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February 2014
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व्यंग्य

दौरे और उपहार

डॉ. रामवृक्ष सिंह

यह शीर्षक सुनने में हिन्दी फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ जैसा लगता है। दौरे और उपहार में क्या संबंध हो सकता है? इसे केवल वे लोग समझ सकते हैं जो सेवा में और खास तौर पर सरकारी सेवा में हैं। कोई व्यक्ति (वह ऊँचा अधिकारी और मंत्रालय/मुख्यालय का अदना-सा क्लर्क भी हो सकता है) आपके कार्यालय का दौरा करने आए तो मन में उठने वाला पहला विचार यही होता है कि उसे उपहार क्या दिया जाएगा? गोया बिना उपहार दिए दौरा पूरा ही नहीं माना जाए, या कि दौरे का मूल उद्देश्य उपहार बटोरना ही होता है, या फिर यह कि उपहार न दिया तो दौरा करनेवाला नाराज़ हो जाएगा और लौटकर अपनी दौरा रिपोर्ट में न जाने क्या अल्लम-गल्लम लिख मारेगा।

सेवा में दौरों का कितना महत्त्व है, यह अपने वरिष्ठ जनों के दौरा-प्रेम को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। लेकिन दौरे से उपहार की जुगलबन्दी केवल स्वदेशी दौरों के संबंध में लागू होती है, विदेश दौरे तो अपने-आप में ही उपहार होते हैं- वह भी भारत की गरीब मुद्रा- रुपी में नहीं, बल्कि अमेरिका की अमीर मुद्रा यानी डॉलर में। कई-कई नौकरियाँ तो लोग दौरों के दौर देखकर ही करते हैं। चाहे तनख्वाह कम हो, पर दौरों की गुंजाइश खूब हो। ऐसी ही एक नौकरी अपन के राम को भी मिली थी- देश के सबसे बड़े बैंक में महाप्रबन्धक की नौकरी। वेतन और परिलब्धियाँ मिलाकर वर्तमान से करीब चालीस हजार रुपये कम थीं, किन्तु दौरों की संभावना बहुत अधिक। दौरे पर जाइए तो वाजिब दैनिक भत्ता तो मिलता ही है, खर्च अलबत्ता होता नहीं, क्योंकि जिस कार्यालय का दौरा कर रहे हैं, वही खाने (और पीने वालों के पीने) की माकूल व्यवस्था अपने खर्च पर कर देता है। यह व्यवस्था करने में दौराधीन कार्यालय के लोगों को भी लाभ होता है। वे खुद भी दौरा-कर्ता के साथ खाते (और पीते) हैं, खर्चा संस्था का। तो दैनिक भत्ता पूरा का पूरा बच जाता है। ऊपर से उपहार, जिसकी कहीं कोई गणना ही नहीं। लिहाजा हमसे अनौपचारिक रूप से कहा गया कि आप आइए तो सही, सारी कोर-कसर और कमी की पूर्ति हो जाएगी। हमने कहा- ना बाबा ना, दौरे और उपहार का क्या ठिकाना! आज है कल नहीं। तनख्वाह तो पक्की है, मिलनी ही मिलनी है। दूसरा यह कि दौरे के लिए अपनी जान हलकान करो, बीवी-बच्चों को उनीन्दा छोड़कर भोर चार बजे भागो, वरना सात बजे की फ्लाइट छूट जाएगी। शनिवार को देर रात लौटो और सोमवार को पौ फटने से पहले ही फिर अटैची उठाकर चल दो। बच्चे बड़े हों और पढ़ाई या नौकरी-चाकरी अथवा किसी अन्य कारण से घर से दूर दूसरे शहर में रहते हों तो बीवी को तनहा छोड़कर महीने के पच्चीस दिन इधर-उधर भटको। किसलिए? दैनिक भत्ते के हजार रुपयों और गाहे-ब-गाहे मिलनेवाले उपहारों के लिए।

यदि किसी भले आदमी को यह लगता है कि दौरों के बिना संस्थाओं के काम नहीं हो पाएँगे तो इसे आंशिक सत्य मानकर भूल जाए। दौरे का उद्देश्य किसी काम को आगे बढ़ाना हो सकता है, लेकिन वह प्राथमिक उद्देश्य नहीं होता। दौरे का प्राथमिक उद्देश्य स्वयं दौरा ही होता है- विषस्य विषमौषधम् की तर्ज़ पर कहना चाहिए- दौरा दौरस्य कारणम्। दौरे के पहले जो स्थितियाँ थीं, दौरे के बाद भी वही रहेंगी। यह अवश्य है कि दौरे के बहाने लोग घूम-फिर लेंगे, सैर-सपाटा कर लेंगे, दर्शनीय स्थानों पर हो आएँगे, खा-पी लेंगे और दौरा-बिल बना लेंगे, उपहार ले-दे लेंगे। आँकड़े भर-भरा लेंगे, चिट्ठियाँ लिख-लिखा लेंगे। खाना-पूर्ति हो जाएगी। व्यवस्था की जड़ता यथावत बनी रहेगी।

तो दौरे का जिक्र होते ही उपहार की बात होती है। दौरे और उपहार का चोली-दामन का साथ है। पता नहीं आजकल के लोग दामन का मतलब समझेंगे या नहीं, पर मुहावरा है तो कभी-कभी इस्तेमाल कर लेते हैं। उपहार के मामले में एक पुरानी कहावत याद आती है- जैसा देवता वैसी पूजा। जिस देवता को जो पसन्द है, उसे वही पुजापा चढ़ाया जाता है। हनुमानजी को केले, बूँदी, बेसन के लड्डू और पेड़े, शिवजी को बेर, बिल्व, बिल्व-पत्र, धतूरा, भाँग और जलाभिषेक अथवा पानी मिला दुग्धाभिषेक, भैरों बाबा को दारू, काली मइया को बकरा, लक्ष्मी माता को रक्त-कमल। अपने यहाँ अतिथि को भी देवता माना जाता है- अतिथि देवो भव। इसलिए देवता की इच्छा-आस्था और मनोकामना के अनुसार उसे उपहार दिया जाता है।

अपने साथ तो कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि अपना ही कोई पुराना साथी दौरा करने चला आया। तो अपुन ने बेतकल्लुफ़ होकर उससे पूछ ही लिया कि तेरी रज़ा क्या है? और उसने अपनी रज़ा बता दी। हमने जुगाड़ कर दिया। दौरा अत्यन्त सफल रहा। बाबा तुलसीदास ने दौरा करनेवालों के लिए ही शायद यह चौपाई लिखी- नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवक समेत सुत नारी।। दौरा करनेवाले के सामने बस इसी मुद्रा में पेश आएँ, उसकी यथा-योग्य पूजा कर दें। अपनी सकल संपदा में से उसका हिस्सा उसे दे दें। वह सफल मनोरथ हो और आप गंगा नहाएँ।

दिक्कत तब होती है, जब गंगा स्नान का यह पर्व हर दूसरे-तीसरे सप्ताह आ धमकता है। ऐसे में सोचना पड़ता है कि सामने वाले को क्या वस्तु उपहार में दें। दौरा करनेवाले भाई लोगों ने उसका भी तोड़ निकाल लिया है- वे नकदी, सोना, किसी देश-व्यापी मॉल के गिफ्ट कूपन, सब कुछ उपहार स्वरूप स्वीकार करने लगे हैं, बल्कि मुँह खोलकर माँगने में भी गुरेज नहीं करते। आप उन्हें अपना बजट बताइए, वे आपकी उलझन दूर करने के लिए सदैव तत्पर मिलेंगे- अहर्निशं सेवामहे। आखिर कोई कितने सूटकेस, कितने गुलदान, कितने गिलास और कटोरे (चाँदी के), कितने कैसरोल अपने घर में रखेगा? सोचने वाले सोच सकते हैं कि उपहार में मिली ये वस्तुएं वे दौरा-कर्ता देवता लोग अपने किसी परिचित या रिश्तेदार या पड़ोसी अधम मानव को भी तो दे सकते हैं। हम कहेंगे- भूल जाइए। जिसे लेने की आदत पड़ जाती है, वह देना नहीं जानता। आप उनके घर जाइए और वे आपको एक गिलास पानी या एक कप चाय पूछ लें, तो इसे उनका बहुत बड़ा वरदान समझिए और अपना अहोभाग्य समझिए। लेने वाले केवल लेना जानते हैं। देना तो उनके संस्कार और शब्द-कोश से ही गायब हो जाता है। यह मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ और पूरा विश्वास है कि सभी पाठकों का अनुभव यही होगा। इसे विश्वनाथ के रस-सिद्धान्त में वर्णित साधारणीकरण समझिए।

लेकिन जिन कार्यालयों का दौरा होता है, उनमें उपहार देने का निर्णय करनेवाले लोग भी कभी-कभी बड़े घाघ और पहुँचे हुए पीर होते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि दौरा-कर्ता नगर के किसी छोटे-से फ्लैट में रहता है, उसके पास सामान रखने की जगह नहीं होगी। सोना-चाँदी, नकदी या गिफ्ट कूपन दे दें तो दौरा-कर्ता के लिए सबसे ज्यादा आसानी हो जाएगी। लेकिन उपहार के निर्णयकर्ता अव्वल दर्ज़े के परपीड़नवादी होते हैं। आप हमें दुश्वारियाँ दें तो हम भी आपको सुखी क्यों रहने दें? वे भी जान-बूझकर कोई सामान ही उपहार के तौर पर देते हैं। ले बच्चे, यह फालतू का सामान ले जा और खुश हो। तेरा दौरा सफल रहा! तेरी यात्रा भी मंगलमय हो!

हमारे उर्वर दिमाग में यह प्रश्न कई बार आया है कि ऐसे सामान का दौरा-कर्ता लोग करते क्या होंगे? अगर हम उनकी जगह होते तो अपने घर से उपहारों का एक बुटीक चलाते और उपहार खरीदनेवाले लोगों को अपने फालतू उपहार बेचकर कुछ पैसे बना लेते। सब लोग तो ऐसा कर नहीं पाएँगे, इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि ऐसे कुछ दौरा-कर्ता मिलकर अपना एक कोऑपरेटिव स्टोर खोल लें और उसमें अपने-अपने फालतू उपहार लाकर बिक्री के लिए रखते जाएँ। इससे कुछ बेरोजगारों को नौकरी भी मिलेगी- बतौर सेल्समैन या सेल्सगर्ल और देश की अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा। एक तीसरा और सबसे कारगर उपाय यह हो सकता है कि उपहारों को वापस किसी गिफ्ट शॉप पर ही बेच दिया जाए- औने-पौने जो भी दाम मिलें, उसी पर। दौरे का उद्देश्य तो तभी पूरा होगा।

*****

चरित्रहीन

कितने ही लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होकर भी ‘चरित्रवान’ का तमगा लगाकर, सर उठाकर जी रहे हैं। जब भी वे पुलिस फाइल्स या क्राइम पेट्रोल सीरियल देखते होंगे, उनकी आत्मा अंदर तक झकझोर जाती होगी। जीवित रहते हुए उन्हें इस लोक में और मरने के बाद परलोक में उन्हें चैन नहीं मिलता होगा।

मेरे एक मित्र हैं, वे किस श्रेणी के हैं, ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन उनके ऊपर चरित्रवान का तमगा लगा हुआ है। जब भी कभी स्त्री-पुरुषों के सम्बन्धों की बात आती है, वे बहुत नैतिक बन जाते हैं। ज्यादातर मामलों में पुरुषों की गलती उन्हें नजर नहीं आती। वे कहते हैं, ‘आग दोनों ओर से लगती है। बिना महिला की सहमति के पुरुष आगे बढ़ ही नहीं सकता।’ जितने भी महिलाओं की ओर से पुरुषों द्वारा बहला-फुसलाकर महीनों से, सालों से दुष्कर्म करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, बिल्कुल गलत है। ये सब आपसी सहमति से ही हो रहा होता है। लेकिन महिला द्वारा पुरुष को ब्लैकमेल करने की गरज से ये मामले प्रकाश में आते हैं।

मैंने उनसे पूछा, ‘आप यह सब इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहे हो? आपके पास इसका कोई पुख्ता सबूत है?’

वे मेरी बात पर मुस्करा गए, जिसका मतलब था, वे इस बारे में कोई सबूत तो नहीं देना चाहते। लेकिन वे जो कुछ कह रहे हैं, बिल्कुल सौ फीसदी सत्य है। वे स्वयं इसके भुगत भोगी हैं। मैं उनकी बात समझ जाता हूँ। उन्हें मुस्काराते देखकर, मेरे मन में भी चरित्रहीन होने की इच्छा पैदा होती है। मैं भी किसी स्त्री के साथ अपना नाम जुड़वाने की इच्छा रखता हूँ। अपने आसपास जितनी भी महिलाएं व युवतियां हैं, उनके बारे में अंदर तक झांककर देखता हूँ। कहीं कोई क्लू मिल जाए, जिसका सहारा लेकर अपुन भी बेतरणी पार कर लें।

कई बार मौका भी मिला, लेकिन चरित्रहीन होने के तरीके नहीं जानने के कारण महिलाओं के पति और युवतियों के पिता के पास जाकर कहना पड़ा कि, ‘फलां आदमी ठीक नहीं है, उससे मेलजोल बढ़ाना ठीक नहीं। वह चरित्रहीन है।’

इसका परिणाम यह हुआ कि मोहल्ले की महिलाएं और युवतियां, जो कभी-कभार मेरी ओर देख लिया करती थी, उन्होंने मेरी ओर नजर उठाना तक बंद कर दिया। मैं स्वयं चरित्रहीन होने का चांस लेना चाहता था लेकिन अपने पैरों स्वयं ने कुल्हाड़ी मार ली। थोड़ा सा भी चरित्रहीन नहीं हो पाया।

जिन व्यक्तियों को मैंने महिलाओं और युवतियों के घर वालों के सामने चरित्रहीन बताया था उन्हें भी मेरी इस हरकत का पता चल गया। वे मुझे चरित्रवान होते हुए भी चरित्रहीन घोषित करने की फिराक में थे।

एक दिन वे चौराहे पर खड़े होकर मेरे बारे में कह रहे थे कि मेरे उस स्त्री से अनैतिक संबंध हैं। मैं, उससे छिप-छिपकर मिलता है। बात एक मुंह से दूसरे, दूसरे से तीसरे होते हुए पूरे मोहल्ले में फैल गई।

मेरे चरित्रवान मित्र ने मुझसे कहा, ‘तुम्हारे फलां स्त्री से अनैतिक सम्बन्ध हैं। सारे मोहल्ले में बात फैल गई है। सुनकर मेरा चेहरा खिल गया। किसी पराई स्त्री से तो नाम जुड़ा।’ मैंने कहा- मजा आ गया, लेकिन खराब बात यह है कि उस स्थिति से अपना कोई सम्बन्ध नहीं है। उससे थोड़ा बहुत सम्बन्ध बनाने की बात तो करो।

चरित्रवान मित्र निराश हो गया। बोला, दिमाग खराब है? वह स्त्री तुमसे सम्बन्ध होने की बात स्वीकार कर रही है। उसकी बात सुनकर मुझे धक्का लगा, ‘लेकिन उसने मुझसे सम्बन्ध बनाए तो है ही नहीं। मैं उसके लिए कब से आतुर हूँ।’ चरित्रवान मित्र मेरी बातों को मेरा दिमाग खराब होना कहकर वहां से खिसक लिया। मैं अब थोड़ा-थोड़ा चरित्रहीन हो गया था। पूरा चरित्रहीन बनने के लिए उस महिला के पास जाना आवश्यक था। उसका पता जानने के लिए मैं उस व्यक्ति के पास चल दिया, जिसने मुझे चरित्रहीन घोषित किया था।

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आत्म-चिंतन का दौर ....

देश में आत्म –चिंतन करने वाले एक ख़ास वर्ग का सीजन शुरू हो गया है।

वे लोग चुनाव नजदीक आते ही सक्रिय हो जाते हैं।

तरह-तरह की चिंताएं उन्हें घेरने लगती हैं।

देश उनको डूबता हुआ सा लगता है। वे अपने –अपने तरीके से वैतरणी इजाद’ करने में लग जाते हैं| कैसे देश को संकट से उबारा जाए ? इसकी नैय्या कैसे पार लगाई जाए?

चिंतन का एक दौर चालू हो जाता है।

तरह –तरह के व्यक्तव्य ,भाषण ,भाषण की शैली, भाषण के शब्द ढूंढे जाने लगते हैं।.बड़ी पार्टी वाले, करोड़ों का बजट लुटाने के पक्षधर बन जाते हैं। विज्ञापन के नमूनों पर घन्टों बहस छिड़ जाती है।

हमारे देश में वैज्ञानिक पैदा न होने के कई कारणों में से एक यह चुनाव भी है। ’सोच’ की सारी ‘युवा-उर्जा शक्ति’ हर पांच साल में, एक बार इधर मुड़ी नहीं कि, तमाम ऊर्जा समाप्त।

’न्यूटन ,आइन्स्टाइन’ वाले देश में फकत, ‘साइंस’ हुआ करता था|

इलेक्शन के एक भी पोस्टर उन लोगों ने ,उनके बाप-दादों ने कभी देखा ही नहीं ।

सेब के टपकने को उनने, कभी पडौसी मुल्क की करामात की संज्ञा नहीं दी। लाईट के, वेग –स्पीड को मापने के काम में,कतिपय , सरकारी रोड़े नहीं डाले गये ।अमेरिका को खोजते वक्त, कोलंबस ,भारत आते समय वास्कोडिगामा के खिलाप ,किसी ने सियासी नारे नहीं लगाये। उनकी नाव को अपने इलाके में छेकने का किसी ने मुआवजा नहीं माँगा। किसी ने खामियाजा भुगतने की उन्हें धमकी नहीं दी।

स्वत: कोलंबस जी ने अमेरिका खोजने का दावा करके,अपने नये खोजे मुल्क में , एक भी वोट खीचने का प्रयास नहीं किया। वे खोजे। खोजकर नक्शे में फिट भर कर दिए। वे किसी इलेक्शन में पी एम,राष्ट्रपति के लिए अपनी उम्मीदवारी नहीं जताई। अपने बच्चों को सरकारी मुहकमे में नौकरी की मांग नहीं की। किसी सरकारी ठेके की तरफ मुंह उठा के नहीं देखा।

हमारे तरफ सब उलटा होता है|

नेता चार कदम पैदल क्या चल लेते हैं ,वे देश की तरफ यूँ देखते हैं कि देखा ,है किसी में दम ?

अनेक नेता तो जैसे ,‘हाईबरनेशन पीरियड’ से आँख मलते हुए बाहर निकलते हैं। एक क्विक निगाह चारों तरफ डालते हैं। जरूरी ‘मदों’ के बारे में अपनी जानकारी फटाफट अपडेट करते हैं ,मसलन प्याज के भाव क्या हैं ?अभी ये मुद्दा बनने लायक है या नहीं?जमीन माफिया का रुख किधर हैं? किसको सपोर्ट कर रहे हैं ?जंगल के ठेके कब बदले ?शराब वाले कहीं ज्यादा ‘धुत्त’ तो नहीं ?चंदा देने वालों के हालचाल कैसे हैं? वे कमा के मोटे हुए या नहीं ?भ्रष्टाचार का पौधा सुख तो नहीं गया ?महगाई पर कोई नया गाना, फ़िल्म वालों ने बनाया क्या ?तमाम आकलन करने वालो का रिसर्च विंग काम करने लग जाता है।

कुछ कुम्भकरणीय नीद से, जागने के लिए एक –दो ड्रम चाय ,काफी, रम-बीयर की डकार लेते हैं|

जब उनके ‘जमूरे; जम्हूरियत की कैफियत से आगाह कर उन्हें फिट करार दे देते हैं तब उनका आत्म-चिंतन का दूसरा दौर चालू होता हैं।

अरे वो....., कन्छेदी,गनपत,समारू सोनी साले कहाँ मर गये सब ?

कुछ ’जी’ वाले संबोधन के लोग भी, याद कर लिए जाते हैं ,गुप्ताजी ,मिसर जी ,दुबे जी।

बुला लाओ सबों को भइ ,,,,,,! इलेक्शन नहीं लड़ना क्या हमें......?दिन ही कितने बचे हैं ?

चमचे ‘रायता’ माफिक इधर –उधर फैल जाते हैं। आदमी –कार्यकर्ताओं की फौज, पिछले इलेक्शन से कुछ ज्यादा जुड़ते दीखती हैं।

घर के सामने तम्बू ,तम्बू के आगे चाय की गुमटी जैसा तामझाम बताता है कि नेता जी चुनाव में जी –जान से जुट गए हैं ।

नेता जी,अपने समर्थक लोगो से पूछ-पूछ के, कदम उठाने का बीड़ा उठाये दिखते हैं।

आप लोगो की राय क्या है ?किस पार्टी का जोर दिखता है ?

वे अचानक इसं अन्दाज से बाते करते है कि ट्रेन में सफर कर रहे हों|आगे कौन सा स्टेशन आयेगा जैसी उत्सुकता नजर आती है, भले ही उस स्टेशन से कोई सरोकार न हो ! आजू-बाजू वालों से कन्फर्म करते रहते हैं ,फला निकल गया क्या ?

वे पिछला इलेक्शन कम मार्जिन से जीते थे| उन्हें फक्र था कि दस-बीस व्होट पर उनकी शख्शियत काम कर गई ,वरना लोग तो लुटिया डुबो ही दिए थे ? अब की बार कहीं चूक न होवे। नहीं तो परचून की दूकान में बैठने की नौबत आ जायेगी।

इस बार उनने आत्म –चिंतन के लिए ‘गुरु हायर’ कर लिया है। वे एजेंडा दे देते हैं गुरु चिंतन कुटी में बैठ कर उनका वक्तव्य तैयार कर लाते हैं। रात को बारह बजे तक टी वी के हर चेनल को रिकार्ड करते हैं फिर धुर विरोधियों के बयान के तोड़ में क्या कहा जाए ,डिसाइड करते हैं। वे चाय पिलाते ,तो हम दुध पिलायें ,वे गरीबी में पले तो हम फुटपाथिए। उनकी माँ बरतन मांजती तो हमारी कपडे धोने वाली। चिंतन की धारा अपने प्रवाह में निरंतर बहते रहनी चाहिए।

उनके ‘थिंक टेंक’ के पास, अमर्त्य सेन वाली अर्थशास्त्रीय पकड़ होती है।

उनके कथन ,कहानी किस्से ,सलीम-जावेद की फिल्मी कहानी सा चटकारा लिए होती हैं।

गरीबो को सुनहरे ख़्वाब परोसना ,पिछड़ों को आगे की लाइन में ले जाने का भुलावा देना ,अमीरों को टेक्स माफी ,थोडा-थोडा सब कुछ,सबो के लिए होता है।

चिंतन का चुनाव से लेना-देना, अभी-अभी हाल के जमाने का फैशन है। पहले कहाँ का चिंतन –विन्तंन होता था ?लठैत गये ,बूथ लुटे, नेता जीते,एक आदमी अपने –आप में बहुमत। सब कुछ शोर्टकट ,वन मेन शो।

कट्टे के आगे कुत्ते कहाँ ठहरते ? कथा ख़त्म।

मुगेरी लाल वाले चिन्तन में झांसा ही झांसा है। जनता को बेवकूफ बनाने का पूरा इन्तिजाम रहता है। जनता को रूठे हुए बच्चो की तरह हर मिनट नया वादा कर दो ,जो जनता बोलती रहे मानने की ग्यारंटी दो। नल,बिजली,सड़क-पानी ,मुफ्त। खाना –पीना मुफ्त, शिक्षा मुफ्त। बेरोजगारों को रोजगार मुहैय्या करने की जवाबदेही। जनता बेचारी फिर दूसरा घर क्यों ढूढे ? मुगेरियों को जीता डालती है। शासन सम्हालते पता लगता है कि रस्ते आसान नहीं। सांप सूंघ जाता है| कीचड़ उछालते-उछालते अपनी ही कमीज मिली हो जाती है। तब सिवाय मैदान छोड़ के भागने के और कोई रास्ता बचता नहीं !

इन दिनों गनीमत है,मान-मनौव्वल ,सर-फुटौव्वल तरीके से ही सही ,”लोकतंत्र” ,लंगड़ाते हुए सही ,धीरे-धीरे सही ,आहिस्ता-आहिस्ता सही,पांच सालाना सफर तय तो कर रहा है।

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छत्तीसगढ़)

२७.२.14./शिवरात्री mob:09426764552

रंगीन टी.वी.

बात उन दिनों की है जब हमारे मुल्क में टी.वी. का प्रसारण कुछ ही  वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। रंगीन प्रसारण शुरू हुए तो कुछ माह ही हुए थे। तब घर में ब्लैक एंड वाइट टी.वी. होना ही बहुत शान की बात थी। रंगीन टी.वी. तो बिरले घरों में ही था। उन्हीं दिनों में आया था मेरा रंगीन टी.वी.।

मेरे पिता एक सर्राफ की दुकान में एकॉउंटेंट थे। उनकी तनख्वा छोटी थी किन्तु मुझे लेकर उनके सपने बहुत बड़े थे। अतः मेरा दाखिला शहर के महंगे अंग्रेजी स्कूल में कराया था। उस स्कूल में अधिकतर धनाड्य परिवारों के लड़के ही पढ़ते थे। मेरे ग्रेड्स हमेशा ही सबसे अच्छे रहते थे। इसलिए शिक्षकों और सहपाठियों के बीच मैं बहुत लोकप्रिय था। किंतु जब वो अपने घर में खरीदे गए किसी महंगे सामान का ज़िक्र करते तो मैं उनसे कतराता था। क्योंकि मेरे पास उन्हें बताने के लिए कुछ नहीं होता था। उनमें से एक था बृजेश। उसके पिता एक बड़े कारोबारी थे। अक्सर विदेश आते जाते रहते थे। हर बार वहाँ से उसके लिए कोई न कोई महंगा खिलौना ज़रूर लाते थे।  बृजेश बहुत शान से उनके बारे में बताता था।

ऐसे ही एक दिन रिसेस में ब्रजेश ने सब को सुनाते हुए कहा " परसों मेरे पापा कलर टी.वी. लेकर आये हैं। " सबने उसकी बात सुनकर ताली बजाई। " तुम सब इस संडे मेरे घर आना हम सब मिलकर फ़िल्म देखेंगे कलर टी.वी. पर। "

बृजेश का व्यवहार मेरे प्रति कोई ख़ास दोस्ताना नहीं था। किंतु क्योंकि सब जा रहे थे और कुछ मेरा मन भी रंगीन टी.वी. देखने को ललचा रहा था।  अतः मैं भी चला गया। बृजेश का बंगला बहुत बड़ा था। हमें एक बड़े से कमरे में ले जाया गया। जहां लकड़ी के बने शोकेस में रंगीन टी.वी. रखा था। कुछ ही समय में फ़िल्म शुरू हुई। रंगीन फ़िल्म देखने में बड़ा मज़ा आ रहा था। जब समाचार के लिए कुछ समय के लिए फ़िल्म को रोका गया तब सभी के लिए नाश्ता आया। गगन जो बृजेश का पक्का चमचा था बोला " कुछ भी हो कलर टी.वी. देखने का मज़ा ही और है। मैं तो डैडी से जाकर ज़िद करूंगा कि वो भी कलर टी.वी. खरीदें। " कई लोगों ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई। मैं ही चुपचाप शरबत पी रहा था। गगन ने जानबूझ कर मुझे चिढ़ाने के लिए पूछा " क्यों तुम नहीं खरीदोगे कलर टी.वी.। " बृजेश जैसे मौका देख रहा था। फ़ौरन बोला      " अरे इसके घर तो ब्लैक एंड वाइट टी.वी. भी नहीं है। ये क्या खरीदेगा। " यह कह कर वह ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा। और कई स्वर भी उसके साथ जुड़ गए। गगन का स्वर सबसे ऊंचा था। यूँ लगा जैसे टी.वी. न होने से मेरा कोई वजूद ही नहीं है। उनकी हंसी नश्तर कि तरह कलेजा चीर गयी। मैं बिना कुछ बोले वहाँ से चला आया।

घर आकर चुपचाप लेट गया। अम्मा ने पूछा तो उन्हें थका हूँ कहकर टाल दिया। खाने के वक़्त भी उन्हें भूख नहीं कहकर टालना चाहा किंतु इस बार पिताजी ने आकर प्यार से पूछा " क्या बात है, बताते क्यूँ नहीं। किसी ने कुछ कहा है। " मैं रोने लगा और सारी बात उन्हें बता दी। मेरी बात सुन कर वह भी उदास हो गए।

एक दिन जब मैं स्कूल से लौटा तो घर में चहल पहल थी। आस पड़ोस के लोग हमारे यहाँ जमा थे। मेरे पहुंचते ही पिताजी मुझे बैठक में ले गए। जहां मेज़ पर कपडे से ढका रंगीन टी.वी. रखा था। उसे देखते ही मैं ख़ुशी से उछल पड़ा और पिताजी के सीने से लग गया। अगले दिन स्कूल में मैंने बड़े शान से सबको रंगीन टी.वी. देखने के लिए अपने घर बुलाया। खासकर गगन और बृजेश को। 

उस वक़्त मैंने ये जानने का प्रयास नहीं किया कि इतना महंगा टी.वी. पिताजी कहाँ से लाये। कई सालों बाद जब मैं बाहरवीं कक्षा में था तो अम्मा ने सारी बात बताई। उस रात पिताजी को नींद नहीं आई। वो सारी रात परेशानी में इधर उधर टहलते रहे। अम्मा ने समझाया " क्यूँ परेशान होते हैं, बच्चा है समझा दीजिये समझ जाएगा। " पिताजी ने गंभीर होकर कहा " जानता हूँ समझदार है, समझ जाएगा। पर उसके दिल में चुभी फाँस नहीं निकलेगी। "

कई दिन ऐसे ही परेशान रहे फिर एक दिन एक निर्णय किया। अपना संदूक खोलकर सोने की कंठ माला निकाली। ये कंठ माला मेरे परदादा को उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर उन ज़मींदार साहब ने दी थी जिनके यहाँ वो काम करते थे।  मुझे याद है एक बार बचपन में उसे दिखाते हुए वे गर्व से बोले " ये कंठ माला उनकी स्वामिभक्ति और ईमानदारी का प्रतीक है। मेरे लिए एक धरोहर है।  " कठिन से कठिन समय में भी उन्होंने उसे नहीं बेचा था। 

उसी कंठ माला को बेचकर वो मेरे लिए रंगीन टी.वी. लाये।

उस दिन से वह  रंगीन टी.वी. मेरे लिए भी मेरे पिता के प्यार का प्रतीक बन गया। आज भी मेरे बंगले में कीमती सामानों के बीच रखी है वह बेशकीमती धरोहर।

लघुकथा

   एक बूढ़ा   औऱ  गिलहरी 

यशवन्त कोठारी

तेज बर्फ गिर रही है। चारों तरफ  बर्फ का समंदर है। पेड़ो पर पत्तियों  पर सब तरफ बर्फ ही बर्फ। कभी रेत  का समंदर देखा था,फिर पानी का समंदर  और अब बर्फ का समंदर। 

इस तेज बर्फानी  मौसम में सामने वाले फ्लेट में  एक बूढ़ा  नितांत अकेला ,रोज उसे देखता हूं ,केवल सिगार पीने  के लिए बाहर  आता है, उसे बाहर  देख कर दो गिलहरियां  इस मौसम में भी पास  आकर उसे टुकुर टुकुर तकती  हैं।  बूढ़ा  उन्हें मूंगफली के दाने  डालता है, गिलहरी दाने  लेकर भाग जाती हे बर्फ अभी भी गिर रही है। 

बूढे  के एकांत अकेलेपन  उदासी  का सहारा बन गयी  है गिलहरी। एक चिड़िया भी आ गयी  है. 

गिलहरी की आँखों  में चमक है,  बूढ़े  की आँखों में उदासी।

आज गिलहरी को डालने के लिए कुछ  नहीं है। बूढ़ा ,गिलहरी  चिड़िया तीनो उदास हैं। बर्फ़   अभी भी गिर रही है।  

यशवन्त  कोठारी  ८६  लक्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार  जयपुर-२

अध्यापक कभी अवकाश - प्राप्त नहीं होता , उसकी निवृति उसके व्याप्ति - सूत्र को अनन्त बनती है.

..........प्रोफेसर सेवक वात्स्यायन

लघुकथा

कुहासा

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सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

" मम्मी ! एक बात तो पक्की है " बेटी की आँखों में चमक थी .

" क्या ? "

" मेरे पापा मेरी सभी सहेलियों के पापा से अच्छे हैं ."

" वह कैसे ? " माँ के चेहरे पर मुस्कान थी .

" पापा हमारी जरूरत की कोई भी बात हमारे कहने से पहले ही समझ जाते हैं और पूरी भी कर देते हैं .उनकी इच्छा है कि मैं खूब पढूं और बड़ी होकर खूब अच्छे काम करूं .........कई बार तो पापा स्व्यम तकलीफ में होते हैं और हमें बताते भी नहीं और हमारी परेशानी को हल करने में लग जाते हैं .रियली पापा इस ग्रेट .आई एम् प्राउड आफ हिम ." बेटी ने चहकते हुए कहा .

" इतनी बड़ी - बड़ी बातें करने के लिए अभी तुम बहुत छोटी हो , समझीं . जाओ अपना होम - वर्क पूरा कर लो ." माँ ने बेटी को दुलारते हुए कहा .

" ठीक है ! पर पहले मेरी पूरी बात सुनो ."

" बोलो मेरी अम्मा ."

" वो जो साक्छी के पापा हैं न , वे हर दिन ड्रिंक करते हैं , केसिनो जाते हैं , घर में गुस्सा करते हैं और कोई उन्हें टोकता है तो घर में ही मार - पीट पर उतर आते हैं . साक्छी के केरियर की तो कभी बात ही नहीं करते ."

" हाँ बिटिया तुम ठीक कहती हो ! तुम्हारे पापा सिर्फ अच्छे पापा ही नहीं सबसे अच्छे पति भी हैं .मेरी और ही देखो . जब मैं उनकी पत्नी बनीं , मैं एक सामान्य और मामूली लड़की थी . तुम्हारे पापा ने मेरे अंदर बैठी प्रतिभा को पहचाना , मुझे उत्साहित किया , मेरे सोये आत्मविश्वास को जागृत किया , हर कठिनाई या असफलता पर भी मुझे निराश नहीं होने दिया , जरूरत पड़ने पर गाइड भी किया . उसका परिणाम सबके सामने है , आज मैं सफल स्कूल - टीचर हूँ .नहीं तो मेरी सारी जिंदगी सिर्फ चूल्हा - चौका बन कर ही रह जाती ."

" तुम दोनों ही महा - बुद्धू हो ." पास खड़े बेटे ने व्यंग से दोनों को टोका .

" क्या कह रहा है ,जतिन . तेरे पापा तेरे लिए क्या कमीं छोड़ते हैं ?"

" वो जो कुछ भी करते हैं , अपने स्वार्थ के कारण करते हैं ,अपनी चोरी पर पर्दा डालने के लिए करते हैं ."

" ऐसी बातें करते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए ."

" मम्मी ! शर्म मुझे नहीं , पापा को आनी चाहिए . आप अपना ब्लड - प्रेशर ऊँचा मत कीजिये . पहले मेरी पूरी बात सुन लीजिये ."

" बोल क्या कहना चाहता है ."

" आपको पता भी है , आजकल पापा जब देखो तब सरला आंटी के घर बैठे दिखाई देते हैं ."

" तुझे कैसे पता ?"

" मेरा दोस्त राहुल उसी गली में रहता है , जिसमें सरला आंटी का घर है . कल पापा ने आपको बताया था कि पापा अपने आफिस - फ्रेंड के साथ किसी को देखने असप्ताल गये थे , जबकि राहुल ने मुझे आज बताया कि पापा बहुत देर तक सरला आंटी के घर पर थे .पापा ने आपसे झूठ बोला न . क्यूँ बोला ये तो वे ही जाने ."

" भइया ! ऐसी उल्टी - सीधी बातें तुझे राहुल ही पड्राता है . पापा के लिए ऐसी बात कहते हुए तुझे भी शर्म आनी चाहिए .सरला आंटी एक समझदार महिला होने के साथ - साथ साहित्यकार भी हैं ."

" हाँ , बड़ी भारी साहित्यकार हैं , महादेवी वर्मा हैं .. दुनियादारी जानती नहीं और तरफदारी करने लगी पापा की ."

" तुम दोनों बहस मत करो …….हो सकता तुम ठीक कह रहे हो .पर किसी दोस्त - वोस्त कि बातों में आकर तुम्हें अपने पिता को कटघरे में नहीं खड़ा कर देना चाहिए , अगर तुम्हारे पापा ने झूठ बोला भी है तो वे अधिक दिन तक उसे मुझसे छिपा नहीं पाएंगे . उन्हें मुझसे अधिक कोई नहीं जानता . उनके प्रति मेरा विश्वास इसलिए अडिग नहीं है कि वे मेरे पति हैं और पति कुछ भी करे , वह देवता ही होता है . मैं जानती हूँ उन्होंने अपने रक्त से सींच कर इस घर - परिवार की परवरिश की है और किसी भी हालत में वे इस पेड़ को सूखने नहीं दे सकते .इस समय तुम दोनों का फर्ज सिर्फ इतना है कि अभी जो काम तुम्हारे जिम्मे है , तुम उसी में लगे रहो बस .....समझे मेरे बच्चों ."

" मम्मा, ! यु आर ग्रेट . " दोनों बच्चे एक साथ बोले .

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
डी - 184,श्याम पार्क एक्सटेंशन , साहिबाबाद ( गाजिआबाद ) ऊ .प्र .Pin 201005,
Mo.No.09911127277 ,

योजना बहिन जी

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वीरेन्‍द्र सरल

वह क्षेत्र बड़ा खुशहाल था। लोग बड़े समृद्ध थे। लेकिन अचानक उस क्षेत्र को प्रकृति की नजर लग गई। वहाँ भीषण अकाल पड़ गया। लोग दाने-दाने के लिये मोहताज हो गये। माटी का मोह ऐसा था, जो उन्‍हें रोजगार के लिये पलायन करने से रोक रहा था। अकाल का समाचार अखबारों में प्रकाशित हुआ था। जिसे पढ़कर उस क्षेत्र का एक हारा हुआ नेता पहुँचा। उसके आने की खबर से वहाँ के लोग राहत की उम्‍मीद लिये भारी संख्‍या में उपस्‍थित हो गये। मगर हारा हुआ नेता तो मानो उनसे बदला लेने के लिये पहुँचा था। उसने कहा-‘‘देख लिया न हमें हराने का परिणाम। जब हमारी सरकार थी तो समय पर बारिश होती थी। पेड़ों पर रसीले ,मीठे और बड़े-बड़े फल लगते थे। खेतों में अनाज की सोने सी बालियाँ लहलहाती थी। अब भुगतो परिणाम, ये हमारी सरकार बदलने के कारण हो रहा है। हमारा मुर्गा खाये, हमारा दारू पिये और हमें ही हरा दिये। यदि हमें वोट देते, हमारी सरकार बनाते तो ये दिन देखने नहीं पड़ते। अब सब कान खोलकर सुन लो , जब तक हमें नहीं जिताओगे, तब तक यहाँ पानी बरसने वाला नहीं है। हमारी मर्जी के बिना तो पेड़ का एक पत्‍ता भी नहीं हिलता, पानी कहाँ से बरसेगा? हमें जिताओ , तभी पानी बरसेगा ,समझे?‘‘ इतना कहकर वह चलता बना। लोग ठगे से उसे देखते रहे।

कुछ दिनों के बाद वहाँ एक महात्‍मा जी पहुँच गये। ये वही महात्‍मा जी थे जो यहाँ से बोरियों में भर-भर कर दान का अनाज ले गये थे। खुशहाली के दिनों में वे यहाँ महीनों तक अपना डेरा जमाये रहते थे। लोगों को संतोषी सदा सुखी का संदेश देते रहते थे। दान की महिमा बतलाते थे। दान के पैसे से स्‍वयं हलुआ ,पुड़ी आदि स्‍वादिष्‍ट ब्‍यंजन गपकते थे और लोगो को ‘जेहि विधि राखे राम तेहि विधि रहिये‘ का भजन सुनाते थे। लोगों को बड़ी उम्‍मीद थी कि महात्‍मा जी के आश्रम में अरबों-खरबों की संपत्‍ति है। अब वे पधार रहे हैं तो इस मुसीबत की घड़ी में मुक्‍त हस्‍त से दान देकर हमारा सहयोग करेंगें। लोगो की भारी भीड़ महात्‍मा जी के स्‍वागत के लिये उमड़ पड़ी। महात्‍मा जी ने पधारते ही प्रवचन देना शुरू कर दिया कि ‘होइहै वही जो राम रचि राखा ,को करि तर्क बढ़ावही शाखा।‘ ‘चाहे लाख करो चतुराई, करम का रेख मिटे न रे भाई, वगैरह-वगैरह। लोगों की उम्‍मीदों पर पानी फिर गया । महात्‍मा जी ने आगे कहा-‘‘जरूर तुम लोगों ने पिछले जन्‍म में कुछ पाप किया होगा। जिसका दंड तुम्‍हे इस जन्‍म में अकाल के दंश के रूप में चुकाना पड़ रहा है। भगवान को प्रसन्‍न करने के लिये व्रत, उपवास और यज्ञ हवन कराना पड़ेगा।‘‘ उसकी सलाह पर लोगों ने अपना बचा-खुचा धन यज्ञ-हवन और शांति पाठ में स्‍वाहा कर डाला पर कोई चमत्‍कार नहीं हुआ। महात्‍मा जी दान-दक्षिणा समेट कर आश्रम की ओर कूच कर गये। लोगों के हाथ केवल निराशा ही लगी।

लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर करें तो क्‍या करें? तभी वहाँ एक दिन चमचा नामक दूत प्रकट हुआ। उसने कुशल कथावाचक की तरह लोगों को समझाया, राजधानी नामक पावन महा तीर्थ में नेता नामक देवता गण निवास करते हैं। वहाँ जाकर उनकी स्‍तुति करने से वे प्रसन्‍न हो जाते हैं और वोटों का प्रसाद चढ़ाने की मनौती मांगने पर प्रसन्‍न हो जाते हैं फिर मन वांछित फल प्रदान करते हैं। ‘नेता जी की आरती जो कोई नर नारी गावे, सुख संपत्‍ति पावे।‘ तुममें से कुछ प्रमुख लोग एक दल बना कर अविंलंब राजधानी की ओर प्रस्‍थान करो और वहाँ पहुँच कर उनकी स्‍तुति करो तो तुम्‍हारा कष्‍ट जरूर दूर होगा। इतना कहकर वह अर्न्‍ताधान हो गया।

उसकी सलाह पर वहाँ के प्रमुख लोगों ने एक दल बनाकर कुछ ही दिनों मे राजधानी नामक पावन महातीर्थ पहुँच गये और उस मंदिंर को तलाशने लगे जहाँ नेता नामक देवता गण विराजते है। उस पावन तीर्थ में निवास करने वाले अन्‍य लोगों से पता पूछते हुये वे उस मंदिर तक पहुँच गये। वहाँ उन्‍होंने देखा, एक महल नुमा बहुत बडा भवन है जिसके आँगन मे एक विशालकाय वृक्ष है। उस पेड़ को घेर कर बहुत से धवल वस्‍त्रधारी नेता अपने हाथों में कुदाल लिये पेड़ के जड़ की खुदाई करने में तुले हैं। लोगों को बड़ा आश्‍चर्य हुआ। वे सोचने लगे, देखो हमारे देश के नेता कितने परिश्रमी हैं। लोग बेकार ही हमारे माननीय नेताओं को बदनाम करते हुये निकम्‍मे और निठल्ले समझते हैं। ये बेचारे यहाँ कुदाल लेकर जड खुदाई करने का श्रमसाध्‍य कार्य करके पसीना बहा रहे हैं। दल प्रमुख ने राजधानी निवासी एक बुजुर्ग से पूछा-‘‘इतना विशालकाय पेड़ हम जीवन में पहली बार देख रहे हैं। इस पेड़ के बारे में हमें बिल्‍कुल जानकारी नहीं है, कृपा करके इस पेड़ का नाम बता दीजिये साथ-ही-साथ ये नेता लोग क्‍या कर रहे हैं यह भी समझा दें तो बड़ी कृपा होगी।‘‘

बुजुर्ग ने समझाया इस पेड़ का नाम लोकतंत्र है। इसके छत्रछाया में अरबों लोग निवास करते हैं। मगर ये नेता इसकी जड़ें खोद रहे हैं। ये इसे यहाँ से उखाड़ कर अपने घर के आँगन में लगाना चाहते हैं। इसलिये इसे धाराशायी करने पर तुले हैं। इतना बताकर वह बुजुर्ग आगे बढ़ गया। लोगों को उसकी बातें समझ में नहीं आयी। दल प्रमुख जड़ खोदने वाले देवताओं को पहचानने की कोशिश करने लगा। एक देवता उसे कुछ जाना-पहचाना लगा , वह खुशी से उछल पड़ा। अरे! ये तो वही देवता है जो पिछले चुनाव में हमारे गाँव में जाकर हमारे सामने हाथ जोड़कर वोटों की भीख मांग रहे थे। चलो, उसी के पास जाकर हम मदद मांगते हैं।

सभी लोग उस नेता के पास पहुँच गये। दल प्रमुख ने उन्‍हें अपने क्षेत्र मे पड़े भंयकर अकाल के संबंध में जानकारी देते हुये मदद की मांग की। मगर उस देवता ने उन्‍हें दो टूक जवाब देते हुये कहा-‘‘मुझे सब मालूम है, अकालग्रस्‍त क्षेत्र के लिये यहाँ से एक योजना जा रही है। जिससे तुम्‍हारी सभी समस्‍याओं का समाधान हो जायेगा।‘‘ फिर उसने एक बहुत ही खूबसूरत योजना की जानकारी उन्‍हें दी और फिर से उस पेड़ की जड़ खोदने में तल्‍लीन हो गया। उसकी बेरूखी देख दल के अन्‍य लोगों की उनसे बात करने की हिम्‍मत नहीं हुई। वे अपनी नम आँखो से बेबसी में इधर-उधर देखने लगे। कुछ समय बाद उन्‍हें वहीं पर एक गोल-मटोल , खूबसूरत देवी जैसी एक महिला दिखाई पड़ी। दल के लोगों को लगा , शायद यही योजना बहिन जी हैं जो हमारे क्षेत्र में जायेगी और चुटकी बजाते ही हमारी समस्‍याओं का समाधान कर देगी। वाकई योजना बहिन जी तो बहुत ही खूबसूरत है। लोग आश्‍वस्‍त होकर अपने गाँव लौट आये और बेसब्री से योजना बहिन जी का इंतजार करने लगे।

दो-तीन महीने बीत जाने के बाद भी जब योजना बहिन जी गाँव नहीं पहुँची तो उन्‍हें चिन्‍ता होने लगी। वे सोचने लगे , योजना बहिन जी कहीं रास्‍ता तो नंही भूल गई। अब तक तो उन्‍हें यहाँ आ जाना चाहिये था पर अब तक आई क्‍यों नहीं ? रास्‍ते में कहीं उसके साथ कोई ऐसी-वैसी घटना तो नहीं घट गई? गाँव वालों के सब्र का बांध टूट रहा था। वे अलग-अलग दलों में बटकर योजना बहिन जी की तलाश करने के लिये निकल पड़े। कोई रेल्‍वे स्‍टेशन, कोई बस स्‍टेण्‍ड और कोई हवाई अड्‌डा पर सुबह से शाम तक बैठकर योजना बहिन जी का इंतजार करने लगें। सभी लोग दिन भर वहाँ योजना बहिन जी का इंतजार करते और देर रात गये थके हारे निराश कदमों से घर लौट आते। महीनों तक उनका यही क्रम चला। एक दिन एक बुद्धिजीवी ने उन्‍हें समझाया-‘‘योजना रेल , बस या हवाई जहाज पर सवार होकर नहीं आती। बंधुओ! वह तो फाइल पर सवार होकर कछुआ चाल से आती है, उसका यहाँ इंतजार करना व्यर्थ है।‘‘ इसे सुनकर एक ग्रामीण ने अपना माथा पीटते हुये कहा-‘‘धत्‌ तेरे की, अरे! हां रे, हम ही लोग कितने बुद्धू हैं। इतनी सी बात हमें अब तक समझ में नहीं आई कि सभी देवी देवताओं के अपने-अपने निजी वाहन होते हैं। जैसे दुर्गा की सवारी शेर, सरस्‍वती की सवारी हंस, लक्ष्‍मी जी की सवारी उल्‍लू वैसै ही योजना बहिन जी की सवारी फाइल, है ना ?‘‘ बात समझ में आते ही सब खुश हो गये और फाइल पर सवार होके आ जा मोरी मैया गाते हुये खुशी-खुशी अपने गाँव लौट आये।

वे लगातार पंचायत प्रमुख और विकास अधिकारी से सम्‍पर्क बना कर योजना बहिन जी की शोर-खबर लेते रहे। बहुत दिनों तक तो कुछ पता नही चला। मगर, अचानक एक दिन गाँव भर में हल्‍ला मचा कि अकालग्रस्‍त क्षेत्र के लिये एक योजना आयी है। गाँव भर के लोग योजना बहिन जी को एक नजर देखने के लिये ग्राम पंचायत की ओर दौड़ पड़े क्‍योंकि राजधानी से वापस लौटने वाले लोगों ने सबको बताया था कि योजना बहुत ही सुन्‍दर हैं। वह हमारी सभी समस्‍यांओ का हल चुटकी बजाते ही कर देगी।

ग्राम पंचायत के सामने अकाल पीडित लोगों की भारी भीड़ थी। सभी लोग योजना बहिन जी से राहत की उम्‍मीद लगाये खड़े थे। भीड़़ के बीच एक दुबली-पतली, बीमार सी महिला खड़ी थी। उसका चेहरा निश्‍तेज था। ऐसा लग रहा था मानो वह स्‍वयं ही अकाल पीडित हो। पता नहीं कितनें दिनों से उसके पेट में अन्‍न का एक दाना भी नहीं गया रहा होगा। उसकी आँखें डबडबाई हुई थी। उसके मन की पीड़ा आँसू के रूप में उसके गालों पर ढुलकने लगी थी । वह कुछ कहना चाहती थी पर भीड़़ और पीड़ा के कारण कुछ कह नहीं पा रही थी।

एक सहृदय ग्रामीण बुजुर्ग ने भीड़ से शांत रहने की अपील की। वहाँ एकत्रित भीड़ कुछ समय के लिये शांत हुई। तब योजना बहिन जी ने बोलना शुरू किया। उसने कहा-‘‘मेरे भाइयों और बहनों! मैं आप लोगों के उम्‍मीदों पर खरा नहीं उतर पाऊँगी , इसका मुझे अफसोस है। मैं आप सबको अपनी आप-बीती सुनाती हूँ। हम लोग कई बहनें हैं, हमें आपदाग्रस्‍त लोगों की सहायता करने के लिये राजधानी से खूब सजा-संवार कर भेजा जाता है मगर रास्‍ते में ही मेरी कई बहनें अपहृत होकर नेताओं की तिजोरियों में कैद हो जाती हैं। कुछ बहनें अधिकारियों के जेबों में पहुँचकर स्‍वाहा हो जाती हैं तो कुछ बहनें भ्रष्‍ट कर्मचारियों के द्वारा लूट ली जाती हैं। कुछ फाइलों में दबकर ही दम तोड़ देती हैं। मैं स्‍वयं कई लुटेरों से लुटती-पिटती यहाँ तक पहुँची हूँ। मेरी दशा आप देख ही रहें हैं। मेरे बदन पर छीना-झपटी के निशान आपको स्‍पष्‍ट दिखलाई पड़ रहे होंगे। अब आप ही बताइये इस दीन-हीन दशा में मैं आपकी क्‍या सहायता कर सकती हूँ। इतना बताकर वह आँचल में मुँह छिपाकर सुबक-सुबक कर रोने लगी। कुछ ही समय बाद वह लड़़खड़ा कर गिर पड़ी। लोगों ने उसकी नब्‍ज टटोलकर देखा, उसके हृदय की धड़कन बंद हो चुकी थी। योजना बहिन जी के प्राण पखेरू उड़ चुके थे

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वीरेन्‍द्र सरल

बोड़रा (मगरलोड़)

पोष्‍ट-भोथीडीह

व्‍हाया-मगरलोड़,जिला-धमतरी

छत्तीसगढ़,पिन कोड-493662

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सृष्टि की रचना का श्रेय ब्रह्माजी को, वहीं उसके पालनहार का श्रेय श्री विष्णुजी को और संहारक के रुप में भगवान शंकर को माना गया है. इस तरह प्रकृति का संतुलन बना रहता है. श्री विष्णु और श्री ब्रह्माजी अपने-अपने लोक में बडॆ ही वैभव के साथ रहते हैं ,जबकि शिव श्मसान में घूनी रमाये रहते है. वस्त्र के नाम पर उनके शरीर से व्याघांबर होता है. पूरे शरीर पर भस्म लपेटे रहते हैं. और गले में सर्पों की माला डली रहती है. उनके चारों ओर भूत-पिशाचों का जमावडा रहता है. वे पद्मासन लगाये पल-प्रतिपल राम के नाम का जाप करते रहते हैं. भययुक्त वातावरण में रहने के बावजूद भी उनके भक्तों की संख्याँ कम नहीं है. देवों के देव महादेव अपने भक्तों पर असीम कृपा बरसाने वाले देव हैं. वे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले देवता और अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देने के लिए जगप्रसिद्ध हैं. महाशिवरात्रि का व्रत करने से उनकी कृपा और भी सघन रुप से उनके भक्तों पर बरसती रहती है.

शिवरात्रि का अर्थ वह रात्रि है जिसका शिवतत्व के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है.या यह कहें कि शिवजी को जो रात्रि अतिप्रिय है उसे शिवरात्रिकहा गया है.

रात्रि ही क्यों ?

भगवान शंकर संहारशक्ति और तमोगुण के अधिष्ठाता हैं, अतः तमोमयी रात्रि से उनका स्नेह(लगाव) होना स्वाभाविक है. रात्रि संहारकाल की प्रतिनिधि है. उसका आगमन होते ही सर्वप्रथम प्रकाश का संहार, जीवों की दैनिक कर्मचेष्टाओं का संहार और अन्त में निद्रा द्वारा चेतना का ही संहार होकर सम्पूर्ण विश्व संहारिणी रात्रि की गोद में गिर जाता है. ऎसी दशा में प्राकृतिक दृष्टि से शिव का रात्रिप्रिय होना सहज ही हृदयंगम हो जाता है. यही कारण है कि भगवान शंकर की आराधना न केवल इस रात्रि में ही वरन सदैव प्रदोष (रात्रि के प्राम्भ होने) के समय में की जाती है

एक बार पार्वतीजी ने जिज्ञासावश भगवान शिव से प्रश्न किया कि “शिवरात्रि” क्या होती है, उस दिन शिवाराधना से किस फ़ल की प्राप्ति होती है और उसके करने का क्या विधान है ? भगवान आशुतोष ने उत्तर देते हुए कहा

फ़ाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथि स्याच्चतुर्दशी तास्यां या तामसी रात्रिः सोच्यते शिवरात्रिका तत्रोपवासं कुर्वाणः प्रसादयति मां ध्रुवम न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तन्नोपवासतः

अर्थात-फ़ाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी “शिवरात्रि” कहलाती है. जो उस दिन उपवास करता है, वह मुझे प्रसन्न कर लेता है. मैं अभिषेक, वस्त्र, घूप, अर्चन तथा पुष्पादिसमर्पण से उतना प्रसन्न नहीं होता जितना कि व्रतोपवास से.

ईशानसंहिता में बतलाया गया है कि फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदिदेव भगवान श्रीशिव करोडॊं सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंगरुप में प्रकट हुए.

शिवरात्रि व्रत की वैज्ञानिकता तथा आध्यात्मिकता

ज्योतिष शास्त्र के आनुसार फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है. अतः वही जीवनरुपी चन्द्रमा का शिवरुपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है. अतः इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से जीव को अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है. यही “शिवरात्रि” का रहस्य है.

महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है. उनके निराकार से साकार रुप में अवतरण की रात्रि ही “ महाशिवरात्रि” कहलाती है. वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति, ऎश्वर्यादि प्रदान करते हैं.

ईशानसंहिता में एक आख्यान प्राप्त होता है –पद्मकप्ल के प्रारंभ में भगवान ब्रह्माजी ने जब अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज एवं देवताओं आदि की सृष्टि कर चुके, एक दिन विचरण करते हुए क्षीरसागर जा पहुँचे. उन्होंने देखा कि भगवान श्री नारायण शुभ्र, श्वेत सहस्त्रफ़णमौलि श्री शेषजी की शय्या पर शांत अधलेटे हुए है. श्रीदेवी श्रीमहालक्ष्मीजी उनकी चरण-सेवा कर रही है. गरुड, नन्द, सुनन्द, गन्धर्व, किन्नर आदि विनम्रभाव से हाथ जोडॆ खडॆ हैं. यह देखकर ब्रह्माजी को अति आश्चर्य हुआ. ब्रह्माजी को गर्व हो गया था कि कि वे ही इस सृष्टि का मूल कारण, सबका स्वामी, नियन्ता तथा पितामह हूँ. वे मन ही मन सोचने लगे कि इन्होंने मुझे आया देखकर न तो प्रणाम किया और न ही अभिवादन किया. क्रोध में वे तमतमा उठे. उन्होंने निकट जाकर कहा:- “देखते नहीं...तुम्हारे सामने कौन खडा है ? मैं जगत का पितामह हूँ और तुम्हारा रक्षक. तुमको मेरा सम्मान करना चाहिए”

इस पर भगवान नारायण ने कहा:- सारा जगत मुझमें स्थित है. फ़िर तुम उसे अपना क्यों कहते हो ? तुम मेरी नाभि-कमल से पैदा हुए हो, अतः मेरे पुत्र हो” दोनो में विवाद होने लगा. ब्रह्माजी ने “पाशुपत: और श्री विष्णु ने “माहेश्वर” अस्त्र उठा लिया. दिशाएँ अस्त्रों के तेज से जलने लगीं, सृष्टि में प्रलय की आशंका हो गयी. देवगण भागते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान विश्वनाथ के पास पहुँचे. अन्तर्यामी शिवजी समझ गए. देवताओं द्वारा स्तुति करने पर प्रसन्न होते हुए उन्होंने कहा:-“मैं ब्रह्मा-विष्णु के बीच चल रहे युद्ध को जानता हूँ. मैं उन्हें शांत कर दूंगा. ऎसा कहकर भगवान शंकर दोनो के मध्य में अनादि, अनन्त-ज्योतिर्मय स्तम्भ के रुप में प्रकट हुए. “शिवलिंगत्योभ्दूत्यः कोटिसूर्यसमप्रभः” .माहेशर, पाशुपत दोनों अस्त्र शान्त होकर उसी ज्योतिर्लिंग में लीन हो गए.

यह लिंग निष्फ़ल ब्रह्म, निराकार ब्रह्म का प्रतीक है. श्री विष्णु और ब्रह्मा ने उस लिंग की पूजा-अर्चना की. यह लिंग फ़ाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को प्रकट हुआ तभी से लिंगपूजा आज तक निरन्तर चली आ रही है.

श्री विष्णु और श्री ब्रह्माजी ने कहा_ हे प्रभु ! जब हम दोनों, लिंग के आदि-अन्त का पता न लगा सके तो आगे मानव आपकी पूजा कैसे करेगा ? इस पर कृपालु श्रीशिव द्वादशज्योतिर्लिंग में विभक्त हो गए. महाशिवरात्रि का यही रहस्य है. (ईशानसंहिता)

द्वितीय आख्यान ----

वाराणसी के वन में एक भील रहता था. उसका नाम गुरुद्रुह था. उसका कुटुम्ब बडा था. अतः वह प्रतिदिन वन में जाक्रर मृगों को मारता और वहीं रहकर नाना प्रकार की चोरियाँ करता था. अपने माता-पिता-पत्नि और बच्चॊं ने भूख से पीडित होकर उससे भोजन की याचना की. वह तुरंत धनुष-बाण लेकर जंगल में निकल पडा. सारे दिन जंगल में भटकता रहा,लेकिन उस दिन कोई भी शिकार हाथ नहीं लगा. सूर्य भी अस्त हो चुका था. अतः जंगली जानवरों के डर से बचने के लिए एक पेड पर चढ गया.

पेड की शाख पर बैठकर वह सो भी नहीं सकता था. खाली बैठे-बैठे वह कर भी क्या सकता था? अनायास ही वह पत्तियाँ तोडते जाता और नीचे गिराता जाता था. वह कोई साधारण पेड नहीं था, बल्कि वह बेल का पेड था. संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि का दिन था और पेड के ठीक नीचे शिवलिंग स्थापित था. अनजाने में वह पूरी रात शिवजी की पूजा करता रहा था. श्री शिवजी प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो गए और उससे वर माँगने को कहा.” मैंने सब पा लिया” कहते हुए भील उनके चरणॊं में गिर पडा. शिवजी ने प्रसन्न होकर उसका नाम “गुह” रख दिया और वरदान दिया कि भगवान राम एक दिन अवश्य ही तुम्हारे घर पधारेंगे और तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे. तुम मोक्ष को प्राप्त होगे.वही व्याध शृंगवेरपुर में निषादराज “गुह” बना, जिसने भगवान का आतिथ्य किया. शिवरात्रि पर्व का संदेश

भगवान शंकर में अनुपम सामंजस्य, अद्भुत समन्वय और उत्कृष्ट सद्भाव के दर्शन होने से हमें उनसे शिक्षा ग्रहणकर विश्व-कल्याण के महान कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए-यही इस परम पावन पर्व का मानवजाति के प्रति दिव्य संदेश है. शिव अर्धनारीश्वर होकर भी कामविजेता हैं, गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त हैं, हलाहल पान करने के कारण नीलकंठ होकर भी विष से अलिप्त हैं, ॠद्धि-सिद्धियों के स्वामी होकर भी उनसे विलग हैं, उग्र होते हुए भी सौम्य हैं, अकिंचन होते हुए भी सर्वेश्वर हैं, भयंकर विषधरनाग और सौम्य चन्द्रमा दोनों ही उनके आभूषण हैं, मस्तक पर प्रलयकालीन अग्नि और सिर पर शीतल गंगाधारा उनका अनुपम शृंगार है, उनके यहाँ वृषभ और सिंह का तथा तथा मयूर एवं सर्प का सहज वैर भुलाकर साथ-साथ क्रीडा करना समस्त विरोधी भावों के विलक्षण समन्वय की शिक्षा देता है. इससे विश्व को सह-अस्तित्व अपनाने की अद्भुत शिक्षा मिलती है

इसी प्रकार उनका श्रीविग्रह-शिवलिंग ब्रह्माण्ड एवं निराकार ब्रह्म का प्रतीक होने के कारण सभी के लिए पूज्यनीय है. जिस प्रकार निराकार ब्रह्म रुप, रंग, आकार आदि से रहित होता है उसी प्रकार शिवलिंग भी है. जिस प्रकार गणित में शून्य कुछ न होते हुए भी सब कुछ होता है, किसी भी अंक के दाहिने होकर जिस प्रकार यह उस अंक का दस गुणा कर देता है, उसी प्रकार शिवलिंग की पूजा से शिव भी दाहिने होकर (अनुकूल होकर) मनुष्य को अनन्त सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं. अतः मानव को उपर्युक्त शिक्षा ग्रहणकर उनके इस महान महाशिवरात्रि-महोत्सव को बडॆ समारोहपूर्वक मनाना चाहिए. 

गोवर्धन यादव

103,कावेरीनगर, छिन्दवाडा

(म.प्र.)480001

लघु कथा

लिव-इन रिलेशन ...

अरुण कुमार झा

[ यह एक काल्पनिक कहानी है। इसके सभी पात्र, स्थान और घटनाएँ काल्पनिक हैं जिनका किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति या किसी स्थान विशेष से कोई संबंध नहीं है। यदि किसी को ऐसी किसी भी प्रकार की समानता का भ्रम होता हो तो यह एक महज संयोग हो सकता है। ]

मुझसे मत पूछिए,… हम नहीं बता पायेंगे। वह अब है नहीं, जो प्रेम के होने या न होने की तसदीक कर सकती थी। कौन जाने!... प्रेम है?… होगा?… नहीं है?… होता है?... बचपन में तो यही सुना था कि प्रेम बड़ी ऊँची चीज है। यह जीवन को जीने के काबिल बनाता है।...आसमान से भी बड़ा, रंग बिरंगी, इंद्रधनुषी परछाँई वाला । ... फिर, रुलाता क्यों है यह?

पहला वाकया तब का है जब वह पहली बार मेरे घर आयी थी और मेरे सावन के झूले पर मेरे सामने पेंग मारने बैठ गई। मैं उसे देखता रहा, … रोकने, टोकने या मना करने की बात मेरे मन में नहीं आयी। ... उसकी उमर तब छह-सात साल रही होगी और मेरी यही कोई आठ-दस साल।

दूसरा वाकया उन दिनों का है जब गाँव में आम के बगीचे में वह हमदोस्तों के साथ गिल्ली-डंडा तो कभी डोल‌-पात खेला करती थी। इन खेलों में जीत के लिए मेरे सिवा किसी में उसे चैलेंज करने की हिम्मत नहीं थी - ऐसा उसका मानना था गो हकीकत में हर बार बाजी मेरी हाथ से फिसल जाती और उसकी विजयी थिरकन में मैं रम जाया करता था । इन मौकों पर बड़ी शिद्दत से वह मुझे देखती थी। मुझे लगता – हार वह गई है, जीता मैं हूँ । मेरे दोस्तों की राय थी कि कैरम के खेल में मुझे हराने के लिए कौशल चाहिए । मुझे किसी ने हराया हो, याद नहीं - सिवाय उसको छोड़कर । मेरे दोस्त मुझे हारता देख हाँक लगाते, परेशान होते और जीत का सेहरा वह अपने सिर बाँध ले जाती । उसे सामने पाकर मैं अपने सारे कौशल भूल जाता, उसकी जीत को अपनी जीत मानता । ... मेरी उम्र तब पंद्रह-सोलह की होगी और उसकी यही कोई बारह-चौदह।

यह बाद की बात है ।...

हमारे वालिदैन शहर आ बसे थे। पढ़ाई-लिखाई हम दोनों की एक ही कालेज में शुरु हुई । वह मुझसे एक क्लास पीछे थी, हालां हमारा विषय एक था । जूलॉजी के प्रैक्टिकल क्लास में एक दिन उसी के उकसावे में आकर मैंने क्लोरोफार्म सूंघ लिया और मुझे आज भी यकीन नहीं है कि मैं बेहोश हुआ था । बेसब्र तो मुझे डॉ. एस. डी. भट्टाचार्य, एच. ओ. डी. जूलॉजी लगे जो उस दिन उस पर इसलिए बरस रहे थे कि मेरी जान क्लोरोफार्म सूंघने के कारण जा सकती थी । मेरी आँख कब बंद हुई ठीक से नहीं बता सकता, पर जब खुली तो उसका हाथ मैंने अपनी हथेली में पाया । वह अपने हाथ से मेरी हथेली को जोर-जोर से रगड़ रही थी और पसीना-पसीना हो रही थी। मेरा मन किया, इस बाहोशी से कभी न उबरूं ।... तब मेरी उमर चौबीस-पच्चीस रही होगी और उसकी बाइस-तेईस के आस-पास।

..... आगे के बारह-चौदह साल झिलमिलाते तारों के बीच गुजर गए । जब वह सामने होती, चाँद दिखाई पड़ता। बाकी समय तारे झिलमिलाते रहते ।

एक रोज जब मैं बिजनेस हाऊस में अपने सेक्रेटरी को डिक्टेशन दे रहा था तभी उसके नाम का विजिटिंग कार्ड दरवान मुझे दे गया और वह जैसे ही कमरे के अंदर आयी, मैं अपनी सीट छोड़कर उसकी अगवानी में लग गया हालां, मैं जानता था कि वह मेरे ही मातहत ड्यूटि करने आयी है । - “श्रीमान्‌ मैं आपसे हिंदी में ही बोलूंगी । परिवार नियोजन के सरकारी आदेशों पर अमल करने का एक तरीका यह है कि शादी न की जाए ।” - वह जमाना संजय गांधी का था और परिवार नियोजन देश की बढ़ती जनसंख्या को कम करने का एक बेहतर तरीका प्रचारित हुआ था । जन संपर्क मेरे कर्म-क्षेत्र का अभिन्न अंग रहा है । लोगों की कथनी और करनी के बीच के फर्क को मैंने देखा-जाना और समझा है। पर यह लड़की! इसने तो सचमुच शादी नहीं की – मेरे लाख कहने के बावजूद । ... बचपन में किसी दिन उसने वायदा किया था - जब उसकी डोली सजेगी, मौर मेरे सिर पर होगा।

तकरीबन चालीस-पैंतालिस की उम्र तक वह मेरे घर बेखौफ आया-जाया करती थी । उसे सामने पाकर मुझे नूर की बारिश होने का एहसास होता । मैं सब भूल जाता - खुद को, अपनी जिम्मेदारियों को, घर- परिवार को, तमाम दुनिया को । मेरी नजरों के आगे केवल वह होती, उसके जेहन में मैं होता । मैं होता, वह होती ।

कुछ दिनों बाद…

एक छोटा बच्चा तुतलाते हुए मुझसे पूछता है – मैं आपको पापा बुला सकता हूँ?... और वह लड़की जो कभी मेरी ब्याहता नहीं रही, मुझे बताया गया, अपने बच्चे को मेरा नाम देना चाह रही है । मैं कैसे मान लूं? मेरी बात पर विश्वास भी कौन करेगा?

मामले को कोर्ट में जाना ही था, … गया भी । डी.एन.ए. टेस्ट समेत सारे तिकड़म हुए । पर यह सब होते-हवाते मेरी उम्र ढलान पार कर गई। कोर्ट ने काफी रियायतें बरतीं । पर, उस नामुराद ने मेरे मकान से दो-तीन फर्लांग की दूरी पर अपनी माँ के लिए इस दौरान एक बड़ा बंगला बनवा दिया । हमारा आमना-सामना होना अदालती कार्रवाई की ओट में पहले ही बंद हो चुका था । मैं बुझा-बुझा सा रहता । मुझसे पूछे बगैर बँगला बनवाने की बात पर मुझे गुस्सा भी आता। पर, शिकायत मैं किससे करता?

एक दिन अचानक एक खत मुझे मिला - लिखावट उसकी ही थी, कांपते-थरथराते हाथों लिखी हुई - “मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा । अब जा रही हूँ । मेरे मरने के बाद मेरा नाम लेकर एक लोटा पानी गिरा देना, मुझे तृप्ति मिल जाएगी।”

घरवालों की मनाही के बावजूद मैं उसकी श्राद्धस्थली तक गया । पंडित जी श्राद्धकर्त्ता से कुल-गोत्र पूछ रहे थे। मेरी आँखों में अचानक बाढ़ आ गई, आँसू बेलाग बहने लगे ।***

हमारी अंग्रेजी

हाल ही में देश में अंग्रेजी से संबंधित एक अभूतपूर्व घटना घटी. वैसे तो हमारे देश में जो भी घटना घटती है वह अभूतपूर्व ही होती है. संसद और विधान सभाएं तो ऐसी घटनाओं के लिए “ दुर्घटना संभावित क्षेत्र “ जैसी ख्याति अर्जित कर चुकी हैं. लिम्का बुक वाले चाहें तो उन्हें अपने रिकार्ड के लिए वहां भरपूर सामग्री मिल सकती है. यहाँ जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है, वह एक नहीं, कई दृष्टियों से अभूतपूर्व है. हुआ यह कि एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में हमारे वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्ण को झिड़कते हुए कहा कि आपकी अंग्रेजी मेरी समझ में नहीं आती. आप हिंदी में बोलिए जिसका अनुवाद करके मेरे अधिकारी मुझे अंग्रेजी में समझा देंगे.

सुधीर कृष्ण एम एस-सी (फिजिक्स) हैं, एम ए (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) हैं, पी-एच डी हैं. दूसरे शब्दों में, उनके पास भारतीय विश्वविद्यालयों की दी हुई ऐसी कई अधिस्नातक डिग्रियां हैं जो बिना अंग्रेजी के नहीं मिलतीं. वे आई ए एस हैं जो अत्यंत प्रतिष्ठित नौकरी मानी जाती है. आज तो आई ए एस की परीक्षा और साक्षात्कार भारतीय भाषाओं में देने की अनुमति मिल गई है, पर 1977 में जब वे आई ए एस बने, तब यह अनुमति नहीं थी. तब साक्षात्कार केवल अंग्रेजी में होता था. श्री सुधीर कृष्ण मूलरूप से उत्तर प्रदेश के निवासी हैं, पर आई ए एस की नौकरी में कर्नाटक कैडर में रहे. अतः उन्होंने कन्नड़ भाषा भी सीखी. इससे पता चलता है कि भाषा सीखने में वे पीछे नहीं रहे. अन्य आई ए एस अफसरों की तरह उन्होंने भी विभिन्न पदों पर काम किया, क्रमशः पदोन्नत होते हुए सचिव स्तर तक पहुंचे और अब जून में रिटायर होने वाले हैं. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह माना जा सकता है कि शिक्षा के दौरान ही नहीं, आई ए एस में प्रवेश से लेकर पदोन्नति के हर सोपान पर उन्होंने अंग्रेजी की बाधा पार की, इसके बावजूद अगर उनकी अंग्रेजी कमजोर है तो क्या इससे यह बात प्रमाणित नहीं होती कि विदेशी भाषा कितनी भी पढ़ ली जाए, उस पर अधिकार नहीं हो सकता ?

चिदंबरम साहब की गिनती हमारी वर्तमान सरकार के “ सुशिक्षित “ लोगों में होती है. कुछ लोग कहते हैं कि उनकी शिक्षा-दीक्षा हारवर्ड (अमरीका) में हुई, शायद इसीलिए उनकी अंग्रेजी भी अलग तरह की होगी. बात गलत तो नहीं है, पर पूरी तरह सच भी नहीं है, क्योंकि उनकी स्कूली और यूनिवर्सिटी शिक्षा तो तमिलनाडु में हुई, एम बी ए उन्होंने हारवर्ड से किया. अतः यह बिलकुल संभव है कि प्रबंधन के गुर सीखने के साथ उनकी अंग्रेजी भी सुधर गई हो. पर हर आदमी तो हारवर्ड नहीं जा सकता.

तो बात हो रही थी चिदंबरम साहब की झिड़की की. बात झिड़की पर खत्म नहीं हुई, बल्कि वहां से शुरू हुई. सचिव महोदय चिदंबरम से तो शिष्टाचारवश कुछ कह नहीं पाए, पर शांत भी नहीं बैठे. बात दूसरे सचिवों की उपस्थिति में कही गई थी. अतः उनके आत्मसम्मान को कुछ ज्यादा ही ठेस लगी. उन्होंने अपने मंत्री कमलनाथ को पत्र लिखा जिसमें चिदंबरम के दुर्व्यवहार की शिकायत करके अपनी भड़ास निकाली. पहले का कोई उदाहरण याद नहीं आता जब किसी अफसर ने सरकार के दिग्गज मंत्री की शिकायत की हो और वह भी लिखकर.

पर शायद वे जानते थे कि जिससे शिकायत कर रहा हूँ, वह कुछ कर नहीं पाएगा . अतः उन्होंने उसी पत्र में यह अनुरोध किया कि समुचित कारर्वाई के लिए यह बात प्रधानमंत्री जी के संज्ञान में लाई जाए. उन्होंने “समुचित कारर्वाई “ के लिए प्रधानमंत्री जी पर भरोसा कैसे कर लिया, यह तो वे ही जानें, पर उनके मंत्री महोदय ने उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए यह शिकायत प्रधानमंत्री जी के पास भेज दी. अब यह तो पता नहीं कि “ मेरी खामोशी अच्छी “ कहने वाले प्रधानमंत्री जी ने इस पर कोई संज्ञान लिया या नहीं, अगर लिया तो क्या किया, पर जैसा अक्सर होता आया है कि सरकार की गोपनीय बातें जनता से गोपनीय नहीं रहतीं, सो यह चिट्ठी किसी तरह मीडिया में आ गई और चर्चा का विषय बन गई. अंग्रेजी समाचारपत्रों ने आई ए एस अफसरों को “ बाबू ” लिखा तो अफसर बिगड़ गए कि हम बाबू नहीं, अफसर हैं ; पर किसी अफसर ने अफसरी दिखाते हुए न तो बैठक में चिदंबरम साहब से कुछ कहने का साहस किया, न उनकी टिप्पणीं के बारे में बाद में कुछ कहा. बात बढ़िया क्वालिटी की अंग्रेजी की थी. अतः संभव है दूसरे अफसरों ने इसीलिए चुप रहना बेहतर समझा हो.

पर इस घटना पर मुझे कुछ कहना है. हमारी सरकार में दो तरह के लोग हैं. एक वे जो अपने अशिष्ट बेतुके बयानों के लिए ही बदनाम हैं, दूसरे वे जो अपने शिष्ट शालीन व्यवहार के लिए जाने जाते हैं, चिदंबरम जी की गिनती इन दूसरे लोगों में ही की जाती है. पर उनकी इस टिप्पणी से तो उनकी छवि धूमिल हुई है. किसी सम्मानित व्यक्ति को इस प्रकार अपमानित करना चिदंबरम जैसे सुशिक्षित व्यक्ति को शोभा नहीं देता.

मामला अंग्रेजी का है, अतः सबसे पहले तो हमारा ध्यान अपनी राजभाषा नीति की ओर जाता है. हमारे मंत्रीगण जिस संविधान की शपथ लेते हैं, उसके अनुसार केन्द्र सरकार की “ राजभाषा “ हिंदी है ( संविधान सभा ने 15 वर्ष के लिए अंग्रेजी में भी काम करने की छूट यह सोचकर दी थी कि परिवर्तन एकाएक करने के बजाय क्रमशः किया जाए ). जब राजभाषा हिंदी है तो बैठक अंग्रेजी में हो ही क्यों रही थी ? हमारे मंत्रीगण शपथ संविधान के अनुरूप काम करने की लेते हैं या उल्लंघन करने की ?

चिदंबरम साहब वकील हैं. तर्क दे सकते हैं कि संविधान के बाद बनाए गए राजभाषा अधिनियम के आधार पर अभी भी अंग्रेजी के प्रयोग की खुली छूट है. बात सच है. तर्क वे यह भी दे सकते हैं कि मैंने तो सचिव महोदय से हिंदी में बोलने के लिए कहा. बिलकुल ठीक, पर आगे यह भी कहा न कि मेरे अधिकारी उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर देंगे, अर्थात आपके कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी. श्रीमान जी, तमिलनाडु में जन्म लेने और शिक्षा पाने के बाद आपने हिंदी विरोध करने वाली पार्टियों में नहीं, बल्कि उस पार्टी में काम करना पसंद किया जो हिंदी के प्रबल समर्थक महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानती आई है. पता नहीं, आप उन्हें अपना आदर्श मानते हैं या नहीं, पर यह तो विचार कर ही सकते हैं कि आप सन 1984 से संसद में हैं और 1985 से केन्द्र सरकार में विभिन्न पदों पर हैं. इस प्रकार केन्द्रीय राजनीति में भूमिका निभाते हुए आपको लगभग तीस वर्ष हो गए. इसलिए वकील साहब, एक बात यह बताइये कि आप वकालत छोड़कर राजनीति में किसलिए आए ? 26 जनवरी 1950 वाली स्थिति बनाए रखने के लिए या इसे बदलने के लिए ? जो छूट 1950 में दी गई थी, उसे कितना खींचेंगे ? इस स्थिति को बदलने का दायित्व कौन निभाएगा ?

सरकार ने राजभाषा नीति के अनुपालन के लिए यह व्यवस्था की है कि सरकारी नौकरी में प्रवेश करते समय हिंदी ज्ञान आवश्यक नहीं, पर नौकरी में आ जाने के बाद हिंदी सिखाने की व्यवस्था सरकारी खर्च पर की जाती है. अखिल भारतीय सेवा में होने के कारण आई ए एस अफसरों को तो उनके प्रारंभिक प्रशिक्षणकाल में ही हिंदी सिखाई जाती है; पर इस प्रशिक्षण का कोई लाभ उठाया जाता है, यह संदिग्ध है क्योंकि मंत्री जी के कामकाज की भाषा तो अंग्रेजी होती है. तो क्यों न केन्द्रीय स्तर पर राजनीति करने के इच्छुक नेताओं के लिए भी हिंदी प्रशिक्षण की सरकारी व्यवस्था कर दी जाए ? संभवतः फिर हिंदी प्रशिक्षण का बेहतर उपयोग हो सकेगा.

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(डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

पी/138, एम आई जी, पल्लवपुरम-2, मेरठ 250 110 )

agnihotriravindra@yahoo.com

चाय कि दूध ? - प्रमोद यादव

 

“देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान् कितना बदल गया इंसान”

अच्छा हुआ...कवि प्रदीपजी कूच कर गए..और अनाप-शनाप दिन देखने से बच गए..वैसे तो यह गीत उन्होनें पूरे संसार को लेकर लिखी पर अपने देश की पतली हालत से वे ज्यादा परिचित थे..उन्हें उम्मीद थी कि आगे हालात सुधरेंगे..इन्सान सुधरेगा..पर उनके जीवन-पर्यंत तो कुछ भी नहीं सुधरा..न देश न इंसान..अलबत्ता सब कुछ और जोरों से बिगड़ा और बदला ..वे होते तो ना जाने और क्या-क्या इंसान की फितरत पर.,.देश पर लिखते..उन्हीं के तर्ज पर किसी ने एक गीत लिखा- “ अम्मा देख..देख..तेरा मुंडा बिगड़ा जाए..अम्मा देख..देख..” इसका अर्थ (मेरे हिसाब से) यूँ है - “माँ भारती..देखो..भारतवासी कैसे बरबाद हो रहे ( सियासत के फेर में)...देखो...लोक-तंत्र नरक-तंत्र हुआ जा रहा.. देखो..वोट और नोट का चक्कर चल रहा.. प्रजा का दुःख-दर्द कोई समझ नहीं रहा...देखो..सब उसे खसोट रहे..लूट रहे... देखो... कोई पिला रहा चुनावी चाय तो कोई पिलाये दूध..माँ...देखो..”

‘ सुनते हो जी....’ पत्नी की तीखी आवाज ने हमेशा की तरह मेरे चिंतन को चिकोट दिया..अच्छा खासा मैं देश-दुनिया और बदलते इन्सान के बवाल पर बालिंग की सोच रहा था कि भूचाल आ गया...इसके पहले कि भूचाल रिपीट हो, मैंने जोर से बिगुल फूंका – ‘ हाँ..सुन रहा हूँ…..बोलो..’

‘ अरे..आज का अखबार तुमने पढ़ा ? ‘ उसने ऐसे पूछा जैसे उसमें उसकी कोई लाटरी फंसी हो.

‘ हाँ..पहले तो मैं ही पढता हूँ ना..तुम्हें तो मालूम है..इसके बगैर मुझे ठीक से हाजमा नहीं होता..अब ऐसा क्या छूट गया जो मैंने नहीं पढ़ा ?’

‘ तुमने पढ़ा न कि चुनाव के चलते पार्टी वाले जगह-जगह लोगों को मुफ्त की चाय पिला रहे हैं..’

मैंने तुरंत बात काटी - ‘ अरे बीबीजी..पुराना न्यूज है ये....अब चुनाव करीब है तो गरीब को लुभाने, वोट -बैंक भुनाने ये सब तो करेंगे ही..तुमने भी तो उस दिन अपनी सखियों के साथ मुफ्त की चाय का लुत्फ़ उठाया ..कैसी थी मुफ्त की चाय ? मैंने पूछा.

‘ अजी मत याद दिलाइये ..हम जिस स्टाल पर गई थी, वहां चाय के पूर्व कईयों ने भाषण पिलाया तब चाय मिली.....पूरे दो घंटे बाद..’

‘ पर मैंने तो सुना है- चाय पहले परोसी जाती है फिर चुस्की के साथ चर्चा..तुम्हारे साथ कैसे उलट हो गया ? ‘

‘ हाँ..हम सब भी यही सोच गए थे जी....चाय का वक्त था..और पीने का मन..पर मुफ्त की चाय बड़ी मंहगी पड़ी....छः भाषणों के उपरांत..दो घंटे बाद मिली..वह भी ठंडी और बेस्वाद..’

‘ पर ऐसी शिकायत तो अखबार में अब तक नहीं छपी..तुम मीडिया में नहीं गई क्या ? ‘मैंने उसे छेड़ा.

‘ दरअसल चाय वाले की गाय कांजीहॉउस में कसरत करने गई थी..दूध के पैकेट कहीं उपलब्ध नहीं थे..तो कैसे पिलाते चाय ?हमने तो “ काली टी” पर भी हामी भरी पर चायपत्ती लेने जो छोकरा गया था उसे पुलिस ले गई..अब खाली शक्कर से तो बनती नहीं न चाय..इसलिए......’ वह झेंप-सी गई.

‘मुफ्त की चाय थोड़ी देर से भी मिले तो क्या बुरा है ? ‘ मैंने चिढाया.

‘ हाँ..पर कोई भाषण पिलाकर पिलाये तो बहुत बुरा है..” वह बौरा गई.

‘ अच्छा छोडो यार..तुम अख़बार के विषय में कुछ बता रही थी न..’ मैंने याद दिलाया.

‘ हाँ..वही तो बता रही थी कि मुफ्त की चुनावी चाय के बाद अब यू.पी.में दूध मिलना शुरू हो गया है.....बिलकुल मुफ्त.....एक पुरानी पार्टी दूध पिलाकर वोट बटोरने के उपक्रम में लगी है..’

‘ तो क्या इरादा है ? दूध पीने गोरखपुर जाओगी ?’ मैंने पूछा.

‘ अरे नहीं जी ..वैसे भी चाय पीने भला कहाँ अहमदाबाद गए थे..आज नहीं तो कल यहीं पीयेंगे..अपने शहर में..बस..न्यौता भर आने दो..’

‘ तो देवीजी का मन अभी मुफ्तखोरी से भरा नहीं है..चाय के बाद अब दूध....वे भी अगर भाषण पिलाकर पिलायें तो ? ‘ मैंने मजाक किया.

‘ नहीं..ऐसा तो नहीं होना चाहिए...दूध तो बस गरम करो..सर्व करो..शक्कर,चायपत्ती,पानी मिलाने का कोई झंझट ही नहीं..पहले दूध मिलेगा फिर भाषण..इस बार तो बिलकुल नहीं झेलना है भाषण..’

‘ मतलब कि दूध जरुर पीना है..वो भी पार्लर में..मुफ्त में..? ‘

‘ हाँ..बिलकुल..’ उसने फटाक से जवाब दिया.

‘ अच्छा बताओ...वोट किसे दोगी ? चाय कि दूध को ? मैंने सहज भाव से पूछा.

‘ जिससे ज्यादा फायदा हो ..’ उसने तुरंत जवाब दिया.

‘श्रीमतीजी .फायदे तो दूध के ही ज्यादा हैं..किसी से भी पूछ लो..स्वास्थ्य के लिए हितकारी..इसे धरती का अमृत भी कहते हैं..एक तरह से इसे पूरा भोजन माना जाता है..यह टी.बी.नाशक, बुद्धिवर्धक, पाचक होता है..दूध से चेहरे का सौन्दर्य बढ़ता है..झांई, मुंहासे, दाग-धब्बे सब गरम दूध लगाने से चले जाते हैं..इससे ही मलाई,मक्खन,घी बनता है-चाय से नहीं..दूध किसी का हो- गाय-भैंस, भेड़-बकरी, ऊंटनी-गधी...सबका फायदेमंद होता है..तुम्हें मालूम है न - क्लियोपेट्रा रोज गधी के दूध से नहाती थी..उसकी सुन्दरता का राज – “लक्स” नहीं गधी का दूध था.. गधी का दूध दो हजार रूपये लीटर में बिकता है...पुराने लोग आज भी “दूधो नहाओ-पूतो फलो” का आशीर्वाद देते हैं.’

उसने बीच में टोका- ‘ अब चाय पे भी थोड़ी चम्मच चला दो..इसके भी गुण गिना दो..’

मैंने कहा - ‘ चाय के केवल नुकसान बता सकता हूँ..यह स्वास्थ्य की सबसे बड़ी दुश्मन है..यह लत है..नशा है..इसमें कोई पौष्टिक तत्व नहीं होता..इससे एसीडीटी बढ़ती है..शरीर में खुश्की आती है..पाचन में दिक्कत पैदा करती है..अनिद्रा की बीमारी देती है...अब बताओ..किसे वोट करोगी ? चाय कि दूध ?‘

पत्नी ने जवाब दिया- ‘ अभी तो चुनाव दूर है जी ...तब तक हो सकता है ..कोई मुफ्त में पिला दे जूस या कोई पिला दे सूप ..कोई पिला दे काफी तो कोई पिला दे लस्सी .. तब तक वेट कर लेती हूँ..सब पीने के बाद तय करुँगी - किसको वोट करूँ..’

‘ अरे भागवान..मुफ्त का इतना कुछ पिओगी तो अपचन हो जाएगा..फिर वोटिंग के दिन वोट नहीं कर पाओगी..पूरे दिन टायलेट में रह जाओगी.. ’ मैंने समझाया.

‘ अपचन होगा तो सबका “टोंटा”(गला) दबाने जाउंगी.....ई.वी.एम. में “नोटा” दबाकर आउंगी....’ इतना बोल वह हंसने लगी.

मुझे बेहद ही “फील-गुड” फिल हुआ कि चलो अखबार पढ़ पत्नी “सिलाई-गोटा” से “नोटा” तक तो पहुंची...

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- प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग, छत्तीसगढ़

प्रमोद भार्गव

अकसर युवा, किशोर और बच्‍चे गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने के लिए खतरों से खेलने का जोखिम उठाते रहते हैं। हाल ही में भिण्‍ड के मोहित दुबे ने लगातार 168 घंटे छात्रों को पढ़ाकर नया कीर्तिमान रचा है। इस रिकॉर्ड को गिनीज बुक अॉफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में शामिल करने का दावा किया जाएगा। मोहित ने इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए भिण्‍ड के विद्यावती कॉलेज में अपनी कोचिंग के छात्र-छात्राओं को लगातार 168 घंटे पढ़ाया। इससे पहले पोलैंड के इरोल मोजवानी ने 121 घंटे लगातार पढ़ाकर साल 2009 में विश्‍व रिकॉर्ड बनाया था। हालांकि खतरों से खेलते बचपन पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय अंकुश लगाने की पहल कर चुका है। बावजूद सिलसिला थमा नहीं है।

रातोंरात प्रसिद्धि पाने के लिए आजकल युवा और अधेड़ अटपटे करतब दिखाकर जान की बाजी दाव पर लगाने में लगे हुए हैं। जुनून की हदें तोड़ देने वाली होड़ में बच्‍चें और किशोर भी पीछे नहीं हैं। वर्तमान रिकॉर्ड तोड़ने की इन प्रतिस्‍पार्धाओं में रचनात्‍मकता कम मदारी किस्‍म का उद्‌दाम आवेश ज्‍यादा है, जो नया रिकॉर्ड कायम करने के दौरान जानलेवा भी साबित हो सकता है। मानवाधिकरों का हनन भी इन प्रदर्शनों के दौरान धड़ल्‍ले से हो रहा है। इसलिए कुछ करतबों के प्रदर्शनों पर अंकुश भी जरूरी है, जिससे ये प्रेरणा का आधार न बनें ?

साहित्‍य में उत्तर आधुनिक जादुई यथार्थवाद की तरह आम जन को भुलावे में डालने के लिए बुद्धू बक्‍से का पर्दा चमत्‍कारों के एंद्रिक कार्यक्रम परोसकर लोगों को सस्‍ते मनोरंजन का लती बनाने में लगा है। अतिरिक्‍त महात्‍वाकांक्षा के चलते आनन-फानन में लोकप्रियता हासिल करने की इस होड़ में तमिलनाडू का मजदूर युवक मुतुकुमार भी अपनी जान हथेली पर लिए शहीदी अंदाज में शामिल हो गया था। वह 38 सैंकेड़ तक गले में फांसी का फंदा डालकर झूलते रहने का अनूठापन व हैरतअंगेज करतब पेश कर चुका है। इस करतब के प्रदर्शन के दौरान उसे समाचार माध्‍यामों ने जिस तरह से उछाला उससे प्रेरित व प्रभावित होकर अब वह और लंबे समय तक रस्‍सी के फंदे पर लटका रहकर गिनीज बुक अॉफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा लेना चाहता है। फांसी के फंदे पर लंबी अवधि तक लटके रहने की होड़ आखिर किस तरह की रचनात्‍मकता आथवा सार्थकता की परिचायक है ? इस तरह की बेहूदी और अनर्थक होड़ें मानसिक विकास के कौन से रास्‍ते प्रशस्‍त करने में सहायक साबित हो रही हैं, इस पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत है ? हां, इतना जरूर है, मुतुकुमार के इस तरह के जोखिम भरे प्रदर्शन जहां उनकी खुद की मौत का कारण बन सकते हैं, वहीं इस तरह के प्रदर्शनों से प्रेरित होकर खेल-खेल में अतिउत्‍साही युवक फंदे पर लटकने के बहाने मौत को भी गले लगा सकते हैं ?

देश के युवा आश्‍चर्यजनक प्रतिस्‍पर्धाओं और उम्र के विपरीत करतबों के प्रदर्शन में लगे हैं। कुछ साल पहले पांच साल की आकांक्षा ने भुवनेश्‍वर के हाइवे पर मोटरसायकल दौड़ाई थी। इसके पहले उड़ीसा के ही चार साल के बुधिया नाम के मासूम बालक ने तीन किलोमीटर लंबी दौड़ लगा देने की पारी खेली। जबकि यह दौड़ सोलह साल की उम्र तक के किशोरों के लिए थी। लेकिन वह दौड़ के ही समानांतर चल पड़ा और टीवी कैमरों ने अनजाने में ही उसे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया था। ये दोनों ही उदाहरण प्रतिभागियों के जहां स्‍वास्‍थ्‍य को आहात कर सकते हैं, वहीं कानून की प्रतिपादित अवधारणा के विपरीत भी जाते हैं। इसी तरह मुतुकुमार का प्रदर्शन भी कानून के दायरे में आकर आत्‍महत्‍या के प्रयास के मामले में दर्ज हो सकता है ? हालांकि हमारे देश में ही यह संभव है कि उपर्युक्‍त एकांगी जानलेवा करतबों को जन समूह का समर्थन और मीडिया में स्‍थान मिल जाता है तो कानून के रखवाले ही वास्‍तविकता से आंखें चुराकर सुरक्षा के इंतजाम मुहैया कराने में लग जाते हैं।

मौजूदा कीर्तिमान तोड़कर नया कीर्तिमान रच देने की इस होड़ में मानकों की परवाह किए बिना मध्‍यप्रदेश के इन्‍दौर की आकांक्षा जाचक 61 घंटे लगातार गाकर जहां जर्मनी में लगातार 54 घंटे गाए जाने का कीर्तिमान ध्‍वस्‍त कर देती है, तब प्रतिक्रिया स्‍वरूप मध्‍यप्रदेश के ही खंडवा जिले के भीकनगांव की एक सोलह वर्षीय बाला सानिया सैय्‍यद 64 घंटे लगातार गाकर इन्‍दौर की आकांक्षा के 61 घंटे के कीर्तिमान को पीछे धकेल देती है। गायन की होड़ का यह सिलसिला यहीं थमकर नहीं रह जाता....!, इन्‍दौर का ही एक और युवक दीप गुप्‍ता प्रतिभावान बालक इस प्रतिस्‍पर्धा में कूदता है और कोयंबटूर में लगातार 101 घंटे गाकर सानिया सैय्‍यद के 64 घंटे के कीर्तिमान को अपने बुलंद हौसले के चलते नकार देता है। गीत गाने के ये कीर्तिमान हालांकि बुलंद हौसलों और नेक नीयत की सफल परिणति रहे लेकिन चिकित्‍सकों की मानें तो वे इरादे स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्‍टि से खतरनाक भी साबित हो सकते हैं। इतनी लंबी अवधि तक लगातार गाने से स्‍वर तंत्रिकाओं में कालांतर में अवरोध पैदा हो सकते हैं। चिकित्‍सा विज्ञान के अनुसार जीवन को लंबा बनाए रखने के लिए सांसों का भी अपना एक हिसाब है। इस हिसाब के औसत का संतुलन गड़बड़ाने से शरीर में स्‍थायी विकार पैदा हो सकते हैं।

सुर अथवा बेसुरे अंदाज में घंटों गीत गाकर नए-नए कीर्तिमान स्‍थापित करना एक बात है। लेकिन गायक कलाकार बनना इसके बिलकुल विपरीत बात है। लता मंगेश्‍वर, आशा भौंसले, किशोर कुमार, मोहम्‍मद रफी या मुकेश लगातार गाने का कीर्तिमान खड़ा कर स्‍थापित कलाकार नहीं बने ? बल्‍कि अपने मौलिक अंदाज में गाने की वजह से बड़े और प्रतिष्‍ठित कलाकार बने और जनमानस गायन के क्षेत्र में स्‍थायी पहचान बनाई। दरअसल गायन के क्षेत्र में स्‍थायी पहचान और उपलब्‍धियों की आसमान छूती निरंतरता के लिए मौलिक सुर, लय और तान की जरूरत है न कि किसी अटपटी होड़ की ? कमोबेश यह स्‍थिति लगातार पढ़ने या पढ़ान ेस बन सकती है। आंखों की रोशनी कम हो सकती है या जा सकती है। लिहाजा ऐसी होड़ों से बचने की जरूरत है।

कुछ विचित्र कर गुजरने की ये महत्‍वाकांक्षाएं कई तरह के सवाल खड़े कर रही है, जो समाजशास्‍त्रियों को चिंता के विषय बनना चाहिए। इस तरह की प्रतिस्‍पर्धाएं खासतौर से बच्‍चों व किशोरों के संदर्भ में सोचनीय हैं क्‍योंकि आयु और शारीरिक विकास से बड़े करतब मानसिक शारीरिक, सामाजिक व वैधानिक मानकों पर खरे नहीं बैठते, इसलिए इनकी पड़ताल जरूरी है ? इधर शालेय (स्‍कूली) छात्रों के बौद्धिकता विषयक संबंधी जो सर्वेक्षण आए हैं उनके निष्‍कर्ष बताते हैं कि छात्रों में तार्किकता और प्रत्युत्‍पन्‍नमति (आई क्‍यू) का अभाव बढ़ रहा है। साथ ही छात्रों में विज्ञान संबंधी विषयों में भी रूचि कम हो रही है। हमारे राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री लगातार कम हो रहे वैज्ञानिकों पर चिंता जता रहे हैं।

इधर टीवी पर जिस तरह से अतीन्‍द्रित शाक्‍तियों का झंडा फहराने वाले भूत-प्रेत, नाग-नागिन, तंत्र-मंत्र और पुनर्जन्‍म के घटनाक्रमों ने कब्‍जा किया है। उसके नतीजतन विद्यार्थी-वर्ग की बौद्धिक क्षमताएं कुंद होकर सस्‍ते मनोरंजन की लती और तात्‍कालिक लोकप्रियता दिलाने वाली हैरतअंगेज होड़ों की शिकार हो रही हैं। समाजशास्‍त्रियों और मानवाधिकार के नायकों को युवा वर्ग पर पड़ रहे विपरीत प्रभाव की पड़ताल करने की आवश्‍यकता है। क्‍योंकि हैरतअंगेज अजूबों करतबों और अनूठे कारनामों से तात्‍कालिक लोकप्रियता तो हासिल हो सकती है लेकिन इस महत्‍व की उपलब्‍धि अर्जित नहीं की जा सकती इसलिए इस तरह की बेतुकी होड़ों से युवा वर्ग को निजात दिलाने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव

लेखक/पत्रकार

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

 

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

     गीता मेरी समझ में                                                                                                                                       
                    
   गीता रुपक में कही गर्इ है. इसकी विषयवस्तु कुल इतनी है:


   कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं.   युद्धारंभक शंख बज चुके हैं. अस्त्र-शस्त्र चलने ही वाले हैं. इसी क्षण अर्जुन धनुष-वाण उठाता है और कृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहता है. वह उन कौरवों को देखना चाहता है जो उससे लड़ने आए हैं. वह सबओर दृष्टि फिराता है. दोनों ही सेनाओं में उसे अपने ही संबंधी दिखते हैं. उन्हें  देखते ही उसके मन में ममत्व उमड़ आता है. उसके मन में होता है कि जिनके लिए वह राज्य, सुख, भोग चाहता है वे ही जीवन की आशा  छोड़कर यहा युद्धहेतु खड़े हैं. वह सोचता है कि अपने ही कुटुम्ब को मारकर उसे क्या मिलेगा. उनको मारने की कल्पना से ही वह कांप उठता है. उसका  मुंह सूखने लगता है, हाथ से गांडीव सरकने लगता है, मन विषाद से भर जाता है. वह अपना  धनुष-वाण त्यागकर उदासमन रथ में पीछे बैठ जाता है. अर्जुन का यह कृत्य कृष्ण को कायरतापूर्ण लगता है. वह उससे पूछते हैं-''अर्जुन! इस विषम घड़ी में तुझे यह मोह कहां से हो आया. अर्जुन अपने मन की स्थिति को कृष्ण के सामने रखता है. कृष्ण उसके मनोविज्ञान को समझते हैं. वह देखते हैं कि अर्जुन संशय में पड़ गया है. वह दुविधा में है कि युद्ध करे अथवा छोड़ दे. उनका तेजस्वी मित्र और शिष्य अपने होने (being) को समझ नहीं पा रहा है. वह उसके मन में उठी दुविधा को दूर करने की चेष्टा करते हैं. वह उसे पहले ज्ञानयोग (कर्मसंन्यास) फिर कर्मयोग समझाते हैं और उसे अपनी प्रकृति अथवा स्वधर्म को पहचानने के लिए प्रवृत करते हैं. अर्जुन अपने मन के संशय को दूर करने के लिए कृष्ण के सामने प्रश्नों की झड़ी लगा देता है. उसका निर्णायक प्रश्न है- इनमें से किस एक को अपनाना उसके लिए उपयुक्त है, कर्मसंन्यास (ज्ञानोपलबिध के बाद कर्म को त्यागना) या कर्मयोग (फल में आसक्ति रखे बिना कर्म करना) को.
   

कृष्ण उसे कर्मयोग की ओर प्रवृत करते हैं. वह कहते हैं कि देहनिर्वाह के लिए कर्म तो करना ही पड़ता है. इसलिए फल में आसक्ति रखे बिना स्वधर्म में प्रवृत होकर कर्म करना ही तेरे लिए श्रेष्ठ है. यह युद्ध तूने ठाना नहीं है, तुझपर आ पड़ा है. गुण और कर्म के अनुसार तू क्षत्रिय है, युद्ध करना तेरा स्वधर्म है. उठो और युद्ध करो.
 

  अर्जुन को कृष्ण की बात समझ में आ जाती है और वह कृष्ण के कहने पर नहीं स्वधर्म से प्रेरित होकर लड़ने के लिए तैयार हो जाता है.
  

इस आ पड़े युद्ध  में, जिसकी ललकार सामने ताल ठोक रही है, युद्ध से विरत होकर अर्जुन का पुन: युद्ध के लिए तैयार हो जाना उसके स्वधर्म अथवा अपने सहज स्वाभाविक कर्म में प्रवृत हो जाने को दिखाता है. आज के कुछ लोगों के देखे अर्जुन का चित्त आतंकी लग सकता है. पर आतंकी चित्त तो घृणा-प्रेरित होता है और युद्ध को ही समस्या का समाधान समझता है. यह युद्ध आपद्धर्म है.
  

अर्जुन यहां केवल 'अर्जुन का नहीं अपितु मनुष्यमात्र का प्रतीक है. प्रत्येक मनुष्य को अपने अंतर्द्र्वन्द्वों और बहिर्द्वन्द्वों से उलझना पड़ता है. अत: यह स्वधर्म मनुष्यमात्र के संदर्भ में है. युद्ध के रुपक में यहां मनुष्यमात्र की प्रतीति ही संदर्भित है.
   इस बात को समझने के लिए इस क्षण मेरे मन में हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास 'पुनर्नवा का एक प्रसंग उभर कर आ रहा है. उपन्यास में देवरात की पुत्री मृणाल सुमेर काका से पूछती है-

   ''लड़कियां इस अनाचार के उन्मूलन में कुछ हाथ नहीं बंटा सकतीं काका? पिताजी बता रहे थे कि विंध्याटवी में कोर्इ सिद्धपुरुष हैं जो देवी के सिंहवाहिनी और महिष्मर्दिनी रूप की उपासना का प्रचार कर रहे हैं. परंतु पिताजी कहते हैं कि लड़कियां सिंहवाहिनी की ही उपासना कर सकती हैं, महिष्मर्दिनी की नहीं.. केवल कविता में यह बात फबती है. ऐसा क्यों होगा, काका? सुमेर काका ठठाकर हंसे, ''तू पूछना चाहती है कि भैंसा अगर चढ़ दौड़े तो तेरी-जैसी लड़की को क्या करना चाहिए. तेरे काका का जबाब है, जो कुछ आस-पास मिल जाए उससे उस भैंसे को दमादम पीट देना चाहिए''.

    आमजन की भाषा में सोचें तो सुमेर काका यही कहते हैं कि मुसीबत आन पड़े तो उसका सामना करना ही करणीय कर्तव्य है. या कहें कि आ पड़े क्षण में लड़़ना भी पड़े तो वह मनुष्य का प्रकृत धर्म ही है. यहां मोह या संशय, विनाश को ही आमंत्रित करेगा. यहां तो जीवन का अस्तित्व ही खतरे में है. सिंहवाहिनी से प्रेरणा लेने तक तो अनर्थ हो जाएगा.
 

   इस युद्ध में कृष्ण अर्जुन से यही कह रहे हैं. हां वह यह अवश्य कहते हैं कि वह (अर्जुन) हर क्षण उसे (अस्तित्व को) स्मरण करता हुआ परिणाम को ध्यान में रखे बिना अनासक्त होकर लड़े. वह अस्तित्व की लीला का मात्रा एक निमित्त है.
   युद्ध छिड़ने के क्षण में युद्ध से विमुखता युद्ध से भाग खड़ा होने जैसा है-   ठीक भैंसा से बचने के लिए प्राण बचाकर भागने जैसा.  
   

युद्ध की कठिन घड़ी में अर्जुन का विषाद उसके अपने कुटुम्बियों के प्रति हुए उसके मोह से उत्पन्न हुआ. उसे लगा कि उसके लिए युद्ध से संन्यास लेना ही उचित होगा. जीवन जीने का यह भी एक मार्ग है. किंतु उसके मन में संन्यास स्यात् पूरी तरह स्पष्ट नहीं था. कृष्ण ने उसे बताया कि संन्यास कर्मों का त्याग अवश्य है पर वह ज्ञान को उपलब्ध हुए ज्ञानियों के लिए ही उपयुक्त है. यह संन्यास, योग भी है जो कर्मरत लोगों के लिए है. इसमें परिणाम की आकांक्षा किए बिना कर्म करना होता है. इसमें कर्म में तो आसक्त नहीं ही होना है, अकर्म में भी आसक्ति नहीं रखनी होती है. यही तेरे लिए करणीय कर्तव्य है. दुविध छोड़ो और युद्ध करो. यही मेरा निशिचत उत्तर है. यह देह तो एक भौतिक पिंड है. इसमें रहने वाला देही (आत्मा) न तो मारता है न ही मारा जाता है. यह एक देह से दूसरी देह में चला जाता है. तू भूलते हो कि तू मारोगे और तेरे भार्इ-बंधु मरेंगे. मैं तो पहले ही उन्हें मार चुका हूं. उनके लिए तेरा शोक करना व्यर्थ है.
 

   ओशो कहते हैं कि ज्ञानमार्ग यदि अर्जुन की समझ में आ गया होता तो गीता दूसरे अध्याय में ही समाप्त हो सकती थी.
  

गीता में उल्लिखित संजय को मिली दूरदृष्टि और कृष्ण का विश्वरूप दर्शन आज के मनस के लिए एक कुतूहलपूर्ण विषय हैं. पर ये तथ्य हैं-
 

  कृष्ण ने अर्जुन को अपना जो विश्वरूप दिखाया वह उनके द्वारा उसको दी गर्इ ध्यान की एक अचानक विधि थी. रामकृष्ण ने भी विवेकानंद को स्पर्श कर उन्हें ऐसी ही अनुभूति दी थी , निर्विकल्प समाधि की अनुभूति, विश्वरूप जैसी.
  

संजय के पास दूर-दृष्टि के होने के संबंध में गीता पर ओशो के प्रथम प्रवचन से एक उद्धरण उल्लेखनीय है:

    ''एक व्यक्ति है अमेरिका में. अभी मौजूद है, नाम है टेड सीरियो. उसके संबंध में दो बातें कहना पसंद करूंगा तो संजय को समझना आसान हो जाएगा. क्योंकि संजय बहुत दूर है समय में हमसे. और न मालूम किस दुर्भाग्य के क्षण में हमने अपने समस्त पुराने ग्रंथों को कपोल-कल्पना समझना शुरू कर दिया है. इसलिए संजय को छोड़ें..यह टेड सीरियो.. कितने हजार मील की दूरी पर कुछ भी देखने में समर्थ है. न केवल देखने में बलिक उसकी आंख उस चित्र को पकड़ने में भी समर्थ है.-ओशो.
 


पाठकों के अवलोकनार्थ श्रीमदभगवदगीता के प्रथम अध्याय का कुछ अंश:


हिंदी में पद्यान्वित                                                                                                                                श्रीमदभगवदगीता
पहला अध्याय
 
  इस अध्याय में धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय उन्हें युद्ध का हाल बताते हैं. पहले उन्होंने दोनों सेनाओं की व्यूहरचनाओं और योद्धाओं के नाम बताए. फिर युद्ध के छिड़ने के क्षण में दोनों ओर अपने संबंधियों को देख अर्जुन के विषादग्रस्त होने और युद्ध से विरत हो धनुष-बाण त्यागकर रथ में बैठ जाने की बात बतार्इ. अर्जुन अनेक लड़ाइयां लड़ चुका था. शत्रुओं को मारने से वह कभी नहीं हिचका. किंतु इस युद्ध में वह अपने संबंधियों को मारने से हिचक गया. उसे लगा उन्हें मारकर वह पाप का ही भागी होगा. अपने कुल के क्षय की बात सोच वह विषाद से भर गया और युद्ध से विरत हो गया. अर्जुन के इसी ममत्वजनित विषाद ने गीता को अंकुरित किया. 
                  
                            धृतराष्ट्र ने पूछा
   कुरूक्षेत्र  की  धर्मभूमि  में  जुटे युद्ध  की इच्छा  ले
   संजय!  मेरे  और पांडु के  पुत्रों ने  क्या किया कहो।1।
                   स्ंजय ने कहा                                
   व्यूह रचे  उस समय धीर  पांडव सेना को देख खड़ी
   जाकर समीप आचार्य द्रोण के कहा नृपति दुर्योधन ने।2।
   यह  देखें  आचार्य  व्यूह में रची  खड़ी  पांडव सेना
   जिसे  रचा है  द्रुपद-पुत्र ने  शिष्य  आपके  बुद्धिबली।3।
   इसमें  शूर  महान धनुर्धर भीम  और  अर्जुन-से  वीर
   सात्यकि और विराट,  द्रुपद  हैं महारथी व युद्धनिपुण।4।
   धृष्टकेतु व  चेकितान  हैं,  काशिराज  भी  पराक्रमी
   पुरुजित,  कुंतीभोज  और हैं  शैब्य वीरवर नरपुंगव1।5।                            
   पराक्रमी  यों  युधामन्यु,  सौभद्र,  उत्तमौजा  बलवान
   और  द्रौपदी-पुत्र   यहां  हैं, सभी  अगम  हैं  महारथी ।6।
   अपने दल में भी विशिष्ट जो जानें उन्हें द्विजोत्तम धीर!
   बतलाता  संज्ञार्थ  आपको   सैन्य-नायकों  को अपने।7।
   आप, भीष्म, संग्राम-विजेता कृपाचार्य व  कर्ण, विकर्ण
   सोमदत्त  का  पुत्र  भूरिश्रवा  और  वीर  अश्वत्थामा।8।
   और बहुत से शूर मेरे हित  त्याग  जीवनेच्छा  अपनी
   लड़ने को  हैं डटे यहां, वे  युद्धविशारद  शस्त्रनिपुण1।9।
   सैन्य हमारी  है अजेय यह  भीष्मपितामह  से रक्षित
   सुगम  जीतने में है पांडव-सैन्य  भीम से अभिरक्षित।10।

सुखद यात्रा

बस स्‍टाप पहुंचते ही यह जानकर खुशी हुई कि न बस छुटी है न हम। हमारे रेल की सुपरिचित सुव्‍यवस्‍थित गति की तरह बस भी समय से आधा घण्‍टा लेट चल रही थी। अच्‍छा है एक दूसरे की अच्‍छी आदतों को देख सीख कर प्रगति करने की कुचेष्‍टा करने में ही भलमनसाहत है। वहॉ बस की प्रतीक्षा में पहले से ही दो मेडमनुमा औरतें खड़ी खुसुर - फुसुर करती अपनी औरत जात होने का परिचय दे रही थी। वे कभी एक दूसरे का कंगन देखकर अपने कंगन घुमा घुमा कर देखती मिलती, कभी बालों को देखती सहेजती तो कभी दूसरे की साड़ी की धरी देख अपनी साड़ी की धरी ठीक करती। कुछ रूकती फिर वे एक दूसरे का सीना देख अपने सीने की ओर देखती। अब मै यह गंदी बात नहीं कर सकता कि वे अपने मंगलसूत्र का मिलान कर रही थी या सीने के उभार का।

मेरे साथ मेरे अतीत और भावी बच्‍चों की अम्‍मा भी थी। वह उनके बालों को एकाग्रचित्‍त हो देखने लगी क्‍योंकि इनके बाल इतने छोटे और विरल हैं कि इन्‍हें कुतरने वाले चूहे भी बदनसीब हो जाए। मैं उकताकर घड़ी देख ही रहा था कि बस आकर रूक गयी, ऐसा अक्‍सर मेरे साथ ही होता है। मैं लपक कर खाली बची मात्र दो सीट को रोककर पसर गया। मेरी एकमात्र धर्मपत्‍नी इधर उधर घूमकर मुआयना ली तब बैठी। यह उसकी आदत है। कहीं भी कभी भी वह अपने हमउम्र लड़कों को ऐसे बोकबाय देखती है कि मुझे भूल जाती है। पूछने पर बताती है कि वह मेरे साथ पढ़ा है जी। अब मैंने पूछना ही बंद कर दिया है क्‍योंकि मैं यह भली भांति समझ चुका हूँ कि संसार का हर एक उसका हमउम्र लड़का उसके साथ पढ़ा है। अब साथ साथ पढ़ने खेलने में बुराई के दिन नहीं रहे। थोड़ी दूर ही गये थे कि बस में तीन मेडम और कुछ यात्री और लद गए। अब खटारा बस में चार चांद लग गए। कोलाहल में इजाफा हो गया। मैंने देखा एक यात्री सन्‍यासी हो चला है। वह बस में चल रही बहसों, चिल्‍लपों, झमेंलो आदि के राग द्वेष से दूर खिड़की पर हवा के झोंके का आनन्‍द ऐसे ले रहा है जैसे खिड़की से आने वाली हवा, हवा नहीं परमात्‍मा का संदेश हो। उसके साथ तेरह चौदह साल का छोकरा थोड़ी सी जगह पर आधा कूल्‍हा टिकाये बकमुद्रा में तल्‍लीन बैठा था।

वैसे तो सामने सीट पर भी एक अधेड़ सो रहा था। वह ऐसे सो रहा था जैसे अपने बाप की गाड़ी से अपने चाचा की बारात जा रहा हो। उसे किसी भी प्रकार का डिस्‍टरबेंस पसन्‍द नहीं था। उसकी बगल में बैठा नवयुवक ऊँघते ऊँघते अपना सिर उसके कंधे पर दे मारता। वह नवयुवक जैसे उसकी नींद की नकल कर रहा था। वह एक दो बार सिर हटाया तब भी युवक नहीं चेता। इस बार फिर वही ! कोई कितना सहे आखिर। उस आदमी ने झल्‍लाकर उसे झिंझोड़ डाला और उसकी टोपी फेंक दी। वास्‍तव में उस अधेड़ को नवयुवक की मलमली टोपी से चिढ़ थी क्‍योंकि वह उसके पास नहीं थी। दुनिया की यही रीत है, मनपसंद चीज दूसरे के पास देखकर जलना, और किसी बहाने खीझकर अपनी जलन पर जल छिड़ककर शांति महसूस करना। दूसरी बात - आदमी जो स्‍वयं करे तो अच्‍छा है लेकिन वही कोई दूसरा करे तो अशोभनीय होता है। एक मेडम कुड़मुड़ाई ” देख न जिसे सीट मिल गयी कैसे सो रहे है ! हम लोग कितनी तकलीफ में है जरा भी सोच नहीं। ऐसे लोगों पर मुझे बहुत गुस्‍सा आता है।“ आये भी क्‍यों न। सभी मेडम सोते यात्रियों को ललचायी नजरों से ऐसे बोकबाय देखने लगी जैसे पाकिस्‍तान का गुलाम सुन्‍दरता की बेगम काश्मीर को देखता है। तभी एकाएक ड्राइवर ने जोर की ब्रेक मारी और खिड़की से झांकते हुए दादर से लेकर नगर हवेली और मादर से लेकर गॉव की कोठी तक की गालियॉ दे डाली। बस में हड़कंप मच गयी। सोते सब जाग गये लेकिन मेरी भागवान नहीं जागी उसका घोड़ा बिक कर रजिस्‍टर्ड हो चुका था। पता चला सामने ही बुद्धि विकास केन्‍द्र है। वहां से निकलता हुआ बिना किसी कोलाहल के हलक तक एल्‍कोहल में डूबा एक शराबी लड़ाकू विमान की तरह वातावरण की गड़बड़ी के कारण हमारे यान से टकरा गया था। वह तो बस के मंगलसूत्र ”ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे“ का सुप्रभाव था जो हम बाल बाल बच गये। ड्राइवर बड़बड़ाने लगा - देखा ! साला मर जाता तो लोग क्‍या कहते। ड्राइवर पीके चलाता है। ये जो पीके निकल रहे है इसका क्‍या ? ड्राइवर ने गाड़ी के साथ साथ बात भी बढ़ा दी। एक बार सड़क पर दो गोल्‍लर लड़ बैठे। मैंने बस खड़ी कर दी। वे रिक्‍शे में जा टकराये। रिक्शा, चालक और सवार दम्‍पत्ति सहित पलट गया। मैं सोच ही रहा था कि पुलिस इस केस पर कौन सी धारा लगाएगी। इतने में मेडमों का गंतव्‍य आ गया। नियमित यात्री को कंडक्‍टर ही नहीं ड्राइवर भी पहचानते हैं। वे अपने सामने लगे आइने से सबको देखते ताकते रहते हैं। भागमानी लोग नवरात्र पर्व में मंदिर जाकर बमुश्किल देवी दर्शन कर पाते है। ड्राइवर इसी शीशे से आठोंकाल बारहों माह देवी दर्शन करते रहते हैं।

वे कीर्तन गाते हैं ः-

यारों हमको चैन कहां, हर वक्‍त सफर में रहते हैं।

किस किस को नजर में रक्‍खे हम, हम सबकी नजर में रहते हैं।

उसने गाड़ी रोक दी। मेडमें उतर ही रही थी कि बस बंद हो गयी, जैसे उनसे बिछड़ने के गम में उसकी छाती धसकने लगी हो। किसी ने कहा - अरे ! इस ढपोरषंख बैल को भी यहीं बैठना था, ठीक से हॅांको ना भाई गाड़ीवान। लोगों के दांत एकाएक बाहर झांकने लगे। वहीं तीन टपोरी सवार हुए। उन्‍होंने चढ़ते ही नजरे घुमाकर बस का मुआयना किया कि लड़कियां या आंटी कहॉ पर है ताकि वही जाकर टाइमपास बकर किया जाय।

बस में बीचोबीच एक कमसिन मांगपर शादी का सनद, गले में पतिव्रता का शील्‍ड और तन को गृहस्‍थी के पुरस्‍कार स्‍वरूप पट्‌टे यानी साड़ी से लपेटे खड़ी थी। ये तीनों नौजवान वहीं हो लिये। व जताना चाह रहे थे कि हम लोग पढ़े लिखे है। जहां लिखित प्रमाण पत्र नहीं होता वहां भौतिक साक्ष्‍य मान्‍य होता हैं। एक ने बात शुरू की यार नौकरी चाकरी नहीं मिल रही है क्‍या करें समझ में नहीं आता। दूसरे ने गंभीरता ओढ़कर कहा - ”अब इधर तो आशा ही छोड़ दो सरकार सब पद समाप्‍त कर रही है।“ ”साला युद्ध भी नहीं हो रहा है। बढ़िया सेना में जाते। दो चार को मार नहीं सकते तो कम से कम मर तो सकते है इससे हमारे साथ परिवार समाज और देष सबका का भला हो जाता।“

तीसरा भला मुंह में पट्‌टी कैसे बांधे रहता। दार्शनिक अंदाज में उसने कहा -”लगेगी जरूर लगेगी लेकिन हमारी भर्ती होने तक युद्ध समाप्‍त हो जाएगा और हम लोग सीमा पर बैठ कर तंमाखू मलेंगे।

पहला तपाक से बोला - रक्षा विभाग में तो रोकड़ा ही रोकड़ा है। हम अच्‍छी अच्‍छी मिसाइलों तोपों की जगह उंचे किस्‍म के खिलौने खरीद लायेंगे।

और अच्‍छी क्‍वालिटी के बम की जगह दिवाली में फोड़े जाने वाले फुसका एटम बम खरीद कर सरकार को चूना लगायेंगे। पान का बीड़ा हम दबायेंगे। और वे एक साथ दांत निपोर कर यह जताने लगे कि हमने भी सुबह दाँत में झाड़ू पोंछा किया था। फिर पहला और तीसरा उस औरत कम कमसिन लड़की को ऐसे देखने लगा जैसे किसी के हाथ में रोटी देखकर कुक्‍कुर जीभ निकालकर होंठ चाँटते दुम हिलाते हुए झपट्‌टा मारने की फिराक में देखता है।

तभी कंडक्‍टर कांख कर पूछा- फलां गॉव वाला कोई है क्‍या और सीटी मार दी। बस रूक गयी , तीनों को अचानक झटका लगा । तीनों उतरे। वहीं एक महिला शिशु को गोद में लिए चढ़ी। साथ में एक अंगरक्षिका जिसे हम द्धापर युग में मंथरा के नाम से जानते थे , भी थी जो अपने दोनों हाथों में थैला लटका रही थी। उसने टिकिट क्‍या ली जैसे पूरी बस खरीद ली। बैठे हुए एक छोकरे से कहा -”ऐ थोड़ा हट जा न, बैठने दे बच्‍चा वाली है।“

कहॉ हटूँ माई इधर जगह हो तब तो हटूँ न!

यह हमारी भारतीय नारियों का सांस्‍कृतिक गुण है कि जहां काम नहीं बनता वहां उनका मुण्‍डा भसक जाता है और वे आंय बांय बकने लगती है।”थोड़ा खसक जाने से तेरा क्‍या जायेगा जैसे तू बस को खरीद लिया है। ....... बड़ा सीट वाला हो गया। .......... रूतबा झाड़ रहा है।“ छोकरे को गुस्‍सा तो आया लेकिन वह उसे बिना पानी के थूक संग लपेटकर निगल गया। वह समझ गया था कि यह काली केवल काली नहीं कराली, कण्‍डिका, चण्‍डिका, रण्‍डिका सब है। एक तो करेला और दूसरा नीम चढ़ा।

पास खड़ी औरत को मानो बल मिल गया। कहा -”अरे ये मरद की जात ही ऐसे होते है बैठ गये सो बैठ गये।“ औरत और बकरी की एक ही जात है। बात करने का बहाना चाहिए बस। दूसरी औरत के फूले मुंह पर जैसे फल लग आये-”उधर टाटा में महिला सीट पर कभी मरद नहीं बैठते। बैठे भी रहते है तो उठ जाते है।“ पीछे खड़े छोकरे ने बहती गंगा में हाथ धोने का शुभ अवसर जान हड़बड़ी में हाथ की जगह अपना सिर डुबो लिया। यह सोचकर कि ये मरद महिलाओं से भी गये गुजरे है। उसने परसाई जी के चाचा स्‍टाइल में कहा - ”यहां भी कहां मरद जात बैठे है ? इतना सुनते ही वह चण्‍डी गुस्‍से की छत पर जा बैठी और शो रूम से निकली नई मॉडल की चमचमाती कार की तरह चमचमाते अपने काले पीले दांत शो करते हुए गुर्रायी -”आँख नहीं बटन लगाये हो क्‍या ? ............ यहां कहां मरद जात। वह अब तब डस ही लेगी ऐसी फन्‍नायी हुई नागिन की तरह घूमकर आंख तरेरने को हुई कि उसके गुस्‍से पर एकाएक हिमपात हो गया। वह वही छोकरा था जिसके मुंह पर उस शिशु वाली बाई को देखकर और माथे पर उस काली की बात सुनकर पानी आया था। जिसने कम से कम इस सफर तक के लिये उस औरत की नजर में शिशु के पापा की जगह पर अपनी तस्‍वीर बिठाने की जुगाड़ में अपनी सीट दे दी थी। वह काली हें हें हें हें करती अपने कर कमल की पांचों उंगलियॉ सिर पर डाल खर्रस खर्रस खुजलाते हुए प्रायश्चित जतलाने लगी। उस छोकरे के अट्‌टहास पुरस्‍कार पाने की प्रबल इच्‍छा पर पानी फिर गया। उसकी इस असफलता पर अपने मौन की सफलता समझ मेरी कुटिल मुस्‍कान मेरे होठों पर ऐसे इतराने लगी जैसे प्रेम की इच्‍छुक लड़कियां अपने अवारा प्रेमी को मोहल्‍ले में मंडराते देख घर के अँगना दरवाजे पर मिटमिटाती है।

बस की गति धीमी हो गयी। कण्‍डकक्‍टर दरवाजा खोल अपना सिर पहले ही ऊॅट की तरह निकाल रखा था। अब गला फाड़ने लगा - कहॉ जाओगी ?

...............................। नीचे खड़ी बुढ़िया गॉव का कुछ नाम बतायी।

”अंय ?“ कण्‍डक्‍टर ने आँख मिचमिचाते हुए कान खड़े कर पूछा।

बस अभी रूकी भी न थी कि वह कूद पड़ा। दौड़ न कहते हुए उसने बुढ़िया का थैला वहीं फेंक दिया जहाँ उपर लिखा था - यात्री अपना सामान स्‍वयं संभाले। और उस बुढ़िया को बांह पकड़कर भीड़ में ठूँस दिया। बुढ़िया ऊँ .. आँ ... करती रही और हाथ पांव पसार कर मुंह फाड़े पैर फैला पसर गयी।

बस चल ही रही थी। दो लोग लड पड़े - ” ए पंगा नई लेना। क्‍या ?“

”तू बार बार क्‍यों धकियाता है ?“

” अरे भीड़ में धक्‍के नहीं तो क्‍या लड्‌डू मिलेंगे।“

”फला गॉव वाले बाहर आ जाओ भाई। कण्‍डकक्‍टर ने कांखकर दंगे को ठण्‍डा कर दिया।

यात्री उतरे चढ़े, गाड़ी बढ़ी, इधर दंगे वाली बात बढ़ गयी। कोई कह रहा था राम के नाम में इतनी शक्‍ति है कि पत्‍थर को पानी में तैरा सकता है। अब देखो न, नाम ही तो है जिसके कारण उसके भगत लोग मरकट लोग मर कट रहे है। हमें तुलसी की चौपाई याद आई - कलयुग केवल नाम अधारा। मिनट भर नहीं हुआ था कि बस रूकी ।

”मेरा एक रूपया”

अरे यार चिल्‍हर नहीं है कहां से लाऊॅगा ? चिल्‍हर लेके बैठा करो न।

मैं ही कहा से लाऊॅगा ?

तो मैं ही सबको चिल्‍हर देने के लिये ठेका लिया हूँ। है नई।

वह यात्री एक रूपया कम होने से आदमी के लेबल से नीचे उतर गया। और बड़बड़ाता हुआ नीचे उतरा कि एक रूपया खा लेगा तो आदमी नहीं बन जाएगा।

दो लड़कियां सवार हुई नीचे रक्षा विभाग का जवान अपनी जेब की सुरक्षा में चौकस आतुर भाव से पूछा - दो सीट ले जा सकते हो क्‍या ?

कण्‍डक्‍टर - नहीं भैया!

जवान - साहब का है।

अरे ले जा तो सकता हूं लेकिन सामने तो मेरा बाप खड़ा मिलेगा जीप में। न ?

कोई बात नहीं कहता हुआ वह जवान बिना किसी शरम के दरवाजा बंद कर जेब में हाथ डाले ऐसे खड़ा रहा जैसे मिशन समाप्‍त हो गया और उसकी फतह हुई हो। उसने लड़कियों के टिकट ले लिए।

दुनिया में एक से बढ़कर एक आदमी है। कोई बूढ़ा फटे नोट लेने से इंकार कर रहा था। कण्‍डक्‍टर ठंन्‍नाया तेरे लिये नये नोट छापते बैठा रहूं क्‍या ? ले धर और आगे बढ़। कण्‍डक्‍टर का घीसा पीटा सड़ेंला एक ही डायलॉग था जब वह पीछे दरवाजे पर होता तो कॉखता अरे आगे बढ़ो भाई। लोग आगे बढ़ जाते। आगे दरवाजे पर होता तब भी कॉखता आगे बढ़ो भाई और लोग आगे बढ़ जाते यानी पीछे खिसक जाते। सीधी बाई सबकी भौजाई। वह एक सीधे सादे देहाती छाप छोकरे को बार बार कहता - ये छोकरा ! तेरे को बार बार बोला न आगे बढ़, आगे बढ़ तू वहीं का वहीं खड़ा है।

ये डोकरी खिसक ना, यहां कहां मर रही है और उसने उस बूढ़िया की कमर पकड़कर धकिया दिया। बूढ़िया दई दई करती रहीं।

इंजन कब खराब हो जाए पता नहीं वैसे ही आदमी का भेजा कब भसक जाए कौन जाने ? अचानक बस में ब्रेक लगी ड्राइवर तमतमाया - ये बीड़ी बंद कर, लोगों को मार डालेगा क्‍या। इतने सारे लोगों को बीड़ी में तंमाखू बनाकर फूँकने की हिम्‍मत रखने वाले उस महानुभाव के दर्शन की उत्‍कट इच्‍छा से सब खुसुर फुसुर करने लगे। वह बीड़ी बाज तो बीड़ी फेंक चुका था सो हम उसे पहचान न पाए लेकिन बस में एक मंत्र जरूर पा लिया- धुम्रपान निषेध।

हमने देखा कि भीड़ की आड़ में एक नौसिखिया निमोछिया छोकरा अपनी हमउम्र छोकरी से चिपका संयोग श्रृंगार रस के आनंद में आकण्‍ठ डूबा हुआ था। यह दृश्य देख कर हमारे मन में भी संचारी भाव जाग उठा। हमने कंधे पर सिर रख सोई अपनी धर्मपत्‍नी को निहारते हुए उसका सिर सहलाया तभी वह गुर्रा उठी कभी तो सीधाई से बैठा कर, इसके अलावा कुछ और भी आता है तुम्‍हें। इतना सुनना था कि हमारा सारा जोश हवा निकले गुब्‍बारे की तरह फुसका हो गया। गनीमत है बस का टायर बचा रहा।

हम इधर उधर देखने लगे। एक आदमी खिड़की के पास बैठा बकरी से तेज कचर कचर चनाबूट खाये जा रहा था और छिलका वहीं फेंक रहा था। उसी के ऊपर सुन्‍दर अक्षरों में लिखा था - यहां गंदगी ना फैलाये। हमें अपना शहर याद आया और साथ ही भारतीय संस्‍कृति भी। लोग वहीं मूतते है जहां लिखा होता है - यहां पेशाब करना मना है। एक आदमी गिरगिट की तरह मुण्‍डी घुमा घुमाकर इसे उसे पूछता. ”कहॉ जाना है ?“ ये कहॉ जाना है ? एक ने उसी से पूछ बैठा - क्‍यों ?“ उसने कहा आसपास उतरते तो सीट मिलती और क्‍या ? क्षणभर में दोनो का मुंह गुपचुप की तरह फूल गया और वातावरण में चुप्‍पी छा गयी। अचानक कण्‍डक्‍टर कॉखा - खपरी वाले कौन कौन है भाई। हम उतरने की तैयारी करने लगे, तभी नजर पड़ी बस में सामने लिखा था - ईश्वर आपकी यात्रा सफल करे। और हम अपनी सुखद सफल यात्रा के लिये बस कम्‍पनी को धन्‍यवाद देते हुए उतर गये।

रचनाकार

धर्मेन्‍द्र निर्मल

ग्राम व पोष्‍ट ः कुरूद

चाय पे बुलाया है../ प्रमोद यादव

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“ शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है ”

बिना मतलब के कोई किसी को चाय पर नहीं बुलाता..( वैसे तो आजकल यह चलन ‘आउट डेटेड‘है..कोई चाय तो क्या पानी भी नहीं पूछता ) पर “इन्होंने” तो पूरे आवाम को एक साथ,एक ही वेन्यु में चाय पर बुलाया तो मतलब कुछ न कुछ नहीं बल्कि बहुत ही कुछ था..कहने को वे कहते रहे कि किसी ज़माने में वे भी चाय बेचा करते..इसलिए उन्हें मालूम है कि चाय की गुमटी या ठेला एक तरह से फुटपाथ का पार्लियामेंट होता है...दुनिया-जहान की सारी आवश्यक और अनावश्यक बातों की,राजनीति, धर्म, विज्ञान, सिनेमा, युद्ध, सीमा की ,पड़ोस की अनुपमा, साधना आदि की चर्चा केवल यहीं होती है..इसलिए देश की दशा, दुर्दशा, व्याप्त भ्रष्टाचार, सुराज-स्वराज आदि की चर्चा करने चाय की चौपाल को चुना..वे ये भी फरमाए कि चाय गरीबों का व्यापार है..( इतना तो सभी जानते हैं भाई....हम कहाँ कहते हैं कि टाटा या अम्बानी केतली लिए घूमते हैं ) आगे बोले कि सारे देश की जनता से एकमुश्त चर्चा करने चाय की गुमटी को चुनने का कारण इनसे बेपनाह मोहब्बत है.और इसलिए इन्हें सम्मानित करने का शौक चर्राया ..यह एक प्रयोग है..सार्थक हुआ( चुनाव जीते ) तो आगे और भी कुछ करेंगे..( अगला पड़ाव ‘ पानठेला ’ हो सकता है..पानठेले में भी वही सब चर्चा होती है जो चायठेलों में होती है..फर्क इतना है कि चाय ‘आगाज’ है तो पान ‘अंत’)

अब तक तो देश में दो ही तरह के चाय प्रसिद्ध रहे – रेलवे की चाय और नान-रेलवे चाय..पहली वाली चाय कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक जैसी,एक कीमत की –और बेहद ही बकवास - बेस्वाद..वहीँ दूसरी चाय (नान-रेलवे) विभिन्न स्वाद व महंगे दामों में ठेलों, गुमटियों, ढाबों, रेस्तराओं, थ्री-स्टार, फाइव स्टार में उपलब्ध होते हैं..अब ये तीसरी पोलिटिकल चाय का प्रमोशन-विमोचन हुआ है..इसका स्वाद तो वही बता पाएंगे जिन्होंने चुस्की ली....राजनीतिक चाय को हलक से उतारना हर किसी के बस की बात नहीं. और वो भी मुफ्त की...तो आइये- बात करते है..कुछ पीने और पिलानेवालों से..चाय की चौपाल पर.. सबसे पहले चलते हैं-कोलकाता ..

‘ हाँ भैयाजी.. सुना है आप पच्चीस सालों से यहाँ पार्टी कार्यालय के सामने पार्टी के लोगों को पिला रहें हैं..आप के पिलाये लोग आज भी राजनितिक पटल पर कई ऊँचे पदों पर पगलाए पसरे हैं..क्या इसके पूर्व कभी किसी बड़े लीडर.ने आपको इस तरह तवज्जो दी ? ‘

‘ नहीं साहब..बिलकुल नहीं..अपने आखिर अपने होते हैं..चायवाले का दर्द एक चायवाला ही समझ सकता है..’

‘ अच्छा..तो बताओ..इनसे आपको क्या उम्मीदें हैं ?’

‘ उम्मीद तो यही है साहब कि ये पी.एम. बनेंगे तो हमारा सालों से रुका रकम(उधार की चाय का) जो पार्टी वाले पी (डकार) गए हैं..हमें ईमानदारी से दिला देंगे..हम जब-जब भी मांगते हैं, ये देते जरुर हैं पर केवल धमकी.. कि तुम्हारी गुमटी गोल कर तुम्हे भी ‘गो-वेंट-गान‘ कर देंगे.. ‘

‘ ठीक है भैया ..आप “ पैसा वसूल “ कार्यक्रम जारी रखे..हमारी शुभ-कामनाएं..’ और मैं चलता बना.

इस बार पटना के प्रमुख इलाके के चौराहे पर स्थित चाय-स्टाल पर पहुँच मुफ्त की चाय पीते एक जजमान से पूछा-

‘ भाई साहब..देश की सबसे महंगी मुफ्त चाय कैसी है ?’

उन्होंने तपाक से कहा- ‘ मुफ्त की है इसलिए बढ़िया है..अब रोज तो मिलेगी ना ? ‘ जवाब के साथ उसने एक अदद प्रश्न भी उछाल दिया..एक के साथ एक फ्री की तरह..मैंने समझाया-

‘ रोज नहीं भैया..केवल अभी दो घंटे भर..रोज पिलायेंगे तो ये सड़क पे आ जायेंगे... फिर इन्हें तो कोई मुफ्त में भी न पिलाये....बताइए..आप केवल चाय पीने आये हैं या इनसे कुछ चर्चा भी चाहते है ?’

‘ हाँ..मैं कुछ जानना चाहता हूँ..’

‘क्या ?’

‘ यही कि ये पागलों की तरह सबको क्यों मुफ्त में चाय पिला रहे हैं ? ‘

मैं आगे और कुछ न सुन सका, भाग आया.

देश का दिल दिल्ली के एक चाय स्टाल पर पहुंचा तो वहां ग्राहक टाईप आदमी कोई न दिखा..सारे लोग नेता जैसे भेष में दिखे..हकीकत तो यही है कि सब पीने वाले नेता ही थे..जिसका स्टाल था वह बंदा लोगों को दौड़-दौड़ कर कप सर्व करते दिखा..मैंने पहला सवाल उसी को दागा कि आप मालिक होकर नौकरों की तरह क्यों सर्व कर रहे हो तो उसका जवाब था- ‘ क्या करें जी..दो घंटों के लिए उन्होंने इसे जबरदस्ती हायर(हाईजैक) किया है..पैसा देंगे भी या नहीं..कह नहीं सकता..इन सबका रिकार्ड तो आप जानते ही है- माले मुफ्त-दिले बेरहम ’ इन्होंने तो ये भी कहा है कि अगर प्रोग्राम फ्लाप हुआ तो एल.सी.डी. का भी पैसा तुमसे वसूलेंगे..’

‘ सचमुच..गन्दी बात..गन्दी बात....’ मैंने उसे सांत्वना दिया. फिर सवाल किया- ‘आपको अगर चर्चा का अवसर मिले तो क्या पूछेंगे ? ‘

‘ केवल यही कि हम चाय वालों ने उनका क्या बिगाड़ा ? दो घंटे बाद ये तो कूच कर लेंगे ..फिर हजारों टूट पड़ेंगे कि मुफ्त की चाय पिलाओ ..लोगों को समझाते-समझाते महीने लग जायेंगे. इस चौपाल के बाद पूरे चुनाव तक पार्टी वाले यूँ ही मुफ्त की चाय पिलाते रहेंगे तो हम चाय वाले खायेंगे क्या ?.. ’

उसका दुःख वाजिब था..

.फिर मैं एक नेताजी की ओर मुड़ गया..पूछा- ‘ नेताजी..इस चाय पार्टी से भला देश का कोई भला होने वाला ? ‘

वे मुस्करा कर बोले- ‘ देश का भला- आपका ठेका. ...हमने तो इस इवेंट का ठेका लिया है..दो घंटे बीतने को है... अब.करोड़ रूपये हमारी जेब में...समझे ? ‘

मैं बिलकुल समझ गया कि गयी भैंस पानी में....तभी एक सज्जन ने मुझे भी मुफ्त की चाय थमा दी.. दो चुस्की ले मैं वहीँ कुर्सी में झपक गया...दुसरे ही पल दुसरे लोक पहुँच गया.. अमरीका का व्हाइट हॉउस...ओबामा को देख मैं पुलकित हो उठा .. मैंने हाथ मिलाया तो उन्होंने भी गर्मजोशी से ‘शेक-हैण्ड’ किया..मैंने सीधे मुद्दे पर आते उनसे पूछा-

‘ओबमाजी.. क्या आप भी पोलिटिक्स में आने के पहले चाय बेचते थे ? ‘

वे उबल पड़े- ‘ वाट रबिश क्वेशचन ?..पूछना है तो कोई ढंग का पूछो.. व्हाई आर यू आस्किंग अबाउट ब्लडी टी..? ’

मैंने बताया कि इन दिनों मेरे देश के दो बड़े लीडर “ चाय-चाय “ का खेल खेल रहें हैं.. आवाम को बता रहे हैं कि कभी वे भी चाय बेचकर गुजारा करते थे..( फ़िलहाल इनका गुजर-बसर विमान और चापर में होता है..धरती पर पाँव भी नहीं धरते) आसन्न चुनाव के चक्कर में दोनों वोट बटोरने “ आम” बनने का चक्कर चला रहे हैं..

‘ आप क्या बोल रहे ..मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा....आई कांट अंडरस्टेंड ....’ ओबामा झल्लाए.

मैंने समझाया कि ये इलेक्शन के पहले पब्लिक को भरमा रहे हैं कि कभी वे भी उन्हीं की तरह आम आदमी थे..एक ने चाय की हांक लगाई तो दूसरा भी ‘हम किसी से कम नहीं’ के अंदाज में चायवाला बन गया.. वे भी देश को चीख-चीख कर बता रहें हैं कि उनसे पहले वे....वे बेचते थे चाय... अपने भाई के साथ...इसलिए आपसे पूछा कि क्या आप भी...?’

‘ नो..नो..हम पीते नहीं तो बेचेगा क्यों ?हमारे घर पानी ही नहीं होता तो कैसे बनेगा टी ? हम तो बचपन से ही बीयर-शेम्पेन पीते आये .. चाय की चुस्की कभी नहीं ली.. हमारे यहाँ पानी खूब महंगा.. दुकानों में बिकता है..सुना है आजकल तुम्हारे मुल्क में भी पानी बिकता है..गुड..वेरी गुड..खूब ..तरक्की किया..’ वे हो-हो कर हंसने लगे.

‘ सर जी..क्या आपने कभी इलेक्शन जीतने.. आम आदमी बनने.. कुछ बेचा ? ‘

‘ नहीं..हमने बेचा नहीं..बल्कि ख़रीदा.. बड़े लोग बेचते नहीं..केवल खरीदते हैं..’

‘ क्या ? ‘ मैंने चौंकते हुए पूछा.

‘ नहीं बताएगा..वेरी सीक्रेट ..सारी..’ वे चुप हो गए.

.एक पल के लिए हमारे बीच सन्नाटा पसर गया...मैं उस “सीक्रेट” के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक जोरों का शोर उठा.. टूटने-फूटने, गिरने-पड़ने, दौड़ने -भागने की आहट आई..कुछ समझ पाता कि “ धड़ाम’ की आवाज के साथ मैं कुर्सी से नीचे गिरा और झपकी से बरी हो गया..ओबामा का सीक्रेट- सीक्रेट ही रह गया....पता कर पाता तो देश के इन कर्णधारों को फ्री में “हैण्ड ओवर” कर देता...कम से कम देश वाले डांडियाखेडा जैसे फ्लाप शो की तरह “चाय-चाय” का यह बोरिंग गेम देखने से तो बच जाते..

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- प्रमोद यादव

गयानगर,दुर्ग,छत्तीसगढ़

साल

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-डॉ. मोहसिन ख़ान

भीषण गर्मी का माह था, चारों ओर के वातावरण में ऐसी आँच थी मानो कोई जंगल आस-पास जल रहा हो । पृथ्वी का हर हिस्सा सूर्य की प्रचण्डता से तापित और पीड़ित था । पक्षियों में अजीब सी व्याकुलता थी, किसी ठण्डी छाया में बैठकर अपना अव्यस्त दिन बिताने की, लेकिन भूख उनको सताती और वह पेड़ की डाल से नीचे आकर दाना चुगते और फिर पेड़ की डाल पर चढ़ जाते । सड़क पर कुछ ही लोगों का आना-जाना था और वे भी धूप से बचते, कतराते चल रहे थे । वाहनों में ताँगा, रिक्शा, टेम्पो अपनी गति में दौड़ रहे थे, जैसे वे भी सोच रहे हों कि ज़्यादा देर सड़क पर खडे़ रहे तो इस कोरताल के साँप के पेट में उतर जाना पडे़गा । शरद बाबू एक कस्बे में अपने मित्र के यहाँ उनकी पुत्री के विवाह-अवसर पर गये हुए थे, वहीं से लौटते हुए एक पेड़ की छाया में खडे़ होकर स्टेशन तक पहुँचने के लिये रिक्शा की प्रतीक्षा कर रहे थे । वे एक गाँव में मिडिल स्कूल के अध्यापक हैं, और स्वभाव से बडे़ ही उदार, विनम्र, मितभाषी और आदर्शवादी हैं । प्रतीक्षा में रत शरद बाबू एकाएक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रसित हो गये और सोचने लगे कि - “क्या मिला उन्हें यह सब करके, थोडी़ सी प्रतिष्ठा, थोडा़ सा मान । समाज में ऐसी गलित परम्पराएँ फैल रही हैं, इन्हीं झूँटे आयोजनों के कारण और यही मध्यम वर्ग इन्हें फैलाने में लगा हुआ है । यह झूँटे लोगों का झूँटा मान इन्हें ही रास होगा, जो यह सब मानते हैं । जैसे तुम खोखले हो वैसा ही तुम्हारा समाज भी खोखला है । भोजन और भोज्य पदार्थों पर इन लोगों ने अपनी भौतिक शक्ति, मान, प्रतिष्ठा और अहंकार की मोहर लगा दी है । जो यह सब नहीं करेगा समाज में प्रतिष्ठा नहीं पयेगा । कैसे लोग हैं भोजन को भी इन्होंने प्रतिष्ठा से जोड़ लिया । कैसे अनर्थी हैं यह सामाजिक जानवर ! आज सब ओर हाहाकार मची है पेट की भूख मिटाने को, वरना कोई किसी का गला क्यों काटता ? हम हमारी प्रतिष्ठा के आगे क्या-क्या कर रहे हैं, दूसरों की पेट की भूख को ही बढा़ रहे हैं, फिर उन्हीं लोगों से घृणा भी कर रहे हैं । विवाह में फिकता और बिगड़ता भोजन किसी भूखे के पेट में जाता.....। वाह ! शादी के नाम पर यह फ़िज़ूल ख़र्ची और यह झूँटा मान !”

एकाएक रिक्शा आती हुई दिखाई दी तो अपने अन्तर्द्वन्द्व बाहर आये और वास्तविकता में लौट आये । शरद बाबू रिक्शा को रुकने का संकेत करते हैं लेकिन सवारों की अधिकता के कारण रिक्शा रुकती नहीं है । शरद बाबू फिर से प्रतीक्षा में रत हो जाते हैं, थोडी़ देर में एक ताँगा आता हुआ दिखाई देता है लेकिन वह उसे रुकने का संकेत नहीं करते हैं और अनजाने बने खडे़ रहते हैं क्योंकि वह कभी ताँगे में नहीं बैठते हैं यह उनके आदर्शों के विरुद्ध है । उनका मानना है कि घोडे़ से इतने लोगों का बोझ खिंचवाना उस पर ज़ुल्म करना है । वैसे भी उस घोडे़ की हालत ऐसी थी जैसे कि वह जीने का मूल्य चुका रहा हो ! कुछ देर प्रतीक्षा के बाद शरद बाबू पैदल ही स्टेशन की ओर चल दिये ।

दोपहर का समय था, आतप भी अपनी चरम सीमा पर था, सड़क पर गढ्ढे थे और गर्मी से कोरताल की सड़क पिघल रही थी । गढ्ढे रूपी वह सड़क प्रत्यक्षत: सरकारी भ्रष्टाचार को दर्शा रही थी । शरद बाबू को बहुत प्यास लगी तो रास्ते में हैण्डपम्प पर पानी पीना चाहा लेकिन हैण्डपम्प खराब था । थोडी़ देर में वह स्टेशन पर पहुँच गये । स्टेशन पर पहुँचते ही ट्रेन का समय पूछा तो ट्रेन एक घण्टा पैंतीस मिनट विलम्ब से थी । अपनी कलाई की घड़ी को देखा तो ठीक एक बज रहा था । शरद बाबू को पानी की प्यास लगी थी, पानी की तलाश में प्लेटफ़ार्म पर निकले और लम्बे डग भरते हुए जल्दी से प्याऊ के पास पहुँचे । पानी पीने के बाद उनकी आँखों में चमक आई और चेहरे पर कुछ ताज़गी आई । ट्रेन काफ़ी देरी से आने वाली थी उन्होंने सोचा थोडा़ सुस्ता लिया जाए खा़ली बैंच को तलाशा और निढाल होकर वहीं बैठ गये । स्टेशन पर अभी मामूली सी चहल-पहल थी, कुछ देर के लिए उनकी आँख लगी ।

शरद बाबू की थोडे़ समय पश्चात् आँख खुली, टाईम देखा तो एक बजकर चालीस मिनट हो गये थे । ट्रेन का समय पूछने गये तो पता चला कि ट्रेन बीस मिनट औए देरी से आयेगी । अब ट्रेन एक घण्टा पचपन मिनट लेट हो गयी थी । शरद बाबू हाथ में बैग लिये इधर-उधर टहलते रहे, साथ ही पसीना पोंछते रहे । सब यात्री ट्रेन की प्रतीक्षा में थे, सभी की आँखें पटरियों पर दूर तक फैल जाती थीं । सभी यात्री अपने सामान के साथ तितर-बितर बैठे थे, कोई सुस्ता रहा था तो कोई पसीना पोंछ रहा था, तो कोई बीडी़ पी रहा था ।

तभी शरद बाबू की दृष्टि एक निरीह बालक पर पड़ती है, जो क़रीब चौदह-पन्द्रह वर्ष की आयु का होगा । सहसा दृष्टि पड़ते ही उनका मन पसीज गया, हृदय भारी हो आया, स्तब्ध हो गये और मन में एक गहन कारुणिकता पिघलकर उतर गयी । अभी वह पिछले अन्तर्द्वन्द्व से मुक्त हुए ही थे कि उस बालक को खाना खाते देखते हुए वही कटु दृश्य स्मृति में पुन: लौट आया । शरद बाबू अपनी जगह पर ही खडे़ होकर उस बालक को निहारते रहे पास पडी़ हुई बालक की चप्पल पर दृष्टि गयी तो उसकी चप्पल रंग, रूप, आकार में विपरीत थी जो कि अपने आप में साम्यता खोती थी, इस विपरीतता से उस बालक की लाचारी स्वत: ही उजागर हो जाती थी । उसके कपडे़ मेले, फटे थे और कुछ अस्त-व्यस्त भी थे । वह बालक खाना खा रहा था वह भी बडी़ ही तल्लीनता से, रोटी पर सब्ज़ी रखकर खाता रहा । खाना पूरा करने की बाद बचा खाना कपडे़ में बाँधा और पोटली बनाकर दीवार पर टँगी थैली उतारी और उसमें रख दिया । उसने एक प्लास्टिक की बोतल निकाली, पहले पानी पीया फिर हाथ धोए और दीवार पर अपनी थैली टाँग दी ।

शरद बाबू समझ नहीं पा रहे थे कि यह बालक कौन है और यह यहाँ क्या कर रहा है ? दीवार पर टँगी उसकी थैली संकेत दे रही थी कि वह उस जगह से परिचित है और यह उसकी रोज़ की दिनचर्या का ही हिस्सा है । बालक ने एक पानी से बाल्टी में से एक पानी का मग्गा निकला और टोकरे पर पानी छिड़का जिससे उस पर ढँका कपडा़ गीला हो गया । बालक ने उस कपडे़ को टोकरे से हटाया तो रहस्य का पर्दा भी हट गया, उस टोकरी में शहतूत थे । बालक ने पूरा कपडा़ गीला किया और शहतूतों को आधा ढँक दिया । उसने टोकरा उठाया और शहतूत बेचने के लिये प्लेटफ़ार्म के चक्कर लगाने लगा । जब बालक शहतूतों का टोकरा लेकर शरद बाबू के पास से गुज़रा तो उन्होंने उससे कुछ पूछने का मन बनाया लेकिन जाने क्या सोचकर चुप रहे । जब दूसरी बार वह बालक गुज़रा तो शरद बाबू ने पूछा-

“क्यों शहतूत कैसे दिये ?”

“आपको कितने के चाहिये ?”

शरद बाबू ने अपनी जेब से दो रुपये निकाले और शहतूत लिये । उस कस्बे के शहतूत काफ़ी प्रसिद्ध थे, और गर्मियों का वह एक फल भी है, इसीलिये वह बालक बेच रहा था । अब तो शायद ही कभी किसी को शहतूत बेचते हुए देखा जा सकता है और आज के समय में तो शहरों में शहतूतों के बारे में कोई जानता भी नहीं होगा । शरद बाबू ने बालक से प्रश्न किया -

“खाना खा लिया ?”

“हाँ बाबूजी ।”

“तुम्हारा नाम क्या है ?”

“किशोर ।”

“तुम कहाँ रहते हो ?”

“यहीं पास में ही बस्ती में ।”

“एक दिन में कितने रुपये कमा लेते हो ?”

“बीस, तीस, पैंतीस और कितने ।”

“तुम्हारा गुज़ारा हो जाता है ।”

“हाँ ।”

“तुम्हारे घर में और कौन-कौन है ।”

“मेरे पिताजी बस ।”

“वो क्या करते हैं ?”

“वो तो कुछ नहीं करते, बीमार हैं ।”

“क्या हो गया है उनको ।”

“क्या पता, वो तो दिनभर खाँसते रहते हैं, कभी-कभी उल्टी करते हैं तो खू़न भी आता है ।”

“तुम्हारी माँ कहाँ है ?”

“वो तो मर गयी, जब मैं छोटा था तभी मर गयी ।”

“खाना कौन बनाता है ?”

“मैं खुद बनाता हूँ, कभी ढाबे से ले आता हूँ ।”

“अब शाम को क्या बनाओगे ?”

“कुछ नहीं, वही सुबह का जो है ।”

शरद बाबू के मन में हलचल बढ़ती जा सही थी वे बडे़ ही द्रवित और कारुणिक होते जा रहे थे, उनका मन अजीब तरह से भारी होता जा रहा था । कुछ और अधिक पूछने का सामर्थ्य फिर उनमें न रहा । बालक भी अपना टोकरा उठाकर आगे चल दिया । बाबूजी को न जाने क्यों उसकी परेशानी विकल करती चली जा रही थी । उनकी सारी बातों का उत्तर तो उसने दिया था पर न जाने उनके भीतर उलझनें और छटपटाहट क्यों बढ़ती जा रही थी, वे समझ नहीं पा रहे थे । वे सोचते रहे कि बचपन में ही इसका बचपना छिन गया, बचपन क्या होता है इसे क्या मालूम ? बस अपने को ज़िन्दा रखने का सारा उपक्रम कर रहा है । परिस्थितियों ने किस तरह उसको चबाया है, उसका एक ही तो साया रह गया है उसका बीमार बाप ! इस विपरीत परिस्थितियों में उसने खु़द को कैसे सम्भाले रखा है ? कभी-कभी अबोधता में भी बडी़ शक्ति होती है और बोधता भी कभी निरर्थक सिद्ध हो जाती है । इसी अबोधता ने इसे इस काम की शक्ति दी है । व्यक्ति यदि अपनी परेशानी को समझने लगे तो वह परेशानियों से पराजित हो जाता है, यह नासमझी ही उसे कर्मरत और संघर्षशील बनाए रखती है । शरद बाबू अन्तर्द्वन्द्व में उलझे थे कि एक मालगाडी़ तेज़ गति से गुज़री तो उसने उन्हें यथार्थ का आभास करा दिया । उन्होंने घडी़ पर नज़र डाली तो दो बजकर तीस मिनट हो चुके थे । सब यात्रियों की आँखों मे प्रतीक्षा का भाव था लेकिन शरद बाबू का मन अब भी भारी था और उलझा हुआ था । अपनी उलझन को सुलझाने शरद बाबू उस बालक के पास पहुँचे और उससे पूछने लगे-

“बिक रहे हैं ?”

“हाँ थोडे़ बिके हैं ।”

“सब बिक जाते हैं ?”

“हाँ कभी-कभी ।”

“इतनी गर्मी में थकते नहीं हो ?”

“थकना तो पड़ता है, तभी तो रोटी मिलती है ।”

शरद बाबू उलझे-उलझे मानस में बालक के विषय में सोचते हैं कि आख़िर इसका आगे क्या होगा ? इस जैसे न जाने कितने बच्चे होंगे सबका क्या हाल है ! बालक ने शरद बाबू से पूछा-

“बाबूजी आप क्या करते हो ?”

“मैं स्कूल में पढा़ता हूँ, तुम्हारे जैसे बच्चों को ।”

“तुम स्कूल जाते हो ?”

“अगर स्कूल जाओ तो खाओ क्या ?”

“मेरे साथ चलोगे, मैं तुम्हें स्कूल में भरती कराउँगा और पढा़उँगा ।”

“नहीं पिताजी का ध्यान कौन रखेगा ।”

बालक की बातों ने शरद बाबू के मानस को झँजोड़ दिया, वे आहत ही खडे़ रहे ।

“बाबूजी ट्रेन आ गई ।” कहता हुआ बलक ने अपना टोकरा उठाया और चल दिया वही उसकी रोज़मर्रा की आवाज़ लगाते हुए । ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर लग गयी, शरद बाबू अन्दर जाकर बैठ गये, थोडी़ देर में ट्रेन ने विसल दिया, फिर उसी बालक की शहतूत बेचने की आवाज़ उन्हें सुनाई दी तो वह आवाज़ उनके भीतर को चीर गयी, उसकी आवाज़ आरी की तरह हृदय को घीसने लगी थी । वह भीतर से एक अजनबीपन के दुख से दुखी होते रहे थे और बालक की असहाय स्थिति से उनका दम घुट रहा था । वातावरण बोझिल हो गया था शरद बाबू की आँखें न जाने उस बालक को फिर क्यों तलाशने लगीं थीं । उस बालक के प्रति कुछ ही समय के उनके भावों ने उन्हें निढाल कर दिया था, उसके लिये कुछ न कर पाने की बाध्यता ने और बहुत कुछ कर पाने की चाह ने शरद बाबू के मस्तिष्क को रौंद डाला था । न जाने क्यों एक अपरिचित सा दुख उन्हें सालता जा रहा था, बालक के संघर्ष की गाथा ने उनका मन भारी कर दिया था । ट्रेन चलने लगी और बालक पीछे छूट गया प्लेटफ़र्म पर कहीं भीड़ में आवाज़ लगाता हुआ । पर आज भी शरद बाबू जब भी उस कस्बे के स्टेशन से गुज़रते हैं तो वही चेहरा, वही आँखें उनके सामने आ जाता है ।

डॉ. मोहसिन ख़ान

201, सिद्धान्त सी एच एस विद्यानगर

अलिबाग़-४०२ २०१

ज़िला-रायगढ़ (महाराष्ट्र)

 

ई-मेल-khanhind01@gmail।com

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