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राजीव आनंद की कहानी - दलित-हरिजन पैकेज

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कहानी दलित-हरिजन पैकेज विधानसभा चुनाव सर पर आ गया था․ नेताओं को अपने-अपने पार्टी हाईकमानों से गाँव दौरा का निर्देश मिल चुका था जिसमें शामिल था ‘दलित-हरिजन पैकेज'․ चुनाव के समय ही गाँवों के दिन फिरते है जब नेता लोग गाँव की रूख करते है वरना तो गाँव आधारित फिल्‍मों और धरावाहिकों के सीडी से ही नेता लोग काम चला लेते हैं․ खैर फिलहाल तो पवन पांडेय उर्फ पीपी को अपने विधानसभा क्षेत्र के गाँवों में जाकर दलित-हरिजन पैकेज पर काम करना था․ पीपी वैसे हैं तो छुटभैया नेता पर अपने को तोप से कम नहीं समझते हालांकि बीस सालों से पार्टी के बड़े नेताओं की चापलूसी करते आ रहे है पर विधायक या सांसद का टिकट तो दूर की बात है, नगरपालिका चुनाव के लिए भी टिकट हासिल करने में सफल नहीं हो सके हैं․ इस बार का विधानसभा चुनाव में अपने खालीश चापलूसी की पूंछ हिलाते-हिलाते टिकट तो हासिल कर लिया पीपी ने लेकिन दलित-हरिजन पैकेज पर गाँव जाकर कार्य करना अग्‍निपरीक्षा की तरह लग रहा था उसे․ बहरहाल पीपी अपने प्रिय चमचा दामोदर रजक उर्फ डीआर को लेकर विधानसभा क्षेत्रा के सभी गाँवों में जाने की योजना बना लिये थे․ डीआर पिछले पांच सालो…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - ताड़पत्र लेखन से श्रुत लेखन तक हिंदी की विकास-यात्रा

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ताड़पत्र लेखन से श्रुत लेखन तक हिंदी की विकास-यात्राडॉ.चन्द्रकुमार जैन  हमारी जनशक्ति देश की और हमारी हिन्दी की भी ताकत है। बहुत साल नहीं हुए जब हम अपनी विशाल आबादी को अभिशाप मानते थे। आज यह हमारी कर्मशक्ति मानी जाती है। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने सही कहा है: ‘अधिक आबादी अपने आप में कोई समस्या नहीं है, समस्या है उस की ज़रूरियात को पूरा न कर पाना। अधिक आबादी का मतलब है अधिक सामान की, उत्पाद की माँग। अगर लोगों के पास क्रय क्षमता है तो हर चीज़ की माँग बढ़ती है।’ आज हमारे समृद्ध मध्य वर्ग की संख्या अमरीका की कुल आबादी जितनी है। पिछले दिनोँ के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को भारत हँसते खेलते झेल गया तो उस का एक से बड़ा कारण यही था कि हमारे उद्योगोँ के उत्पाद मात्र निर्यात पर आधारित नहीँ हैँ। हमारी अपनी खपत उन्हें ताक़त देती है और बढ़ाती है। इंग्लिश-हिन्दी थिसारस द्वारा भारत में कोशकारिता को नया आयाम देने वाले अरविंदकुमार का मानना है कि इसे हिंदी भाषियोँ की और विकसित देशोँ की जनसंख्या के अनुपातोँ के साथ-साथ सामाजिक रुझानोँ को देखते हुए समझना होगा। दुनिया की कुल आबादी मेँ से हिंदुस्तान और …

चन्द्रकुमार जैन की पांच प्रेरक कविताएँ

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन की
पांच प्रेरक कविताएँ हौसला ================ काँटों से डरने वाले फूल-फल पा नहीं सकते तूफां से डरने वाले साहिल पा नहीं सकते स्वयं चूमती चरण मुसीबत जांबाजों की इस दुनिया में सफ़र से डरने वाले मंज़िल पा नहीं सकते।  सुबह =============== दो रातों के बीच सुबह है दोष न उसको देना साथी दो सुबहों के बीच रात भी एक ही जीवन में है आती ! आगत का स्वागत करना है विगत क्लेश की करें विदाई, शाम बिखरकर, सुबह जो खिलीं कलियाँ कुछ कहतीं मुस्कातीं ! पूजा ================ किसी के काम आ जाएँ अगर ये हाथ तो पूजा हुई ! किसी के दर्द में दो पल हुए गर साथ तो पूजा हुई ! माना कि प्रार्थना में होंठ रोज़ खुलते हैं मगर, आहत दिलों से हो गई कुछ बात तो पूजा हुई ! ख्वाहिश ================ क्यों यहाँ हर शख्स औरों में किसी की खोज में है ? ख़बर अपनी ही नहीं उसको न ही वह होश में है ! पाँव के नीचे ज़मीं चाहे न हो पर देखिए तो आसमां की बुलंदी छूने की ख़्वाहिश जोश में है ! ज़िंदगी ================ मिली हुई दुनिया की दौलत भूल न जाना माटी है ! हाथ न आई है जो अब तक दौलत वही लुभाती है ! लेकिन इस खोने-पाने की होड़-दौड़ भी …

चन्द्रकुमार जैन का चिंतन - टीस उसे उठती है जिसका भाग्य खुलता है !

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चिंतन -------------------टीस उसे उठती है जिसका भाग्य खुलता है !डॉ.चन्द्रकुमार जैन  घटना है वर्ष १९६० की. स्थान था यूरोप का भव्य ऐतिहासिक नगर तथा इटली की राजधानी रोम। सारे विश्व की निगाहें २५ अगस्त से ११ सितंबर तक होने वाले ओलंपिक खेलों पर टिकी हुई थीं। इन्हीं ओलंपिक खेलों में एक बीस वर्षीय अश्वेत बालिका भी भाग ले रही थी. वह इतनी तेज़ दौड़ी, इतनी तेज़ दौड़ी कि १९६० के ओलंपिक मुक़ाबलों में तीन स्वर्ण पदक जीत कर दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बन गई. रोम ओलंपिक में लोग ८३ देशों के ५३४६ खिलाड़ियों में इस बीस वर्षीय बालिका का असाधारण पराक्रम देखने के लिए इसलिए उत्सुक नहीं थे कि विल्मा रुडोल्फ नामक यह बालिका अश्वेत थी अपितु यह वह बालिका थी जिसे चार वर्ष की आयु में डबल निमोनिया और काला बुखार होने से पोलियो हो गया और फलस्वरूप उसे पैरों में ब्रेस पहननी पड़ी। विल्मा रुडोल्फ़ ग्यारह वर्ष की उम्र तक चल-फिर भी नहीं सकती थी लेकिन उसने एक सपना पाल रखा था कि उसे दुनिया की सबसे तेज़ धाविका बनना है। उस सपने को यथार्थ में परिवर्तित होता देखने वे लिए ही इतने उत्सुक थे पूरी दुनिया वे लोग और खेल-प्रेमी. डॉक्टर …

राजीव आनंद की लघुकथाएँ - अनवर चाचू तथा मातमी कौन

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लघुकथा अनवर चाचूकाम का जैसे जुनून सवार रहता अनवर पर, बस आप काम बोलिए, वह करने को तत्‍पर। आलस तो उससे कोसों दूर भागती। अनवर गरीब जरूर था लेकिन उसे रूपए-पैसे से मोह नहीं था। वह रईस दिलजान अहमद के किराना स्‍टोर में काम करता था। मालिक जब उसे तनख्‍वाह देता तो देने के पहले कई बार थूक लगा-लगा कर गिनता पर अनवर के हाथ में आते ही वह बिना गिने रूपए रख लेता और या तो काम में लग जाता या घर जाने के लिए निकल पड़ता। दिलजान अहमद जब अकेले होते तो सोचते कि जितनी तनख्‍वाह वह अनवर को देते, उससे दुगनी रकम के वे अनवर के कर्जदार हो जाते। जितना काम अनवर करता है उसे तय तनख्‍वाह से अधिक मिलना ही चाहिए लेकिन यह दिलजान अहमद के सोच तक ही रही कभी हकीकत न बन पायी। अनवर न सिर्फ दुकान का काम करता बल्‍कि फल-सब्‍जी वगैरह भी ला देता, बच्‍चों को स्‍कूल भी ले जाता और ले आता। दिलजान का दिल होता था कि वह अनवर से उसके बाल-बच्‍चों के बारे में भी पूछे लेकिन दिलजान की दिल की बात दिल में ही रह जाती। दुकान चलाने में इतनी व्‍यस्‍तता होती कि वह अनवर से कभी यह नहीं पूछ पाया कि उसके बाल-बच्‍चे स्‍कूल भी जाते है या नहीं ? अनवर जब माल…

गीता दुबे की कहानी - आतिफ हुसैन से अखिलेश साहू

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गीता दुबे कहानी - आतिफ हुसैन से अखिलेश साहू “हलो तिवारी जी, जमशेदपुर से हरीश शुक्ला बोल रहा हूँ।” ‘हाँ सर कहिए, क्या सेवा कर सकता हूँ’---- उधर से तिवारी जी ने जवाब में कहा। “कल स्टील एक्सप्रेस से हावड़ा पहुँच रहा हूँ, गाड़ी चाहिए थी।” ‘ठीक है,मिल जाएगी,कौन सी गाड़ी लेंगे?’ “इस बार बड़ी गाड़ी इनोवा दीजीएगा, हम छह लोग हैं” ‘ठीक है सर, लेकिन आप हावड़ा उतरने के बजाए पहले वाली स्टेशन ‘संतरागाछी’ उतर जाइयेगा, वहीँ से हमारा ड्राइवर आपको पिक कर लेगा। हावड़ा में गाड़ी को लाइन पर आते-आते काफी समय लग जाता है। मैं इनोवा का नंबर और ड्राइवर का मोबाईल नंबर SMS कर देता हूँ’ कहकर तिवारी जी ने फोन रख दिया। कोलकाता में तिवारी जी की करीब एक दर्जन गाड़ियाँ चलतीं हैं। मिर्जापुर से रोजगार की तलाश में तिवारी जी कोलकाता आये थे। रोजगार न मिलने पर उन्होंने मारुती800 खरीदी और खुद ही ड्राइवर बन कोलकाता में गाड़ी चलाने का काम करने लगे। और आज पैंतीस वर्ष बाद तिवारी जी के पास सभी तरह की गाड़ियाँ इनोवा, इंडिका, ऐम्बेसडर, टवेरा, इंडिगो....... करीब एक दर्जन से भी ज्यादा गाड़ियाँ हैं, ड्राइवर हैं। बासठ वर्षीय तिवारी जी अब घर पर ही …

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - पाँच साहित्यिक सुभाषित

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पाँच साहित्यिक सुभाषित--------------------------------डॉ.चन्द्रकुमार जैन लेखक चेतना जगाता है-------------------------------एम.टी.वासुदेवन नायर लिखते हैं - साहित्य साक्षी होता है मानवीय दुर्गति का,न्यायिक निषेध का। वह समस्त निष्ठुरताओं का गवाह तो है पर उसके पास कोई तैयार निदान या समाधान नहीं है। एक राजनीतिज्ञ कह सकता है - 'तुम मुझे वोट दो, मैं देश को स्वर्ग बना दूँगा।' एक धार्मिक व्यक्ति कह सकता है - 'मेरी राह चलो, निश्चित स्वर्ग मिलेगा।' परन्तु एक लेखक नहीं कह सकता की मेरी रचना पढो, तुम दूसरे ज़हां में पहुँच जाओगे या कि मैं सब कुछ ठीक कर दूँगा। इस विषय में लेखक कुछ भी नहीं कर सकता। वह तो मानवीय यातना की विस्तीर्ण धरती का एक मूक साक्षी है। वह तो केवल अपनी चिंताएँ बाँट सकता है, चेतना जगा सकता है कि देखो यह चीजें हैं जो व्यवस्था को खोखला कर रही हैं, इनसे सावधान रहोहटाने की मानसिकता------------------------------प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी का कहना है - पहले जहाँ लिखा था : 'बीवेर, नैरो ब्रिज अहेड',अब वहाँ आ गया है : 'सावधान, पुलिया संकीर्ण है।'उस पुल से गुज…

सुनीता अग्रवाल की कहानी - भेड़िया आया

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भेड़िया आयावो फफकती हुई अपने बॉस कमरे से निकली। बाहर इतनी देर से लगे कानों ने अपनी आँखो पर विशवास करने के लिए उसकी ओर देखा, उसने सुड़क-सुड़क के अपनी नाक साफ़ करके इधर-उधर देखा ओर रोती हुई भाग गई। सारे कान, आँख बनें एक दूसरे मिले फिर मुंह बनकर फुसफुसाने लगे। ये फुसफुसाहट पूरे ऑफिस में जल्दी ही चर्चा का विषय बन गई। बात फैल गई थी कि उस लड़की को उसके एक कलीग ने पन्द्रह दिन पहले रात के अंधेरे में सेक्सुएल हरेस करने की कोशिश की है। इस बात पर सब उससे सहानुभूति कर रहे थे। अगले दिन की सुबह बहुत अजीब थी वो आदमी जब ऑफिस आया तो उसका चेहरा बहुत बीमार, उदास और रोया हुआ सा था। और वो लड़की एकदम फ्रेश, सिर उठाकर कोरिडोर में जा रही थी दोनों की नजरें मिलीं लड़की ने बहुत गर्व से यूँ देखा कि - “देखो मैंने तुमसे अपना बदला ले लिया। सारा ऑफिस तुम पर थू-थू कर रहा है। अब देखो मैं तुम्हें कैसा मजा चखाती हूं” वो आदमी सोच रहा था पता नहीं ये लड़की कब सुधरेगी मैंने उसे दिन उस लड़के साथ बाथरुम में डांट दिया था कि “तुम्हें शर्म नहीं आती कि तुम आदमियों के बाथरुम में इस लड़के साथ आ गई हो, जाओ यहां से वरना मैं तुम्हा…

उमेश कुमार गुप्ता का व्यंग्य - दिशा मैदान और तीर कमान

व्यंग्यदिशा मैदान और तीर कमान
उमेश कुमार गुप्ता    हमारे देश में दिशा मैदान और तीर कमान का चोली दामन का साथ है। जब भी पेट दर्द करे तो पहले तीर चलाये उसके बाद जहाॅ पर तीर गिरे वहाॅ गड्ढा खोदें। अपना वजन कम करें उसके बाद गड्ढे में मिट्टी  घास फूंस डालकर उसे हाइजैनिक तरीके से ढककर आ जायें । 
        ऐसा करने से आपके पूर्वज खुश हो जाएंगे। हजारों साल पुरानी पौराणिक शौच कर्म काण्ड की कथा पूर्ण हो जायेगी और आपको प्रत्येक दिन ऐसा करने से इस जन्म के बाद मोक्ष प्राप्त होगा।         भले ही आप खुले में शौच करने से जीते जी डायरिया मलेरिया, टायफाइड, डेंगू से मर जाये लेकिन मोक्ष के चक्कर में अपने घर में न तो शौचालय बनवाये न ही शौंच करने जाये ।     हमारे देश में 50प्रतिशत से अधिक आबादी इसी पौराणिक क्रियाकर्म पर चल रही है। देश को आजाद हुये 67 साल से ज्यादा का समय हो गया है । लेकिन उसके बाद ही उतने ही प्रतिशत लोग खुले में शौच का आनंद ले रहे हैं।     देश के गांव में तो शत-प्रतिशत आबादी खुली हवा में जानवरों की तरह मलमूत्र त्यागने की आदी है ही, लेकिन शहरी बाबू भी इनसे कम नहीं हैं । सुबह-सुबह प्रभाकर के पर…

सुरभि सक्सेना की लघुकथा - माफ़ी

माफ़ी
सुरभि सक्सेना "ज़रूर मेरे ही प्रेम में कोई कमी रह गयी होगी तभी न इतनी वफ़ा और प्यार समर्पित करने के बाद भी तुमने दी तो बस बेवफाई, झूठ और दुःख .... जाओ देव जाओ .... एक बार और मैं तुम्हें माफ़ करती हूँ पर याद रखना की इस बार के बाद न तो तुम मुझे दोबारा देख पाओगे न सुन पाओगे न महसूस कर पाओगे !!! हाँ मैं ही ग़लत हूँ, क्योंकि मैंने ही एक ग़लत इंसान से ... हर बार ग़लत उम्मीदें लगाईं हैं - यह सारी बातें याद करते करते देव की आँखें छलक पड़ी !! अचानक, माँ की आहट पाते ही जल्दी जल्दी अपनी नम आँखों को साफ़ करते हुए देव ने कहाँ - ना जाने मेरी आँख में ये क्या पड़ गया .. उफ़ मैं अभी आया माँ !!
इतना कह कर देव कमरे से निकल कर खुले आँगन में निकल आया - जहाँ बैठ कर घंटों वो शुभी के साथ बातें, किया करता था और बातों बातों में जब लड़ाई हो जाती तो गुस्सा करके फ़ोन भी काट देता था, टेबल पर एक विस्की की बोतल और हाथ में गिलास ... ये कौन सा पैग था देव को याद ही नहीं ... याद है तो बस शुभी की.... देव को न जाने क्या हो गया था उसे अब शुभी की इतनी याद क्यों आ रही थी - उसकी बातें इतनी याद आती हैं जब वो साथ नहीं सामने नही…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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