संदेश

July, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

रचनाकार.ऑर्ग संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन 2014 के लिए प्रायोजन आमंत्रित

चित्र
आप सभी सुहृदय पाठकों के सक्रिय सहयोग से रचनाकार.ऑर्ग में पिछले दो मौकों पर व्यंग्य तथा कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन अत्यंत सफलतापूर्वक पूर्ण किए जा चुके हैं.

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन के विवरण के लिए यहाँ देखें -
http://www.rachanakar.org/2009/08/blog-post_18.html

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन के विवरण के लिए यहाँ देखें -
http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

इस बार संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन 2014 प्रस्तावित है. संस्मरण लेखन में हर किस्म के संस्मरण – यात्रा, घटना, स्थिति-परिस्थिति, व्यक्ति आदि-आदि सभी - शामिल किए जाएंगे.

इस आयोजन हेतु आप सभी पाठकों से पुरस्कारों हेतु प्रायोजन के प्रस्ताव आमंत्रित हैं. यदि प्रायोजन आदि से पुरस्कारों हेतु पर्याप्त राशि/सामग्री प्राप्त होने की संभावना बनेगी तभी इस आयोजन को आगे बढ़ाया जाएगा, अन्यथा इसे छोड़ दिया जाएगा. यदि प्रायोजक चाहेंगे तो उनके नाम / आर्टवर्क / विज्ञापन / वेबसाइटों के लिंक आदि इस आयोजन की प्रविष्टियों के साथ प्रकाशित किए जाएंगे.

प्रायोजन में आप अपनी तरफ से कुछ भी, कितना भी दे सकते हैं. पुरस्कार राशि से लेकर अपनी स्वयं की या …

शशिकांत सिंह ‘शशि’ का व्यंग्य - आदमी

चित्र
आदमी व्‍यंग्‍य जंगल की एक निंबध प्रतियोगिता में गाय ने आदमी पर निबंध लिखा जो इस प्रकार है। आदमी एक दोपाया जानवर होता है । उसको दो कान , दो आंखें और दो हाथ होते हैं। वह सबकुछ खाता है । उसका पेट बहुत बड़ा तो नहीं होता लेकिन कभी भरता नहीं है । यही कारण है कि आदमी जुगाली नहीं करता । उसके सींग नहीं होती लेकिन वह सबको मारता है । उसके दुम नहीं होती लेकिन वह दुम हिला सकता है । वह एक अदभुत किस्‍म का प्राणी होता है । उसके बच्‍चे भी बड़े होकर आदमी ही बनते हैं। आदमी हर जगह पाया जाता है । गांवों में , शहरों में , पहाड़ों और मैदानों में । रेगिस्‍तान से लेकर अंटार्कटिका जैसे ठंडे स्‍थानों पर भी पाया जाता है । वह कहीं भी रह सकता है लेकिन जहां रहता है उस जगह को जहरीला कर देता है। उससे दुनिया के सारे जानवर डरते हैं । वह जानवरों का दुश्‍मन तो है ही पेड़-पौधों का शत्रु भी है । आदमियों के अनेक प्रकार होते है। गोरा आदमी , काला आदमी , हिन्‍दू आदमी , मुसलमान आदमी , ऊँची जाति का ,नीची जाति का , पर सबसे अधिक संख्‍या में पाये जाते हैं - धनी आदमी गरीब आदमी । आदमी हमेशा लड़ने वाला जीव होता है । वह नाम, मान, जान…

यशवंत कोठारी का व्यंग्य - भारत का सरकारी पर्व : फ़ाइल फ़ाड़ोत्सव

चित्र
व्यंग्यफ़ाइल    फ़ाड़ोत्सवयशवंत  कोठारीसरकार चुप है. मंत्री चुप है। वित्त  मंत्री ने बजट का हलुआ  चख लिया है. जनता ने बजट  कीमारझेल  ली है। महंगाई के कारण  केवल  प्याज  , टमाटर  और आलू  पर व्यंग्य पढ़ने  पड़  रहे हैं  .ऐसी विकट  परिस्थितियों में सरकार ने एक चमत्कार किया  उसने फाइल   फ़ाड़ोत्स्व  का आयोजन  किया  .सभी  सरकारी  दफ्तरों में  फाइल   फाड़ने , जलाने,नष्ट करने  की एक प्रतियोगिता चली।  बहुत सी महत्त्व पूर्ण ऐतिहासिक महत्त्व की फाईलें    जला दीगयीं   नष्ट कर दी गयीं।   आने वाले समय  में   शोधकर्ता  इतिहासकार   राजनीति  के  अध्येता  इन फाईलों के बिना  क्या करेंगे ? देश का वास्तविक इतिहास कैसे लिखा  जायेगा ?फाईलें फाड़ने की ऐसी भी क्या जल्दी थीमहत्त्व पूर्ण अंशों  को बचाया जासकता  था। या फिर उनको कम्प्यूटर  में सुरक्षित किया  जा सकता था।मगर सरकार जो करे सो ठीक।   सरकार  राजनितिक नियुक्तियों में उलझ  कर रह गयी हैकभी सरकारी दफ्तरों में एक नोट शीट या  फाइल  के  एक कागज   के खो जाने पर बड़े बड़े अफसरों  बाबुओं की शामतआ जाती थी।   उस पत्रावली के खो जाने की सूचना पूरे ऑफिस  को दी जाती थी,   और…

सुभाष लखेड़ा के तीन व्यंग्य

चित्र
आओहमबाबा बनें !
अफ़सोस सिर्फ यही है कि यह ख्याल मुझे इतनी देर से क्यों आया ? खैर,  देर आयद दुरुस्त आयद ! आखिर, इससे पहले आता भी तो  मैं चाहते हुए भी बाबा न बन पाता।  दरअसल, आज मैं उम्र के जिस दौर में हूँ, हम बाबा उसी  उम्र में बन सकते हैं, पोते - पोतियों के भी और नाती - नातिनों के भी। लेकिन मैं आपको जैसा बाबा बनने के लिए कह रहा हूँ, उसके लिए बच्चों के बच्चे नहीं अपितु अक्ल में कच्चे कुछ ऐसे लोग चाहियें जो बिना  मेहनत किये एक सुखद जिन्दगी की तलाश में रहते हैं। ये लोग अपने देश में करोड़ों में हैं। फलस्वरूप,  यदि आप मेरे आह्वान पर मेरे साथ बाबा बनते हैं तो लक्ष्मी कब से हमारे पाँव छूने के लिए व्यग्र है और यश कब से हमारे इंतज़ार में जूते घिस रहा है।  आपको इन नामों से कहीं गलतफहमी न हो जाए, इसलिए आपको यह बताना जरूरी है कि जो लक्ष्मी आप सोच रहे हैं, वह तो   हमारे पास कुछ समय बाद आयेगी। आखिर, करोड़ों का साम्राज्य कोई साल - दो साल में तो बनेगा नहीं। उसके लिए हमें सत्संग के साथ - साथ भूमि हथियाने जैसे कुछ दूसरे उपाय भी करने पड़ेंगे। कुछ नेताओं के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ेगा। दरअसल, यह लक्ष्म…

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - जनम-जनम का साथ है…

चित्र
व्‍यंग्‍य जनम-जनम का साथ है वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ लोग बताते है कि इस धरा-धाम पर उसका अवतरण मोबाइल धारण किये हुये ही हुआ था। इसी कारण उसकी सुबह ‘ऊँ मोबाइलाय नमः‘ की जाप से शुरू होती और रात में वह ‘गुडनाइट माय डियर मोबाइल‘ कहने के बाद ही बिस्‍तर पर जाता। कभी मोबाइल के बिगड़ जाने पर वह इतना दुःखी होता है, जितना अपने छोटे बच्‍चे के बीमार हो जाने पर या अपने पिताजी के दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाने पर भी नहीं होता। कभी नेटवर्क प्राब्‍लम के कारण यदि उसकी किसी से बात नहीं हो पाती तो वह पंख कटी मुर्गी की तरह फड़फड़ाने लगता। दिन में व्‍यस्‍त सड़क पर चलते समय उसकी नजर हमेशा रास्‍ते से ज्‍यादा मोबाइल के स्‍क्रीन पर होती है। औेर ऊंगलियां बटनों से अठखेलियाँ करती रहती है। बाइक या चार पहिया चलाते समय उसका यह उत्‍साह कई गुणा बढ़ जाता है। जिन्‍दगी को भगवान भरोसे छोड़कर वह पूरा ध्‍यान हर पल अपने मोबाइल पर देता था। वह पुनर्जन्‍म के सिद्धांत को मानने वाला आदमी है, उसका कहना है कि जिन्‍दगी दोबारा मिल सकती है पर मोबाइल? मोबाइल के नाम पर सिर पर कफन बाँधकर गाड़ी चलाने वाले उस आदमी की वीरता देख लोग दाँतों तले ऊंगलिया दबा …

महावीर सरन जैन का आलेख - भारत में भारतीय भाषाओं का सम्मान और विकास

चित्र
भारत में भारतीय भाषाओं का सम्मान और विकास प्रोफेसर महावीर सरन जैन राजतंत्र में, प्रशासन की भाषा वह होती है जिसका प्रयोग राजा, महाराजा और रानी, महारानी करते हैं। लोकतंत्र में, ´राजभाषा' शासक और जनता के बीच संवाद की माध्यम होती है। लोकतंत्र में, हमारे नेता चुनावों में जनता से जनता की भाषाओं में जनादेश प्राप्त करते हैं। जिन भाषाओं के माध्यम से वे जनादेश प्राप्त करते हैं, वही भाषाएँ देश के प्रशासन की माध्यम होनी चाहिए एवं उनको लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का माध्यम भी बनना चाहिए। बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में, भारत सरकार ने सिद्धांत के धरातल पर यह निर्णय ले लिया था जनतंत्र को सार्थक करने के लिए विभिन्न राज्यों में वहाँ की भाषा को तथा संघ के राजकार्य के लिए हिन्दी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। प्रशासकों को जनता के बीच काम करना है। जनता से संवाद करना है। जनता से संपर्क स्थापित करने के लिए उनकी भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। भाषा का ज्ञान है अथवा नहीं – इसका पता किस प्रकार चलेगा। लोक सेवा आयोग परीक्षाओं का संचालन किस उद्देश्य से करता है। यह किस प्रकार पता चलेगा कि परीक्षार्थी को जनता की भा…

दीनदयाल शर्मा का रेडियो नाटक - घर की रौशनी

चित्र
रेडियो नाटक - घर की रोशनी दीनदयाल शर्मा पात्र :  1. कमला , 2. रमन , 3. अमन, 4. राजपाल, 5. डॉक्टर-एक, 6. डॉक्टर-दो (नवजात शिशु के रोने की ध्वनि) डॉक्टर : बधाई हो कमला....अब घर जाकर थाली बजाओ। कमला :  (आश्चर्य से) क्या कहा..थाली बजाओ..(संयत होकर) भगवान का लाख-लाख शुक्र है, जो पोता आ गया। डॉक्टर : पोता नहीं....पोती आई है कमला....तुम पोती की दादी मां बन गई हो। कमला : (आश्चर्य से) क्या कहा...पोती आई है..(परेशान होकर) ओ हो..भाग फूटे मेरे...तो क्या बहू ने फिर बेटी को जन्म दिया है। डॉक्टर : बिल्कुल...लेकिन लगता है तुम बेटी के जन्म पर खुश नहीं हो। कमला : (व्यंग्य से) बेटी के जन्म पर भी कोई खुश होता है भला। डॉक्टर : क्यों...ऐसी क्या कमी होती है बेटियों में। कमला : तुम नहीं समझोगी डॉक्टर। मैंने बेटे और बहू दोनों से कहा था कि चैक करवा लो। डॉक्टर : और पता चल जाता कि बेटी होगी...तो क्या करती? कमला : वही करती...जो दुनिया करती है। अबोर्शन करवा देती। डॉक्टर : (आश्चर्य से) तो क्या कन्या भ्रूण की हत्या करवा देती! कमला : और नहीं तो क्या। ये कोई नई बात नहीं है। आप डॉक्टर हैं। आप मुझसे ज्यादा जानती हैं। ड…

बच्चन पाठक ‘सलिल’, राजीव आनंद तथा चन्द्रेश कुमार छतलानी की लघुकथाएँ

बच्चन पाठक 'सलिल'सात्विक क्रोध दोपहर का समय था,मैं भोजन कर लेटा  हुआ था,मेरे घर के सामने एक टैक्सी रुकी,,मैं बाहर आया,-एक व्यक्ति एक टोकरी लेकर मेरे पास आया ,,,उसके पीछे पीछे एक युवती थी -उसने  चरण स्पर्श किया और बोली--''गुरुदेव,मैं हूँ ममता गोराई '',,मैंने आशीर्वाद देते हुए कहा,-''अरे,तुम अचानक कहाँ से प्रकट हो गई ?'',, युवती ने हँसते हुए कहा-'गुरु जी ,आप  वैसे ही हैं,-आपका चिर परिचित लहजा सुनकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई,उसने कहा-ये कुछ फल हैं,कृपया स्वीकार करें ''--कुछ फल ,क्या थे फलों का अम्बार था,संतरे,सेब,कई किलो अंगूर, सूखे फलों का एक बड़ा पैकेट '', ममता ने अपनी राम कहानी बिना किसी भूमिका के प्रारम्भ की --'' बी ए के पश्चात मैंने आपकी सलाह से हिंदी टाइपिंग सीखी,,,मैं हिंदी टाइपिस्ट बनना चाहती थी,-आपने कहा --रेलवे में हिंदी अधिकारी पद का विज्ञापन निकला है,-आवेदन कर दो,और तैयारी करो,'',,,मैंने आवेदन किया ,आपने दो महीनों  तक हिंदी साहित्य का इतिहास,और सामान्य ज्ञान पढ़ाया,  ---मैं डर रही थी,बोली--''परीक्…

शशि गोयल की बाल कहानी - नन्हा वीर

नन्‍हा वीर अमर सिंह की रानी ने समाचार सुना तो धक से रह गई। स्‍वयं उसके भाई ने ही उसका सुहाग उजड़वा दिया था। शाहजहॉ के साले सलावत खॉ ने अमर सिंह का अपमान भरे दरबार में किया। राजपूत खून खौल उठा और एक ही बार में अपमान करने वाले का सिर दरबार के फर्श पर लुढ़कने लगा। वीर अमर सिंह के क्रोध से डर कर उस समय शाहजहॉ भयभीत अंतःपुर से चले गये। दरबारियों ने तलवारें चमकाई। एक हिकारत की निगाह उन पर डाल कर अमर सिंह घोड़े पर सवार हो कोट लॉघ कर बाहर आ गये। शाहजहॉ भी बदला लेने की फिराक में था, उसने अमर सिंह के साले अर्जुन गौड़ को लालच दे कर अपनी तरफ मिला लिया। अमर सिंह को सिखा पढा कर महल में ले आया और पीछे से अमर सिंह को मार डाला। शाहजहॉ ने ठहाका लगाया और अमरसिंह की नंगी लाश बुर्ज पर डलवा दी। चील कौवे बैठने लगे। रानी का ह्‌दय पति के अपमान और भाई की बेवफाई से जल रहा था साथ ही राजपूत स्‍त्री पति के शव को चील कौवों को खाने को छोड़ कर जौहर कैसे करे। रानी ने सैनिक भेजे लेकिन उन्‍हें मार डाला गया। वे शव के समीप भी न पहुँच सके। शाहजहाँ ने व्‍यंग्य से कहा-क्‍या इसके खानदान में ऐसा कोई भी नहीं है जो इसकी लाश ले …

प्रमोद भार्गव का आलेख - भारतीय न्यायपालिका में सड़न

चित्र
संदर्भःपूर्व न्‍यायमूर्ति काटजू का बयान न्‍यायपालिका में सिद्धांत से समझौता प्रमोद भार्गव विधायिका और कार्यपालिका में सिद्धांत और नैतिकता से समझौते रोजमर्रा के विषय हो गए हैं। यही वजह है कि संसद और विधानसभाओं में दागियों की भरमार है और भ्रष्‍टाचार ने सभी हदें तोड़ दी हैं। ऐसे में एक न्‍यायपालिका ही आमजन के लिए ऐसा भरोसा है, जहां उसे संविधान के इन दो स्‍तंभों की गलतियों से विधि-सम्‍मत निराकरण की अंतिम उम्‍मीद बंधी हुई होती है। लेकिन जब न्‍यायाधीश ही सिद्धांतों की नैतिक इबारत से समझौता करने लग जाएंगे तो व्‍यक्‍ति और समुदाय के मानवाधिकारों की रक्षा के तो सभी रास्‍ते ही बंद हो जाएंगे। इस परिप्रेक्ष्‍य में सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पूर्व न्‍यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष मार्कंडेय काटजू ने तीन प्रधान न्‍यायाधीशों पर एक भ्रष्‍ट जज को मिले अनुचित लाभ की अनदेखी करने के आरोप लगाए हैं। यह बेहद गंभीर मामला है। इस मामले की उच्‍च स्‍तरीय जांच के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट के दो अन्य पूर्व न्यायाधीशों पर यौन-शोषण संबंधी आरोप भी लगे थे. काटजू के ब…

एस. के. पाण्डेय की 3 लघुकथाएँ – मेहनत, तीन बातें तथा पुरानी सोच

चित्र
मेहनतहेमा ने कहा सर हमने अलजेब्रा की चार-पाँच किताबें खरीद लिया है। फिर भी अलजेब्रा बिल्कुल समझ में नहीं आती। मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा यूनिवर्सिटी रोड पर जो पुस्तक सदन है उसके पास चार-पाँच नहीं अलजेब्रा की पचासों किताबें हैं। फिर भी उसको अलजेब्रा नहीं आती। यदि किताब रखने से ही अलजेब्रा समझ में आ जाती तो वह दुकान बंद करके कहीं अलजेब्रा पढ़ा रहा होता। जरूरत है मेहनत करने की। यदि पढ़ न सको तो किताबें इकट्ठा करने से क्या फायदा ? बिना मेहनत के जिंदगी में कुछ भी हासिल नहीं होता। यह सुनकर हेमा कुछ गंभीर हो गई। शायद वह और मेहनत करने को सोच रही थी। तीन बातेंराजीव ने मुझसे कहा सर मैंने इस विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया है और आज मेरा पहला दिन है। मुझे क्या करना चाहिए जिससे मैं जीवन में सफलता प्राप्त कर सकूँ। मैंने कहा आपको तीनों बातें याद रखनी चाहिए और इन पर अमल करना चाहिए। उसने कहा कृपया बताएँ वो तीन बातें क्या हैं ? मैंने कहा पहली बात तो यह है कि आपको कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे आपके माता-पिता को कष्ट हो। कुछ भी करना हो तो सोच लिया करो कि हमारे माता-पिता इसके बारे में जानेंगे तो उन्हें बुरा…

सविता मिश्रा की लघुकथाएँ

चित्र
1....नींव की ईंट =====================
श्याम बहुत ही होनहार छात्र था, सभी शिक्षक उसकी इतनी तारीफ करते, कि माँ बाप का सीना ख़ुशी से फूल जाता। धीरे धीरे समय बीतता रहा अब श्याम कक्षा नौ में आ गया था। माँ को उस पर बहुत भरोसा था अतः ध्यान ज्यादा नहीं देती राजेश से कहती "बच्चा है खेलने खाने की उम्र है ज्यादा जोर पढाई पर मत दिया करिए"।
पापा तो कक्षा आठ में ही उसके क्लास में टॉप से खुश हो एक मोबाईल उपहार में दे दिए। वह अपनी मेहनत जारी रक्खेगा इस विश्वास पर, वह भटक जायेगा, यह बात दिमाग़ में लाये ही नहीं। अब माँ पापा जब भी कमरे में आते उन्हें श्याम पढ़ते दीखता पर उन्हें क्या पता था कि श्याम तो धोखा दे रहा है। उनकी नजर बचा वह अब ह्वाट्सअप पर चैटिंग और गेम में ही लगा रहता है। उसकी मेहनत से सब आश्वस्त थे इस बार भी टॉप करेगा उनका बेटा।
पर इस बार सब उल्टा हुआ जब रिजल्ट लेने स्कूल पहुंचे शिक्षकों ने शिकायतों का पुलिंदा जैसे तैयार रखा था, एक एक कर सभी ने शिकायत कर डाली और हिदायत दी कि "आप श्याम पर अधिक ध्यान दे बढ़ता हुआ बच्चा है, हाथ से निकल गया तो बहुत मुसीबत होगी, आपके ही भले के लिये कह …

लता सुमन्त का आलेख - अनोखा गुजराती कवि -उमाशंकर जोशी

अनोखा गुजराती कवि -उमाशंकर जोशीडॉ. लता सुमन्तउमाशंकर का आगमन गुजराती साहित्य की ही नहीं,भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है.गाँधीयुग, अनुगाँधीयुग और स्वातंत्र्योत्तरकाल के दौरान चलनेवाली उनके सर्जन और चिंतन की प्रवृत्ति ने जीवन कला और कविता के अनेक आयामों के दर्शन कराए हैं.जिसका उल्लेख भारतीय साहित्य और संस्कृति के इतिहासकारों को भी करना पड़ेगा. उमाशंकर का पालन - पोषण गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित और पोषित आन्दोलनों के बीच हुआ था.कवि ने प्रत्यक्ष रुप से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था.उत्तर गुजरात से आए उमाशंकर आजीवन अध्यापक थे.साहित्यप्रवाहों से घनिष्ठ संबंध बनाए रखने के अलावा संस्कृत महाकाव्यों और पुराणों का उन्होंने गहन अध्ययन किया था. देश -विदेश के राजकीय और सांस्कृतिक परिवेशों का मार्मिक परामर्श वे करते रहते थे.उमाशंकरजी ने रवीन्द्र साहित्य का आकंठ रसपान किया था.वे आजीवन कर्मयोगी थे..उनका कविकर्म खुद एक अध्यात्म प्रवृत्ति बन गया था. उनका जन्म 21 जुलाई 1911 के दिन उत्तरगुजरात के बामणा गाँव में हुआ था.शामलाजी के निकटवर्ती पर्वतप्रदेश में - डुंगरावाला के नाम से जाने…

श्याम गुप्त का आलेख - जीव जीवन व मानव -भाग ३...

चित्र
पूर्व का आलेख यहाँ देखेंजीव जीवन व मानव -भाग ३...(ब) मानव का सामाजिक विकास युगों तक प्रारंभिकहोमो सेपियनघूमंतू शिकारी-संग्राहक -- के रूप में छोटी टोलियों में रहा करते थे | जैसे जैसे मस्तिष्क व सामाजिकता का विकास होता गया, सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया तीब्रतर होती गयी| सांस्कृतिक उत्पत्ति व कृषि एवं पशुपालन --सांस्कृतिक उत्पत्ति ..कृषि व पशुपालन के विकास के साथ सांस्कृतिक विकास ने जैविक उत्पत्ति का स्थान ले लिया| लगभग 8500 और 7000 ईपू के बीच, मध्य पूर्वके उपजाऊ अर्धचन्द्राकार क्षेत्र में रहने वाले मानवों नेवनस्पतियों व पशुओं के व्यवस्थित पालन की व्यवस्था कृषि शुरुआत की जो प्रारम्भ में खानाबदोश थे व विभिन्न क्षेत्रों में घूमते रहते थे | यह अर्ध-चंद्राकार क्षेत्र वास्तव में भारतीय भूभाग का ब्रह्मावर्त क्षेत्र था जहां सर्वप्रथम कृषि व पशुपालन प्रारम्भ हुआ| मथुरा-गोवर्धन क्षेत्र विश्व में प्रथम पशुपालन व कृषि सभ्यताएं थीं, जिसका वर्णन ऋग्वेद में भी है |स्थाईबस्तियों का विकासकृषि का प्रभाव दूर दूर तक पड़ोसी क्षेत्रों तक फैला व अन्य स्थानों पर स्वतंत्र रूप से भी विकसित हुआ | कृषि व पशु-…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.