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रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - दौरे और उपहार

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व्यंग्यदौरे और उपहारडॉ. रामवृक्ष सिंहयह शीर्षक सुनने में हिन्दी फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ जैसा लगता है। दौरे और उपहार में क्या संबंध हो सकता है? इसे केवल वे लोग समझ सकते हैं जो सेवा में और खास तौर पर सरकारी सेवा में हैं। कोई व्यक्ति (वह ऊँचा अधिकारी और मंत्रालय/मुख्यालय का अदना-सा क्लर्क भी हो सकता है) आपके कार्यालय का दौरा करने आए तो मन में उठने वाला पहला विचार यही होता है कि उसे उपहार क्या दिया जाएगा? गोया बिना उपहार दिए दौरा पूरा ही नहीं माना जाए, या कि दौरे का मूल उद्देश्य उपहार बटोरना ही होता है, या फिर यह कि उपहार न दिया तो दौरा करनेवाला नाराज़ हो जाएगा और लौटकर अपनी दौरा रिपोर्ट में न जाने क्या अल्लम-गल्लम लिख मारेगा। सेवा में दौरों का कितना महत्त्व है, यह अपने वरिष्ठ जनों के दौरा-प्रेम को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। लेकिन दौरे से उपहार की जुगलबन्दी केवल स्वदेशी दौरों के संबंध में लागू होती है, विदेश दौरे तो अपने-आप में ही उपहार होते हैं- वह भी भारत की गरीब मुद्रा- रुपी में नहीं, बल्कि अमेरिका की अमीर मुद्रा यानी डॉलर में। कई-कई नौकरियाँ तो लोग दौरों के दौर देखकर ही करते हैं…

हनुमान मुक्त का व्यंग्य - चरित्रहीन

चरित्रहीन कितने ही लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होकर भी ‘चरित्रवान’ का तमगा लगाकर, सर उठाकर जी रहे हैं। जब भी वे पुलिस फाइल्स या क्राइम पेट्रोल सीरियल देखते होंगे, उनकी आत्मा अंदर तक झकझोर जाती होगी। जीवित रहते हुए उन्हें इस लोक में और मरने के बाद परलोक में उन्हें चैन नहीं मिलता होगा। मेरे एक मित्र हैं, वे किस श्रेणी के हैं, ये तो मुझे नहीं पता, लेकिन उनके ऊपर चरित्रवान का तमगा लगा हुआ है। जब भी कभी स्त्री-पुरुषों के सम्बन्धों की बात आती है, वे बहुत नैतिक बन जाते हैं। ज्यादातर मामलों में पुरुषों की गलती उन्हें नजर नहीं आती। वे कहते हैं, ‘आग दोनों ओर से लगती है। बिना महिला की सहमति के पुरुष आगे बढ़ ही नहीं सकता।’ जितने भी महिलाओं की ओर से पुरुषों द्वारा बहला-फुसलाकर महीनों से, सालों से दुष्कर्म करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, बिल्कुल गलत है। ये सब आपसी सहमति से ही हो रहा होता है। लेकिन महिला द्वारा पुरुष को ब्लैकमेल करने की गरज से ये मामले प्रकाश में आते हैं। मैंने उनसे पूछा, ‘आप यह सब इतने विश्वास के साथ कैसे कह रहे हो? आपके पास इसका कोई पुख्ता सबूत है?’ वे मेरी बात पर मुस्करा गए, जिसका मतलब …

सुशील यादव का व्यंग्य - आत्म चिंतन का दौर

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आत्म-चिंतन का दौर ....देश में आत्म –चिंतन करने वाले एक ख़ास वर्ग का सीजन शुरू हो गया है। वे लोग चुनाव नजदीक आते ही सक्रिय हो जाते हैं। तरह-तरह की चिंताएं उन्हें घेरने लगती हैं। देश उनको डूबता हुआ सा लगता है। वे अपने –अपने तरीके से वैतरणी इजाद’ करने में लग जाते हैं| कैसे देश को संकट से उबारा जाए ? इसकी नैय्या कैसे पार लगाई जाए? चिंतन का एक दौर चालू हो जाता है। तरह –तरह के व्यक्तव्य ,भाषण ,भाषण की शैली, भाषण के शब्द ढूंढे जाने लगते हैं।.बड़ी पार्टी वाले, करोड़ों का बजट लुटाने के पक्षधर बन जाते हैं। विज्ञापन के नमूनों पर घन्टों बहस छिड़ जाती है। हमारे देश में वैज्ञानिक पैदा न होने के कई कारणों में से एक यह चुनाव भी है। ’सोच’ की सारी ‘युवा-उर्जा शक्ति’ हर पांच साल में, एक बार इधर मुड़ी नहीं कि, तमाम ऊर्जा समाप्त। ’न्यूटन ,आइन्स्टाइन’ वाले देश में फकत, ‘साइंस’ हुआ करता था| इलेक्शन के एक भी पोस्टर उन लोगों ने ,उनके बाप-दादों ने कभी देखा ही नहीं । सेब के टपकने को उनने, कभी पडौसी मुल्क की करामात की संज्ञा नहीं दी। लाईट के, वेग –स्पीड को मापने के काम में,कतिपय , सरकारी रोड़े नहीं डाले गये ।अमेरिका क…

आशीष त्रिवेदी की लघुकथा - रंगीन टीवी

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रंगीन टी.वी. बात उन दिनों की है जब हमारे मुल्क में टी.वी. का प्रसारण कुछ ही  वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। रंगीन प्रसारण शुरू हुए तो कुछ माह ही हुए थे। तब घर में ब्लैक एंड वाइट टी.वी. होना ही बहुत शान की बात थी। रंगीन टी.वी. तो बिरले घरों में ही था। उन्हीं दिनों में आया था मेरा रंगीन टी.वी.। मेरे पिता एक सर्राफ की दुकान में एकॉउंटेंट थे। उनकी तनख्वा छोटी थी किन्तु मुझे लेकर उनके सपने बहुत बड़े थे। अतः मेरा दाखिला शहर के महंगे अंग्रेजी स्कूल में कराया था। उस स्कूल में अधिकतर धनाड्य परिवारों के लड़के ही पढ़ते थे। मेरे ग्रेड्स हमेशा ही सबसे अच्छे रहते थे। इसलिए शिक्षकों और सहपाठियों के बीच मैं बहुत लोकप्रिय था। किंतु जब वो अपने घर में खरीदे गए किसी महंगे सामान का ज़िक्र करते तो मैं उनसे कतराता था। क्योंकि मेरे पास उन्हें बताने के लिए कुछ नहीं होता था। उनमें से एक था बृजेश। उसके पिता एक बड़े कारोबारी थे। अक्सर विदेश आते जाते रहते थे। हर बार वहाँ से उसके लिए कोई न कोई महंगा खिलौना ज़रूर लाते थे।  बृजेश बहुत शान से उनके बारे में बताता था। ऐसे ही एक दिन रिसेस में ब्रजेश ने सब को सुनाते हुए कहा " …

यशवन्त कोठारी की लघुकथा - एक बूढ़ा और गिलहरी

लघुकथा    एक बूढ़ा   औऱ  गिलहरी  यशवन्त कोठारी तेज बर्फ गिर रही है। चारों तरफ  बर्फ का समंदर है। पेड़ो पर पत्तियों  पर सब तरफ बर्फ ही बर्फ। कभी रेत  का समंदर देखा था,फिर पानी का समंदर  और अब बर्फ का समंदर।  इस तेज बर्फानी  मौसम में सामने वाले फ्लेट में  एक बूढ़ा  नितांत अकेला ,रोज उसे देखता हूं ,केवल सिगार पीने  के लिए बाहर  आता है, उसे बाहर  देख कर दो गिलहरियां  इस मौसम में भी पास  आकर उसे टुकुर टुकुर तकती  हैं।  बूढ़ा  उन्हें मूंगफली के दाने  डालता है, गिलहरी दाने  लेकर भाग जाती हे बर्फ अभी भी गिर रही है।  बूढे  के एकांत अकेलेपन  उदासी  का सहारा बन गयी  है गिलहरी। एक चिड़िया भी आ गयी  है.  गिलहरी की आँखों  में चमक है,  बूढ़े  की आँखों में उदासी। आज गिलहरी को डालने के लिए कुछ  नहीं है। बूढ़ा ,गिलहरी  चिड़िया तीनो उदास हैं। बर्फ़   अभी भी गिर रही है।   यशवन्त  कोठारी  ८६  लक्मी नगर ब्रह्मपुरी बहार  जयपुर-२

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथा - कुहासा

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अध्यापक कभी अवकाश - प्राप्त नहीं होता , उसकी निवृति उसके व्याप्ति - सूत्र को अनन्त बनती है. ..........प्रोफेसर सेवक वात्स्यायन लघुकथा कुहासासुरेन्द्र कुमार अरोड़ा" मम्मी! एक बात तो पक्की है " बेटी की आँखों में चमक थी ." क्या ? " " मेरे पापा मेरी सभी सहेलियों के पापा से अच्छे हैं ." " वह कैसे ? " माँ के चेहरे पर मुस्कान थी . " पापा हमारी जरूरत की कोई भी बात हमारे कहने से पहले ही समझ जाते हैं और पूरी भी कर देते हैं .उनकी इच्छा है कि मैं खूब पढूं और बड़ी होकर खूब अच्छे काम करूं .........कई बार तो पापा स्व्यम तकलीफ में होते हैं और हमें बताते भी नहीं और हमारी परेशानी को हल करने में लग जाते हैं .रियली पापा इस ग्रेट .आई एम् प्राउड आफ हिम ." बेटी ने चहकते हुए कहा . " इतनी बड़ी - बड़ी बातें करने के लिए अभी तुम बहुत छोटी हो , समझीं . जाओ अपना होम - वर्क पूरा कर लो ." माँ ने बेटी को दुलारते हुए कहा . " ठीक है ! पर पहले मेरी पूरी बात सुनो ." " बोलो मेरी अम्मा ." " वो जो साक्छी के पापा हैं न , वे हर दिन ड्रिंक करते ह…

वीरेन्‍द्र सरल का व्यंग्य - योजना बहिन जी

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योजना बहिन जी वीरेन्‍द्र सरल वह क्षेत्र बड़ा खुशहाल था। लोग बड़े समृद्ध थे। लेकिन अचानक उस क्षेत्र को प्रकृति की नजर लग गई। वहाँ भीषण अकाल पड़ गया। लोग दाने-दाने के लिये मोहताज हो गये। माटी का मोह ऐसा था, जो उन्‍हें रोजगार के लिये पलायन करने से रोक रहा था। अकाल का समाचार अखबारों में प्रकाशित हुआ था। जिसे पढ़कर उस क्षेत्र का एक हारा हुआ नेता पहुँचा। उसके आने की खबर से वहाँ के लोग राहत की उम्‍मीद लिये भारी संख्‍या में उपस्‍थित हो गये। मगर हारा हुआ नेता तो मानो उनसे बदला लेने के लिये पहुँचा था। उसने कहा-‘‘देख लिया न हमें हराने का परिणाम। जब हमारी सरकार थी तो समय पर बारिश होती थी। पेड़ों पर रसीले ,मीठे और बड़े-बड़े फल लगते थे। खेतों में अनाज की सोने सी बालियाँ लहलहाती थी। अब भुगतो परिणाम, ये हमारी सरकार बदलने के कारण हो रहा है। हमारा मुर्गा खाये, हमारा दारू पिये और हमें ही हरा दिये। यदि हमें वोट देते, हमारी सरकार बनाते तो ये दिन देखने नहीं पड़ते। अब सब कान खोलकर सुन लो , जब तक हमें नहीं जिताओगे, तब तक यहाँ पानी बरसने वाला नहीं है। हमारी मर्जी के बिना तो पेड़ का एक पत्‍ता भी नहीं हिलता, पा…

गोवर्धन यादव का आलेख - आ गई महाशिवरात्रि पधारो शंकरजी

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सृष्टि की रचना का श्रेय ब्रह्माजी को, वहीं उसके पालनहार का श्रेय श्री विष्णुजी को और संहारक के रुप में भगवान शंकर को माना गया है. इस तरह प्रकृति का संतुलन बना रहता है. श्री विष्णु और श्री ब्रह्माजी अपने-अपने लोक में बडॆ ही वैभव के साथ रहते हैं ,जबकि शिव श्मसान में घूनी रमाये रहते है. वस्त्र के नाम पर उनके शरीर से व्याघांबर होता है. पूरे शरीर पर भस्म लपेटे रहते हैं. और गले में सर्पों की माला डली रहती है. उनके चारों ओर भूत-पिशाचों का जमावडा रहता है. वे पद्मासन लगाये पल-प्रतिपल राम के नाम का जाप करते रहते हैं. भययुक्त वातावरण में रहने के बावजूद भी उनके भक्तों की संख्याँ कम नहीं है. देवों के देव महादेव अपने भक्तों पर असीम कृपा बरसाने वाले देव हैं. वे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले देवता और अपने भक्तों को मनचाहा वरदान देने के लिए जगप्रसिद्ध हैं. महाशिवरात्रि का व्रत करने से उनकी कृपा और भी सघन रुप से उनके भक्तों पर बरसती रहती है.शिवरात्रि का अर्थ वह रात्रि है जिसका शिवतत्व के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है.या यह कहें कि शिवजी को जो रात्रि अतिप्रिय है उसे शिवरात्रिकहा गया है. रात्रि ही क्यों ? भगवान …

अरुण कुमार झा की लघुकथा - लिव-इन रिलेशन

लघु कथा लिव-इन रिलेशन ... अरुण कुमार झा [ यह एक काल्पनिक कहानी है। इसके सभी पात्र, स्थान और घटनाएँ काल्पनिक हैं जिनका किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति या किसी स्थान विशेष से कोई संबंध नहीं है। यदि किसी को ऐसी किसी भी प्रकार की समानता का भ्रम होता हो तो यह एक महज संयोग हो सकता है। ] मुझसे मत पूछिए,… हम नहीं बता पायेंगे। वह अब है नहीं, जो प्रेम के होने या न होने की तसदीक कर सकती थी। कौन जाने!... प्रेम है?… होगा?… नहीं है?… होता है?... बचपन में तो यही सुना था कि प्रेम बड़ी ऊँची चीज है। यह जीवन को जीने के काबिल बनाता है।...आसमान से भी बड़ा, रंग बिरंगी, इंद्रधनुषी परछाँई वाला । ... फिर, रुलाता क्यों है यह? पहला वाकया तब का है जब वह पहली बार मेरे घर आयी थी और मेरे सावन के झूले पर मेरे सामने पेंग मारने बैठ गई। मैं उसे देखता रहा, … रोकने, टोकने या मना करने की बात मेरे मन में नहीं आयी। ... उसकी उमर तब छह-सात साल रही होगी और मेरी यही कोई आठ-दस साल। दूसरा वाकया उन दिनों का है जब गाँव में आम के बगीचे में वह हमदोस्तों के साथ गिल्ली-डंडा तो कभी डोल‌-पात खेला करती थी। इन खेलों में जीत के लिए मेरे सिवा कि…

रवीन्द्र अग्निहोत्री का आलेख - हमारी अंग्रेज़ी!

हमारी अंग्रेजी हाल ही में देश में अंग्रेजी से संबंधित एक अभूतपूर्व घटना घटी. वैसे तो हमारे देश में जो भी घटना घटती है वह अभूतपूर्व ही होती है. संसद और विधान सभाएं तो ऐसी घटनाओं के लिए “ दुर्घटना संभावित क्षेत्र “ जैसी ख्याति अर्जित कर चुकी हैं. लिम्का बुक वाले चाहें तो उन्हें अपने रिकार्ड के लिए वहां भरपूर सामग्री मिल सकती है. यहाँ जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है, वह एक नहीं, कई दृष्टियों से अभूतपूर्व है. हुआ यह कि एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में हमारे वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्ण को झिड़कते हुए कहा कि आपकी अंग्रेजी मेरी समझ में नहीं आती. आप हिंदी में बोलिए जिसका अनुवाद करके मेरे अधिकारी मुझे अंग्रेजी में समझा देंगे. सुधीर कृष्ण एम एस-सी (फिजिक्स) हैं, एम ए (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) हैं, पी-एच डी हैं. दूसरे शब्दों में, उनके पास भारतीय विश्वविद्यालयों की दी हुई ऐसी कई अधिस्नातक डिग्रियां हैं जो बिना अंग्रेजी के नहीं मिलतीं. वे आई ए एस हैं जो अत्यंत प्रतिष्ठित नौकरी मानी जाती है. आज तो आई ए एस की परीक्षा और साक्षात्कार भारतीय भाषाओं में देने की अनुमति मिल गई है, प…

प्रमोद यादव का व्यंग्य - चाय कि दूध?

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चाय कि दूध ? - प्रमोद यादव “देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान् कितना बदल गया इंसान” अच्छा हुआ...कवि प्रदीपजी कूच कर गए..और अनाप-शनाप दिन देखने से बच गए..वैसे तो यह गीत उन्होनें पूरे संसार को लेकर लिखी पर अपने देश की पतली हालत से वे ज्यादा परिचित थे..उन्हें उम्मीद थी कि आगे हालात सुधरेंगे..इन्सान सुधरेगा..पर उनके जीवन-पर्यंत तो कुछ भी नहीं सुधरा..न देश न इंसान..अलबत्ता सब कुछ और जोरों से बिगड़ा और बदला ..वे होते तो ना जाने और क्या-क्या इंसान की फितरत पर.,.देश पर लिखते..उन्हीं के तर्ज पर किसी ने एक गीत लिखा- “ अम्मा देख..देख..तेरा मुंडा बिगड़ा जाए..अम्मा देख..देख..” इसका अर्थ (मेरे हिसाब से) यूँ है - “माँ भारती..देखो..भारतवासी कैसे बरबाद हो रहे ( सियासत के फेर में)...देखो...लोक-तंत्र नरक-तंत्र हुआ जा रहा.. देखो..वोट और नोट का चक्कर चल रहा.. प्रजा का दुःख-दर्द कोई समझ नहीं रहा...देखो..सब उसे खसोट रहे..लूट रहे... देखो... कोई पिला रहा चुनावी चाय तो कोई पिलाये दूध..माँ...देखो..” ‘ सुनते हो जी....’ पत्नी की तीखी आवाज ने हमेशा की तरह मेरे चिंतन को चिकोट दिया..अच्छा खासा मैं देश-दुनिया और …

प्रमोद भार्गव का आलेख - प्रसिद्धि के लिए कीर्तिमान बनाने की होड़

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प्रमोद भार्गव अकसर युवा, किशोर और बच्‍चे गिनीज बुक में नाम दर्ज कराने के लिए खतरों से खेलने का जोखिम उठाते रहते हैं। हाल ही में भिण्‍ड के मोहित दुबे ने लगातार 168 घंटे छात्रों को पढ़ाकर नया कीर्तिमान रचा है। इस रिकॉर्ड को गिनीज बुक अॉफ वर्ल्‍ड रिकॉर्ड में शामिल करने का दावा किया जाएगा। मोहित ने इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए भिण्‍ड के विद्यावती कॉलेज में अपनी कोचिंग के छात्र-छात्राओं को लगातार 168 घंटे पढ़ाया। इससे पहले पोलैंड के इरोल मोजवानी ने 121 घंटे लगातार पढ़ाकर साल 2009 में विश्‍व रिकॉर्ड बनाया था। हालांकि खतरों से खेलते बचपन पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय अंकुश लगाने की पहल कर चुका है। बावजूद सिलसिला थमा नहीं है। रातोंरात प्रसिद्धि पाने के लिए आजकल युवा और अधेड़ अटपटे करतब दिखाकर जान की बाजी दाव पर लगाने में लगे हुए हैं। जुनून की हदें तोड़ देने वाली होड़ में बच्‍चें और किशोर भी पीछे नहीं हैं। वर्तमान रिकॉर्ड तोड़ने की इन प्रतिस्‍पार्धाओं में रचनात्‍मकता कम मदारी किस्‍म का उद्‌दाम आवेश ज्‍यादा है, जो नया रिकॉर्ड कायम करने के दौरान जानलेवा भी साबित हो सकता है। मानवाधिकरों का हनन भी …

शेषनाथ प्रसाद का आलेख - गीता मेरी समझ में

गीता मेरी समझ में                                                                                                                                       

   गीता रुपक में कही गर्इ है. इसकी विषयवस्तु कुल इतनी है:
   कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने सामने खड़ी हैं.   युद्धारंभक शंख बज चुके हैं. अस्त्र-शस्त्र चलने ही वाले हैं. इसी क्षण अर्जुन धनुष-वाण उठाता है और कृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहता है. वह उन कौरवों को देखना चाहता है जो उससे लड़ने आए हैं. वह सबओर दृष्टि फिराता है. दोनों ही सेनाओं में उसे अपने ही संबंधी दिखते हैं. उन्हें  देखते ही उसके मन में ममत्व उमड़ आता है. उसके मन में होता है कि जिनके लिए वह राज्य, सुख, भोग चाहता है वे ही जीवन की आशा  छोड़कर यहा युद्धहेतु खड़े हैं. वह सोचता है कि अपने ही कुटुम्ब को मारकर उसे क्या मिलेगा. उनको मारने की कल्पना से ही वह कांप उठता है. उसका  मुंह सूखने लगता है, हाथ से गांडीव सरकने लगता है, मन विषाद से भर जाता है. वह अपना  धनुष-वाण त्यागकर उदासमन रथ में पीछे बैठ जाता है. अर्जुन का यह कृत्य…

प्रमोद यादव की श्वेत श्याम फ़ोटोग्राफ़ी - नारायणपुर मंडई

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नारायणपुर मंडई - श्वेत-श्याम चित्रों में / प्रमोद यादव

धर्मेन्‍द्र निर्मल का व्यंग्य - सुखद यात्रा

सुखद यात्रा बस स्‍टाप पहुंचते ही यह जानकर खुशी हुई कि न बस छुटी है न हम। हमारे रेल की सुपरिचित सुव्‍यवस्‍थित गति की तरह बस भी समय से आधा घण्‍टा लेट चल रही थी। अच्‍छा है एक दूसरे की अच्‍छी आदतों को देख सीख कर प्रगति करने की कुचेष्‍टा करने में ही भलमनसाहत है। वहॉ बस की प्रतीक्षा में पहले से ही दो मेडमनुमा औरतें खड़ी खुसुर - फुसुर करती अपनी औरत जात होने का परिचय दे रही थी। वे कभी एक दूसरे का कंगन देखकर अपने कंगन घुमा घुमा कर देखती मिलती, कभी बालों को देखती सहेजती तो कभी दूसरे की साड़ी की धरी देख अपनी साड़ी की धरी ठीक करती। कुछ रूकती फिर वे एक दूसरे का सीना देख अपने सीने की ओर देखती। अब मै यह गंदी बात नहीं कर सकता कि वे अपने मंगलसूत्र का मिलान कर रही थी या सीने के उभार का। मेरे साथ मेरे अतीत और भावी बच्‍चों की अम्‍मा भी थी। वह उनके बालों को एकाग्रचित्‍त हो देखने लगी क्‍योंकि इनके बाल इतने छोटे और विरल हैं कि इन्‍हें कुतरने वाले चूहे भी बदनसीब हो जाए। मैं उकताकर घड़ी देख ही रहा था कि बस आकर रूक गयी, ऐसा अक्‍सर मेरे साथ ही होता है। मैं लपक कर खाली बची मात्र दो सीट को रोककर पसर गया। मेरी एकम…

प्रमोद यादव का व्यंग्य - चाय पे बुलाया है...

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चाय पे बुलाया है../ प्रमोद यादव “ शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसीलिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है ” बिना मतलब के कोई किसी को चाय पर नहीं बुलाता..( वैसे तो आजकल यह चलन ‘आउट डेटेड‘है..कोई चाय तो क्या पानी भी नहीं पूछता ) पर “इन्होंने” तो पूरे आवाम को एक साथ,एक ही वेन्यु में चाय पर बुलाया तो मतलब कुछ न कुछ नहीं बल्कि बहुत ही कुछ था..कहने को वे कहते रहे कि किसी ज़माने में वे भी चाय बेचा करते..इसलिए उन्हें मालूम है कि चाय की गुमटी या ठेला एक तरह से फुटपाथ का पार्लियामेंट होता है...दुनिया-जहान की सारी आवश्यक और अनावश्यक बातों की,राजनीति, धर्म, विज्ञान, सिनेमा, युद्ध, सीमा की ,पड़ोस की अनुपमा, साधना आदि की चर्चा केवल यहीं होती है..इसलिए देश की दशा, दुर्दशा, व्याप्त भ्रष्टाचार, सुराज-स्वराज आदि की चर्चा करने चाय की चौपाल को चुना..वे ये भी फरमाए कि चाय गरीबों का व्यापार है..( इतना तो सभी जानते हैं भाई....हम कहाँ कहते हैं कि टाटा या अम्बानी केतली लिए घूमते हैं ) आगे बोले कि सारे देश की जनता से एकमुश्त चर्चा करने चाय की गुमटी को चुनने का कारण इनसे बेपनाह मोहब्बत है.और इसलिए इ…

मोहसिन खान की कहानी - साल

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साल-डॉ. मोहसिनख़ानभीषण गर्मी का माह था, चारों ओर के वातावरण में ऐसी आँच थी मानो कोई जंगल आस-पास जल रहा हो । पृथ्वी का हर हिस्सा सूर्य की प्रचण्डता से तापित और पीड़ित था । पक्षियों में अजीब सी व्याकुलता थी, किसी ठण्डी छाया में बैठकर अपना अव्यस्त दिन बिताने की, लेकिन भूख उनको सताती और वह पेड़ की डाल से नीचे आकर दाना चुगते और फिर पेड़ की डाल पर चढ़ जाते । सड़क पर कुछ ही लोगों का आना-जाना था और वे भी धूप से बचते, कतराते चल रहे थे । वाहनों में ताँगा, रिक्शा, टेम्पो अपनी गति में दौड़ रहे थे, जैसे वे भी सोच रहे हों कि ज़्यादा देर सड़क पर खडे़ रहे तो इस कोरताल के साँप के पेट में उतर जाना पडे़गा । शरद बाबू एक कस्बे में अपने मित्र के यहाँ उनकी पुत्री के विवाह-अवसर पर गये हुए थे, वहीं से लौटते हुए एक पेड़ की छाया में खडे़ होकर स्टेशन तक पहुँचने के लिये रिक्शा की प्रतीक्षा कर रहे थे । वे एक गाँव में मिडिल स्कूल के अध्यापक हैं, और स्वभाव से बडे़ ही उदार, विनम्र, मितभाषी और आदर्शवादी हैं । प्रतीक्षा में रत शरद बाबू एकाएक अन्तर्द्वन्द्व से ग्रसित हो गये और सोचने लगे कि - “क्या मिला उन्हें यह सब करके, थोडी़ स…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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