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July 2014
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आप सभी सुहृदय पाठकों के सक्रिय सहयोग से रचनाकार.ऑर्ग में पिछले दो मौकों पर व्यंग्य तथा कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन अत्यंत सफलतापूर्वक पूर्ण किए जा चुके हैं.

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन के विवरण के लिए यहाँ देखें -
http://www.rachanakar.org/2009/08/blog-post_18.html

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन के विवरण के लिए यहाँ देखें -
http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

इस बार संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन 2014 प्रस्तावित है. संस्मरण लेखन में हर किस्म के संस्मरण – यात्रा, घटना, स्थिति-परिस्थिति, व्यक्ति आदि-आदि सभी - शामिल किए जाएंगे.

इस आयोजन हेतु आप सभी पाठकों से पुरस्कारों हेतु प्रायोजन के प्रस्ताव आमंत्रित हैं. यदि प्रायोजन आदि से पुरस्कारों हेतु पर्याप्त राशि/सामग्री प्राप्त होने की संभावना बनेगी तभी इस आयोजन को आगे बढ़ाया जाएगा, अन्यथा इसे छोड़ दिया जाएगा. यदि प्रायोजक चाहेंगे तो उनके नाम / आर्टवर्क / विज्ञापन / वेबसाइटों के लिंक आदि इस आयोजन की प्रविष्टियों के साथ प्रकाशित किए जाएंगे.

प्रायोजन में आप अपनी तरफ से कुछ भी, कितना भी दे सकते हैं. पुरस्कार राशि से लेकर अपनी स्वयं की या  रचनाकार मित्र की पुस्तकें आदि कुछ भी. याद रखें, बूंद बूंद से घट भरता है.
इस आयोजन हेतु रचनाकार.ऑर्ग की ओर से आरंभिक राशि रु. 5000/- जमा की जा रही है.
प्रायोजन हेतु अपने प्रस्ताव यहाँ टिप्पणी बॉक्स में दे सकते हैं (कृपया अपना ईमेल संपर्क सूत्र अवश्य दें) अथवा rachanakar@gmail.com पर ईमेल कर सकते हैं.

अद्यतन :  पर्याप्त प्रायोजन राशि / प्रायोजकों के अभाव में यह आयोजन अभी स्थगित किया जा रहा है.

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आदमी

व्‍यंग्‍य

जंगल की एक निंबध प्रतियोगिता में गाय ने आदमी पर निबंध लिखा जो इस प्रकार है। आदमी एक दोपाया जानवर होता है । उसको दो कान , दो आंखें और दो हाथ होते हैं। वह सबकुछ खाता है । उसका पेट बहुत बड़ा तो नहीं होता लेकिन कभी भरता नहीं है । यही कारण है कि आदमी जुगाली नहीं करता । उसके सींग नहीं होती लेकिन वह सबको मारता है । उसके दुम नहीं होती लेकिन वह दुम हिला सकता है । वह एक अदभुत किस्‍म का प्राणी होता है । उसके बच्‍चे भी बड़े होकर आदमी ही बनते हैं। आदमी हर जगह पाया जाता है । गांवों में , शहरों में , पहाड़ों और मैदानों में । रेगिस्‍तान से लेकर अंटार्कटिका जैसे ठंडे स्‍थानों पर भी पाया जाता है । वह कहीं भी रह सकता है लेकिन जहां रहता है उस जगह को जहरीला कर देता है। उससे दुनिया के सारे जानवर डरते हैं । वह जानवरों का दुश्‍मन तो है ही पेड़-पौधों का शत्रु भी है ।

आदमियों के अनेक प्रकार होते है। गोरा आदमी , काला आदमी , हिन्‍दू आदमी , मुसलमान आदमी , ऊँची जाति का ,नीची जाति का , पर सबसे अधिक संख्‍या में पाये जाते हैं - धनी आदमी गरीब आदमी । आदमी हमेशा लड़ने वाला जीव होता है । वह नाम, मान, जान, पहचान, आन और खानदान के लिए लड़ता ही रहता है । सबसे अधिक , अपनी पहचान के लिए लड़ता है । जानवरों में यह हँसी की बात मानी जाती है कि पहचान के लिए कोई लड़े । किसी के सींग छोटे हैं तो किसी के बड़े । किसी की दुम छोटी है तो किसी की बड़ी । हाथी के कान विशाल होते हैं तो ऊँट के एकदम छोटे लेकिन दोनों लड़ते नहीं हैं। कौआ काला होता है । तोता हरा लेकिन दोनों एक ही डाल पर प्रेम से रह सकते हैं। आदमियों में सबसे ज्‍यादा लड़ाई पहचान के लिए होती है। कहते हैं कि आदमी एक सामाजिक प्राणी है जबकि समाज में रहना उसे आता ही नहीं । वह सबसे ज्‍यादा अपने पड़ोसी से लड़ता है। वह दो ईंच जमीन के लिए भी लड़ सकता है और एक गज कपड़े के लिए भी । और तो और वह एक पके पपीते के लिए चौबीस घंटे अनवरत लड़े तो जानवरों को आश्‍चर्य नहीं होगा । पड़ोसी से लड़ने के लिए धर्म और जाति बनाई गई हैं ंजानवरों में जाति और धर्म नहीं हैं तो वह कितने सुख से रहता है। ऐसा नहीं कि शेर के शक्‍तिशाली भगवान हैं और उन्‍हें मांसाहार पसंद है । तो , खरगोश के भगवान शाकाहारी हैं। उनका अवतार जंगल को शेरों से मुक्‍त कराने के लिए हुआ था। मछलियों के भगवान पानी में रहते तो बंदरों के पेड़ पर । यदि ऐसा होता तो जंगल में जानवर लड़ते -लड़ते मर जाते । शुक्र है जानवरों के पूर्वजों के दिमाग में ऐसी बातें नहीं आई । नहीं तो जंगल भी नगर बन जाते । हँसी तो तब आती है जब इतनी लड़ाइयों के बावजूद आदमी अपने को सामाजिक प्राणी मानता है ं। धन्‍य है आदमी ।

आदमी में अनेक गुण होते है । वह धन जमा करता है । उसे लगता है कि दुनिया में धन ही किसी को भी सुरक्षित रख सकता है । धन जमा करने की भी कोई हद नहीं है । अपने देश में तो जमा करता ही है । दूसरे देशों में जाकर भी जमा करके आता है । धन दो प्रकार का होता हैं -काला और सफेद । वह दोनों प्रकार के धन का संग्रह करता है। सारी कतर-ब्‍योंत जीवन भर करता है धन के लिए । जंगल में यह बीमारी नहीं आई तो जानवर कितने सुखी हैं । नहीं तो शेर के बच्‍चे जंगल को अपनी जागीर मानने लगते । मानते तो अब भी हैं लेकिन उसके लिए उनकी आपस में जंग होती है । सेना के साथ नहीं, व्‍यक्‍तिगत रूप से। सत्‍ता मिलने के बाद यदि उनके अंदर धन की लालसा होती तो क्‍या पता अपने ही जंगल के पेड़ों को दलालों के हाथों बेच देते । नदियों को उद्योगपतियों के यहां गिरवी रख देते । हवा को भाड़े पर लगा देते। पत्‍तों के लिए आपस में लड़ते और सारे के सारे मारे जाते । शेर को धोखे से मारा जाता । हिरण लोमड़ी के साथ मिलकर सत्‍ता के लिए षडयंत्र करती । हमारे पूर्वज कितने विवेकशील थे कि उन्‍होंने धन नाम की आदत लगने ही नहीं दी । खाओ-पीओ, सुखी रहो के सिद्धांत पर जानवर जीते हैं । न वर्त्‍तमान की चख-चख न भविष्‍य की चिंता । न बैंक है न पुलिस । हां, पुलिस ही नहीं आदमी को सेना की जरूरत भी पड़ती है । कहने के लिए तो वह अपने को सभ्‍य और सुसंस्‍कृत मानता है लेकिन उसे सभ्‍य तरीके से रहना ही नहीं आता । उनको शांति स्‍थापना के लिए पुलिस रखनी पड़ती है । जितना बड़ा आदमी ,उतनी ज्‍यादा सुरक्षा । एक देश का आदमी दूसरे देश के आदमी पर हमले करता है। उसकी जमीन पर कब्‍जा करना चाहता है । वह अपनी सेना से हमला करता है । दोनों सेनाओं में लड़ने वाले लोग लड़ते और मारे जाते हैं जबकि युद्ध के बाद मौज करने वाले सीमा पर कभी जाते भी नहीं। सैनिक नामक आदमी शहीद हो जाता है । नेता नामक आदमी राज करता है । जंगल में ऐसी कोई संभावना नहीं है। एक जंगल का शेर यदि दूसरे जंगल के शेर से लड़ता भी है तो बिना सेना और हथियार के । अपने स्‍वार्थ के लिए वे दूसरे जानवर की बलि नहीं देते । यही कारण है कि उन्‍हें सदियों से राजा माना जाता रहा है ।

राजा आदमियों में पहले होते थे अब नहीं होते । पहले भी जब राजा हुआ करते थे तो राजा के लिए आदमी आपस में लड़ते थे । अब उनके समाज में एक लोकतंत्र नाम की व्‍यवस्‍था है जिसकी कमजोरियों का लाभ उठाकर एक आदमी लाखों आदमियों को बेवकूफ बनाता है । अपनी कलाकारी में यदि वह सफल हो गया तो राज करने का अधिकार उसे मिल जाता है । लोकतंत्र में अक्‍सर यही होता है कि नेता आदमी नारे गढ़ता है । सपने बुनता है । बुने हुये सपनों को चमकाता है। उसे आम आदमी को दिखाता है। उसके हाथों उन सपनों को बेच देता है। आम आदमी उसे अपना सपना समझकर खरीद लेता है लेकिन वह होता है नेता आदमी का सपना। वह अपने अभिनय , कला-कौशल और संसाधनो से एक पूरे समाज को अपने पक्ष में मोड़ लेता है। आम आदमी यह जानते हुये भी कि नेता आदमी ने आजतक जो भी कहा गलत कहा गलता कि सिवा कुछ नहीं कहा, उसके बहकावे में आ जाता है । लोग उसके बुने हुये सपनों को अपने मन में पांच साल तक पालते हैं और अंत में उसको अनाप-सनाप कहता शुरू कर देते हैं । उसके बाद दूसरे नेता को वोट देते हैं। उन्‍हीं सपनों को एक बार फिर पालते हैं । बेशक रंग अलग हो । जंगल में लोकतंत्र नहीं है। जंगल के जानवर सुखी हैं। उन्‍हें पता है कि शेर ही राजा है। वह भी जानता हैं कि वही राजा हैं। झूठ और फरेब की गुंजाइश ही नहीं है । आदमियों के लोकतंत्र में कहा तो यह जाता है कि इसमें कमजोर को भी न्‍याय मिलता है लेकिन यह शक्‍ति के सिद्धांत पर ही आधारित हैं। शरीर की नहीं धन की शक्‍ति।

जंगल में मांसाहारी जीव मांस खाते हैं । शाकाहारी हरी घास । आदमियों में यह एक विचित्र बात है कि कोई एक समय का भोजन नहीं जुटा पाता तो कोई एक समय में हजारों रुपये का खाना खा जाता है । कोई यह सोच कर पेरशान है कि क्‍या खायें ? कोई यह सोचकर टेंशन में है कि क्‍या-क्‍या खायें ? कोई खाने के लिए मंदिर की सीढि़यों पर भीख मांगता है तो कोई उसी मंदिर में भागवान को छप्‍पन भोग खिलाता है ताकि उसका खाया हुआ आसानी से पच जायें । एक आदमी रात में खुले आसमान के नीचे सोता है । ठंड में ठिठुरता रहता है । दूसरा , अपने राजसी बिस्‍तर पर गर्म रजाई में दुबक कर रंगीन सपने देखता है । जंगल में ऐसी समस्‍यायें नहीं आतीं । मजबूत जानवर कमजोर जानवर को खाता जरूर है लेकिन केवल भूख लगने पर । वह मार-मार कर जमा नहीं करता । कल की चिंता जंगल में किसी को नहीं है। सभी अपनी मांद में एक तरह से रहते हैं चाहे वह सियार हो या शेर । पंछी अपने घोंसलों में रहते हैं । मछली पानी में । किसी को भोजन , वस्‍त्र और आवास की चिंता नहीं है ।

अंत में एक बात और , आदमियेां की बोली अलग-अलग होती है। वह केवल बोलता ही नहीं लिखता और पढ़ता भी है। एक बंगाली में बोलेगा तो दूसरा मराठी में । किसी की बोली गुजराती है तो किसी की पंजाबी । भारत को आदमी हिन्‍दी बोलेगा तो इंगलैंड का अंग्रेजी। खैर, अलग-अलग बोली है तो बोले । पर वह तो बोलियों के लिए लड़ता है। सबको यही लगता है कि उसकी भाषा अच्‍छी है और बकियों को बेकार । वह खून खराबे तक करता है यही सोच-सोचकर। जानवरों में यह समस्‍या नहीं है । पूरें संसार भर के कुत्‍ते भौंकते है। सृष्‍टि भर की गांये एक ही तरह रंभाती है । ऐसा नहीं कि चम्‍पकपुर जंगल के कुत्‍ते भौंके और नंदनवन के रेंकें । यही कारण है कि जंगल में बोलियों की लड़ाई भी नहीं होती । संसार में जितने आदमी हैं । उन्‍हें आप आदमी नहीं कह सकते । सबके अपने अपने नाम है । कोई पीटर है तो प्रभुदयाल । कोई मिर्जा मुस्‍ताफ है तो कोई मदनचंद । जंगल में सभी शेर , शेर हैं। सभी गायें , गाय । अंत में वह नाम के लिए भी लड़ता है । हँसी तो यह सोचकर आती है कि लड़ाइयों के बावजूद आदमी अपने आपको संसार का सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी मानता है ।

यह निबंध प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्‍ठ मानी गई । क्‍या जंगल में भी पक्षपात होते हैं ?

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शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर नांदेड

431736

व्यंग्य

फ़ाइल    फ़ाड़ोत्सव

यशवंत  कोठारी

सरकार चुप है. मंत्री चुप है। वित्त  मंत्री ने बजट का हलुआ  चख लिया है. जनता ने बजट  की मार झेल  ली है। महंगाई के कारण  केवल  प्याज  , टमाटर  और आलू  पर व्यंग्य पढ़ने  पड़  रहे हैं  .ऐसी विकट  परिस्थितियों में सरकार ने एक चमत्कार किया  उसने फाइल   फ़ाड़ोत्स्व  का आयोजन  किया  .

सभी  सरकारी  दफ्तरों में  फाइल   फाड़ने , जलाने, नष्ट करने  की एक प्रतियोगिता चली।  बहुत सी महत्त्व पूर्ण ऐतिहासिक महत्त्व की फाईलें    जला दी गयीं   नष्ट कर दी गयीं।   आने वाले समय  में   शोधकर्ता  इतिहासकार   राजनीति  के  अध्येता  इन फाईलों के बिना  क्या करेंगे ? देश का वास्तविक इतिहास कैसे लिखा  जायेगा ?फाईलें फाड़ने की ऐसी भी क्या जल्दी थीमहत्त्व पूर्ण अंशों  को बचाया जासकता  था। या फिर उनको कम्प्यूटर  में सुरक्षित किया  जा सकता था।

मगर सरकार जो करे सो ठीक।   सरकार  राजनितिक नियुक्तियों में उलझ  कर रह गयी है

कभी सरकारी दफ्तरों में एक नोट शीट या  फाइल  के  एक कागज   के खो जाने पर बड़े बड़े अफसरों  बाबुओं की शामत आ जाती थी।   उस पत्रावली के खो जाने की सूचना पूरे ऑफिस  को दी जाती थी,   और फाइल को पूरी शिद्दत से खोजा  जाता   था।  संबंधित लिपिक  पर तो निलंबन की तलवार लटक जाती थी।  फाईलें व पुराने रिकॉर्ड जलाने की भी एक निश्चित   प्रक्रिया थी  जिसका  पालन  विभाग की जिम्मेदारी थी।  मगर  महात्मा गांधी, सुभाष बोस   जैसे महत्वपूर्ण  नेताओं की फाईलों पर प्रश्न चिन्ह  लग  गए हैं।

इधर सरकार के मंत्रियों  का  मीडिया से एकालाप , प्रेमालाप अलाप   भी लगभग  बंद है.  हज़ारों फाईलों  के नस्ट  होने की बात पर देश व्यापी बहस की जरूरत है।  पहले अनुपयोगी   फाईलों को   लाल कपडे में बांध कर भंडार में सुरक्षित   रखा जाता था।   मगर  लाल फीताशाही का यह चलन भी  फाईलों को नहीं बचा सका।

वैसे शुरू में फाइल  एक नोट शीट  और एक कागज से  चलती है,  जो बिलकुल तन्वंगी होती है। धीरे धीरे     कई टैब्लों पर जाती जाती  प्रौढ़ा जाती है और  अंत  में भंडार की शोभा बढाती है.

फाईलों की  कथा अनंत है।  प्रसिद्ध   व्यंग्यकार  रविन्द्र नाथ त्यागी सरकार में एक बड़े अफसर थे  एक बार एक  फाइल  आधा घंटा देरी से लाने के  कारण  परेशानी में पड़   गए थे।  यहाँ तो लाखों फाईलें  नष्ट  हो गयी हैं।  कुछ करो  भाई।

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यशवंत कोठारी 

८६  लक्ष्मी नगर  ब्रह्मपुरी जयपुर

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आओहम बाबा बनें !

अफ़सोस सिर्फ यही है कि यह ख्याल मुझे इतनी देर से क्यों आया ? खैर,  देर आयद दुरुस्त आयद ! आखिर, इससे पहले आता

भी तो  मैं चाहते हुए भी बाबा न बन पाता।  दरअसल, आज मैं उम्र के जिस दौर में हूँ, हम बाबा उसी  उम्र में बन सकते हैं, पोते - पोतियों

के भी और नाती - नातिनों के भी। लेकिन मैं आपको जैसा बाबा बनने के लिए कह रहा हूँ, उसके लिए बच्चों के बच्चे नहीं अपितु अक्ल में

कच्चे कुछ ऐसे लोग चाहियें जो बिना  मेहनत किये एक सुखद जिन्दगी की तलाश में रहते हैं। ये लोग अपने देश में करोड़ों में हैं। फलस्वरूप, 

यदि आप मेरे आह्वान पर मेरे साथ बाबा बनते हैं तो लक्ष्मी कब से हमारे पाँव छूने के लिए व्यग्र है और यश कब से हमारे इंतज़ार में जूते

घिस रहा है।  आपको इन नामों से कहीं गलतफहमी न हो जाए, इसलिए आपको यह बताना जरूरी है कि जो लक्ष्मी आप सोच रहे हैं, वह तो  

हमारे पास कुछ समय बाद आयेगी। आखिर, करोड़ों का साम्राज्य कोई साल - दो साल में तो बनेगा नहीं। उसके लिए हमें सत्संग के साथ - साथ

भूमि हथियाने जैसे कुछ दूसरे उपाय भी करने पड़ेंगे। कुछ नेताओं के साथ भी तालमेल बिठाना पड़ेगा।

दरअसल, यह लक्ष्मी तो हमारी गली में रहने वाली वह लड़की है जो  किसी खांटी बाबा के आशीर्वाद से आगामी फिल्म में सलमान की हीरोइन

बनने की इच्छा पाले हुए है।  यश का भी ऐसा ही मामला है।  मैट्रिक में बड़ी मुश्किल से पास होने वाला यश कुछ वर्षों बाद सूबे का मुख्यमंत्री  

बनने के लिए आशीर्वाद चाहता है।  इधर जिन बाबाओं की दुकानें हैं, वे किसी न किसी को आशीर्वाद दे चुके हैं और यश को नए बाबा की तलाश है।

संतान की चाह रखने वाले  ऐसे दम्पतियों से भी संपर्क साधना होगा क्योंकि जो वर्तमान बाबाओं से निराश हो चुके हैं।

बहरहाल, खुशखबरी की बात है कि ऐसे लाखों लक्ष्मियाँ और यश हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। और हाँ ,  मुख्य बाबा तो  मैं रहूँगा और आप

सहायक बाबा की भूमिका में रहेंगे।  आपको प्रारंभ में दिहाड़ी पर कुछ ऐसे लोग रखने हैं जो गली मोहल्लों में जाकर लोगों को बाबा  " चमत्कारी "  

की उन शक्तियों के बारे में बताएँगे जो उन्होंने आठ वर्षों तक हिमालय पर जाकर साधी हैं।  हाँ, बाबा चमत्कारी मेरा ही नाम होगा और एक बार

यह प्रक्रिया शुरू हो गयी तो समझो फिर  अपने आप भक्तों की संख्या में इजाफा होता जाएगा । तो फिर हाँ बोलो और शुरू हो जाओ। वैसे भी एक

बाबा का स्थान खाली होने वाला है।  

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कलयुगी महाभारत 
                                                                                   

अवकाश के क्षणों में सत्यभामा जी ने भगवान श्री कृष्ण से पूछ लिया - प्रभु, कलयुग में महाभारत हुआ तो उसमें कौन जीतेगा ?
भगवान ने मुस्कराते हुए कहा - प्रिय, कलयुग कागजी शेरों का जमाना होगा। इसमें अपने को शेर मानने वाले योद्धा अपने चारों तरफ

सुरक्षा घेरा बनाकर युद्ध क्षेत्र में उतरेंगे। यह युद्ध भी कागजी होगा और यह मैदानों के बजाय स्कूल - कॉलेज के भवनों, पंचायत घरों और

अन्य दूसरे सरकारी भवनों में होगा। ऐसे सभी युद्धों में सर गिने जायेंगे। इसलिए ऐसे युद्धों में तब कौरव ही जीतेंगे। बाणों की जगह बटन

दबेंगे और जिसके नाम के बटन को ज्यादा लोग दबाएंगे, वही विजयी माना जायेगा। पाण्डव तो पांच होंगे और कौरव सौ होंगे। मेरी सेना

भी कौरवों के साथ होगी। मैं पाण्डवों के साथ रहूंगा लेकिन मेरा वोट तो एक ही गिना जायेगा।
यह सुनकर सत्यभामा जी खिन्न स्वर में बोली - तो क्या आप पाण्डवों की मदद नहीं करेंगे ?
भगवान हँसते हुए बोले - सत्यभामा जी, आप यूं दुखी न हों। यह सब तो मेरी लीला है। द्वापर के पांडवों को तो मोक्ष प्राप्त हो गया था।

दरअसल, ये सभी कौरव हैं किन्तु ये जनता को बरगलाने के लिए नकली महाभारत खेल रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद ये सब एक - दूसरे

की मदद करते हैं। कलयुग में यही होना है। जनता इस युग में कष्ट भोगने के लिए अभिशप्त है।

   " प्रभु ! आपकी लीला आप ही जानें। " यह कहने के बाद सत्यभामा जी निरीह भारतीय जनता के लिए प्रार्थना करने लगी।
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भ्रष्टाचार पर  सोचते हुए !

 

आजकल दिमाग अक्सर भ्रष्टाचार पर स्वयं सोचने लगता है दरअसल, दिमाग पिछले कुछ वर्षों में लगातार इसी विषय पर अन्ना, रामदेव,
केजरीवाल, मोदी और कहीं वे नाराज न हो जायें तो आडवाणी जी के विचार सुनता रहा है। इसके अलावा स्वयं भ्रष्टाचार में संलिप्त अन्य दूसरे नेता
भी इस विषय पर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं। भ्रष्टाचार का सर्वाधिक  सुंदर नख - शिख वर्णन करने में वे माहिर होते हैं क्योंकि वे भ्रष्टाचार की
वजह से ही पैदा हुए लगते हैं। हमारे टीवी से जुड़े मीडिया कर्मियों का तो यह प्रिय विषय है। वे अपने चैनलों में नियमित रूप से एक सफ़ेद दाड़ी वाले
को, एक गंजे युवा को और  अपने कुछ ऐसे परिचितों को बुलाकर इस विषय पर बहस कराते हैं जिनका खुद का दामन जगह - जगह दागी प्रतीत होता है।

खैर, आज रात से दिमाग शायद सोते समय भी इसी विषय पर सोचता रहा क्योंकि मैं सपने में एक ऐसे नेता की प्रशंसा में कविता पाठ कर रहा था

जिनके कुछ किस्म के भ्रष्टाचारों से उनकी वह पत्नी भी परेशान है जिसने नेता जी से कहकर अपने सभी भाइयों को कई नगरों में करोड़ों के प्लाट लाखों में
दिलाये और अपने लिए भी विदेशी बैंकों में भारी धन राशि जमा कराई है। बहरहाल, दिमाग का क्या ? वह अब बगावत कर चुका है। वह आज उस भ्रष्टाचार
के बारे में सोच रहा है जिसे करोड़ों रुपये के एवज में वे लोग करते हैं जिन्हें इस देश के लोग अपना नायक - नायिका मानने के भ्रम में फंसे हुए हैं। यह भ्रष्टाचार
विभिन्न उत्पादों के विज्ञापन से जुड़ा हुआ है।

दिमाग का मानना है कि यदि आपने किसी पदार्थ को कभी भी इस्तेमाल नहीं किया है और न आपने उसके बारे में कोई जांच - पड़ताल की है तो फिर
आप किस हक़ से उसे आमजन को इस्तेमाल करने को कहते हैं ? हमारे देश में फिल्मों सहित विभिन्न क्षेत्रों में चोटी पर पहुंचे नायक - नायिकाएं सभी ऐसे
उत्पादों की तारीफ़ में विज्ञापनों में कसीदे काढ़ते नजर आते हैं जिनको उन्होंने कभी भी इस्तेमाल नहीं किया है और न भविष्य में करेंगे। हमारी फ़िल्मी नायिकाएं
जिन साबुनों के विज्ञापनों से करोड़ों कमाती हैं, उनका इस्तेमाल वे सिर्फ तस्वीर खिंचवाने के दौरान करती हैं। हमारे जो फ़िल्मी नायक गर्भवती महिलाओं को
ऐसे विज्ञापनों में सलाह - मशविरा देते हैं, वे अपने लिए बच्चे किराए की कोख से पैदा करवाते हैं। हमारे कुछ नायक जिन्हें कुछ लोग  भगवान का दर्ज तक
देते हैं, वे तेल - तौलियों के विज्ञापनों में नजर आते हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं जो सिर्फ अपने उत्पादों पर भरोसा रखते हैं, शेष सभी उन्हें लूटेरे नजर आते हैं।

मेरा दिमाग मेरे से ही पूछ रहा है कि क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है। मैंने किसी का नाम नहीं लूंगा जबकि दिमाग मुझे लगातार उनका नाम लेकर परेशान कर
रहा है। उनके नाम आप सभी जानते हैं। अ से  लेकर ज्ञ तक, आप सभी के विज्ञापन देखते आये हैं। दिमाग तो सिर्फ आप से आपकी राय जानना चाहता है।
आखिर, जिस तेल या साबुन को वे खुद इस्तेमाल नहीं करते, उसे हमें लगाने को क्यों कहते हैं ? दिमाग परेशान है। उसे यह भी मिड -डे मील जैसा भ्रष्टाचार
लगता है क्योंकि ये सब वे पैसा बनाने के लिए करते हैं, जनता को सही मार्ग दर्शन देने के लिए नहीं !

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- सुभाष लखेड़ा, सी - 180 , सिद्धार्थ कुंज, सेक्टर - 7, प्लाट नंबर - 17, नई दिल्ली - 110075           

व्‍यंग्‍य

जनम-जनम का साथ है

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

लोग बताते है कि इस धरा-धाम पर उसका अवतरण मोबाइल धारण किये हुये ही हुआ था। इसी कारण उसकी सुबह ‘ऊँ मोबाइलाय नमः‘ की जाप से शुरू होती और रात में वह ‘गुडनाइट माय डियर मोबाइल‘ कहने के बाद ही बिस्‍तर पर जाता। कभी मोबाइल के बिगड़ जाने पर वह इतना दुःखी होता है, जितना अपने छोटे बच्‍चे के बीमार हो जाने पर या अपने पिताजी के दुर्घटनाग्रस्‍त हो जाने पर भी नहीं होता। कभी नेटवर्क प्राब्‍लम के कारण यदि उसकी किसी से बात नहीं हो पाती तो वह पंख कटी मुर्गी की तरह फड़फड़ाने लगता। दिन में व्‍यस्‍त सड़क पर चलते समय उसकी नजर हमेशा रास्‍ते से ज्‍यादा मोबाइल के स्‍क्रीन पर होती है। औेर ऊंगलियां बटनों से अठखेलियाँ करती रहती है। बाइक या चार पहिया चलाते समय उसका यह उत्‍साह कई गुणा बढ़ जाता है। जिन्‍दगी को भगवान भरोसे छोड़कर वह पूरा ध्‍यान हर पल अपने मोबाइल पर देता था। वह पुनर्जन्‍म के सिद्धांत को मानने वाला आदमी है, उसका कहना है कि जिन्‍दगी दोबारा मिल सकती है पर मोबाइल? मोबाइल के नाम पर सिर पर कफन बाँधकर गाड़ी चलाने वाले उस आदमी की वीरता देख लोग दाँतों तले ऊंगलिया दबा लिया करते हैं।

उसकी वीरता देख पुलिस वाले कई बार उसे सम्‍मानित भी करना चाहते थे। पर वह पुलिस वाले के हाथों सम्‍मानित नहीं होना चाहता था। वह उन्‍हें देख ऐसे बिदकता था, जैसे लाल कपड़े को देखकर साँड़। फिर वह अपनी गाड़ी ऐसे दौड़ाता था। जैसे कोई बिना लगाम का घोड़ा। पुलिस वाले हर बार उसे सम्‍मानित करने से चूक जाते और हाथ मलते रह जाते। उस आदमी के हाव-भाव देखकर ऐसा लगता था कि जैसे कोई फकीराना अंदाज में गा रहा हो, ‘मन लागो यार मोबाइल में ‘।

अन्‍ततः उसकी वीरता का समाचार यमलोक तक पहुँच गया। यमराज उसके दर्शन के लिये व्‍याकुल हो गये। उसे स्‍वयं उस बहादुर को सम्‍मानित करने के लिये यहाँ असमय ही प्रकट होना पड़ा। हुआ कुछ यूँ था कि एक दिन वह अपने मोबाइल पर किसी से बात करते हुये फुलस्‍पीड में गाड़ी चला रहा था। बातों में वह इतना मशगूल हो गया था कि उसे आगे-पीछे का कुछ भी ध्‍यान नहीं था। दिख रहा था तो सिर्फ मोबाइल का स्‍क्रीन, जैसे महाभारत में द्रोपदी स्‍वयंबर के समय अर्जुन को सिर्फ मछली की आँख दिखाई दे रही थी। अचानक हवा का एक झोंका आया और उसका प्राणों से प्‍यारा मोबाइल उसके हाथ से छूटकर व्‍यस्‍त सड़क के बीच में जा गिरा। मोबाइल को जरा-सा भी खरोंच ना आ जाये, यह सोचकर उसने तुरन्‍त अपनी बाइक फिल्‍मी हीरो के स्‍टाइल में मोड़ी और मोबाइल को उठाने के लिये झुका। तभी एक ट्रक उसे रौंदते हुये निकल गया।

यमराज बांहे फैलाये कह रहा था कि धन्‍य हैं आप, आपकी वीरता देख मेरी आँखे धन्‍य हो गईं। यह मेरा परम सौभाग्‍य है कि आप मेरे कार्यकाल में स्‍वर्गारोहण कर रहे है। आइये, जल्‍दी चलिये यमलोक में आपके स्‍वागत की तैयारी बड़ी जोर-शोर से चल रही है।

मरकर जिन्‍दगी के कव्‍हरेज क्षेत्र से बाहर हो जाने के बाद भी उसका जीव मोबाइल पर किसी से बात करने की कोशिश कर रहा था। जिसे देख यमराज मुस्‍कुराते हुये बोला-‘‘अरे! अब तो इसे छोडि़ये महाशय, जल्‍दी चलिये देर हो रही है।‘‘ उसने झुंझलाकर यमराज को झिड़कते हुये कहा-‘‘अरे चुप रहो यार, दो मिनट घरवालों से बात तो कर लेने दो। तुम्‍हें जल्‍दी पड़ी है तो जाओ, अपना पता ठिकाना छोड़ दो, मैं आराम से आ जाऊँगा, ओ के। दो मिनट रूक भी नहीं सकते, कहीं भागे थोड़े ही जा रहा हूँ।‘‘ यमराज को अपना-सा मुँह लेकर रह जाना पड़ा और वह अपने मोबाइल में व्‍यस्‍त हो गया।

इधर घटना स्‍थल पर भीड़ बढ़ गई थी। पुलिस के सिपाही, पत्रकार, फोटोग्राफर सब आ गये थे। भीड़ हटाई जा रही थी, फोटो खींचे जा रहे थे। तभी एक सिपाही के मोबाइल का रिंगटोन बजा। उसने कॉल रिसीव करने से पहले मोबाइल का स्‍क्रीन देखा, एक अनजाना और नया नम्‍बर था। उसने कॉल रिसीव करते हुये पुलिसिया अंदाज मे कहा-‘‘कौन है बे?‘‘ जवाब मिला-‘‘साहब मैं बोल रहा हूँ, देख नही रहे हैं? अरे! साहब मैं आपके सामने मरा हुआ पडा हूँ और इधर यमराज के साथ खड़ा हूँ। मैंने तो आपको यह बताने के लिये फोन किया है कि आप उस ट्रक वाले को छोड़ दीजिये, उसकी कोई गलती नहीं है। मैं तो स्‍वयं अपने मोबाइल के साथ सती हुआ हूँ। ट्रक चालक और उसके मालिक को नाहक परेशान ना किया जाय। सर, आपके साथ जो पत्रकार बंधु है कृपा करके उन्‍हें भी मेरा यह संदेश सुना दीजिये ताकि वे जनहित में इसे प्रकाशित कर सके। और हाँ एक बात और, मेरी यह अंतिम इच्‍छा मेरे घरवालों को भी बता दीजिये कि जब मेरी शव यात्रा निकाले तो मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर रखे और मेरे एक हाथ में एक लेटेस्‍ट मॉडल का मोबाइल जरूर पकड़ा दें। जिससे लोगों को पता चले कि इस नश्‍वर संसार में आदमी के साथ मोबाइल के सिवा और कुछ भी नहीं जाता। साथ-ही -साथ, समय-समय पर मेरे मोबाइल को यहीं से रिचार्ज भी कराते रहें, पता नही स्‍वर्ग में ये सब सुविधा है या नहीं। ‘‘

ये सब सुनकर सिपाही का दिल धक-धक करने लगा। बड़ी मुश्‍किल से उसने अपने आप को सम्‍हाला। आवश्‍यक कार्यवाही के बाद मृतक के शव को पोस्‍टमार्टम के लिये डॉक्‍टरों को सौप दिया गया। कुछ समय बाद डॉक्‍टर चीरघर में शव का पोस्‍टमार्टम करने लगे।

पोस्‍टमार्टम के दौरान शव के सीने मे कम्‍पन होने लगा। स्‍वीपर शेयर बाजार की तरह उछल पड़ा। स्‍वीपर बोला-‘‘सर! लगता है, आपका मोबाइल बज रहा है। शायद किसी का फोन आया है?‘‘ डाक्‍टर ने उसे डपटते हुये कहा-‘‘बकवास बंद करो, चुपचाप अपना काम करो। मैं अपना मोबाइल घर पर छोड़ आया हूँ और तुम्‍हारा मोबाइल अस्‍पताल में पड़ा है फिर यहाँ किसका मोबाइल बजेगा? शायद तुमने सिपाही की बात सुन रखी है तभी डर के मारे अनाप-शनाप बके जा रहे हो।‘‘ स्‍वीपर चुपचाप काम करने लगा। कुछ समय बाद वहाँ फिर मोबाइल का रिंग-टोन जोर-जोर से बजने लगा। ‘छोड़ेंगे ना हम तेरा साथ वो साथी मरते दम तक, मरते दम नहीं, सात जनम तक, सात जनम नहीं जनम जनम तक।‘

अब तो डॉक्‍टर के भी कान खड़े हो गये। वे सावधानी से मौका मुआयना करने लगे। उसका ब्‍लडप्रेशर पेट्रोल के दाम की तरह बढ़ने लगा। लेकिन उसने हिम्‍मत से काम लेते हुये कहा-‘‘लगता है इसके जेब मे मोबाइल पड़ा है। जेब टटोलकर तो देखो जरा।‘‘ स्‍वीपर ने डरते हुये कहा-‘‘सर, इसके कपड़े तो पहले से ही उतारे जा चुके हैं। जब कपड़े ही नहीं पहने हैं तो जेब कहाँ से होगी।‘‘ डाक्‍टर माथे पर छलक आये पसीने को पोछते हुये कहा-‘‘बात तो तुम सही कह रहे हो पर कम्‍पन तो सीने में ही हो रहा है। जरा सीने का विच्‍छेदन करके तो देखो।‘‘ डॉक्‍टर के इशारे पर सीने का विच्‍छेदन करके देखा गया। तो दोनों यह देखकर दंग रह गये कि शव के हृदय में मोबाइल की मनोहर छवि बसी थी। तस्‍वीर एकदम स्‍पष्‍ट थी। रिंगटोन उसी तस्‍वीर से बज रहा था और कम्‍पन भी वहीं से हो रहा था। दोनों उस महान मोबाइल प्रेमी को मन-ही-मन प्रणाम करते हुये कहने लगे-‘‘अहो भाग्‍य, हमारा जन्‍म सफल हो गया आपके दर्शन लाभ पाकर। धन्‍य हैं हम जो हमें आपके दिल के भीतर झाँकने का सौभाग्‍य मिला, मोबाइल आपकी आत्‍मा को शांति प्रदान करे।‘‘

पोस्‍टमार्टम के पश्‍चात उसके शव को परिजनों को सौंप दिया गया। उसकी अंतिम इच्‍छा का सम्‍मान करते हुये उनके परिजनों ने उसे अंतिम बिदाई देते समय उसके हाथ कफन से बाहर निकाल कर रखे थे और उसके एक हाथ पर मोबाइल भी रखा गया था। परिजन बिलख-बिलख कर रो रहे थे। लेकिन उसके चेहरे पर असीम शांति के भाव थे और होठों पर मधुर मुस्‍कान। ऐसा लग रहा था कि उसकी आत्‍मा मोबाइल में समाहित हो गई हो। तभी उसके मोबाइल का रिंगटोन फिर बजने लगा। जिसमे गाना आ रहा था, ‘जनम-जनम का साथ है हमारा तुम्‍हारा, अगर न मिलते इस जीवन में तो लेते जनम दोबारा ‘।

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वीरेन्‍द्र सरल

बोड़रा

पोष्‍ट-भोथीडीह ,व्‍हाया-मगरलोड़

जिला-धमतरी ,छ ग

भारत में भारतीय भाषाओं का सम्मान और विकास

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

राजतंत्र में, प्रशासन की भाषा वह होती है जिसका प्रयोग राजा, महाराजा और रानी, महारानी करते हैं। लोकतंत्र में, ´राजभाषा' शासक और जनता के बीच संवाद की माध्यम होती है। लोकतंत्र में, हमारे नेता चुनावों में जनता से जनता की भाषाओं में जनादेश प्राप्त करते हैं। जिन भाषाओं के माध्यम से वे जनादेश प्राप्त करते हैं, वही भाषाएँ देश के प्रशासन की माध्यम होनी चाहिए एवं उनको लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं का माध्यम भी बनना चाहिए।

बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में, भारत सरकार ने सिद्धांत के धरातल पर यह निर्णय ले लिया था जनतंत्र को सार्थक करने के लिए विभिन्न राज्यों में वहाँ की भाषा को तथा संघ के राजकार्य के लिए हिन्दी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। प्रशासकों को जनता के बीच काम करना है। जनता से संवाद करना है। जनता से संपर्क स्थापित करने के लिए उनकी भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। भाषा का ज्ञान है अथवा नहीं – इसका पता किस प्रकार चलेगा। लोक सेवा आयोग परीक्षाओं का संचालन किस उद्देश्य से करता है। यह किस प्रकार पता चलेगा कि परीक्षार्थी को जनता की भाषा का समुचित ज्ञान है अथवा नहीं। जब सरकारी अधिकारी बनने की इच्छा रखने वाले परीक्षार्थी लोक सेवा आयोग की परीक्षाएँ जनता के लिए बोधगम्य भाषाओं के माध्यम से देकर परीक्षा पास करेंगे तभी तो उनकी भाषिक दक्षता प्रमाणित होगी। उन भाषाओं के माध्यम से परीक्षा पास करने वाले सक्षम अधिकारी ही तो उन भाषाओं के माध्यम से प्रशासन चला पाएँगे तथा जनता से संवाद स्थापित कर सकेंगे।

लेखक ने सन् 1984 से लेकर सन् 1988 तक यूरोप में एक यूनिवर्सिटी में, विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। लेखक को यूरोप के 18 देशों में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यूरोप के सभी उन्नत विश्वविद्यालयों में विदेशी भाषाओं के संकाय हैं। संकाय में लगभग 40 विदेशी भाषाओं को पढ़ने और पढ़ाने की व्यवस्था होती है। विदेशी भाषा का ज्ञान रखना एक बात है, उसको जिंदगी में ओढ़ना अलग बात है। यूरोप के जिन 18 देशों की लेखक ने यात्राएँ कीं, उसने पाया कि 18 देशों में से इंग्लैण्ड को छोड़कर आस्ट्रिया, बेल्जियम, बुल्गारिया, चैकोस्लाविया (अब चैक गणराज्य और स्लोवेनिया), पश्चिमी जर्मनी, पूर्वी जर्मनी (अब केवल जर्मनी), हंगरी, इटली, लक्षमबर्ग, नीदरलैण्ड्स, पौलेण्ड, रोमानिया तथा उस समय के यूगोस्लाविया देशों का सरकारी कामकाज अंग्रेजी में नहीं होता था। वहाँ के विश्वविद्यालयों की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी नहीं था। वहाँ के प्रशासन का माध्यम अंग्रेजी नहीं था। जब पहली बार, मैं इटली के रोम के हवाई अड्डे पर पहुँचा, अंग्रेजी की अन्तरराष्ट्रीय भाषा होने का मेरा भ्रम टूटा गया। मैंने एक सज्जन से अंग्रेजी बोलकर उस काउंटर की जगह के बारे में जानना चाहा जहाँ से मुझे होटल के वाउचर लेने थे। उस सज्जन ने मुझे घूरा और चला गया। जब मैं बार बार ऐसा करता रहा और निराश हो गया तब मैंने संकेतों की भाषा का सहारा लिया। ऐसा करने पर मुझे सफलता मिली। यह घटना सन् 1984 के फरवरी माह की है। उपर्युक्त 17 देशों के शिक्षण एवं प्रशासन का माध्यम अंग्रेजी नहीं थी। प्रत्येक देश अपनी भाषा में अपना काम करता था। शिक्षण का काम भी। प्रशासन का काम भी। मेरा विश्व के लगभग 100 देशों के राजनयिकों से सम्पर्क हुआ। इंगलैण्ड और अमेरिका देशों के राजनयिकों को छोड़कर, बाकी देशों के राजनयिकों ने कहा कि या तो अपने देश की भाषा में बात होनी चाहिए या सामने वाले महँमान की भाषा में। संप्रभुता संपन्न देश के व्यक्ति को किसी तीसरे देश की भाषा में बात नहीं करना चाहिए। या तो अपने देश की भाषा में बात करो, संवाद करो। अगर आपको अतिथि की भाषा का ज्ञान है तो आप अपने अतिथि की भाषा में बात कर सकते हैं। हर देश में पर्यटकों की सुविधा के लिए पुस्तिकाएँ मिलती हैं। उनमें उस देश की भाषा में अन्तरराष्ट्रीय लिपि में बीस तीस कामकाज के वाक्य रहते हैं। उनका अनुवाद पर्यटक की भाषा में होता है। मसलन – 1. नमस्ते। 2. धन्यवाद 3. यह - - - होटल कहाँ है। 4. आप - - होटल चलोगे। 6.क्या लोगे।7. कमरा मिलेगा। 7. मैं - - - देखना चाहता हूँ। इसके अतिरिक्त लगभग सौ शब्द का शब्द भण्डार रहता है। हम जिस देश में जाते थे, हमें उस देश की भाषा वाली तथा उसका अंग्रेजी में अनुवाद वाली पुस्तिका खरीदनी पड़ती थी। किसी भी भारतीय भाषा में अनुवाद वाली पुस्तिका नहीं मिलती थी। यूरोप के हर देश में पर्यटकों के लिए जो पुस्तिका उस देश की भाषा में निर्मित होती थी उसके अनुवाद भारतीय भाषाओं को छोड़कर यूरोप के हर देश की भाषा के साथ साथ जापानी, चीनी, कोरियन आदि अनेक गैर यूरोपियन भाषाओं में भी होते थे। भारतीय भाषाओं को छोड़कर प्रत्येक देश का पर्यटक अपनी भाषा में अनुवादित पुस्तिका खरीदकर अपना काम चलाता था। हमें केवल अंग्रेजी में अनुवादित पुस्तिका पर निर्भर रहना पड़ता था।

भारत में 29 राज्य हैं। हर राज्य का सरकारी कामकाज उस राज्य की राज्यभाषा में होना चाहिए। संघ की राजभाषा हिन्दी है। सह राजभाषा अंग्रेजी है। संघ के राजकाज में सह राजभाषा से अधिक महत्व मुख्य राजभाषा को मिलना चाहिए।

संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता बनाए रखने का मतलब क्या है। क्या परीक्षार्थी की अभिक्षमता (एपटीट्यूड) को नापने वाला प्रश्न पत्र मूलतः अंग्रेजी में ही बन सकता है। क्या भारत में ऐसे विद्वान नहीं हैं जो भारतीय भाषाओं में मूल प्रश्न पत्र का निर्माण कर सकें। मूल अंग्रेजी के प्रश्न पत्र का अनुवाद जटिल, कठिन एवं अबोधगम्य हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में कराने का क्या प्रयोजन है। संघ लोक सेवा आयोग चाहता क्या है। क्या उसकी कामना यह है कि देश के प्रशासनिक पदों पर केवल अंग्रेजी जानने वाले ही पदस्थ होते रहें। क्या लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के प्रश्न पत्र का निर्माण मूल रूप से भारतीय भाषाओं में नहीं हो सकता। आप प्रश्न पत्र का निर्माण मूलतः भारतीय भाषाओं में कराइए। उस प्रश्न पत्र का अनुवाद अंग्रेजी में कराइए। लोक सेवा आयोग के अधिकारियों को भारतीय भाषाओं के माध्यम से परीक्षा देने वाले परीक्षार्थियों का दर्द समझ में आ जाएगा। प्रश्न पत्रों के निर्माण की प्रक्रिया को उलट दीजिए। वर्तमान स्थिति में बदलाव जरूरी है। इस साल की परीक्षा में, मूल अंग्रेजी के प्रश्न पत्र का जैसा अनुवाद भारतीय भाषाओं में हुआ है – वह इस बात का प्रमाण है कि लोक सेवा आयोग भारतीय भाषाओं को लेकर कितना गम्भीर है। हमने प्रश्न पत्र का हिन्दी अनुवाद टी. वी. चैनलों पर सुना है। हम कह सकते हैं कि हमारे लिए प्रश्न पत्र की हिन्दी बोधगम्य नहीं है। क्या लोक सेवा आयोग यह चाहता है कि जो अमीर परिवार अपने बच्चों को महँगे अंग्रेजी माध्यम के कॉन्वेन्ट स्कूलों में पढ़ाने की सामर्थ्य रखते हैं, केवल उन अमीर परिवारों के बच्चे ही आईएएस और आईएफएस होते रहें। समाज के निम्न वर्ग के तथा ग्रामीण भारत के करोड़ों करोड़ों किसान, मजदूर, कामगार परिवारों के बच्चे कभी भी यह सपना न देख सकें कि उनका बच्चा भी कभी उन पदों पर आसीन हो सकता है।

भविष्य में, संसार में वे भाषाएँ ही टिक पाएँगी जो भाषिक प्रौद्योगिकी की दृष्टि से इतनी विकसित हो जायेंगी जिससे इन्टरनेट पर काम करने वाले प्रयोक्ताओं के लिए उन भाषाओं में उनके प्रयोजन की सामग्री सुलभ होगी।

सूचना प्रौद्यौगिकी के संदर्भ में भारतीय भाषाओं की प्रगति एवं विकास के लिए, मैं एक बात की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। व्यापार, तकनीकी और चिकित्सा आदि क्षेत्रों की अधिकांश बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल की बिक्री के लिए सम्बंधित सॉफ्टवेयर ग्रीक, अरबी, चीनी सहित संसार की लगभग 30 से अधिक भाषाओं में बनाती हैं मगर वे हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, मराठी, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं का पैक नहीं बनाती। मेरे अमेरिकी प्रवास में, कुछ प्रबंधकों ने मुझे इसका कारण यह बताया कि वे यह अनुभव करते हैं कि हमारी कम्पनी को हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, मराठी, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं के लिए भाषा पैक की जरूरत नहीं है। हमारे प्रतिनिधि भारतीय ग्राहकों से अंग्रेजी में आराम से बात कर लेते हैं अथवा हमारे भारतीय ग्राहक अंग्रेजी में ही बात करना पसंद करते हैं। उनकी यह बात सुनकर मुझे यह बोध हुआ कि अंग्रेजी के कारण भारतीय भाषाओं में वे भाषा पैक नहीं बन पा रहे हैं जो सहज रूप से बन जाते। हमने अंग्रेजी को इतना ओढ़ लिया है जिसके कारण न केवल हिन्दी का अपितु समस्त भारतीय भाषाओं का अपेक्षित विकास नहीं हो पा रहा है। जो कम्पनी ग्रीक एवं अरबी में सॉफ्टवेयर बना रही हैं वे हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, मराठी, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं में सॉफ्टवेयर इस कारण नहीं बनातीं क्योंकि उनके प्रबंधकों को पता है कि उनके भारतीय ग्राहक अंग्रेजी मोह से ग्रसित हैं। इस कारण हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, मराठी, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं की भाषिक प्रौद्योगिकी पिछड़ रही है। इस मानसिकता में जिस गति से बदलाव आएगा उसी गति से हमारी भारतीय भाषाओं की भाषिक प्रौद्योगिकी का भी विकास होगा।

अधिकांश बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल की बिक्री के लिए सम्बंधित सॉफ्टवेयर ग्रीक, अरबी, चीनी सहित संसार की लगभग जिन 30 से अधिक भाषाओं में बनाती हैं, उनमें से चार पाँच भाषाओं के अतिरिक्त शेष 24 या 25 भाषाएँ ऐसी हैं जिनके प्रयोक्ताओं की संख्या 50 मिलियन (05 करोड़) से भी कम है। भारत में कम से कम पाँच भाषाएँ ऐसी हैं जिनके प्रयोक्ताओं की संख्या 50 मिलियन (05 करोड़) से बहुत अधिक है। प्रमाणिक आँकड़ों के आधार पर उनका विवरण निम्न है –

क्रम

भाषा का नाम

2001 की जनगणना के अनुसार वक्ताओं की संख्या

भारत की जनसंख्या में भाषा के वक्ताओं का प्रतिशत

1991 की जनगणना के अनुसार वक्ताओं की संख्या

भारत की जनसंख्या में भाषा के वक्ताओं का प्रतिशत

1

हिन्दी (परिगणित)

422,048,642

41.03 %

329,518,087

39.29 %

2

बांग्ला / बंगला (परिगणित)

83,369,769

8.11 %

69,595,738

8.30 %

3

तेलुगू (परिगणित)

74,002,856

7.19 %

66,017,615

7.87 %

4

मराठी (परिगणित)

71,936,894

6.99 %

62,481,681

7.45 %

5

तमिल (परिगणित)

60,793,814

5.91 %

53,006,368

6.32 %

हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, मराठी, तमिल जैसी भारतीय भाषाओं की सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के लिए कम से कम विदेशी कम्पनियों से भारतीय भाषाओं में व्यवहार करने का विकल्प चुने। उनको अपने अंग्रेजी के प्रति मोह का तथा अपने अंग्रेजी के ज्ञान का बोध न कराए। जो प्रतिष्ठान आपसे भाषा का विकल्प चुनने का अवसर प्रदान करते हैं, कम से कम उसमें अपनी भारतीय भाषा का विकल्प चुने। आप अंग्रेजी में दक्षता प्राप्त करें – यह स्वागत योग्य है। आप अंग्रेजी सीखकर, ज्ञानवान बने – यह भी ´वेल्कम' है। मगर जीवन में अंग्रेजी को ओढ़ना बिछाना बंद कर दें। ऐसा करने से आपकी भाषाएँ विकास की दौड़ में पिछड़ रही हैं। भारत में, भारतीय भाषाओं को सम्मान नहीं मिलेगा तो फिर कहाँ मिलेगा। इस पर विचार कीजिए। चिंतन कीजिए। मनन कीजिए।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

रेडियो नाटक -

घर की रोशनी

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दीनदयाल शर्मा

पात्र :  1. कमला , 2. रमन , 3. अमन, 4. राजपाल, 5. डॉक्टर-एक, 6. डॉक्टर-दो

(नवजात शिशु के रोने की ध्वनि)

डॉक्टर : बधाई हो कमला....अब घर जाकर थाली बजाओ।

कमला :  (आश्चर्य से) क्या कहा..थाली बजाओ..(संयत होकर) भगवान का लाख-लाख शुक्र है, जो पोता आ गया।

डॉक्टर : पोता नहीं....पोती आई है कमला....तुम पोती की दादी मां बन गई हो।

कमला : (आश्चर्य से) क्या कहा...पोती आई है..(परेशान होकर) ओ हो..भाग फूटे मेरे...तो क्या बहू ने फिर बेटी को जन्म दिया है।

डॉक्टर : बिल्कुल...लेकिन लगता है तुम बेटी के जन्म पर खुश नहीं हो।

कमला : (व्यंग्य से) बेटी के जन्म पर भी कोई खुश होता है भला।

डॉक्टर : क्यों...ऐसी क्या कमी होती है बेटियों में।

कमला : तुम नहीं समझोगी डॉक्टर। मैंने बेटे और बहू दोनों से कहा था कि चैक करवा लो।

डॉक्टर : और पता चल जाता कि बेटी होगी...तो क्या करती?

कमला : वही करती...जो दुनिया करती है। अबोर्शन करवा देती।

डॉक्टर : (आश्चर्य से) तो क्या कन्या भ्रूण की हत्या करवा देती!

कमला : और नहीं तो क्या। ये कोई नई बात नहीं है। आप डॉक्टर हैं। आप मुझसे ज्यादा जानती हैं।

डॉक्टर : क्या जानती हंू ज्यादा?

कमला : यही कि आपको यदि मुंह मांगी कीमत दी जाती तो यह काम आप भी कर देती।

डॉक्टर : (गुस्से से) होश में तो हो कमला। क्या इस कन्या के भ्रूण की, मैं हत्या करवा देती ! तुम्हें बोलने से पहले कुछ सोचना तो चाहिए था।

कमला : गुस्सा करने की जरूरत नहीं डॉक्टर..सच्चाई हमेशा कड़वी होती है।

डॉक्टर : लेकिन सभी डॉक्टर एकसे नहीं होते, यह तुम भी जानती हो।

कमला : सभी डॉक्टर एक से तो नहीं होते, लेकिन पैसा किसे बुरा लगता है डॉक्टर।

डॉक्टर : पैसा बुरा तो नहीं लगता, लेकिन पैसे के लिए मैं किसी की हत्या नहीं करती...समझी। तुम्हें पता होना चाहिए कमला, कि  मैं केवल डॉक्टर ही नहीं, दो बेटियों की मां भी हंू।

कमला : सॉरी डॉक्टर, अनजाने में आपकी भावनाओं को जो ठेस पहुंची है, इसका मुझे खेद है।

डॉक्टर : कोई बात नहीं, लेकिन बेटियों के बारे में अपनी धारणाएं बदल दो कमला।

कमला : धारणाएं इतनी जल्दी नहीं बदल सकती डॉक्टर।

डॉक्टर : तुम भी तो किसी की बेटी हो।

कमला: बेटी हंू, इसीलिए तो सोचती हंू। हमारा समाज इतनी जल्दी बदलने वाला नहीं डॉक्टर।

डॉक्टर : समाज अपने आप नहीं बदलता कमला..इसके लिए किसी न किसी को तो पहल करनी ही पड़ेगी।

(दृश्य परिवर्तन)

कमला :  (आवाज देते हुए) रमन....।

रमन :  (दूर से आवाज आती है) हां मां। 

कमला : (आश्चर्य से) बेटा, मैंने सुना है तूने नशबंदी करवा ली!

रमन : (संयत होकर)  हां मां।

कमला : क्यंू बेटे, ऐसा क्यों किया तूने? तुझे पता होना चाहिए कि तू बेटियों का बाप है। एक बेटा भी तो होना चाहिए।

रमन : (थोड़ा सा हँसकर) आजकल बेटा-बेटी सब बराबर हैं मां।

कमला : (संयत होकर) बेटा, ये सब कागजी बातें हैं। बेटा-बेटी बराबर कैसे हो सकते हैं। बेटी तो पराया धन होती है।

रमन : ऐसा क्यों सोचती हो मां। तुम्हारी पोतियां बड़ी होकर हम सबका नाम रोशन करेंगी।

कमला : नाम तो रोशन करेंगी। लेकिन वंश चलाने के लिए एक बेटा भी तो होना चाहिए।

रमन : ये सब पुरानी बातें हैं मां। ऐसा मत सोचा करो।

कमला : पुरानी बातें नहीं हैं। ये जीवन की सच्चाई है। तुम सच्चाई से कैसे मुँह मोड़ सकते हो!

रमन : यह तो वक्त बताएगा मां।

कमला : घर में छोटा भाई कुंवारा बैठा है...इसके लिए कहीं बात चलाई क्या?

रमन : मां, बात कैसे चलाऊं...अमन कोई काम-धाम भी तो नहीं करता।

कमला : काम नहीं करता है तो क्या यह कुंवारा ही रहेगा?

रमन : मां, तुम भी सोचो। कुछ भी काम नहीं करने वाले लड़के को कोई अपनी बेटी कैसे दे सकता है?

कमला : क्यों नहीं दे सकता। तेरे बाबूजी की शादी हुई थी तो ये कौनसा काम करते थे?

रमन : तब और बात थी मां।

कमला : और क्या बात थी.. वही घर.... और वही खानदान...। बहू की छोटी बहिन है ना पूनम। अपने ससुर जी से बात कर ले। मुझे पूनम पसंद भी है।

रमन : आपको तो पूनम पसंद है, लेकिन वे पूनम के लिए पढ़ा लिखा और कोई अच्छा काम करने वाला लड़का देखना चाहते हैं मां।

कमला : अपना अमन भी तो पढ़ा लिखा है।

रमन : अमन कहां पढ़ा लिखा है मां। दसवीं पास आजकल कोई मायने रखता है क्या?

कमला : (ठण्डी सांस लेकर) तेरे बाबूजी तो इसी दुख को लेकर चले गए थे।

(दृश्य परिवर्तन)

राजपाल : (ठण्डी सांस लेकर) कमला, मुझे अमन की रात-दिन चिंता लगी रहती है। क्या करूं..इसके लिए बहू कहां से लाऊं?

कमला : चिंता करने से क्या होता है जी। कुछ कोशिश भी करो। सब कहते हैं...चौधरी राजपाल का खानदान बहुत ऊंचा है...दौलत है, शोहरत है, इज्जत है...क्या कमी है।

राजपाल : खानदान में तो कमी नहीं है कमला। लेकिन आजकल बेटियों की कमी बहुत आ गई है। फिर अपना अमन कोई काम-धंधा भी तो नहीं करता।

कमला : काम-धंधा नहीं करता है तो क्या कोई लड़की नहीं देगा?

राजपाल : अब लड़कियां कहां है कमला...लोग भी अब इतने स्वार्थी हो गए हैं कि बेटियों को जन्म से पहले ही मारने लगे हैं।

कमला : दूर दराज के गांव से किसी $गरीब गुरबे की लड़की ले आओ।

राजपाल : $गरीब घर की और इसके जोड़ की...मुश्किल है।

कमला : आप सोचलो.. आप हर्ट के मरीज हो...आपको दो बार पहले ही अटैक हो चुका है...यदि आपको कुछ हो गया तो अमन का क्या होगा...कौन करेगा इसका रिश्ता..कौन देगा इसे लड़की।

राजपाल : कुछ नहीं होगा मुझे...ऐसा क्यों सोचती हो तुम...यदि खुदा न खाश्ता मुझे कुछ हो गया तो इसका बड़ा भाई है ना रमन..। रमन कोशिश करे तो अमन का रिश्ता होने में देर ही नहीं लगेगी।

कमला : ना जी ना...रमन के पास टाइम कहां है..।

राजपाल : कमला, अपना हाथ दो मुझे..मेरे सिर पर हाथ रख...तुझे मेरी कसम है, यदि मेरे जीते जी अमन का रिश्ता नहीं होता है तो यह काम तुझे करना होगा...किसी भी कीमत में...चाहे कुछ भी हो जाए। सुन रही है ना?

कमला : जी।

राजपाल : भला है या बुरा है..जैसा भी है। अमन हमारा बेटा है। इसका रिश्ता नहीं होता है तो (हिचकी) इसका रिश्ता नहीं होता है तो (हिचकी)  कमला..कम..ला (हिचकी) 

कमला : (विस्मय से) क्या हुआ रमन के बाबूजी? क्या हुआ...(घबरा कर विस्मय से) आपको क्या हो गया...यह गर्दन..(घबराकर बिलखते हुए) अजी सुनते हो रमन के बाबूजी... (बिलख कर रोते हुए) क्या हो गया है आपको..रमन के बाबूजी बोलो तो...(चीख मार कर रोते हुए) नही, आप मुझे छोड़कर नहीं जा सकते...आप मुझे यंू छोड़कर...(बिलख कर रोते हुए)।

(दृश्य परिवर्तन)

कमला : रमन बेटा, तुम्हारे बाबूजी को स्वर्ग सिधारे तीन साल हो गए। अमन के बारे में कुछ सोच बेटा। छोटे भाई की चिंता तूं नहीं करेगा तो फिर कौन करेगा। तू बहू पर दबाव भी डाल सकता है।

रमन : बहू पर दबाव डालने से रिश्ता होता है क्या मां। तुम जानती हो कि पूनम एम.ए. करके एम.फिल. कर रही है।

कमला : देख ले बेटा, पूनम अपने अमन के जोड़ की भी है।

रमन : जोड़ की कहां है मां...अमन पूनम से उम्र में लगभग दुगुना है।

कमला : लड़कियों की उम्र नहीं देखी जाती बेटा। मैं इस घर में ब्याह कर आई तो मात्र ग्यारह साल की थी।

रमन : तब बात और थी मां।

कमला : तूं बात चलाए तो बात बन सकती है बेटा।

रमन : मां अमन कोई काम धाम भी तो नहीं करता। कितने काम करवा दिए इसको। किसी भी काम में मन नहीं लगाता। इसको सैट करने में मैं खुद अपसैट हो गया हंू। रात को देर से आना और सुबह देर से उठना...इसे अपनी लाइफ के बारे में कोई चिंता है क्या..।

कमला : सिर पर पड़ेगी तो अपने आप करेगा। फिर तेरे होते इसको काहे की चिंता है। चिंता करने को मैं हंू ना।

रमन : मां, मुझे अमन के बारे में कुछ मत कहा करो। जब वक्त आएगा तो सब कुछ हो जाएगा।

कमला : गुस्से से कब आएगा वक्त? तुझे क्या जरूरत है इसकी चिंता करने की। मैं मां हंू ना..मुझे चिंता है...तूं भी कान खोलकर सुन ले..अमन के लिए कोई लड़की देखता है तो ठीक है...नहीं तो साफ- साफ कह दे कि यह मेरे बस का नहीं है। तुझे पता है तेरे बाबूजी द्वारा दिलाई गई कसम मेरा बार- बार पीछा कर रही है।

रमन : मां तुझे कैसे समझाऊं अब...मैंने अमन को पढ़ाने की कितनी कोशिश की थी..लेकिन यह हर बार एक ही जवाब देता कि भाई साहब, पढ़ाई में क्या रखा है, कोई नौकरी तो मिलेगी नहीं।

कमला : हां तो कौनसा $गलत कहता था अमन।

रमन : $गलत तो नहीं कहता था, लेकिन पढ़ाई केवल नौकरी के लिए तो नहीं की जाती। तुम्हीं देखो मां, मैंने इसे कितने काम करवाए। इसने किसी भी काम में मन नहीं लगाया। काम करना तो दूर यह टिक कर बैठता ही नहीं है।

कमला : टिक कर कैसे बैठे...इसके पैर में कोई चक्कर है बेटा। टिक कर बैठना, इसके बस की बात नहीं है।

रमन : पैर में कोई चक्कर-वक्कर नहीं है मां.... मुझे तो लगता है इसकी संगति सही नहीं है..... यह $गलत संगति के कारण अपना कैरियर $खुद बिगाड़ रहा है।

कमला : इसके कैरियर की तंू चिंता कर बेटा।

रमन : मुझसे कुछ नहीं होता मां।

कमला : तो फिर अमन कुंवारा ही रहेगा।

रमन : तो मैं लड़की कहां से लाऊं? लड़कियां पेड़ों के तो नहीं लगती।

कमला : तुम्हारे इतनी जान पहचान है। फिर अमन तुम्हारा छोटा भाई है।

रमन : (खीजकर) मां तुम समझती क्यंू नहीं।

कमला : फिर भी बेटा, कोशिश कर तंू।

रमन : कोशिश तो कर सकता हंू। वैसे भी यह चालीस का होने को है। लड़की ढंूढऩे में दिक्कत तो आएगी मां।

कमला : मेरे जीते जी इसका घर बांधना चाहती हंू बेटा। चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े।

रमन : कुछ भी करने से मतलब?

कमला : अमन को सैट करने में चाहे मुझे अपना मकान भी बेचना पड़े तो यह मकान भी बेच दूंगी।

रमन : मां, इतना बड़ा $फैसला। 

कमला : हां बेटा। मकान बेटे के सपने से तो बड़ा नहीं है नां।

रमन : अमन के लिए तुम यह मकान बेच दोगी?

कमला : (गुस्से से)े तुम्हें कोई दिक्कत हो रही है?

रमन : मकान बेचने का $फैसला मत लो मां। बाबूजी ने कितनी मुश्किलों के बाद अपने घर का सपना साकार किया था।

कमला : (लाचारी से) तो मैं क्या करूं रमन...अमन एक कंपनी की एजेन्सी लेना चाहता है...और उसे दस लाख रुपयों की जरूरत है। इतने रुपये कहां से लाऊं मैं?

रमन : (आश्चर्य से) दस लाख?

अमन : (घर में प्रवेश करते हुए व्यंग्य लहजे मेें बोलते हुए) क्यों बड़े भैया, दस लाख का नाम सुनकर पसीने छूटने लगे...आपको पता होना चाहिए..बिजनैस बातों से नहीं होता भैया।

रमन : लेकिन अमन, मकान बेचकर बिजनैस करोगे?

अमन : (व्यंग्य लहजे मेें बोलते हुए) क्यों, मकान कोई बड़ी चीज है क्या...बिजनैस चल निकले तो ऐसा एक क्या..दस मकान बना लो।

रमन : और यदि बिजनैस नहीं चला तो...?

अमन : (व्यंग्य लहजे मेें ) तो साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि मेरे बिजनैस के लिए मकान नहीं बेचना।

रमन : बिल्कुल, यह मकान नहीं बेचने दूंगा।

अमन : (गुस्से से) मां मैंने कहा था न कि बड़े भैया मकान नहीं बेचने देंगे। (व्यंग्य लहजे मेें ) इन्हें काहे की चिंता है। ये तो मियां-बीवी दोनों कमाते हैं।

रमन : (व्यंग्य लहजे मेें ) तो तुम भी कमाओ...कौन रोकता है तुम्हें।

कमला : (गुस्से से) रमन चुप रहो तुम.......मैं अमन के लिए यह मकान बेचूंगी..... मुझे कोई रोकता है तो रोक लेना।

रमन : (संयत होकर) एक बार और सोच लो मां। आपका यह $फैसला सही नहीं है।

कमला : सही हो या $गलत...मैंने अब पक्का सोच लिया है...अब तुम बहू को लेकर अपने लिए कहीं किराए का मकान देख लो।

रमन : ठीक है मां, जैसी आपकी आज्ञा। मैं चला जाता हंू...लेकिन कभी तकली$फ हो तो बेटे को याद कर लेना।

(दृश्य परिवर्तन)

कमला :  (आश्चर्य में) बेटा अमन, तूं शराब पी रहा है?

अमन :  (नशे में) शराब नहीं पी रहा हंू...$गम दूर कर रहा हंंू मां...मेरी कंपनी बहुत घाटे में चली गई है।

कमला : व्यापार में न$फा-नुकसान तो चलता ही रहता है बेटा...लेकिन..।

अमन : तुम नहीं जानती मां..मेरी पीड़ा तुम नहीं समझ सकती..।

कमला : तेरी पीड़ा मैं नहीं समझ सकती। यह तंू कह रहा है...अरे तेरे लिए मैंने क्या कुछ नहीं किया।

अमन : (नशे में) तुम मां हो..मेरे लिए तुम नहीं करोगी तो क्या कोई $गैर करेगा।

कमला : (रूंआंसी होकर) रमन सच कहता था..आज उसकी एक-एक बात याद आ रही है।

अमन : (नशे में) तुम मां हो ना...इसलिए याद कर रही हो..मैं तो उन्हें बिल्कुल भी याद नहीं करता..अब तो वे दोनों रिटायर भी हो गए होंगे।

कमला : मुझे लगता है उन्होंने यह शहर ही छोड़ दिया होगा...यहां होते तो कभी तो आते...(बिलखती है) दोनों पोतियां भी ब्याहने लायक हो गई होगी।

अमन : (नशे में) क्या मां तुम भी..रो रोकर खून क्यों जला रही हो अपना....मेरी तरह रहो नां, कोई याद करे तो ठीक नहीं तो...।

कमला : अपने बड़े भैया के बारे में ऐसा मत सोचो बेटा...हम भी तो पुश्तैनी घर बेचकर इस कोठरी में रहते हैं। कोई ढंूढ़े भी तो ढंूढ़ नहीं पाए।

अमन : (नशे में) तुम मकान की चिंता मत करो मां..एक दिन मैं उससे बढिय़ा मकान बनवा दूंगा..(उल्टी करता है) आ....(उल्टी करता है) आ....

कमला : (घबराकर) अरे...खून की उल्टियां...अमन तुझे क्या हो गया बेटा... (बिलखकर)अमन तुझे कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा..(रोते हुए) मैं किसके सहारे जिऊंगी बेटा..हे भगवान, मेरे अमन को ठीक कर दो..।

अमन : (नशे में) तुम घबराओ मत मां..(उल्टी करता है) आ....मुझे कुछ नहीं होने वाला...(उल्टी करता है) आ....

कमला : (बिलखकर) मैं तुझे अस्पताल ले चलती हंू बेटा.. (घबराते हुए) अस्पताल ले चलती हंू..।

(दृश्य परिवर्तन)

कमला : (बिलखते हुए) डॉक्टर, मेरे बेटे को बचा लीजिए..मेरे अमन को बचा लीजिए डॉक्टर..देखो तो डॉक्टर...देखना तो इसे क्या हो गया है...।

डॉक्टर : ऐसे मत कीजिए....धीरज रखिए आप...।

कमला : (घबराते हुए) डॉक्टर बेटा, मेरे अमन को बचा लो...इसे खून की उल्टियां हो रही है।

डॉक्टर : आप घबराइए मत..सब ठीक हो जाएगा। कहां है पैसेण्ट?

कमला : (रोते हुए) वो देखो...वो लेटा हुआ है..मेरे अमन को बचा लो डॉक्टर...(रोते -रोते) रमन तो हमें छोड़कर चला गया...अब अमन ही मेरे बुढ़ापे का सहारा है..।

डॉक्टर : (संयत होकर)  पैसेण्ट का क्या नाम बताया आपने?

कमला : अमन है बेटा...(बिलखते हुए)..एक इसका बड़ा भाई था रमन..बहुत साल पहले वह तो हमें  छोड़कर चला गया..।

डॉक्टर : आपका नाम कमला है?

कमला :  (आश्चर्य से) हां डॉक्टर बेटा, लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मेरा नाम...।

डॉक्टर : (थोड़ा सा हँसते हुए) मैं आपकी पोती हंू रोशनी।

कमला :  (आश्चर्य से) मेरी पोती.... रोशनी..मेरी पोती हो तुम..रमन कहां है बेटा?

डॉक्टर :  (ठण्डी आह भर कर) पापा के ट्रांसफर के बाद हम सब गुजरात चले गए थे..और वहां एक दिन  ऐसा भूकंप आया कि सब कुछ बिखर गया। (संयत होकर) पापा आपको बहुत याद करते थे।

कमला : (घबराकर) तेरे अमन चाचा को संभाल बेटा...यह सुबह से ही खून की उल्टियां कर रहा है..।

डॉक्टर : चाचा की चिंता मत करो दादी मां, सब ठीक हो जाएगा।

कमला : बेटा रोशनी...(खुश होकर) तूंने मेरे जीवन में एक नई उमंग भर दी है बेटा। मुझे यंू लगता है मानो रोशनी के रूप में मेरा रमन वापस घर आ गया है। रमन सच कहता था बेटा...।

डॉक्टर : पापा क्या कहते थे दादी मां?

कमला : वह कहता था बेटा-बेटी आजकल सब बराबर होते हैं मां। मैं ही नहीं समझी थी उसकी भावना को। अब मेरे घर की रोशनी तुम हो डॉक्टर बेटा। तुम हो घर की रोशनी...तुम हो घर की रोशनी।

- दीनदयाल शर्मा,  

10/22 आर.एच.बी. कॉलोनी, 

हनुमानगढ़ जं. - 335512

mob. 094145 14666, 09595 42303

नाम : दीनदयाल शर्मा, =जन्म :  प्रमाण पत्र के अनुसार 15 जुलाई, 1956, =जन्म  स्थान : जसाना, तहसील: नोहर, जिला: हनुमानगढ़, राजस्थान, =शिक्षा: एम.कॉम., (व्यावसायिक प्रशासन, 1981), पी.जी.डिप्लोमा इन जर्नलिज्म (1985) राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर। =स्काउट मास्टर बेसिक कोर्स (1979, 1990) 

=साहित्य सृजन : हिन्दी व राजस्थानी में 1975 से सतत् सृजन, =मूल विधा: बाल साहित्य, लेखन:    हिन्दी व राजस्थानी दोनों भाषाओं में 1975 से सतत सृजन।=विशेष प्रकाशन : ''हिन्दी-राजस्थानी-अंग्रेजी''  में तीन दर्जन पुस्तकें प्रकाशित। =संग्रहों में प्रकाशित : देशभर की अनेक बाल पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित =''डॉ.प्रभाकर माचवे : सौ दृष्टिकोण'' सहित शिक्षा विभाग राजस्थान के शिक्षक दिवस प्रकाशनों में रचनाएं प्रकाशित।  =तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा 17 नवम्बर, 2005 को जयपुर में अंग्रेजी बाल नाट्य कृति 'द ड्रीम्स' का लोकार्पण। =महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती देवीसिंह प्रतिभा पाटिल की ओर से बाल दिवस, 2007 की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में सम्मान। =अनेक पुस्तकों एवं स्मारिकाओं का संपादन।=प्रसारण : आकाशवाणी से व्यंग्य, कहानियां, कविताएं , रूपक, झलकी आदि समय-समय पर प्रसारित। =दूरदर्शन से साक्षात्कार एवं कविताएं प्रसारित। =आकाशवाणी से राज्य स्तर पर अब तक पंद्रह रेडियो नाटक प्रसारित।  =संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान बाल कल्याण परिषद्, =संस्थापक/अध्यक्ष : राजस्थान साहित्य परिषद्, =साहित्य संपादक (मानद)  टाबर टोल़ी (बच्चों का अ$खबार) = संपादक (मानद) कानिया मानिया कुर्र (बच्चों का राजस्थानी अखबार) =संपादक (मानद) पारस मणि (बच्चों की  राजस्थानी तिमाही पत्रिका)

=पुरस्कार एवं सम्मान : =केन्द्रीय साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से निबन्ध (संस्मरण) 'बाळपणै री बातां'' पर राजस्थानी बाल साहित्य पुरस्कार घोषित (2012)

=राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर से  ''डॉ.शम्भूदयाल सक्सेना बाल साहित्य पुरस्कार''  (1988-89), 

=राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर से  ''जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य पुरस्कार''  (1998-99), 

=अखिल भारतीय बाल कल्याण संस्थान, कानपुर से  ''बाल साहित्यिक सेवाओं के लिए सम्मान''  (1998-99), 

=शकुन्तला सिरोठिया बाल कहानी पुरस्कार, इलाहाबाद (1988-89), =कमला चौहान स्मृति ट्रस्ट, देहरादून से  ''सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य का राष्ट्रीय पुरस्कार''  (2001), 

=ग्राम पंचायत, नगर परिषद् तथा जिला प्रशासन की ओर से  ''साहित्यिक सेवाओं के लिए समय-समय पर सम्मान'' । 

=इक्यावन हजार रुपये की साहित्यिक पुस्तकें दान में देने पर अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस पर सर्वाधिक पुस्तक दानदाता के राज्य स्तरीय पुरस्कार से बिड़ला सभागार, जयपुर में सार्वजनिक सम्मान (2005) 

=बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2005) 

=सृजनशील बाल साहित्य रचनाकारों की राष्ट्रीय संस्था बाल चेतना, जयपुर की ओर से  ''सीतादेवी श्रीवास्तव स्मृति सम्मान''  (2006)

=बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए राजस्थान ब्राह्मण महासभा की ओर से सार्वजनिक सम्मान (2009) 

=बाल साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भटनेर महर्षि गौतम सेवा समिति, हनुमानगढ़ की ओर से सम्मानित (2009)

=चूरू में साहित्यिक सेवाओं के लिए समारोह आयोजित कर सार्वजनिक सम्मान (2010), 

=नोहर (हनुमानगढ़) में बाल साहित्य में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए वरिष्ठ साहित्यकार स्व.रामकुमार ओझा की स्मृति में पुरस्कृत एवं सार्वजनिक रूप से सम्मानित (2010)। =राजस्थानी बाल संस्मरण पुस्तक 'बाळपणै री बातां' के लिए स्व. श्री घीसूलाल सेन स्मृति बाल वाटिका पुरस्कार (2011) 

विशेष : =डॉ.भीमराव अंबेडकर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, श्रीगंगानगर की एम.फिल. (हिन्दी साहित्य) की छात्रा प्रदीप कौर ने हिन्दी साहित्य की व्याख्याता डॉ.नवज्योत भनोत के निर्देशन में महाराज गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर को  सत्र 2009-10 में  लघु शोध प्रबंध  ''दीनदयाल शर्मा का बाल साहित्य : एक अध्ययन''  एम.फिल. (हिन्दी साहित्य) के चतुर्थ प्रश्न पत्र हेतु प्रस्तुत किया।

= माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राजस्थान की ओर से आयोजित क्षेत्र के प्रसिद्ध साहित्यकार के प्रोजेक्ट निर्माण योजना के अंतर्गत  ''बाल साहित्यकार दीनदयाल शर्मा का व्यक्तित्व एवं कृतित्व'' विषय पर राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय, मक्कासर, हनुमानगढ़, राजस्थान की वरिष्ठ अध्यापिका श्रीमती उर्वशी बिश्नोई के निर्देशन में सीनियर सैकण्डरी कक्षा की छात्रा कु.रेणु बाला ने  सत्र 2010-11 में प्रोजेक्ट का निर्माण किया

 

संप्रति : राजस्थान सरकार के शिक्षा विभाग राजस्थान में 18 फरवरी 1983 से सेवारत।

पता : 10/22, आर.एच.बी.कॉलोनी, हनुमानगढ़ जं.-335512, राज., 

 

E mail : deen.taabar@gmail.com,

Blog : www.deendayalsharma.blogspot.com

बच्चन पाठक 'सलिल'

सात्विक क्रोध

 

दोपहर का समय था,मैं भोजन कर लेटा  हुआ था,मेरे घर के सामने एक टैक्सी रुकी,,मैं बाहर आया,-एक व्यक्ति एक टोकरी लेकर मेरे पास आया ,,,उसके पीछे पीछे एक युवती थी -उसने  चरण स्पर्श किया और बोली--''गुरुदेव,मैं हूँ ममता गोराई '',,मैंने आशीर्वाद देते हुए कहा,-''अरे,तुम अचानक कहाँ से प्रकट हो गई ?'',,

युवती ने हँसते हुए कहा-'गुरु जी ,आप  वैसे ही हैं,-आपका चिर परिचित लहजा सुनकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई,उसने कहा-ये कुछ फल हैं,कृपया स्वीकार करें ''--कुछ फल ,क्या थे फलों का अम्बार था,संतरे,सेब,कई किलो अंगूर, सूखे फलों का एक बड़ा पैकेट '',

ममता ने अपनी राम कहानी बिना किसी भूमिका के प्रारम्भ की --'' बी ए के पश्चात मैंने आपकी सलाह से हिंदी टाइपिंग सीखी,,,मैं हिंदी टाइपिस्ट बनना चाहती थी,-आपने कहा --रेलवे में हिंदी अधिकारी पद का विज्ञापन निकला है,-आवेदन कर दो,और तैयारी करो,'',,,मैंने आवेदन किया ,आपने दो महीनों  तक हिंदी साहित्य का इतिहास,और सामान्य ज्ञान पढ़ाया,  ---मैं डर रही थी,बोली--''परीक्षा से मुझे डर लग रहा है ,मैं अस्थायी टाइपिस्ट बनने जा रही हूँ,''-आप नाराज हो गए,-बोले -''मूर्ख,मैंने इसीलिए तुम्हारे साथ इतना परिश्रम किया,पद अनुसूचित जन जाति के लिए सुरक्षित है,-तुम्हारी तैयारी है,परीक्षा में बैठो,,नहीं तो मेरे पास कभी मत आना ''- - मैंने परीक्षा दी-मेरा चुनाव हो गया,मेरी नियुक्ति गौहाटी में हो गई,-दो वर्षों के बाद आई,तो आपका निवास बदल गया था,-पिताजी भी सेवा निवृत होकर बुंडू चले गए थे,-भाई वहीँ दुकान चलाता  है,,,तब से मैं आपका पता बराबर खोज रही थी, एक ऑन  लाइन पत्रिका से आपका पता मिला,मैं बुंडू आई थी,दौड़ी दौड़ी आपको सरप्राइज़ देने आ गई,फिर उसने चरण पकड़ कर पूछा --''अब तो आप नाराज नहीं हैं न ?'

मैंने भरे कंठ से कहा--''बेटा -वह मेरा सात्विक क्रोध था,-गुरु शिष्य से कभी नाराज नहीं होता ''

   डॉ बच्चन पाठक 'सलिल '

पंचमुखी हनुमान मंदिर के सामने

आदित्यपुर -2 ,जमशेदपुर-13

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चन्द्रेश कुमार छतलानी

तेरे, मेरे, उसके बोल

 

"क्यूं अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर रही हो, सुशीला?" - सुधीर चिल्लाया

उसकी पत्नी सुशीला ने बोलना बंद नहीं किया, "आप सब मर्द क्या समझते हो? सदियों से हम औरतों पर हुक्म चलाते आये हो, अब परिस्थितियां बदल गयी हैं| हम भी किसी से कम नहीं हैं, मुझे अगर इस दिवाली पर हीरे अंगूठी नहीं मिली तो आपकी और आपके घरवाले दिवाली कैसे मनाते हैं, मैं भी देखती हूँ|"

सुधीर ने कहा, "तुम्हारी भाभी भी क्या तुम्हारे भाई को ऐसे ही टोर्चर करती है?"

सुशीला एक दम बिफर गयी, "मेरी भाभी ने कोई मेरे जैसे बेटा नहीं जना है, उसने बेटी पैदा की है, मैं-मम्मी और भैया मिलकर उसे कुछ बोलने देंगे क्या?"

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Chandresh Kumar Chhatlani

ई-मेल - chandresh.chhatlani@gmail.com


http://chandreshkumar.wikifoundry.com

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राजीव आनंद

लघुकथा कचहरी का चुनाव

कचहरी में चुनाव है। कचहरी प्रांगण में जगह-जगह पोस्‍टर, बैनर लग रहे है। चुनाव में खड़े वकीलों के भाषणों और आश्‍वासनों का बाजार गर्म है। गरीब वकील प्रत्‍याशी बालुशाही मिठाई खिला रहे हैं, अमीर प्रत्‍याशी शहर से कहीं दूर मुर्गा-दारू की पार्टी चला रहें है। हालांकि यह राजनीतिक चुनाव नहीं है फिर भी तेवर और कलेवर में राजनीतिक चुनाव से कुछ कम नहीं । प्रत्‍याशी कचहरी में चुनाव के प्रति संजीदा है, उन्‍हें अपनी सेवा जो देनी है बेंच और बार को ।

इसी माहौल में राजू वकील रोज की तरह कचहरी आया है हालांकि उसे कचहरी जाने की कोई उत्‍सुकता नहीं है। अरे कोई काम हो, कुछ आमदनी की कोई उम्‍मीद हो तो मन भी लगे। काम तो है नहीं, रोज पैदल कोर्ट पहनकर चार-पांच किलोमीटर का रास्‍ता तय करके कचहरी पहॅुंचे, बेमन से महुआ पेड़ के नीचे टेबल-कुर्सी को झाड़ा-पोंछा, अपने चरमराये जूते को निहारा, आसपास नजर घुमाया और एक उदासी के साथ अपनी कुर्सी पर बैठ गया। खैनी को चूने के साथ मिलाकर लगा रगड़ने और टुकुर-टुकुर कचहरी के चहल-पहल को निर्विकार भाव से देखता-सुनता रहा। राजू को उम्‍मीद थी कि दशहरा के पहले कुछ काम जरूर मिल जाएगा, मिला भी, दो-एक एफिडेवीट का काम, कमाई दोनों एफिडेवीट मिलाकर दस रूपया। उम्‍मीद से बहुत कम, इतना काम, काम न मिलने के बराबर । राजू के टेबल के सामने से जब एक वकील अपनी चमचमाती कार लेकर जाता है तो उसे लगता है कि कचहरी की भीड़ उसी वकील के तरफ दौड़ी जा रही है। अपनी-अपनी किस्‍मत । राजू तकरीबन ग्‍यारह-बारह साल से वतौर वकील कचहरी आता जाता रहा है हालांकि कभी वकालत करने का मौका नहीं मिला। राजू के पिता चाहते थे कि राजू कोई नौकरी कर ले, वे राजू को वकील नहीं बनाना चाहते थे।

खैनी ठोंक-ठाक कर अपने होंठो के भीतर राजू अभी दबाया ही था कि अध्‍यक्ष पद के दावेदार अपने दूत-भूत के साथ राजू के टेबल पर पहुँच गए। ऐसे वक्‍त आसपास के वकील भी प्रत्‍याशी के इर्द-गिर्द जमा हो जाते है पर राजू प्रायः उदासीन ही बना रहता, क्‍या होगा उत्‍साहित होकर, वह सोचता । पिछले सालों साल से यही सब तमाशा देख रहा है, झेल भी रहा है, एक अध्‍यक्ष और एक सचिव आते है, खाते-पीते है, घोटाला करते है और बेदाग निकल जाते है, साइकिल से चलने वाले अघ्‍यक्ष अब कार पर चलते है लेकिन राजू की माली हालत तो वहीं की वहीं। उसने दूसरी खिल्‍ली खैनी ठोंकना शुरू किया। थोड़ी बहुत राहत मिलती है तो बस खैनी की होेंठों के भीतर चुनचुनाहट से ।

कार्यकारणी सदस्‍यों के प्रत्‍याशी वकील मतदाताओं को रिझाने-उलझाने की पुरजोर कोशिश करते रहते हैं। इन प्रत्‍याशियों के अलावा बेंच और बार की भलाई के बारे में कोई और सोच भी नहीं सकता। ये अगर चुनाव नहीं लड़े और लड़कर नहीं जीते तो बेंच और बार का पतन सुनिश्‍चित है। सचिव पद के दावेदार में सभी अपने को वफादार, वकीलों के हितों का ख्‍याल रखने वाला साबित करने पर तुले है। हर वाक्‍य के बाद अपनी काबिलयत और ईमानदारी का नारा लगाता है जैसे ईमानदारी सर्वोतम नीति है, का नारा इन्‍होंने ही दिया है। राजू को इन दिनों आश्‍चर्य भी होता है कि आमूमन उसकी तरफ कोई वकील का घ्‍यान नहीं जाता लेकिन चुनाव के समय हर प्रत्‍याशी उसके टेबल पर आ रहा है और उसे अपने पक्ष में वोट डालने का आग्रह कर रहा है। मतलबी दुनिया, मतलबी लोग । शाम होने को आयी, घर से गंदे बोतल में लाया साफ पानी पी-पीकर राजू ने आज का समय भी काट दिया, कुर्सी को टेबल से जंजीर के जरिए बांध‍कर घर जाने को निकल पड़ा है राजू कचहरी प्रांगन से।

रात के वक्‍त राजू अपने बिस्‍तर पर करवटें बदल रहा है, चारों बच्‍चे सो चुके है, पत्‍नी अपना बचा-खुचा काम समेट रही है। थकावट बहुत है पर नींद नहीं आ रही है। पत्‍नी को पुकारना चाहता है पर यह सोचकर कि पिछले दो बार पुकारा तो दो की जगह चार बच्‍चे का बाप बन गया, अब नहीं पुकारूंगा। करवटें बदलते-बदलते नींद तो आ ही जाएगी। राजू को पिता की बात याद आने लगी कि कोई नौकरी कर ले, छोटे शहरों में आजकल वकालत का कोई भविष्‍य नहीं, तिस पर गर्मी और बरसात में कोर्ट पहने रहना होगा और कहीं बहस वगैरह किया तो सर्कस के जोकर की तरह काला लबादा जिसे गाउन कहते है पहनना होगा। अरे किस कानून के अनुसार गर्मी में भी कोर्ट और गाउन पहने की बात कही गयी है, भाई ! इसी तरह की सोच में उब-डूब होता हुआ राजू कभी इस करवट तो कभी उस करवट लेता रात काटता है। दूसरे दिन उठने के बाद कुछ भी नहीं बदला, सब कुछ जस का तस, कोई परिवर्तन नहीं। घर से कचहरी और कचहरी से घर। उम्र से लंबी सड़कों पर लड़खड़ाते पैर से चलता राजू अपनी जिंदगी के पैंतालिस साल गुजार चुका, उसे चिंता तो अपने पत्‍नी और बच्‍चों की है। चाय की दुकान और ठेला लगाने वालों से भी कम कमाने वाला राजू कैसे अपने दो लड़के और दो लड़कियों को पढ़ा-लिखाकर अपनी जिम्‍मेदारी निभाएगा, यही उसकी चिंता का विषय रहा करता।

राजू को कचहरी के चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है। जब खाने पहनने के लाले पड़े हों तो क्‍या कचहरी, क्‍या चुनाव। उसे तो अपने टेबल पर प्रत्‍याशियों के आमदरफ्‌त देखकर लगता कि वह इंसान नहीं सिर्फ एक वोट है। प्रत्‍याशियों का समझाने का अंदाज कितना अपनापन लिए हुए है लेकिन कोई भी प्रत्‍याशी राजू के बिगड़े माली स्‍थिति का हमदर्द नहीं।

खाली समय में बादाम फोड़ना भी राजू को मँहगा लगता, लिहाजा चार-पाँच खिल्‍ली खैनी खाने के अलावा और कोई चारा न था। राजू खैनी सानते-सानते सोचने लगा कि जब कोई काम ही नहीं है तो क्‍यों न घर चल दिया जाए। कुर्सी-टेबल समेटकर राजू चलता है घर की और सोचता है कि रास्‍ते में जो अमड़े का पेड़ है वहीं से कुछ अमड़े बच्‍चों के लिए ले चले।

घर पहुँचकर राजू चौंकता है। बच्‍चे बताते है कि कोई वकील अंकल आए थे, महीने भर का आटा, चावल, दाल, तेल दे गए हैं। एक परचा भी दिया है और कहे है कि पापा को दे देना। राजू परचा ले लेता है, पर्चे पर लिखा है अमुक वकील को वोट देकर अध्‍यक्ष बनाएं। राजू पर्चा हाथ में लिए सोचता है ईमानदारी का भाषण पिलाने वाले अध्‍यक्ष प्रत्‍याशी अब मुझे और मेरे परिवार को खाना खिला रहें है। एक बार तो मन हुआ कि आटा, चावल, दाल, तेल जाकर पहॅुंचाने वाले वकील के घर दे आएं लेकिन पत्‍नी का अतिउत्‍साहित होकर खाना पकाना और बच्‍चें का पंगत में थाली लेकर खाना परोसे जाने का इंतजार करते देखकर राजू की हिम्‍मत पस्‍त हो गयी। राजू ने परचे को पतलून की जेब में धीरे से ठेल दिया।

राजीव आनंद

प्रोफसर कॉलोनी, न्‍यु बरगंड़ा

गिरिडीह-815301 झारखंड़

नन्‍हा वीर

अमर सिंह की रानी ने समाचार सुना तो धक से रह गई। स्‍वयं उसके भाई ने ही उसका सुहाग उजड़वा दिया था। शाहजहॉ के साले सलावत खॉ ने अमर सिंह का अपमान भरे दरबार में किया। राजपूत खून खौल उठा और एक ही बार में अपमान करने वाले का सिर दरबार के फर्श पर लुढ़कने लगा। वीर अमर सिंह के क्रोध से डर कर उस समय शाहजहॉ भयभीत अंतःपुर से चले गये। दरबारियों ने तलवारें चमकाई। एक हिकारत की निगाह उन पर डाल कर अमर सिंह घोड़े पर सवार हो कोट लॉघ कर बाहर आ गये। शाहजहॉ भी बदला लेने की फिराक में था, उसने अमर सिंह के साले अर्जुन गौड़ को लालच दे कर अपनी तरफ मिला लिया। अमर सिंह को सिखा पढा कर महल में ले आया और पीछे से अमर सिंह को मार डाला। शाहजहॉ ने ठहाका लगाया और अमरसिंह की नंगी लाश बुर्ज पर डलवा दी। चील कौवे बैठने लगे।

रानी का ह्‌दय पति के अपमान और भाई की बेवफाई से जल रहा था साथ ही राजपूत स्‍त्री पति के शव को चील कौवों को खाने को छोड़ कर जौहर कैसे करे। रानी ने सैनिक भेजे लेकिन उन्‍हें मार डाला गया। वे शव के समीप भी न पहुँच सके।

शाहजहाँ ने व्‍यंग्य से कहा-क्‍या इसके खानदान में ऐसा कोई भी नहीं है जो इसकी लाश ले जा सके। रानी अपने और बहादुर कह सकने वाले सबसे प्रार्थना कर चुकी तो हार कर बोली ,‘बंदी मेरी तलवार ला और मेरे साथ चल मैं स्‍वयं महारावल की लाश शाहजहाँ के किले से निकालकर लाऊँगी।' रानी ने सैनिक वेश बनाया, तलवार ली लेकिन उसी समय अमरसिंह के बड़े भाई का लड़का राम सिंह सैनिक वेष मे हाथ में चमचमाती तलवार लिये सामने आया,‘रूको चाची' उस चौदह वर्षीय बालक ने दृढ़ स्‍वरों में कहा,” मेरे होते अभी आपको महल से बाहर जाने की नौबत नहीं आयेगी। ”पर बेटा 'उस कोमल चेहरे को आशंकित दृष्‍टि से देखते बोली तो वह बोला,”चाचाजी के पावन शरीर की रक्षा करना मेरा धर्म है। मैं प्राण दे दॅूंगा इसके लिये बेटा जा!'रोते रोते रानी ने आशीष दी। ‘रो मत चाची' घोड़े को ऐड़ लगाते हुए राम सिंह ने कहा,” चाचा जी के शव के साथ मैं अभी लौटता हूं।

दुर्ग का द्वार खुला था तीर की तरह राम सिंह बढ़ता चला गया द्वार रक्षक समझ पायें तब तक राम सिंह दुर्ग के निकल पहुँच गया। दुर्ग पर तैनात सैनिकों को तलवार की धार पर एक के बाद एक गिराता वह बुर्ज पर चढ़ गया। पूज्‍य चाचा जी का शव उठाया उतरा और घोड़े पर बैठा पर कोई सैनिक कुछ न कर सका वह मार काट मचाता दुर्ग के बाहर हो गया।

‘बेटा तूने मेरी मरे पति का और सम्‍पूर्ण राजपूत जाति का मान रखा हैं ईश्‍वर तेरी रक्षा करे' और साथ ही तैयार चिता में शव रख उस पर जा बैठी।

Dr. shashi goyal

संदर्भःपूर्व न्‍यायमूर्ति काटजू का बयान

न्‍यायपालिका में सिद्धांत से समझौता

प्रमोद भार्गव

विधायिका और कार्यपालिका में सिद्धांत और नैतिकता से समझौते रोजमर्रा के विषय हो गए हैं। यही वजह है कि संसद और विधानसभाओं में दागियों की भरमार है और भ्रष्‍टाचार ने सभी हदें तोड़ दी हैं। ऐसे में एक न्‍यायपालिका ही आमजन के लिए ऐसा भरोसा है, जहां उसे संविधान के इन दो स्‍तंभों की गलतियों से विधि-सम्‍मत निराकरण की अंतिम उम्‍मीद बंधी हुई होती है। लेकिन जब न्‍यायाधीश ही सिद्धांतों की नैतिक इबारत से समझौता करने लग जाएंगे तो व्‍यक्‍ति और समुदाय के मानवाधिकारों की रक्षा के तो सभी रास्‍ते ही बंद हो जाएंगे। इस परिप्रेक्ष्‍य में सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पूर्व न्‍यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष मार्कंडेय काटजू ने तीन प्रधान न्‍यायाधीशों पर एक भ्रष्‍ट जज को मिले अनुचित लाभ की अनदेखी करने के आरोप लगाए हैं। यह बेहद गंभीर मामला है। इस मामले की उच्‍च स्‍तरीय जांच के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट के दो अन्य पूर्व न्यायाधीशों पर यौन-शोषण संबंधी आरोप भी लगे थे.

 

काटजू के बयान को इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, क्‍योंकि मद्रास उच्‍च न्‍यायालय में जिस कथित अतिरिक्‍त जज सेवारत थे, उसी दौरान काटजू इसी अदालत में मुख्‍य न्‍यायाधीश थे। इस जज पर जिलाधीश रहते हुए भ्रष्‍टाचार के अनेक आरोप चस्‍पा थे। मसलन काटजू स्‍ंवय उस अवैध प्रक्रिया के चश्‍मदीद थे, जिसके तहत भ्रष्‍ट जज का लगातार कार्यकाल बढ़ाया गया, पदोन्‍नत किया गया और आखिर में उसे स्‍थायी भी कर दिया गया। इस घटना की पटकथा 2004 से लिखना शुरू होकर सुप्रीम कोर्ट के तीन न्‍यायाधीश बदले जाने तक लिखी जाती रही। जाहिर है, न्‍यायपालिका में पसरी अंधेरगर्दी का यह एक ऐसा खुलासा है, जो अंधा बांटे रेवड़ी चीन्‍ह-चीन्‍ह कर देय, कहावत को चरितार्थ करता है।

 

हालांकि काटजू भी इस घटना का एक पक्ष थे, लेकिन उनकी आंखों पर न्‍याय की प्रतीक मूर्ति की तरह पट्‌टी बंधी रही। न्‍याय की तराजू का पलड़ा अन्‍याय की तरफ झुकता रहा और अब जाकर 10 बाद उन्‍होंने इस अन्‍याय की परत से धूल झाड़ी है तो इसे क्‍या कहा जाए, देर आए दुरूस्‍त आए ? या जैसा कि कांग्रेस के प्रवक्‍ता कह रहे हैं कि काटजू का भारतीय प्रेस परिषद के अध्‍यक्ष बने रहने का कार्यकाल पूरा हो रहा है, लिहाजा इस कार्यकाल को बढ़ाने के लिए काटजू झूठा व बेबुनियाद कथन देकर नरेंद्र मोदी सरकार से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में हैं ? यह सवाल उठना भी इसलिए लाजिमी है, क्‍योंकि बाद में काटजू सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश भी बन गए थे, लेकिन तब भी उनके ओंठ सिले रहे। हो सकता है, यदि वे मुंह खोलते तो उनके भी व्‍यक्‍तिगत हित प्रभावित हो जाते ? सिद्धांत और नैतिकता की यही वह महत्‍वपूर्ण कसौटी है, जिस पर ज्‍यदातर पदाधिकारी खरे नहीं उतरते। नतीजतन दागी अपनी पारी सफलतापूर्वक खेल जाते हैं

 

इस कथा कि अंतकर्था है कि जो भ्रष्‍ट जज थे, उनके कामकाज को संदेह के घेरे में लेते हुए, मद्रास हाइर्कोर्ट के कई न्‍यायाधीशों ने प्रतिकूल टिप्‍पणियां दर्ज की थीं। लेकिन इसी अदालत के कार्यवाहक मुख्‍य न्‍यायाधीश ने पक्षपात बरतते हुए अपनी कलम की ताकत दिखाई और एक झटके में सभी टिप्‍पाणियां खारीज कर दीं और भ्रष्‍ट जज हाइर्कोर्ट के अतिरिक्‍त जज बना दिए गए। राजनीतिक दबाव के चलते ऐसा इसलिए किया गया क्‍योंकि विवादित जज को तमिलनाडु के एक प्रभावित नेता का सर्मथन हासिल था। वह भी इसलिए क्‍योंकि इस जज ने कभी उन्‍हें जमानत दी थी। सब जानते हैं कि यह दल द्रमुक है और राजनीतिक सख्‍शियत एम करूणानिधि हैं।

हालांकि काटजू का कहना है कि वे जब हाइर्कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश बने तो उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधान न्‍यायाधीश रमेशचंद्र लाहोटी से इस मामले की जांच कराने का निवेदन किया। लाहोटी ने आइर्बी से जांच कराई भी। जांच में आरोप सही पाए गए। नतीजतन आरोपी जज को स्‍थायी जज नहीं बनाया गया। तब सप्रंग सरकार को सहयोग दे रहे तमिलनाडु के घटक दल ने सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर दबाव बनाया। यहां तक कि सरकार गिराने की धमकी तक दे डाली। कांग्रेस के बिचौलिए सामने आए। तब लाहोटी ने अपना निर्णय बदला और आरोपी जज को अतिरिक्‍त न्‍यायाधीश बना दिया। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमकोर्ट के ही न्‍यायमूर्ति सभरवाल ने आरोपी जज की सेवानिवृत्‍ति की उम्र पूरी हो जाने के बावजूद सेवा का विस्‍तार कर दिया। और फिर केजी बालकृष्णन के कार्यकाल में उसे स्‍थायी जज बना दिया गया। यदि काटजू की सुनाई यह रहस्‍य कथा सही है, तो इस संदर्भ में यह सवाल उठना सहज है कि आखिर ऐसे क्‍या कारण थे कि एक साथ तीन प्रधान न्‍यायाधीशों ने एक भ्रष्‍ट जज के नाजायज हितों का सरंक्षण किया ? इस मामले के खुलासे से यह तो साफ है कि दाल में काला जरूर है। इसलिए इसकी सत्‍यता की जांच जरूरी है ? यदि मामला बेबुनियाद साबित होता है तो काटजू के खिलाफ भी अवमानना का मामला बनना चाहिए ? यदि यह मामला केवल मनमोहन सिंह से जुड़ा होता तो यह मानना सहज था कि वे द्रमुक के दबाव में आ गए होंगे ? क्‍योंकि दागियों को सरंक्षण तो वे अपने पूरे 10 साल के कार्यकाल में देते रहे हैं।

 

भ्रष्‍ट जज को इस तरह सरंक्षण देना इस बात का संकेत है कि न्‍यायिक नियुक्‍तियां और पदोन्‍नतियों में शुचिता व ईमानदारी खूंटी पर टांग दी गई है। वर्तमान नियुक्‍ति प्रक्रिया अप्रासांगिक हो चुकी है। इसमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। मौजूदा पद्धति में जजों की नियुक्‍ति में कार्यपालिका की प्रत्‍यक्ष भूमिका तो समाप्‍त कर दी गई, लेकिन अप्रत्‍यक्ष तौर से राजनीतिक दबाव की भूमिका प्रभावशील है। केंद्र की मोदी सरकार न्‍यायाधीशों की नियुक्‍ति के लिए एक आयोग बनाने पर विचार कर रही है। यह आयोग कालेजियन प्रणाली की जगह लेकर नियुक्‍ति की प्रक्रिया को बेहतर बनाने का काम करेगा, ऐसा सरकार का दावा है। इस प्रणाली में यह शर्त रखी जाना जरूरी है कि सेवानिवृत्‍ति के बाद पांच साल तक किसी भी न्‍यायाधीश को किसी आयोग या परिषद का अध्‍यक्ष नहीं बनाया जाए। क्‍योंकि यह एक ऐसी खिड़की है, जिसका प्रलोभन पद लोलुपता को उकसाए रखता है और न्‍यायाधीश केंद्र व राज्‍य सरकारों से समझौता करके नैतिक सिद्धांतों की बलि चढ़ा देते हैं। इसके साथ ही न्‍यायिक जवाबदेही विधेयक भी लाया जाना जरूरी है। न्‍याय प्रक्रिया से जुड़े मानहानि के कानून में भी संशोधन की जरूरत है, जिससे न्‍यायिक विंसगतियों को उजागर किया जा सके।

 

न्‍यायालय और न्‍यायाधीशों को सूचना के अधिकार के दायरे में भी लाना जरूरी है। इस बाबत ध्‍यान रहे कि उच्‍चतम न्‍यायालय ने मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें सूचना के अधिकार के तहत न्‍यायाधीशों की पारिवारिक संपत्‍ति की जानकारी ली जा सके। तत्‍कालीन न्‍यायमूर्ति केजी बालकृष्‍णन ने इस याचिका को इस दलील के साथ निरस्‍त कर दिया था कि ‘उनका दफ्‌तर सूचना के दायरे से इसलिए बाहर है, क्‍योंकि वे संवैधानिक पदों पर आसीन हैं।‘ जबकि कार्मिक मंत्रालय ने भी न्‍यायपालिका को सूचना कानून के दायरे में लाने की सिफारिश की सिफारिश की थी। मंत्रालय ने दलील थी कि ‘संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी लोकसेवक हैं। इसलिए सूचना का अधिकार उन पर भी लागू होना चाहिए। यहां विडंबना रही है कि संसद न्‍यायपालिका को कोई दिशा निर्देश दे नहीं सकती और न्‍यायपालिका का विवेक मानता है कि वह सूचना के अधिकार से परे है।

 

यहां गौरतलब है कि जब यह अधिकार संसद और विधानसभाओं पर लागू हो सकता है तो न्‍यायपालिका पर क्‍यों नहीं ? यदि लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में जनता सर्वेसर्वा है, तो देश के नागरिक को न्‍यायपालिका क्षेत्र में भी जानकारी मांगने का अधिकार मिलना चाहिए। काटजू का पर्दाफाश भी इस बात की तस्‍दीक करता है कि यदि न्‍यायपालिका पर गोपनीयता का पर्दा न पड़ा रहता तो भ्रष्‍ट जज के संबंध में लिखी गई प्रतिकूल टिप्‍पणियों का तभी खुलासा हो गया होता ? लिहाजा इस जज के सेवा विस्‍तार, पदोन्‍नति और स्‍थायीकरण की कोशिशों पर भी वहीं विराम लग गया होता। न्‍यायपालिका की विश्‍वसनीयता बनी रहे, इसलिए उसे बदनामी की खुली खिड़कियों से बचाने की जरूरत है ?

 

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49, श्रीराम कालोनी

शिवपुरी म.प्र.

फोन 07492 232007

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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मेहनत

हेमा ने कहा सर हमने अलजेब्रा की चार-पाँच किताबें खरीद लिया है। फिर भी अलजेब्रा बिल्कुल समझ में नहीं आती। मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा यूनिवर्सिटी रोड पर जो पुस्तक सदन है उसके पास चार-पाँच नहीं अलजेब्रा की पचासों किताबें हैं। फिर भी उसको अलजेब्रा नहीं आती। यदि किताब रखने से ही अलजेब्रा समझ में आ जाती तो वह दुकान बंद करके कहीं अलजेब्रा पढ़ा रहा होता। जरूरत है मेहनत करने की। यदि पढ़ न सको तो किताबें इकट्ठा करने से क्या फायदा ? बिना मेहनत के जिंदगी में कुछ भी हासिल नहीं होता। यह सुनकर हेमा कुछ गंभीर हो गई। शायद वह और मेहनत करने को सोच रही थी।

 

 

तीन बातें

राजीव ने मुझसे कहा सर मैंने इस विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया है और आज मेरा पहला दिन है। मुझे क्या करना चाहिए जिससे मैं जीवन में सफलता प्राप्त कर सकूँ। मैंने कहा आपको तीनों बातें याद रखनी चाहिए और इन पर अमल करना चाहिए। उसने कहा कृपया बताएँ वो तीन बातें क्या हैं ?

मैंने कहा पहली बात तो यह है कि आपको कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहिए जिससे आपके माता-पिता को कष्ट हो। कुछ भी करना हो तो सोच लिया करो कि हमारे माता-पिता इसके बारे में जानेंगे तो उन्हें बुरा तो नहीं लगेगा। उन्हें दुःख तो नहीं होगा। इससे तुम कभी गलत रास्ते पर नहीं जाओगे। और जिस उद्देश्य के लिए तुम्हें भेजा गया है और तुम आए हो उसे हासिल करने में तुम्हें सहायता मिलेगी।

दूसरी बात यह है कि अपने अध्यापकों का सम्मान करना और वे जो बताएँ, पढाएँ उसे ध्यान से सुनना और दिए गए काम को रोज का रोज पूरा कर लेने की कोशिस करना।

तीसरी और अंतिम बात यह है कि कभी यह मत भूलना कि सफलता सही व अनवरत कठिन परिश्रम से ही मिलती है।

राजीव ने कहा कि ये तीन बातें मैं कभी नहीं भूलूँगा। और सही दिशा में लगातार कठिन परिश्रम करूँगा। ऐसा कहकर वह प्रणाम करके चला गया

 

पुरानी सोच

रसायन विज्ञान के आचार्य ने कहा कि मुझे आज पता चला कि आप बहुत पुरानी सोच के हैं। मैंने कहा सोच अच्छी होनी चाहिए। अपने और दूसरों के लिए भी। फिर चाहे अच्छी हो या पुरानी क्या फर्क पड़ता है ?

वे बोले कि मैंने सुना है कि आप श्यामपट्ट पर हमेशा दाहिनी ओर से लिखना शुरू करते है। इससे तो यही साबित होता है कि आप पुरानी सोच के हैं। क्योंकि पुराने लोग भी दाहिने हाथ अथवा दाहिनी ओर से काम करना शुभ मानते थे। हम लोग तो कुछ भी नहीं मानते कहीं से भी लिखना शुरू कर देते हैं।

मैंने कहा कि यह पुरानी नहीं वैज्ञानिक सोच है। आप ने ज्यादा गणित तो नहीं पढ़ा है फिर भी स्कूल में तो पढ़ा ही होगा। वे बोले पढ़ा तो है। मैंने कहा कि यह भी सुना होगा कि गणित सभी विज्ञानों की माता है। वे बोले यह भी सुना है। मैंने कहा कि जो माता सिखाए उसे तो हर किसी को मानना चाहिए। वे बोले क्या मतलब ?

मैंने कहा स्कूल में जोड़ना आपको दाहिनी ओर से सिखाया गया था कि बायीं ओर से। वे बोले दाहिनी ओर से। मैंने कहा घटाना भी दाहिनी ओर से ही सिखाया गया होगा। वे बोले अब बस करिये हमारी समझ में आ गया गुणा भी दाहिने से ही करते हैं। मैंने कहा गणित में अधिकांश चीजे दाहिनी ओर से ही होती हैं तो दाहिनी ओर से लिखना पुरानी सोच है अथवा वैज्ञानिक। इतना सुनकर वे जाने लगे। जाते-जाते बोले आपने सही कहा सोच सही होनी चाहिए चाहे पुरानी ही क्यों न हो।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/ URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
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1....नींव की ईंट

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श्याम बहुत ही होनहार छात्र था, सभी शिक्षक उसकी इतनी तारीफ करते, कि माँ बाप का सीना ख़ुशी से फूल जाता। धीरे धीरे समय बीतता रहा अब श्याम कक्षा नौ में आ गया था। माँ को उस पर बहुत भरोसा था अतः ध्यान ज्यादा नहीं देती राजेश से कहती "बच्चा है खेलने खाने की उम्र है ज्यादा जोर पढाई पर मत दिया करिए"।


पापा तो कक्षा आठ में ही उसके क्लास में टॉप से खुश हो एक मोबाईल उपहार में दे दिए। वह अपनी मेहनत जारी रक्खेगा इस विश्वास पर, वह भटक जायेगा, यह बात दिमाग़ में लाये ही नहीं। अब माँ पापा जब भी कमरे में आते उन्हें श्याम पढ़ते दीखता पर उन्हें क्या पता था कि श्याम तो धोखा दे रहा है। उनकी नजर बचा वह अब ह्वाट्सअप पर चैटिंग और गेम में ही लगा रहता है। उसकी मेहनत से सब आश्वस्त थे इस बार भी टॉप करेगा उनका बेटा।


पर इस बार सब उल्टा हुआ जब रिजल्ट लेने स्कूल पहुंचे शिक्षकों ने शिकायतों का पुलिंदा जैसे तैयार रखा था, एक एक कर सभी ने शिकायत कर डाली और हिदायत दी कि "आप श्याम पर अधिक ध्यान दे बढ़ता हुआ बच्चा है, हाथ से निकल गया तो बहुत मुसीबत होगी, आपके ही भले के लिये कह रहे है, बुरा ना मानियेगा"। हाथ में रिजल्ट जैसे ही आया राजेश के पैरो के नीचे से जैसे जमीं खिसक गयी, माँ को भी काटो तो जैसे खून ही नहीं, दोनों आवक रह गये श्याम सारे विषयों में फेल था।


राजेश को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने शिक्षक से कहा "आप चिंता ना करे अगली बार मेरा यही बेटा, पहले जैसा करके दिखाएगा"। घर पहुँचते ही श्याम को राजेश ने बुलाया श्याम डर गया कि आज तो खैर नहीं पापा बहुत मारेगें, पर राजेश ने कुछ नहीं किया बस समझाया, "कि जिन्दगी राह इसी उम्र में मजबूत होती है,  इस कड़ी को कमजोर कर दोगे तो, भविष्य की राह बहुत कठिन हो जाएगी बेटा"। "यूं समझो की नींव की ईंट है यही समय",।


श्याम की समझ आ गया उसने खुद ही अपना मोबाइल पापा को देते हुए बोला , "पापा भटकाव की जड़ है यह, इसे आप रखिये और जब मैं, पढलिख आप की तरह गजटेड अफसर हो जाऊँगा तो आपसे, इससे भी अच्छा मोबाइल माँगूंगा"। यह कह श्याम अपने कमरे में जाकर अपनी पढ़ाई करने लगा। राजेश उसकी कामयाबी के प्रति आश्वस्त हो नीलू की तरफ देख मुस्करा दिया

 
२..

स्त्रीत्व मरता कब है

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नक्सली लड़कियां जंगलों में भटक भटक थकान से टूट चुकी थी, थोड़ा आराम चाहती थी, तभी संगीत की मधुर आवाज सुन ठिठक गयी। ना चाहते हुए भी वे मधुर आवाज की ओर खींचती चली गयी। गाने की मधुर आवाज की ओर बढ़ते बढ़ते, वह गाँव के बीचोंबीच आ पहुंची, एक सुरक्षित टीले पर चढ़ 'कुछ सुकोमल सुसज्जित लडकियों को देख' ग्लानी से भर उठी।


देश भक्ति गीत पर थिरकती युवतियाँ कितनी सुन्दर लग रही है, बालों में गजरा, सुन्दर साड़ी, चेहरे पर एक अलग ही लालिमा छायी है और हमें देखो बिना शीशा कंघी के कस कर बांधे हुए बाल, लड़कों से लिबास, कंधे पर भारी भरकम राइफल, दमन कारी अस्त्र शस्त्र लादे, जंगल जंगल भटक रहे है। सरगना बोली "हम भी तो इन्हीं की तरह थे सुकोमल अंगी, पर आज देखो कितने कठोर हो गये, समय ने हममें बहुत परिवर्तन कर दिया, एक भी त्रियोचरित्र गुण नहीं रह गया"। दूसरी ने भी हाँ में हाँ मिला कहा "जिसे देखो हमें रौंद आगे बढ़ जाता है, सारे सपने चकनाचूर हो गये, कहने को कोई अपना नहीं इन हथियारों के सिवा"। सबसे छोटी वाली ने कहा "हाँ ये हथियार भी हमारी अस्मिता की रक्षा कहा कर पाए, हा खूनी जरुर बना दिए"।


सभी नक्सली लड़कियां एक दूजे की आँख में देख कर, एक कडा फैसला लेने का निश्चय किया। कठिन निर्णय लेते ही, धीरे धीरे ऐसे स्थान पर आ गयी जहाँ से पोलिस की नजर उन पर पड़ सके। आज शायद १५ अगस्त था, अतः पूरी लाव लस्कर के साए के तले, गाँव वाले जश्न मना रहे थे।


किसी पोलिस वाले की निगाह उन नक्सली लड़कियों पर पड़ गयी जो मग्न थी जश्न देखने में। सभी गाँव वाले और पोलिस वाले मिलकर नक्सली लड़कियों को धर दबोचे। पोलिस अपने कामयाबी पर फूले नहीं समा रही थी और नक्सली लड़कियां मंद मंद मुस्करा त्रियोचरित्र के सपने बुन रही थी। उन चंद क्षणों में हजारों सपने देख डाले होंगे। सभी मुख्यधारा में शामिल होने का, मन ही मन जश्न मनाते हुए, सब एक दूजे की ओर देख ..जैसे कह रही थी "स्त्रीत्व मरता कब है, देखो आज इतने सालों बाद आखिर जाग ही गया"।

 

आज भटकाव के रास्ते से लौट जो आई थी, इसकी ख़ुशी भी उनके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।

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Savita Mishra

Khandari,
AGRA 282002

अनोखा गुजराती कवि -उमाशंकर जोशी

डॉ. लता सुमन्त

उमाशंकर का आगमन गुजराती साहित्य की ही नहीं,भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है.गाँधीयुग, अनुगाँधीयुग और स्वातंत्र्योत्तरकाल के दौरान चलनेवाली उनके सर्जन और चिंतन की प्रवृत्ति ने जीवन कला और कविता के अनेक आयामों के दर्शन कराए हैं.जिसका उल्लेख भारतीय साहित्य और संस्कृति के इतिहासकारों को भी करना पड़ेगा.

उमाशंकर का पालन - पोषण गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित और पोषित आन्दोलनों के बीच हुआ था.कवि ने प्रत्यक्ष रुप से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था.उत्तर गुजरात से आए उमाशंकर आजीवन अध्यापक थे.साहित्यप्रवाहों से घनिष्ठ संबंध बनाए रखने के अलावा संस्कृत महाकाव्यों और पुराणों का उन्होंने गहन अध्ययन किया था. देश -विदेश के राजकीय और सांस्कृतिक परिवेशों का मार्मिक परामर्श वे करते रहते थे.उमाशंकरजी ने रवीन्द्र साहित्य का आकंठ रसपान किया था.वे आजीवन कर्मयोगी थे..उनका कविकर्म खुद एक अध्यात्म प्रवृत्ति बन गया था.

उनका जन्म 21 जुलाई 1911 के दिन उत्तरगुजरात के बामणा गाँव में हुआ था.शामलाजी के निकटवर्ती पर्वतप्रदेश में - डुंगरावाला के नाम से जाने जानेवाले दो जमीदारों के यहाँ वे काम करते थे. बामणा में उनका घर पर्वत की तलहटी में कुछ ऊँचाई पर था.पर्वतों तथा उनके मध्य स्थित शामलाजी के प्राकृतिक सौन्दर्य का उन्होने बचपन से ही पान किया था. प्रकृति के स्नेहासिक्त.आँचल तथा परिवार के गहन प्यार ने कवि के संस्कारों को पोषित किया था.

बचपन में उन्हें पर्वतों की कन्दराओं में उदयाचल के सामने क्षितिज पर, गिरिमालाओं के मस्तक पर क्ऱ़़़़ीडा करनेवाले उषा के रंग,बीच - बीच में झलकनेवाली सारसों की ध्वनि, हरे - भरे खेत, वर्षाऋतु के उत्सव और मेले इन सबके व्दारा कुदरत और मानवजीवन के संस्पर्श की अनोखी अनुभूति होती थी.उनके गीतों पर गांँव के लग्नोत्सवा ेंऔर मेलों का ऋण बहुत है.शब्दों के प्रति सजगता उनमें खिलती उम्र से ही थी.ब्राह्मणों के वेदोच्चार,छंदगान,और विशेष रूप से ग्रामीण समाज के लोगों की भाषा के प्रति वे बचपन से ही आकर्षित थे.

बामणा में चोथी पास करने के पश्चात आगे शिक्षा की असुविधा के कारण उन्होंने इड़र छात्रालय में शिक्षा प्राप्त की. यहाँ समग्र वर्ष के दौरान एक सहाध्यायी से छंद का परिचय प्राप्त किया.

मैट्रिक की पढाई के लिए वे जब अहमदाबाद आए तब तक सरस्वतीचंद्रभाग -1,दलपत काव्य, गिरधर कृत रामायण, साहित्यरत्न, काव्य माधुर्य, लोर्ड ओवेबरी का प्लेझर्स ऑफ लाइफ का डॉ. हरिप्रसाद देसाई व्दारा किया गया अनुवाद, संसार का सुख आदि पुस्तकों का पठन किया.इ़डर में उस प्रदेश के नायकों एवं भोजकों द्वारा अभिनित नाटक देखते तथा छात्रालय में विद्यार्थीयों द्वारा अभिनीत नाटकों के सूत्रधार बनते थे.

अहमदाबाद केन्द्र से मेट्रिक्युलेशन की परीक्षा प्रथम स्थान में पास करने के पश्चात उन्होंने गुजरात कॅालेज में प्रवेश लिया.1930 में इन्टरआर्टस् की परीक्षा देनी थी वही ंसत्याग्रह की जंग छिड गई जिस कारण से पढाई अधूरी रह गई.1934 में अेलफिन्सटन कॉलेज में प्रवेश लिया.वहीं से 1936 में अर्थशास्त्र - इतिहास विषयों के साथ बी.ए. ऑनर्स किया और 1938 में गुजराती मुख्य विषय केसाथ एम. ए. प्रथम श्रेणी में पास किया.1936 में विलेपार्ले की गोकणीबाई हाईस्कूल में शिक्षक के रुप में तथा 1938 में सिडनहाम कॅालेज में प्राध्यापक के रुप में कार्य किया.

1937 में ज्योत्सनाबहन के साथ उनका विवाह हुआ. 1939 में अहमदाबाद में स्थाई रुप से निवास किया.1946 तक वहाँ की गुजरात वर्नाक्युलर सोसायटी में अध्यापन - संशोधन किया.1947 में संस्कृति

पत्रिका शुरु की.मेट्रिक में शाकुंतल और उत्तररामचरित के अलावा पूर्वालाप और द्विरेफ नी वातो पढा था.जेल में मराठी - बंगाली भाषा सीखी और तुकाराम के अभंग तथा रवीन्द्र के काव्य पढे.

जेल में खगोल शास्त्र के अध्ययन की जिज्ञासा ने जन्म लिया.इस समय के दौरान टॅामस ई. केम्पीज कृत -इमीटेशन ऑफ क्राइस्ट पढा.इस दौरान बहिर्जगत तथा आंतर्जगत एक रूप हो रहे थे.ऐसे समय में ब्रह्मांड की भूमिका पर काल की पात्र के रूप में कल्पना कर नाट्यरचना करने की प्रेरणा हुई.उसके लिए महाभारत और प्रथम विश्वयुद्ध की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास शुरु किया.

1931में गाँधी इरविन करार के कारण कॅालेज छोड काका कालेलकर के शिष्य बन गए. काका साहब के सानिध्य ने तथा विद्यापीठ के ग्रंथालय ने उनका ज्ञानकोश समृद्ध किया सिसृक्षा को उत्तेजित किया परिणाम स्वरुप विश्व शातिकाव्य की रचना हुई.

1928 में कॉलेज के प्रथम वर्ष में आबु पर्वत के नखी सरोवर पर शरदपूर्णिमा के दिन जिस काव्य की रचना की वह उनका प्रथम काव्य था.उस पर - ठाकोर ना भणकारा काव्य का प्रभाव है.विश्वशांति पर नानालाल तथा बलवंतराय के प्रभाव के बावजुद उन दोनों से अलग प्रतीत होती है - ईबारत और आकार. ऐसा कवि खुद कहते हैं.विश्व शांति कविता की सराहना नरसिंहराव ने भी की है.

उनका पहला नाटक -इसु नु बलिदान के तुरंत बाद - साप ना भारा जैसी यथार्थवादी नाट्यकृतियों की रचना हुई.बाद में वे कहानियाँ भी लिखने लगे.कविता का प्रवाह तो अविरत चल ही रहा था.सुन्दरम् का साथ, रामनारायण की विवेचना और प्रो.ठाकुर की नुकताचीनी,ये सब उमाशंकर के सृजनकार्य में अपरोक्ष रुप से सहायभूत हुए.

गाँधी शासन की कंठी - बाँधे बगैर गाँधी जीवन - संदेश को विशाल रुप से आत्मसात कर खुद के सृजन चिंतन में उन्होंने जीवित रखा.साथ ही साथ पश्चिम देशों कि यात्रा,पाश्चात्य -युरोप की कविता तथा फ्रें न्च और अमेरिकन नाटककारों का अध्ययन उनके सृजनकार्य को पोषित और संस्कारित करते रहे.पद्यनाटकों की दिशा में समय - समय पर किये गए प्रयोग उनकी सामर्थ्य तथा तद्नुरुप पुरुषार्थ के साक्षी हैं.

उन्हें प्राप्त प्रतिष्ठित पदों में गुजरात युनिवर्सिटी का कुलपति पद, सहित्य अकादमी का अध्यक्ष पद , विश्वभारती का कुलपति पद और गुजराती साहित्य परिषद के चौवीसवें अधिवेशन का प्रमुख पद आदि मुख्य हैं जो सारस्वत सेवा उपरांत भारत के प्रमुख सारस्वत तथा संस्कार पुरुष के रुप में उन्हें प्रतिष्ठित करता है.उनकी रचनाओं को प्राप्त पुरस्कारों में 1936 में - गंगोत्री को रणजीत राम सुवर्णचंद्रक , 1944 में प्राचीना - को महीडा पुरस्कार, 1968में निशीथ - को भारतीय ज्ञानपीठ का 50 हजार रुपए का पुरस्कार आदि प्रमुख हैं.

काव्यवैभव : 1931 से 1981 के दौरान उमाशंकर ने दस काव्यग्रंथ गुजराती साहित्य को दिये.1981 में उनके समग्र ग्रंथों का संग्रह उनके सत्तरवें जन्म पर प्रकाशित हुआ..उसमें निरुपित प्रथम काव्य की प्रथम पंक्ति है -वहाँ दूर से मंगल शब्द आ रहा..और काव्य की अंतिम पंक्ति -आखरी शब्द मौन को ही कहना होता है.इन दो पंक्तियों के बीच से गुजरी उनकी कविताओं के भाव - विचारों की तरह अभिव्यक्ति में आए विविध मोड विशेष रुप से कविताओं में निरुपित वैविध्य पूर्ण कला - वैभव की ओर ध्यानाकर्षित करते हैं.

विश्वशांति के मंगल शब्द से उनकी सृजन प्रवृत्ति का आरंभ

होता है.उमाशंकर की कविता का मंगलाचरण कुछ इस तरह से शुरु होता है -जब तक इस विशाल विश्वमंदिर के किसी कोने में भीसत्य प्रेम या सौन्दर्यका हनन होगा, तब तक विश्व में अखंड शांति नहीं हो सकेगी.ऐसी मुग्ध भावना से प्रेरित होकर वे विश्वशांति के विचारों का विकास इस काव्य में निरुपित करते हैं.वे वर्तमान को भूत और भविष्य के साथ जोडकर विश्वप्रेम का युग संदेश सुनाते हैं.जीवन के कलाधर गाँधीजी के आगमन का कवि की आर्षवाणी उत्साह पूर्वक स्वागत करती है.- पुण्य फले भारत की प्रजा के, अहो! महाभाग्य वसुन्धराके!

गुलाम घेरे बही मुक्तगंगा, उडे ध्वज अंतर में स्नेह रंगे.

स्नेह के सेतु द्वारा पूर्व तथा पश्चिम को जोडने की प्रार्थना करते हुए

कवि युगमूर्ति से कहते हैं - तुम तो पूर्व के हो ना हो पश्चिम के ही

अहिंसा,सत्य और प्रेम किसी, एक के नहीं?

हँसाया भूत और भविष्य ,हसाओ वर्तमान को !

पढाओ प्रेम के मंत्र बावली मनुज जाति को.

विशाल जग के आँंगन में नहीं केवल मनुष्य

पशु हैं, पंखी हैं,पुष्पों वनों की है वनस्पति !

वे संसार की दहलीज पर खडे होकर -वसुधैवकुटुम्बकम् का उद्बोधन करते हैं.

1934 में प्रकाशित गंगोत्री - काव्यसंग्रह में समाजोभिमुखता वास्तविकता के विविध स्तरों पर प्रकट होती दिखाई देती है.स्वातंत्र्य का शंखनाद -शूरसम्मेलन तथा बारणे -बारणे बुद्ध जैसी रचनाओं में सुनाई देता है.स्वातंत्र्य यज्ञ की बलि बनकर इतिहास का पन्ना खुश्बु से भर देने की कवि की आकांक्षा है,

उनके मन में एक ही प्रश्न उठता रहता है -

मै गुलाम ?

सृष्टिबाग का अमोल फूल मानव गुलाम ?

स्वतंत्र प्रकृति तमाम

एक मनुज ही क्यों गुलाम?

जेल में लिखे गए -एक चुसायला गोटला में भी गुलामी की वेदना और स्वातंत्र्य की अभिव्यक्ति होती है.धाणी नु गीत ,हथोडा नु गीत, मोची और टॉमस हूड के ध साँग आँफ द शर्ट का अनुवाद पहेरण नु गीत में पीडितों की वेदना, संवेदना का सहानुभूति पूर्ण निरुपण हुआ है.आखिर कवि रामजी से कहते हैं –

रामजी, क्यों रोटी महँगी?

रक्त मांस इतने सस्ते ?

बुलबुल और भिखारण के संवादकाव्य में भिखारिन बुलबुल से कहती है - गीत जिंदा मृत्यु समान, मीठे आज तो गा !

सोनाथाली - के कथाकाव्य में श्रमजीवी की प्रतिष्ठा की है.इन सभी रचनाओ में कवि का समाजवादी दृष्टिकोण झलकता है. उसकी पराकाष्ठा -जठराग्निमें देखने को मिलती हे .पेट नी आग और लोही ना आँधण - की बात कवि बार - बार करते हैं.इस प्रकार की रचनाएँ युगवंदना की भूमिका पर पहुँच जाती है.विश्वतोमुखी और विश्वमानवी में मानवता की उपासना की भावना भव्य कल्पना से मंडित होकर आती है.उमाशंकर की ही नही,प्रत्येक सच्चे कवि की मंशा इन पंक्तियों में व्यक्त होती है –

व्यक्ति मिट बनूँ मनुज ,

माथे पर धरुँ धूल वसुंधरा की.

पचास वर्ष की सृजन - यात्रा के दौरान उमाशंकर ने अपने साहित्य के द्वारा कलात्मक सत्य प्रकट करनेवाली उक्तियाँ काव्यभूमि में बिखेरी हैं. उनमें विश्वमानवी की भावना के दर्शन सहज ही रवीन्द्रनाथ टैगोर की याद दिला देते हैं.

निशीथ में उमाशंकर की कविता गंगोत्री से एक कदम आगे बढी हुई दिखाई देती है.प्रकृति के भव्य ,सुन्दर,गहन रुप को शब्दों में कैद करने के साथ प्रणय की प्रसन्न मधुर संवेदना उसके वैशिष्ट्य को निरुपित करती है.निशीथ - के प्रणय काव्यों का गुजराती के प्रेमकाव्य के इतिहास में एक अनोखा स्थान है.उनकी प्रणय भावना -निहारी कविता तुममें जबकि तुम्हें भी कविता में - कहने के लिए प्रेरित करती है.हृदय की रखवालीन को विरल जीवन के आनंद की रक्षा के लिए कवि बिनती करते हैं. पृथ्वी का प्रेम पत्नी के प्रति प्रणय में व्यवधान रूप नहीं बनता.विशाल सर्वतोमुखी दृष्टि से कवि खुद प्रिय व्यक्ति को समष्टि रूप में परिवर्तित होते देखते हैं.विराट सर्वस्पर्शी प्रेमभावना का क्रमबद्ध तथा मार्मिक निरुपण गुजराती कविता में पहली बार देखने को मिलता है.

आतिथ्य काव्यसंग्रह में 1940 से 1945 के दौरान लिखी रचनाएँ प्राप्त होती हैं.द्वितीय विश्वयुद्ध पर लिखी गई - मार्गशीर्ष : 1996 - जिसकी रचना1939 में हुई, वह भी इस संग्रह में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उद्भवित विषमवेदना और चिंतन का इसमें सुन्दर निरुपण हुआ है.साथ ही बंगाल का अकाल,गाँधीजी के उपवास,कस्तुरबा का निधन तथा हिरोशिमा - नागासाकी द्वारा साध्य विजय आदि वैश्विक घटनाएँ भी इनकी कविताओं का विषय बनी हैं.वसंतवर्षा उनका स्वतंत्रता प्राप्ति के सात वर्ष बाद प्रकाशित काव्यसंग्रह है.काव्यसंग्रह की प्रकृति और प्रेम की कविताएँ आतिथ्य का सातत्य दर्शाती हैं.इनके मुक्त तुलिका से चित्रित मनोरम ऋतुचित्र मुख्य रुप से आकर्षित करते हैं.श्रावण की धूप से बोझिल डाली,पत्तों की हरी कटोरियों में खिलती थोडी -सी धूप और - चाहे श्रृंग ऊँचे - मगर माँ के श्रृंगस्तनों से शान्ति अमृत पीती धूप - कवि के मन में बस गई है.सुभग कल्पना मृदु भावसंवेदना और गतिशील वर्णनों के कारण वसंतमंजरी तथा मेघदर्शन इस संग्रह की सुन्दर रचनाएँ हैं.मधुरलय तथा कोमल सौन्दर्य दर्शन में कवि रवीन्द्र का प्रभाव झलकता है.

वसंतवर्षा - की अधिकतर रचनाएँ स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की हैं.इन कविताओं में कवि का नजरिया बदला हुआ नजर आता है.15 अगस्त 1947 कविता में कवि कहते हैं-

जिस दिन का हम इंतजार कर रहे थे

वह तुम हो ? आओ.

जिसकी उषा का आँचल दुग्ध धवल शहीदों -सा

पवित्र रक्त से हुआ रंजित , वह तुम हो? आओ.

उदित हुए तुम निष्प्रभ चाहे आज

मेघाच्छन्न नभ में ,

पुरुषार्थ के प्रखर प्रताप से मध्याह्न तुम्हारा दीप्त हो ,

भव्य तपोदीप्त.

कवि शुभाशंसा व्यक्त करते हैं परंतु दिल में गमगीनी है :

हजार बार हँसना चाहूँ ,

हृदय में खुशाली नहीं. अतः कवि प्रभु से प्रार्थना करते हैंः- प्रभु व्यथित उर में , तिनका एक आस का दे !

चाहे न कुछ दे सके , जरा आत्मश्रद्धा तू दे !

क्योंकि कवि को जगत् जीर्ण दिखाई देता है.आसपास कि दुनिया में होनेवाला नैतिक मूल्यों का हस अब असह्य हो गया है.सब कुछ सड चुका है उसका खाद बनाकर नए मूल्यों से भूमि को हरा - भरा करने की वह रुद्र से प्रार्थना करता है.अभिव्यक्ति की पद्धति निराली है.परंपरित छंद का प्रयोग किया है. रडो न मुज मृत्यु ने !

कविता में कवि राष्ट्रपिता से कहते हैं- हम नहीं रोएँगे ,पिता,मृत्यु आपकी पावन,

कलंकमय दैन्य का, निज रो रहे जीवन.

संग्रह की अंतिम रचना पंखीलोक उमाशंकर की आधुनिक कवित्व शैली का प्रतिनिधित्व करती है.पहली ही पंक्ति में –

कान अगर आँख हो तो

शब्द उसे प्रकाश लगे.

इस तरह से- - शब्द कवि को ढूँढते हुए आते हैं.पाणिनी के नियमों से बद्ध शब्द?

या फिर पंखी समान टपकते प्रकाश के टुकडे ?

शब्द अगर बोल पाते तो कवि को जरुर कहते –

कविता बनना कहाँ हमारी हैसियत?

इस तरह से आधी सदी से बह रही ऊमाशंकर की कविता पूर्ववर्ती कविताधारा से पोषण पाकर,अनेक नए उन्मेषों तथा कवित्व शक्ति से युक्त ,नूतन प्रयोगशील धारा के साथ खुद का और गुजराती कविता धारा का सातत्य बनाए रखती है.इतने सुदीर्घ समय पट पर , इतना स्वस्थ , रंगीन वैविध्य पूर्ण स्वर आधुनिक गुजराती कविता के इतिहास में और शायद भारतीय भी -बहुत कम कवियों के सुनाई दिये हैं.

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35, विश्वंभर पार्क -1

परमहंस सोसायटी के पास,

गोत्री रोड, बडौदा. -390021

संदर्भ ग्रंथ -

अर्वाचीन गुजराती साहित्य नी विकास रेखा -2 डाँ धीरुभाई ठाकर

पूर्व का आलेख यहाँ देखें

जीव जीवन व मानव -भाग ३...

(ब) मानव का सामाजिक विकास

युगों तक प्रारंभिक होमो सेपियन घूमंतू शिकारी-संग्राहक -- के रूप में छोटी टोलियों में रहा करते थे | जैसे जैसे मस्तिष्क व सामाजिकता का विकास होता गया, सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया तीब्रतर होती गयी|

सांस्कृतिक उत्पत्ति व कृषि एवं पशुपालन -- सांस्कृतिक उत्पत्ति ..कृषि व पशुपालन के विकास के साथ सांस्कृतिक विकास ने जैविक उत्पत्ति का स्थान ले लिया| लगभग 8500 और 7000 ईपू के बीच, मध्य पूर्व के उपजाऊ अर्धचन्द्राकार क्षेत्र में रहने वाले मानवों ने वनस्पतियों व पशुओं के व्यवस्थित पालन की व्यवस्था कृषि शुरुआत की जो प्रारम्भ में खानाबदोश थे व विभिन्न क्षेत्रों में घूमते रहते थे |

यह अर्ध-चंद्राकार क्षेत्र वास्तव में भारतीय भूभाग का ब्रह्मावर्त क्षेत्र था जहां सर्वप्रथम कृषि व पशुपालन प्रारम्भ हुआ| मथुरा-गोवर्धन क्षेत्र विश्व में प्रथम पशुपालन व कृषि सभ्यताएं थीं, जिसका वर्णन ऋग्वेद में भी है |

स्थाई बस्तियों का विकासकृषि का प्रभाव दूर दूर तक पड़ोसी क्षेत्रों तक फैला व अन्य स्थानों पर स्वतंत्र रूप से भी विकसित हुआ | कृषि व पशु-पालन की विभिन्न स्थिर पद्धतियों के विकास ने मानव को खानाबदोश जीवन की बजाय एक स्थान पर स्थिर होकर रहने को वाध्य किया और मानव (होमो सेपियन्स ) कृषकों के रूप में स्थाई बस्तियों में स्थानबद्ध हुए |

जनसंख्या वृद्धि - सभी समाजों ने खानाबदोश जीवन का त्याग नहीं किया—अतः वहाँ सभ्यता तेजी से नहीं बढ़ी |  विशेष रूप से जो पृथ्वी के ऐसे क्षेत्रों में निवास करते थे, जहां घरेलू बनाई जा सकने वाली वनस्पतियों व पशु-पालन योग्य प्रजातियां बहुत कम थीं (जैसे ऑस्ट्रलिया, ) ... कृषि को न अपनाने वाली सभ्यताओं में, कृषि द्वारा प्रदान की गई सापेक्ष-स्थिरता व बढ़ी एवं स्थिरता के कारण जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्ति बढ़ी |

पृथ्वी की पहली उन्नत सभ्यता विकसित -- कृषि का एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा;  मनुष्य वातावरण को अभूतपूर्व रूप से प्रभावित करने लगे| अतिरिक्त खाद्यान्न ने एक पुरोहिती या संचालक वर्ग को जन्म दिया, जिसके बाद श्रम-विभाजन में वृद्धि हुई| परिणामस्वरूप मध्य पूर्व के सुमेर में 4000 और 3000 ईपू पृथ्वी की पहली सभ्यता विकसित हुई | शीघ्र ही प्राचीन मिस्र, सिंधु नदी की घाटी तथा चीन में अन्य सभ्यताएं विकसित हुईं|

वास्तव में सुमेरु हिमालयन क्षेत्र का केन्द्र-स्थान है, यहीं कैलाश पर्वत व मानसरोवर झील क्षेत्र है जो महादेव का धाम है | यहीं से विश्व की सर्व -प्रथम उन्नत सभ्यता भारतीय सभ्यता देव-सभ्यता के नाम से सर्व-प्रथम विक्सित हुई | पुनः सिंधु-क्षेत्र में आर्य-सभ्यता के नाम से विक्सित हुई व् ब्रह्मावर्त के अर्धचंद्राकार क्षेत्र गंगा-जमुना के दोआब..उत्तर भारत में स्थापित हुई|

आज मानव निवास की सबसे ऊंची चोटी हिमालय की बंदर-पूंछ चोटी है....जिसे सुमेरु भी कहा जाता है.. अर्थात बन्दर की पूंछ लुप्त होकर मानव बनने का स्थान | सुमेरु विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का स्थान कहा जाता है|

धर्मों का विकास -- 3000 ईपू, हिंदुत्व- विश्व के प्राचीनतम धर्मों में से एक, जिसका पालन आज भी किया जाता है, की रचना शुरु हुई. इसके बाद शीघ्र ही अन्य धर्म भी

विकसित हुए धर्म वस्तुतः ज्ञान व अनुभव के वैज्ञानिक आधार पर रचित सामाजिक व्यवस्थाएं थीं | हिंदुओं के पारंपरिक -मौखिक ज्ञान वैदिक साहित्य ने विश्व-समाज में धर्म, समाज, साहित्य, कला व विज्ञान की उन्नति व विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया |

मानव सभ्यता के इतिहास का अंधकार-मय काल..(डार्क पीरियड ऑफ हिस्ट्री)...

वस्तुतः भारतीय विद्वान मानव जाति के स्वर्णिम युग --वैदिक-युग का काल १०००० हज़ार ई.पू. का मानते हैं | महाभारत युद्ध ( महाभारत काल-५५००-३००० ई.पू.) एक विश्व-युद्ध था एवं जैसे वर्णन मिलते हैं वह एक परमाणु-युद्ध था जिसमें भीषण जन-धन-संसाधन व स्थानों व जातियों-कुलों व संस्कृति का विनाश हुआ | सभ्यता के महा-विनाश से इस काल के आगे का इतिहास प्राय: अँधेरे में है| विश्व भर के लिए प्रेरक, उन्नायक व उन्नति-कारक भारतीय-सभ्यता के अज्ञानान्धकार में डूब जाने से सारे विश्व इतिहास का ही यह एक अन्धकार-मय काल रहा | जिसमें विश्व भर में सभ्यता का कोई विकास नहीं हुआ| विश्व भर में छोटे-छोटे स्थानीय स्वायत्तशासी राज्य बच गए थे जो आपस में वर्चस्व व धन के लिए युद्ध किया करते थे, शासक प्रायः निरंकुश व अत्याचारी, विलासी थे, धर्माडंबर, दास-प्रथाएं आदि विभिन्न कुप्रथाएँ फ़ैली हुईं थीं | सारा योरोप लौहयुग में स्थित था| शासक अपने व्यक्तिगत लाभ-हानि एवं आडम्बर हेतु गुलामों से बड़े बड़े निर्माण आदि कराया करते थे | बेबीलोन, असीरिया, मेसोपोटामिया, मिस्र आदि देश अपने अपने में ही स्थित थे | भारत में भी लगभग यही स्थिति थी| स्थानीय स्तरों पर कला व साहित्य, मूर्तिकला व विज्ञान में खोजें भी होती रहीं परन्तु सभी मानव जाति अज्ञानान्धकार के आडम्बर वे आपसी युद्धों आदि में लिप्त रही | सामाजिकता व बाह्य जगत से महत्वपूर्ण संबंधों आदि का अधिक ज़िक्र नहीं मिलता |

.......अंतत लगभग ६००-५०० ई.पू में नई-सभ्यता के चिन्ह प्राप्त होते हैं|

नई सभ्यताओं का विकास( मध्यकाल )

भाषा व लेखन के आविष्कार--- ने जटिल समाजों के विकास को सक्षम बनाया था | मिट्टी की तख्तियों, लौह-पत्र, ताम्र-पत्र, शिला-लेख, चर्म, सिल्क एवं भोज-पत्र का लेखन हेतु उपयोग ने प्राचीन ग्रंथों व ज्ञान के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी | वैदिक युग से महाभारत-काल तक विश्व व भारतीय सभ्यता के स्वर्ण-काल में संस्कृत भाषा व भोजपत्रों पर लिखित ग्रंथों का सभ्यता के विकास में अति-महत्वपूर्ण योगदान था |

महाभारत काल- (५५००-३००० ईपू ) के पश्चात पुनः लगभग ६००-५०० ई.पू. में विज्ञान के प्राचीन रूप में विभिन्न विषय विकसित हुए जो मानव के सुख-सुविधा के हेतु बने | भाषा व लेखन के आविष्कार ने साहित्यिक कृतियाँ इलियड, ओडिसी आदि की रचना में सहयोग दिया | भारत में पाणिनि ने संस्कृत भाषा का व्याकरण रचना कोष की रचना की, योरोप में रोम साम्राज्य का उत्थान, जराथ्रुश्त्र धर्म, भारत में बौद्ध व जैन धर्म का उदय, वैशाली में विश्व का प्रथम गणराज्य की स्थापना, ओलम्पिक खेलों का प्रारम्भ के साथ विविध विकास प्रारम्भ हुए|

साम्राज्यों का विकास ---महाभारत काल- (५५००-३००० ईपू ) के पश्चात पुनः लगभग ६००-५०० ई.पू. में नई सभ्यताओं का उदय हुआ, जो एक दूसरे के साथ व्यापार किया करतीं थीं और अपने इलाके व संसाधनों के लिये युद्ध किया करतीं थीं| ६००-500 ईपू के आस-पास, मध्य पूर्व, इरान, भारत, चीन, योरोप, मध्य-एशिया और ग्रीस, मिस्र में लगभग एक जैसे साम्राज्य थे जो आपस में एक दूसरे से युद्ध में हारते व जीतते रहते थे और देशों के अधिकार क्षेत्र व् सीमा-क्षेत्र घटते व बढ़ते रहते थे | युद्ध के कारण मूलतः व्यापार या प्रयोगार्थ संसाधन हुआ करते थे| कभी-कभी व्यक्तिगत झगड़े व स्त्रियाँ भी |

विश्वविद्यालयों (प्राचीनतम शिक्षा केन्द्रभारतीय वि.वि. तक्षशिला व नालंदा थे ) द्वारा ज्ञान के प्रसार को सक्षम बनाया गया | पुस्तकालयों के उद्भव ने ज्ञान के भण्डार का कार्य किया और ज्ञान व जानकारी के सांस्कृतिक संचरण को आगे बढ़ाया | भारत में इस काल में एक पुनर्जागरण हुआ जिसके कारण इस युग में भी भारत व भारतीय-सभ्यता विश्व में सिरमौर बन चुकी थी| अब मनुष्यों को अपना सारा समय केवल अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये कार्य करने में खर्च नहीं करना पड़ता था- जिज्ञासा और शिक्षा ने ज्ञान तथा बुद्धि द्वारा नई-नई खोजों की प्रेरणा दी

आधुनिक विज्ञान का युग

प्रथम शताब्दी में कागज़ के आविष्कार (१०५ ई...त्साई लूँ ..चीन का हान-साम्राज्य ) व चौथी शताब्दी से पूर्ण प्रचलन में आने पर एवं मुद्रण-कला (१४३९ई...जर्मनी के गुटेनबर्ग द्वारा ) के आविष्कार से ज्ञान-विज्ञान व उसका संरक्षण तेजी से बढ़ा |

चौदहवीं सदी में, धर्म, कला व विज्ञान में तेजी से हुई उन्नति के साथ ही इटली से पुनर्जागरण काल ( रेनेशां ) का प्रारम्भ हुआ जो पूरे योरोप में फ़ैल गया| पुनर्जागरण सचमुच वर्तमान युग का आरंभ है। सन 1500 ई. में वास्तव में यूरोपीय सभ्यता की नवीनीकरण की शुरुआत हुई, जिसने वैज्ञानिक तथा औद्योगिक क्रांतियों को जन्म दिया, जिसके बल पर उस महाद्वीप द्वारा पूरे ग्रह पर फैले मानवीय समाजों पर राजनैतिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाने के प्रयास से सन 1914 से 1918 तथा 1939 से 1945t तक, पूरे विश्व के देश विश्व-युद्धों में उलझे रहे |

यह वास्तव में योरोप द्वारा उच्च-ज्ञान,उन्नत-सभ्यता व सुस्संकारिता का प्रथम स्वाद था जो भारतीय ज्ञान-विज्ञान, लूटे हुए शास्त्रादि-पुस्तकें व अकूत धन, खजाने आदि .. के अरब व्यापारियों, मुस्लिम आक्रान्ताओं व अन्य योरोपीय व ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा मध्य-एशिया से योरोप तक फैलाये जाने से प्राप्त हुआ| जिनके आधार पर व प्रकाश में योरोप में वैज्ञानिक नवोन्नति व औद्योगिक क्रान्ति हुई|

सांस्कृतिक दृष्टि से यह युग अधि-भौतिकता के विरुद्ध भौतिकता का एवं मध्ययुगीन सामंती अंकुशों-अत्याचारों से व्यथित समाज द्वारा सामाजिक अंकुशों के विरुद्ध व्यवस्था है। यह कथित रूप में व्यक्तिवाद व अंधविश्वास के विरुद्ध विज्ञान के संघर्ष का युग था |

यह भारतीय प्रभाव में यूनानी और रोमन शास्त्रीय विचारों के पुनर्जन्म का काल था | परन्तु भारतीय ज्ञान-विज्ञान के दर्शन व धर्म से समन्वय नीति को न समझ पाने के कारण पुनर्जागरण के साथ प्रक्षन्न मानववाद भी पनपा| अर्थात लौकिक मानव के ऊपर अलौकिकता, धर्म और वैराग्य को महत्व नहीं चाहिए। जिसने अंत में उसी व्यक्तिवाद को जन्म दिया जिसके विरुद्ध विज्ञान का संघर्ष प्रारम्भ हुआ था| इसने एक नए शक्तिशाली मध्यवृत्तवर्ग को भी जन्म दिया, बौद्धिक जीवन में एक क्रांति पैदा की। पुनर्जागरण और सुधार आंदोलन दोनों पाश्चात्य प्राचीन पंरपराओं से प्रेरणा लेते थे, और नए सांस्कृतिक मूल्यों का निर्माण करते थे।

18वीं शताब्दी तर्क और रीति का उत्कर्षकाल व पुनर्जागरण काल की समाप्ति है। तर्कवाद और यांत्रिक भौतिकवाद का विकास हुआ| धर्म की जगह, मनुष्य के साधारण सामाजिक जीवन, राजनीति, व्यावहारिक नैतिकता इत्यादि पर जोर | यह आधुनिक गद्य के विकास का युग भी है। दलगत संघर्षों, कॉफी-हाउसों और क्लबों में अपनी शक्ति के प्रति जागरूक मध्यवर्ग की नैतिकता ने इस युग में पत्रकारिता को जन्म दिया।-

19वीं शताब्दी में ---रोमैंटिक युग में फिर व्यक्ति की आत्मा का उन्मेषपूर्ण और उल्लसित स्वर सुन पड़ता है| तर्क की जगह सहज गीतिमय अनुभूति और कल्पना; अभिव्यक्ति में साधारणीकरण की जगह व्यक्तिनिष्ठता, नगरों के कृत्रिम जीवन से प्रकृति और एकांत की ओर मुड़ना स्थूलता की जगह सूक्ष्म आदर्श और स्वप्न, मध्ययुग और प्राचीन इतिहास का आकर्षण;  मनुष्य में आस्था | विक्टोरिया के युग में जहाँ एक ओर जनवादी विचारों और विज्ञान पर अटूट विशवास जन्म हुआ वहीं क्रान्तिवादिता का भी जन्म हुआ|

20वीं शताब्दी---- फासिज्म, रूस की समाजवादी क्रांति, समाजवाद की स्थापना और पराधीन देशों के स्वातंत्र्य संग्राम; प्रकृति पर विज्ञान की विजय व नियंत्रण से सामाजिक विकास की अमित संभावनाएँ और उनके साथ व्यक्ति व जीवन की संगति-समन्वय की समस्यायें- अति-भौतिकतावाद से उत्पन्न..पर्यावरण, प्रदूषण, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, अनाचार, स्वच्छंदता आदि...भी उत्पन्न हुईं । व्यक्तिवादी आदर्श का विघटन तेजी से हुआ अतः यौन कुंठाओं के विरुद्ध भी आवाज उठी। जिसमें चिंता, भय और दिशाहीनता और विघटन की प्रवृत्ति की प्रधानता है।

फिर से भारत -----भारतीय दृष्टि से अंधकार-युग के पश्चात विश्व के सामंती युग का प्रभाव भारत पर भी रहा| अपनी सांस्कृतिक धरोहर की विस्मृति से उत्पन्न राजनैतिक अस्थिरता के कारण उत्तरपश्चिम की असभ्य व बर्बर जातियों के अधार्मिक, खूंखार व अनैतिक चालों से देश गुलामी में फंसता चला गया| योरोप के पुनर्जागरण से बीसवीं शताब्दी तक विश्व के सभी देश भारत पर अधिकार को लालायित रहे एवं योजनाबद्ध तरीकों से भारतीय पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों, शैक्षिक केन्द्रों, संस्कृति का विनाश

व प्राचीन शास्त्रों की अनुचित व्याख्याओं द्वारा उन्हें हीन ठहराने के प्रयत्नों में लगे रहे| जिसमें असत्य वैज्ञानिक, दार्शनिक, व साहित्यिक तथ्यों का सहारा भी लिया जाता रहा, ताकि भारतीय अपने गौरव को पुनः प्राप्त न कर पायें एवं उनका साम्राज्य बना रहे| परन्तु १९ वीं सदी में भारतीय नव-जागरण काल प्रारम्भ हुआ और स्वतन्त्रता युद्ध द्वारा १९४७ ई. में विदेशी दासता के जुए को उतार कर भारत एक बार फिर अपने मज़बूत पैरों पर उठ खडा हुआ है अपने समर्थ, सक्षम, सुखद अतीत के ज्ञान-विज्ञान को नव-ज्ञान से समन्वय करके अग्रगण्य देशों की पंक्ति में |

समाज का वैश्वीकरण

प्रथम विश्व युद्ध (१९१४१९१८ ) के बाद स्थापित लीग ऑफ नेशन्स विवादों को शांतिपूर्वक सुलझाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना की ओर पहला कदम था. जब यह द्वितीय विश्व युद्ध को रोक पाने में विफल रही, तो इसका स्थान संयुक्त राष्ट्र संघ ने ले लिया| द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद विश्व क्षितिज पर नई शक्ति अमेरिका का उदय हुआ जो संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय भी बना| 1992 में, अनेक यूरोपीय राष्ट्रों ने मिलकर यूरोपीय संघ की स्थापना की. परिवहन व संचार में सुधार होने के कारण, पूरे विश्व में राष्ट्रों के राजनैतिक मामले और अर्थ-व्यवस्थाएं एक-दूसरे के साथ अधिक गुंथी हुई बनतीं गईं. इस वैश्वीकरण ने अक्सर टकराव व सहयोग दोनों ही उत्पन्न किये हैं, जो विभिन्न द्वंद्वों को जन्म देते रहते हैं |

कम्प्युटर युग--

बीसवीं सदी से प्रारम्भ, वर्त्तमान इक्कीसवीं सदी में कम्प्युटर व सुपर-कम्प्युटर के विकास ने मानव व सभ्यता के सर्वांगीण विकास को को नई-नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है | आज मानव सागर के अतल गहराइयों से लेकर आकाश की अपरिमित ऊंचाइयों को छानने में सक्षम है और मानव व्यवहार के दो मूल क्षेत्र विज्ञान व अध्यात्म दोनों ही को यदि अतिवाद से परे ..समन्वित भाव में प्रयोग-उपयोग किया जाय तो वे भविष्य में एक महामानव के विकास की कल्पना को सत्य करने में सक्षम हैं | जो शायद आपसी द्वेष-द्वंद्वों से परे व्यवहार कुशल-सरल व प्रेममय मानव होगा |

सायबॉर्ग या कम्प्युटर मैन..... की कल्पना ... सायबॉर्ग ऐसे काल्पनिक मशीनी मानव हैं, जिनका आधा शरीर मानव और आधा मशीन का बना होता है। ऐसे मानव विज्ञान के क्षेत्र और विज्ञान गल्प में दिखाये जाते हैं | इस शब्द का प्रयोग बाहरी अंतरिक्ष में मानव-मशीनी प्रणाली के प्रयोग के संदर्भ किया जाता है | इस प्रकार सायबॉर्ग की परिकल्पना एक ऐसे जीवित मानव या अन्य प्राणी की है जिसमें तकनीक के कारण कुछ असाधारण क्षमताएं उपलब्ध होती हैं।

विज्ञान कथाओं और फिल्मों में सायबॉर्ग के संबंध में मानवीय और मशीनी अंतर्द्वद्व को दर्शाया गया है। कथा-जगत और फिल्मों में दिखाए जाने वाले सायबॉर्ग प्रायः मानवों से बिल्कुल अलग अधिकतर योद्धाओं की छवि वाला दिखाया जाता है। इसके अतिरिक्त बौद्धिक स्तर पर भी वे मानव से बेहतर दिखाए जाते हैं।

साइबर मानव प्रणाली ( सी एच एस ) अनुसंधान.....मानव केंद्रित कंप्यूटिंग के ज्ञान और अभ्यास और परिणामों का निर्माण करने के लिए अनुभवजन्य तरीकों में निहित है| यह कंप्यूटिंग प्रौद्योगिकी और मानव जीवन और समाज लगातार प्रक्रिया में एक दूसरे को बदलने, सह विकसित, संभावित परिवर्तनकारी और विघटनकारी विचारों, सिद्धांतों को और आगे बढ़ाने के व्यापक लक्ष्य के साथ मनुष्य और कंप्यूटिंग के बीच जटिल संबंधों और हमारी समझ दोनों में तेजी लाने, मानव क्षमताओं, अवधारणात्मक और संज्ञानात्मक, शारीरिक और सामाजिक प्रगति के अनेक रूप प्रदर्शित करता है|

व्यक्ति को युक्ति से, सामाजिक रूप से बुद्धिमान कम्प्यूटिंग के लिए, व्यापक नेटवर्किंग द्वारा समर्थित बड़े, विकसित, विषम सामाजिक, तकनीकी प्रणालियों के लिए तैयार करना | उनके प्रदर्शन में सुधार के लिए अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने, मानव-भलाई के कार्यों के विचारों में सुधार ,रचनात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ाने के लिए उन्हें शक्ति प्रदान करना, एक डिवाइस या वातावरण के माध्यम से व्यक्ति मानव क्षमताओं को बढ़ाना ,समाज के सामंजस्य, नवीनता, सुरक्षा और स्थिरता के लिए कंप्यूटिंग का उपयोग करने वाले सिस्टम को विक्सित करना |

चित्र--१..यंत्र मानव...

इस प्रकार यह एक एसे मानव के निर्माण की कल्पना है जो अधिक सामाजिक, समझदार, भलाई के कार्यों व दायित्व को वहन करने वाला, कुशल एवं एक स्वस्थ, सबल द्वंद्व हीन समाज के निर्माण की आधार शिला रखने वाला होगा, तथा भविष्य में एक महामानव के विकास की कल्पना को सत्य करने हेतु एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध होगा, यदि हम वास्तव में ही विज्ञान व अध्यात्म दोनों ही के दुरुपयोग से बचें एवं अतिवाद से परे ..समन्वित भाव में प्रयोग-उपयोग कर सकें |

चित्र २ - आधुनिक मानव का सामाजिक विकास

-----------चित्र-गूगल साभार ....

सन्दर्भ....

1-The age of earth... .Donlrymps  G S, Newman williyam.et el. US geological society 1997.

2.-evidence for Ancient bombardment on earth…by Robert rock

3-Evolution of fossils & plants…Taylor et el.

4-Origin of earth & moon.. NASA .by  Taylor

5-Did life come from another world?... wanflesh david  etc scientific American press.

6-cosmic evolution…tufts university by cherssan eric

7-Trends in ecology & evolution…Xiao S, lafflame S…

8-A natural history of first 4 Billions of life on earth New york nature & earth by  Forggy and Richmand…

9- First step on land….mac newton, Robert B and Jeniffer M..

10-The mass Extinction.... science Aug 05…

11- पृथ्वी का इतिहास एवं चन्द्रमा की उत्पत्ति व विशाल संघात अवधारणा…..विकीपीडिया

१२- भारत कोश ..

13. सायबॉर्ग : एवोल्यूशन ऑफ द सुपरमैन  … डी.एस. हेलेसी

-----क्रमश भाग-४..भविष्य का महामानव ( अंतिम) ..अगले अंक में ...

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