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April 2014
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पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल 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श्याम गुप्त

ग़ज़ल ज्ञान
ग़ज़ल की कोई किस्म नहीं होती है दोस्तों|
ग़ज़ल का जिस्म उसकी रूह ही होती है दोस्तों |
 
हो जिस्म से ग़ज़ल विविध रूप रंग की ,
पर रूह, लय गति ताल ही होती है दोस्तों |
 
कहते हैं विज्ञ कला-कथा ग़ज़ल ज्ञान की ,
यूं ग़ज़ल दिले-रंग ही होती है दोस्तों |
 
बहरें वो किस्म किस्म की, तक्ती सही-गलत ,
पर ग़ज़ल दिल का भाव ही होती है दोस्तों |
 
उठना व गिरना लफ्ज़ का, वो शाने ग़ज़ल भी ,
बस धडकनों का गीत ही होती है दोस्तों |
 
मस्ती में झूम कहदें श्याम ' ग़ज़ल-ज्ञान क्या ,
हर ग़ज़ल सागर ज्ञान का ही होती है दोस्तों ||
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पंचक श्याम सवैया ... ( वर्ण गणना  एवं पांच पंक्तियाँ )..


प्रीति  वही जो होय लला सौं जसुमति सुत कान्हा बनवारी |
रीति वही  जो निभाई लला हैं  दीननि  के दुःख में दुखहारी |
नीति वही जो सुहाई लला दई ऊधो कौं शुचि सीख सुखारी |
सीख वही दई गोपिन कौं जब चीर हरे गोवर्धन धारी |
जीत वही हो धर्म की जीत रहें संग माधव कृष्ण मुरारी ||

शक्ति वही जो दिखाई कान्ह गोवरधन गिरि उंगरी पै धारो |
युक्ति वही जो निभाई कान्ह दुःख-दारिद ग्राम व देश को टारो |
उक्ति वही जो रचाई कान्ह करो नर कर्म न फल को विचारो |
भक्ति वही जो सिखाई कान्ह जब ऊधो को ज्ञान अहं ते उबारो |
तृप्ति वही श्री कृष्ण भजे भजे राधा-गोविन्द सोई नाम पियारो ||
 
हारि वही हारे घनश्याम तजे रन द्वारिका धाम सिधाए |
हार वही विजयंतीमाल लगै गल श्याम के अंग सुहाए |
रार वही जो मचाई श्याम जो गोपिन-गोप सखा मन भाये |
नार वही हरि सिन्धु-अयन ताही तें नारायन कहलाये |
नारि वही वृषभानु लली जो श्याम सखा मनमीत बनाए ||
 
नीर वही जो बहाए सखा लखि कंटक पांय सुदामा सखा के |
पीर वही जो सही उर माहिं भाई ब्रज छांडत राधा-सखा के  |
धीर वही जो धरे उर धीर ज्यों राधा धरी गए श्याम सखा के |
तीर वही प्रन देय भुलाय कें शस्त्र गहावै जो पार्थ-सखा के |
वीर वही नर त्यागे जग हो राह में भक्ति की द्रुपदि-सखा के ||
 


            ---- डा श्याम गुप्त ,के-३४८, आशियाना लखनऊ

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जसबीर चावला

यथास्थिति पर प्रहार करती जसबीर चावला की कविताएँ

मौन परंपरा
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ताड़पत्रों से लेकर सुंदर काग़ज़ तक
धर्मग्रंथों की जिल्दों में बंधा धर्म
धर्मग्रंथ चुप रहते हैं
वाचन चालू है
संगमरमरी मूर्तियाँ
प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी ताकती हैं अपलक
प्राण का स्पंदन नहीं
सूत्र चक्र चल रहे
बुद्ध मौन
कैसा भी हो अत्याचार
सन्नाटा नहीं टूटता
पता नहीं चर्च में घंटिया क्यों बजती हैं
किसकी अंतिम बिदाई के लिये
'फार हूम दि बेल टॉल्स'

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चौथी क़सम
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लड़कपन में चुपके से पढ़े
किसी की डायरी के पन्ने
ज़िक्र कई बार था क़सम खाने का
याचक आत्मग्लानि का
क़सम टूटने का
'आज फिर बीड़ी पी'
'नहीं पियूँगा अब'
ईश्वर माफ़ करे शक्ति दे

फ़िल्म 'तीसरी क़सम' देखी जवानी में
राजकपूर को क़समें खाते देखा
तीसरी क़सम वहीदा से जुदाई के बाद
बैलगाड़ी में नहीं बैठायेगा
किसी नौटंकी की बाई को
कसमों का सिलसिला जारी रहता
फ़िल्म ही समाप्त हो गई

ख़बरों की बदबू देख क़सम खाई
टीवी न देखने की
न अख़बार पढ़ने की
रिमोट को भी छुपाया अपने आप से

पता नहीं क्यों सूरज निकलने से पहले
सचेत हो जाते कान
बरामदे में धम्म की अखबारी आवाज़ के लिये
क़दम उठ जाते
हाथ खोया रिमोट ढूंढ लेते
झुँझलाता मन बदलने लगता चैनल रोज की तरह
लहूलुहान कर लेता
व्यसनी हो गया है
ईश्वर माफ़ कर
शक्ति दे

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पाँचों उँगलियाँ घीं में
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मीडियाका स्वर्ण काल
बिकाऊ रीढ़
पुष्य नक्षत्र
धनतेरस
बरस रहा सोना
खबरों का अकाल

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उपयुक्त स्थान
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बहुत सिर चढ़ गया भगवान
थोड़ा करें किनारे
कम दुलारें

कहीं बस्ती में भेजें
इंसान बनायें
सिर से उतारें

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आओ मर्द बनें
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देश का वीरगाथा काल है
रोपेगें अश्वगंधा
किन्नर नहीं गा सकेंगे अब
'आग लगे तेरे अश्वगंधा के खेत में'
शिलाजीत की पुड़िया मुफ़्त
दिन फिरे चारण भाटों के
सबके दिन फिरें
विरुदावली गायेंगे

मर्द बनाने का काम जारी है
बालश्रमिकों का प्रवेश भी वर्जित नहीं

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कमरे में क्रांति
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तेरह बुलाये
तेरह ही आये
चिंतित हुए
फुसफुसाहट से ऊंचे स्वर तक गये
गुस्साये
अपनी ढफली बजाई
अपना राग अलापा
साम्राज्यवादी शक्तियों को ललकारा
चेतावनी दी
अलगाव वादियों से देश को सावधान किया
प्रस्ताव पास किया
कुछ ने वाकआउट किया
मोहल्ले में शंखनाद हुआ
सत्यनारायण की कथा का समापन हुआ

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इतिहास का परिहास
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सिकन्दर लौटा था पंजाब से वापस
इनका बिहार तक गया
भगतसिंह राजगुरू सुखदेव रहे लाहौर जेल में
इन्होंने अंडमान भेजा
तक्षशिला पाकिस्तान में आज भी है
बिहार में मिला इन्हें
इतिहास पर भारी परिहास
'मैं चाहूँ यह कहूँ मैं चाहे वह कहूँ मेरी मर्ज़ी'

मेरा टेसू वहीं अड़ा
खाने को माँगे दहीबड़ा

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देवताओं की तलाश
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हम थे कभी तैंतीस करोड़
तैंतीस करोड़ देवता
हम बढ़े करोड़ों में
एक सौ बीस करोड़ हुए
देवता सैकड़ों में ही बढ़े
उन पर बोझ बढ़ा
एक देवता
चार चार आदमी
बहुत नाइंसाफ़ी है
अतिरिक्त भार से लदे देवता हमें माफ़ करे
अब किस देव की उपासना करें हम
चाहिये कुछ और देवता
आओ कुछ पत्थर ढ़ूंढे
कुछ सड़कें कुछ चौराहे
कुछ नये देवता बनाएँ
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48,Adityanagar
A B Road
Indore 452001
chawla.jasbir@gmail.com
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मोतीलाल

ढूंढने की प्रक्रिया
जहाँ तक पहुंचती है
वो रास्ते बंद पड़े हैं
जो जाते थे मेरे गाँव में ।

यहाँ खिलते थे फूल
हर मौसम में
और गूंजती थी
चिड़ियों की मीठी चहचहाट
विशाल पीपल व बरगद के पेड़ों में ।

यहाँ बसती थी खुश्बू
फसलों की गरमाहट से
हर खेतों के कोख में
और गाये जाते थे गीत
भोली गोरियों के मधुर कंठों से
पनघट के पथ में ।

यहाँ सांझ ढले आती थी
रंभाती हुई गायें
धूल धुसरित मेड़ों से
और आंगन में
दीये जलाती मेरी माँ
तुलसी के चौबारे में ।

यहीं नहीं पहुंच पाती है
हमारे शहरों के रास्ते
रोजाना मनो मिट्टी
कागज में ढूंढा जाता है
और बंद कर दिया जाता है
वह फाईल
जिसे पहुंचना था मेरे गाँव में ।

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* मोतीलाल/राउरकेला
संपर्क:  बिजली लोको शेड , बंडामुंडा
          राउरकेला  - 770032 ओडिशा
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पद्मा मिश्रा


राने दोहे -नए सन्दर्भ में
जनमत के ये सारथी
सबक गये हैं भूल ,
आम कहाँ से खायेंगे,
जब बोया पेड़ बबूल,

हरियाली को निगल गई,
इस विकास की धार ,
सूनी आँखें देखतीं
अपत कंटीली डार --

लोकतंत्र के घाट पर ,
भई नेतन की भीर ,
धन-जन-बल ,चंदन घिसें,
तिलक देत ,सब बावन वीर ,
 
महंगाई की मार से ,
जनता है बेजार,
लोकतंत्र के देवता !,
अब तो सुनो हमार ,
 
कंकर-पत्थर जोरि के ,
ऊँचो महल बनाय ,
नीयत में ही खोट थी ,
अब जेल में रहन सुहाय,

धन-बल,-जन-बल,बाहु -बल,
और रतन -धन खान
जब आयक रछापा पड़त है,
सब धन धूरि समान ,
----------.

जागो मेरे देश!,,,,
थम गया ,
वादों -नारों नगाड़ों का शोर ,
खामोश हो गई -
अघोषित महाभारत की दुनिया ,
पर टूट रही है खामोशियाँ -
अंतर्मन की -
खामोशियों को टूटना ही होगा,
सुनो -अंतरात्मा की आवाज सुनो ,
कभी तो जागे यह अंतश्चेतना !
नहीं चाहते क्या ?
इस जागरण को मुखर होने दो,
बदल जाने दो सारी तस्वीरें,
तभी बदलेगा -समूचा परिदृश्य ,
उन तस्वीरों के बदले रंग -
उनका मौन रेखाचित्र ,
एक नई इबारत लिखेगा -
संवेदना की लेखनी से ,
मानवता के नाम --
जागो मेरे देश!,,,,

 

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सुशांत सुप्रिय

१. फ़र्क
                         ------------
                                         ---

मैंने बर्फ से
हाथ मिलाया
सुन्न पड़ गईं
मेरी उँगलियाँ

मैंने आग से
हाथ मिलाया
जल गईं
मेरी उँगलियाँ

मैंने राजनेता से
हाथ मिलाया
मेरा हाथ ही
ग़ायब हो गया

                          ------------०-------------

                            २. महा-गणित
                           ------------------

शून्य में शून्य जोड़ कर
शून्य से शून्य घटा कर
शून्य से शून्य को गुणा कर के
शून्य से शून्य को भाग दे कर
जो अंतिम महा-शून्य
हमारे समक्ष उपस्थित होता है
उसी का नाम राजनेता है

                          -------------०-------------

                             ३. जब आँख खुली
                            ----------------------

कल रात मैंने
एक सपना देखा
मगर वह कोई सपना नहीं था

सपने में मुझे
कुछ जोकर दिखे
लेकिन वे कोई जोकर नहीं थे

वहाँ सर्कस जैसा
माहौल था
किंतु वह कोई सर्कस नहीं था

वहाँ एक अमीर आदमी
लाया गया जो
वास्तव में कोई और ही था

वहाँ झक्क् सफ़ेद धोती-कुर्तों
और उजले सफ़ारी-सूटों में
कुछ जादूगर आए
जो असल में जादूगर थे ही नहीं

उन्होंने उस अमीर आदमी को
जोकरों की तालियों के बीच
देखते-ही-देखते
एक बीमार भिखारी बना दिया
लेकिन यह कोई खेल नहीं था

बहुत देर बाद
जब मेरी आँख खुली
तो मैंने पाया
कि वे सफ़ेदपोश
असल में राजनीतिज्ञ थे
और मेरी बगल में
जो बीमार भिखारी
पड़ा कराह रहा था
वह दरअसल मेरा देश था

                           ------------०------------

१. आश्चर्य
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आज दिन ने मुझे
बिना घिसे
साबुत छोड़ दिया

पृथ्वी अपनी धुरी पर
घूमते हुए
हैरान सोच रही है

                        यह कैसे हुआ
                        यह कैसे हुआ
                        यह कैसे हुआ

                          ----------०----------

                        २. निमंत्रण
                       ---------------

ओ प्रिय
आओ कोई ऐसी जगह तलाश करें
         जहाँ प्रतिदिन मूक समझौतों के सायनाइड
         नहीं लेने पड़ें
         जहाँ ढलती उम्र के साथ
         निरंतर चश्मे का नंबर न बढ़े
         जहाँ एक दिन अचानक
         यह भुतैला विचार नहीं सताए
         कि हम सब महज़
         चाबी भरे खिलौने हैं
चलो प्रिय
कौमा और पूर्ण-विराम से परे कहीं
जिएँ

                           ------------०------------

                      ३. हक़ीक़त
                     ---------------

हथेली पर खिंची
टूटी जीवन-रेखा से
क्या डरते हो

साप्ताहिक भविष्य-फल में की गई
अनिष्ट की भविष्यवाणियों से
क्या डरते हो

कुंडली में आ बैठे
शनि की साढ़े-साती से
क्या डरते हो

यदि डरना है तो
         अपने 'मैं' से डरो
         अपने बेलगाम शब्दों से डरो
         अपने मन के कोढ़ से डरो
         अपने भीतर हो गई
         हर छोटी-सी मौत से डरो
क्योंकि
उँगलियों में
'नीलम' और 'मूनस्टोन' की
अँगूठियाँ पहन कर
तुम इनसे नहीं बच पाओगे

-----.

१. डरावनी बात
                             --------------------
                                                     

एक दिन
मैं अपने घर गया
लेकिन वह मेरे घर जैसा
नहीं लगा

मकान नम्बर वही था
लेकिन वहाँ रहते
सगे-सम्बन्धी
बेगाने लगे

गली वही थी
लेकिन वहाँ एक
अजनबीपन लगा

पड़ोसी वे ही थे
लेकिन उनकी आँखें
अचीन्ही लगीं

यह मेरा ही शहर था
लेकिन इसमें
अपरिचय की
तीखी गंध थी

यह एक डरावनी बात थी
इससे भी डरावनी बात यह थी कि
मैंने पुकारा उन सब को
उन के घर के नाम से
लेकिन कोई अपना वह नाम
नहीं पहचान पाया

                        -----------०------------

                            २. इधर से ही
                          -------------------
                                                  

लुटेरे इधर से ही गए हैं
यहाँ प्रकृति की सारी ख़ुशबू
लुट गई है

भ्रष्ट लोग इधर से ही गए हैं
यहाँ एक भोर के माथे पर
कालिख़ लगी हुई है

फ़रेबी इधर से ही गए हैं
यहाँ कुछ निष्कपट पल
ठग लिए गए हैं

हत्यारे इधर से ही गए हैं
यहाँ कुछ अबोध सपने
मार डाले गए हैं

हाँ, इधर से ही गुज़रा है
रोशनी का मुखौटा पहने
एक भयावह अँधेरा
कुछ मरी हुई तितलियाँ
कुछ टूटे हुए पंख
कुछ मुरझाए हुए फूल
कुछ झुलसे हुए वसंत
छटपटा रहे हैं यही

लेकिन सबसे डरावनी बात
यह है कि
यह जानने के बाद भी
कोई इस रास्ते पर
उनका पीछा नहीं कर रहा

                       ------------०------------

                          ३. किसान का हल
                        -----------------------
                                                    

उसे देख कर
मेरा दिल पसीज जाता है
कई घंटे मिट्टी और
कंकड़-पत्थर से
जूझने के बाद
इस समय वह हाँफ़ता हुआ
ज़मीन पर वैसे ही पस्त पड़ा है
जैसे दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद
शाम को निढाल हो कर पसर जाते हैं
कामगार और मज़दूर

मैं उसे प्यार से देखता हूँ
और अचानक वह निस्तेज लोहा
मुझे लगने लगता है
किसी खिले हुए सुंदर फूल-सा
मुलायम और मासूम
उसके भीतर से झाँकने लगती हैं
पके हुए फ़सलों की बालियाँ
और उसके प्रति मेरा स्नेह
और भी बढ़ जाता है

मेहनत की धूल-मिट्टी से सनी हुई
उसकी धारदार देह
मुझे जीवन देती है
लेकिन उसकी पीड़ा
मुझे दोफाड़ कर देती है

उसे देखकर ही मैंने जाना
कभी-कभी ऐसा भी होता है
लोहा भी रोता है

                           ------------०------------

                              ४. यह सच है
                             -----------------

जब मैं छोटा बच्चा था
तब मेरे भीतर एक नदी बहती थी
जिसका पानी उजला
साफ़ और पारदर्शी था

उस नदी में
रंग-बिरंगी मछलियाँ
तैरती थीं

जैसे-जैसे मैं
बड़ा होता गया
मेरे भीतर बहती नदी
मैली होती चली गई

धीरे-धीरे
मैं युवा हो गया
पर मेरे भीतर बहती नदी
अब एक गंदे नाले में
बदल गई थी

उस में मौजूद
सारी मछलियाँ
मर चुकी थीं

उसका पानी अब
बदबूदार हो गया था
जिसमें केवल
बीमारी फैलाने वाले
मच्छर पनपते थे

                   यह दुनिया की
                   ज़्यादातर नदियों
                   की व्यथा है
                   यह दुनिया के
                   ज़्यादातर लोगों की
                   की कथा है

                           ------------०------------

                               ५. विडम्बना
                             ------------------
                                                    

तुम आई
और मैं तुम्हारे लिए
सर्दियों की
गुनगुनी धूप हो गया

तुमने मुझे देखा
और मैं तुम्हारे लिए
गर्मियों की
घनी छाँह हो गया

तुम्हें एक बग़ीचे की
ज़रूरत थी
और वह मैं हो गया

मैं तुम्हारी प्यास के लिए
मीठे पानी का
कुआँ हो गया

मैं तुम्हारी भूख के लिए
तवे पर फूली हुई
रोटी हो गया

सुस्ता कर
अपनी भूख-प्यास मिटा कर
तुम एक बार फिर
तरो-ताज़ा हो गई

और तब
मैंने देखा
तुम पूछ रही थीं :
" कहाँ रह गया
वह बेवक़ूफ़-सा आदमी
जो मेरी मदद करने का
दावा कर रहा था ! "

 

प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
         मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा
         ५१७४, श्यामलाल बिल्डिंग ,
         बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,
         नई दिल्ली - ११००५५
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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संगीता निषाद

प्रेम और विलाप
वे देख देख मोहे मुस्‍काते रहें    
हम दूर बैठे शरमाते रहे ।
लो आ गई है मिलन कि वो रात
आज है मोरे प्रियतम भी मोरे साथ ।
साथ ये कैसा था......................
पल भर ना रूके पानी के जैसा था
देश का आया उन्‍हें संदेश
वापस आ जाओ अपने देश
सुबह हुई ओ चले गये बार्डर पर
जब वो आये तो थे लिपटे एक चादर पर।
मैं ना रोई उस शहीद पर
जिसने दे दी जान अपनी जमी पर ।
मेरे प्रेम की कहानी लिखी
जीवन की एक डोर पुरानी दिखी।
आस पड़ोस का कोई गम ना था,
जो अपनों से मिले दर्द वो कम ना था
एक पल लगा मैं हारी जिन्‍दगी से
पर मिला हौसला मुझे मेरे जमीन से
लड़ी मैं अपनी तकदीर से
और जीती दुनिया मैंने इन हाथों की लकीर से
यही थी कहानी मेरी
जो लड़ी तो बनी जिन्‍दगानी मेरी 

 

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पूनम सिंह


डर लगता है मुल्क के जां निसारों से,
बेच खाने वाले वतन के जिम्मेदारों से,
नीचे से ऊपर तक रिश्वत के खूंटे हैं,
चपरासी से लेकर वज़ीर तक झूठे हैं,
सब के सब नेता बन जाते है बेईमान,
कुर्सी पे बैठते ही हो जाते हैं धनवान,
कोयला क्या ताबूत तक बैच खाया है,
जानवरों का चारा भी खूब पचाया है।

अब सुनो इन कहानी पुलिस वालों की,
वर्दी पहन के गुंडागर्दी करने वालो की,
महाना न मिले ऊपरी कमाई बहुत है,
आमदनी के पालते ज़रियात बहुत है,
अमीरों से लेकर फकीरों को लूटते हैं,
बच्चों से लेकर बेवाओं को चूसते हैं।

रास्तों पे मनचलों ने किया बुरा हाल है,
माँ बहिन का घर से निकलना मुहाल है,
बेटियों की इज़्जत सरेआम तार तार है,
इनकी हैवानियत पे शेतां भी शर्मसार है,
सबके दरमियां में सज़ा दो संगसार की,
खून की बूंद तक निचोड़ लो बदकार की,
बिना सज़ा के मुआशरा नहीं चलने वाला,
बिना फांसी चढ़ाए कुछ नहीं बदलने वाला,

बिना फांसी चढ़ाए कुछ नहीं बदलने वाला।

पूनम सिंह
आगरा
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विजय वर्मा

  उंगली पर  निशान

काम वाली बाई
वोट के दिन
काम करने नहीं आई।
हम सब ने सोचा
चलो अच्छा है
कुछ तो जागृति आई है
गरीब तबके  ने भी
प्रजातंत्र का महत्व समझा है
भले ही जीवन उसका ग़मज़दा है।
उलटी बेरा
वह काम करने आ गयी।
उसकी उंगली पर निशान देखकर
मेरी पत्नी हर्षा गयी।
क्यों,वोट  दे आई ? पत्नी ने पूछा।
तू वोट ज़रूर  दी है.
कहाँ दे पायी दीदी -----
बिगना के बाबू को
शराब पीने  से मना  की
तो उसने मेरी उंगली ' थुर ' दी है। 

V.K.VERMA.D.V.C.,B.T.P.S.[ chem.lab]
vijayvermavijay560@gmail.com

 

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चंद्रप्रकाश


अच्छा है समय का गतिमान रहना
भागता है समय तो भागने दो
समय कुलांचे भरता है , भरने दो
समय चीखता चिल्लाता है
चीखने चिल्लाने दो

अकुलाता है समय तो अकुलाने दो
समय विलाप करता है
तो सुनो समय का विलाप

अच्छा है समय का कुलांचे भरना
चीखना चिल्लाना
हांफना
और विलाप करना

बजाय इसके कि समय ठहर जाये
बजाय इसके कि समय गूंगा-बहरा और पंगु हो जाये
बजाय इसके कि समय कोमा में चला जाये
अच्छा है समय का गतिमान रहना

............................................................................

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सुरभि मिश्रा

नए मतदाता का संकल्प
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                            ---
मैं प्रसन्न हूँ क्योंकि मैंने आज किया मतदान
भारत की मैं एक नागरिक जो है बहुत महान

अपनी इच्छा के वश में ही मैंने बटन दबाया
प्रतिउत्तर में मुझको सुमधुर स्वर एक था आया

हम भारत के वीर सिपाही आगे बढ़ते जायेंगे
मातृभूमि की सेवा में हम हरदम क़दम बढ़ाएंगे ।

जमशेदपुर, झारखण्ड


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विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '

                     कभी
           चर्चा   का    विषय
        हुआ   करता    था   'नल '
               हो   एकमत
              सभी      सोचते
            इस      विषय    पर
                    किन्तु
        जब  से    आगये    वो
         खत्म    हो  गई     जैसे
      गली    की      अन्तरंगता   ही
      गंदा - पानी  दुविधा  बन   गया
                    सबकी,
    हर रोज  कभी  भी  हो  जाता ,
                  ' हो -हल्ला'
             ठहर  जाते  राहगीर
                चलते - चलते
              देखने       नज़ारा
               मेरी   गली    का
        लड़  रहे  होते    जब   सब,
                     'पानी'
               बेवाक   बढ़  जाता
             ढलान    की      तरफ,
      और  तोड़   देता    सभी  बंधन
        जो   बनाये  थे  इंसान  ने ...
              -कवि विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र '
कर्मचारी कालोनी , गंगापुर सिटी , स.मा.
00000000000000000
सीताराम पटेल

दिल
कभी कभी दिल खिलता है।
कभी कभी दिल मिलता है॥
खिलता है, दिल मिलता है,
कभी कभी सुख मिलता है॥
हम भी खुश तुम भी खुश,
लेकिन दुखिया सारा संसार।
हमारी चांदी तुम्‍हारी चांदी,
क्‍या करना है हमें बहार॥
लड़े मरे दुनिया हमें क्‍या,
हमें मिलता रहे बस प्‍यार।
खाते रहें हम हलवा पूरी,
भूखा सोये सारा संसार॥
********
सृष्टि का संगीत
सुनो सुनो ध्‍यान से सुनो
सृष्टि का संगीत
परिन्‍दों के कलरव से
निकल रहे हैं अनोखा धुन
मूक मैना भी आज हो रही है वाचाल
चूंकि प्रकृति आज बनी है दुल्‍हन
टिटहरी आज बजा रही है टिमकिड़ी
पिक फूंक रही शहनाई
कठफोड़वा बजा रहा मशान
झींगुर खींच रही है तान
चिंक चिंक फुदक फुदक
नाच रही है गौरेया
पड़कुलिया परेवना गर्दन
लचकाकर नाच रहे हैं हाय दैया
कांव कांव राग आलाप रहा काग
प्रकृति की आवाज को साज दे रहा पपीहरा
पी कहां पी कहां कहते ही आया पुरुष आकाश
दुल्‍हा के भेस में अति सुन्‍दर लग रहा है आज
प्रकृति और पुरुष का पाणिग्रहण होगा आज
पैकों पैकों का गाना गाकर
नाच रहा है मोर आज
फुलझड़ी सा उड़ रहे हैं कौंच का दल
सहजन सेमल सूर्यमुखी सरसों पलाश चार आम
के पुष्पों से पहनी है सतरंगी साड़ी प्रकृति खास
प्रकृति और पुरूष का पाणिग्रहण का कर दर्शन
हुलस रहा है आज जन जन का मन
                                          
00000000000000000

कैलाश यादव

                अमर-प्रेम
जिनके घर पर दर लगवाये, जिनको रोशन दान किये,
मेरे घर जब छाये अंधेरे, मैंने जब-जब उन्‍हें पुकारा,
चीत्‍कार मेरी सुनकर भी, आंख बंद कर सोये हुये,
जिसके दर से आस लगाई, उसने ही पट बंद किये।
   शायद महक जाये फुलवारी, शायद पुरवाई चल जाये,
   इसी आस में जाग रहा हूं, पवन वेग का कोई झोंका,
                     किसी सनम के पट खोल दे,
                      शायद फिर से आयें बहारें,
   कब से डोली सजी हुई है, श्रंगारित साजन बैठे हैं,
   इसी आस में जाग रहा हूं, शायद फिर आ जायें कहारें,
   शायद उनको याद नहीं अब, एहसां जो भी चंद किये,
   जिसके दर से आस लगाई, उसने ही पट बंद किये।
उम्‍मीदों पर दुनिया कायम, यही सोचकर सितम हैं झेले,
वरना इतना विष है जग में, विषधर सारे जग में फैले,
शायद प्रेम का अमृत बरसे, शायद विष सारा धुल जाये,
इसी आस में कब से बैठा, शायद अमर-प्रेम मिल जाये,
   जिनकी याद लिखे थे मुक्‍तक, जिनको अर्पित छंद किये
   शायद उनको याद नहीं अब, एहसां जो भी चंद किये,
   जिसके दर से आस लगाई, उसने ही पट बंद किये।

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अमित कुमार गौतम ''स्वतन्त्र''

पुकार

चलो!
तैयार हो जाओ
आगे बढ़ो!!
आ रही है!
सीमा से पुकार!!

तुम देश के जवान हो!
हिमालय कि शान हो!!
भारत माँ के लाल हो!
दुश्मनों के काल हो!!
आ रही है!
सीमा से पुकार!!

देश को चाहिए!
बलिदानों का राग!!
देखना है तकते!
कितना बाजुओं में है!!
आ रही  है!
सीमा से पुकार!!

एकता कि ललकार है!
तलवार धार दार है!!
अग्रसर होते जाना है!
विजयी तिरंगा लहराना है!!
आ रही है!
सीमा से पुकार!!


ग्राम-रामगढ न.२,तहसील-गोपद बनास,
     जिला-सीधी,मध्यप्रदेश,486661

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मनोज 'आजिज़'


(१ मई श्रम दिवस पर कविता)

सर्वोदय सन्देश
-------------------
                    ---

किसी देश को विकास पथ पर
ले जाने वाला मजदूर है
सबसे ज्यादा वही आजतक
लाचार, व्यथित, मजबूर ।

मंत्री, संत्री सभी मिलकर
उत्थान की बात करते हैं
हालत उनकी जस की तस है
दो जून रोटी को जूझते हैं ।

श्रम, श्रमिकों के समन्वय ही
नव-निर्माण की जननी है
उनकी बातें सब मिलकर अब
उदार भाव से करनी है ।

डींग हांकते कई लोग हैं
लेखक, नेता, संघ दुकानी
पास श्रमिक के कोई नहीं होता
जब मलिन होता उनकी जवानी ।

आएं, हम सब श्रम करें और
दिशा नयी भारत को दें
श्रमिक वर्ग में भेद न कर हम
सर्वोदय सन्देश जगत को दें ।

पता-- आदित्यपुर-२, जमशेदपुर
00000000000000000000000

 

सुशील यादव

नसीब में कहाँ था, सुर्खाब का ‘पर’ कभी
जिसे  समझते, खुशनुमा मंजर कभी

गुनाह को रहमदिल मेंरे माफ कर देना
मकतल गिर  छूटा  कहीं, खंजर कभी  

हमें हैरत हुई इन  ‘शीशो’ को देख के 
तराशा हुआ  मिल गया , पत्थर कभी
 
नहीं खेल! किस्मत.;  जहाँ में है आसा 
लकीर खिच, कब रुका है समुंदर कभी

तुझे टूट कर चाहने का इनाम ये
तलाश करते हैं, खुद को अन्दर कभी

शहंशाह मिटते हैं बस  आन पे साहब 
झुका के सर, जिया है क्या, अकबर कभी ?

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श्रीमती प्रेम मंगल 

               लोकतंत्र पर व्‍यंग्‍य
लोकतंत्र की परिभाषा को
क्‍या तुम जानो क्‍या पहिचानो
अम्‍बर से भी ऊंची है यह
समन्‍दर से भी गहरी है यह।
                वसुधाष्‍पर झान नहीं है किसी को इसका
                सात समन्‍दर तक भी प्रचार  है इसका  ।
हिन्‍दी भाषा में जनता का शासन अर्थ है इसका,
अपना अपना भाषण देना मर्म है इसका,   
जिसकी लाठी भैंस उसीकी धर्म है उसका,
लूट-खसोट कर माल बटोरना कर्म है इसका।
             तुम्‍हारी भूमि मेरी भूमि है,
             तुम्‍हारा माल मेरा माल है,
             मेरा माल मेरा कमाल है,
             इसके अन्‍दर मेरा कपाल है।
जहां चाहूं वहां ही मैं जाऊं,
जो चाहूं मै वह कर डालूं,
गांजा,भांग औ चरस मैं खाऊं,
संस्‍कारों को क्‍यों मैं अपनाऊं।
               शासन मेरा मेरे अपने लिये है,
                 नियम कानून मेरे अपने ही हैं ,
                 कहां का भ्रष्‍टाचार कहां का घपला,
                 मिलकर चलो नहीं कोई है  घपला ।
कमीशन नहीं मिला गर किसी को,
मसाला मिल जायेगा मीडिया को,
बढ़ाचढ़ा कर भरा जायेगा पेपर को,
मुख्‍य बना दिया जायेगा समाचार को।               
               लोकतंत्र है यहां सबकुछ चलता है,
               मिलजुल कर खानेवाला यहीं पलता है ।
                 

मानव जन्‍म की सार्थकता
जन्‍म मिला जब है मानव का ,
कर्म न कर ए बन्‍दे दानव का,
अच्‍छा गर कर सके न किसी का,
बुरा सोचना मत कभी किसी का ।
                       वफादारी गर निभा न सके जहां में,
                       तो जीना ना बन्‍दे तू गद्दारी में,
                       बहुत मुश्किल है नाम कमाना जहां में,
                       मिटती हस्‍ती है केवल इक पल में।
लेकर किसी से कोई बडा बनता नहीं,
देकर दान घर कभी खाली होता नही,
अपने लिये जीना तो मुश्किल है नहीं,
दूजों के लिये जीकर दिखाना आसान नहीं।
                          कन्‍स औ शकुनी ने बदनाम किया नाम मामा का,
                          कैकयी ने दुर्भाव दिखाकर आंचल गंदला किया सौतेली माता का,
                          हनुमंत ने सीना फाडकर विश्वास दिखा दिया रामभक्‍ति का,
                          मीरा ने प्‍याला पीकर जहर का दिखा दिया सच्‍चा प्‍यार श्याम का ।
नाम कमाना सच्‍चा  धर्म है मानव का,
सद्‌कर्मों से सिर ऊठाना फर्ज है उसका,
कर्ज चुकाना है वसु द्वारा किये गये पालन-पोषण का,
षुक्र्र्‌गुजार करना है छत देने हेतु अम्‍बर का।
                              भगतसिंह,सद्‌गुरु,सुखदेव गर नहीं बन सकते,
                              आदर्षों की पाती गर तुम नहीं लिख सकते,                          
                              सच मानो तुम जीवन अपने को सार्थक नहीं कर सकते,
                             धरा औ अम्‍बर का कर्ज कभी नहीं चुका तुम सकते।
जन्‍म मिला जब है मानव का ,
कर्म न कर ए बन्‍दे दानव का,
अच्‍छा गर कर सके न किसी का,
बुरा सोचना मत कभी किसी का ।         
श्रीमती प्रेम मंगल कार्यालय
कार्यालय पर्यवेक्षक
स्‍वामी विवेकानन्‍द ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्रयूशन्‍स
इन्‍दौर,  म. प्र.

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देवेन्द्र सुथार

शपथ-ऊर्जावान
अब मैँ जाग गया हूँ और
आज से ही नए जीवन की
शुरुआत करनी है।
अब मैँ कर्म क्षेत्र मेँ
उतकर संघर्ष करुंगा।
और किसी विजेता की तरह
संसार के सुख-ऐश्वर्य पर
अधिकार जमाऊंगा।
यह मोटर-कारेँ,बंगले,हीरे-मोतियोँ मेँ
परमात्मा ने मेरा हिस्सा भी रख छोडा है।
और मुझे कर्म करके
कठोर मेहनत करके
सूझ-बूझ से अपनी शक्तियोँ को जगाकर
मुझे अपना हिस्सा हक हासिल करना है।
----------.


सुबह-सुबह सपनोँ कि दुनिया से बहार आकर
अपनोँ मेँ खोना जाना
फिर वही पुरानी घाघर लेकर
पानी भरने जाना,पानी न मिलने पर
खाली हाथ लौट जाना
वही पुराने कागजोँ कि फाईल लेकर काम माँगना
किस्मत पर रोना फिर अकेले ही संभल जाना
घर लौटने से पहले माँ कौ लाचार पिता को बेचारा देख मरना
जिन्दगी से इतना डरना आश का तिनका तक खो जाना
जिन्दगी के इतने दुखोँ को हँसते हुए ह्रदय से विदा करना
और कहना तुझ जैसी भी है जिन्दगी पर तुझ पर मुझे नाज हैँ
पर मुझे तुझसे प्यार है प्यार है
---

हिन्दी की स्थिति
आज भारत की क्या
स्थिति हो गई है ।
हिन्दी तो केवल अढाई
शब्दोँ मेँ ही खो गई है ।
लोग अंग्रेजी बोलने मेँ
महसूस करते हैँ सम्मान।
जैसे हिन्दी मेँ बात करके
हो जाएंगे दो टके के इंसान ।
नमस्ते को छोड लोग
कहते है हैलो,हाय।
हाय ! जैसे उन्हेँ हो
कोई दु:ख असहाय।
माँ को तो कहते हैँ
मम्मी-मम्मी।
ममी जो जिन्दा होकर भी
जिन्दा नहीँ।
पिता को कर दिया
पूरी तरह डैड।
पराठोँ को छोड लोग
खा रहे है जैम और ब्रैड।
पारंपरिक नृत्य-गीतोँ का तो
चला गया जमाना।
लोग तो पसन्द करते है
डिस्को जाना,अंग्रेजी मेँ गाना गाना।
बच्चे सबसे पहले सीखते है
ए फाँर एप्पल,जे फाँर जीरो।
और समझते है
अपने आपको हीरो।
हिन्दी के माथे पर बिन्दी
बन गई उसका कलंक।
एक दो तो याद नहीँ पर याद है
सबको अंग्रेजी के अंक।
आने वाली पीढी जब
हिन्दी से नजर चुराएगी।
और बेतुकी बढेगी हिन्दी
कहकर इसकी हंसी उडाएगी।
तो हिन्दी किसकी
शरण मेँ जाएगी?
हिन्दी है हमारी मातृभाषा
जीवित रखे इसका स्वरुप।
नहीँ तो एक दिन हम
पहचान नहीं पाएंगे भारत का रुप।

देवेन्द्र सुथार बागरा जालोर राजस्थान

0000000000000000


सन्‍तोष कुमार सिंह


किसे चुनोगे ?
दाग लगे या साफ हैं।
किसके कितने पाप हैं।
किसे चुनोगे पहचानो अब,
मत के दाता आप हैं॥

जिस थाली में ये खाते हैं।
छेद उसी में कर जाते हैं।
इनका घड़ा भरा पापों से,
ये पापों के तात हैं॥

दुःशासन के ये अवतारी।
लगा मुखौटा बने भिखारी।
चीरहरण औ' सियाहरण ही,
इनके क्रिया-कलाप हैं॥

घूम रहे हैं कुशल मदारी।
इनके रक्‍त भरी मक्‍कारी।
पल-पल में ये रंग बदलते,
ये गिरगिट के बाप हैं॥

जनता को दुःख देने वाले।
कले धन के ये मतवाले।
ए0सी0 बिल से निकल आ गए,
अब जहरीले सांप हैं॥

जनादेश जब खण्‍डित पाते।
चुपके-चुपके हाट लगाते।
घोड़ों से ज्‍यादा कीमत में,
बिकते गधे-प्रताप हैं॥
- सन्‍तोष कुमार सिंह
कवि एवं बाल साहित्‍यकार
मथुरा।

0000000000000

अनुज कुमार


कविता : अनंतिम सत्य

थोड़े दिनों बाद मकड़ा बना चुका होगा,
अपना जाला,
उसका जाला उसके असीम धैर्य का परिचय होगा,
उस जाले की संश्लिष्ट बुनावट में अनेकों भयाक्रांत मकड़ों की मेहनत भी जुटी होगी.

तदोपरांत वह आमंत्रण भेजेगा और तमाम भ्रमित मक्खियाँ..हतप्रभ,
अपने बचे-खुचे छत्ते तहस-नहस कर,
धीरे-धीरे उसी जाले का शिकार होंगी,
जिसके भय से अब तक वे दुबके पड़ी थीं.
वह अब उनके दुःख हर लेगा.
वह जाला उनके अच्छे दिन वापस लाएगा.

मक्खियाँ अपनी धुन भूल चुकी होंगी,
वे जाने-बूझे भूल चुकी होंगी अपना पथ
...जिससे होते आयी थीं वे इस जाले की तरफ,
मकड़ा अपने अकड़ में अकड़ा ही रहेगा,
वह अपने मद में चूर थूक में भर रहा होगा
...थोड़ी और चिपचिपाहट, थोडा और लिजलिजापन
मक्खियाँ अपने ख़त्म होने को असुरक्षा बोध से ज्यादा प्रीतिकर मान चुकी होंगी.
उनमें हिचकिचाहट लेशमात्र न होगी.
अपने दोहन का उनमें कोई मलाल न रहेगा.


ये जो दिल है, माना समूचा मेरा है,
पर इसका आधा हिस्सा तुमसे अटा हुआ है,
इस कारन दो हिस्सों में बंटा हुआ है,
मात्र यह एक विभाजन है,
जिसमें सुख ही सुख है,
कहीं कोई मुटाव नहीं है, कहीं न कोई कटा हुआ है....
इतनी तू-तू-मैं-मैं लेकिन, हर उन्स में प्रेम पगा हुआ है
साथी मेरे...
आधा हिस्सा जो तुमसे पटा हुआ है,
इस कारन जीवन जुटा हुआ है.
-----------------एक सादी प्रेम-कविता---------------------

 


कविता : प्रेम-गणित

बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
उसके ऐब क्या गिनाऊं,
एक उत्कट उत्कंठा भर जाता है हर रोज़,
हर रोज़ उसकी खुश्बू मैं घर भर में बिखेरते रहती हूँ,
और उसके विछोह की मात्र निशानी,
मेरे कटे होंठों पर जमी लाली की पपड़ी है..

बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
उसका इंतज़ार जैसे सदियों सा,
जैसे उसे गए अरसा हुआ,
जैसे शाम के बदले वह दोपहर आ धमके,
मुझे रसोई के कोने से निहारता रहे,
मेरे बालों को पसिनाये चेहरे से हटाये,
होंठों की पपड़ी हटाये, और कहे बहुत बुरा हुआ...दर्द हुआ होगा...

बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
कि उसका रहना न रहना एक बराबर,
कि उसका न होना, होना है, होना, न होना
लो !!! किसी भी वकत वह दरवाज़े पर होगा,
मैं ज़रा संवार लूँ चेहरा,
आँखों में काजर भर लूँ,
ज़रा अपनी थकावट समेट लूँ.
मुस्कान से दग्ध कर दूँ उसे.
हाँ, जानती हूँ बड़ा ऐय्यार है मेरा साथी,
मेरी मुस्कान पर टिका है मेरे ऐय्यार का जीवन.


कविता : लांसनायक सुधीर महतो
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वो बच्चा जिसके सर पर एक घाव बना है,
रिश्ते में मेरा बेटा था,
और कहने को आगे होगा इस देश का अमर सिपाही,
एक सच्चा शहीद.

भान है,
इस शहीद को आनन-फानन याद किया जाएगा,
और हड़बड़ाहट में भूला दिया जाएगा.

कोई समय...मेरी बातों में चाव होता,
किसी बहाने, हर बात में बेटा बेटा और मात्र बेटा होता.

आज, घरवालों की दहाड़ें सीना चीरे दे रहीं हैं,
मन और हेरा रहा है,
काँधों से छिन गई है ताकत,
कांधा तुम सब मिल कर दे देना,
हुमाद भी,
पोते से कहना आग दे दे.

फिलहाल मुझे पेंठिया हो आने दो,
चाय पीने बहाने,
किशन की दूकान पीछे मन भर रोऊँगा
जब जी हल्का हो जाए,
लौट आऊंगा.
आँगन में पसरा रहूँगा,
मन ही मन रोता रहूँगा,
कुछ दिन बाद जीवन की नियति मान,
उन सब को राम-राम कह आऊंगा,
जो हमारे दुःख को अपना दुःख समझ
शोक में साझा होने आये थे.

आगे भी, गाँव वाले बेटे के स्मारक की बात सोचेंगे.


कविता : दिहाड़ी
रोज़ सवेरे,
कानों का एक जत्था,
चौकस,
देश के किसी चौरस्ते पर,
चार खल वाले टिफिन को बगल रखे,
अपने गिने जाने का करते हैं इंतज़ार.
उनकी दिनचर्या का यह सबसे नाजुक समय होता है.

सब कुछ शुभ होने को,
धरती की तरह,
रोज़मर्रा की ज़रूरतों की धूरी पर उनके घर का घूमना भी बेहद ज़रूरी है.
बेहद ज़रूरी है उनका रोज़ का गिना जाना.


कविता : खुले दिल से गले मिलोगे ?
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अभी कहाँ मंझा हूँ,
कितना खुरदुरा है मन,
अभी तो विभक्त होना है खुद से,
अपनी ही छाया से सीखना है होना नम्र,
कभी न ख़त्म होने वाले जद्दोजहद से सीखना है मांझना विवेक,
दूर जंगल में घाँस की बढ़ती जड़ों से सीखना है धैर्य,
रात भर बनते ओस से सीखनी है शांति,
तन्हाई से सीखना है होना साझीदार,
अधीरता से सीखना है होना ईमानदार,
मैं को जब कर आऊंगा दफन,
और कुछ न होने से कुछ होने के बूझ लूँगा अर्थ....
तब प्रेम बोलो तुम...
खुले दिल से गले मिलोगे ?

संपर्क: anujkumarg@gmail.com
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सूफी का जूता

(1)

पूरे हिन्दुस्तान में सूफियों की तलाश शुरू हो गई हैं। पुराने, अनुभवी और थोड़ा-बहुत अपने आत्म-सम्मान का ध्यान रखने वाले सूफी इधर-उधर छिप गए ताकि विज्ञापन कंपनियों के दलालों से बच सकें, जो उनकी तलाश में घूम रहे हैं। किस्सा ये है कि सूफियों को कई बड़ी भारतीय कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाना चाहती हैं। ‘बिजनस विजार्ड्स’ ने बताया है कि अमेरिका में सफल हो जाने के बाद हिन्दुस्तान में भी सूफी फार्मूला पूरी तरह कामयाब होगा। अमेरिका में सूफी फॉर्मूला इसलिए सफल हो गया था कि वहां लोग सूफियों के दर्शन, प्रेम, त्याग और मैत्री के बारे में कुछ न जानते थे और ये उनके लिए आकर्षित करने वाले शब्द बन गए थे। जबकि हिन्दुस्तान में दो पीढ़ियों पहले लोग इन शब्दों से परिचित थे और अब ये शब्द नई जनरेशन के लिए नोस्टैल्जिया बन चुके हैं। और उनकी जगह डिस्को संगीत में सुरक्षित हो चुकी है।

(2)

बहुत खोजने के बाद एक सूफी मिला जो विज्ञापन एजेंसी वालों से बचने के लिए डाकू बन गया था। उसे यह भ्रम था कि डाकू बनकर बच जाएगा। पर चूंकि सूफी था इसलिए डाकू बनने के बाद भी सूफी ही रहा और पकड़ा गया। इस सूफी को दिल्ली की प्रसिद्ध तिहाड़ जेल से पकड़ा गया था। पहले उसकी सजा माफ कराई गई और उससे कहा गया कि अरबों डॉलर का मुनाफा कमानेवाली एक कारॅपोरेशन उसे जनहित के काम में लगाना चाहती है।

‘‘जनहित का क्या काम होगा’ सूफी ने पूछा।

‘‘कॉरपोरेशन ने जिस इलाके में अपनी विशालकाय फैक्टरी लगाई है। वहां पीने का पानी खत्म हो गया है, हवा दूषित हो गई है, पेड़ जल गए हैं। बच्चे अपंग पैदा होते हैं। वहां जाकर संतोष, त्याग, बलिदान का सन्देश देना है।’’

(3)

सूफियों की इतनी चर्चा के बाद एक सज्जन ने सोचा कि पुराने-धुराने सूफी की तलाश की जाए और उससे सूफी बनने के हुनर सीखकर खुद सूफी बना जाए।

बहुत खोजने पर सज्जन की सूफी तो नहीं, सूफी के एक पैर का जूता मिल गया। सज्जन को बहुत खोजने पर भी दूसरे पैर का जूता न मिला तो निराश होकर एक जूता घर ले आए।

पर रात में जूते ने बोलना शुरू कर दिया।

उसने कहा, ‘‘आजकल सूफियों का सबसे अच्छा प्रोफाइल डिजाइन अमेरिकन ड्रेस डिजाइनर पॉप जक्सीम करता है, तुम उसके पास जाओ।’’

ये सुनकर सज्जन बेहोश हो गए और सूफी का जूता हंसने लगा। और फिर जूता सज्जन की खोपड़ी और चेहरे पर लगातार बरसने लगा। सज्जन का चेहरा लाल हो गया।

कुछ देर बाद सज्जन की जब आंख खुली तो वो पूरे सूफी बन चुके थे। और जूता वहां नहीं था।

(4)

देश के सबसे महंगे ड्रेस डिजाइनर ने सूफी कॉस्ट्यूम डिजाइन किया। चार कॉरपोरेशनों ने गुडविल फंडिंग की। एक एयर लाइन ने कहा कि अब उनकी एयर लाइन की एयर होस्टेस अगले महीने से सूफी ड्रेस में होंगी।

बहरहाल, एक सात-सितारा होटल में सूफी अब्दुल कय्यूम अलसबा बोस्ताने बहश्तेवारे सकिने तूरानी को सूफी ड्रेस का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया।

जगमगाते दरकार हॉल में कई देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री मौजूद थे। बिजना और फैशन की दुनिया का तो कोई सितारा ऐसा न था जो वहां न हो।

सूफी अब्दुल कय्यूम अलसबा बोस्ताने बहश्तेवारे सकिने तूरानी के साथ कई राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सूफी ड्रेस पहनकर मंच पर आए।

फिर सबने देखा कि सूफी समेत सब वी.वी.आई.पी. नंगे नजर आने लगे।

(5)

जब मामला सूफी कविता और सूफी संगीत से होता सूफी कॉस्ट्यूम, सूफी टूरिज्म सूफी फर्नीचर, सूफी डेकोर, सूफी डेकोर, सूफी बाथरूम, सूफी फूड, सूफी ज्वैलरी, सूफी शू, सूफी अंडर वियर और सूफी चाट मसाले तक आ गया तो सूफी वहीउद्दीन वल्द जहीरुद्दीन वल्द सुहीदुद्दीन वल्द करीमुद्दीन ने अपने बेटे टॉमउद्दीन से कहा ‘‘बेटा, अब तुम सूफी कफन की दुकान खोल लो।’’

‘‘क्यों डैडी’ उनके बेटे टॉमउद्दीन ने पूछा।

‘‘बेटा, अब वही बचा है...वो काम हमने न किया तो यही कफन-चोर कर लेंगे।’’

(6)

कोई दो सौ साल के बाद सूफी कदीर ने फिर से शरीर धारण किया तो उन्हें पता चला कि उनकी कब्र पर बहुत शानदार मकबरा बन गया है। पास ही विशाल दरगाह है। मकबरे के परिसर में ही एक पांच-सितारा होटल है। हजारों लोग कब्र पर फातिहा पढ़ने और चादर चढ़ाने आते हैं। लाखों रुपए रोज का चढ़ावा आता है। मुम्बई का हर डॉन और फिल्म स्टार उनकी पूजा करता है। ये सब जानकर सूफी कदीर बहुत खुश हुए और अपने मकबरे की तरफ बढ़े तो उन्हें उस तरफ से कुछ लोग भागकर आते दिखाई पड़े। इन लोगों ने सूफी कदीर से कहा कि मकबरे की तरफ मत जाना।

‘‘क्यों’ सूफी कदीर ने पूछा।

‘‘उधर गालियां चल रही हैं।’’

रोकने के बावजूद सूफी दरगाह की तरफ लपके। उन्हें डर था कि कहीं पुलिस की गोली से कोई मासूम न मर जाए।

वे दरगाह के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा बन्दूकधारियों का एक दल मकबरे के अन्दर है और दूसरा बाहर। दोनों के बीच गोलीबारी हो रही है।

‘‘ये कौन लोग हैं जो एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं।’’ सूफी ने किसी से पूछा।

‘‘ये सूफी कदीर की औलादें...उनके वंशज हैं।’’

‘‘ये क्यों लड़ रहे हैं।

‘‘दरगाह पर कब्जा करने के लिए।’’

‘‘कब्जा कैसा कब्जा।’’

‘‘लगता है, नए आए हो...चले...जाओ...नहीं तो बेकार में मार दिए जाओगे।’’

लेकिन सूफी कदीर तेजी से मकबरे की तरफ बढ़े।

‘‘ओय बुड्ढ़े, हट वहां से...कहां जा रहा है’

‘‘मैं सूफी कदीर हूं बेटा।’’

‘‘तो तू किसकी तरफ है हमारी तरफ या उनकी तरफ’

‘‘मैं अपनी तरफ हूं बेटा।’’

‘‘नौजवान ने उनके ऊपर गोलियां तड़तड़ा दीं और सूफी कदीर फिर दो सौ साल के लिए मर गए।

(7)

सूफी रहमानी के पास सब कुछ था। नाम था। इज्जत थी। शोहरत थी। लेकिन बदनसीबी यह कि सन्तान न थी। कोई औलाद न बचती थी। जब वह बहुत परेशान हो गया तो एक दिन उसके दोस्तों ने सलाह दी कि देश में एक ही आदमी है, जिसके आशीर्वाद से तुम्हारी औलाद बच सकती है।

‘‘ये आदमी कौन है।’’ सूफी ने पूछा।

‘‘ये हमारे देश का प्रधानमंत्री है।’’

‘‘क्या उसकी दुआ में इतनी तासीर है’

‘‘हां...वो चाहे तो ये हो सकता है...लेकिन उससे मिलना आसान नहीं है...’’

‘‘क्या करना होगा’

‘‘तुमको उसके दर तक सिर पर पैर रखकर जाना पड़ेगा।’’

मरता क्या न करता, सूफी प्रधानमंत्री के पास गया और उसके आशीर्वाद से एक बेटे का बाप बना। सूफी ने अपने बेटे का नाम प्रधानमंत्री के नाम पर रखा ताकि पूरी दुनिया ये समझ सके कि उसके ऊपर किसका क्या उपकार है।

(8)

सूफी हमीद की दुकान नहीं चल रही थी। सब कुछ करने के बावजूद न तो लोग उनके पास आते थे और न वे कहीं बुलाए जाते थे। खाने-पीने के लाले पड़ गए थे।

एक दिन सूफी हमीद की बीवी ने कहा, ‘‘सुनो, मेरी मानो तो तुम अंग्रेजी बोलना सीख लो।’’

सूफी हमीद को बीवी की अक्लमन्दी पर हैरत हुई।

वे बोले, ‘‘तू ये कैसे जानती है कि मेरी बदनसीबी का यही राज है कि मैं अंग्रेजी नहीं बोल सकता’

बीवी बोली, ‘‘लो, मैं न जानूंगी तो कौन जानेगा...सोते हुए तुम हर रात यही बड़बड़ाते हो कि अंग्रेजी बोल सकता होता तो ये हालत न होती।’’

(9)

सूफी अजमली के पुत्र ने अपने पिता से कहा कि डैडी आप बेकार में शायरी,वायरी किया करते हैं। उसे आजकल कौन समझता है। आजकल के सूफी तो सूफी मुखड़ों को फिल्मी गानों में लाकर लाखों कमा रहे हैं। आप इधर ट्राई क्यों नहीं करते

सूफी बोले, ‘‘बेटा वहां मैं ट्राई कर चुका हूं। गीतकारों और म्यूजिक डायरेक्टरों ने बड़ी सांठ-गाठं कर रखी है। वहां किसी की दाल गलना मुश्किल है।’’

बेटा बोला, ‘‘वो सब छोड़िए आप डांस के एरिया में क्यों नहीं निकल जाते मैं बैंड पकड़ लुंगा। सिस्टर डांस करेगी। मां एंकर हो जाएंगी। छोटू पब्लिसिटी में लग जाएगा। दादा जी को बुकिंग विंडो पर बैठा देंगे।’’

(10)

चार सूफियों को सोने के लिए एक कम्बल दे दिया गया। पहले तो चारों सूफी कम्बल देने वाले पर बहुत चिल्लाए। उन्होंने कहा, ‘‘चार कम्बल नहीं थे चार सूफियों को बुलाया ही क्यों था। ये सूफियों का अपमान है।’’ खैर कम्बल देने वाला जान बचाकर चला गया। लाने से पहले कह गया कि मैं आयोजकों को भेजता हूं।

उसके जाने के बाद एक सूफी ने कहा, ‘‘मैं तो तुम जैसे तीन घटिया सूफियों के साथ एक कम्बल में सोने से मर जाना ज्यादा पसन्द करूंगा।’’

‘‘तो यूं मर ही जाओ।’’ तीनो सूफियों ने उसे मार डाला।

अब तीन सूफी बचे।

तीनों ने तय किया कि कम्बल के तीन हिस्से कर लिये जाएं और तीनों एक-एक हिस्सा ले लें।

कम्बल कैसे बनता जाए, इस बात को लेकर तीनों में बहस हो गई। एक सूफी और मर गया। अब दो बचे।

उनमें ये झगड़ा शुरू हुआ कि कम्बल के तीन हिस्से दो सूफियों में केसे बांटे जाएं। इस बात पर दोनों लड़ने लगे और एक और सूफी की जान चली गई।

अब अकेले सूफी ने सोचा कि उस पर ही तीन की हत्या का आरोप आएगा। यह सोचकर उसने आत्महत्या कर ली।

तब आयोजक आए, जो एक नेता थे। उनके साथ तीन नेता और थे।

सदन में शहीदे आजम

हमारे लोकतंत्र पर चारों तरफ से हमले हो रहे हैं। लेकिन हमारे प्रतिनिधि इन हमलों को नाकाम कर देते हैं। हो सकता है कि हमारे प्रतिनिधि अपनी सज्जनता और भोलेपन के कारण पहले हमलों को न समझ पाते हों लेकिन जब समझ जाते हैं तो जान पर खेलकर लोकतंत्र को बचा लेते हैं। दुख और चिन्ता की बात यह है कि उनके जान पर खेलकर लोकतंत्र बचाने के प्रयासों की सराहना उन्हें स्वयं ही करनी पड़ती है। जबकि यह काम जनता का है, लेकिन जनता आजकल क्रिकेट मैच, भौंडे टेलीविजन कार्यक्रम शेयर मार्केट का उतार चढ़ाव, सोने का बाजार, प्रापर्टी की कीमतों में हेर-फेर, बिना किए करोड़पति हो जाने के सपने ही देखती है। खैर, हमारे जनप्रतिनिधि किसी बात का बुरा नही मानते। वे मानते हैं कि जनता को न बदला जा सकता है, न वे किसी देश में जाकर जनप्रतिनिधि बन सकते हैं।

हमारे लोकतंत्र पर ताजा हमला एक बदबू ने कर दिया है। हमारे कर्मठ, समर्पित, प्रतिभावान प्रतिनिधि चाहते हैं कि सदन की कार्यवाही कम-से- कम साल में दो सौ दिन तो चले पर व्यवधान डालनेवाले इस कार्यवाही को समेटकर सौ से भी कम के आंकड़े पर खड़ा कर देते हैं। इन दिनों सदन की कार्यवाही बहुत सुन्दरता से चल रही थी कि अचानक सदन पर बदबू ने हमला कर दिया। यदि हमला करने वाला कोई और होता तो हमारे प्रतिनिधि सीना सीना तानकर खड़े हो जाते। लेकिन चूंकि हमलावर अदृश्य था इसलिए हमारे प्रतिनिधि विवश हो गए। पर यह बहस चलने लगी क यह दुर्गन्ध कैसी है! कुछ ने कहा, यह गैस की बदबू है। इस पर पूछा गया किस कम्पनी की गैस की बदबू है। थोड़ा खुलकर कम्पनी का नाम बताया जाए। बदबू से कम्पनी का नाम बता देना सरल था लेकिन सदन खामोश रहा। बहस यह होने लगी कि दुर्गन्ध कब से आ रही है। एक सदस्य ने कहा कि वह जब से जनप्रतिनिधि चुनकर आया है तब से उसे यह दुर्गन्ध आ रही है। इस पर पूछा गया कि उसने इससे पहले दुर्गन्ध की शिकायत क्यों नहीं की प्रतिनिधि ने बताया कि वह तो दो साल पहले ही चुनकर आया है। उसे लगा था कि शायद जिसे वह दुर्गन्ध समझ रहा है वह दुर्गन्ध नहीं सुगन्ध है जिसे सदन में बड़े प्रयासों से फैलाया गया है। नए सदस्य के इस वक्तव्य पर कुछ दूसरे सदस्य नाराज हो गए और उन्होंने नए सदस्य पर जातिवादी होने का आरोप लगाया। अब बहस जातीय आधार पर बट गई और जाति-विशेष की तरफ इशारे होने लगे। बहस को लाइन पर लाते हुए एक अनुभवी सदस्य ने कहा कि पिछले पच्चीस साल से वह यह दुर्गन्ध महसूस कर रहा है। बात पीछे खिसकते-खिसकते यहां तक पहुंची कि अंग्रेज जब हमारे देश को आजाद करके गए थे तब से यह दुर्गन्ध सदन में है। यह अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गई दुर्गन्ध है। इस मत का पूरे सदन ने समर्थन किया और कहा गया कि विदेश मंत्रालय इस पर सख्त कार्यवाही करे और ब्रितानी सरकार से कड़े शब्दों में पूछा जाए कि यह क्या मामला है। कुछ सदस्य बदबू कि ब्रितानी षड्यंत्र होनेवाले बिन्दु से इतना उत्तेजित हो गए कि उन्होंने कहा कि अंग्रेज तो जो भी छोड़ गए सबसे बदबू आती है। रेल की पटरियां गन्धाती हैं, गेटवे ऑफ इंडिया से लेकर इंडिया गेट तक बदबू-ही-बदबू है। नौकरशाही से दुर्गन्ध आती है। आई.पी.सी. से सड़ी गन्ध आती है। शिक्षा-व्यवस्था की हालत तो गन्दे नाले जैसी है। सदन के जिम्मेदार सदस्यों ने जब बहस को यह मोड़ लेते देखा तो बोले-वह सब छोड़िए, यहां सदन में इस गन्ध के लिए जो जिम्मेदार है उससे जवाब तलब किया जाना चाहिए। इस पर मेजें बजने लगीं।

सदन के कुछ प्रभावशाली यह बहस होने से पहले सदन की कैंटीन में सस्ते दरों पर मिलने वाली बिरयानी खाने चले गए थे। वे वापस आए तो उन्होंने यह बहस होते देखी। वे बहुत नाराज हो गए। एक सीनियर सदस्य ने कहा, ‘‘आप लोगों को शर्म नहीं आती आप इसे बदबू कह रहे हैं’

‘‘फिर यह क्या है’

‘‘यह तो लोकतंत्र की सुगन्ध है।’’

‘‘ये कैसे’

‘‘अरे, आपको शर्म नहीं आ रही! ये तो डूब मरने की जगह है। आपको मालूम है, हमने लोकतंत्र कितने बलिदान देकर हासिल किया है कितने शहीदों का खून बहा है। कितने घर उजड़े हैं। कितने ने कालापानी काटा है। कितने फांसी के फन्दे पर झूले हैं। कितनी बहनों का सुहाग उजड़ा है। कितनी माँओं की गोदें सूनी हुई है। तब हमें लोकतंत्र मिला है। आप लोगों की इन ओछी हरकतों से आज स्वर्ग में राष्ट्रपिता पर क्या गुजर रही होगी; सुभाषचन्द्र बोस कितना दुखी होंगे और शहीदे आजम का कलेजा टुकड़े-टुकड़े हो गया होगा...अगर उनके सामने...अगर उनके सामने...’’

अचानक सभी सदस्यों की आंखें एक तरफ को उठ गईं। धीरे-धीरे नपे तुले कदमों से एक नवयुवक सदन में दाखिल हो रहा था। उसका तेजवान लम्बोतरा चेहरा था। बड़ी-बड़ी संवेदना और विचार में डूबी आंखों से वह सबको देख रहा था। उसने फ्लैट हैट लगाई हुई थी। चेहरे पर शानदार मूंछें फब रही थीं। नौजवान धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा। उसने अपने हाथ में कुछ लिया हुआ था। नौजवान के रौब-दाब के आगे सबकी घिग्गी बंध गई थी। बड़ी हिम्मत करके एक सीनियर सदस्य ने पूछा,‘‘आप कौन हैं’

नौजवान ने जोर का ठहाका लगाया। उसकी आवाज देर तक सदन में गूंजती रही। कुछ क्षण बाद वह बोला-‘‘क्या यह बताने की जरूरत है कि मैं कौन हूं!’’

अबकी नौजवान ने फिर जोर का ठहाका लगाया। लेकिन यह डरावना ठहाका था। चुने हुए प्रतिनिधि कांप गए सदन की दीवारें थर्रा गई। नौजवान की आग उगलती आंखें मिलाने की हिम्मत किसी में न थी।

कुछ ठहरकर एक सदस्य ने पूछा, ‘‘आपका धर्म आपका जाति’

नौजवान ने नफरत से कहा, ‘‘मेरा कोई धर्म नहीं है। मेरा कोई जाति नहीं है।’’

तीसरे प्रतिनिधि ने कहा,‘‘तब तो श्रीमान आज की तारीख में आपको किसी चुनाव क्षेत्र से हजार वोट भी न मिलेंगे।’’

‘‘मैं यहां वोट लेने नहीं आया हूं’’ वह आत्मविश्वास के साथ बोला।

‘‘फिर श्रीमान जो...यह तो लोकतंत्र का मंदिर है...यहां...’’

एक सीनियर सदस्य बात काटकर बोला,’’ मैं इन्हें पहचान गया हूं, ये शहीदे आजम हैं।

‘‘अरे बाप रे बाप!’’ पूरे सदन में यह वाक्य गूंज गया। सभी सदस्य हैरान-परेशान हो गए।

‘‘ये आपके हाथ में क्या है शहीदे आजम’

‘‘ये बम है।’’

‘‘बम’

‘‘हां बम।’’

‘‘इसे यहां क्यों लाए हैं’

‘‘इसे यहां फेंकने लाया हूं।’’

‘‘यहां फेंकने’

‘‘क्यों शहीदे आजम’

‘‘यहां बदबू आती है न’

‘‘हां, आती है।’’

‘‘बदबू का यही इलाज है।’’

‘‘लेकिन ये बम...’’

सदन एक जोरदार धमाके की आवाज से थर्रा गया। चारों तरफ धुआं-ही धुआं हो गया। जनप्रतिनिधि मेंजों के नीचे छिप गए। जब धुआं छंटा तो उनमें से कुछ ने मेज के नीचे से सिर निकाले।

एक बोला, ‘‘क्या चले गए शहीदे आजम’

‘‘तुम देखो।’’

‘‘नहीं, तुम देखो।’’

‘‘चले तो गए हैं, पर जाने कब चले आएं!’’

‘‘हां यार, ये तो है।’’

‘‘तो मेज के नीचे ही रहें।’’

‘‘सदन की कार्यवाही’

‘‘चलती ही रहेगी क्योंकि सभी मेजों के नीचे हैं।

ताजमहल की बुनियाद

यमुना के किनारे जहां आज ताजमहल खड़ा है वहां ताजमहल बनने से पहले कई हजार बीघा उपजाऊ जमीन थी। यह जमीन बिलसारी, रगबड़ी चौखेटा और अनुगर गांव के किसानों की थी। इस जमीन पर गेहूं के अलावा मौसमी सब्जियों की शानदार खेती होती थी। गर्मियों में यहां जो खरबूजा होता था वह आसपास क्या दिल्ली तक मशहूर था। ककड़ियां और खीरे तो लाजवाब होते थे। तरबूज में तो लगता था किसानों ने अपना दिल रख दिया है, पानी की कमी न थी। दोमट मिट्टी को पानी मिल जाए तो सोना उगलती है। आगरा जैसी मंडी पास थी जहां राजा, रंक और फकीर सौदा देखते थे, मोल भाव न करते थे। पर भाग्य में तो और कुछ ही लिखा था। शहंशाह शाहजहां अपनी सबसे प्यारी बेगम मुमताज महल के लिए एक ऐसा मकबरा बनवाना चाहता था जो दुनिया में बेमिसाल हो।

‘‘लेकिन शहंशाहे आलम पानी तो इमारत की बुनियाद को कमजोर कर देता है।’’ उस्ताद अहमद लाहौरी ने दरबारे खास में हाथ जोड़कर अर्ज किया।

‘‘अहमद मकबरा तो जमना के किनारे ही बनना चाहिए...मैं चांदनी रातों में, उस मकबरे का अक्स जमना के पानी में देखना चाहता हूं।’’ जहांपनाह ने कहा।

‘‘हुक्मे सरकार।’’ उस्ताद अहमद खां लाहौरी ने जमीनें देखना शुरू कर दिया। उसे ऐसी जमीन चाहिए थी जो ताजमहल जैसी इमारत को सहेज सके। उस्ताद अहमद खां लाहौरी की तजुर्बेकार आंखों ने इस्फहान, शीराज, तबरेज, बल्ख, बुखारा, समरकंद ही नहीं, बल्कि बगदाद और दमिश्क की जमीनें देखी थीं। उसने यूनान और रूम की देवियों के मकबरे देखे थे।

वह जानता था कि कौन सी जमीन का कितना बड़ा जिगर होता है। कौन-सी जमीन हवा के गुब्बारे की तरह फट जाती है और कौन सी जमीन अपने सीने पर सैकड़ों साल तक लाखों मन का बोझ उठाए रहती है। गलती उस्ताद अहमद लाहौरी की नहीं उस जमीन की थी जहां ताज बना है।

‘‘और तुम जानते हो आज क्या हो रहा है।’’

‘‘क्या’

‘‘चारों गांवों के किसान...अपनी जमीन वापस मांग रहे हैं।’’

‘‘नहीं...ये कैसे हो सकता है।’’

‘‘ये तो किसान भी नहीं जानते।’’

‘‘लेकिन...’’

‘‘तुम जानते हो, ताजमहल सिर्फ शाहजहां ही ने नहीं बनवाया है। ताज तो उससे बहुत पहले बनना शुरू हो गया था और बाद तक बनता रहा...अब भी बन रहा है...ताज पूरा तो नहीं हुआ है...न होगा...लेकिन किसानों का कहना है हमें हमारी जमीन चाहिए।’’

‘‘तो पुलिस...’’

‘‘देखो लोकतंत्र है...वैसे शाहजहां के समय में भी लोकतंत्र था, लेकिन तब का लोकतंत्र...’’

‘‘मतलब लोकतंत्र कमजोर हुआ है’

‘‘हां। और तुम्हारी मदद की-सबसे बड़ी वजह यही है।’’

‘‘बाअदब, बामुलाहिजा होशियार, शहंजाहे हिन्दोस्तान शाहजहां संसद में तशरीफ लाते हैं।’’

मीडिया दीवाना हो गया। लगा पागलखाने का दरवाजा खुल गया है। पूरे शाही लिबास में सजे-सजाए सिर पर ताज, जलाल और जमाल की मूर्ति बने शाहजहां ने संसद में प्रवेश किया। चारों तरफ रौशनी फैल गई। घंटा बजने की आवाजें आने लगीं। फरियादी आगरा के किले की दीवार से लटकती रस्सी को खींचने लगे और पूरे किले में घंटा बजने की आवाज गूंजने लगी। धीरे-धीरे घंटा बजने की आवाज तूती की आवाज में बदल गई। और वही शहनाई की आवाज में तब्दील हो गई। सांसदों ने सम्राट का स्वागत किया और सम्राट ने अपना भाषण शुरू कर दिया...

‘‘देखो, उस समय के लोग सम्राट को भगवान का अवतार मानते थे।’’

‘‘आज’

‘’भगवान को भी भगवान नहीं मानते।’’

‘‘फिर’

‘‘ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने नया अवतार लिया है।’’

‘‘कौन है वह अवतार।’’

‘‘लोकतंत्र।’’

‘‘लोकतंत्र’

‘‘हां।’’

‘‘वही भगवान है...अपराजेय है सर्वशक्तिमान है, दयालु...’’

‘‘सांसदों, माबदौलत आज बहुत खुश हैं...ताजमहल आज जितना खूबसूरत है...जितना बड़ा है...जितना शानदार है...जितना मजबूत है...जितना मशहूर है...उतना तो मेरे जमाने में भी नहीं था...माबदौलत आज के हाकिए वक्त यानी डेमोक्रेसी मतलब लोकतंत्र के एहसानमंद है...सरकारी खजाने में जितना सोना है उतना पहले कभी न था...’’तालियां गड़गड़ाने लगीं

‘‘आज हुकूमत सही हाथों में है...मैंने तो सिर्फ एक ताजमहल बनवाया था...आपने तो सैकड़ों ताजमहल बनवा दिए हैं...मैंने तो सिर्फ जमना के किनारे ताज बनवाया था आपने हर नदी के किनारे...मैंने तो सिर्फ 22 करोड़ खर्च किए थे आपने...’’

‘‘...यह संसद नहीं है, दीवाने आम है शहंनशाह। आपको अब अपना पता भी याद नहीं...देखिए सम्राट...इधर-उधर नजर डालिए।’’

‘‘बादशाह सलामत ताजमहल की बुनियाद को मजबूत बनाने के लिए पानी की जरूरत है...और पानी नहीं है...जमना सूख रही है...पानी नहीं है...पानी...’’उस्ताद अहमद लाहौरी ने चीखकर कहा। वह स्पीकर की टेबुल के नीचे से निकल आया था।

‘‘उस्ताद अहमद खां तुमने ताज की बुनियाद में क्या रखा था’

‘‘...मैंने ताज की बुनियाद को एक हजार साल तक के लिए पक्का बना दिया था। लेकिन...’’

‘‘वहां रखा क्या था’

‘‘चूंकि हुक्म था कि ताजमहल जमुना के किनारे बनाया जाएं...’’

‘‘...ये लोग कहां से आ रहे हैं सैकड़ों और फिर हजारों और फिर लोखों...ये घर में क्यों नहीं बैठते...ये बैठते क्यों नहीं...ये सब एक साथ क्यों आ रहे हैं ये एक दूसरे से पूछते क्यों नहीं कि तुम्हारा धर्म क्या है तुम्हारा मजहब क्या है और फिर एक दूसरे से लड़ने क्यों नहीं लगते...खून की होली क्यों नहीं खेलते...ये एक दूसरे की जाति क्यों नहीं पूछते ये अलग-अलग जबानें क्यों नहीं बोलते...ये सब एक जैसे क्यों लगते हैं...क्यों ऐसा है...ये सब एक दिशा में आगे क्यों बढ़ रहे हैं...बूढ़े जवानों की तरह चल रहे हैं और जवान चिड़ियां की तरह उड़ रहे हैं...’’

‘‘ताज को हटाओं।’’

‘‘कहां ले जाएं’

‘‘चाहे जहां ले जाओ।’’

‘‘ताज पर हमें गर्व है।’’

‘‘करते रहो।’’

‘‘ताज हमारी संस्कृति का प्रतीक है।’’

‘‘बनाए रखो।’’

‘‘ताज हमारा...’

‘‘...शहंनशाह में फिर अर्ज करना चाहता हूं कि ताजमहल की बुनियाद को पानी की बड़ी जरूरत है। जमुना में अब पानी नहीं है। अगर ताजमहल की बुनियाद को पानी न मिला तो...गजब हो जाएगा...हुजूरे आलम तो जानते ही हैं कि पानी के वगैर कुछ नहीं हो सकता...आदमी हो या पेड़-पौधे हों...जानवर हों या...’’

‘‘क्यों जी अब तुम ये बखेड़ा क्या खड़ा कर रहे हो’ एक सांसद ने कहा।

‘‘ये तुमने...पानी...पानी क्या लगा रखा है...कौन कहता है पानी की कमी है...जो कहता है उसे शर्म से पानी-पानी हो जाना चाहिए।...आज पानीपचास हजार करोड़ का उद्योग है...समझे...’

‘‘आलमपनाह...मैं तो कहता ही रहूंगा...पानी...पानी...और पानी।’’ उस्ताद अहमद लाहौरी ने कहा।

‘‘उस्ताद...पानी का नाम भी मत लो...’’

‘‘क्यों’

‘‘चुप रहो...संसद का सम्मान करो...इसे चाहे दीवाने खास समझो...चचाहे आम...

‘‘ताजमहल की बुनियाद के लिए पानी क्यों जरूरी है...उस्ताद अहमद लाहौरी’ शहंशाह ने पूछा।

‘‘जहांपनाह...पांच बहुत गहरे कुएं खोदे गए थे..उसमें साखू की लकड़ी भरी गई थी...साखू की लकड़ी पानी में पत्थर जैसी हो जाती है...इमारत को सहारा देती है...पानी नहीं होता...जो चटख जाती है...’’

‘‘झूठ बक रहा है उस्ताद।’’ किसी ने चीखकर कहा।

‘‘क्या झूठ’

‘‘ताजमहल की बुनियाद में रखी लकड़ियां पानी में मजबूत नहीं होती...’’

‘‘फिर...’

‘‘खून जो काम कर सकता है वह पानी नहीं कर सकता।’’

नो रेड लाइट इन इंडिया

अमेरिका से हार्वर्ड विजनेस स्कूल से एम.बी.ए.। आक्सफोर्ड से बी.ए.। किंग्स कॉलेज से हाईस्कूल। बीरु भाई का ये सब डिग्रियां देख कर हंसी आती है। लेकिन हंसी दबा लेते हैं, पी लेते हैं क्योंकि ये डिग्रियां उनके एकलौते बेटे रतन भाई रनवानी को मिली हैं। उन्होंने रतन की ऐसी एजूकेशन दी है और रतन ने ली है जो दुनिया की सबसे अच्छी बिजनेस एजूकेशन कही जा सकती है। ये डिग्रियां देखकर बीरु भाई रनवानी को क्यों हंसी आती है वे जानते हैं कि ये लड़के जितना जानते हैं इंटरनेशनल मार्केट के बारे में नए एरियान ऑफ बिजनेस के बारे में उतना बीरु भाई नहीं जानते। बीरु भाई तो गुजरात के गुमनाम से शहर रनवान से हाईस्कूल फेल हैं। लेकिन उन्होंने टाटा और बिड़ला को पीछे कर दिया है। उन्होंने कारपोरेट बिजनेस का नया व्याकरण रचा है। वे जिस तरह आगे बढ़े हैं वैसे तो आंधी और तूफान भी नहीं बढ़ते। उनकी बढ़त देखकर लोगों के होश उड़ गए थे। रनवान जैसी जगह का एक अवारा सा लड़का देखते-देखते दो सौ अरब का असामी बन बैठा था।

-ये तुम लाल बत्ती पर गाड़ी क्यों रोक देते हो बीरु भाई ने अपने सबसे छोटे बेटे रतन से कहा।

- डैड लाइट रेड है। रतन बोला।

यूं तो सैकड़ों क्या हजारों ड्राइवर हैं, लेकिन बीरु भाई पुराने जमाने के आदमी हैं। खुद आगे की सीट पर बैठते हैं। कभी सीट बेल्ट नहीं लगाते। पहले तो बाप बेटे में इस बात को लेकर झगड़ा हो जाया करता था। रतन कहता था डैड आप जब तक बेल्ट नहीं लगाएंगे मैं गाड़ी नहीं चलाऊंगा।

-मैं बेल्ट कभी नहीं लगाता।

-डैड ये लेटेस्ट मॉडल की कैडीलॉक उस वक्त तक स्टार्ट ही नहीं होगी जब तक आप बेल्ट नहीं लगाएंगे।

-ठीक है अब लो। बीरु भाई ने अपनी कमर के पीछे से बेल्ट लगा ली।

-ये क्या डैड

-अब गाड़ी स्टार्ट करो।

-गाड़ी स्टार्ट हो गई। बीरु भाई के चेहरे पर भाव वही रहे जो पहले थे। दोनों कुछ देर खामोश रहे। अगले चौराहे पर लाल बत्ती आ गई। रतन ने गाड़ी रोक दी।

- लाल बत्ती पर गाड़ी मत रोका करो। बीरु भाई ने रतन से कहा।

-डैड ये इंटरनेशनल रूल है।

- हां लेकिन नेशनल रूल नहीं है।

-तो डैड ये लाल बत्तियां क्यों लगाई गई हैं।

-रतन बहस मत करो ये बत्तियां हमारे लिए नहीं हैं।

-डैड एक्सीडेंट हो जाएगा।

-हो जाने दो। बीरु भाई बोले।

-डैड प्लीज।

-रतन तुम्हें इंडिया में काम करना है।

-यस डैड...।

-ग्रीन मतलब हरा मतलब आगे।

-लेकिन डैड...।

-रतन में अच्छे-बुरे की बात नहीं कर रहा हूं।

बीरु भाई बोले।

कुछ देर खामोशी रही।

-रतन, ये कंट्री हमारा है।

-क्या डैड

-यस रतन, हमारा है, हमारा है।

-इस कंट्री के लोग हमारे हैं, यहां की नदियां हमारी, पहाड़ हमारे हैं, यहां की सरकार हमारी है, यहां की सब चीजें हमारी हैं।

-डैड ऑर यू क्रेजी।

-क्या तुम्हे हार्वर्ड में ये नहीं पढ़ाया गया था

-नो डैड।

-यही बात है, तुम्हारी तालीम पूरी नहीं हुई है।

बीरु भाई ने कहा और रतन हैरत से उन्हें देखने लगा।

-डैड पूरे वर्ल्ड में इतनी अच्छी पढ़ाई नहीं।

-नहीं तुम्हारी पढ़ाई पूरी हुई। मैं तुम्हें फिर से पढ़ाऊंगा।

बीरु भाई ने हजार कोशिशें कर लीं, लेकिन रतन की पढ़ाई पूरी नहीं हो पाई। पर बीरु भाई भी हार मानने वाले लोगों में हैं नहीं। अगर हार ही मान ली होती तो आज वे वीरु भाई न होते।

रात अंधेरी, सन्नाटा, सुनसान, सड़कें। रात की तीन बजे हैं। हवा के सन्नाटें की आवाजें आ रही हैं।

-गाड़ी की रफ्तार और बढ़ाओ। बीरु भाई बोले।

-डैड स्पीड लिमिट।

-तुम गाड़ी चला रहे हो, मैं बैठा हूं। गाड़ी इस देश में चल रही है। स्पीड लिमिट कुछ नहीं है। समझे स्पीड बढ़ गई।

-स्पीड और बढ़ाओ। बीरु भाई बोले।

- डैड इट इज हंडरेड टेन। रतन ने कहा।

-और बढ़ओ। बीरु ने आदेश दिया।

गाड़ी की रफ्तार एक सौ बीस हो गई।

-और बढ़ाओ।

गाड़ी की रफ्तार एक सौ चालीस एक सौ चालीस हो गई।

-रतन ये बाईं तरफ देख रहे हो फुटपाथ। बीरु भाई बोले।

-यस डैड आई एम वेरी केयर फुल।

-फुटपाथ पर लोग सो रहे हैं।

-यस डैड।

-रतन ये हमारे लोग हैं।

-कैसे डैड।

-हमारे कारखाने के मजदूर हैं।

-वेरी गुड डैड। मैं केयरफुल हूं। रतन बोला।

-नहीं रतन केयरफुल होने की जरूरत नहीं है।

-क्या मतलब डैड

-गाड़ी की फुटपाथ पर चढ़ा दो

-नौ डैड।

-रतन ये हमारे लोग हैं, इट इज अवर कंट्री।

बीरु भाई ठंडी आवाज और शान्त स्वर में बोले।

-तब तो डैड और।

-नो रतन डू इट। बीरु भाई ने सख्ती से कहा।

-नहीं डैड ये नहीं हो सकता है। रतन ने कहा।

-रतन ये हो सकता है और ये होना है। रंग सिर्फ एक होता है। वे लोग जो रंगों को कई रंग को मानते हैं, बेवकूफ हैं। चढ़ाओ गाड़ी उन पर जो फुटपाथ पर सो रहे हैं।

-नो डैड।

बीरु भाई ने गुस्से से रतन की तरफ देखा और उन्होंने जोर से स्टेरिंगफुटपाथ की तरफ घुमा दिया। गाड़ी पचास-साठ सोए लोगों के ऊपर से कुचलती हुई नीचे सड़क पर आ गई।

-डैड ये आपने क्या किया

-रतन तुम्हें पहली बार डिग्री मिली है।

- व्हाट डैड वह गुस्से में चिल्लाया और फिर रोने लगा। वह जोर-जोर से रोने लगा।

-मैं अपने आपको कभी माफ नहीं कर पाऊंगा डैड, ये क्या हो गया।

-रतन कुछ नहीं हुआ है। तुमने शायद पच्चीस-तीस लोगों को अपनी गाड़ी के नीचे कुचल दिया है जिसमें से शायद पन्द्रह-बीस लोग मर गए होंगे और बाकी बुरी तरह घायल हो गए होंगे।

रतन चीखकर बोला, डैड प्लीज आपके अन्दर इंसानियत नाम की...।

-हां हां है क्यों नहीं।

-क्या है

-देखो जो लोग फुटपाथ पर सो रहे थे वे आदमी नहीं थे।

-क्या मतलब डैड

-रतन वो सब डमी हैं, मतलब पुतले। आदमी के पुतले।

-पुतले

-हां हां पुतले। बीरु भाई हंसकर बोले।

-लेकिन मैंने तो हड्डियां टूटने की आवाज सुनी है।

-तो क्या हुआ पुतलों के हड्डियां भी होती हैं।

-खून देखा है।

-तो क्या हुआ पुतलों के अन्दर खून भी भरा गया था।

-ये सब क्या है डैडी और पुतले वहां किसने रखाए थे।

-मैंने।

-आपने क्यों

-तुम्हें यह बताने के लिए रंग सिर्फ एक होता है।

-प्लीज डैड।

-सुनो आदमी और पुतलों में कोई फर्क नहीं होता।

-आप क्या कह रहे हैं डैड

-रतन वे पुतले नहीं आदमी थे।

-ओ गॉड मैं कन्फूज हो गया हूं, सच, सच बताइए वो क्या थे,

- रतन, वो दोनों ही थे।

दिल की दुनिया

मुझे यह अन्दाजा बिल्कुल नहीं था कि मैं बुढ़ापे में इतनी जल्दी ‘खिसक’ जाऊंगा। मैं तो ये सोचे बैठा था कि दांतों के दर्द और आंखों की कमजोरी से होता बुढ़ापा सबसे बाद में ‘भेजे’ तक पहुंचेगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। यह भी गजब है कि मैं अपने को भला-चंगा समझता हूं, लेकिन मुझे यह समझाया जाता है या ज्यादातर लोग मानते हैं कि मैं खिसक गया है।

कभी-कभी बुढ़ापे में पता नहीं क्यों, चीजें गड़बड़ाने लगती हैं। कहा जाता है कि बूढे शक्की होते हैं। यह सच है। कहा जाता है कि बूढ़े चटोरे होते हैं। यह भी सच है। कहा जाता है कि बूढों की काम-वासना उनकी आखों और जबान में आ जाती है। यह भी सच है। लेकिन बुढ़ापे में मेरे साथ हो हुआ, वह आम-तौर पर होता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम।

लोग कहते हैं कि बुढ़ापे में बहुत अजीब तरह से खिसका हूं। इसका सुबूत यह दिया जाता है कि मैं अखबार को उल्टा पढ़ने लगा हूं। उल्टा पढ़ने से मतलब यह नहीं कि पिछला पन्ना पहले और पहले का पन्ना आखिर में पढ़ता हूं। उल्टा पढ़ने का यह मतलब भी नहीं कि किसी घटना या सूचना आदि को उल्टा कर देता हूं। उदाहरण के लिए अगर खबर है कि सरकार ने अकाल पीड़ित जनता को सौ-करोड़ रुपए की सहायता देने का निश्चय किया है, तो मैं इस खबर को उल्टा कर देता हूं। पढ़ता हूं कि अकाल पीड़ित क्षेत्र की जनता ने सरकार को सौ करोड़ रुपयें की सहायता देने का निश्चय किया है। यह उल्टा-पुल्टा समझने और कहने की आदत शायद पुरानी है। बस, इतना हुआ है कि बुढ़ापे में थोड़ी बढ़ गई है। मैं पेशे के तौर पर अध्यापक हुआ करता था। छात्रों को जब भी पढ़ाता था, यह लगता था कि छात्र मुझे पढ़ा रहे हैं। और धीरे-धीरे छात्रों से मेरा अच्छा रिश्ता स्थपित हो गया था, क्योंकि मैं पास छात्रों को फेल और फेल छात्रों के पास मानने लगा था। मैं बुद्धिमान को मूर्ख और मूर्ख को बुद्धिमान कहता था। छात्र मेरी बातों के मर्म को समझते थे, लेकिन प्रधानाचार्य मुझसे बहुत नाराज रहता था। क्योंकि में उसे चपरासी और चपरासी को प्रधानाचार्य कहा करता था। एक बार स्कूल में एक नेता आए थे। मैंने नेता को जनता और जनता को नेता बोल दिया था। इस पर नेता ने मेरा तबादला एक दुर्गम स्थान के स्कूल में करा दिया था। पर यह सब मेरे लिए सरल था।

इसी दौरान मैंने सुबह का अखबार चौराहे पर जाकर पढ़ना शुरू कर दिया था। मैं खबरें पढ़ता था-‘प्रधानमंत्री ने ग्लानी के साथ कहा कि देश बहुत तेजी से पीछे जा रहा है।’ मेरी ये खबरें सुनकर लोग प्रसन्न हुआ करते थे। वे मुझसे तरह-तरह की खबरें पढ़वाते थे और देखना चाहते थे कि असली खबरों को अखबार वाले कैसे तोड़-मरोड़ कर छापते हैं। किसी ने मुझे यह सलाह भी दी थी मैं अपना अखबार शुरू कर लूं। लेकिन मेरे पास खबरें नहीं थी। मैं तो अखबारों की उल्टी खबरों से ही सीधी खबरें बनाता था।

एक दिन मैंने चौराहे पर खबर पढ़ी की रक्षा मंत्री ने देश से कहा कि कि देश पूरी तरह असुरक्षित है और विदेश से किसी प्रकार का ‘कोई खतराहैं। इस खबर के बाद मैंने दूसरी खबर पढ़ी कि प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि हम पड़ोसी देशों से अपनी सभी समस्याओं को लड़ाई-झगड़े द्वारा हल करना चाहते हैं। तीसरी खबर थी कि देश की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है। निर्यात घट रहा है, आयात बढ़ रहा है।

रोज की खबरें सुनाकर मैं अपने क्वार्टर में चादर ताने बेफिक्री की नींद सो रहा था कि अचानक किसी ने दरवाजे पर ठोकरें मारी। मैं उठ गया। दरवाजा खोला दो बाहर तो सफारी सूटधारी खड़े थे। उनमें से एक मुझे देखकर बोला-तुम देश के सबसे बड़े दुश्मन हो।

मैंने पढ़ा-तुम देश के सबसे बड़े मित्र हो।

वे बोले-तुम किस देश के एजेंट हो

मैंने पढ़ा-तुम किस देश के एजेंट नहीं हो

मैंने कहा-आप लोगों का अभारी हूं कि आप मुझे इतना सम्मान दे रहे हैं।

-क्या मतलब उनमें से एक काफी चिढ़ गया।

- मैं आप लोगों का एहसानमंद हूं। मैंने भाषा का दूसरा रूप पेश किया। टीचर जो ठहरा।

-अबे होश में है कि नहीं वह बोला।

मैंने पढ़ा-जनाब आप पूरी तरह होश में है।

मैं क्या बोलता। सोचा बोलना खतरनाक है। गर्दन ‘हां’ में हिला दी। इस पर वह और गुस्से में गया।

-साले तू रात दिन-जनता को भड़काता रहता है।’’ वाह बोला।

मैंने पढ़ा-प्रिय भाई आप रात-दिन जनता को समझाते रहते हैं।

मैंने कहा-यह मेरा फर्ज है।’’

-क्या बोला’ वह दहाड़ा।

-भाई साहब, आप जो कह रहे हैं सच है। मैं बोला।

-तो तू मानता है,

-हां मानता हूं...आप मुझे बहुत सम्मान दे रहे हैं। मैंने कहा।

-तू तो जूते मारने लायक है।’’ वह बोला।

-आप मुझे क्यों सिर पर बैठकर इतना सम्मान दे रहे हैं। मेरे यह कहते ही वह मेरी तरफ झपटा और जोर का झापड़ मारा। मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि मैं अपने ढंग से इसका आलेख पढ़ चुका था।

-इसे ले चलो। वह बोला।

-इसके खिलाफ सुबूत दूसरे ने पूछा।

- यह अपने आप अपने खिलाफ सुबूत भी है और गवाह भी।

वे मुझे लेकर चल दिए। वे मुझे एक बड़े कमरे में ले गए, जहां तेज रौशनी थी। पर, मुझे लगा अंधेरा है। मैंने उनसे पूछा कि यहां अंधेरा क्यों कर रखा है वे बोले, अभी पता चल जाएगा कि यहा अंधेरा है या उजाला। उनमें से एक गया और कुछ अखबारों के बंडल ले आया और एक अखबार मुझे पकड़ाकर बोला-तुम अखबार उल्टा क्यों पढ़ते हो

-उल्टा तो आप लोग पढ़ते हैं। मैंने कहा।

-ये गलत है...तुम सीधे शब्द नहीं समझते क्या

-मैं सीधे ही शब्द समझता हूं। मैं बोला।

-पढ़ो, उन्होंने एक समाचार मेरे सामने कर दिया और पकड़कर सुनाया ‘राज्य विकास प्राधिकरण ने गरीबों के लिए ग्यारह हजार फ्लैट बनाए।’

-इस समाचार को पढ़ो’’ उनका सरदार, जो मुझे पीट चुका था, बोला।

-राज्य विनाश, प्राधिकरण को गरीबों ने ग्यारह हजार फ्लैट दिए। मैंने पढ़ा।

-देखा आपने उनमें से एक बोला।

-बस, अब सुबूत की जरूरत नहीं है...फिर भी तगड़ी दफा लगाने के लिए कुछ और प्रमाण जमा कर लो। वह बोला।

-चल पढ़ इसे-उनमें से एक ने अखबार सामने रख दिया। जिस पर हेडलाइन थी-माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।

दूसरा बोला-चल, इसे पढ़ दे।

-माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा...

-बस-बस...देख...संभलकर। उनमें से एक बोला।

-ओये...उल्लू के पठ्टे...उसे बोलने क्यों नहीं दिया उनके अधिकारी ने कहा और मुझसे बोला-‘कहो...जी...तुम कहो...’

-मुझे कोई टोक देता है, तो मैं कुछ नहीं बोलता।

- देखा...साला बच निकला...देशद्रोह में फंस जाता, तो मजा आता। उनका अधिकारी ने बोला।

चलो जी सीधे-सीधे सवाल पूछ लो और केस बन्द करो...वैसे भी इसका ‘एनकाउन्ट’ तो करना ही है। एक सफारी सूटधारी बोला।

-ठीक है...पूछो।

- कश्मीर...पर पूछ ले...नागालैंड पर सवाल कर...और नहीं तो...‘डेमोक्रेसिया’ पर पूछ ले। उनमें से एक बोला।

अभी ये बात हो ही रही थी कि एक और आदमी कमरे के अन्दर आया। उसे देखकर सब खड़े हो गए। वह आदमी मुस्कुरा रहा था। सब उसके सामने चूहा बने हुए थे। मैं समझ गया कि यह आदमी इन सबका अफसर ही है।

-सर, ये आदमी खतरनाक है। एक ने मेरी तरफ इशारा करके अफसस से कहा।

-देशद्रोही है। दूसरे ने कहा।

- माओवादी है। तीसरा बोला।

- आतंकवादी है। चौथा बोला।

साहब बोला-तुम सब बेवकूफ हो।

चारों ने कहा यस सर।

साहब बोला- तुम इसका ‘एनकान्टर’ करना चाहते हो

-नहीं सर...ट्रेन से कटकर मरेगा।

- पानी में डूबकर भी मर सकता है।

- तुम लोकतंत्र पर धब्बा हो। साहब बोला।

- क्यों सर वे बोले।

- अरें, अब भी इतने पिछड़े हो...जितना तुम्हारे पुरखे थे। साहब बोला।

-यस सर...वे बोले।

साहब ने मुझसे कहा-आप जा सकते हैं...आप धोखे से पकड़ लिए गए थे। आप आजाद हैं।

मैंने कहा-मैं कहां जाऊं

साहब बोला-आजाद हैं...ट्रेनें देश के कोने-कोने में जाती हैं। चाहें तो केरल के ‘बीच’ बहुत सुन्दर हैं...जहां आपको दिल चाहे...वहां जा सकते हैं। -मेरा दिल...मैं अपना दिल इधर-उधर तलाश करने लगा।

-क्या तलाश कर रहे हैं साहब बोला।

-अपना दिल। मैंने कहा।

-बहुत बड़ा देश है। कहीं न कहीं आपको मिल ही जाएगा।’’ साहब बोला।

-ठीक है...मैंने उठते हुए कहा-मैं खतरनाक तो नहीं हूं

साहब बोला-पहले दिल तलाश कर लीजिए। तब बताऊंगा।

कत्लेआम का मेला

आसमान का रंग इतना सुर्ख हो गया जैसे तपता हुआ इस्पात और लगा कि अभी कुछ ही सेकेंड में आसमान फट जाएगा और जमीन के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। हवा में जली हुई लाशों की बदबू शामिल हो गई और आसमान पर सफेद बादलों के डरे-सहमे टुकड़े अपनी जान बचाने की कोशिश में इधर-उधर छिपने की जगह तलाश करने के लिए भागने-दौड़ने लगे।

लकड़ी का पुराना दरवाजा हल्की-चरचराहट की आवाज के साथ खुला। दरवाजे की आवाज ऐसी दर्दनाक थी जैसे किसी का दिल चीर दिया गया हो। दरवाजे के अन्दर पहले बूढ़े पिता का सिर आया। उलझे-उलझे बाल और अरस्तु जैसी दाढ़ी के बीच पसीने से भीगा काला चेहरा जो आंखों के बोझ को संभाल नहीं पी रहा था। सिर के बाद पिता ने कन्धे पर लदी जवान बेटे की लाश का लटका हुआ सिर अन्दर आया।

आंगन में खड़ी बूढ़ी औरत, दो लड़के और एक लड़की बूढ़े को अन्दर आता देख रहे थे। बूढ़े ने अपनी परिवार की तरफ नहीं देखा क्योंकि वह जानता था कि बताने के लिए कुछ नहीं है और ये जो सामने खड़े हैं सब जानते हैं। धीरे-धीरे बूढ़ा कन्धे पर जवान बेटे की लाश रख अन्दर आंगन में आ गया। कच्चे आंगन के एक कोने में बेरी के पेड़ से बंधी बकरी बूढ़े को देखकर मिमियाई और चुप हो गई। बूढ़े के कपड़े पसीने में तर थे। उसके पैर कांप रहे थे, लेकिन उसे देखकर यह नहीं लगता था कि वह थक गया है जबकि ऐसा उसके साथ पहली बार नहीं हो रहा था। पिता अपने बेटे की लाश कन्धे पर उठाए खड़ा रहा। लड़की आगे बढ़ी और कच्चा आंगन बुहारने लगी।

जीवित और मरे हुए आंगन में आने लगे। कुछ ही देर में भीड़ लग गई पिता अपने बेटे की लाश कन्धे पर लिये खड़ा रहा।

...उनके पास हथियारों की कमी नहीं है।

...उनकी सेना को भरपेट खाना मिलता है।

...उनके पास ऐसी दूरबीन हैं जो हमारे दिल के अन्दर तक देख लेती हैं।

कोई क्या कहता, न किसी को दिलासा दिया और न हमदर्दी जताई, न दुःख जाहिर किया और न सांत्वना के दो शब्द बोले।

लड़की आंगन बुहारती रही और पिता बेटे की लाश कन्धे पर रखे खड़ा रहा। लोग प्रेतात्माओं की तरह बातें करते रहे।

-ये देखो हमारे सात बेटों को कुचल डाला है...

-ये तो चलती फिरती रौनक और रौशन सड़क के किनारे मरा है...इसे किसी ने कुचला नहीं...ये...

हमें क्या शिकायत...हम तो जिन्दा कब्रिस्तान में रह रहे हैं।

-देखा इनके गले पर रस्सी के फन्दों के निशान हैं।

-इन्हें फांसी दी गई है।

-नहीं इन्होंने खुद फांसी लगाई...अब उन्हें इतनी भी फुर्सत नहीं है कि फांसी लगाए...अब तो हम अपने आप ही...।

लड़की ने आंगन साफ कर दिया। मां आगे बढ़ी और आंगन को लीपने लगी। मां आगे बढ़ी और आंगन को लीपने लगी। पिता अपने कन्धे पर बेटे की लाश लिये खड़ा रहा। मां धीरे-धीरे जैसे यह करते-करते ऊब गई हैं, आंगन लीपती रहीं।

...एक सौ ग्यारह लोगों की लाशें आ गई हैं।

...ये नौकरी मांगने गए थे।

...ये इंटरव्यू देने गए थे।

...ये देश की सेना में भरती होने गए थे।

...ये एडमीशन लेने गए थे।

बूढ़े बाप के चेहरे पर थकान के आसार नहीं थे। वह एकटक, एक ही पोजीशन में बेटे की लाश उठाए खड़ा था। उसकी पलकें भी नहीं झपक रही थी। आंगन को लीपती उसकी औरत ने घूंघट के पीछे से बूढ़े को देखा। बूढ़ा जब पहली बार सबसे बड़े बेटे की लाश लाया था तो इसी तरह खड़ा था। तब वह कुछ बोल रहा था, कह रहा था। शुक्र करो कि मुझे अपने लाड़ले की लाश मिल गई है। कुछ लोगों को तो उनके बेटों, बेटियों की लाश नहीं मिल पाई है। जिन्होंने मेरे बेटे को मारा है बहुत नरम दिल लोग थे। इतनी इंसानियत कौन दिखाता है आजकल।

बूढ़े बाप की आंखों में यादों का जुगनू जगमगा गया। जब यह पेट मे था-जो आज कन्धे पर है-तो इसकी मां ने, जो आंगन लीप रही है कहा था-‘‘सुनो जी आज काम से लौटते समय एक-दो मीटर कपड़ा लेते आना।’

-‘‘क्यों’

-‘‘ये पहनेगा क्या’वह अपने पेट की तरफ देखकर शरमा गई थी।

...बूढ़े पिता ने यादों के जुगनू को उड़ा दिया। अभी तो दो बेटे और एक बेटी हैं।

...उन्होंने हमारी आंखों के आंसू भी छीन लिए।

...ये कौन हैं जो तमाम लाशों के चारों तरफ सिर झुकाए बैठे हैं और खामोशी में अपने को घोल रहे हैं।

अब गिनती करना भी छोड़ दिया गया है। क्या फर्क पड़ता है, न मारने वाले की आंख में आंसू आता है और मरने वाले के रिश्तेदार ही होते हैं। सबने मान लिया है, जान लिया है, समझ-बूझ लिया है।

-ये पानी मांगने गए थे।

-ये बिजली मांगने गए थे।

-और इधर...पता नहीं कितनी लाशें पड़ी हैं।

-वे इंसाफ मांगने गए थे।

-क्यों मार दिया

-बहुत बड़ा जुर्म किया है।

बूढ़ा पिता कन्धे पर जवान बेटे की लाश उठाए खड़ा है। उसकी मां आंगन लीप रही है। लगता है दसियों साल बीत गए हैं और यह दृश्य ठहर गया है जैसे पहाड़...जैसे नदियां...बूढ़े पिता को जुगनू परेशान कर रहे हैं...ये बूढ़ी औरत जो आंगन लीप रही है दरअसल जादूगरनी है। ये आधा किला चावल और चार-पांच आलू से ऐसा खाने बनाना जानती है जिससे चार बच्चों और बाप का पेट भर जाता है। उसका पेट तो हमेशा भरा ही रहता है।

...ये औरत...जादूगरनी है...बच्चे ही नहीं...न जाने क्या-क्या पैदा कर लेती है...यादों के जुगनू उड़ने लगे...

बूढ़ी औरत लिपाई करती रही। धीरे-धीरे जमीने सूखती रही। लोग जमा होते रहे। बूढ़ा पिता जवान बेटे की लाश कन्धे पर रखे खड़ा रहा। सूरज धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगा।

दो भाई कहीं से कुछ फूल ले आए। उन्होंने फूल एक कोने में रख दिए और अपने पिता की तरफ देखा। बड़े भाई की लाश से खून की बूंदें टपक-टपक कर जमीन पर गिर रही थीं और बूढ़े बाप का कन्धा पूरा गीला हो गया था लेकिन वह थका नहीं था। दोनों बेटे बाप के कन्धे को देख रहे थे और सोच रहे थे उन्हें भी एक दिन इसी तरह यहां आना होगा। बहन झाडू देगी...मां लिपाई...

-ये अस्पताल के सामने पड़े थे...वहां से लाए गए।

-ये खेती-बाड़ी कर रहे थे।

-और ये

-ये...ये कुछ नहीं कर रहे थे।

-और ये...

-ये गैस...से...

-और ये

-ये बेकार थे...बेकार।

बूढ़ा आगे बढ़ा, बुढ़िया ने उसकी मदद करनी चाही पर बूढ़े ने हाथ के इशारे से मना कर दिया। दोनों लड़कों ने भी पिता के कन्धे से बड़े भाई की लाश को उतारने में मदद करनी चाही लेकिन बूढ़े ने मना कर दिया। लड़की अपने बूढ़े पिता की मदद की गरज से पीछे हट गई।

बूढ़े ने बहुत धीरे-धीरे एक-एक क्षण लेते हुए; बहुत आहिस्ता-आहिस्ता अपने जवान बेटे की लाश को जमीन को तरफ लाना शुरू किया। पहले पीठ...फिर सिर...फिर टांगें...बुशर्ट खून में तर है।

-नाक से भी खून निकल रहा है।

-ये कैसे मरा एक आवाज आई

-क्या करोगे पूछकर बूढ़ा बोला।

-क्या हुआ था

-सब एक ही बात है...नतीजा एक ही निकलता है...

सब खामोश हो गए।

भाइयों ने अपने बड़े भाई का डिग्री लेते हुए ‘कन्वोकेशन’ में लिया गया चित्र सामने रख दिया। बहन ने फूल चेहरे के इधर-उधर रख दिए। बूढ़ी मां लगातार जवान बेटे का चेहरा देखती रही...बिलकुल पत्थर की मूर्ति की तरह।

बूढ़ा पिता लड़खड़ाकर खड़ा हो गया और हवा में हाथ हिलाने लगा जैसे कुछ पकड़ने की कोशिश कर रहा हो। फिर लोग वहां से हट गए। लाश का सिर बुढ़िया ने अपनी गोद में ले लिया। माथे पर से खून में सने बाल हआए और चूम लिया। उसके होंठों पर बेटे का खून लग गया। बूढ़े ने एक अजीब तरह की भयानक और दर्द में डूबी चीख मारी...पूरे आंगन में जुगनू चमकने लगे...हर तरफ जुगनू ही जुगनू...सब कुछ जुगनुओं के बीच खो गया...एक किलकारी एक जुगनू...धरती पर पहला कदम...एक जुगनू...गुलाबी होंठों से पहला उच्चारित शब्द एक जुगनू...स्कूल का बस्ता...टिफिन...सपना...जुगनू...जुगनुओं के बीच एक जीवन उभरा...एक पूरा जीवन...लोगों का जीवन...और जुगनुओं मं डूब गया...मां की सिसकियां से जुगनू लिपटे रहे। बाप हवा में हाथ उठाए विपत्तियों को देखता रहा...भाई और बहन जुगनुओं में खोते चले गए...आसमान का रंग फिर बदलने लगा...धीरे-धीरे एक करुण आवाज धरती से आती सुनाई देने लगी...अस्पष्ट आवाज साफ होती चली गई...करुण स्वर उभरा...ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी...जो शहीद हुए...।

यहां से देश को देखो

चांद और जमीन के बीच से देखा जाए तो यह लाखों मील चौड़ा जमीन का हिस्सा है जहां धरती फटकर चीथड़ा-चीथड़ा हो गई है। इस कोने से उस कोने तक जमीन में दरारें ही दरारें दिखाई देती हैं। सूखी हवा का तांडव बेरोक-टोक जारी है। आबादियां मिट्टी में मिल गई हैं। और सिवाय निर्जीवता के कुछ और नहीं है। मौत के डरावने तूफान उठते हैं और लोगों को अपने साथ उड़ा लेते हैं। जो अकाल मौत का शिकार हो जाते हैं उनकी आंखें और हाथ उधर पास की उड़ती हुई रोटियों का पीछा करते हैं। और थककर ठहर जाते हैं।

लाखों करोड़ों सूखे हाथ और निर्जीव आंखें।

ऊपर आसमान में अचानक नीली छतरी और सफेद बादलों को चीरते हेलीकॉप्टर इस तरह नीचे आते दिखाई पड़ते हैं जैसे सीधे स्वर्गलोक से आ रहे हों। विशाल, विकराल दैत्यनुमा हेलीकॉप्टर अपनी शक्ति और ताकत का सिक्का जमाते, अपनी श्रेष्टता और उत्कृष्टता को सिद्ध करते, अपने अधिकारों और सत्ता का प्रर्दशन करते नीचे उतर रहे हैं। उनके बड़े-बड़े पंख हवा को चीर रहे है। काले रंग का मजबूत इस्पात और आधुनिक कल-पुर्जे और नई तकनीक से बने हेलीकॉप्टर लगता है झपट्टा मारकर जी चाहेंगे अपने साथ ले जाएंगे, जहां उतरेंगे उस धरती को जला डालेंगे, जहां चाहेंगे मौत की बारिश कर देंगे और जहां चाहेंगे जिन्दगी का सफाया हो जाएगा...शक्ति और शक्ति और शक्ति...ताकतवर, तेज, रफ्तार मजबूत और इस्पात के दिल वालीे हेलीकॉप्टर।

हवा में उड़ते हुए हाथ जुड़ जाते हैं और उनमें फूलों की माटी-मोटी मालाएं आ जाती हैं। आंखें स्थिर हो जाती हैं और आकाश से अवतरति होते हेलीकॉप्टरों की तरफ देखने लगती हैं। हाथ काले हैं, हथेलियां में रेखाएं नहीं हैं। कोई रेखा नहीं है, न भाग्य की, न उम्र की, न पैसे की, न परिवार की।उंगलियों पर मोटे-मोटे सख्त गट्टे पड़े हैं। लगता है जानवरों जैसा काम करते करते ये हाथ खुर बन गए हैं। लेकिन इनमें और खुरों में अन्तर है तो यही है कि खुर मालाएं नहीं पकड़ सकते। खुर चुनाव निशान पर ठप्पा नहीं लगा सकते। खुर हाथ नहीं जोड़ सकते।

बादलों को फाड़ते हेलीकाप्टर कुछ नीचे आ गए हैं पर लगता है उन्हें उतरने की जल्दी नहीं है। वे आकाश में कवायद कर रहे हैं जैसे फौजी हथियारों और अस्त्रें-शस्त्रों के साथ करते हैं। कभी हेलीकॉप्टर एक लाइन में कदमताल चलते हैं, कभी ऊपर नीचे हो जाते हैं, कभी सीढ़ी जैसी बना लेते हैं, कभी फांसी के फंदे की तरह गोल दायरे में उड़ने लगते हैं, कभी अलग-अलग दिशाओं में मुड़ जाते हैं, तेजी से नीचे आते-आते ऊपर चले जाते हैं, एक पल में दिशाएं बदल लेते हैं कलाबाजियां खाते हैं, कभी तड़तड़ाहट की आवाजें निकलते हैं जैसे मशीनगन से गोलियां चल रहीं हों, कभी संगीत बिखर जाता है। कभी छलावा लगते हैं, कभी हकीकत नजर आते हैं।

ये हाथों में फूलों की मोटी-मोटी मालाएं लिये सिर्फ उन्हें देखते हैं। लगता है इन लोगों के पास और कुछ नहीं, सिर्फ दो हाथ हैं जिनमें मोटी-मोटीमालाएं हैं और ये इसी तरह पैदा हुए थे, इसी तरह मर जाएंगे। न इनका पैदा होना उनके हाथ में था और न इनका मरना ही इनके हाथ में होगा।

इस अचम्भे से पहले कई तरह के अचम्भे यहां हो चुके हैं। पता नहीं कहां से बीस-बीस पहियों वाले सैकड़ों ट्रक यहां आ गए थे। उनमें क्या है, ये कोई जान न सका था क्योंकि ये ट्रक लोहे की मोटी चादरों से ढंके हुए थे।

लेकिन अगले दिन ही लोगों ने देखा कि किसी जादू से एक बड़े से इलाके के चारों तरफ प्लास्टिक की दीवारें खड़ी हो गई हैं। गेट लग गए हैं बड़े से अहाते के अन्दर सड़के बन गई हैं। बिजली के हंडे जल रहे हैं। पेड़ लग गए हैं जो रोशनी में जगमगा रहे हैं, घास के मैदान बन गए हैं, पानी के फौव्वारे छूट रहे हैं। जादू की नगरी में महल-दो महले बन गए हैं।

हेलीकॉप्टर अचानक गंभीर हो गए। राष्ट्रीय गीत का संगीत बजने लगा। उसके बाद देश प्रेम के गीत हवा में बिखरने लगे। ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’ का संगीत सुगन्ध बनकर फैल गया। फिर जयघोष होने लगा। जुड़े हुए हाथ से तालियां बजने लगीं, प्रशस्तियां शुरू हो गई। उसके बाद आंकड़ों से सिद्ध किया गया कि हम विश्व शक्ति बन चुके हैं।

विशाल, ऊंचे, व्यापक, भव्य मंच सामने हेलीकॉप्टर से प्रधानमंत्री उतरे , मंत्री मंडल उतरा, पक्ष और विपक्ष के नेता उतरे, संसाद उतरी, हर जाति के नेता अवतरित हुए, सरकार उतरी, सर्वोच्च न्यायालय उतरा, प्रेस और मीडिया उतरा, पंडित, मौलवी, महंत, योगी, आचार्य माफिया सरगना, डॉन सुपर स्टार और शताब्दी के नायक, नायिकाएं उतरीं।

असंख्य हाथ तालियां बजाने लगे।

तालियों की आवाज कम है...आप लोगों से अनुरोध है कि अपने मुर्दो को भी ले आएं ताकि अधिक लोग तालियां बजा सकें।

मुर्दे भी आ गए और तालियां बजाने लगे।

अब भी तालियां कम बज रही हैं...जानवर और पेड़ पौधे भी तालियां बजाएं।

और वे भी तालियां बजाने लगे।

प्रधानमंत्री ने इतना आत्मीय, संवेदनशील और भावभीगा भाषण दिया कि उनकी आंखों में आंसू आ गए।

कृषि मंत्री ने कहा-आप लोग चिन्ता ने करें, हम कुछ ऐसा करने जा रहे हैं कि खेतों में हैम्बर्गर और चिप्स फला करेंगे...कारें उगेंगी, टी.वी. औरफ्रिज पैदा होंगे...।

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा-हम यहां दस सुपर स्पेशलटी अस्पताल खोलेंगे जहां आप ही लोगों को रोजगार मिलेगा...आप ही मरीज होंगे और आप ही डॉक्टर होंगे...आपका ही आपरेशन होगा और आप ही ऑपरेशन करेंगे...।

विपक्ष के नेता ने कहा-आप चिन्ता न करें, हम लगातार विपक्ष में बने रहेंगे...अगली सरकार हमारी बनी तो भी विपक्ष रहेगा...मतलब विपक्ष...होगा।

शताब्दी के महानगर ने कहा-मैं मुम्बई में रहता हूं, पर मेरा मन यहांआपके बीच है। शताब्दी की महानायिका मंच पर आई तो लोगों ने पहली बार मुंह खोला, एक ही आवाज आई ‘ठुमका लगाओ, ठुमका’ महानायिका ने ठुमके लगाए।

हेलीकॉप्टर वापस लौट रहा है। अन्दर की तरफ शान्ति है। प्रधानमंत्रीमंत्रिमंडल और विपक्ष के लोग खुलकर पूरी-पूरी सांसें ले रहे हैं। हेलीकॉप्टर के अन्दर की हवा पूरी तरह स्वस्थ और सुरक्षित है।

धर्माचार्यो ने बहुत मेहनत की है। वे सभी बढ़ती उम्र और बढ़ते वजन के कारण अब इतना भी नहीं कर पाते। वे पीछे की सीटों पर सो रहे हैं।

युवा संसद विश्वसुन्दरी और शताब्दी की महानायिका से ठिठोलिया कर रहे हैं। महानायक अपना हैट मुंह पर रखे सो रहे हैं।

हेलीकाप्टर हवा से बातें कर रहा हूं।

पत्रकार और मीडिया के लोग मंत्रियों से अपने रिश्ते पक्के करने में जूटे हैं।

विश्वसुन्दरी और शताब्दी की महानायिका ने हेलीकाप्टर की खिड़की से बाहर देखा और बोली-वो क्या है वो पत्थर कैसे लगे हैं। युवा सांसद की आंख कमजोर है, वह देख नहीं पाया।

‘‘क्या है कुछ नहीं।’’

‘‘नहीं नहीं...वो देखो।’’

दूसरी युवा सांसद बोला-पहाड़ है।’’

‘‘नहीं-नहीं वह पहाड़ नहीं है।’’ विश्वसुन्दरी ने कहा।

‘‘फिर क्या है’ युवा सांसद ने पूछा।

अभिनेत्री ने पास बैठे एक अधेड़ उम्र राजनेता से पूछा और वह उछल कर खिड़की पर आ गया।

‘‘वो उधर पत्थरों जैसा क्या है कब्रिस्तान जैसा लगता है।’’ विश्व सुन्दरी ने पूछा।

‘‘नहीं-नहीं, कब्रिस्तान नहीं है।’’

‘‘पत्थर बिलकुल वैसे ही लगे हैं जैसे कब्रों के ऊपर लगाते हैं।’’ विश्व सुन्दरी ने कहा।

‘‘नहीं...शिलान्यास के पत्थर हैं।’’

‘‘क्या मतलब’

‘‘हम यहां पचास स्कूल खोलेंगे...दस अस्पताल बनाएंगे...पांच सुपर मॉल खोले जाएंगे...बीस पुल बनाए जाएंगे...पन्द्रह सडकें तैयार होंगी...पांच कॉलोनियां बसाई जाएंगी...ये उन सब योजनाओं के शिलान्यास के पत्थर है।’’

‘‘ओ यू मीन फाउंडेशन स्टोन हैं।’’

‘‘हां हां...वही।’’

‘‘और उधर क्या है...उधर’ विश्व सुन्दरी ने दूसरी तरफ इशारा किया।

‘‘उधर...उधर पिछले चुनाव में किए गए शिलान्यास हैं।

‘‘और उस तरफ’

‘‘उससे पहले वाले चुनाव में...’’

‘‘और उधर...बहुत से पत्थर जो दिखाई पड़ रहे हैं।’’

‘‘मैडल वो पत्थर नहीं हैं...आदमी हैं।’’

‘‘आदमी...यू मीन पीपुल

‘‘जी हां।’’

‘‘पर पत्थर जैसे लगते हैं।’’

‘‘शिलान्यासों की पूजा करते-करते पत्थर हो गए होंगे।’’ एक युवा सांसद ने कहा।

‘‘नहीं नहीं...अभी इन्हीं लोगों ने तो तालियां बजाई थीं।’’ वरिष्ठ नेता बोला।

‘‘लेकिन लोग यहां से पत्थर क्यों लग रहे हैं’ विश्व सुन्दरी ने पूछा।

वरिष्ठ नेता कुछ देर तक सोचता रहा, फिर बोला, ‘‘यही उन्हें देखने की सही जगह है...’’वह उठकर अपनी सीट पर बैठ गया।

पूरा मंत्रिमंडल, पूरी सासंद, पूरा विपक्ष पत्थरों के ऊपर उड़ता रहा और पत्थर उनके स्वागत में अपने हाथ हिलाते रहे।

मेरे मौला

याचना, प्रेम, विनय और करुणा...यह सब क्या है...आंखों के सामने तस्वीर आ गई...मेरे मौला बुला ले मदीने मुझे...उलाहना...घिसे पिटे टेप से निकलकर आवाज कानों के परदों से टकराती लाखों-करोड़ों की भीड़ से गुजरती खलील मियां के चेहरे पर आकर कांपने लगती है और खलील मियां के मुंह से शाही किमाम की खुशबू में ध्वनि तरंगें घुल जाती हैं...क्या है यार...मेरे मौला बुला ले...आवाज की पिच बढ़ जाती है। मैं अपने को रोक नहीं पाता...आंखें बन्द हैं और खलील मियां के हाथों में कैंची और कंघा मेरे चेहरे पर तेजी से गश्त कर रहे हैं।

‘‘क्या हज करने का इरादा हैं..’’मैंने अश्लील मियां से पूछा...लहजे में जो छिपा हुआ व्यंग्य था, वे समझ नहीं पाए। खलील मियां सोच ही कैसे सकते थे कि कोई मुसलमान हज करने के इरादे को व्यंग्यात्मक स्वर में भी कह सकता है।

‘‘जब मौला चाहेंगे...अभी कहां हमारी सुनवाई हुई है।’’

‘‘क्यों, क्या बात है’

‘‘दो लड़कियों का ब्याह करना है, सर!’’

‘‘कितने बच्चे हैं तुम्हारे’

‘‘दो लड़के और माशा अल्ला से चार लड़कियां।’’

‘‘हूं।’’ मैं खामोश हो गया। मेरी ‘हूं’ में क्या नहीं था...

‘‘लड़के क्या करते हैं’ मैंने फिर पूछा।

‘‘यही काम, जो हम करते हैं।’’

मैं समझ गया...यानी बाल काटते हैं, दाढ़ी बनाते है।

हाइड्रो पॉवर स्टेशन, जिसे चालीस साल पहले आधुनिक भारत का तीर्थ कहा जाता था, अब सिर्फ पॉवर हाडस रह गया है। पुराने सोवियत यूनियन के विकास मॉडल पर बनाया गया पॉवर हाउस...फ्लैट, बंगले, क्लब, शादीघर, मार्केट, अस्पताल, सिनेमा हॉल...सब कुछ अपना...पॉवर हाउस की सेंट्रल मार्केट मे खलील मियां की नेशनल हेयर कटिंग सैलून...

सेंट्रल मार्केट में दूसरे दुकानदार खलील मियां को खलील मियां कहते हैं...कुछ मजाक में खाली मियां भी कहते हैं...खाली मतलब कुछ नहीं, मियां को मतलब मुसलमान...अपने इस नाम पर खलील मियां भाव शून्य चेहरे से ताकते हैं, बोलते कुछ नहीं...

बीएससी इंजीनियरिंग के बाद पॉवर हाउस में नौकरी...आप नेशनलिस्ट मुसलमान हो नकवी साहब...नेशनलिस्ट अरे आप होली में रंग खेलते हो...आप दिवाली में जुआ खेलते हो...आप नेशनलिस्ट मुसलमान हो...तिवारी जी, क्या आप नेशनलिस्ट हिन्दू हो आप ईद में सेवई खाते हो आप बकरीद के कबाब खाते हो आप नेशनलिस्ट हिन्दू होें..

‘‘मियां बकरीद आ रही है...कुर्बानी कहां करोगे’...खलील मियां ने तीस साल पहले मुझसे यही सवाल पूछा था, जो आज पूछ रहे हैं।

‘‘अच्छा, बकरीद...’’

‘‘हां कल चांद हो गया तो परसो...’’

‘‘तुम तो जानते ही हो, खलील मियां, हम गांव में ही कुर्बानी कर देते हैं।’’

‘‘हां, मियां...यहां कहां लफड़े में फंसोगे...’’

ऊपर तिवारी जी, नीचे त्रिपाठी जी, बाएं हाथ वाले फ्लैट में वर्मा जी, दाहिनी तरफ सिंह साहब...नकवी जी, आप जब मीट पकाया करें, तो हमें बता दिया करें...हम लोग उस दिन कहीं और चले जाया करेंगे...हमारी मैडम को मीट की दुर्गंध से उल्टी आ जाती है...पर आप लोग खाओ...

नयी-नयी शादी हुई थी...सफिया गोश्तखोर...अब क्या हो सफिया को अम्मां...अब्बू...मीटिंग बैठ गई...असिस्टेंट इंजीनियर...देखो छत पर अंगीठी ले जाओ...वहां गोश्त भून लो...हवा में खुशबू उड़ जाएगी...तब नीचे लाओ...किसी को पता चल गया...खलील मियां ने कहा था पहली बकरीद पर...‘‘अगर आप कहें, तो मैं कुर्बानी...

‘‘अरे, छोड़ो! ऐसी कुर्बानी ये क्या फायदा कि हम ही कुर्बान हो जाएं...

‘‘नहीं-नहीं...खलील मियां...सब हो जाएगा...तुम फिक्र न करो...’’

यार, यह मुसलमान भी अजीब कौम है...मेरे मौला बुला ले...अरे यार,अपनी बदहाली को दूर करने की दुआ नहीं मांगोगे...अपने पिछड़ेपन को दूर नहीं करोगे...बस, मदीने...अरे, तो वहां से आए ही क्यों थे...आए कहां थे...पता नहीं कबसे हम रटने लगे...मेरे मौला...अब देखिए, मेरे मां-बाप को क्या सूझी कि मेरी नाम लख्ते हसनैन नकवी रख दिया...अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तक तो नाम ठीक-ठाक रहा, लेकिन पॉवर हाउस में...एल एच नकवी करना पड़ा। फिर ‘क’ को ‘ब’ बनाना पड़ा...अरे यार, यह तो सभी करते हैं...सी एल शर्मा क्या अपने को छेदीलाल शर्मा लिखें..

‘‘आप नेशनलिस्ट मुसलमान हो, नकवी जी...अपने-अपनी लड़की को स्कूल में संस्कृत दिलवायी है।’’

पॉवर हाउस के चार हजार कर्मचारियों में ग्यारह सौ इंजीनियर...उनमें से एक लख्ते हसनैन नकवी...बाकी शर्मा, पाठक, पांडेय, द्विवेदी, चतुर्वेदी, सिंह, वर्मा, लाल और पाल...क्या नाम है मेरा...नकवी...कोई कह रहा था...नकवी जी, परचेज डिपार्टमेंट में कोई खान नाम का लड़का आया है...आया होगा साला! मुझे क्या करना हैें..अबे, हम शिया मुसलमान हैं...सैयद हैं...नकवी हैं...हमें खानों-पठानों से क्या मतलबें..ये सब बारी-बारी से आकर क्यों बताते हैं कि ‘परचेज’ में खान का कोई लड़का...

‘‘आज अयोध्या में बाबरी मस्जिद पर जमाव है...‘‘सफिया ने सुबह अखबार देखते हुए कहा था, ‘‘कई लाख लोग पहुंच गए हैं...’’

‘‘मुझे लगता है, कुछ न कुछ होकर रहेगा।’’

‘‘तो तुम आज पॉवर हाउस न जाओ।’’

‘‘क्यों’

‘‘कहीं फसाद न हो जाए।’’

‘‘पॉवर हाउस न गया, तो कहीं कोई यह न समझे कि...’’

‘‘क्या न समझे’

‘‘यही कि देखो, ‘प्रोटेस्ट’ कर रहा है...’’

दिन भर काम नहीं हुआ था...रेडियो...टी.वी...खबरें...फोन...मैं केबिन में अकेला बैठा था...न कुछ जानने की कोशिश कर रहा था और न कोई मुझे बता रहा था...बस शोर...बढ़ते शोर से...अचानक जोर का पटाखा फूटा था...आवाजें तेज हो गई थीं...खनखनाती हुई आवाज में मल्होत्रा ने कहा, ‘‘साढ़े पांच बज गए...घर नहीं जाओगे क्या आज, नकवी साहब’ मैं घबराकर खड़ा हो गया था...यह क्या कह रहा है मल्होत्रा...‘क्या आज’ घर नहीं जाओगे...क्यों नहीं जाऊंगा...

सफिया टी.वी. के सामने बैठी थी...उन लोगों ने बाबरी मस्जिद ढा दी...अरे यह सब पॉलिटिक्स है...बन्द करो टी.वी...साफिया ने टी.वी. बन्द कर दिया...रात में सफिया सो गई, तो मैंने रेडियो खोला...धीरे-धीरे...बीबीसी...यह सब पॉलिटिक्स है, तुम सो जाओ, लख्ते हसनैन नकवी...रात के दो बजा है...सो जाओ, एक एच नकवी...तुम ऐसे कौन-से सच्चे और पक्के मुसलमान हो...सो जाओ, रात के तीन बजे हैं...नकवी जी, सो जाओ...अब तो चार बजा है...क्या कल छुट्टी लोगे...एप्लीकेशन जी एम के पास जाएगी, तो क्या सोचेगा...मियां जी बाबरी मस्जिद का दुख मना रहे हैं।

‘‘आप सोये नहीं’ सुबह की नमाज पढ़ने सफिया उठी, तो देखा कि मैं बैठा हूं।

‘‘हां, बस, कुछ वैसे ही...’’

‘‘क्या’ साफिया ने टटोलने वाली नजरों से देखा...मैं उसके नमाज-रोजे का मजाक बनाने वाला...ईद-बकरीद मारे-खदेड़े नमाज के लिए जाने वाला...बैठा रहा रात भर...

सफिया दूसरे कमरे में नमाज पढ़ने चली गई...मैं उसे देख सकता था...यार तुम्हें मतलब क्या बाबरी मस्जिद से...यह चक्कर क्या है...चलो उठो, चाय बनाओ...

‘‘मेरे मौला...गुजरात की खबरें पढ़ रहे हैं, सर...बुला ले...‘‘खलील मियां ने घिसे टेप की आवाज के साथ सुर मिलाया।

‘‘पहले यह टेप बन्द करो...’’उन्होंने टेप हल्का कर दिया।

‘‘यह सब पॉलिटिक्स है...’’

‘‘काहे के लिए’

‘‘हुकूमत के लिए।’’

‘‘अरे, तो हुकूमत तो वो कर रहे हैं न’ खलील मियां के पूछने पर मैं चकरा गया...यार, ये कह तो ठीक री रहा है। तब क्या बात है

‘‘मियां, मानो न मानो...ये लोग...मुसलमानों को नेस्तोनाबूद कर देना चाहते हैं...पर सोचो, मियां, मुसलमानों ने इनका बिगाड़ा क्या हैं...अरे, हम दिन-रात खटते हैं, तो ऊपर वाला गोश्त-रोटी का इंतजाम कर देता है...मियां, फिर ये लोग क्यों ऐसा करते हैं’

‘‘मुसलमान भी तो बदमाशी करते हैं।’’

‘‘हां, बेशक...तो उन्हें पकड़ो, सजा दो...पर मियां, यह तो न करो...जिन्दा तो न जलाओ मासूमों को...अब तो आने लगे...मौत के पसीने मुझे...मौला बुला ले मदीने मुझे...बताओ न मियां, हम क्या करें..मदीने मुझे...’’

‘‘अरे, यह तुमने क्या किया, खलील मियां’ मैंने आंखें खोलकर सामने लगा आइना देखा।

‘‘क्या...‘खत’ तो आप लगवाते नहीं...’’

‘‘खत-वत छोड़ो...तुम सालों से दाढ़ी ट्रिम कर रहे हो मेरी।

‘‘तो, मियां क्या हुआ’

‘‘अरे, यह हुआ कि तुमने दाढ़ी इतनी छोटी कर दी कि लगता है, है ही नहीं।’’

‘‘नहीं...इतनी तो...पर अच्छा ही है, मियां!’’ वे चुप हो गए। कुछ नहीं बोले। लेकिन शायद वे कहना चाहते थे-पाजामा खुलवाने में टाइम लगता है, मियां...दाढ़ी देखकर...अब तो आने लगे...मौत के पसीने मुझे...मेरे मौला...

‘‘नहीं...’’मैं बोला, लेकिन वह मेरी आवाज नहीं थी।

 

वर्जित फल

पशु अधिकार आन्दोलनकारियों ने हजारों लेख लिखे थे, सैकड़ों प्रतिनिधि-मंडल राजनेताओं से मिले थे, बरसों आन्दोलन चला था तब कहीं जाकर पशु अधिकार आन्दोलन कार्यकर्ताओं ने यह अर्जित किया था कि योरोप के चिड़ियाघरों में बंद शेरों को जहां से उनके पूरखे लाये गये थे वहां ले जाकर छोड़ दिया जाये। लेकिन यह भी सरल न था क्योंकि कुछ युवा शेरों की यह

तीसरी चौथी पीढ़ी थी जो चिड़िया घर के रमणीय वातावरण में डिब्बाबंद खाने और टेट्रापैक दूध पर परवान चढ़ी थी। अगर उनकी अचानक किसी सुबह अफ्रीका या एशिया के जंगलों में आंख खुलती तो अवश्य ही डर के मारे बेहोश हो जाते। इसलिए यह सोचा गया कि इन शेरों को उनके मूल स्थान पर ले जाकर छोड़ने से पहले उन्हें उन जंगलों और वहां बचे खुचे शेरों के जीवन के बारे में पर्याप्त जानकारियां दिए जाना जरूरी है संचार युग में यह कठिन काम न था।

पहले दिन जब चिड़ियाघर के शेरों को उनके मूल स्थान के बारे में फिल्में दिखाई गयीं तो उसकी प्रतिक्रिया आशा के विपरीत थी। कुछ शेरों ने तो यह मानने से ही इनकार कर दिया कि वे वहां के मूल निवासी हैं। कुछ ने जब जंगली, बर्बर शेरों को अन्य निरीह पशुओं की हत्याएं करते तथा असभ्य तरीके से मांस खाते और गंदा पानी पीते देखा तो बोले कि ये फिल्में हमारा नैतिक बल समाप्त करने तथा हमें भयावह जंगली में ढकेल दिये जाने की साजिश का एक हिस्सा हैं। लेकिन अफसोस कि पशु अधिकार कार्यकर्त्ता उनकी बात न समझ सके। पर यदि वे शेरों की बात समझ भी जाते तो उनका जबाब यही होता कि वे जो कुछ कर रहे हैं वह अपने विश्वासों और प्रतिबद्धता के अंतर्गत ही कर रहे हैं। वे यह अवश्य करेंगे क्योंकि उनका यह काम हजारों वर्षो में अर्जित संस्कृति का प्रतिफलन है।

शेरों के पिंजड़ों में यह सोचकर पर्याप्त मात्रा में खाना और पानी रख दिया गया उन्हें जंगली पशुओं का शिकार करने तथा गंदे नालों, तालाबों का पानी पीने का अभ्यस्त होने में कुछ समय अवश्य लग जायेगा। इसके अलावा उनकी सुविधा की दूसरी चीजों के अतिरिक्त, यहां तक कि बच्चा शेरों के खिलौना तक रख दिये गये। स्कूली बच्चों को प्रेरित किया गया कि वे शेरों के पिंजड़ों में विदाई कार्ड रखें।

हवाई जहाज की सवारी उनके लिए नयी न थी। वे सामान्य रहे। पर जब मूल स्थान पर हवाई जहाज उतरा तो उनमें कुछ बेचैनी पाई गयी। साथ जो डॉक्टर था उसने इंजेक्शन दिये जिनका तुरंत अच्छा प्रभाव पड़ा। शेर सामान्य हो गये। कुछ युवा शेर तो गुनगुनाने तक लगे। उनके पिंजड़ों को खोल कर जंगलों में रख दिया गया।

कुछ सप्ताह बाद जब पशु अधिकार कार्यकर्त्ता पिजड़ों को इस उद्देश्य से लेने पहुंचे के उनका पुनः इस्तेमाल किया जा सके तो उन्होंने देखा कि शेर तो पिंजड़ों में नहीं हैं लेकिन एक विचित्र प्रकार के जीव पिंजड़ों में खचाखच भरे हैं। वे शेरों से नहीं डरते थे पर इस नये जीव से डर गये क्योंकि इन जीवों की शारीरिक जांच से यह साबित हुआ कि वे मनुष्य हैं। अटपटी अनजान भाषा के अतिरिक्त उनमें से एक दो टूटी-फूटी अंग्रेजी भी बोल लेते थे।

‘‘तुम लोग पिंजड़ों में क्यों घुस गये हो’ उनसे पूछा गया।

‘‘हमें अपने साथ ले चलो’’ वे बोले।

‘‘क्यों’

‘‘इसलिए कि हमारी हालत शेरों से बदतर है।

‘‘लेकिन तुम लोग आदमी हो।’’

‘‘इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। हम उसकी तरह आदमी हैं जैसे शेर शेर हैं।’’

‘‘लेकिन यह तुम्हारा देश है तुम लोग यहां रहो।’’

‘‘तुमने यह शेरों से क्यों नहीं कहा था उनका भी तो यही देश था।’’

‘‘देखों शेरों को चिड़ियाघर में रखा गया था।’’

‘‘हम उससे भी खराब जगह रह लेंगे।’’

‘‘नहीं, हम तुम्हें नहीं ले जा सकते।’’

‘‘देखो हम कई मायनों में शेरों से ज्यादा उपयोगी हैं। हम तुम्हारे देश का उत्पादन बढ़ा सकते हैं।’’

‘‘उत्पादन नहीं नहीं...तुम्हें मालूम है कि हम लोग हर साल करोड़ों टन अनाज नष्ट कर देते हैं।’’

‘‘हम अनाज नष्ट करने में तुम्हारी सहायता करेंगे। कोलेस्ट्रोल, प्रोटीन, विटामिन आदि की चिंता किए बिना हम खूब खा सकते हैं।’’

‘‘नहीं नहीं उसकी आवश्यकता नहीं है। हम तो अपने किसानों को फसलें न पैदा करने के लिए पैसा देते हैं।’’

‘‘तुम्हारा देश हमारे जैसे लोगों के रहने के लिए आदर्श हैं। तब तो हमें वहां जरूर ले चलो।’’

‘‘हम मजबूर हैं। तुम्हें नहीं ले जा सकते हां कोई घायल या बीमार जानवर, विशेष रूप से कुत्ता या बिल्ली हो तो बताओ।’’

‘‘कहो तो हम अपने को घायल कर लें। वैसे बीमार हमारा पूरा देश है।’’

‘‘तुम्हारी यही चालाकी है कि हम तुम्हें नहीं ले जाना चाहते।’’

‘‘चालाक तो हम बिलकुल नहीं हैं। हम निरीह हैं। शेरों के मुकाबले तो बिलकुल असहाय हैं। शेरों को खाना नहीं खरीदना पड़ता। शेरों ने देशों की सीमाएं भी नहीं बनायी हैं जो रोज़ बनती बिगड़ती रहती हैं शेर धर्मों को भी नहीं मानते। शेर अलग-अलग भाषाएं भी नहीं बोलते। शेर बारूद के इस्तेमाल से भी नावाक़िफ है। न तो शेर सरकारें बनाते हैं। न चुनाव कराते हैं और न ये कहते हैं कि वे जनतांत्रिक हैं हमारे ऊपर ये सारी जिम्मेदारियां हैं...तुम हमें यहां से ले चलो।’’

पिजड़ों में ठसाठस भरे लोग किसी तरह निकलने पर तैयार न थे। हद यह है कि पशु अधिकारों कार्यकत्ताओं ने हिंसा तक का सहारा भी लिया, क्योंकि इससे उनके विश्वास खण्डित न होते थे, परन्तु फिर भी वे बाहर न निकले तब एक कार्यकर्ता ने कहा, ‘‘अब ये सरलता से बाहर न आयेंगे।’’

‘‘क्यों’

‘‘क्योंकि इन्होंने वह खाना चख लिया है जो हमने पिंजड़ों में शेरों के लिए छोड़ा था।’’

 

लहर

कोई बीस साल पहले की बात है। उन दिनों मैं पैरिस की अकादमी ऑफ फाइन आर्ट्स में पढ़ता था। लखनऊ आर्ट्स कालिज से डिप्लोमा करने के बाद फ्रेंच सरकार की स्कालरशिप पर मैं अपनी पढ़ाई का तीसरा साल पूरा कर चुका था। तीन साल बाद देश की ऐसी सख्त याद आयी कि छात्रवृत्ति सेबचाये पैसे से टिकट खरीदा और दिल्ली आ गया। दिल्ली में किसी कलाकार मित्र ने बताया कि ‘आईफैक्स’ में नये पेंटर्स की नेशनल एग्जीबीशन हो रही है। योरोप में भारी-भरकम कपड़े पहनने से ऊबा मैं खद्दर के कुर्त्ते पाजामे और कोल्हापुरी चप्पल में आईफैक्स चला गया। सामने ही पहला इनाम पायी पेंटिंग लगी थी। लगा काम देखा हुआ है। दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी पता न चला कि किसका काम है। मैं नजदीक आया। नाम पढ़ा-रजनीकर। अरे! रजनीकर तो वही लड़का है जो लखनऊ में मुझसे एक साल जूनियर था। और लखनऊ छोड़ते समय मैं अपनी बहुत सी पेंटिंग्स उसे रखने के लिए दे आया था। मैं कुछ उधेड़-बुन में था कि एक लड़का मेरे पैरों पर झुक गया। पैर पकड़े-पकड़े उसने कहा, ‘‘दादा आप कब आये। मैं तो पहचान भी न पाता अगर कहीं और...’’रजनीकर बोलता रहा लेकिन। मैं कुछ सुन न सका क्योंकि सामने जो चित्र लगा था वह उन्हीं में से एक था जो मैं उसको दे आया था।

वह खड़ा हो गया। ‘दादा’ उसके स्वर में याचना, क्षमा अपराध स्वीकार और पता नहीं क्या-क्या था। उसके बाद मैं उससे यह न कह सका कि यह मेरी पंटिंग है। यह भी न कह सका कि उसने ऐसा क्यों किया। मैं खामोश हो गया। मुस्करा दिया। क्योंकि मेरी नजर में मेरा और उसका वह काम सिर्फ एक अच्छी कोशिश थी। उससे ज्यादा कुछ नहीं।

उस घटना के दस साल के अंदर ही रजनीकर माना-जाना पेंटर हो गया। वह कई अकादमियों का मेंबर है। उसे कई सम्मान मिल चुके हैं। वह कई जूरियों का मेंबर रहा है। वह देश के उच्च कला सर्किल में आ गया है। अभी कुछ साल पहले मिला था तो बोला, ‘‘दादा आपने पेंट करना छोड़ दिया। अबकी ‘त्रिनालय’ में कुछ भेजिये न। मैं जूरी में हूं।’’

मैं उसकी इस बात पर हंस सकता होता तो हंस कर लोट-पोट हो गया होता। मैंने कहा, ‘‘भाई अच्छा काम देखने को बहुत है। मैं तो उसे देखता हूं। और खुश रहता हूं।’’

‘‘आप डिजाइनिंग की तरफ निकल गये।’’ वह बोला।

उन दिनों मैं न्यूयार्क के फैशन डिजाइनर ‘किटी एण्ड कैट’ के साथ काम करता था।यह भी पुरानी ही बात है। यह तो नहीं कह सकता कि मैं फैशन डिजाइनिंग में सफल नहीं हुआ क्योंकि आज तक ‘किटी एण्ड कैट’ का जेम्स किलो कभी-कभी फाने करके कहता है-‘‘आदि ह्वाई डोन्ट यू ज्वाइन मी।’’ मैं अब उसे क्या ज्वाइन करूं। वहां काम करते-करते धीरे-धीरे यह लगा कि यार यह सब क्यों कर रहा हूं कोई उचित जवाब समझ में न आया। पैसा तो खूब था। पर और क्या था

न्यूयॉर्क छोड़ा तो फिर पैरिस आ गया। पेंटिंग करना छोड़ चुका था। फैशन डिजाइनिंग करना न चाहता था। सोचा ‘रेस्टोरेशन ऑफ एंशियन्ट वॉल पेंटिंग्स’ में कुछ करना चाहिए। एक साल का डिप्लोमा किया तो ‘यूनिसेफ’ में काम मिल गया। इंडोनेशिया चला गया। वहां से चीन भी जाना हुआ। इन्हीं दिनों तीसरी दुनिया और ‘यूनेस्को’ की रस्साकशी देखी। राजनैतिक स्वार्थी में आंच ने जलती अमूल्य कला कृतियां देखीं। प्रोग्राम के फ्रेंच डायरेक्ट ने साफ कहा, ‘‘आदि हम राजनैतिक स्थितियों या दवाबों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। वैसे भी कला ने हमेशा सत्ताओं के अधीन काम किया है।वह चाहे चर्च की सत्ता हो या पूंजीवादी की सत्ता या समाजवाद की सत्ता।’’

राजनैतिक कारणों से जमाकर्त्ता का काम बंद हुआ तो मैं एक खाली बर्तन जैसा था। पता नहीं कुछ करने की इच्छा ही नहीं थी। अपने बैंक का हिसाब किताब देखा तो पन्द्रह साल में खासी बड़ी रकम जमा हो गयी थी। उसे समेटा और दिल्ली आ गया।

उन दिनों दिल्ली की सबसे बड़ी एजेन्सी ‘डेवलप’ हुआ करती थी। संतोष चटर्जी एम.डी. थे। उन्होंने मुझे डिजाइन डिपार्टमेंट का हेड बनाने का ऑफर दिया। मैंने बेदिली से ‘डेवलप’ ज्वाइन कर ली। सोचा जब किसी न किसी सत्ता के आधीन काम करना है तो क्यों ‘बाजार की सत्ता’ के आधीन करूं।

‘डेवलप’ में मेरा काम इतना पसंद किया गया कि हर साल हजारों रुपये के ‘इंक्रीमेंट’ मिलने लगे। लेकिन मुश्किल ये थी कि मेरे सबसे घटिया काम पसंद किये जाते थे। वह लाखों की संख्या में छपते थे। उस पर एवार्ड मिलता था। और एवार्ड लेने मुझे जाना पड़ता था। धीरे-धीरे वह स्थिति असहनीय हो गयी। मैंने ‘डेवलप’ छोड़ दी। चटर्जी की समझ में यह बिलकुल न आया। न उन्हें समझाना चाहता था कि मैंने यह फैसला क्यों किया है। चटर्जी ने कहा, ‘‘तुम सिर्फ कन्सल्टेंट हो जाओं। हफ्ते में एक बार आओ।’’ पर मन तो मन ही है। उखड़ा तो उखड़ता चला गया।

एजेन्सी का काम छोड़ने के बाद मैंने सफेद कागज और स्केच पेन की तरफ देखना छोड़ दिया। मैं आंखें बंद किये किये उन सुंदर चित्रों को देखा करता था जो मैंने ‘टेट गैलरी’ या ‘लूर्व’ में देखे थे। अजंता की दीवारों से बातें किया करता था। वेनिस की गोलियों में घूमा करता था। विशाल गिरजाघरों की छतों और दीवारों पर भटका करता था। सोचता था वहां कला है। वही कला है। जब तक जिन्दा हूं श्रेष्ठतम् कला और सुन्दरता से अभिभूत रहूं। घटिया काम करना या देखना बेकार है। कला तो एक नजरिया है। कला जिन्दगी गुजारने का एक तरीका है। कला अपनी और अपने परिवेश की सुन्दरता को बनाये रखना है और विकसित करते रहना है। कला का कोई स्थूल अर्थ नहीं है। चित्र बनाना, एक्लप्वर बनाने तक कला को सीमित कर देना या उसी को कला समझना तो मूर्खता है। मैं उस मूर्खता से निकल आया था। मुझे खुशी थी कि मैंने सबसे बड़े कलाकार यानी प्रकृति को पहचान लिया है और मैं खुश हूं। मैं उससे भरपूर आनंद उठाता हूं।

ऐजेन्सी की नौकरी छोड़ने के बाद पता नहीं क्यों, हो सकता है कि शायद लम्बे समय तक फ्लैटों में रहते-रहते तंग आ गया था, यह ख्याल आया कि अपने लिए एक मकान बनाऊं। पच्चीस-छब्बीस साल में मुझे जो भी अनुभव हुए थे। दुनिया घूमकर जो-जो कुछ भी देखा था और रहन-सहन को जो भारतीय आवश्यकताएं या परम्पराएं थीं उन्हें मद्देनजर रखते हुए मैंने अपने लिये घर का नक्शा बनाया। एक विशाल पार्क के बिलकुल सामने जगह खरीदी और चाव से मकान बनवाता रहा। मकान जब बन गया तो मुझे अपने हर काम की शुरुआत लगा। यह बात दूसरी है कि ‘स्कूल ऑफ आकीटैक्चर’ वालों ने उसे पारम्परिक भारतीय भवन निर्माण कला की एक जीवंत शैली माना। उसके बारे में लेख लिखे गये। अब तक आकीटेक्चर के लड़के लड़कियां घर देखने चले आते थे।

बहरहाल अब मैं अपने घर में गनेश के साथ रहता हूं। गनेश को भी मेरे साथ आठ साल हो गये हैं। गाजीपुर के एक गांव का है। वह अब मेरी आदतों से इतना परिचित है जितना कि बहुतेरे अपने आप से भी नहीं होते। सुबह उठकर बेडरूम में चाय। फिर नहाना, फिर सामने वाले पार्क की एक घंटा लम्बी सैर। फिर माली के साथ कम्पाउण्ड के पेड़ पौधों की देखभाल। फिर गाड़ी की सफाई। फिर बाहर जाने कि लिए तैयार होना। फिर आई.आई.सी. की लायब्रेरी में बारह साढ़े बारह तक अखबार पत्रिकाएं देखना। वहां के बार में एक बियर पीना और दिन का हल्का लंच लेकर घर वापस। दोपहर में एक घंटे आराम। फिर क्लब में टेनिस। वापसी पर ह्विस्की...अक्सर दोस्तों का जमावड़ा। रात का खाना और कुछ पढ़ कर सो जाना। वैसे मेरी जिन्दगी को अपनी अलग रफ्तार है। बहुत खुशी होती है कि कई बार शादी से बाल-बाल बच गया। अगर कहीं वह दुर्घटना घट गयी होती तो पता नहीं क्या होता

शादी के सिलसिले में अपने साथ बनाए गए आदर्श को मैंने गनेश के लिए मान्य नहीं माना। उसकी शादी पिछले ही साल लगभग मैंने ही करवाई है।

सुबह का आठ बजा है। दरवाजे और खिड़कियों से धूप सीधे ड्राइंग रूम के मैरून रंगों वाले अफ़गानी कालीन पर एक दिलचस्प पैटर्न बना रही है। हरे रंग की पारदर्शी पत्थर की नीची मेज पर धूप का एक टुकड़ा चमक रहा है। दीवारों पर बने उड़ीसा के लोक चित्र चुपचाप अपनी पैनी आंखों से धूप को इस तरह देख रहे हैं जैसे अनाधिकार ही वहां आ गई हो। कांसे की बनी बड़ी मूर्ति, जो मोहनजोदड़ो की नर्तकी की अनुकृत है, चुपचाप खड़ी है, शायद शताब्दियों से इस इंतजार में कि वह क्षण आए जो आने वाला है। दीवार में बने ताक़ों के बीच लगी कठपुतलियों के कान खड़े हो गए जब सामने वाले दरवाजे से गनेश की पत्नी, जो रंग-बिरंगी गंवारू साड़ी का लंबा घूंघट निकाले थी, अंदर आई। मुझे ड्राइंगरूम में बैठा देखकर एक क्षण लौट कर पिछले दरवाजे से सीधे सर्वेंट रूप में जाने को हुई। फिर मेरे कहने पर कि जाओ, जाओ निकल जाओ। उसने तेजी से पैर बढ़ाए। पैरों के तलवों का लाल रंग सफेद संगमरमर के फर्श पर लगा छाप छोड़ रहा हो। पायलों की मद्धिम आवाज को उसने जान-बूझकर दबा लिया। पैरों की उंगलियों में पड़े बिछुवे और छल्ले चमक गए। बनी-बनाई कलाकृति पर एक ऐसी लाइन जैसी खिंच गई जसके बिना कलाकृति, किसी को पता न था, फिर भी अधूरी थी। घर-बार जोरू-जाते से विमुक्त रहनेवाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह एक अनुभव था। यह दृश्य मेरी मनपसंद पेंटटिंग्स में शामिल हो गया। मैं वचारों में इसे कई-कई तरह के कोणों से देखा करता था। कभी इस पेंटिंग में नए रंग लगा देता था, कभी प्रकाश आने की दिशा बदल देता था, कभी गति बढ़ा देता था। हर बार यह पेंटिंग एक नया मजा देती थी।

दस साल से कुछ न करने के बावजूद मैं इन सवालों से नहीं बच सका हूं कि मैं कुछ क्यों नहीं करता। दोस्त, एहबाब जिनकी कमी नहीं है अक्सर पूछते हैं, आश्चर्य इस पर होता है कि अब तक, कि मैं कुछ क्यों नहीं करता पेंट क्यों नहीं करता, रेखांकन कें नहीं करता मैं कभी हंस कर जवाब देता हूं कि यार दुनिया में कूड़े के वैसे ही बड़े-बड़े ढेर लगे हैं, मैं उन्हें बढ़ाना नहीं चाहता। कूड़े के ढेर देखने हों तो अर्ट गैलरीज में चले जाओ। ऐसा-ऐसा पेंटर मिल जाएगा जो लाइन खींचना तक नहीं जानता और मशहूर है। नेशनल पेपर का एक आर्ट क्रीटीक कंपोजीशन की ए बी सी नहीं जानता और कला का बहुत बड़ा पारखी है। सेठ साहूकार आलू-प्याज की तरह थोक में प्रदर्शनी की सभी पेंटिंग्स खरीद लेते हैं। एक भयानक ‘मीडियाक्रिटी’ का माहौल है। सब कुछ मेरे बिना आराम से चल रहा है, चलने दो। दोस्त कहते हैं ठीक है तुम अपने लिए बनाओ। अपने लिए क्यों इसलिए कि तुम कलाकार हो। दुनिया में कला की कमी नहीं है। फिर मास्टर्स को तुम लोग क्यों भूल जाते हो अगर उनसे अच्छा कोई नहीं बना सकता तो क्यों बनाए क्या डॉक्टर ने कहा कि आप बनाएं

काम न करने के पीछे मैंने हो सकता है जो तर्क सोचे हैं वे एक तरह के प्रतिरोध हों या पालयन हो। जो कुछ भी हो, मैं खुश हूं। हां, कभी-कभी इस खुशी के पीछे एक स्वर ऐसा सुनाई पड़ता है जो मुझे पसंद नहीं है। सफेद कागज से मैं डरने नहीं, असुविधा महसूस करने लगा हू। सफेद कागज देखते ही मेरी कल्पना उसमें फार्म और रंगों का संयोजन करने लगती है। मैं सोचता हूं दस साल बाद अगर ब्रुश उठायातो पता नहीं क्या हो अब न तो वह अभ्यास ही रह गया है और न विश्वास जो पहले था। न वह इग्नोरेंस के कारण पैदा होने वाला साहस बचा है और न वह शुरूआती तड़प है जिसके चलते मैं दस-दस घंटे पेंट करता रहता था। कभी लगता वह जुनून ही नहीं बचा। वह पागलपन ही शेष नहीं है जो था। इकी वजह क्या है, बढ़ती हुई उम्र साठ पार कर लिया है मैंने।

शादी के कुछ ही महीने बाद गनेश की पत्नी गर्भवती हो गई थी। मैं उसे गनेश के साथ नर्सिंग होम ले गया। दवाएं, इंजेक्शन, खाना-पीना सबका ध्यान रखने का काम गनेश को सौंप कर भी मैं खुद यह मालूम करता रहता था कि वैसा करती है या नहीं जैसा डॉक्टर ने कहा है। उसके फूले हुए पेट को मैं रहस्य और रोमांच के साथ देखता था। उससे पहले कभी मैंने यह सब कुछ इतने नजदीक से नहीं देख था। उसके हाव-भाव में भी परिवर्तन आ रहा था औरजब वह मां बनी और बच्ची पहली बार सर्वेंट रूम में आई तो गनेश की पत्नी का चेहरा भी एक पेंटंग जैसा लगा। क्या कोई कलाकार उस प्रक्रिया को पेंट कर सकता है जिससे गुजरता उसका चेहरा यहां तक पहुंचा है बच्ची का नाम मैंने लहर रखा। सुंदरता और गति के मेरे आदर्श को समाहित करने वाला नाम।

गनेश लहर से मुझे दादा कहलवाने की कोशिश करता था। अब शाम मैं जब लौटता तो लहर के साथ एक घंटा बिताना अनिवार्य हो गया था। उसका बातें समझना, उसका हंसना, उसका चलना सीखना, उसकी जिद और उसका रोना-सब कुछ मुझे उद्वेलित कर देता था। वह और बड़ी हुई तो मेरे साथ पार्क जाने लगी। मेरे पार्क जाने से पहले गनेश उसे तैयार करके ड्राइंगरूम में ले आता था। वह मेरी छड़ी लेने की जिद करती थी। कभी गोद में आने की जिद करती। धीरे-धीरे उसके अंदर भावनाओं का संचार हो रहा था। वह पहली बार बेाली थी तब मुझे लगा था कि लहर की नई गति है। नई दिशा। पता नहीं वह मेरे साथ बड़ी हो रही थी या मैं उसके साथ छोटा हो रहा था! अगर मैं छोटा भी हो रहा था, बच्चा भी बन रहा था तो यह मुझे पसंद आता था। उसके कहने पर मोर को पकड़ने की कोशिश। उसके कहने पर खरगोश के बच्चों को घास खलाना। हिरन के कान सहलाना। कबूतरों को दाना खिलाना। कुत्ते की बोली बोलना।

पेड़ों के झुरमुट में मोर खड़ा था। मैं धीरे-धीरे लहर को उसके पास ले गया। मोर को देखकर वह खुशी से चीखी और मोर की तरफ दौड़ी। मोर उड़ गया। वह रोने लगी। मैं उसे चुप कराने की कोशश करता रहा लेकिन कामयाब न हुआ। वह पूरे रास्ते रोते-रोते घर आई। अंदर भी रोती रही। उसकी मां ने उसे केला खिलाना चाहा पर वह रोती रही। मैंने चॉकलेट देनी चाही। पर उसने न ली। गनेश ने कुत्ते की बोली बोली जिस पर वह आमतौर पर हंस देती थी, पर वह रोती रही। मोर-मोर की रट लगाए हुए थी।

अचानक मैंने पेस्टल कलर निकाले और तेज़ी से एक सफेद कागज पर मोर बना दिया। कागज पर बने मोर को देखकर उसका रोना कुछ थमा। सिसकियां बाकी रह गईं। फिर वह कागज पर बने मोर को देखने लगी। मैं भी हैरत से उस मोर को देख रहा था। उसके बाद मैं रुका नहीं। लहर की पसंद के सभी जानवर कागज पर उतरते चले गए। उनमें लहर भी थी। कांपते हाथों से स्केचेज के कोने में मैंने एक झटके से ए. और के. लिख दिया और तब पच्चीस सल बाद लिखे इन ‘इनीशियल्स’ की गर्मी में मैंने एक दूसरी दुनिया देखी।

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