संदेश

May, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

मुकेश कुमार का शोध आलेख - विद्यासागर नौटियाल के उपन्यासों में पहाड़ी परिवेश

चित्र
विद्यासागर नौटियाल के उपन्यासों में पहाड़ी परिवेश(विद्यासागर नौटियाल) उपन्यास आधुनिक जीवन की जटिलताओं को समग्रता से प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम है। साहित्यकार समाज में रहते हुए अपनी आँखें बन्द नहीं करता। समाज की विसंगतियाँ उसके कोमल हृदय को प्रभावित करती हैं और उसकी अभिव्यक्ति भी अनिवार्य रूप से वह करता है। उपन्यास का फलक विस्तृत होने के कारण इन विसंगतियों का सम्पूर्ण चित्र उतारने का अवसर उपन्यासकार को मिलता है। यही कारण है कि आधुनिक उपन्यास में समाज को उसके यथार्थ रूप में देखा जा सकता है। नौटियाल जी ने अपने सभी उपन्यासों में टिहरी गढ़वाल को केन्द्र में रखकर कथा वस्तु का निर्माण किया है। वे नई कहानी दौर के साहित्यकार थे, उन्होने गढ़वाल के विषय में लिखकर साहित्य में अपनी पहचान को सुरक्षित रखा है। गढ़वाल की यथार्थ तस्वीर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर इन्होंने गढ़वाल की सांस्कृतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याओं से पाठकों को परिचित कराया है। पहाड़ को आम-जन के बीच में उपस्थित कर पहाड़ के अनेक आदर्शों को साहित्य में कलमबद्ध कर नौटियाल ने सराहनीय कार्य किया है। पहाड़ों पर बसने वाल…

नरेश अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताएँ (ईबुक - कविता संग्रह)

चित्र
चुनी हुई कविताएँकवि द्वारा चयनित प्रतिनिधि कविताएँ
डॉ. नरेश अग्रवाल  सर्वाधिकार सुरक्षित - डॉ. नरेश अग्रवाल
इस ‘ई-पुस्तक’ का प्रकाशन डॉ. नरेश अग्रवाल द्वारा स्वंय किया गया है तथा पुस्तक के रुप में प्रकाशन-राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर, राजस्थान द्वारा किया गया है।
प्रकाशन वर्ष सन् 2014राजस्थानी ग्रन्थागार
सोजती गेट,
जोधपुर, राजस्थान

डॉ. नरेश अग्रवाल-एक परिचय
‘‘नरेश का मिजाज एक चिन्तक का है, वे जीवनानुभवों की गहराई में उतरने का माद्दा रखते हैं।’’ - इंडिया टुडे

1 सितम्बर 1960 को जमशेदपुर में जन्म। 
अब तक स्तरीय साहित्यिक कविताओं की 6 पुस्तकों का प्रकाशन तथा शिक्षा सम्बन्धित 6 पुस्तकों का प्रकाशन। साहित्य जगत में रचित पुस्तकों को अच्छी ख्याति प्राप्त। ‘इंडिया टुडे’ एवं ‘आउटलुक’ जैसी पत्रिकाओं में भी इनकी समीक्षाएँ एवं कविताएँ छपी हैं। देश की सर्वोच्च साहित्यिक पत्रिका ‘आलोचना’ में भी इनकी कविताओं को स्थान मिला। लगभग सारी स्तरीय साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।‘मरुधर’ रंगीन द्विमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन पिछले चार वर्षों से लगातार कर रहे हैं, जो आर्ट पेपर पर छपती है।सन् 2014 में …

पुस्तक समीक्षा - सपनों के वातायन

पुस्तक समीक्षा - 
समीक्ष्य पुस्तक --सपनो के वातायन [कविता संग्रह \
कृतिकार --पद्मा मिश्रा
प्रकाशक -सारस्वत प्रकाशन
मुल्य -१२५ रु

नैसर्गिक मूल्यों की तलाश --सपनों के वातायन कविता साहित्य की सर्वाधिक  एवं बहुचर्चित विधा रही है ,इसकी अनगिन परिभाषाएं की गई हैं ,कुछ भावकों ने इसके कलापक्ष को और कुछ ने भाव पक्ष को अधिक महत्त्व दिया है ,कविता में कला और भाव का संतुलित प्रयोग हो ,यह एक बहु मान्य सिद्धांत रहा है ,
मई विश्व हिंदी सम्मेलन ,सूरिनाम [दक्षिण अमेरिका ]गया था ,वहाँ भारतीय एवं विदेशी विद्वानों से भेंट हुई थी ,कुछ लोग कविता ,विशेषतया हिंदी कविता के वर्तमान स्वरूप से चिंतित थे उनकी चिंता का कारन था -कविता का गद्यनुमा हो जाना ,सपाटबयानी से कविता को अखबारी समाचार बना देना अश्लीलता की बढती प्रवृत्ति --और कविता को वाद विशेष का घोषणापत्र बना देना इत्यादि।
वर्तमान वैज्ञानिक युग में कविता को केवल ''वाणी का अमृत ''कह कर ही नहीं रहा जा सकता ,--वह समाज का दर्पण भी है --संघर्ष का पाथेय  भी है ,पर साथ ही उसका उद्देश्य लोक मंगल भी होना चाहिए ,मानव कभी रोबोट नहीं बन सकता ,जब तक मानव है …

पुस्तक समीक्षा - 16 आने 16 लोग

चित्र
साहित्यिक मूल्यवत्ता के निकष पर ’16 आने 16 लोग-डाॅ. सूर्य प्रसाद शुक्ल, डी.लिट्.साहित्य की सभी विधाओं में जीवन सत्य की शब्दार्थमय अभिव्यक्ति समाहित होती है। जीवनी या जीवन चरित के रूप में लिखा गया साहित्य अतीत के अनुभव और वर्तमान के विकास का आलोक होता है। इसमें मनुष्य की जीवन दृष्टि विकसित करने की क्षमता होती है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव ने अपने साहित्यिक निबन्धों से तमाम साहित्यकारों व मनीषियों के जीवनी-लेखन को समृद्ध किया है। सत्ता हमेशा साहित्यकार की स्वतंत्र चेतना को बाधित करती है पर प्रशासन में बैठकर भी अपनी अनुभूतियों को स्वतंत्र रूप में व्यक्त करना दुःसाध्य कार्य है। ऐसे में एक तरफ कृष्ण कुमार यादव प्रशासकीय अनुभवों से लेखकीय उर्जा सहेजते हैं तो दूसरी ओर उनके जीवन में साहित्य की उपस्थिति सदैव अन्र्तमन में एक शक्ति जगाती है। उनकी पुस्तक ‘’16 आने 16 लोग‘’ में संकलित 16 महान चरित्र नायकों की जीवनियाँ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की विशेषताओं के अधिकार पूर्ण विवेचन से समृद्ध हुई हैं । इन विवेचनों में मात्र जन्म और जीवन का परिचय ही नहीं है, अपितु…

सुनील कुमार ''सजल'' का व्यंग्य - गिरोह का समाजवाद

यह तो हम पहले कह चुके हैं। गिरोहों के पीछे मत पड़ो। पर पुलिस वाले मानते कहाँ हैं। कहते हैं -'हम गिरोहों को पकङेगें। उनकी ऐसी -तैसी करके रख देंगे। देखते हैं कैसे बचते हैं बच्चू। 'गिरोह तो गिरोह है। समाज के खरपतवार। एक मिटता है ,दूसरा सक्रिय हो जाता है। पुलिस वालों की नाक के नीचे। थाने के सामने वारदात कर जाते हैं। वह भी सरेआम। पुलिस है कि अपनी पीठ थ पथपाती है ,'इलाके में शांति है। 'शांति तो थाने परिसर में रहती है। जहाँ लोग प्यार से हलाल होते हैं। उफ़ !तक नहीं करते। हम लोकतान्त्रिक शैली में पहले भी कहते थे। अब भी कहते हैं। भविष्य में भी कहते रहेंगे की गिरोहों को फलने -फूलने दो। उनके पेट पर लात काहे मारते हो। साहब हमें गुप्त सूत्रों से पता है। पुलिस दुनियां के सामने उन्हें गिरफ्तार करती है। ठुकाई करती है पर वास्तव में उनसे ला भ का हिसाब बैठाती है। यह बात तो सच है। हर नम्बर दो के काम के लिए पुलिस का सहयोग जरुरी है। ऐसे सहयोगियों का भी अपना एक गिरोह है ,जो गिरोहों को असामाजिक से सामाजिक होने का प्रमाण -पत्र देते हैं। साहब गिरोह चलना सहज काम नहीं है। बिलकुल फैक्टरी चलने जैसा …

दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - यथार्थ का बलात्कार

चित्र
अभी  हाथ में न्यूज़ पेपर लेकर बैठा ही था कि  दरवाज़ा जोर जोर से पीटने की आवाज़ आई, मैं समझ गया कि द्विवेदी जी आ गए हैं क्योंकि वही दरवाज़े पर इस तरह दस्तक देते हैं।  वो अलग बात है कि उनकी ऐसी खतरनाक दस्तक मेरे मन में दहशत भर देती है कि वे कहीं दरवाज़े सहित ही अंदर न आ जाएँ अतः मैं भाग कर दरवाजा खोलने के लिए उठा और दरवाज़े के  स्वतः खुलने से पहले ही उसे खोलने में कामयाब रहा। दरवाज़ा खोलना था कि द्विवेदी जी ने राकेट के जैसे कमरे में प्रवेश किया और सोफे को हिरोशिमा समझ कर  उस पर परमाणु बम की तरह धम्म से गिर पड़े। मैंने दरवाज़ा बंद किया और उनके पास पहुंच कर ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए पूंछा, " कहिये कैसे आना हुआ द्विवेदी जी ?" उन्होंने मेरे खिचड़ी नुमा इस साधारण से प्रश्न का  मटन कोरमानुमा स्वादिष्ट उत्तर देते हुए कहा, "अजी इधर से गुज़र रहे थे तो सोचा तुमसे मिलते चलें इसी बहाने कुछ गपशप हो जाएगी और चाय पानी भी हो जायेगा। " अच्छे मेजबान का फ़र्ज़ अदा करते हुए मैं उनके चाय पानी और गपशप की  मांग पूरी करने में लग गया तब तक वो मेज पर रखे पेपर को उलट पलट कर अपनी पसंदीदा खबरे खोज कर पढ़ने ल…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.