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August, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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सूर्यकांत मिश्रा का शिक्षक दिवस विशेष आलेख - “गुरू” से “सर” तक की यात्रा के बीच

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“गुरू” से “सर” तक की यात्रा के बीच
-: शिक्षक दिवस का औचित्य :-
    वर्तमान समय शिक्षा और शिक्षकों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं माना जाना  चाहिए । शिक्षा और शिक्षकों के बदले स्वरूप ने वास्तव में पुरातन पद्धतियों पर अपनी प्रतिष्ठा कायम की है या फिर आधुनिकता और व्यवसायिक दृष्टिकोण वाले इस युग ने शिक्षा के साथ शिक्षकों के महत्व पर सवाल खड़ा कर दिया है ? यह एक गंभीर मुद्दे के रूप में दिखायी दे रहा है । जहाँ शिक्षा पहले दान और संस्कारों का पर्याय मानी जाती थी वही आज के विलासितापूर्ण जीवन में शिक्षा इन दोनो व्यवहारिक दृष्टिकोणों से दूर कहीं भटक चुकी है। शिक्षकों के विषय में भी कुछ ऐसी ही दृश्य हमारी नजरों की सामने दिन प्रति दिन अलग-अलग रूप में आकर शिक्षकों के उस पुराने योगदान के साथ अस्वाभाविक तुलना के लिए विवश कर रहा है। शिक्षकों की जरूरत अनादिकाल से समाज की सर्वोपरीमाँग रही है। आज के समय में भी इसे कमतर आँकना हमारी भूल हो सकती है। इतना अवश्य है कि “गुरू” से “सर” तक की अविराम यात्रा में कहीं न कहीं हमारा गुरूत्व दूषित हुआ है और हम पर अंग्रेजियत की जो परत चढ़ी है उसने हमें गुरू के लिवा…

लता सुमन्त तथा मनोज 'आजिज़' की लघुकथाएँ

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आत्मविश्वास
                                                       डॅा.लता सुमन्त
     बेटे के कहने पर बाबा ने अपना 35 साल पुराना नौकरी का गाँव छोड़ा था. अब तक आपने बहुत श्रम किये.अब आप केवल आराम करेंगे.केवल बेटे की बातों पर विश्वास न करके उन्होंने बहू से भी पूछा - हम तुम्हारे साथ रहें उसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं?परंतु निशीता को किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति न थी.
       बहू और बेटे के साथ नये फ्लेट में उनके तीन साल बहुत ही आनंदोल्लास और चैन से गुजरे.जो वे समझ भी न पाए.प्रेम से बातें करना,बहू की सराहना करना,उसे सम्मान देना, हर कार्य में उसे सहकार देना आदि.माँ - बाबा की तरह ही प्यार करनेवाले तथा उसकी भावनाओं की कद्र करनेवाले थे उसके सास - ससुर.उसके मन के हर पल की जैसे उन्हें खबर रहती थी.निशीता को जैसे एक माँ - बाबा के छूटने पर दूसरे,सास - ससूर, माँ - बाबा की जगह मिल गए थे.उसे माँ - बाप की कमी कभी महसूस नहीं हुई थी.
          बडे जेठ, जेठानी, नंद सभी लोग बहुत ही और हमेशा उसकी सराहना करनेवाले थे.प्रेम की कमी न थी और अपनापन पारावार था.अपनी निशीता पढी - लिखी,सहृदयी और नम्र है.इस बात की हर…

नन्दलाल भारती की कहानी - इकलौती बहू

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इकलौती बहू/कहानीचिन्‍ताप्रसाद कुल जमा चौथी जमात तक पढ़े थे पर खानदानी चालाक थे। चिन्‍ताप्रसाद के पुरखों ने कमजोर वर्ग के लोगों को भूमिहीन बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। अंग्रेजों के जमाने में भूमिका लेखा -जोखा रखना इनका खानदानी पेशा था पर आजादी के बाद सब कुछ सरकार की अधीनस्‍थ हो गया। नौकरी के लिये इश्‍तहार निकलने लगे। नौकरी के लिये कोई भी आवेदन कर सकता था,पढ़े- लिखे नवयुवक ने परम्‍परागत्‌ एकाधिकार को पटकनी दे दी। चिन्‍ताप्रसाद पैतृक व्‍यवसाय हाथ नहीं लगने की उम्‍मीद खत्‍म हो गयी थी। वे बचपन में शहर की ओर भाग चले थे । शहर में आने के बाद उन्‍हें नौकरी के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ा। जैसे नौकरी उनकी इन्‍तजार कर रही थी। कालेज की कैन्‍टीन में चिन्‍ताप्रसाद को काम मिल गया। तनख्‍वाह के साथ खाना रहना मुफ्‌त मिलने लगा। चिन्‍ताप्रसाद की तनख्‍वाह सूखी बच जाती थी। साल भर के चिन्‍ताप्रसाद की नौकरी पक्‍की हो गयी थी। वह हर दूसरे महीने बूढे़ मां-बाप को मनिआर्डर भेजने का नियम बना लिया। चिन्‍ताप्रसाद के घर हर दूसरे महीने मनिआर्डर की रकम लेकर डाकिया आता। डाकिया आसपास के गांवों में चिन्‍ताप्रसाद की जिक्र …

पुस्तक समीक्षा - अजनबी मौसम से गुजरकर

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पुस्‍तक समीक्षा पुस्‍तक ः अजनबी मौसम से गुजरकरलेखक ः विनोद कुमारप्रकाशकः प्रकाशन संस्‍थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्‍ली-110002मूल्‍य ः 150/-अजनबी मौसम से गुजरकर पंद्रह कहानियों का संग्रह है जो लंबे अंतराल पर लिखी गयी है. पुस्‍तक के लेखक विनोद कुमार कवि, नाटककार, निर्देशक एवं अभिनेता भी है जिनकी हिन्‍दी और अंग्रेजी में ग्‍यारह पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा चार पुस्‍तकें प्रकाशनाधीन है. आकाशवाणी दूरदर्शन से पचास से ज्‍यादा नाटक प्रसारित होते रहे हैं तथा पंद्रह नाटकों का देश के विभिन्‍न नगरों-महानगरों में लगभग 150 बार मंचन एवं प्रदर्शन हो चुका है. लेखक विनोद कुमार फिल्‍म ‘आक्रांत' के लेखक और निर्देशक भी है जिसका प्रीमियर दूरदर्शन के राष्‍ट्रीय चैनल पर हो चुका है जो टाइम वीडियो पर उपलब्‍ध है. इसके अतिरिक्‍त लेखक झारखंड़ केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय, राँची में अंग्रेजी केन्‍द्र के अघ्‍यक्ष एवं भाषा स्‍कूल के डीन है. लेखक ने पुस्‍तक के प्रस्‍तावना में लिखा है कि पुस्‍तक में संग्रहित कहानियाँ आज के समय की पड़ताल करती हुई उस आदमी का आकलन करती है जो खुद अपने आपसे और व्‍यवस्…

दिलीप भाटिया का आलेख - अहा! बचपन

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अहा! बचपन प्रार्थना,तुम्‍हारी मम्‍मी से जब मैं स्‍मार्टफोन के फीचर्स सीख रहा था, तो तुम्‍हारी प्रतिक्रिया थी, ‘‘नानू, आपके माम डेड ने नहीं सिखाया था क्‍या ? ‘‘मेरे उत्तर‘‘उस समय ये सब नहीं थे‘‘। पर तुम्‍हारी जिज्ञासा थी कि मेरा बचपन कैसा था ? तुम्‍हें होस्‍टल जाना था, इसलिए आज तुम्‍हें इस पत्र के माध्‍यम से अपने बचपन की एक झलक भर दिखलाने का प्रयास कर रहा हूँ।माम को अम्‍मा, डेड को बाबूजी, सिस को दीदी, ब्रो को भैया, आंटी को मौसी चाचीजी, अंकल को ताऊजी चाचाजी, काम वाली बाई को काकी, नानू को नानाजी, दादू को दादाजी कहते थे। साइकिल से स्‍कूल जाते समय हेलमेट नहीं पहनना होता था, टी.वी. नहीं होने से अम्‍मा बाबूजी के पास हमारे लिए समय होता था, स्‍कूल से आने के पश्‍चात गली में साथियों के साथ खेलते थे, इसलिए हमें फेसबुक फे्रन्‍डस की आवश्‍यकता नहीं थी। दादी की मठरी इतनी स्‍वादिष्‍ट होती थी कि हमें मेगी, पीजा की कमी महसूस नहीं होती थी। लालटेन की हल्‍की रोशनी में पढ़ने पर भी हमें चश्‍मा नहीं लगा, प्‍लेट भर चावल मिठाई खाने पर भी हमें मोटापे की बीमारी नहीं लगी, कुऐं नल का पानी भी हमें स्‍वस्‍थ रखता था। …

सुभाष चन्द्र लखेड़ा की तीन लघुकथाएँ - " जय जवान " , " रिश्तेदार ", और " बेताल का सवाल "

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जय जवान        इस घटना से जुड़े सभी नाम छुपाते हुए मैं एक सच्चा किस्सा बयां कर रहा हूँ। आर्मी में भर्ती के लिए प्रत्याशियों को कुछ मनोवैज्ञानिक सवालों  से भी गुजरना पड़ता है। कोई 20 - 21 वर्ष  पहले एक मीटिंग के दौरान एक वरिष्ठ व्यक्ति ने जब शीर्षस्थ पद पर आसीन एक अधिकारी को बताया  कि उनके विभाग ने प्रत्याशियों को परखने के लिए जो नई मनोवैज्ञानिक प्रश्नावली तैयार की है, वह बहुत ही त्रुटिहीन है तो शीर्षस्थ पद पर आसीन  उस अधिकारी ने हम सभी को अपना एक अनुभव सुनाया। कुछ समय पहले उनके ड्राइवर ने उनसे आग्रह किया था कि वे उसके बेटे मंजीत  को फ़ौज  में भर्ती करवाने की कृपा करें। उन्होंने उसी समय ड्राइवर द्वारा बताये गए भर्ती केंद्र के मुखिया को फोन पर मंजीत की मदद करने को कहा। तीन - चार  दिन बाद भर्ती केंद्र के मुखिया ने खेद प्रकट करते हुए उन्हें सूचना दी कि मंजीत फ़ौज के लिए फिट नहीं पाया गया।         खैर, यही कोई छह महीने बाद उनका ड्राइवर मिठाई का डब्बा लिए उनके कमरे में दाखिल होते हुए बोला - साहब, मंजीत भर्ती हो गया है। " डब्बे  से मिठाई का टुकड़ा उठाते हुए जब  उन्होंने ड्राइवर को थोड़ा कुरेद…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - ऐसे आचरण पर हमारी खामोशी आखिर क्यों ?

ऐसे आचरण पर हमारी खामोशी आखिर क्यों ?डॉ.चन्द्रकुमार जैन देश की राजधानी में एक युवती के साथ चलती बस में बलात्कार की घटना कीचर्चा जमकर हुई थी। निर्भया का मामला अब संवेदना और प्रतिक्रिया से ज्यादाप्रचार के रूप मेंढल-सा गया मालूम पड़ता है।संसद में हर दल की ओर से इस पर चिन्ताव्यक्त की गयीऔर बलात्कार के अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा का कानून बनाने के सुझाव भी दिए गए।पहल भी हुई। लेकिन अफ़सोस है कि  21 वीं सदी में इन पुराने पड़ चुके सुझावों पर चर्चाका दौर आज भी लगातार चल रहा है।देश में यह अपने किस्म का अलहदा विरोध प्रदर्शन कहा जा सकता है। फिर भी, बात सिर्फ अनाचार या दुराचार की नहीं, देश में ऐसे न जाने कितने मामले हैं जिन्हें सीधे या प्रकारांतर से दुराचार की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए लेकिन जिन्हें लेकर हम न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, ना ही ऐसे आचार-व्यवहार के अँधेरे को चीरने वाली कोई किरण तलाशते हैं। सोचें आखिर ऐसा क्यों ? इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की कठोर सजा दी जानी चाहिये, लेकिन सजा तो घटना के घटित होने के बाद का कानूनी उपचार है। हम ऐसी व्यवस्था पर …

गोवर्धन यादव का आलेख - स्वामीनारायण अक्षरधाम की संस्कृति-तीर्थ यात्रा

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स्वामीनारायण अक्षरधाम (गोवर्धन यादव) स्वामीनारायण अक्षरधाम एक नूतन-अद्वितीय संस्कृति-तीर्थ है. भारतीय कला, प्रज्ञा और चिंतन का बेजोड संगम यहाँ देखा जा सकता है. भारतीय संस्कृति के पुरोधा, स्वामीनारायण संप्रदाय के संस्थापक श्री घनश्याम पाण्डॆ या सहजानन्दजी ( 1781-1830) की पुण्य स्मृतियों को समर्पित स्वामीनारायण अक्षरधाम के आकर्षण से प्रभावित होकर जन-सैलाब खिंचा चला आता है..और स्वामी के दर्शन कर अपने को अहोभागी मानता है. धर्म और संस्कृति को समर्पित इस महामानव ने अपने आपको तप की भट्टी में तपाया, ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित किया, और संचित पुण्यों को जनसाधारण के बीच समर्पित कर दिया. एक दिव्य महापुरुष योगीजी महाराज ने आशीर्वाद दिया था कि यमुना के पावन तट पर एक भव्य आध्यात्मिक महालय की स्थापना होगी, जिसकी ख्याति दिग-दिगन्त में होगी. गुणातीत गुरुपरंपरा के पांचवे गुरु/ संतशिरोमणी/ दिव्य व्यक्तित्व के धनी विश्ववंदनीय प्रमुखस्वामी महाराजजी ने अपने गुरु के . उस परिकल्पना को पृथ्वी- तल पर साकार कर दिखाया. स्वामिनारायण अक्षरधाम के निर्माण और संवहन का उत्तरदायित्व बी.ए.पी.एस.स्वामिनारायण संस्था ने पू…

अनिल कुमार पारा का आलेख - आखिर कब थमेगा भगदड़ का बवन्‍डर ?

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आखिर कब थमेगा भगदड़ का बवन्‍डर ? 25 अगस्‍त 2014 समय सुबह 6 बजे वही समय जब श्रृद्धालु सतना जिले में स्‍थित चित्रकूट के कामतानाथ स्‍वामी के मंदिर सहित कामदगिरी पर्वत परिक्रमा में बढ़चढ़कर भाग ले रहे थे, किसी ने यह नहीं सोचा था कि उनकी यह परिक्रमा आखिरी परिक्रमा होगी। और उनकी जिदंगी के सांसें चंद मिनटों में समाप्‍त हो जायेंगी। बस बचेगी तो हर तरफ पुकार-ही-पुकार चीख-ही-चीख जिसे कोई सुनने और समझने वाला नहीं होगा बस होगा तो वहां भागने वाला ही होगा, और आस्‍था के सैलाब के भगदड़ के बवन्‍डर में बस मिलेगी तो केवल आस्‍था के पुजारियों की लाशें ही लाशें जिनके फोटो खीचने वाले तो हजारों मिल जायेंगें पर उन जिदंगियों को सहारा देने वाला कोई नहीं मिलेगा। जी हॉं में बात कर रहा हूं मध्‍यप्रदेश के सतना जिले में भगवान राम की तपोस्‍थली कही जाने वाली चित्रकूट नगरी की जहॉं की भूमि ऋषियों और मुनियों के तप से पावन बन गई, माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने सीता और लक्ष्‍मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षों में से ग्‍यारह वर्ष इसी पावन भूमि पर बिताए थे। इसी भूमि पर ऋषि अत्रि और माता सती अनसुइया ने ध्‍यान लगया था। तथा ब…

पुस्‍तक समीक्षा - चौखड़ी जनउला

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पुस्‍तक समीक्षा विलुप्‍त होते शब्‍दों को सहेजने का उद्यम-‘‘चौखड़ी जनउला‘‘वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ भारतेन्‍दु हरिशचन्‍द्र ने लिखा है कि ‘निज भाषा उन्‍नति अहै, सकल उन्‍नति के मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के शूल‘ अपनी भाषा के प्रति प्रेमाभिव्‍यक्‍ति का इससे श्रेष्‍ठ उदाहरण अन्‍यत्र दुर्लभ है। सचमुच भाषा न केवल भावों के सम्‍प्रेषण का माध्‍यम भर है बल्‍कि मनुष्‍य के सोच-विचार, चिन्‍तन-मनन, स्‍वप्‍न और कल्‍पना का आधार भी है। भाषा हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है। अपनी मातृभूमि के प्रति उत्तरदायित्‍वों का बोध कराती है। पर ध्‍यान रहे, कोई भी भाषा अपनी सर्वश्रेष्‍ठता सिद्ध कर किसी को भी भाषायी विवाद में फँसने के लिए नहीं उकसाती बल्‍कि सबको समानता के साथ ‘सबके साथ, सबका विकास‘ का संदेश देती है। भाषा तो कल-कल, छल-छल बहती नदी के निर्मल धार के समान होती है जो अपने विकास यात्रा के पथ पर आने वाली अन्‍य भाषाओं के शब्‍दों को बड़ी आत्‍मीयता के साथ आत्‍मसात करके वृहद से वृहत्तर होती चली जाती है। लेकिन इस विराटता के कारण जब भाषा के प्राण तत्‍व सूखने लगते हैं अर्थात मूल भाषा के शब्‍द विलुप्‍त होने लगत…

लोकेश कुमार शर्मा का आलेख - डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र : व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व

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॥ ऊँ गं गणपतये नमः ॥ डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ः व्‍यक्‍तित्‍व और कृतित्‍व''जयन्‍ती पर विशेष'' शोधार्थी - लोकेश कुमार शर्मा जल - कण - सा छोटा जीवन,रज - कण - सी उसकी काया;सागर - सी आकांक्षाएँ,पर्वत - सी उसकी माया।(जीवन संगीत)जीवन की नश्‍वरता और उसकी आकांक्षाओं को सहज शब्‍द देने वाले डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र आधुनिक युग के लब्‍ध प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार हैं। सरस्‍वती के सफल आराधक डॉ. मिश्र की कालजयी कृतियां खड़ी बोली हिन्‍दी की समृद्ध धरोहर हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा ने लिखा है कि - ''पं. बलदेव प्रसाद मिश्र हिन्‍दी की उन विभूतियों में हैं जिन्‍होंने अपनी प्रतिभा का प्रकाश अज्ञात रूप से विकीर्ण किया है। साहित्‍य के सभी अंगों पर सफलतापूर्वक उत्‍कृष्‍ट कृतियों की सृष्‍टि कर उन्‍होंने हिन्‍दी की सेवा की है'' डॉ. मिश्र की कृतियों के अनुशीलन से यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि उन्‍होंने अपनी साहित्‍यिक प्रतिभा से हिन्‍दी साहित्‍य के विविध अंगों के भण्‍डार की श्रीवृद्धि की है। गद्य और पद्य पर उनका असामान्‍य अधिकार था, तथापि वे एक लब्‍धप्रतिष्‍ठित कवि के रूप में हमारे सामने आते ह…

हरीश कुमार की कविताएँ

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(1) जे एन यू के बाहर आज बड़े भाई साहब और होरी मिल गए कुशल क्षेम पूछा तो कहने लगे हमारी गर्दन अभी भी औरों के पाँव तले दबी है शिक्षा व्यवस्था अंग्रेज के आधीन हैं हम कई बार शिकायत लेकर आलोचकों, चिंतकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों और अनुवादकों के पास गये पर सब व्यस्त हैं शोध सेमीनार विदेश यात्रा से उत्पन्न यशोगान हेतु मठाधीशों की उपासना में प्रेमचंद औ दूसरे माइबाप उनकी पुस्तकों के काराग्रह में कैद है सर्वाधिकार सुरक्षित की बेड़ियां पहने मन चाहा लिखते हैं पुस्तकें छपवाते हैं परस्पर पीठ थपथपाते हैं क्रम से पुरस्कार पाते हैं सब जुगाड़ रस से परिपूर्ण है भैया गोबर औ छोटे वही डटे हैं कहते है आज प्रेमचंद को आजाद मैंने पूछा आप कहा जा रहे हैं बोले लमही से आ रहे हैं दिल्ली मुखर्जी नगर जा रहे हैं करवाना है (2) सत्य और शिव अनचीन्हे हुए सुन्दरता जीवित लगती है चलो इसी सहारे प्रेम उपजता रहे शेष मिल ही जायेंगे इसी मोड़ पर । (3) सत्य के कई पहलू होते हैं हर पहलू का अपना सत्य होता है प्रत्येक व्यक्ति अपने सत्य की स्थापना को ले सत्ता की और अग्रसर होता है (4) भगवा
केसरिया
बसंती
ला…

गोवर्धन यादव का आलेख - गणेश चतुर्थी के दिन चांद देखने की मनाही क्यों?

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भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रदर्शन-निषेधभाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष चतुर्थी सिद्धविनायक चतुर्दशी के नाम से विख्यात है. इस दिन संपूर्ण भारतवर्ष में श्रीगणेशजी की विधिवत स्थापना की जाती है. इसी दिन भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था. श्री गणेश हिन्दुओं के प्रथम पूज्य आराध्य देवता हैं. अपने भक्तों के कष्ट दूर करने में श्रीगणेश सक्षम देवता हैं. गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफ़लचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजमं इस तिथि में किया गया दान, स्नान, उपवास और पूजन-अर्चन श्रीगणेश की कृपा से सौ गुना हो जाता है., परन्तु इस दिन चन्द्रदर्शन से मिथ्या कलंक भी लगता है. अतः इस तिथि में चन्द्रदर्शन न हो, ऎसी सावधानी बरतनी चाहिए. इसी दिन भगवान श्रीकृष्णजी ने भी अकस्मात चन्द्रदर्शन कर लिए थे, इस चन्द्रदर्शन के कारन उन पर चोरी का आरोप लगा था. इस कथा से जुडा हुआ आख्यान जरुर पढा जाना चाहिए. द्वापर युग में द्वारिकापुरी में सत्राजित नामक एक यदुवंशी रहता था. वह सूर्यदेव का परम भक्त था. उसकी कठिन भक्ति से प्रसन्न हो, सूर्य ने उसे एक स्यमन्तक नामक मणि दी, जो सूर्य के समान ही कान्तिमान थी. वह …

पुस्तक समीक्षा - अजनबी मौसम से गुजरकर

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पुस्‍तक समीक्षा पुस्‍तक ः अजनबी मौसम से गुजरकरलेखक ः विनोद कुमारप्रकाशकः प्रकाशन संस्‍थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्‍ली-110002मूल्‍य ः 150/-अजनबी मौसम से गुजरकर पंद्रह कहानियों का संग्रह है जो लंबे अंतराल पर लिखी गयी है. पुस्‍तक के लेखक विनोद कुमार कवि, नाटककार, निर्देशक एवं अभिनेता भी है जिनकी हिन्‍दी और अंग्रेजी में ग्‍यारह पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी है तथा चार पुस्‍तकें प्रकाशनाधीन है. आकाशवाणी दूरदर्शन से पचास से ज्‍यादा नाटक प्रसारित होते रहे हैं तथा पंद्रह नाटकों का देश के विभिन्‍न नगरों-महानगरों में लगभग 150 बार मंचन एवं प्रदर्शन हो चुका है. लेखक विनोद कुमार फिल्‍म ‘आक्रांत' के लेखक और निर्देशक भी है जिसका प्रीमियर दूरदर्शन के राष्‍ट्रीय चैनल पर हो चुका है जो टाइम वीडियो पर उपलब्‍ध है. इसके अतिरिक्‍त लेखक झारखंड़ केन्‍द्रीय विश्‍वविद्यालय, रांची में अंग्रेजी केन्‍द्र के अघ्‍यक्ष एवं भाषा स्‍कूल के डीन है. लेखक ने पुस्‍तक के प्रस्‍तावना में लिखा है कि पुस्‍तक में संग्रहित कहानियां आज के समय की पड़ताल करती हुइर् उस आदमी का आकलन करती है जो खुद अपने आपसे और व्‍यव…

पुस्तक समीक्षा - मैं बस्तर बोल रहा हूँ

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पुस्‍तक समीक्षा सुलगती जमीं की कराहती आवाज -‘‘मैं बस्‍तर बोल रहा हूँ--‘‘ वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ शस्‍यश्‍यामला भारत भूमि के मानचित्र पर बस्‍तर की पहचान प्रकृति के गोद में बसे एक ऐसे भूखण्‍ड की रही है जो साल के सघन वृक्षों से आच्‍छादित है। जहाँ विश्‍व विख्‍यात कुटुम्‍बरसर की गुफा और च़ित्रकोट का जलप्रपात है। जहाँ माँ दन्‍तेश्‍वरी का पावन धाम है। डंकनी और शंखनी की धाराएं माँ दन्‍तेश्‍वरी के चरण पखारकर उसका यशोगान करती हुई धरा को अभिसिंचित कर उर्वरा बनाती है। जहाँ की धरती लोहा उगलती है। जहाँ महुए के मादक गंध के साथ वहाँ के निवासियों की जिन्‍दगी मांदर के थाप पर थिरकती है, नाचती और गाती है जहाँ का लोक संगीत आदिवासी दिलों की धड़कन और साँसों का सरगम है। पर न जाने किस मनहूस घड़ी में बस्‍तर के सुख और समृद्धि को किन स्‍वार्थी तत्‍वों की नजर लग गई कि बस्‍तर सुलगने लगा है। न जाने किन लोगों ने बस्‍तर के सीने में बारूद भर दिया है जो बस्‍तर आज लाल आतंक का पर्याय बन गया है। कब कहाँ धमाका हो जाए और इंसानी जिस्‍म के चिथडे़ उड़ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। गोलियों की सनसनाहट और भारी बूटों की आवाज से सहमकर पहाड़ी …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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