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पखवाड़े की कविताएँ

श्याम गुप्तग़ज़ल ज्ञान
ग़ज़ल की कोई किस्म नहीं होती है दोस्तों|
ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तों |

हो जिस्म से ग़ज़ल विविध रूप रंग की ,
पर रूह, लय गति ताल ही होती है दोस्तों |

कहते हैं विज्ञ कला-कथा ग़ज़ल ज्ञान की ,
यूं ग़ज़ल दिले-रंग ही होती है दोस्तों |

बहरें वो किस्म किस्म की, तक्ती सही-गलत ,
पर ग़ज़ल दिल का भाव ही होती है दोस्तों |

उठना व गिरना लफ्ज़ का, वो शाने ग़ज़ल भी ,
बस धडकनों का गीत ही होती है दोस्तों |

मस्ती में झूम कहदें श्याम ' ग़ज़ल-ज्ञान क्या ,
हर ग़ज़ल सागर ज्ञान का ही होती है दोस्तों ||
--------  पंचक श्याम सवैया ... ( वर्ण गणना  एवं पांच पंक्तियाँ )..
प्रीति  वही जो होय लला सौं जसुमति सुत कान्हा बनवारी |
रीति वही  जो निभाई लला हैं  दीननि  के दुःख में दुखहारी |
नीति वही जो सुहाई लला दई ऊधो कौं शुचि सीख सुखारी |
सीख वही दई गोपिन कौं जब चीर हरे गोवर्धन धारी |
जीत वही हो धर्म की जीत रहें संग माधव कृष्ण मुरारी ||शक्ति वही जो दिखाई कान्ह गोवरधन गिरि उंगरी पै धारो |
युक्ति वही जो निभाई कान्ह दुःख-दारिद ग्राम व देश को टारो |
उक्ति वही जो रचाई कान्ह करो नर कर्म न फल को विचारो |
भक्ति वही जो सिखाई कान्…

असगर वजाहत की कहानी - सूफी का जूता

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सूफी का जूता (1) पूरे हिन्दुस्तान में सूफियों की तलाश शुरू हो गई हैं। पुराने, अनुभवी और थोड़ा-बहुत अपने आत्म-सम्मान का ध्यान रखने वाले सूफी इधर-उधर छिप गए ताकि विज्ञापन कंपनियों के दलालों से बच सकें, जो उनकी तलाश में घूम रहे हैं। किस्सा ये है कि सूफियों को कई बड़ी भारतीय कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाना चाहती हैं। ‘बिजनस विजार्ड्स’ ने बताया है कि अमेरिका में सफल हो जाने के बाद हिन्दुस्तान में भी सूफी फार्मूला पूरी तरह कामयाब होगा। अमेरिका में सूफी फॉर्मूला इसलिए सफल हो गया था कि वहां लोग सूफियों के दर्शन, प्रेम, त्याग और मैत्री के बारे में कुछ न जानते थे और ये उनके लिए आकर्षित करने वाले शब्द बन गए थे। जबकि हिन्दुस्तान में दो पीढ़ियों पहले लोग इन शब्दों से परिचित थे और अब ये शब्द नई जनरेशन के लिए नोस्टैल्जिया बन चुके हैं। और उनकी जगह डिस्को संगीत में सुरक्षित हो चुकी है। (2) बहुत खोजने के बाद एक सूफी मिला जो विज्ञापन एजेंसी वालों से बचने के लिए डाकू बन गया था। उसे यह भ्रम था कि डाकू बनकर बच जाएगा। पर चूंकि सूफी था इसलिए डाकू बनने के बाद भी सूफी ही रहा और पकड़ा गया। इस सूफी को दिल्ली…

असगर वजाहत की कहानी - सदन में शहीदे आजम

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सदन में शहीदे आजम हमारे लोकतंत्र पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। लेकिन हमारे प्रतिनिधि इन हमलों को नाकाम कर देते हैं। हो सकता है कि हमारे प्रतिनिधि अपनी सज्जनता और भोलेपन के कारण पहले हमलों को न समझ पाते हों लेकिन जब समझ जाते हैं तो जान पर खेलकर लोकतंत्र को बचा लेते हैं। दुख और चिन्ता की बात यह है कि उनके जान पर खेलकर लोकतंत्र बचाने के प्रयासों की सराहना उन्हें स्वयं ही करनी पड़ती है। जबकि यह काम जनता का है, लेकिन जनता आजकल क्रिकेट मैच, भौंडे टेलीविजन कार्यक्रम शेयर मार्केट का उतार चढ़ाव, सोने का बाजार, प्रापर्टी की कीमतों में हेर-फेर, बिना किए करोड़पति हो जाने के सपने ही देखती है। खैर, हमारे जनप्रतिनिधि किसी बात का बुरा नही मानते। वे मानते हैं कि जनता को न बदला जा सकता है, न वे किसी देश में जाकर जनप्रतिनिधि बन सकते हैं। हमारे लोकतंत्र पर ताजा हमला एक बदबू ने कर दिया है। हमारे कर्मठ, समर्पित, प्रतिभावान प्रतिनिधि चाहते हैं कि सदन की कार्यवाही कम-से- कम साल में दो सौ दिन तो चले पर व्यवधान डालनेवाले इस कार्यवाही को समेटकर सौ से भी कम के आंकड़े पर खड़ा कर देते हैं। इन दिनों सदन की कार्य…

असगर वजाहत की कहानी - ताजमहल की बुनियाद

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ताजमहल की बुनियाद यमुना के किनारे जहां आज ताजमहल खड़ा है वहां ताजमहल बनने से पहले कई हजार बीघा उपजाऊ जमीन थी। यह जमीन बिलसारी, रगबड़ी चौखेटा और अनुगर गांव के किसानों की थी। इस जमीन पर गेहूं के अलावा मौसमी सब्जियों की शानदार खेती होती थी। गर्मियों में यहां जो खरबूजा होता था वह आसपास क्या दिल्ली तक मशहूर था। ककड़ियां और खीरे तो लाजवाब होते थे। तरबूज में तो लगता था किसानों ने अपना दिल रख दिया है, पानी की कमी न थी। दोमट मिट्टी को पानी मिल जाए तो सोना उगलती है। आगरा जैसी मंडी पास थी जहां राजा, रंक और फकीर सौदा देखते थे, मोल भाव न करते थे। पर भाग्य में तो और कुछ ही लिखा था। शहंशाह शाहजहां अपनी सबसे प्यारी बेगम मुमताज महल के लिए एक ऐसा मकबरा बनवाना चाहता था जो दुनिया में बेमिसाल हो। ‘‘लेकिन शहंशाहे आलम पानी तो इमारत की बुनियाद को कमजोर कर देता है।’’ उस्ताद अहमद लाहौरी ने दरबारे खास में हाथ जोड़कर अर्ज किया। ‘‘अहमद मकबरा तो जमना के किनारे ही बनना चाहिए...मैं चांदनी रातों में, उस मकबरे का अक्स जमना के पानी में देखना चाहता हूं।’’ जहांपनाह ने कहा। ‘‘हुक्मे सरकार।’’ उस्ताद अहमद खां लाहौरी ने जमीने…

असगर वजाहत की कहानी - नो रेडलाइट इन इंडिया

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नो रेड लाइट इन इंडिया अमेरिका से हार्वर्ड विजनेस स्कूल से एम.बी.ए.। आक्सफोर्ड से बी.ए.। किंग्स कॉलेज से हाईस्कूल। बीरु भाई का ये सब डिग्रियां देख कर हंसी आती है। लेकिन हंसी दबा लेते हैं, पी लेते हैं क्योंकि ये डिग्रियां उनके एकलौते बेटे रतन भाई रनवानी को मिली हैं। उन्होंने रतन की ऐसी एजूकेशन दी है और रतन ने ली है जो दुनिया की सबसे अच्छी बिजनेस एजूकेशन कही जा सकती है। ये डिग्रियां देखकर बीरु भाई रनवानी को क्यों हंसी आती है वे जानते हैं कि ये लड़के जितना जानते हैं इंटरनेशनल मार्केट के बारे में नए एरियान ऑफ बिजनेस के बारे में उतना बीरु भाई नहीं जानते। बीरु भाई तो गुजरात के गुमनाम से शहर रनवान से हाईस्कूल फेल हैं। लेकिन उन्होंने टाटा और बिड़ला को पीछे कर दिया है। उन्होंने कारपोरेट बिजनेस का नया व्याकरण रचा है। वे जिस तरह आगे बढ़े हैं वैसे तो आंधी और तूफान भी नहीं बढ़ते। उनकी बढ़त देखकर लोगों के होश उड़ गए थे। रनवान जैसी जगह का एक अवारा सा लड़का देखते-देखते दो सौ अरब का असामी बन बैठा था। -ये तुम लाल बत्ती पर गाड़ी क्यों रोक देते हो बीरु भाई ने अपने सबसे छोटे बेटे रतन से कहा। - डैड लाइट रेड…

असगर वजाहत की कहानी - दिल की दुनिया

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दिल की दुनिया मुझे यह अन्दाजा बिल्कुल नहीं था कि मैं बुढ़ापे में इतनी जल्दी ‘खिसक’ जाऊंगा। मैं तो ये सोचे बैठा था कि दांतों के दर्द और आंखों की कमजोरी से होता बुढ़ापा सबसे बाद में ‘भेजे’ तक पहुंचेगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। यह भी गजब है कि मैं अपने को भला-चंगा समझता हूं, लेकिन मुझे यह समझाया जाता है या ज्यादातर लोग मानते हैं कि मैं खिसक गया है। कभी-कभी बुढ़ापे में पता नहीं क्यों, चीजें गड़बड़ाने लगती हैं। कहा जाता है कि बूढे शक्की होते हैं। यह सच है। कहा जाता है कि बूढ़े चटोरे होते हैं। यह भी सच है। कहा जाता है कि बूढों की काम-वासना उनकी आखों और जबान में आ जाती है। यह भी सच है। लेकिन बुढ़ापे में मेरे साथ हो हुआ, वह आम-तौर पर होता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम। लोग कहते हैं कि बुढ़ापे में बहुत अजीब तरह से खिसका हूं। इसका सुबूत यह दिया जाता है कि मैं अखबार को उल्टा पढ़ने लगा हूं। उल्टा पढ़ने से मतलब यह नहीं कि पिछला पन्ना पहले और पहले का पन्ना आखिर में पढ़ता हूं। उल्टा पढ़ने का यह मतलब भी नहीं कि किसी घटना या सूचना आदि को उल्टा कर देता हूं। उदाहरण के लिए अगर खबर है कि सरकार ने अकाल पीड़ित जन…

असगर वजाहत की कहानी - कत्लेआम का मेला

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कत्लेआम का मेला आसमान का रंग इतना सुर्ख हो गया जैसे तपता हुआ इस्पात और लगा कि अभी कुछ ही सेकेंड में आसमान फट जाएगा और जमीन के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। हवा में जली हुई लाशों की बदबू शामिल हो गई और आसमान पर सफेद बादलों के डरे-सहमे टुकड़े अपनी जान बचाने की कोशिश में इधर-उधर छिपने की जगह तलाश करने के लिए भागने-दौड़ने लगे। लकड़ी का पुराना दरवाजा हल्की-चरचराहट की आवाज के साथ खुला। दरवाजे की आवाज ऐसी दर्दनाक थी जैसे किसी का दिल चीर दिया गया हो। दरवाजे के अन्दर पहले बूढ़े पिता का सिर आया। उलझे-उलझे बाल और अरस्तु जैसी दाढ़ी के बीच पसीने से भीगा काला चेहरा जो आंखों के बोझ को संभाल नहीं पी रहा था। सिर के बाद पिता ने कन्धे पर लदी जवान बेटे की लाश का लटका हुआ सिर अन्दर आया। आंगन में खड़ी बूढ़ी औरत, दो लड़के और एक लड़की बूढ़े को अन्दर आता देख रहे थे। बूढ़े ने अपनी परिवार की तरफ नहीं देखा क्योंकि वह जानता था कि बताने के लिए कुछ नहीं है और ये जो सामने खड़े हैं सब जानते हैं। धीरे-धीरे बूढ़ा कन्धे पर जवान बेटे की लाश रख अन्दर आंगन में आ गया। कच्चे आंगन के एक कोने में बेरी के पेड़ से बंधी बकरी बूढ़े को …

असगर वजाहत की कहानी - यहाँ से देश को देखो

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यहां से देश को देखो चांद और जमीन के बीच से देखा जाए तो यह लाखों मील चौड़ा जमीन का हिस्सा है जहां धरती फटकर चीथड़ा-चीथड़ा हो गई है। इस कोने से उस कोने तक जमीन में दरारें ही दरारें दिखाई देती हैं। सूखी हवा का तांडव बेरोक-टोक जारी है। आबादियां मिट्टी में मिल गई हैं। और सिवाय निर्जीवता के कुछ और नहीं है। मौत के डरावने तूफान उठते हैं और लोगों को अपने साथ उड़ा लेते हैं। जो अकाल मौत का शिकार हो जाते हैं उनकी आंखें और हाथ उधर पास की उड़ती हुई रोटियों का पीछा करते हैं। और थककर ठहर जाते हैं। लाखों करोड़ों सूखे हाथ और निर्जीव आंखें। ऊपर आसमान में अचानक नीली छतरी और सफेद बादलों को चीरते हेलीकॉप्टर इस तरह नीचे आते दिखाई पड़ते हैं जैसे सीधे स्वर्गलोक से आ रहे हों। विशाल, विकराल दैत्यनुमा हेलीकॉप्टर अपनी शक्ति और ताकत का सिक्का जमाते, अपनी श्रेष्टता और उत्कृष्टता को सिद्ध करते, अपने अधिकारों और सत्ता का प्रर्दशन करते नीचे उतर रहे हैं। उनके बड़े-बड़े पंख हवा को चीर रहे है। काले रंग का मजबूत इस्पात और आधुनिक कल-पुर्जे और नई तकनीक से बने हेलीकॉप्टर लगता है झपट्टा मारकर जी चाहेंगे अपने साथ ले जाएंगे, जह…

असगर वजाहत की कहानी - मेरे मौला

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मेरे मौला याचना, प्रेम, विनय और करुणा...यह सब क्या है...आंखों के सामने तस्वीर आ गई...मेरे मौला बुला ले मदीने मुझे...उलाहना...घिसे पिटे टेप से निकलकर आवाज कानों के परदों से टकराती लाखों-करोड़ों की भीड़ से गुजरती खलील मियां के चेहरे पर आकर कांपने लगती है और खलील मियां के मुंह से शाही किमाम की खुशबू में ध्वनि तरंगें घुल जाती हैं...क्या है यार...मेरे मौला बुला ले...आवाज की पिच बढ़ जाती है। मैं अपने को रोक नहीं पाता...आंखें बन्द हैं और खलील मियां के हाथों में कैंची और कंघा मेरे चेहरे पर तेजी से गश्त कर रहे हैं। ‘‘क्या हज करने का इरादा हैं..’’मैंने अश्लील मियां से पूछा...लहजे में जो छिपा हुआ व्यंग्य था, वे समझ नहीं पाए। खलील मियां सोच ही कैसे सकते थे कि कोई मुसलमान हज करने के इरादे को व्यंग्यात्मक स्वर में भी कह सकता है। ‘‘जब मौला चाहेंगे...अभी कहां हमारी सुनवाई हुई है।’’ ‘‘क्यों, क्या बात है’ ‘‘दो लड़कियों का ब्याह करना है, सर!’’ ‘‘कितने बच्चे हैं तुम्हारे’ ‘‘दो लड़के और माशा अल्ला से चार लड़कियां।’’ ‘‘हूं।’’ मैं खामोश हो गया। मेरी ‘हूं’ में क्या नहीं था... ‘‘लड़के क्या करते हैं’ मैंने फिर…

असगर वजाहत की दो कहानियाँ – वर्जित फल तथा लहर

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वर्जित फलपशु अधिकार आन्दोलनकारियों ने हजारों लेख लिखे थे, सैकड़ों प्रतिनिधि-मंडल राजनेताओं से मिले थे, बरसों आन्दोलन चला था तब कहीं जाकर पशु अधिकार आन्दोलन कार्यकर्ताओं ने यह अर्जित किया था कि योरोप के चिड़ियाघरों में बंद शेरों को जहां से उनके पूरखे लाये गये थे वहां ले जाकर छोड़ दिया जाये। लेकिन यह भी सरल न था क्योंकि कुछ युवा शेरों की यह तीसरी चौथी पीढ़ी थी जो चिड़िया घर के रमणीय वातावरण में डिब्बाबंद खाने और टेट्रापैक दूध पर परवान चढ़ी थी। अगर उनकी अचानक किसी सुबह अफ्रीका या एशिया के जंगलों में आंख खुलती तो अवश्य ही डर के मारे बेहोश हो जाते। इसलिए यह सोचा गया कि इन शेरों को उनके मूल स्थान पर ले जाकर छोड़ने से पहले उन्हें उन जंगलों और वहां बचे खुचे शेरों के जीवन के बारे में पर्याप्त जानकारियां दिए जाना जरूरी है संचार युग में यह कठिन काम न था। पहले दिन जब चिड़ियाघर के शेरों को उनके मूल स्थान के बारे में फिल्में दिखाई गयीं तो उसकी प्रतिक्रिया आशा के विपरीत थी। कुछ शेरों ने तो यह मानने से ही इनकार कर दिया कि वे वहां के मूल निवासी हैं। कुछ ने जब जंगली, बर्बर शेरों को अन्य निरीह पशुओं की हत्…

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अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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