होगी. . ? लाजवंती ने कहा.

पप्पू वहीं जमीन पर लेटा था. उसकी नाक - मुंह से बह रही त्रिवेणी को देखकर मोटी का मन घृणा से भर गया पर घृणा करने से उसका काम बिगड़ सकता था. उसने पप्पू को उठाया और महंगी साड़ी के आंचल से बच्चे की गंदगी को पोंछते हुए बोली - बच्चे को साफ - सफाई से रखना चाहिए. . . ।

मोटी के मन में स्वार्थीपन था पर लाजवंती का मन भर आया,मोटी के कर्म को देखकर. उसके विचार में परिवर्तन आया और वह पुनः शोषित होने मोटी के घर काम पर जाने लगी. . . . . ।

 

बहू का व्यवहार

हलीज पर कदम धरते ही गोमती ने कुलेन्द्र की मां मालती से कहा - बुआ, आप कुलेन्द्र का विवाह कर ही डालो । समय खराब चल रहा है पता नहीं कब उसकी कदम भटक जाये ?

मालती चांवल साफ कर रही थी । उसके हाथ से गोमती ने सूपे ले लिया । सूपे पर हाथ चलाती बोली - इस उम्र में आंखें गढ़ाकर काम करो यह मुझे पसंद नहीं ।

मालती ने गोमती पर स्नेह की द्य्ष्टि डाली । कहा - सच कहूं बहू, मैं तुम्हारी ही तरह बहू चाहती हूं । ऐसी बहू जो आते ही चौंका सम्हाल ले । मुझे आभास न होने दे कि मैं सास हूं । वह मुझे मां ही माने, सिर्फ मां । कहते - कहते मालती की आंखों में चमक आ गई ।

गोमती ने कहा - बुआ, मैं एक ऐसी ही बहू दिलाऊंगी . . . . ।

मालती जानती थी । गोमती यही कहेगी । गोमती ने आगे कहा - मगर एक समस्या है ?

- समस्या . . . कैसी समस्या ?

- वे लोग दहेज नहीं दे सकते । वैसे मैं जिस लड़की की बात कर रही हूं । उसका नाम कुमुदनी है ।गृह कार्य में दक्ष, रुप रंग में सुन्दर, ग्यारहवीं तक पढ़ी है । पढ़ - लिखकर भी आधुनिकता से परहेज करती है । अभी तीज में गई थी तो कुमुदनी के पिता रामेश्वर से मैंने कुलेन्द्र के विषय में चर्चा चलायी ।वे कुमुदनी का विवाह कुलेन्द्र से करने तैयार है ।

- बहू,एक बात तुम भी गांठ मे बांध लो । हमें दहेज नहीं, सुन्दर, सुशील, गृहकार्य में निपुण बहू चाहिए । कुमुदनी के बारे में मैं आज ही कुलेन्द्र के पिता से बात करुंगी . . . . ।

संध्या को कुलेन्द्र के पिता अवध आये। खाने पीने से निपटने में रात हो गई थी । मालती ने जल्दी - जल्दी चौका का काम निपटाया ।अवध के पास आयी ।उसने खाट पर बैठते हुए कहा - सो गये क्या ?

- नहीं तो, आज बहुत जल्दी काम निपटा आयी, क्या विचार है . . . ? कहते हुए अवध उठ बैठे ।अपना हाथ मालती की ओर बढ़ाया ।उसके हाथों ने मालती के गाल का स्पर्श किया । एक बार मालती शर्म से लाल हो गयी ।अवध का हाथ आगे बढ़ता इसके पूर्व उसे परे ढकेलते हुए कहा - दो शब्द प्रेम के बोल क्या बोले । तैयार हो जाते हो अपने में समेटने । कभी अपनी उम्र का भी ख्याल किया करो ।

अवध के होठों पर मुस्कान तैर आयी । कहा - अच्छा, तुम क्या कहना चाहती हो, कहो ।

- बहू गोमती आयी थी ।बता रही थी, उसके मायका में एक लड़की है - कुमुदनी । उसके माता - पिता कुलेन्द्र के साथ कुमुदनी को भंवरा देने तैयार है ।

- अच्छा, तो बात यह है । मैं और कुलेन्द्र कल ही चले जाते हैं कुमुदनी के घर ।

दूसरे ही दिन अवध कुलेन्द्र के साथ कुमुदनी को देखने चले गये ।उन्होंने लड़की देखी । लड़का - लड़की भी एक - दूसरे को पसंद कर लिए ।फलदान के साथ विवाह का मुहूर्त भी निकाल लिया गया ।

नियत दिन से विवाह कार्यक्रम प्रारंभ हुए और कुमुदनी ससुराल चली गयी ।

नयी - नवेली बहू सबकी चहेती होती है ।जैसे - जैसे पुरानी होती जाती है उसकी आदतें व व्यवहार सामने आता जाता है । फिर वह किसी की चहेती बन जाती है तो किसी का दुश्मन, मगर कुमुदनी को ससुराल आये दो वर्ष बीत गये मगर उसने अपने आदत व्यवहार से किसी को नाराज होने का अवसर ही नहीं दिया ।इसी बीच कुलेन्द्र की नौकरी भी लग गई । उसकी नियुक्ति लिपिक के पद पर हुई थी । शहर में उसे नौकरी करनी पड़ती थी और शहर गांव से पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित था । प्रतिदिन आना - जाना संभव नहीं था । अतः वहीं किराया का मकान लेकर रहता था । वह आठ पन्द्रह दिनों में गांव आया करता था ।

ग्यारह बजे उसे आफिस जाना होता और लौटने का समय निश्चित नहीं था । वह कुमुदनी को अपने साथ शहर ले आना चाहता था । उसने अपनी बात कुमुदनी के समक्ष रखी । कुमुदनी ने कहा - आप कैसी बातें करते हैं, मां की तबीयत अक्सर खराब रहती है । बाबूजी कुछ कर नहीं सकते । अगर मैं यहां नहीं रहूंगी तो इनको समय पर कौन खाना देगा ।

- और मुझे वहां तकलीफ उठाना पड़ता है उसका क्या ?

- हम अभी तकलीफ झेल सकते हैं, मगर ये तो बूढ़े हो चुके हैं । अपना शरीर भी इनसे सम्हाला नहीं जाता ।

कुमुदनी ने बात टालने की कोशिश की मगर कुलेन्द्र नहीं माना और आखिरकार कुमुदनी को कुलेन्द्र के साथ शहर जाना ही पड़ा ।

पूरे तीन वर्ष बीत गये मगर न कुलेन्द्र स्वयं गांव गया और न ही कुमुदनी को गांव जाने दिया । जब कुलेन्द्र का पुत्र हुआ तो उसने मां बाबूजी को पत्र अवश्य लिखा था कि आपका नाती आया है । आप लोग अपने नाती को देखने आओ । पत्र के जवाब में उसके बाबूजी का पत्र आया था कि इन दिनों मालती की तबीयत खराब चल रही है । तुम लोग यहां आ जाओ ।

कुलेन्द्र ने बाबूजी का पत्र आया इसकी जानकारी भी उसने अपनी पत्नी कुमुदनी को नहीं दिया ।कुछ दिनों तक पत्र व्यवहार चलता रहा उसके बाद अवध का तो पत्र आता मगर कुलेन्द्र पत्र देना बंद कर दिया । जब कुमुदनी पूछती तो कह देता - उसने पत्र भेजा है । पुत्र के पत्र आना बंद होने के कारण अवध और मालती समझने लगे कि यह सब कुमुदनी के कारण हो रहा है मगर सच्चाई और कुछ थी ।

काफी दिन निकलने के बाद भी कुलेन्द्र ने जब गांव जाने का नाम नहीं लिया तो कुमुदनी एक दिन जिद्द पर अड़ गयी । बोली - मैं तुमसे जब भी गांव जाने कहती हूं , तुम बहाना बना देते हो । तुम यहीं रहो । मैं मुन्ना को लेकर कुछ दिनों के लिए गांव जाऊंगी । इधर अवध पत्र लिख - लिखकर बहू बेटे को बुला बुलाकर थक गया था । जब एक दिन फिर मालती ने कहा तो अवध भड़क उठा - तुम बहू - बहू की रट लगायी रहती हो और तुम्हारी बहू के कारण पुत्र ने गांव आना तो क्या पत्र लिखना भी छोड़ दिया । यह सब उसी का सिखाया धराया है वरना हमारा कुलेन्द्र ऐसा कहां था ।अब तुम अपने दिमाग से बेटा बहू का नाम निकाल दो और यदि नहीं निकलता तो कल गाड़ी में बिठा देता हूं, तुम वहीं चली जाओ । जब लताड़ पड़ेगी तब बुद्धि ठिकाने आयेगी । आजकल की बहुंए परिवार को जोड़ती नहीं, तोड़ती हैं ।

कुमुदनी की जिद्द के सामने कुलेन्द्र को झुकना ही पड़ा । वे गांव आये । बातों ही बातों में सच्चाई खुली कि सारी गलती पुत्र की है न की बहू की तो अवध का सीना गर्व से तन गया । उसके मन में कुमुदनी के प्रति जो दुर्भावना जगी थी वह खत्म हो गई । वह मन ही मन बड़बड़ा उठा - कुछ बहुएं ऐसी भी होती है जो घर को जोड़ती है ।परिवार में सामंजस्य स्थापित करती है ।

मालती जो दिन रात खाट में पड़ी रहती वह उठकर कुमुदनी के साथ काम में हाथ बंटाने का प्रयास करने लगी । कुमुदनी ने साफ शब्दों में मना करते हुए कहा - अब आपका आराम करने का दिन है ।

कुमुदनी के ही कहने पर कुलेन्द्र ने अपना तबादला गांव के ही पास शहर में करवा लिया और अब वह गांव से ही आना जाना कर नौकरी करने लगा ।

 

चरण

ता नहीं चरण को क्या हो गया था कि सुबह से ही सिर पर हाथ देकर आंगन में बैठ जाता. मास्टरनी चिल्लाई - झुंझलाई पर चरण पर कोई असर नहीं पड़ा. मास्टर , मास्टरनी पर बिफरा. मास्टरनी चुप होने के बजाय और चिल्लाने लगी -न मालूम किस जनम का बदला ले रहा यह निकम्मा. अरे, तुम मुझ पर क्यों नाराज होते हो. अगर भड़कना ही है तो भड़को अपने सिर चढ़ाये नौकर पर तब जानूंगी सचमुच तुम सत्य के लिए लड़ते हो. इसे हुआ ही क्या है ? ठीक तो दिखता है .

- तुम चुप होती हो कि नहीं, बुढ़ापा आ गया है बेचारे का. शरीर थक गया होगा. . . ।

- हां. . हां. . . , तुम तो ब्रम्हृा लगते हो. ऐसी बात कर रहे हो मानो सब समझ गये. आ गया होगा बुढ़ापा बेचारे का. . . . ।

जब बातचीत जोर पकड़ने लगती तब मास्टर की आठ वर्षीय बिटिया चरण के हाथ को पकड़कर बाहर ले जाती. वह अबोध बालिका क्या - क्या सोचती रही होगी, अपनी मां के बारे में. जरुर बुरा ही सोचती होगी. उस बालिका की आत्मा में आशंका सिपचती होगी - चरण को मार न दे. . . ?

आज भी मास्टरनी चिल्लाती रही. मास्टर हताश हो टहलने निकल गया. चरण को लेकर मुनियां बाहर चली गई. पाकगृह में प्रवेश करते ही मास्टरनी का क्रोध दुगुना हो गया. वह भभक उठी - चरण ने लकड़ी नहीं काटी है. किसे जलाकर खाना बनाऊंगी. ठीक है, मास्टरजी उसके पक्ष में बोलते हैं. पता लग जायेगा जब खाना नहीं मिलेगा. . . ।

मास्टरनी की सारी आशाएं व्यर्थ गयी. मास्टर आ कर तैयार होकर स्कूल चला गया. मास्टरनी उल्टी गंगा बहती देखकर भीतर ही भीतर जलकर राख हो गयी. वह स्वयं से कुड़ गयी. लकड़ी धम्म से आंगन में पटक काटने लग गयी. पर परेशानी के सिवा कुछ हासिल नहीं कर सकी.

ठक् - ठक् की आवाज सुनकर चरण भीतर आया. मास्टरनी लकड़ी काटती वैसी ही झुकी रही. उसने यह दिखाने का प्रयास किया कि उसे चरण के आने की कोई खबर ही नहीं. चरण उसी पैर वापस हो गया. तब मास्टरनी लकड़ी काटना छोड़कर जाते हुए चरण को देखती रही. चरण धीरे - धीरे कमान की तरह शरीर लिए निकल गया था.

वापस आया तो चरण के हाथ में फटी लकड़ियां थीं. उन्हें मास्टरनी से कुछ दूर जमीन पर रख दिया. मास्टरनी पसीना पोंछती रह गयी. हंफरने लग गयी पर लकड़ी कटी नहीं थी. चरण बाहर निकल कर दरवाजे के बाजू में बने चौरे पर जाकर बैठ गया सिर पर हाथ देकर.

दोपहर खाना खाने की छुट्टी हुई. दो बज गये थे. मुनिया आकर उससे लिपट गयी. चरण चिंता मग्न था. मुनिया के अचानक आकर लिपटने से एक बार उसका अशक्त शरीर ने अपना संयम तोड़ दिया. वह सम्हलते - सम्हलते सम्हल पाया. उसने मुनियां को अपनी गोद में ले लिया.

मास्टर आकर चरण के पास कुछ पल ठहर गया. फिर घर के अंदर प्रवेश किया. मास्टरनी का क्रोध शांत हो चुका था. मास्टर ने आवाज दी - खाना - खुराक देना है कि नहीं श्रीमती जी. . . ?

पाकगृह से निकलती हुई मास्टरनी ने कहा - क्यों नहीं. . । अरे, मुनियां कहां है,वह नहीं आयी ?

-बाहर है. . । मास्टर ने कहा.

- बाहर. . . ! किसके साथ है ?

- तुम जाकर देख सकती हो.

मास्टरनी ने बाहर आकर देखा - चरण उकड़ू बैठा था. मुनियां उसकी गोद में बैठी उसकी दाढ़ी को छूकर कह रही थी - बाबा. . . बाबा, ये बाल क्यों उगते हैं ?तुम रोज - रोज नहीं काटते. पापा तो रोज सुबह काटते हैं ?

चरण धीरे - धीरे कहने लगा - मुझे कहां जाना होता है बिटिया कि रोज - रोज दाढ़ी बनाऊं. ये क्यों उगते है. . यह तो आदिमकाल से बढ़ती आ रही है. इसे समूल नष्ट करना असंभव है. अगर बाल नहीं उगेंगे. नाखून नहीं बढ़ेंगे तो पशुता ही खत्म हो जायेगी. यही तो प्रमाण है कि आज भी पशुता जीवित है. . . ।

- मुन्नी. . . । मास्टरनी ने धीरे से आवाज दी. चरण की गोद पर पड़े ही पड़े मुनिया ने मम्मी की ओर देखा. मास्टरनी चरण के समीप आकर बोली - क्यों चरण, कसम खा ली है क्या,यहां से नहीं उठने की. भीतर जाने का विचार नहीं है क्या ?

- नहीं मास्टरनी बाई, मैं क्यों कसम खाने लगा. जहां उमर बीत गई वहां जाने के लिए . चल मुनियां बेटी.

चरण की गोद से मुनिया उठ खड़ी हुई. चरण धरती को थेम कर उठा. धीरे - धीरे पग बढ़ाकर घर में प्रवेश किया. छपरी में पहुंच कर मास्टर से थोड़ी दूर में बैठ गया. मास्टरनी मास्टर को पाकगृह से खाना लाकर दिया. उसने देखा - चरण अपने भोजन करने के स्थान पर न बैठकर दूर बैठा है. उसने कहा - क्यों चरण, वहां क्यों बैठा है. भोजन नहीं करना है क्या ? क्या सोचता रहता है दिन भर. हू. . . चल इधर आ. . . ।

चरण अपने भोजन करने के स्थान पर जा बैठा. उसके सामने मास्टरनी ने भोजन की थाली और लोटा भर पानी ला कर रखा. चरण ने लोटा उठाया और गटागट पानी पी गया फिर भोजन करना शुरु किया.

कुछ दिनों से मास्टरनी परखती आ रही थी - चरण के हर कार्य को. वह धीरे - धीरे खाने लगा था. वह भी एक ही परोसा खा कर उठ जाता था. पहले तो यूं खाना खाता कि समय ही नहीं लगता था वह भी दो - तीन बार ले - लेकर. मास्टरनी चरण को परखने की खूब कोशिश करती. वह जानना चाहती थी कि चरण को आखिर हुआ क्या है. क्यों खाना टूट गया है. क्यों स्मरण शक्ति क्षीण होती जा रही है. मगर उसकी जिज्ञासा पूरी नहीं हो पा रही थी. वह चाह कर भी चरण से कुछ नहीं पूछ पाती थी.

मास्टरनी को इतना समझ तो आ गया था कि उम्र ढलने के साथ चरण का शरीर शिकस्त हो चुका है. पर वह अक्सर तब चीखने - चिल्लाने लगती जबकि उसका काम अधूरा रह जाता. उस पर एक काम का बोझ और आ जाता. . . . ।

संध्या हो चुकी थी. गायें वापस आ रही थी. गायों के गले में बंधी घंटियां टन् - टन् बज रही थी. चरण आंगन में बैठा था. मास्टर छपरी में बैठा अखबार पढ़ रहा था. मुनियां पुस्तक के पन्ने उलट - पलट कर चित्र देख रही थी. मास्टरनी ने कोठे को झांककर देखा -वहां जानवरों के लिए घास नहीं डली थी. फिर क्या था वह तमतमा गई . वह चरण पर बिफर पड़ी - चरण तुम दिनोंदिन क्यों लापरवाह बनते जा रहे हो. अगर जानवर भूखे मरेंगे तो पाप हमें लगेगा, तुम्हें क्या है. अगर तुमसे कोई काम नहीं हो पाता तो हमसे क्यों नहीं कह देते. हम कर लेते. . . . ।

चरण निर्विकार बैठा रहा. मास्टरनी, मास्टर पर सवार हो गई - और तुम जो हो यह सब होते हुए चुप्पी साधे देखते रहते हो. मैं कल मायका चली जाती हूं. रोज - रोज के झंझट में मैं पड़ना नहीं चाहती. तुम सम्हालना अपना घर और नौकर.

मास्टर चरण के पास आया. कहा - क्यों चरण, आखिर बात क्या है. काम क्यों नहीं करते. रोज सुबह शाम ये विवाद क्यों. . . ।

- मुझे लगता है मास्टरजी मेरी मति फिरती जा रही है.

- तुम्हारी मति नहीं फिर रही है. एक दिन इस झंझट में मेरी मति जरुर फिर जायेगी. मुझे तो लगता है - अब तुम मुफ्त की रोटियां तोड़ना चाहते हो. . . ।

चरण ने कभी सोचा भी नहीं था कि मास्टर उसके लिए कभी ऐसे शब्द का भी प्रयोग कर सकता है. मुनियां को लगा - विवाद बढ़ने को आमादा है. वह चरण के पास आ उसे उठाने लगा कि मास्टर ने मुनिया को अपनी ओर खींचा. कहा - खबरदार, आज के बाद चरण के पास गया तो. . . चरण चलो उठो और अब यहां से चलता करो. बर्दाश्त की भी हद होती. तुमने तो सारी सीमाएं ही लांघ दिया है. . . ।

चरण को कुछ समझ नहीं आ रहा था. मास्टर ने आगे कहना जारी रखा - तुम उठते हो कि उठाकर बाहर फेंकू. . . . ।

चरण सकपका गया. पर उसने हिम्मत नहीं हारी अशक्त शरीर को उठाने का प्रयास करते हुए सशक्त जुबान से कहा - नहीं मास्टर, नहीं. मुझे उठाकर फेंकने की जरुरत नहीं. मेरा नाम चरण है और मेरे चरण में इतनी शक्ति है कि वह चल सकती है. . . ।

- खूब बोलने लगे हो चरण. . . ।

- समय है मास्टर. . . समय आदमी को गूंगा और वाचाल बना देता है. . . . ।

मास्टर का क्रोध फनफना गया. उसने चरण को एक लात मार दी . चरण उठ रहा था मगर लात पड़ते ही वह लड़खड़ाकर फिर से गिर गया. चरण की आंखें छलछला आयी. उसकी आंखें तो तब भी नम नहीं हुई थी जब उसका इकलौता पुत्र देश की सेवा में शहीद हो गया था. चरण ने कहा - अब मुझे सब समझ आ गया मास्टर लोग आम खाने से मतलब रखते हैं और गुठलियां फेंक देते हैं.

इतना कह चरण उठा और चलता बना.

मुनियां पलंग पर गिरकर सुबकने लगी.

रात होने लगी. चरण लौटा नहीं. मास्टर पलंग पर करवटें बदलने लगा. नींद आंखों से दूर चली गयी थी. उसे चरण के शब्द बार - बार सुनाई दे रहे थे - समय के सब साथी. . सबसे बड़ा वक्त है. लोगों को आम के रस से मतलब होता है, गुठलियों से नहीं. . . . . ।

सचमुच में चरण पथ प्रदर्शक का काम बखूबी करता था. उसके ही अनुभव ने मुझे आज हर चीज दी. एक मात्र पुत्र था उसका. वह देश को न्यौछार हो गया. तब भी चरण ने रोया नहीं. कहता फिरता रहा - यदि मेरा दस पुत्र होते तो देश की सेवा में लगा देता. . . । चरण ने मुझे अपना पुत्र के समान ही माना. . . पर मैंने क्या किया उसके साथ ? अभद्रता, अव्यवहार. . . नहीं ,नहीं मुझे ऐसा नहीं करना था. . . . ।

इसी उधेड़ बुन में मास्टर की आंख लग गयी.

सुबह हो चुकी थी. चरण रात भर नहीं लौटा. मास्टर के मन में आशंका सिपचने लगी - अब चरण गांव के लोगों को लेकर आयेगा. मेरे विरुद्ध पंचायत जुड़ेगी. लोग मुझे भला बुरा कहेंगे. मेरे व्यवहार पर थूकेंगे. . .

समय सरकता जा रहा था मास्टर का मन विचलित होते जा रहा था. दस बजने को जा रहा था पर मास्टर अब तक स्नान नहीं किया था. उसकी पत्नी ने कहा - क्यों जी, आज नहीं नहाना है क्या ? स्कूल नहीं जाना है क्या ? ठंड अधिक लग रही है क्या ?

सचमुच आज ठंड कुछ अधिक ही थी. पूस महीना जो ठहरा. कुछ क्षण मास्टर दुसाले में दुबका पड़ा रहा फिर अचानक उठा और दरवाजे की ओर बढ़ा. मास्टरनी ने कहा - कहां जा रहे हो. . . . ?

- मैं चरण को देखने जा रहा हूं. वह रात भर नहीं आया. पता नहीं कहां होगा. किस हाल में होगा. . . ।

-मगर. . . ।

- मगर वगर कुछ नहीं. . . . ।

और चरण अपने घर से निकल गया. जैसे ही उसने बाहर कदम रखा कि देखा - चरण को उठाये कुछ लोग खड़े हैं. मास्टर दौड़कर उन लोगों के पास गया. वे लोग चरण को लेकर भीतर आये. मास्टर ने उन लोगों से पूछा - क्या हुआ चरण को. . . ।

वे लोग चरण को नीचे लिटा दिए. एक ने कहा -मास्टर जी, यह मुनियां - मुनियां कह रहा था. हमने आवाज सुनकर इसके पास गये. इसका शरीर ठंड से कांप रहा था. कुछ ही देर बाद इसके मुंह से आवाज निकलना बंद हो गया और शरीर की हरकत भी रुक गयी. लगता है - कल रात की ठंड यह सह नहीं सका. . . ।

मास्टर सन्न रह गया. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें क्या न करे. . . उसे आत्मग्लानि हो रही थी कि उसे ऐसा नहीं करना था पर समय सरक चुका था और चरण का मृत देह उसकी आंगन में पड़ा था. मास्टर की आंखें भर आयी. वह चरण के मृतदेह से लिपटकर कहना चाहता था - कितनी ठंड लगी होगी चरण तुम्हें, इतनी ठंड तो नहीं लगी होगी न जितनी तेरे जाने के बाद से मुझे लगने लगी है. तेरी आत्मा तो नहीं कांपी होगी न ! देख, मेरी आत्मा कल से कांप रही है. . . . क्या तू कभी लौटकर नहीं आयेगा. . . क्या मेरा चरण सदैव के लिए मुझसे बिछड़ गया. . . ?

पर मास्टर कुछ नहीं कह सका. मास्टरनी अहिल्यारुपी शिलाखंड बन गयी. मुनियां दूर खड़ी सुबकती रही. . . सुबकती रही. . . ।

 

अपनत्व

-कश खींचकर धुआं उड़ाओ. खो-खो करो . मेरी नींद खराब हो,यह मुझे जरा भी पसंद नहीं. बु ढ़ऊ,मेरी सलाह मान धुआं उड़ाना छोड़ शान्ति से सोओ और मुझे भी चैन की नींद सोने दो।

रामदीन का माथा चकरा गया फूट भर का छोकरा,उसके द्वारा ऐसी हिदायत ? उसने सोचा भी नहीं था-सड़क का यह नटखट,सिर चढ़कर बोलेगा. तिलमिला कर उसने कहा-धुआं उड़ा रहा हूं तो अपनी कमाई का. तुम पर दया मरा इसका मतलब यह नहीं कि तुम मुझे समझाओ ?

-बुढ़ऊ,मैं तुम्हारे हित की बात कर रहा हूं. धुंआ तुम्हारे जीने के दिनों में बढ़ोतरी नहीं कटौती ही करेगी.

-मेरे जीवन से तुम्हें क्या ? एक दिन जिऊं या एक हजार साल?

-तुम्हारे जीने मरने से मुझे क्या ? पर मेरा तो ख्याल करो . धुआं और खांसी-खोखली मेरी नींद खराब कर रही है.

-चुपचाप आंख बंद कर सो जा नहीं तो धक्का मार कर बाहर कर दूंगा.

-तुमसे और क्या उम्मीद की जा सकती है. मैंने पहले ही मना किया-बुढ़ऊ,मुझे अपने साथ मत ले चलो,परेशानी में पड़ोगे पर बन गये थे न मेरे हितैषी. अब अपने कर्मों का सुनो भाषण ।

रामदीन को लगा वास्तव में उससे भूल हुई. इस शैतान को तो फूटपाथ में ही मरने देना था. कड़ाके की सर्दी जब शरीर में घुसती तब नानी याद आ जाती. चपर-चपर चल रहा मुंह नहीं चलता . ठण्ड से शरीर ठिठूरता और दांत किटकिटाता.

रामदीन ने एक कश खींच कर फिर धुआं फूंका. बालक ने नाक भौं सिकोड़ा. कहा-तुम पर मेरी बात का जरा भी असर नहीं हुई.

-तुम सो क्यों नहीं जाते ?

-तुम सोने दोगे तब न ? धुएं से आंख जल रही है और खांसी से नींद उड़ रही है.

रामदीन जितना अपने आपको समझा रहा था. बालक उसे उतना ही गुस्सा करने उकसा रहा था. उसने कहा-तू चुपचाप सो जा नहीं तो तुम्हें धक्का देकर घर से निकाल दूंगा या फिर मैं खुद निकल जाऊंगा.

बालक को हंसी आ गयी. उसको हंसते देख रामदीन का क्रोध फनफना गया. वह गुस्से से बालक की ओर देखने लगा. बालक की हंसी थमी नहीं . वह लगातार हांसे जा रहा था. उसकी लगातार हंसी से रामदीन झेंप सा गया. उसने पूछा- क्यों रे, मैंने ऐसा क्या कह दिया कि बत्तीसा दिखाने लगा.

बालक ने हंसते हुए कहा-बुढ़ऊं,तुम मुझे बाहर निकालने की धमकी दे रहे हो. मैं तो बाहर निकलूंगा नहीं . रही बात तुम्हारी,तो शौक से बाहर का दरवाजा खोले देता हूं. . . ।

रामदीन तैश में आ गया-दरवाजा तुम्हें खोलने की जरुरत नहीं , मैं चला जाता हूं । रामदीन दरवाजे की ओर बढ़ने लगा. बालक ने कहा-सड़क में रात काटने का मन है तो जाओ काटो,मुझे परवाह नहीं पर याद रखो बाहर की ठण्ड तुम्हें बर्फ के समान जमा देगी. अब तुम्हारे शरीर में वह क्षमता नहीं कि बाहर का ठण्ड सह सको. संभव है -कल तुम्हारा शरीर अकड़े पड़े मिले और मुझे तुम्हारे अन्तिम संस्कार की व्यवस्था करनी पड़े ।

रामदीन का पैर रुक गया. बाहर पड़ रही सर्दी का अंदाजा वह बंद कमरे में ही लगा लिया था. गर्म कपड़ा पहनने के बाद भी उसे ठण्ड सा लग रहा था. रामदीन वापस अपनी जगह पर आ गया. बालक ने कहा -क्यों बुढ़ऊं,साहस जवाब दे गया?देगा भी क्यों नहीं . कभी आकाश तले जीना सीखे ही नहीं हो .

रामदीन चुप रहा. वह चाह रहा था-बालक मुंह बंद करे. चुपचाप सो जाएं. बालक चाह रहा था -बुढ़ऊं कश खींचना बंद करे धुंआ उड़ना बंद हो और उसकी खांसी-खोखली रुक जाएं ताकि वह शान्ति की नींद सो सके. स्थिति विपरीत थी. न रामदीन चोंगा छोड़ पा रहा था नहीं बालक अपना मुह बंद कर पा रहा था.

रामदीन ने विचार भी नहीं किया था कि जिस बालक को सड़क से उठाकर ले जा रहा है,वह उसका सिरदर्द बन जाएगा. उसे अकेला सड़क पर भटकते देखा. उसे दया आ गयी. वह दयावान बन गया. रामदीन उसे रात भर अपने घर में पनह देने की नियत से ले आया था उसे क्या पता था कि जिसे वह उठाकर ले जा रहा है वह ताना देदेकर उसकी शान्ति में खलल पैदा कर देगा. उसकी स्वतंत्रता पर पाबंद लगायेंगा. उसके जीवन में ऐसा एक भी अवसर नहीं आया था कि उसके कार्यप्रणाली पर अवरोध हो. मगर यह बालक तो न सिर्फ अवरोध पैदा कर रहा था अपितु चोंगा पीने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रहा था.

रामदीन वापस अपन&