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October 2014
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रवि श्रीवास्तव,
 
कहानी
एक ऑफ़िस ऐसा भी। भाग -1
ऑफ़िस जाना है इसका ख्याल मन में आते ही लोगों को मन में कुछ अजीब सा ऐहसास होने लगता है। बहुत सारा काम करना पड़ेगा, बॉस की डॉट सुननी पड़ेगी, अच्छा काम किया तो तोड़ी सी सराहना मिलती है।
पर इस कहानी में एक ऐसा ऑफ़िस है जो आप को थोड़ा हैरान कर देगा। सुबह से शाम तक अब यहां एक ही काम होता है। बाजार में अपना वर्चस्व फैला रखी कम्पनी एमएनआई को मात देने की सोच के साथ टीएनएस नाम से कम्पनी ने अपनी शुरूआत की। शुरूआती कुछ दिनों में काम भी सही तरीके से चला। पर अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने सब कुछ बिखेर कर रख दिया। सारी बातें और सोच धरी रह गई। इसका हर कर्मचारी यहां परेशान आत्मा की तरह रहता है।

आदित्य: ऑफ़िस का मेरा पहला दिन कुछ जगह नौकरियों का तजुरबा लेने के बाद जब मैं इस ऑफ़िस में आया तो मुझे यहां काम कर रहे लोगों को देखकर उत्साहित हो उठा। मुझे लगा आगे बढ़ने और सीखने के लिए इससे अच्छी जगह क्या हो सकती है। कम वेतन में अच्छे भविष्य की तलाश में हामी भर दी। काफी अच्छे लोगों के बीच शुरूआती समय गुजरता गया। मेहनत और लगन से मैंने वहां काम सीखा। पर आज वही पूरा ऑफ़िस लापरवाही और राजनीति की वजह से इस हालत में आ पहुंचा जिसे देख मुझे अपनी मेहनत पर गुस्सा भी आता, दिल करता कि मैं भी कामचोर बन जाऊं पर शायद खुदा ने ऐसी फितरत नहीं दी थी मुझे। हमारे विभाग की बागडोर जिसके हाथ में थी वो काफी नौजवान युवक दीपक सर थे। उनको देख ये लगता था कि दिल में कुछ कर दिखाने का हौसला हो तो कुछ भी मुमकिन नहीं है। क्षेत्र का बेहतरीन तजुरबा लिए आरिफ सर जिनकी उम्र करीब 60 साल की होगी हमारे बॉस को कम्पनी को आगे बढ़ाने की सलाह देते थे। साथ ही एक विभाग की जिम्मेदारी भी उनके पास थी।

बॉस की मेहनत से कम्पनी ने बाजार में अपना नाम तो कमा लिया था। पर एक कमी रही काम कर रहे कर्मचारी खुश नहीं नज़र आ रहे थे। ये उनकी कमी थी या उनकी तरक्की की जलन या दोनों समझ नहीं आ रहा था। खैर फिर भी काम अच्छी तरह से चल रहा था। एक और कमजोरी वेतन का समय पर न आना। सारे कम्पनियों के लोग अपना वेतन पाकर खर्च कर महीने के आखिरी तक गरीब हो जाते थे तब हमारे ऑफ़िस के सारे कर्मचारी अमीरी के गुलछर्रे उड़ाते थे। पहले दिन तो मेरा काफी नरबस तरीके से दफ्तर का समय गुजरा। अपने आप को असहाय भी महसूस कर रहा था। पर हौसले को बुलंद रखा। दो तीन दिन के बात दिल में थोड़ा सी दिलासा आई। नये दोस्त बनें। इन नए दोस्तों के साथ काम करने में धीरे-धीरे मज़ा आने लगा। इस ऑफ़िस में बहुत सारे लोगों के बीच एक ऐसे शख्सियत से मुलाकात हुई जिसे देख मुझे आश्चर्य होता था। ऐसी सकारात्मक सोच की सड़क से गुजर रहे भिखारी को देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना दिखा दे। अंकित नाम के इस शख्स से जब मुलाकात हुई तो लगा कि खुदा के किस नुमाइंदे से मिला हूं। पर धीरे धीरे जान पहचान अच्छी हो गई थी। हमारे विभाग की देख-रेख कर रहे अंकित की दीपक से अच्छी दोस्ती थी। उनकी दोस्ती को लेकर लोग एक नई फिल्म ये दोस्ताना के निर्माण की बाते कर रहे थे। ऑफ़िस के काम को नहीं पर अपने वेतन को लेकर सारे कर्मचारी न खुश थे। सबकी नज़र में एक जो कराश रहा था वो मेरा बॉस दीपक था। सब उसे तानाशाह की पदवी देने लगे थे।

एक बात जो सबको खटक रही थी वो थी 6 महीने का इंक्रीमेंट जो बॉस ने ऐसे बोला था । तब भी ऑफ़िस काफी अच्छे तरीके से चल रहा था। किसी को आपस में एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं थी। काम और लोगों की लगन ने कम्पनी को ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया था। कि दूसरी कम्पनी को अपने अस्तित्व को बचाने में सोचना पड़ रहा था। कुछ महीनों में खड़ी ये कम्पनी धीरे-धीरे अपने कदमों पर चलने लगी थी। अब कम्पनी को दौड़ना बाकी था। जाहिर है रेस लंगड़े घोड़े से नहीं जीता जा सकता था। बॉस के दिमाग की एक उपज निकलकर सबके सामने आई। बाजार में अपना पूरा साम्राज्य फैला रखी कम्पनी से एक कर्मचारी को उसकी कमजोरी और ताक़त को जानने के लिए कम्पनी में प्रतीक को नियुक्त कर लिया। आरिफ सर को सारे दिन की रिपोर्ट प्रतीक को देनी पड़ती थी। साथ ही अगले दिन का विवरण बनाकर रखना पड़ता था। प्रतीक के आने के बाद कुछ दिन तक फील्ड पर काम कर रहे कर्मचारियों ने अच्छा काम किया। हर तरफ कम्पनी के चर्चे होने लगे थे। पर ये खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रह पाई। प्रतीक के व्यवहार में थोड़ा बदलाव आया। फील्ड पर काम कर रहे कर्मचारी अब निराश होने लगे। उनका मानना था कि प्रतीक गालियों से उनसे बाद करने लगा था। अब जो जोश था वो बुझने लगा था।

दोनों तरफ आग लग चुकी थी। कलह शुरू हो गई थी। बात दोनों पक्ष रखते आरिफ और दीपक के सामने पर निर्णय नहीं निकला। कुछ कर्मचारियों ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया। बॉस को फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्हें लगा कि चेस का वजीर तो उनके हाथ में है। पर इतनी नादानी आज तक नहीं देखी कि मैदान में पूरी सेना के बल पर युद्ध जीता जाता है। ये उनकी नादानी थी या किसी पर बहुत जाता आत्मविश्वास ये वो अपने मन में रखे रहे। हांलाकि सब कुछ उजड़ने के बाद कई बार दोष देते हुए आरिफ सर के मुंह से सुन लिया था। अब तक लोग दीपक और आरिफ से खुश नहीं थे एक और नया अध्याय प्रतीक ने जोड़ दिया। कहावत कही गई है कि तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा। वही कुछ शुरू हो गया। इक छोटी सी कम्पनी जो अभी खड़ी हुई थी। विनाश का सिलसिला शुरू हो गया। इस छोटी सी कम्पनी में राजनीति शुरू हो गई। तब से मक्कारी का सिलसिला शुरू होता गया। काम न करने और दूसरों पर काम टाल देने में सभी ने जैसे स्नातक की डिग्री ले रखी हो। जिन्हें थोड़ा सा काम करना पड़ जाए लगता था कि धरती का सारा बोझ उनके सिर पर आ गया हो। फिर क्या था ऑफ़िस के अंदर तीन बड़े ग्रुप बन गए। 1-महिला ग्रुप नाम है पर महिलाओं के साथ कुछ लोग शामिल थे जो उनकी बातों पर ज्यादा गौर करते थे।2- राजनीति ग्रुप इसमें कुछ चुनिंदा लोग थे।

सबसे बड़े ग्रुप में स्मूकर्स था। जिसमें ऐसा लगता था कि ईश्वर ने हर अलग-अलग जगह से परेशान आत्माएं भेजी हैं। सब परेशान पर सिगरेट के धुएं के छल्ले में परेशानी भूल जाते हैं। इन तीनों ग्रुप में जो फिट बैठते थे। वो थे अंकित शर्मा। जो हर तरफ रहते थे। अब ऑफ़िस में हर तरफ से पांसा फेके जा रहे थे। पर इन पासाओं की स्मूकर्स ग्रुप को कोई परवाह नहीं थी। कुछ ऐसे कर्मचारी भी थे जो धूम्रपान नहीं करते थे पर रहते थे स्मूकर्स के साथ में। तानाशाही और सिर्फ चुनिंदा लोगों की बात सुनने का आरोप कर्मचारी बॉस पर लगाते रहे। पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा था। सब जानकर भी अनदेखा किया जा रहा था। कही न कही इसमें थोड़ी सच्चाई भी थी। अचानक मालिक के आदेश पर कम्पनी को दूसरी इमारत में भेजा गया। कुछ कर्मचारियों को बुरा लगा पर मरता क्या न करता। दूसरी जगह नौकरी का मौका नहीं मिल रहा था। जहां काम कर रहे थे उसमें भी इतनी समस्याएं थी। वेतन का समय पर न आना। खैर ऑफ़िस दूसरी इमारत में पहुंचा। वेतन थोड़ा से समय पर आ गया। और नाराज़ 5 कर्मचारियों नें एक साथ बिना बताए दफ़्तर आना बंद कर दिया। और एक बड़ा झटका कम्पनी को लगा। बढ़ रही कम्पनी फिर से पिछले कदम पर आने लगी। कुछ नए लोगों की नियुक्ति की गई। पर वो बात नहीं थी जो जज्बा पहले के लोग रखते थे। उस नई इमारत में जब मैं गया तो अंकित शर्मा पूछ लिया आखिर ऑफ़िस में क्या हो रहा है। तो उनके जवाब से मुझे काफी हंसी आई। इतना प्यारा सा जवाब भाई जिंदगी में जहर घुल गया है। जो नए नुमाइंदो की नियुक्ति हुई थी पहले तो वो कर्म को पूजा मानते थे पर कुछ ही दिनों में उनके तेवर बदल गए।

इस दफ्तर में ज्यादा काम करने वाला हमेशा बेवकूफ की श्रेणी में रहा। क्योंकि हमारे बॉस की आंखों से काम करने वाले कर्मचारी नहीं दिखते थे। सुजीत नाम के बंदे को कुछ दिन के लिए काम सीखने के लिए रखा गया। उस समय तो ऐसा लग रहा था कि कम्पनी के लिए अपनी जान को भी न्यौछावर कर देगा । नियुक्ति मिलते ही कुछ ही महीनों में गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए दूसरा रूप भी सामने आया। बॉस अपनी हकड़ में अंजान बने रहे और लोग आश्चर्य चकित रह गए। धीरे-धीरे पटरी पर गाड़ी आ ही रही थी। पर फिर वेतन का मुद्दा सामने आया।राकेश राजा, हासिम जैसे अनुभवी लोगों को कम वेतन मिल रहा था। जिसमें राकेश राजा ने तो अपना मोर्चा खोल दिया। अब वो हर दिन दफ़्तर देर से आने लगे थे। पर हासिम शांत स्वाभाव से बैठे थे। नई नियुक्ति में फिर से एक कर्मचारी वहां से लाया गया जहां से प्रतीक को लाया गया था। बॉस की सोच अपरमपार चल रही थी। कहते है जो दूसरे के लिए गढ्ढा खोदते हैं वही उसमें गिरते हैं।

बड़ा तजुरबा रखने वाले भास्कर को लाया गया। इस ग्रहण लगी कम्पनी को नई उम्मीद देने के लिए। तभी मालिक का नया फरमान आया कि कम्पनी को पुरानी बिल्डिंग में फिर से भेज दिया जाए। फिर से कर्मचारी को वही पुरानी इमारत मिली पर इस बार नीचे का फ्लोर मिला। बॉस को लग गया था कि नाव डूब रही है पर उपाय करने के बजाए आंखें बंद कर ली। दफ़्तर में गिने चुने लोग काम कर रहे थे। बाकी तो अपनी अय्याशी के लिए नाम कमाने लगे। एक नया दौर आया जिसने पूरे ऑफ़िस को अपने रंग में रंग दिया। एक ऐसा वायरस जो बहुत जल्द सब पर भारी पड़ गया। पर काम करने वाले कर भी रहे थे। पर दीपक सर की बात ही निराली थी। उन्हें कोई मतलब ही नहीं था। खैर जो वायरस था गेम खेलने का। गेम के लेकर ऑफ़िस में अचानक एक नया मोड़ आया। कम्प्यूटर पर गेम खेलने का चस्के ने सब पर नशा चढा दिया। कुछ तो इस नशे से बचे थे पर उनका काम बॉस को नहीं दिखता था।

हर कम्प्यूटर पर गेम का एक टैब खुला रहता था। देखकर ऐसा लगता था कि जैसे हम दफ़्तर में न होकर किसी खेल के क्लब में हो। पहले तो बॉस के चोरी-छिपे खेल रहे थे। पर कुछ ही दिनों में बॉस क्या है इसका मतलब ही नहीं रह गया। इस बीच एक नए क्रांतिकारी का उदय हुआ। जो दीपक के रवैये से परेशान तो था साथ ही इस पूरे सिस्टम से। काम छोड़कर लोग गेम खेल रहे थे। जो उसे पसंद नहीं था। अनुभव नाम के इस बंदे में काम की लगन और मेहनत तो कूट-कूट कर भरी थी। पर शरीर से लग रहा था कि तेज आंधियों में बचके रहता होगा वरना हवा में उड़ सकता है। ज्यादा बखान तो उसका नहीं कर सकता। पर इतना जरूर था कि उसके शरीर की सारी हड्डियों को आसानी से गिन सकते हो। अपने आप में आत्मविश्वास लिए हर किसी को काम करने के लिए कहता पर लोगों को तो नशा कैंडी क्रश नाम के गेम में था। अगर कोई बड़ा काम होता और कोई उसकी बात को नहीं सुन रहा होता तो वह खुद उस काम को करने लगता था। उसकी कुछ बातों को लेकर राजनीतिक ग्रुप और महिला ग्रुप के साथ-साथ धूम्रपान करने वाले उसके साथ के लोग मजाक बनाते रहते थे। पर न किसी का गम उसे न किसी की परवाह, चल जाता था उधर जिधर दिखे राह। ऐसा मुंह फट आदमी शायद ही इस कम्पनी में कोई रहा हो। जो भी कहना हो सीधा मुंह पर। डर भी उसे किसी का नहीं था क्योंकि वह खुद में ईमानदारी से और समय से अधिक काम करता था। अभिनव जब किसी से काम करने को कहता तो ऐसा लगता था था कि कोई मच्छर आकर कान में गाना गाया और चला गया। थक हार के वह आदित्य के पास आता था तब थोड़ी बहुत सुनवाई होती जाती थी। आदित्य को चस्का तो था गेम का पर उससे ज्यादा काम का भी था। वह अपना गेम अधिकतर दूसरों से खेलने को कहता था जिनको महारथ हासिल थी।

इस दफ़्तर के अंदर का हाल ऐसा हो गया था कि सुबह कदम रखते ही हाय हैलो करने के बाद कितने लेवल को पार किया कल ये जानना दूसरों को जरूरी हो गया था। जो कर्मचारी इसमें स्नातक कर चुके थे वो तो फोन भी करते थे भाई लाइफ ख़त्म हो गई और गेम को अनलॉक कर दो। सुबह की शिफ्ट में लड़कियों पर इसका ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा था। वो अपना काम बड़े मन के साथ करती थी। लेकिन दोपहर के बाद तो काम करने वाले कर्मचारियों का उद्देश्य काम नहीं गेम का लेवल पार करना था। गेम का कमजोर सिपाही होने के वजह से आदित्य को बोरियत होती थी। पर शान बचाने के लिए दूसरे से लेवल जरूर पार कराता था। हाल बदलते गे काम छूट जाए पर एक दूसरे को लाइफ भेजना जरूरी था।

 इन चीजों को देखकर अनदेखा किया हमारे बॉस ने जिससे कुछ लोगों का तो मनोबल बढ़ता गया। कामचोरियां हद से ज्यादा बढ़ने लगी। सुजीत का हाल था कि लोहे में रहे और लोहार में भी। भास्कर तो उसे खबरी का नाम दिया। समय पर आने जाने के लिए भास्कर और दीपक में बहस भी हुई थी। वह भी पूरे कर्मचारियों के सामने बॉस की हैसियत में दीपक में कुछ खास दम नहीं दिखा।

एक बार आदित्य की अंतरात्मा जागी उसने अंकित से कहा कि इसका वर्णन वह कविता के जरिए सबके सामने रख देगा। तो पुराना घिसा डायलॉग सुना बाबू क्लेश हो जाएगा। आदित्य चुप हो गया। गेम चरम सीमा पर चल रहा था। सब अपना ही भविष्य को अंधेरे में डाल रहे थे ये बात समझ नहीं पा रहे थे। ऑफ़िस से घर जाने के बाद रात कैसे बीते जल्दी से कल जाकर कर्मठ कर्मचारी की तरह बहुत सारे लेवल पार करूंगा। हाल वही चल रहा था विनाशकाले विपरीत बुद्धि। कम्पनी के पतन के चर्चे एक बार फिर बाजार में होने लगी। बॉस ने कभी इसका कारण न तो जानने की कोशिश की और न ही मालिक से बात करने की हिम्मत जुटा पाए। कर्मचारी क्या काम कर रहे है इसका लेखा जोखा भी बॉस ने कभी नहीं देखा। सिर्फ कुछ लोगों को निशाना बनाया। हालात बिगड़ते गए। अय्याशियां कामचोरियां बढ़ती गई। कुछ कर्मचारियों ने स्वेच्छा से ऑफ़िस छोड़ दिया। फिर एक दिन मानव संसाधन का फोन आना शुरू हो गया। कुछ लोगों से उनका राजीनामा मांग लिया गया। बचे कर्मचारियों से ऑफ़िस बिना बैशाखी के रेंग रहा था। ठोकर लगने के बात भी मक्कारी नहीं गई। मालिक ने दीपक को दूसरी कम्पनी में तवादला कर दिया। अब पूरी कम्पनी के सर्वेसवा आरिफ बचे थे। आरिफ की चापलूसी कहे या आज्ञाकारी कर्मचारी ये तो सुजीत ही जानता था कि वह क्या कर रहा है। पर इतना जरूर था कि उसने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। आने-जाने का समय उसका बदल गया था ऐसा लग रहा था कि वह यहां पिकनिक मनाने आता था। देर से आना जल्दी जाना आदत बन गई थी। कामचोरी की सारे हदें सुजीत ने तोड़ दी थी। जिसे वह गर्व से दूसरे के सामने कहता था।

काम करने वालों को लेकर पहले भी बॉस की आंखें बंद थी आज भी आरिफ सर की आंखें बंद हैं। कौन काम कर रहा है कभी नहीं पूछा न ही देखा। दूसरों को ताना देने वाला सुजीत आज वही काम कर रहा था। आरिफ के सामने अपने को अच्छा साबित कर सारी सत्ता अपने हाथों में ले लिया था। बाकी कर्मचारी मूकदर्शक बने थे। हालांकि सुजीत ने बचे किसी कर्मचारी के बारे में कुछ गलत नहीं किया था। लेकिन लोगों की नजरों में खटक रहा था। काम न करने को लेकर और आने-जाने के समय को लेकर पूरे दफ़्तर में चर्चा होती थी। डूब रही कम्पनी में एक बार मालिक का आश्वासन फिर आया कि फिर से कुछ नए तरीके से इसकी शुरूआत करेंगे। मालिक तो शुरू करवा देंगे पर क्या ऐसे कर्मचारी से कम्पनी आगे बढ़ सकती है। ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा काम की कद्र कब होगी इस कम्पनी में। आदित्य हर रोज जाकर यही सोचता था। क्या काम से बढ़कर चापलूसी है जो अधिकारियों को नज़र नहीं आती है। ऑफ़िस का नाम सुनकर लगता था कि बहुत सारे लोग काम करते होंगे। लेकिन अब न तो बहुत सारे लोग थे न ही ज्यादा काम।

एक ऐसा ऑफ़िस जिसने काम करने वाले कर्मचारियों के नजरअंदाज किया। उसका पतन हो रहा है। बचे कर्मचारी आस लगाकर बैठे है कि मालिक शायद कुछ नया कर दे। लेकिन मक्कारी की आदत आज भी वही है। आदित्य भी इन सबकी की तरह बनना चाहता है पर अभी तक ख़ुदा की मेहरबानी चल रही है उसे इन सबसे दूर रखने की। सब कुछ ऐसे ही चल रहा है। सबको इंतजार है मालिक के आखिरी फैसले का। कि क्या होगा मालिक का आखिरी निर्णय। अब न तो बाजार में इसका ज्यादा नाम भी नहीं बचा। दूसरी बड़ी कम्पनी को प्रभावित कर रही ये कम्पनी के इस तरह बिखरने से उस कम्पनी ने राहत की सांस ली है। पड़े सूखे में बारिश की आस लगाए बैठे लोगों के जैसे आज बचे कर्मचारी भी ऐसी आस लगाएं है। अब देखना है कि मालिक का दिल कब पसीजता है।

ये कहानी का भाग एक है जल्द ही आप के सामने दूसरा भाग आप के सामने आएगा और आगे की ऑफ़िस के अंदर की वो बात जिसे सोचकर आप हंसेगे और दंग भी रह जाएंगे। कि सच में क्या एक ऑफ़िस ऐसा भी है।
 
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स्‍वाभिमान

उन्‍होंने अपने कम्‍प्‍यूटर पर नया-नया नेट का कनेक्‍शन ले लिया. उनकी उम्र के लोग कम्‍प्‍यूटर का ककहरा भी नहीं जानते. उन्‍होंने ले तो लिया पर ज़्‍यादा कुछ नहीं जानते थे. शुरुआत में उन्‍होंने फटाफट अपने अध्‍यवसाय से सम्‍बन्‍धित कुछेक लेखकों को फ़ेस बुक पर दोस्‍त बनाना प्रारंभ किया. ताज्‍जुब, गूगल स्‍वयं उनके रंग में रंग गया. अनगिनत साहित्‍यकारों की सूची उसमें आने लगी. उन्‍होंने भी कुछ मित्रता के अनुरोध भेजें, स्‍वीकार किये. कई अवांछित भी. ऐसे में एक नामी पत्रिका के संपादक को भी जोश-जोश में ‘रिक्‍वेस्‍ट' भेज दी, जो उसने अदेर मंज़ूर भी कर ली. वह उनकी कई लघुकथाएं प्रकाशित कर चुका था- परिचय इस तरह था ही.

इधर उन्‍होंने अपनी एक दीर्घ और स्‍तरीय कहानी उसे भेजी. कई बार फ़ोन करने के बावजूद टालमटोल के जवाब- ‘अभी फ़ाइल नहीं देख पाया...' ; ‘लम्‍बी है ना, पढ़ूंगा...' ; ‘देखता हूं...' वग़ैरह. तीन माह बाद तो एक मर्तबा फ़ोन ही काट दिया.

उसी सम्‍पादक का ऑन-लाइन निमंत्रण मिला कि उसकी किताब का अमुक स्‍थान पर, अमुक तारीख को, अमुक समय पर विमोचन का भव्‍य आयोजन है. उन्‍होंने सोचा, जाना चाहिए.

विमोचन के दिन वे सुबह से बेचैन रहे. ‘जाना है, जाना है...' के तनाव में. जाने के फ़ायदे और न जाने के नुक़सान इस ‘संपर्क-साहित्‍य' के युग में क्‍या उन्‍हें पता नहीं थे...

दोपहर हुई, शाम आने को थी, लेकिन वे उस कार्यक्रम में नहीं गये तो नहीं ही गये.

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पराजय

मतदान करने के बाद उन्‍होंने सोचा कि पत्‍नी के साथ बाज़ार से होकर जाना ठीक रहेगा. उनकी पत्‍नी सिवा उनके कभी बाहर नहीं निकलती थीं- वह भी कभी-कभार -ख्‍़ाास कर कुछ विश्‍ोष ख्‍़ारेदी करनी हो तब. इधर उनका हमेशा का किराना दुकान वाला जो चावल दे रहा था, उनकी पत्‍नी को पसन्‍द नहीं आ रहा था. तो उन्‍होंने सोचा कि दुकान पर जाकर चावल के नमूने देखकर वे स्‍वयं तय कर देंगी कि- हां, यह चलेगा.

जब वे दोनों उस दुकान पर पहुंचे, दुकान के मालिक बंसल जी कुछ अन्‍यमनस्‍क लग रहे थे. उन्‍होंने जब उनसे कहा कि इन बोरियों में रखे चावल कैसे हैं और किस भाव के... ज़रा हमारी श्रीमती जी को दिखा दें तो बंसल जी ने अनपेक्षित जवाब दिया. वे बोले, ‘अरे छोड़िये भी इनको, कल बहुत अच्‍छा चावल आ रहा है, वह आप ले जाना...'

पत्‍नी को और खुद उनको भी यह उत्‍तर नागवार गुज़रा, अपमानास्‍पद लगा. यदि बंसल जी उनकी एकाध बार आयी पत्‍नी को बाहर ही अलग-अलग खुली बोरियों में भरे चावल दिखा देते तो उनका कुछ बिगड़ना तो था नहीं. एक झटके के साथ उन्‍होंने ज्‍यों कह दिया हो- ‘अभी जाइए आप, मेरे पास व्‍यर्थ की फ़र्माइश पूरा करने की फुर्सत नहीं है.'

इतने सालों से वे उनके ग्राहक थे, उन्‍हें यह व्‍यवहार बुरा लगा. लौटते वक़्‍त उनकी पत्‍नी ने कह भी दिया- ‘कैसा दुकानदार है यह, ग्राहक को माल दिखाने की तमीज़ नहीं है इसमें...' उन्‍होंने मन ही मन यह निश्‍चय किया कि अब इस दुकान पर दोबारा नहीं आयेंगे...

लेकिन फिर उन्‍हें इस निर्णय ने पसोपेश में डाल दिया, मध्‍यमवर्गीय सभ्‍य मानसिकता आड़े आ गयी. इतनी पुरानी दुकान को वे कैसे छोड़ें... कल बंसल जी पूछेंगे तो... दूसरी दुकान पर देख लेंगे तो...

उन्‍होंने पत्‍नी को समझाने की कोशिश की- ‘बंसल जी ऐसे नहीं हैं. निहायत शरीफ़ हैं, मुलामियत से बात करते हैं, वाजिब दाम लगाते हैं, सही माल देते हैं... हो सकता है, वहां रखे चावल हमारे स्‍तर के न हों... कभी उन्‍होंने कोई ग़लत बर्ताव नहीं किया...' शायद वे अपने ग़ुस्‍साये दिमाग़ को दलीलें दे रहे थे.

और आिख्‍़ारकार दस-बारह दिनों बाद वे साहस जुटाकर फिर उसी दुकान पर महीने भर के सामान की सूची लेकर चले ही गये...

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प्रतिगमन

रात के नौ बज रहे होंगे. वे रिक्‍शा से घर लौट रहे थे. उनका परिचय किसी भी सामान्‍य नागरिक का हो सकता है. वैसे वे सेवा-निवृत्‍त प्राध्‍यापक थे.

ज्‍यों ही चौराहे से उनका रिक्‍शा दाहिनी ओर मुड़ा, उनकी जेब में रखा मोबाइल पुकार उठा. उन्‍होंने उसे कान से लगाया और बात करने लगे. तभी किसीने पार्श्‍व से उनका मोबाइल छीनने की कोशिश की. वे बातचीत में खोये हुए थे पर संयोग से उनकी उंगलियों की मोबाइल पर पकड़ मज़बूत थी. वह गुंडा सफल नहीं हो पाया, हांलाकि उन्‍होंने उस युवक की एक झलक देख ली थी.

उनके इस हादसे से उबरने तक रिक्‍शा कुछ फ़ासला तय कर चुका था. उन्‍होंने हड़बड़ाते हुए रिक्‍शा वाले से कहा, ‘अरे! कोई मेरा मोबाइल झपट रहा था...'

रिक्‍शा वाले ने पलटकर देखा- ‘क्‍या... मोबाइल... चलो साब देखते हैं...' उसने रिक्‍शा रोक लिया.

उन्‍होंने एक साथ दो चीज़ें- सामने, फिर पीछे -नोट की... रिक्‍शा वाला अधेड़ और दुबला-पतला था. दूसरे, वह मोबाइल चोर चौराहे की पुलिया पर इत्‍मीनान से जाकर बैठ गया था.

उन्‍हें इधर बढ़ चुकी आपराधिक प्रवृत्‍ति का पूरा अंदाज़ा था, जिसमें ज़रा-ज़रा-सी घटना के दौरान छुरा या पिस्‍तौल चलाकर हत्‍या कर दी जाती है. उन्‍होंने क्षण भर सोचा, तदुपरान्‍त रिक्‍शा वाले से बोले, ‘भैया, बेहतर है, तुम रिक्‍शा चुपचाप आगे निकाल लो...'

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हो सकता है

उसने पासपोर्ट के लिए अर्ज़ी दी थी. व्‍यक्‍तिगत सत्‍यापन हेतु पुलिसवाला घर पर आया. यहां-वहां हस्‍ताक्षर लिये, परिचय-पत्र आदि देखे और चुप बैठ गया. वह समझ गया कि यह ग़लत रिपोर्ट भेजेगा यदि इसे रिश्‍वत नहीं दी. उसने पूछ ही लिया- ‘कितने ?' पुलिसिए ने बेशर्मी से हज़ार मांगे. उसने दे दिये.

उसका दूसरे ही दिन कहीं जाने का कार्यक्रम बना. आरक्षण करवाने गया. तत्‍काल में उसे पांच सौ रुपए अतिरिक्‍त देकर टिकट मिल गया. लौटकर वह बिजली का बिल सही कराने गया. उसे वहां चार सौ देने पड़े. पानी का पिछला बिल भरने के बावजूद नये बिल में वह रक़म पुनः डाल दी गयी थी. वह जल बोर्ड गया. यहां मात्र दो सौ में काम हो गया.

इन्‍हीं दिनों उसका एसी खराब हो गया. कंपनी को बारहा फ़ोन करने के ग्‍यारह दिन बाद एक बंदा आया. बस आउटर को पानी से धोया, फ़िल्‍टर को कपड़े से साफ़ किया और एक फ़ार्म निकालकर बोला, ‘सब ठीक कर दिया साब, साढ़े पांच सौ कंपनी का सर्विसिंग चार्ज़ होता है...' वह समझ गया कि यह कंपनी को परे हटाकर कम पैसे लेने को आतुर है. इसने विचार किया- चलो इतनी बचत ही सही -उसे तीन सौ देकर रवाना किया.

एसी अगले दिन फिर बन्‍द हो गया. उस बंदे को लगातार पांच दिनों तक फ़ोन करता रहा. वह बहाने बनाकर रह जाता, आया नहीं. मरता क्‍या न करता, उसने एक प्राइवेट मेकैनिक से संपर्क किया. बूढ़े सरदारजी थे. आये. कुछ पार्टस्‌ निकाल कर ले गये. शाम तक कहीं से इलेक्‍ट्रानिक बोर्डों को सुधरवा कर ले भी आये. लगा दिया. बताया कि जिसने सुधारा, साढ़े तेरह सौ लिये और उनकी मज़दूरी हुई ढाई सौ. दे दिये उसने सोलह सौ, सरदारजी के आश्‍वासन पर कि एसी रुक जाये तो मेरी ज़िम्‍मेदारी.

एसी चलता रहा. कहीं कोई शिकायत न हुई. अभी-अभी हुए कटु अनुभव उसे बार-बार याद आ रहे थे. उसने पत्‍नी से कहा, ‘एसी तो अच्‍छा चल रहा है पर पता नहीं सरदारजी ने वहां साढ़े तेरह सौ दिये भी थे या उसमें भी अपना हिस्‍सा रख लिया... ढाई सौ में आजकल कौन काम करता है...'

उसकी पत्‍नी ने थोड़ी देर सोचा, फिर जवाब दिया- ‘कदाचित तुम्‍हारा अनुमान सही हो क्‍योंकि सरकार किसी की भी बने, देश में भ्रष्‍टाचार बेधड़क चल रहा है. लेकिन इसमें से एक मुद्‌दा निकल कर आता है कि चारों तरफ़ हो रही बेईमानी को सहते-सहते हमारा सोच इतना निष्‍ठुर हो गया है कि हम ईमानदार पर भी शक करने लगे हैं कि शायद उसने भी बेईमानी की होगी... हो सकता है, बूढ़े सरदारजी ने सब कुछ ईमानदारी से किया हो...

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प्रा. डा. अशोक गुजराती,

बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी,

दिल्‍ली- 110 095.

स्वर्ण धातु का भाव बाजार में कम या ज्यादा होता रहता है पर भारत में इस के प्रति दीवानगी कभी कम नहीं होती। यह प्रतिष्ठा और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है, आड़े वक्त में यह काम आता है। यह दो मुख्य कारण तो इसकी वैल्यु को कभी कम नहीं होने देंगे। परंपरागत रुप से, श्रेष्ठता क्रम में, सोने को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है- स्टैंडर्ड, आभुषण और गिन्नी। स्टैंडर्ड यानि 24 कैरेट सोने की शुद्धता 999.9 में आंकी जाती है। 22 कैरेट की शुद्धता का मान होता है-916.00। शुद्ध सोने से सभी प्रकार के गहने नहीं बनाए जा सकते। उसे मजबूती प्रदान करने के लिए 11 भाग सोना, एक भाग चाँदी व ताँबे का मिश्रण तैयार किया जाता है।

एक अनुमान के मुताबिक भारतीय महिलाएं लगभग 100 टन सोने के गहने हर साल खरीदती हैं। हिन्दू समाज के लिए तो इसका धार्मिक महत्व है। धन की देवी लक्ष्मी को स्वर्ण धातु बहुत पसन्द है। लक्ष्मी पूजन के समय पीत वस्त्र धारण करना शुभ और फलदायी माना जाता है। अग्नि को शुद्धि करने वाला माना जाता है और स्वर्ण को उसका प्रतीक। इसी कारण सोने के आभूषण कमर से ऊपर पहनना ही ठीक समझा जाता है। इसके अतिरिक्त अक्षय तृतीया को सोने की खरीददारी को शुभ माना जाता है। कोई भी शादी-ब्याह सोने के गहनों के बिना अधूरा माना जाता है। सोने का उपयोग केवल आभुषण या सिक्कों के रुप में नहीं होता। इसका प्रयोग दंतकला व सजावटी अक्षर बनाने के लिए भी होता है। स्वर्ण के यौगिक फोटोग्राफी में भी प्रयुक्त होते हैं।

वैसे तो संत-फकीर माया से दूर रहते हैं , लेकिन उनके भक्तों को तो सोने से मोह है सो उन्हें सोने से लाद कर रख दिया। शिरडी के साईं बाबा के स्वर्ण सिंहासन की कीमत करोड़ों की है। अमृतसर का विश्वप्रसिद्ध स्वर्णमन्दिर किसी परिचय का मोहताज नहीं है। तिरुपति बालाजी के मन्दिर पर तो जैसे सोने की बरसात होती है। इनका एक मुकुट शुद्ध सोने का है और उसका वजन 13 किलोग्राम है। यही नहीं इसमें हीरे भी खूब जड़े हुए हैं। इनकी सोने की धोती 40 किलोग्राम की है। यहीं से इस शानदार और दुर्लभ धातु के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के पास 3000 टन से ऊपर स्वर्ण भण्डार है और इससे कई गुना ज्यादा निजी क्षेत्र में है। स्वर्ण नियंत्रण कानून 1963 भी सोने के लगाव को सीमित नहीं कर पाया। कुछ सालों बाद इसे हटा दिया गया था।

ऐतिहासिक रुप से देखें तो ईसा से 2500 वर्ष पूर्व भी सोने का प्रचलन था। सिंधु घाटी की सभ्यता में यह पाया गया है। चरक संहिता में स्वर्ण और उसकी भस्म का औषधि रुप में वर्णन है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इसका जिक्र आया है।

सोना वायुमण्डल की ऑक्सीजन से प्रभावित नहीं होता। यह मुक्तअवस्था में चट्टानों में पाया जाता है। पहाड़ी जल स्त्रोतों में कभी कभी इसके कण मिलते हैं। हरियाणा में जगाधरी के पास आदिबद्री मंदिर है। इसके साथ लगती सोम्ब नदी का क्षेत्र ऐसा है जहां माहिर लोग सोना निकालते हैं। नदी में कंकर रुप में सोना बहकर आता है। नदी की गोद से सोना तलाशने के धंधे में स्थानीय लोगों का कहना है कि जो नदियां हिमालय की गोद से निकलती हैं वे पहाड़ों के कई दुर्लभ खनिज पदार्थों को अपने साथ बहाकर लाती हैं। इन्हीं पदार्थों में सोने के सूक्ष्म कण होते हैं। फैलाव वाले क्षेत्र में नदी की गति कुछ धीमी हो जाती है तो ये कण रेत के साथ किनारों पर आ जाते हैं। नदी से सोना निकालने वाले लोग टीम बनाकर घुस जाते हैं। एक खास शीशे जैसी प्लेट से मिट्टी की परख की जाती है। जैसे ही सोने के सूक्ष्म कणों की हल्की सी चमक नजर आती है, फौरन उस मिट्टी को इकट्ठा कर लिया जाता है। इन लोगों के पास एक पहाड़ी लकड़ी से बना विशेष प्रकार का बक्सा होता है। इस बक्से के ऊपर बांस की लकड़ी की झाली लगी होती है। इसी झाली के ऊपर सोने के कणों वाली रेत को रख के उस पर पानी डाला जाता है। इससे हल्के रेतकण तो बक्से से बाहर हो जाते हैं और भारी सोने के कण बक्से में चले जाते हैं। नीचे बची रेत को दुबारा झाली पर डाल कर पानी गिराया जाता है। कई बार यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। अंत में जो थोड़ी सी रेत बच जाती है उसमें पारा डालकर उसे खूब रगड़ा जाता है। ऐसा करने से सोने के बचेखुचे कण पारे से चिपक जाते हैं। आखिर में सोने और पारे को पर्याप्त आँच में गर्म किया जाता है। पारा तो जल कर खत्म हो जाता है पर बारीक सोने के कण बच जाते हैं।

बिहार की सिंहभूमि जिले में सुवर्णरेखा नदी में भी सोने के कण मिले हैं। सिक्किम में यह अन्य अयस्कों के साथ मिश्रित रुप मे मिलता है। हैदराबाद के हट्टी क्षेत्र से सोना प्राप्त हुआ है। मैसूर की कोलार खानों से भी सोना निकाला जाता है। वहां पारदन और सायनाइड विधि द्वारा सोना प्राप्त किया जाता है। इस तरह भारत में विश्व का लगभग दो प्रतिशत सोना प्राप्त होता है।

सोने का उपयोग केवल आभुषण या सिक्कों के रुप में नहीं होता। इसका प्रयोग दंतकला व सजावटी अक्षर बनाने के लिए भी होता है। स्वर्ण के यौगिक फोटोग्राफी में भी प्रयुक्त होते हैं।

हमारे पड़ोसी देश चीन में भी सोने के प्रति दीवानगी बढ़ती जा रही है। सूत्रों की माने तो वहां का केन्द्रिय बैंक अपनी नकदी व डालर को सोने में तबदील कर रहा है। वहां सोने की खुदरा खपत में वृद्धि देखी गई है। इस बात की पुष्टि वर्ल्ड गोल्ड कांउसिल ने भी की है। उसका अनुमान है कि चीन में सोने की खपत, जो इस समय 1132 टन है , 2017 में बढ़कर 1350 टन प्रति वर्ष हो सकती है। सोना निवेश का सशक्त माध्यम माना जाता है। आर्थिक सुरक्षा के मद्देनजर भविष्य में भी सोने का महत्व कायम रहेगा।

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(मुख्य सामग्री स्त्रोतः विकीपीडिया, नब्बे के दशक का नवभारत टाइम्स)

 

हरदेव कृष्ण, ग्राम/डाक – मल्लाह-134102

जिला पंचकूला (हरियाणा )

अच्छा वक्ता विरुद्ध अच्छा वक्ता

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एक समय की बात है, एक शहर में ढेंचू और घेंचू नामक दो मित्र रहते थे| दोनों ही प्रखर वक्ता थे, लेकिन घेंचू की माली हालत बहुत ही खराब होती जा रही थी| घेंचू जब भी मुंह खोलता तो पिटता| उसके लगभग सभी अंग काम करना बंद कर दिए थे| पिटने कि वजह से| वहीं ढेंचू दिन दूना रात चौगुना तरक्की कर रहा था| एक दिन संयोग से ढेंचू और घेंचू दोनों को एक ही विषय पर व्याख्यान देने के लिए बुला लिया गया| सबसे पहले घेंचू ने बोलना शुरू किया और समा बाँध दिया लेकिन भाषण का अंत होते-होते लोगों ने जूते-चप्पल कि बौछार कर दिया| ढेंचू ने बीच बचाव करके मामले को शांत किया और ख़ुद बोलने लगा| सब लोगों ने बहुत ही आदर भाव से सुना| घेंचू जब घर पहुँचा तो काफ़ी दुखी था, उसने ढेंचू से पूछा, क्या कारण है? लोग मेरी बातों को तवज्जोह नहीं देते! बात खतम होते - होते लोग मुझपर टूट पड़ते है! यहां तक कि लोग मेरे द्वारा लिखे गये ब्लॉग्स को भी पसंद नहीं करते! मुझमें क्या कमी है? इस पर ढेंचू ने घेंचू को ये बातें बताई।

मित्र तुम बोलते अच्छा हो, हर पहलू पर बोलते हो लिखते हो, लेकिन बोलने और लिखने से पहले  सुनिश्चित कर लो बोलना किस पर है और क्या बोलना है? किसके पक्ष में बोलना है और किसके विपक्ष में बोलना है। बोलने से पहले आप ग्रुप बना लो एक जिसके पक्ष में बोलना है दूसरा जिसके विपक्ष में बोलना है। थोड़ा इतिहास उठा के देखो किस वर्ग विशेष के विपक्ष में बोलना है, ऐसे लोग जिनके विरोध में बोलने पर कोई हानि न हो, उन्हें गाली भी दे तो वे कुछ न बोलेंगे इग्नोर कर देंगे, बस ऐसे टाइप के लोगों को ही निशाना बनाओ, ये कुछ भी ख़राब करें उस पर तो खिचाई करो ही अगर ये कुछ अच्छा भी करें तो उसे भी शक के निगाह से देखो, उसकी भर्त्सना करो। इनकी हमेशा खिंचाई ही करो क्योंकि इनसे तो कोई खतरा है ही नहीं। अब बारी आती है ऐसे ग्रुप कि जिनके पक्ष में बोलना है, ये काफी खतरनाक ग्रुप वाले लोग हो सकते है,  इनकी तो प्रशंसा भी बहुत सोच समझ कर करनी चाहिए ये अपने आलोचकों को कभी नहीं बख्शते क्या मजाल है इनके बारे में कोई कुछ उलटा सीधा लिख-बोल दे। अगर ये कोई गलत काम भी करें तो भी इनकी तारीफ करो,  इनकी गलती को भी पॉजिटिव वे में लो, अगर पॉजिटिव वे लेने कि कोई सूरत ही न हो तो मौन हो जाओ, कुछ न बोलो धीरे-धीरे सब सामान्य हो जायेगा। यही बोलने का मूल मंत्र है।

ढेंचू कि ये बातें सुनकर घेंचू भाव विभोर हो गया और ढेंचू के द्वारा बताये गए हर एक बात को अक्षरशः पालन करने कि कसम खाई। घेंचू की ख्याति नई-नई उचाइया छूने लगी।


Guru Prasad Dwivedi
http://gpdwivedi.hpage.com

 

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

हल के फाल से धरती का सीना चीरकर अन्‍न उगाने वाले और दुनिया की भूख मिटाने वाले अन्‍नदाता छत्तीसगढि़या श्रमवीर किसान जब अपनी श्रमनिष्‍ठा के फलस्‍वरूप खेतों में लहलहाती हुई धान की सोने जैसी बालियों को देखता है तब मस्‍ती और उमंग के साथ बरबस गा उठता है कि ‘छत्तीसगढ़ ला कहिथे भैया धान के कटोरा, ये दे लक्ष्‍मी दाई के कोरा भैया धान के कटोरा।‘ मेहनतकश कृषक के कंठ से मुखरित यह गीत, गीतकार की लोकप्रियता का प्रमाण है। यह गीत केवल माटी की वंदना और मातृभूमि का गौरव गान ही नहीं बल्‍कि छत्तीसगढि़या स्‍वाभिमान का प्रतीक भी है। कला, साहित्‍य और संस्‍कृति से इतर लोग जो इस कालजयी गीत के गीतकार को चेहरे से नहीं पहचानते वे भी गीत के माध्‍यम से उन्‍हें जानते है। वैसे भी सर्जक की पहचान चेहरे से नहीं बल्‍कि उसकी सर्जना से होती है। कृतित्‍व ही व्‍यक्‍तित्‍व का दर्पण होता है। इस गीत के गीतकार डॉ जीवन यदु जी विद्वत समाज में लोक साहित्‍य के गंभीर अध्‍येता के रूप में प्रतिष्‍ठित और सम्‍मानित है। यदि डॉ जीवन यदु के छत्तीसगढ़ी साहित्‍यिक अवदान का समग्र मूल्‍यांकन करते हुए संक्षेप में कहें तो यह कहना अतिश्‍योक्‍तिपूर्ण नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ी साहित्‍याकाश जिन सितारों की चमक से देदीप्‍यमान है उनमें से एक सितारे को साहित्‍य जगत जीवन यदु के नाम से जानता है।

श्री प्रकाशन दुर्ग से प्रकाशित उनका छत्तीसगढ़ी काव्‍य संग्रह ‘धान के कटोरा‘ इन दिनों चर्चा में है। डॉ यदु ने अपने सुदीर्घ साहित्‍यिक यात्रा में अपने संवेदनशील हृदय के स्‍पंदन में जो कुछ महसूस किया और सचेत मस्‍तिष्‍क से जो कुछ चिन्‍तन किया है उन अनुभवों का निचोड़ इस संग्रह में हैं। कवि जो देखता है और महसूस करता है, उसी को तो कोरे कागज पर उतार कर जीवन्‍त कर देता है। आखिर अनुभूति ही तो अभिव्‍यक्‍ति की जननी होती है। नये शिल्‍प और बिबों के माध्‍यम से गंभीर बातो को कम-से-कम शब्‍दों में कह देने की कला में सिद्धहस्‍त डॉ यदु की लेखनी का ही कमाल है जो संग्रह में जीवन के विविध रंगों का इन्‍द्रधनुष मन को मोह लेता है।

कवि ने इस संग्रह में अपने जीवन अनुभवों को साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओ यथा गीत, गजल, नई कविता और वक्रोक्‍ति अर्थात व्‍यंग्‍य के माध्‍यम से रखने का सार्थक उपक्रम किया है। जहां अपन मुड़ में पागा बांधव, रहिबे हुशियार भैया, चलो-चलो रे भैया, जिनगी बने परी, भइया, पखरा सही काया में आगी सही मन, सुधारन जिनगानी, बिजहा धान तपास जी, चेत-चेत रे चिरैया, जांगर के महिमा जैसी रचना के माध्‍यम से कवि ने सामाजिक चेतना के साथ श्रमनिष्‍ठा और आत्‍मनिर्भरता का संदेश दिया है वहीं दूसरी ओर बादर करे साहूकारी, भुइंया के चूंदी, मउसम, जड़काला, भुइंया के लगिन धरागे, आगे अषाढ़ कविता के माध्‍यम से प्रकति का मानवीयकरण करते हुए सुन्‍दर प्रकृति चित्रण किया है। खुसरे हे सरकार मा जी की ये पंक्‍ति ‘‘ जोंक कोख मा सीखत रहिथे, ढंग लहू ला चुहके के, तभे जोंक मन चतुरा होथे, लहू के कारोबार मा जी‘‘ राजनीतिक मूल्‍यहीनता, देखत हवं, अमेरिकी परेतिन ह, देश में हमागे की ये पंक्‍ति ‘‘ मॉल मा खुसरबे त जेब ला टमड़ ले, हटरी झन खोज, वो तो कब के नंदागे‘‘ सांस्‍कृतिक क्षरण। जउंहर भइगे की ये पंक्‍ति ‘‘लोकतंत्र ला घुनहा कीरा कस खोलत हें, नवा किसम के राजा रानी जउंहर भइगे‘‘ प्रशासनिक मूल्‍यहीनता। आजादी के बाद की ये पंक्‍ति ‘‘आजादी के बाद बबा के मिहनत मिलगे मट्‌टी मा, गंगाजल ला खोजत-खोजत देश खुसरगे भट्‌टी मा‘‘ आजादी से मोह भंग की स्‍थिति तथा का कहिबे की ये पंक्‍ति ‘‘ संसद के अनुशासन टी वी मा देखत हन, वो आल्‍हा, ये फगुवा गावत हे का कहिबे‘‘ राजनेताओं के चारित्रिक पतन, खोजत हे प्रेमचंद, सुन भई तुलसीदास जैसी रचनाओं के माध्‍यम से साहित्‍यिक क्षेत्र में आई मूल्‍यहीनता को कवि ने निर्भीकतापूर्वक व्‍यक्‍त करने का सफल प्रयास किया है। वैसे तो संग्रह की सभी कविताएं उत्‍कृष्‍ट है पर बस्‍तर के वनवारिसयों के दर्द को अभिव्‍यक्‍त करती कविता बता, कहाँ हम जावन? तथा सिविर बनिस रहवास पाठकों का विशेष घ्‍यान आकृष्‍ट करती है।

संग्रह की कविताओं में कवि ने छत्‍तीसगढ़ी के ऐसे शब्‍द जो हाशिए पर ढकेल दिए गये हैं या ढकेले जा रहे हैं उनका भरपूर प्रयोगकर पुनः प्राण प्रतिष्‍ठा करने का स्‍तुत्‍य प्रयास किया है यथा बेलबेलही, ओखी, बइठांगुर, अदियान इत्‍यादि। साथ-ही साथ भाषा के आभूषण लोकोक्‍तियों का प्रयोग भी कवि ने यथा स्‍थान बहुत सुन्‍दर ढंग से किया है जैसे ‘‘ जब तक हे सांस तब तक हे आस‘‘, ‘‘ररूहा हा सपना देखे, चांउर अउ दार के‘‘ इत्‍यादि।

संग्रह को ध्‍यान से पढ़ने के बाद स्‍पष्‍ट तौर पर कहा जा सकता है कि इसकी कविताओं में छत्‍तीसगढि़या श्रमवीरों के श्रम सीकर से सनी मिट्‌टी की ऐसी सौंधी महक है जो हर छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य प्रेमी पाठक को मंत्र मुग्‍ध करने में सक्षम हैं पर पुस्‍तक का अधिक मूल्‍य पाठकों को आतंकित करता हुआ महसूस होता है और टंकन की अशुद्धियां प्रकाशक की प्रतिष्‍ठा पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा देता है। मुझे लगता है कि छत्‍तीसगढ़ी काव्‍य की ऐसी उत्‍कृष्‍ट कृति यदि अधिक मूल्‍य के कारण सुधि पाठकों के हाथ में पहुंचने के बजाय ग्रंथालयों के आलमारियों में बंद हो जाय तो कवि के सार्थक श्रम का अपेक्षित परिणाम मिलना संदिग्‍ध हो जाता है। बहरहाल इस कृति के लिए कवि डॉ जीवन यदु जी को हार्दिर्क बधाई-

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

बोड़रा, मगरलोड़

जिला-धमतरी, छ ग

 

कृति- धान के कटोरा

कवि -डॉ जीवन यदु

प्रकाशक- श्री प्रकाशन दुर्ग, छ ग

मूल्‍य-460 रूपया

 

birendra.saral@gmail.com

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

धर्मराज का दरबार लगा था। अपने चैम्‍बर में चि़त्रगुप्‍त टेबल पर पड़ी फाइलों पर नजर झुकाये बारीकी से निरीक्षण कर रहे थे। आस-पास रखी अलमारियों में भी फाइलें ठूंस-ठूंस कर भरी हुई थी। चित्रगुप्‍त के सामने मृत्‍यु लोक से आये जीवों की बड़ी लम्‍बी कतार थी। यमदूत कंधे पर गदा उठाए व्‍यवस्‍था बनाने में जुटे हुये थे। कुछ यमदूत फाइलों को इधर-उधर लाने और ले जाने का काम रहे थे। वहाँ का माहौल एकदम गरम था। बिलकुल वैसे ही जैसे चुनाव के समय कार्यालयों का होता है। मृत्‍युलोक से आए जीव बिल्‍कुल वैसे ही धक्‍का-मुक्‍की कर रहे थे जैसे चुनाव टिकट पाने के लिए टिकटार्थी करते हैं, फर्क बस इतना ही था कि वहाँ समर्थकों की भीड़ नहीं थी। वहाँ जो भी थे बस टिकिटार्थिर्यों की तरह ही थे। चित्रगुप्‍त बार-बार अपना चश्‍मा पोंछकर पहनते और फिर फाइलों पर झुक जाते। इधर लाइन में खड़े जीवों की हालत खराब थी। घंटो लाइन में खड़े रहने के कारण पैर दुखने लगे थे। वे फुसफुसाते हुए आपस में बातचीत कर रहे थे कि हद हो गई, अपने गुनाहों का हिसाब कराने के लिए भी घंटो लाइन लगाना पड़ रहा है। यहाँ भी कोई फास्‍ट ट्रैक कोर्ट की व्‍यवस्‍था नहीं हैं। यदि ये बात पहले से मालूम होती तो हम अपने जीवन के सोलह संस्‍कारों में एक ‘लाइन‘ संस्‍कार को भी जोड़ लेते और जीवन के कुल सत्रह संस्‍कार गिनते। यहाँ यदि अपने देश के लोगों से बात करने की सुविधा होती तो हम उन्‍हें बताते कि बच्‍चों को शैशवकाल से ही लाइन पर घंटो खड़े होने की स्‍पेशल ट्रेनिंग दी जाय क्‍योंकि लाइन का मामला ‘जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी‘ वाला है। जन्‍म के साथ ही पंजीयन के लिए लाइन फिर स्‍कूल कॉलेज में प्रवेश के लिए लाइन, डिग्री लेने के बाद रोजगार दफ्‍तर के सामने लाइन, शादी के बाद राशन के दूकान के सामने लाइन। अब कहाँ तक गिनायें भाई, मरने के बाद यहाँ धर्मराज के दरबार में चित्रगुप्‍त के सामने लाइन। ये लाइन का चक्‍कर हर जगह है।

घंटों खड़े रहने के बाद किसी एक जीव के गुनाहों का हिसाब होता तब वह हिसाब पर्ची लेकर धर्मराज के पास जाता। धर्मराज जी उस पर्ची को धरम तुला पर तौलते और वजन के हिसाब से स्‍वर्ग या नरक में प्‍लाट एलाट करते। तब कोई जीव अपने स्‍थान पर शिफ्‍ट हो पाता। इस प्रक्रिया में इतना समय लग रहा था कि लाइन पर खड़े जीव एकदम बोरियत महसूस करने लगे थे।

जब लाइन पर खड़े-खड़े कुछ जीवों की सहनशक्‍ति जवाब देने लगी तो उन्‍होंने फैसला किया कि यहाँ बेमतलब खड़े रहने के बजाय वेटिंग हॉल में जाकर आराम करना चाहिए और जब नम्‍बर आ जाय तभी यहां आना ठीक रहेगा। कुछ जीव लाइन से बाहर निकलकर वेटिंग हॉल की ओर बढ़ गये।

वेटिंग हाल में पहुँचकर उनके होश उड़ गये। यहाँ तो पहले से ही काफी भीड़ थी। पाँव रखने के लिए भी तिल भर जगह नहीं थी। बिल्‍कुल रेल्‍वे के प्रतीक्षालय की तरह दृश्‍य था। सफाई वैसे ही नदारद थी जैसे भ्रष्‍ट्रों के मन से ईमानदारी। गंदगी इतनी जितना कार्यालयों में घूस। रिश्‍वतखोरों के चरित्र से आने वाली बदबू से भी ज्‍यादा दुर्गन्‍ध। उन जीवों की आँखें आपस में ऐसी मिली मानों पूछ रही हो अब क्‍या करें? यहाँ आकर तो बुरे फँसे। उनकी आँखें वहाँ बैठने की जगह तलाशने लगी। चारों तरफ नजर दौड़ाने के बाद उन्‍हें एक कोने में थोड़ी-सी जगह दिखाई दी। वे सब वहीं पहुँच कर आमने-सामने बैठ गये। उनकी बातचीत फिर शुरू हुई।

वे एक दूसरे से अपने-अपने मरने का कारण पूछने लगे। किसी ने अपने मरने का कारण कैंसर बताया तो किसी ने एड्‌स। किसी ने टी वी बताया तो किसी ने किडनी फेल। मगर एक जीव ने कहा मैं तो फाइल के संक्रमण से मरा। अन्‍य जीवों की उसकी बातें समझ में नहीं आई, वे उसे आश्‍चर्य से देखने लगे। फाइल वाले जीव ने कहा-‘‘मैं समझ रहा हूँ। आप लोगों को मेरे मरने का कारण समझ में नहीं आ रहा है। भैया मेरे सीधी-सी बात है, मैं लोकनिर्माण विभाग में था लेकिन लोक निर्माण के बजाय जीवन पर्यन्‍त अपने इहलोक के निर्माण में लगा रहा। मेरे इहलोक का ऐसा भव्‍य निर्माण हो गया कि विरोधियों को जलन होने लगी। बात जाँच दल तक पहुँच गई। डर के मारे मैं फाइल कुतरने लगा। तभी विश्‍वस्‍त सूत्रों से जानकारी मिली कि जाँच दल आक्रामक मुद्रा में तेजी से मेरी ओर बढ़ रहा है। हड़बड़ी में मैं फाइल निगलने लगा। अब आप सब तो जानते ही है, फाइलों की बड़ी बुरी आदत होती है। वह बिना हरी पत्तियों के सरकती ही नहीं हैं। मेरी फितरत तो हमेशा अपने दोनों हाथों से हरी पत्तियों को बटोरने की रही थी। सो अपनी हरी पत्तियों को फाइल के साथ लगाने का तो सवाल ही नहीं उठता। बस यहीं मुझसे चूक हो गई। फाइल अपनी आदत के अनुसार मेरे गले में जाकर अटक गई और मुझे परलोक आना पड़ गया।

दूसरे जीव ने आह भरते हुए कहा-‘‘किस्‍मत वाले हो भाई जो फाइल की कृपा से मरे। हम तो ऐसे बदनसीब है कि रेत और गिट्‌टी की उल्‍टी होने से ही मर गये।‘‘ आसपास बैठे बाकी जीवों को फिर घोर आश्‍चर्य हुआ। किसी जीव ने पूछा- ‘‘वो कैसे?‘‘

‘‘समय समय का फेर है भाई। मतलब निकल जाने पर लोग पहचानते तक नहीं वरना मेरे मरने का कारण तो ये फाइल वाले साहब ही बता देते। जिस लोक निर्माण विभाग में ये साहब थे मैं उसी विभाग का ठेकेदार था। ना जाने कितनी हरी पत्तियों के साथ मैंने अपनी फाइल साहब की ओर सरकाई होगी। इन साहब को केवल हरी पत्तियों की याद है बाकी सब भूल गये। यहाँ तक मुझे भी। मैं इन्‍हें हरी पत्तियां खिलाता था और स्‍वयं रेत गिट्‌टी छड़ और सीमेंट खाता था। मैंने ये सब यहाँ तक खाया कि लोग मेरा पेट देखकर ही जान जाते थे कि इसमें जरूर रेत गिट्‌टी और छड़ ही भरा होगा। मेरी साँसो से लोगों को सीमेंट की बदबू आती थी और पेट से गिट्टियों के बजने की आवाज सुनाई देती थी। इस कारण से लोग मेरे आसपास भी नहीं फटकते थे। पिछली बार मैं बदहजमी का शिकार हो गया, पचाने की काफी कोशिश की पर सफल नहीं हुआ। रेत और गिट्टियों की उल्‍टी हुई और मेरा राम नाम सत्‍य हो गया।‘‘ ये सब सुनकर फाइल वाले जीव ने उसे ध्‍यान से देखा फिर हाथ आगे बढ़ाते हुये कहा-‘‘अरे! हाँ यार, मिलाओ हाथ। मैं तो सचमुच भूल ही गया था। बात यह थी कि तुमसे पार्टनरशीप के बाद मेरा स्‍थानान्‍तरण हो गया था ना। बड़े दिनों के बाद मिले यार। मैंने तो सोचा भी नहीं था कि कब के बिछड़े हुये हम आज यहाँ आकर मिलेंगे।‘‘ दोनों जीव आपस में गले मिले। बाकी जीव इस कलयुगी भक्‍त और भगवान के मिलन को देखकर तालियां बजाने लगे। गले मिले-मिले ही फाइल वाले जीव ने गिट्टी वाले जीव के कानो पर फुसफुसाते हुए कहा-‘‘देखो अपना फिफ्‍टी-फिफ्‍टी वाला पिछला मामला भूल मत जाना, यहाँ भी जरा ध्‍यान रखना ठीक है।‘‘ गिट्टी वाला जीव ओ के बॉस के अंदाज में गर्मजोशी से हाथ मिलाया फिर दोनों अलग हुए।

वहाँ सभी जीव इसी तरह हँस-हँस कर बातें कर रहे थे पर एक जीव कोने पर एकदम गुमसुम बैठा था। वह कुछ समय के लिए अपनी जगह से उठता, बेचैनी से चहलकदमी करता। चारों तरफ नजर घुमाकर किसी को बेस्रबी से ढूँढता और निराश होकर फिर चुपचाप बैठकर शून्‍य को निहारने लगता। फाइल वाले जीव ने उससे पूछा-‘‘क्‍या बात है भाई, आप बड़े परेशान लग रहे हैं। किसी का इंतजार कर रहे हैं क्‍या?‘‘ उदास जीव बोला- ‘‘क्‍या आपके पास अच्‍छी पिक्‍चर क्‍वालिटी वाला कोई मोबाइल है? यहाँ तो कोई फोटोग्राफर भी नहीं दिख रहा है।‘‘ यह सुनकर फाइल वाले जीव के साथ ही सभी जीवों का ध्‍यान उसकी ओर चला गया। गिट्‌टी वाले जीव ने उससे कहा-‘‘पहले आप आराम से बैठिये। अभी तक आपने अपने मरने का कारण भी नहीं बताया और कैमरा के चक्‍कर में पड गये।‘‘ उदास जीव दहाड़े मार कर रोने लगा और कुछ समय बाद सिसकते हुये कहा-‘‘अब आप लोगों को क्‍या बताऊँ। दरअसल मैं फोटो खिंचवाने की बीमारी से मरा हूँ। उसकी बात सुनकर आसपास बैठे जीव हैरत में पड़ गये। एक जीव ने कहा-‘‘फोटो खिंचवाने की बीमारी, ये कौन-सी नई बीमारी है। हमने आज तक ऐसी बीमारी के बारे में नहीं सुनी है। लगता है कोई भयानक और लाइलाज बीमारी है। कहीं संक्रामक तो नहीं हैं?‘‘

उदास जीव बोला-‘‘बड़ी खतरनाक बीमारी है भैया और यह बड़ी तेजी से फैलने वाली बीमारी है। देख नहीं रहे हैं। मरने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रही है। अभी भी मुझे मोबाइल या कैमरे की तलाश है। जब तक जिन्‍दा था। सब काम छोड़कर रात दिन अपना फोटो खिंचवाया करता था या अपने आप भी खींच लिया करता था। बस फोटो खिंचवाना और उसे फेसबुक पर लगाना यही मेरा सबसे बड़ा कर्तव्‍य था। फोटो लगाने के बाद दिन भर लाइक और कमेंन्‍ट्‌स का इंतजार, ये तो मेरा परम कर्तव्‍य था। अपने सभी अन्‍तरंग, बहिरंग तस्‍वीरों के साथ-साथ मैंने अपने पालतू कुत्‍ते और बिल्‍ली की तस्‍वीरें भी फेस बुक पर लगाया करता था। महिलाओं की तस्‍वीरों पर अधिक लाइक और कमेन्‍ट्‌स देखकर ही मैंने अपना जेन्‍डर परिवर्तन कराने के लिए विशेषज्ञ डॉक्‍टर से भी मिल चुका था। बात पक्‍की भी हो गई थी पर किस्‍मत धोखा दे गई। जेंडर चेंज होने से पहले मैंने अपनी एक तस्‍वीर फेसबुक पर लगाई। उस पर कमेन्‍ट्‌स तो दूर एक लाइक के लिए भी मैं महीनों तरस गया। यह सदमा मैं बर्दाश्‍त नहीं कर सका, मुझे अटैक आया और मैं मर गया।‘‘ यह बताकर वह फिर रोने लगा।

पास ही बैठे एक जीव ने उसे सांत्‍वना देते हुये कहा-‘‘मत रोओ भाई जो होना था सो हो गया अब अफसोस करने से क्‍या फायदा किस्‍मत में लिखा होगा तो आपको अगले जन्‍म में लाइक और कमेन्‍ट्‌स जरूर मिल जाएंगे? आपकी आपबीती सुनकर लग रहा हैं कि सचमुच ये फोटो खिंचवाने की बीमारी बड़ी भयंकर और लाइलाज है। भगवान बचाये ऐसी बीमारी से, सचमुच हमारी किस्‍मत अच्‍छी रही कि हम छोटी-छोटी बीमारियों से मरे और हमें आपके जितना दारूण दुख नहीं सहना पड़ा। अब बात समझ में आ रही है कि आप बहुत समय से इतना बेचैन क्‍यों थे और बार-बार फोटोग्राफर की तलाश क्‍यों कर रहे थे।‘‘ फिर वह जीव हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखते हुए कहा-‘‘हे भगवान! मेरे अपनों को इस बीमारी की पीड़ा से बचाना। मेरे प्रभु आपसे बस इतनी ही प्रार्थना है कि मेरे किसी दुश्‍मन को भी इस बीमारी के चंगुल में मत फँसाना।‘‘

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी(छत्‍तीसगढ़)

ममदू

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ममदू की माँ थैला झटक कर खाली करते हुए ममदू पर झल्‍लाई-कितनी बार तुझ से कहा है कि सिर्फ पन्‍नी ही बीन कर लाया कर, ये ढेर सारे कागज़ क्‍यों भर लाता है। वो इब्राहिम पन्‍नी वाला सब छाँट-छाँट कर कागज़ अलग कर देता है, फिर तौलता है। जितना बोझ ढो कर लाता है उसमें तीन चार किलो ही पन्‍नी निकल पाती है, बाकी कागज़ का ढेर......। क्‍या फायदा ऐसी मेहनत का ? रोज़ मना करती हूँ पर मानता ही नहीं नासमिटा। अगर ढंग से बीने तो किलो दो किलो पन्‍नी तो और हो ही जाय, पर न जाने क्‍या धुन में रहता है यह लड़का....... ! छः सात साल का ममदू मुजरिम बना नीची निगाह किये माँ का उलाहना सुनता रहता चुपचाप। उसके मन में क्‍या चलता है, इससे किसी को क्‍या सरोकार। उसकी माँ के दिमाग़ में तो दो वक्‍त की रोटी की जुगाड़ के सिवाय कुछ आता ही कहाँ है। आज की साँसे खत्‍म हो रही है तो कल जीने की चिन्‍ता उसे दो रोटी के गोल चक्‍कर से बाहर निकलने ही नहीं देती। रोज सुबह वह भी काम पर निकल जाती और ममदू बड़ा सा मैला कुचैला थैला लेकर निकल जाता शहर की गन्‍दी और बदबूदार जगहों की सैर करने। उसकी मजबूर जगहें, गन्‍दी नालियाँ, नगर पालिका द्वारा जगह जगह रखे गये कचरे के डिब्‍बे, अस्‍पताल, सड़क किनारे लगी चाय की होटलें और उन बिल्‍डिंगों के आसपास जहाँ बेशउर लोग कचरा अपनी खिड़कियों से बाहर उछाल देते हैं। यही तो वे जगहें है जहाँ से ममदू के पेट की ज्‍वाला को ईंधन मिलता है। इन जगहों से घूमते-घूमते कभी-कभी उसका गुज़र अम्‍बेडकर स्‍कूल के सामने से भी हो जाता, जहाँ उसकी उम्र के बच्‍चे पढ़ते है। संयोग से कभी कभी उस वक्‍त बच्‍चों की खाने की छुट्टी होती। स्‍कूल के मैदान में घने नीम के पेड़ की छाँव में बच्‍चे अपने अपने टिफिन से खाना खा रहे होते, तो कोई भाग दौड़, खेल में व्‍यस्‍त रहते। बाल सुलभ ममदू अपने तन पर मैली चीथड़े हुई कमीज़ लटकाये, कन्‍धे पर कचरे का थैला लटकाये, स्‍कूल की बाउन्‍ड्री वाल के पास खड़ा हो जाता। कम ऊँची बाउन्‍ड्री वाल पर लगी मोटे तार की बड़े-बड़े चौकोर छेद वाली जाली से ममदू को अन्‍दर का सब नज़ारा दिखाई देता। अपने काम से बेखबर ममदू उन बच्‍चों को निहारने लगता। उसके मैल से काले पड़े चहरे पर दिव्‍य मुस्‍कान बिखरने लगती। काले चेहरे पर उसके पीले दाँत और उभर कर चमकने लगते। वह मन ही मन कुछ सोचता फिर आगे बढ़ जाता। उस मासूम के मन के भाव कोई क्‍या जाने! थोड़े आगे एक कम्‍प्‍युटर टायपिंग, फोटोकापी, लेमिनेशन, फेक्‍स और न जाने क्‍या-क्‍या काम की दुकान आती। सुबह-सुबह दुकान वाला सफाई करके ”कम्‍प्‍युटर पेपर वेस्‍ट” वह कागज़ जो टायपिंग में, या फोटोकापी करने में खराब हो गये दुकान के बाजू में डाल देता। यह सफेद प्रेस बन्‍द कागज ममदू को अच्‍छे लगते और वह उनको बटोर कर अपने थैले में डाल लेता। पढ़ना लिखना तो वह जानता ही नहीं पर वह साफ सुथरे सफेद कागज ममदू को भले लगते। घर जाकर उसे उन कागज़ो के बदले माँ की डाँट फटकार सुननी पड़ती, पर वह भी क्‍या करे कागज़ का और बच्‍चों का एक कुदरती रिश्‍ता है। कागज़ से निकली शिक्षा और बच्‍चों का मन जब एक हो जाते है तो मनुष्‍य का मनुष्‍य होना सार्थक हो जाता है। वह ज्ञान विज्ञान की सीढियाँ चढ़ता चला जाता है। संसार में महान्‌ से महानतम्‌ होता चला जाता है। तभी वह संसार का सर्वश्रेष्‍ठ प्राणी कहलाता है। ममदू की कहानी की जनक कागज़ और कलम ही तो है। मासूम और नासमझ बच्‍चा भी कागज़ के मोह में पड़ जाता है। फिर वह उसे फाड़े, पढ़ने का अभिनय करे या अपनी नन्‍ही नन्‍ही उँगलियों में कलम पकड़ कर कागज़ पर आड़ी तिरछी लकीरें खींचे। ममदू को भी कागज़ आकर्षित करते तो उसकी माँ को गन्‍दी मैली बदबूदार पालीथीन की थैलियों में अपना भविष्‍य नज़र आता। ममदू माँ की डाँट सुन ही रहा था कि पास की झुग्‍गी से सुरेखा हाँफती काँपती दौड़ी चली आई। हाथ में प्‍लास्‍टिक का खाद भरने वाला बड़ा-सा थैला लेकर झुग्‍गी के दरवाजे में झाँकती हुई बोली-काकी जल्‍दी चलो, पीठे का सरकारी गुदाम है ना जो गन्‍दे नाले के किनारे बना है, वहाँ पर बाहर पड़ी गेहूँ की बोरियाँ बारिश में फट गयीं है। गेहूँ बोरों से फिसल फिसल कर नाले में बह रहा है। गोमती और सुक्‍खी भी वहीं गई हैं। काकी एक साड़ी रख ले, नाले के पानी से गेंहू छानने के लिये और भरने के लिये कुछ बोरा वगैरह। गन्‍दे नाले के पानी में पड़े गेहूँ साड़ी के कपड़े से छान-छान कर भर लायेंगे।

यह खबर ऐसी थी कि जैसे स्‍विस बैंक में जमा सारा काला धन वापस आ गया हो और सरकार ने मुनादी करा दी हो कि यह जनता का माल है जो चाहे जितना भर कर ले जाये। ममदू की माँ ने कचरा बीनने वाला बड़ा थैला देखा तो वह जगह जगह से फटा हुआ था। उसने झट मैली कुचैली, मुड़ी-तुड़ी पालीथीन की आठ दस छोटी बड़ी थैलियाँ लीं। अपने बदन पर लपेटी पुरानी मैली साड़ी उतारी और ब्‍लाउज़ पेटीकोट में ही ममदू को साथ ले सुरेखा के पीछे भागी।

कुछ देर बाद नाले के गन्‍दे पानी से रिसती गेहूँ से भरी आठ दस छोटी-बड़ी, नीली-पीली, काली सफेद, पालीथीन की थैलियाँ ममदू की झुग्‍गी में रखी थीं। किसी ने कुछ नहीं कहा, पर गेहूँ से भरी यह गन्‍दी पालीथीन की थैलीयाँ ममदू के मन मस्‍तिष्‍क में उसका मुँह चिढ़ाती नाच रही थी, कह रही थी कि माँ ठीक कहती है कि यह गन्‍दी पालीथीन की थैलियाँ कागज़ से कहीं ज्‍यादा अहम्‌ है।

ममदू अपने दिमाग़ में ढेर सारी उथल पुथल लिये, मैला थैला कन्‍धे पर लटकाये अम्‍बेडकर स्‍कूल की बाउन्‍ड्री की जाली के पास खड़ा खेलते-कूदते साफ-सुथरे बच्‍चों को निहार रहा था। एक स्‍कूली बच्‍चा चोरों की तरह इधर-उधर देखता जाली के पास आया जहाँ ममदू खड़ा था। उसने जाली के पास दीवार की मुन्‍डेर पर अपना टिफिन बाक्‍स उल्‍टा कर सारा खाना फेंक दिया और डिब्‍बा बन्‍द कर वापस भाग गया। ममदू ने हाथ बढ़ाकर सारा खाना समेट लिया। फिर वह रोज़ खाने के लालच में उसी बाउन्‍ड्री वाल के पास खड़ा रहने लगा। बच्‍चा जो खाना वहाँ फेंक जाता ममदू उसे उठा लेता। एक दिन ममदू की उस लड़के से बात हो गई। लड़के ने खाना फेंकने का सारा किस्‍सा ममदू को बता दिया। ममदू आँखें फाड़कर उसकी बात सुनता रहा। मम्‍मी रोज़ यह टिफिन बना कर देती है पर यह खाना मुझे अच्‍छा नहीं लगता इसलिये मैं इसे यहाँ फेंक देता हूँ, मम्‍मी समझती है मैंने खा लिया। फिर मैं घर जाकर मिठाईयाँ, चाकलेट, आलू चिप्‍स्‌, बादाम, किशमिश, मैगी सब खाता हूँ। यह सब मुझे बहुत अच्‍छे लगते हैं। लड़के की बातें सुन कर ममदू के मुँह में पानी भर आया। ऐसी स्‍वादिष्‍ट चीज़ो की तो ममदू कल्‍पना भी नहीं कर सकता था। ममदू ने पूछा- इतना सारा सामान तुम्‍हारे यहाँ आता कहाँ से है?

वह बोला- बाजार से! मेरे पापा के पास बहुत पैसे होते है। वह आफिस में काम करते हैं न...! ममदू ने पूछा-आफिस में क्‍या काम होता हैं ? क्‍या वहाँ पैसे बनते हैं ?

वह लड़का बोला- नहीं, वहाँ कागज़ों की फाईलों में काम होता है। मेरे पापा बहुत सारे कागज़ पढ़ते हैं और बहुत सारे कागज़ लिखते हैं। फिर उनको बहुत सारे पैसे मिलते है। बस...फिर हम बाजार जाते हैं और बहुत सारी चीजे़ खरीदते हैं।

ममदू ने आश्‍चर्य से पूछा- क्‍या बैठे-बैठे सिर्फ कागज़ों को पढ़ने लिखने से इतने सारे पैसे मिलते है? ममदू कागज़ की महिमा को अपने अन्‍दर सहजता से महसूस नहीं कर पा रहा था। पर वह बहुत उत्‍सुक था उस लड़के से और बहुत कुछ जानने के लिये ।

लड़का बोला-मेरे पापा कार में बैठकर आफिस जाते हैं, शानदार सूट पहनकर, मेरी माँ भी बहुत अच्‍छी अच्‍छी साड़ियाँ पहनती है और मुझे बहुत प्‍यार करती हैं। हमारा घर भी बहुत बड़ा और बहुत सुन्‍दर है। मैं भी स्‍कूल मे पढ़ाई कर रहा हूँ। मैं भी पापा जैसा बनूँगा, बड़ा आदमी...! इतने में स्‍कूल की घन्‍टी बज गई और बच्‍चा भाग कर अपने दोस्‍तों के टोले में खो गया।

स्‍कूल की घन्‍टी बजना तो बन्‍द हो गई पर ममदू के मस्‍तिष्‍क में सैकड़ों घन्‍टियाँ बजने लगीं। उसके कानों में लड़के के शब्‍द गूँजने लगे...मेरी माँ बहुत अच्‍छी-अच्‍छी साड़ियाँ पहनती है.......। मुझे बहुत प्‍यार करती है....। हमारा घर भी बहुत बड़ा और बहुत सुन्‍दर है। मैं भी स्‍कूल में पढ़ाई कर रहा हूँ.......। मैं भी बनूँगा पापा जैसा बड़ा आदमी...! ममदू को अपने ख्‍यालों में दिखी अपनी झुग्‍गी के दरवाजे पर चीथड़ा लपेटी खड़ी उसकी माँ जो उसे प्‍यार करने के बजाय डाँट रही है, कि पन्‍नी के बदले कागज़ क्‍यों बीनकर लाया ? और उसे भला बुरा कह रही है। वह उदास हो गया और सोचने लगा-क्‍या यह कागज़ की किताबें पढ़ने से छोटा आदमी बड़ा आदमी बन जाता है ? ममदू का बाल सुलभ मन सोचने लगा.. अगर मैं भी कागज़ पढ़ सकूँ तो अच्‍छा-अच्‍छा खाना, अच्‍छे अच्‍छे कपड़े मुझे और मेरी माँ को भी मिलें......! ममदू के हृदय में उसके थैले में पड़े कागज़ों का आकर्षण और बढ़ गया। उसके मन में थैले में पड़े सफेद कागज़ और गन्‍दी पॉलीथीन की थैलियों के बीच जंग होने लगी। उसी उधेड़बुन में वह घर चला गया। माँ ने रोज़ की तरह आज भी उसे भला बुरा कहा पर वह अन्‍दर से पत्‍थर हो गया था।

रात को नींद में उसे सितारों से जगमगाता आसमान दिखा। उसकी माँ एक बहुत सुन्‍दर साड़ी पहने, ढेर सारे गहने अपने ऊपर लादे एक बड़े से घर में, चाँदी के थाल में अच्‍छा-अच्‍छा खाना सजाये, दोनो बाँहें फैलाए उसे पुकार रही है। ममदू बहुत सुन्‍दर कपड़े पहने, हाथ में ढेर सारे कागज लहराते हुए उसकी ओर दौड़ा चला आ रहा है।

सुबह-सुबह लाउड स्‍पीकर के भोंगे की आवाज से उसकी नींद टूटी तो वह भागकर झुग्‍गी से बाहर आया। बाहर हल्‍की बारिश हो रही थी। उसने देखा झुग्‍गी बस्‍ती की तंग गलियों में सरकारी हरकारा एक रिक्‍शा में बैठा चिल्‍ला रहा था-हर बच्‍चे का अधिकार, शिक्षा का अधिकार। अपने बच्‍चों को पास के सरकारी स्‍कूल में पढ़ने भेजिये। सरकार ने बच्‍चों को मुफ्‍त शिक्षा का इन्‍तजाम किया है। वहाँ खाना भी मिलेगा और कपड़ा भी। रिक्‍शा जब ममदू की झुग्‍गी के पास से गुज़रा तो ममदू ने रिक्‍शे पर लगा पोस्‍टर देखा। उस पर लिखा था-“एक बेहतर कल बनाएं, सारे बच्‍चे स्‍कूल जाएं। कोई बच्‍चा छूट न पाए, हर बच्‍चा स्‍कूल जाए।” ममदू यह सब तो पढ़ नहीं सका, पर उसने देखा कि एक पेन्‍सिल पर सवार दो बच्‍चे बस्‍ते लटकाए मुस्‍कुराते हुए उड़े चले जा रहे हैं। एक माँ अपने बच्‍चे को गोद में बिठाए, स्‍लेट पर उसको लिखना सिखा रही है। मुख्‍यमंत्रीजी बच्‍चे को गोद में उठा कर मुस्‍कुरा रहे हैं। ममदू पोस्‍टर पर यह सब देखकर गद्‌गद्‌ हो गया। वह भागकर घर में आया। उसने माँ को देखा, वह सब तरफ से अंजान चूल्‍हे के पास चाय बना रही थी। बाहर भोंगे की आवाज का उस पर कोई असर नहीं था। वह पुलकित हो बोला-माँ मैं भी स्‍कूल........! जीने की उहापोह में माँ ने ममदू के शब्‍द सुने ही नहीं। आधे शब्‍द पानी के बुलबुले की तरह ममदू के मुँह में ही घुल गये। माँ ने कहा-“यह चाय पी ले और जल्‍दी जा अपने काम पर। देर होने पर मुँआ हरमू सब पन्‍नी बीन कर ले जायगा, तेरे जाने से पहले। सुबह बहुत जल्‍दी उठ कर भागता है हरामी..!” और एक टूटा कप बदरंग मैली चाय से भरा ममदू की ओर बढ़ा दिया। ममदू ने चाय के कप में झाँक कर देखा। एक क्षण के लिये वह कहीं खो गया। उसे लगा उसके नन्‍हे हाथों में एक सुनहरी प्‍याला है जिसमें उसके सारे सपने मोतियों की तरह भरे हैं। वह मोतियों को खुश होकर निहार ही रहा था कि- ”जा जल्‍दी कर...!” माँ की कठोर आवाज़ से घबराकर सुनहरी प्‍याला उसके हाथ से छूट गया। सारे सपनों के मोती बिखर गये। टूटे कप के टुकड़े और बदरंग मैली चाय झुग्‍गी के कच्‍चे फर्श पर फैल गई।

 

अखंड भारत के अजेय शिल्पकार  : सरदार वल्लभ भाई पटेल 

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लौहपुरुष की व्यवहारिक दूरदृष्टि ने बचाया देश का विश्व-वैभव 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

फ्रैंक मोराएस ने लिखा है  कि एक विचारक आपका ध्यान आकर्षित करता है,एक आदर्शवादी आदर का आह्वान करता है, पर कर्मठ व्यक्ति, जिसको बातें कम और काम अधिक करने का श्रेय प्राप्त होता है,लोगों पर छा जाने का आदी होता है, और पटेल एक कर्मठ व्यक्ति थे। शायद यही कारण है कि सरदार पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाता है लेकिन उनकी सफलताएं उनसे भी बडी है क्योंकि उन्होनें ऐसे माहौल में काम किया जो कि बहुत कठिन थे। उन्होंने छोटी-छोटी रियासतो और जागीरों को, जहां अलग अलग भाषाएं, परंपराएं और धर्म थे, को एक देश के रूप में एकीकृत किया, जहां आज विश्व की 17.5 प्रतिशत आबादी रहती है। स्मरण रहे कि इस विश्व में सबसे बडी जनसंख्या के रूप मे भारत का प्रभाव सरदार पटेल के योगदान के कारण है।

सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण जैसे असंभव दिखने वाले कार्य को उस समय अंजाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस उपमहाद्वीप को हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और छोेटे-छोटे रजवाड़ों के समूह के रूप में बांटना चाहते थे । अगर सरदार पटेल निरंतर प्रयास न करते तो आज भारत की जगह बहुत सारे देश होेते जो एक दूसरे से लडते रहते। उन्होंने जगह-जगह घूमकर सब राजाओं को एकसाथ जोडकर भारत बनाने के लिए राजी किया, उन्हें सबको इकटठा करने में थोडा समय लगा और उन्हें इसके इसके लिए हिंसा बल का प्रयोग नही करना पड़ा।

आज़ादी की रक्षा की दीवानगी

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आजादी के बाद भारत को एक अखंड स्वरूप देने में लौह पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को भुलाया नही जा सकता और माना जाता है कि उनके जैसे धैर्यवान और दूरदर्शी नेतृत्व के कारण ही छोटी छोटी रियासतों में बंटे भारत को एकजुट किया जा सका था। एक अनुशासित व्यक्तित्व के स्वामी सरदार पटेल ने वीपी मेनन समेत कई सहयोगियों की मदद से 500 से भी ज्यादा रियासतों को भारतीय संघ में शामिल होने के लिए मना लिया था। इनमें से अधिकांश रियासतों ने आजादी की पूर्व संध्या से पहले ही  भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस ऐतिहासिक एकीकरण के चलते ही भारत को आजादी खंडित टुकड़ों के बजाय एक अखंड राष्ट्र के रूप में मिल सकी। आजादी की घोषणा होने के बाद भारत में मौजूद सैंकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों को एकसाथ मिलाना सबसे मुश्किल काम था, लेकिन लौह पुरुष ने यह कर दिखाया। 

अंग्रेजियत से इनकार-खादी स्वीकार

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इंग्लैंड से वकालत पढ़कर आए पटेल गुजरात के प्रसिद्ध वकीलों में शुमार थे। गांधी जी के व्यक्तित्व और उनके विचारों से प्रभावित होने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए थे। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अपने तमाम अंग्रेजीदां कपड़ों को आग के हवाले कर पूरी तरह से खादी अपना ली थी। उनका आजाद भारत का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय था लेकिन पटेल ने गांधी जी के कहने पर प्रधानमंत्री बनने का विचार सोच छोड़ दिया। इस पूरे दौर में ही पटेल और नेहरू के बीच कई मसलों को लेकर मतभेद रहे लेकिन उन्होंने राष्ट्रहित में इन मतभेदों को दरकिनार किया था।

सरदार पटेल भारत के देशभक्तों में एक अमूल्य रत्न थे। वे भारत के राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम में अक्षम शक्ति स्तम्भ थे। आत्म-त्याग, अनवरत सेवा तथा दूसरों को दिव्य-शक्ति की चेतना देने वाला उनका जीवन सदैव प्रकाश-स्तम्भ की अमर ज्योति रहेगा। वास्तव में वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। इस मितभाषी, अनुशासनप्रिय और कर्मठ व्यक्ति के कठोर व्यक्तित्व में कौटिल्य जैसी राजनीतिक सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अब्राहम लिंकन जैसी अटूट निष्ठा थी। जिस अदम्य उत्साह, असीम शक्ति, मानवीय समस्याओं के प्रति व्यवहारिक दृष्टिकोण से उन्होंने निर्भय होकर नवजात गणराज्य की प्ररम्भिक कठिनाइयों का समाधान अद्भुत सफलता से किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया। 

मनसा-वाचा-कर्मणा देशभक्त

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सरदार पटेल मन, वचन तथा कर्म से एक सच्चे देशभक्त थे। वे वर्ण-भेद तथा वर्ग-भेद के कट्टर विरोघी थे। वे अन्तःकरण से निर्भीक थे। अद्भुत अनुशासन प्रियता, अपूर्व संगठन-शक्ति, शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता उनके चरित्र के अनुकरणीय अलंकरण थे। कर्म उनके जीवन का साधन था। संघर्ष को वे जीवन की व्यस्तता समझते थे। गांधीजी के कुशल नेतृत्व में सरदार पटेल का स्वतन्त्रता आन्दोलन में योगदान उत्कृष्ट एवं महत्त्वपूर्ण रहा है। स्वतन्त्रता उपरान्त अदम्य साहस से उन्होंने देश की विभिन्न रियासतों का विलीनीकरण किया तथा भारतीय प्रशासन की निपुणता तथा स्थायित्व प्रदान किया। 

स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड (डिविजन) उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा।

संघर्ष को सौभाग्य मानने वाले वीर

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संघर्ष को सरदार पटेल जीवन की व्यस्तता और सौभाग्य समझते थे। किसानों की दयनीय स्थिति से वे कितने दुखी थे इसका वर्णन करते हुए पटेल ने कहा - किसान डरकर दुख उठाए और जालिम का लातें खाये, इससे मुझे शर्म आती है। और मैं सोचता हूँ कि किसानों को गरीब और कमजोर न रहने देकर सीधे खड़े करूँ और ऊँचा सिर करके चलने वाले बना दूँ। इतना करके मरूँगा तो अपना जीवन सफल समझूँगा। 

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा काल में ही उन्होंने एक ऐसे अध्यापक के विरुद्ध आंदोलन खड़ाकर उन्हें सही मार्ग दिखाया जो अपने ही व्यापारिक संस्थान से पुस्तकें क्रय करने के लिए छात्रों के बाध्य करते थे। सरदार पटेल के ऐतिहासिक कार्यों में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण, गांधी स्मारक निधि की स्थापना, कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा आदि कार्य सदैव स्मरण किए जाते रहेंगे। उनके मन में गोआ को भी भारत में विलय करने की इच्छा कितनी बलवती थी, इसका उद्धहरण ही काफी है। माना जाता है कि यदि लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रधानमंत्री बनते तो कश्मीर भारत के लिए आज समस्या नहीं होता. कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, वह भी भारत के पास होता.पाक अधिकृत कश्मीर की एक-एक इंच भूमि मुक्त करा ली गई होती। आपकी सेवाओं, दृढ़ता व कार्यक्षमता के कारण ही आपको लौहपुरुष कहा जाता है।

आज भी देश का लगभग आधा भाग सांप्रदायिक एवं विघटनकारी तत्वों की चपेट में फंसा दिखाई देता है, ऐसी संकट की घड़ी में सरदार पटेल की स्मृति हो उठना स्वभाविक है।  देश को एक करने वाला यह लौह पुरुष 15 दिसंबर,1950 को हम सबको अलविदा कह गया। वे वास्तव में भारत की आन-बान-शान के प्रतीक हैं। 

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी कालेज,

राजनांदगांव, मो.9301054300

प्रेरक प्रसंगः-

मेरे आदर्श शिक्षक आज भी अनुकरणीय हैं-

शशांक मिश्र भारती

तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।

करता करै न कर सकै गुरु करै सो होय ।।

उपर्युक्त पंक्तियों को सार्थक करने वाले गुरुजनों का संरक्षण किसके जीवन में जीवन्तता, परिवर्तन न ला देगा। निश्चय ही ऐसे गुरुजनों की खोज प्रत्येक जिज्ञासु शिक्षार्थी को रहती है। मैंने शिक्षा प्राप्त करने के विविध वर्गों-प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च-उच्चतर में बार-बार ऐसा अनुभव किया और जीवन को एक निश्चित दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले श्रद्धेय गुरुजन से प्रथम साक्षात्कार कक्षा ग्यारह में प्रवेश के समय साल 1989 जलाई पुवायां इण्टर कालेज पुवायां शाहजहांपुर उ.प्र. में हुआ।

जी हां वह सम्मानित पूजनीय गुरुजन श्री मथुराप्रसाद शर्मा प्रवक्ता भूगोल तीन दशक से अधिक समय से शिक्षण में संलग्न थे। उनके पढ़ाये हुए छात्रों ने पहले से ही भयभीत कर रखा था, कि शर्मा जी बड़े सख्त हैं पूरा दुर्वासा समझो। समय से कक्षा में प्रवेश करते हैं तथा प्रत्येक विद्यार्थी की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हुए समय पर ही शिक्षण कार्य समाप्त करते हैं। कभी -कभी आवश्यक होने पर अतिरिक्त कक्षायें भी लेते हैं। पढ़ने वाले लगनशील व परिश्रमी छात्र उनके शीघ्र प्रिय छात्र बन जाते हैं। इस तरह की बातें मेरे मस्तिष्क में थी। इसलिए कदम फूंक -फूंक कर रख रहा था पहले दिन कक्षा में प्रवेश किया; तो सभी उनके सम्मान में उठकर खड़े हो गये उन्होंने -'बैठो' कहा ! उसके बाद सामान्य परिचय की औपचारिकता पूरी की। फिर शिक्षण कार्य प्रारम्भ कर दिया। वादन समाप्त होने पर कक्षा से बाहर जाने से पूर्व उन्होंने कहा -''आप लोग पुस्तक व कापियों की व्यवस्था अतिशीघ्र कर लें ताकि पढ़ाई व्यवस्थित रूप से प्रारम्भ हो सके और हां यदि किसी को विषय से सम्बन्धित कोई समस्या हों; कुछ पूछना हो तो किसी भी समय निःसंकोच आ सकता है।''

उसके बाद मान्य गुरुवर के सानिध्य में भूगेाल विषय का अध्ययन प्रारम्भ हो गया। दो वर्ष के अध्ययन काल में शिक्षण के सैद्धान्तिक व व्यावहारिक दोनों पक्षों पर उनकी कर्मठता, नियमितता व गम्भीरता देखी ।कई बार अपने सहयोगियों को असन्तुष्ट कर भी हम लोगों को समय देने में संकोच न करते। जीवन में अनुशासन व आचरण की पवित्रता उनके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण विशेषता थी। पाठ्यक्रम अधिक होने के बाद भी पूर्ण करवाने का भरसक प्रयास करते। आपस में चर्चायें करवाकर व्यावहारिक पक्ष सुदृढ़ करते। भूगोल सम्बन्धी उपकरण, मानचित्र, ग्लोब, चट्टानें व भूपत्रक स्वंय प्रयोग कर समझने को कहते। आवश्यकता होने पर प्रायोगिक कक्षाओं के लिए अवकाश में भी बुलाते। दो वर्ष में एक दिन भी वे देर से विद्यालय पहुंचे हों या कक्षा खाली रही हो। ऐसा अवसर न आया और न ही कभी अनुशासन के लिए डण्डा पकड़े या डांटते हुए देखा।

एक बार की बात है। वह मुझे भारत का मानचित्र (अक्षांशीय व देशान्तरीय विस्तार के आधार पर ) बनाना समझा रहे थे; कि विज्ञान अध्यापक श्रीवास्तव आगये और कहा-''चलो देर हो रही है, इनको कल समझा देना।'' उन्होंने जवाब देते हुए कहा-''आपको जल्दी है तो जाइये। मुझे इस लड़के को आज ही समझाना है।'' उसके बाद श्रीवास्तव जी वहीं रुक गये और बाद में शर्मा जी के साथ ही गये। इससे मैंने समझा निश्चय ही शर्मा जी ने शिक्षण के उपयोग व महत्व को समझकर ही अपने जीवन में उतारा था और जिसे वह पूर्णतया अपने छात्रों में भरना चाहते थे। कभी - कभी वह कहते थे कि जब कोई प्रश्न पूछे या कोई बात जानना चाहे। तो उसका पूरा जवाब दो। अधूरे जवाब से न पूछने वाला सन्तुष्ट हो पायेगा और न तुम्हारे ज्ञान की सच्ची परख होगी। इसके अतिरिक्त उनकी दिनचर्या साधारण वेशभूषा ,बोलचाल का शालीन ढंग, व्यसनों से मुक्त व्यक्तित्व भी धीरे -धीरे प्रभावित कर रहा था। इण्टर उत्तीर्ण करने के बाद जब भी अवसर मिला या सामने पड़े आशीर्वाद अवश्य लिया होगा। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद से सम्पर्क न हो सका; परन्तु मेरे हृदय में उनके प्रति श्रद्धा व विश्वास ज्यों का त्यों है।

शर्मा जी के अतिरिक्त हाईस्कूल में श्री देवेन्द्र कुमार शुक्ल (हिन्दी अध्यापक), स्नातक में डा.नित्यानन्द मुदगल (हिन्दी प्राध्यापक) व शिक्षास्नातक में डा.गिरिजानन्दन त्रिगुणायत आकुल के व्यक्तित्व व कृत्तित्व ने मुझे कहीं न कही और किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है

मैंने ऐसे अपने गुरुजनों का विशेषकर उल्लेख किया है। जिनके विद्यार्थियों के मध्य उद्देश्य स्पस्ट थे। विषयवस्तु चरण दर चरण उद्देश्यों के अनुरूप रहती थी। उनके पढ़ाने तरीका व तकनीक विषय वस्तु के अनुकूल रहती थी। किसी प्रकरण को आरम्भ करने के पूर्व वे उसकी भूमिका ऐसे बांधते थे कि जिसे सुनकर विद्यार्थी सीखने के प्रति उत्सुक हो पूरी तन्मयता से सुनते। यही नहीं इनके द्वारा पूर्ण पैकेज को एक साथ न पढ़ाकर पाठ को छोटे -छोटे खण्डों में विभक्त कर पढ़ाया जाता था और यह जानने का प्रयास रहता कि छात्र-छात्राओं ने कितना सीखा- समझा। यही नहीं वे विषय वस्तु की क्रमबद्धता-तर्कसंगतता सीखने के प्रति विद्यार्थियों की सक्रियता, प्रश्न पूछने की छूट देना उनसे सौहार्दपूर्ण व उत्साहवर्द्धक तरीके से चर्चा करते थे। इनकी विषयवस्तु पर पूरी पकड़ थी कहीं पर कोई चूक नहीं करते थे समयबद्धता योजनाबद्ध तैयारी पाठ से भटकाव होने ही नहीं देती थी ।यह बार यह जानने का कोशिश करते थे कि बच्चे समझ रहे हैं या नहीं उनकी रुचि है या नहीं, पाठ समाप्त करने के पहले ये सम्मानित जन उसकी मुख्य- मुख्य बातों दोहरा देते थे कई बार बोलकर अथवा श्यामपट पर लिख कर तारतम्य बिठा देते थे। कुल मिलाकर अपने विषय के ज्ञाता, पढ़ाने के ढंग की समय- समय पर समीक्षा करने वाले, प्रसन्नचित, सामूहिकता से कार्य करने अपने संस्थान पर गर्व की भावना से युक्त, निष्पक्ष, अपने कर्त्तव्य के प्रति ईमानदार रहे।

मैं इनके अतिरिक्त कक्षा एक से लेकर एम.ए. बी.एड. तक अपने समस्त गुरुजनों के प्रति भी नतमस्तक हूं और अपने जीवन में बिखरे रंगों व आयामों के लिए उनका आजीवन आभारी हूं। सभी की अनुकम्पा को शब्दों में पिरोना सम्भव नहीं है। सामान्यतः विद्यार्थी के लिए सभी गुरुजन समान ओर पूजनीय होते हैं इसी के साथ माध्यमिक के एक गुरुजन श्री अग्रवाल के उल्लेख के बिना न्याय न होगा जिन्होंने कक्षा दस में केवल दो ही वादनों में आकर दर्शन दिये और अर्थशास्त्र जैसे महत्वपूर्ण विषय में प्रसाद रूपी ज्ञान पुष्प दे गये।

मैंने अपने शिक्षणकाल के आरम्भ से ही चाहे वह प्राथमिक वर्ग रहा हो या उसके बाद माध्यमिक; अपने गुरुजनों के बतलाये-दिखलाये श्रेष्ठ पथ का सदैव अनुकरण करने का प्रयास किया है। सफल भी रहा हूं।भले ही इसके लिए मुझे कक्षा-कक्ष के दूषित-गन्दे वातावरण, सहयोगियों के असहयोग, छींटाकशी, प्रधानाचार्य-प्रबन्धकों के अनावश्यक हस्तक्षेप को जानबूझकर अनदेखा करना पड़ा हो। कई बार आवश्यकता से अधिक परिश्रम किया है। व्यक्तिगत रूप से आज भी अपने श्रेष्ठ आचरणवान, परिश्रमी, मार्गदर्शक गुरुजनों द्वारा स्थापित आदर्शों व मूल्यों के अनुपालन के लिए प्रयासरत हूं और जीवन पर्यन्त रहूंगा।

यदि वर्तमान में शिक्षण-प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम आदि शिक्षा के विविध अंगों को देखें तो परिस्थितियां अत्यन्त कठिन होती जा रही हैं। कर्त्तव्य से अधिक पैसे को महत्व देने वालों की संख्या बढ़ रही है। नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर आचरण हीनों की संख्या बढ़ा रहा है। छल -बल के दम पर ऊँची डिग्रियां, अंक, नौकरी, स्थानान्तरण पाने वाले हावी हो रहे हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज व सरकारें सभी अपने दायित्व निर्वहन के प्रति गम्भीर नहीं हैं। कर्त्तव्य व अधिकार के मध्य सामंजस्य घट रहा है। रही - सही कसर सर्वशिक्षा अभियान, रमसा व एमडीएम के सदुपयोग न हो पाने से पूरी हो जा़ रही है ।पानी की तरह पैसा खर्च होने के बाद भी परिणाम ढाक के तीन पात से संकुचित हो रहे हैं। ऐसे में निराश होने से श्रेष्ठ है कि सार्थक प्रयास किये जायें कदाचित ही सही शिक्षक इन पक्तियों को ध्यान में रखें-

शिक्षक से ही निर्मित होता है , बालक का व्यक्तित्व ।

वही उसे सफल बनाता , उपजाता जग में अस्तित्व।।

 

28.10.2014

शशांक मिश्र भारती हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र.

पोलियो के पहले टीके के जन्मदाता को भुला दिया ?

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

शायद ही कोई ऐसा जागरूक नागरिक हो जो भारत के पल्स पोलियो अभियान और दो बूँद ज़िंदगी की जैसे कैम्पेन को न जानता हो। बच्चो के स्वच्छ और साफ़ सुथरे रहने का भी पोलियो से बचाव का गहरा नाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जोनास सॉल्क एक अमेरिकी चिकित्सा शोधकर्ता और विषाणुशास्त्री थे, जिन्हें पोलियो के पहले सुरक्षित और प्रभावी टीके के विकास के लिए जाना जाता है ?अगर नहीं तो गौर कीजिए कि न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में मेडिकल स्कूल में पढ़ते हुए सॉल्क ने एक चिकित्सक बनने की बजाए चिकित्सा अनुसंधान की ओर कदम बढ़ा कर अपने लिए अलग राह चुनी।वर्ष 1955 में जब सॉल्क ने पोलियो का टीका पेश किया।

पोलियो को युद्ध के बाद के दौर का सबसे भयावह स्वास्थ्य समस्या माना जाता था। 1952 तक इस बीमारी से प्रतिवर्ष तीन लाख लोग प्रभावित और 58 हजार मौत हो रही थी, जो अन्य दूसरी संक्रामक बीमारी की तुलना में सबसे ज्यादा थी। इनमें से ज्यादातर बच्चे थे। 

राष्टपति रूजवेल्ट की वह पहल

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याद रहे कि राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट इस बीमारी के सबसे ख्यात शिकार थे, जिन्होंने इस बीमारी से लड़ने के लिए टीका विकसित करने के लिए एक संस्थान की स्थापना की। छोटे-छोटे बच्चों को पोलियो जैसी भयंकर बीमारी से बचाने वाले फरिश्ते का जन्मदिन 28 अक्टूबर को था। डॉक्टर जोनास सॉल्क जिन्होंने बच्चों को पोलियो का शिकार हो जाने से बचाया व पोलियो दवा का आविष्कार किया। उनके 100वें जन्मदिन के खास मौके पर विश्व का सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल उन्हें श्रद्धाजंलि अर्पित की। आज गूगल डूडल पर उनकी तस्वीर दिखाई गई जिसमें एक ओर डॉक्टर जोनास दिखाई दे रहे हैं व दूसरी ओर कुछ बच्चे हैं जिनके हाथ में 'थैंक्यू डॉक्टर सॉल्क' नाम का एक साइन बोर्ड है। वास्तव में गूगल बधाई का पात्र है कि दुनिया की पोलियो जैसी बड़ी चुनौती के लिए अपनी ज़िंदगी की राह मोड़ देने वाले इस महान व्यक्तित्व को याद किया। लेकिन अफ़सोस की बात है कि नौनिहालों को भविष्य की बेबस ज़िंदगी से बचाने वाले इस मसीहा के नाम पर कोई 'विश्व दिवस' नहीं मनाया गया।

डाक्टर सॉल्क का यादगार योगदान

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डॉक्टर जोनास सॉल्क का जन्म 28 अक्टूबर,1914 में अमेरिका की न्यूयार्क सिटी में हुआ था। वे एक महान शोधकर्ता के रूप से जाने जाते है। डॉ.सॉल्क द्वारा बनाई गई पोलियो दवा के उपलब्ध होने के ठीक 2 वर्ष पहले तक अमेरिका में 45,000 से भी ज्यादा लोग पोलियो के शिकार हो चुके थे लेकिन उनकी इस महान खोज के बाद यह संख्या 1962 में घटकर मात्र 910 ही रह गई। इस महान व्यक्ति ने न्यूयॉर्क के विश्वविद्यालय से वर्ष 1939 में दवा क्षेत्र में एम.डी की डिग्री हासिल की थी जिसके बाद जल्द ही वे माउंट सिनाई अस्पताल में चिकित्सक के रूप में काम करने लगे। विभिन्न तरीके के शोध में उनकी बढ़ती हुई दिलचस्पी ने उन्हें मिशिगन के विश्वविद्यालय में एक खास तरह के शोध पर काम करने का मौका दिया।

डाक्टर सॉल्क ने पिट्सबर्ग के औषधि विद्यालय में भी काम किया जहां उन्होंने पोलियो की दवा बनाने की तकनीकों को सीखा। आखिरकार विभिन्न संगठनों में काम करने के बाद जब डॉ. सॉल्क ने पोलियो दवा का आविष्कार कर लिया तो पहली बार इसे बंदरों पर आजमाया गया। इसके बाद इसे कुछ मरीजों पर आजमाया गया जिन्हें पहले से ही पोलियो था। इसके बाद तो जैसे डॉ. सॉल्क की इस महान खोज की खबर पूरे विश्व में फैल गई और इसे वर्ष 1954 में लाखों बच्चों पर आजमाया गया। अंत में साल 1955 में पोलियो दवा को सुरक्षित व लाभकारी करारा दिया गया।

भारत जब हुआ पोलियो मुक्त

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गौरतलब है कि पोलियोको पोलियोमेलाइटिस भी कहा जाता है। यह विषाणु जनित रोग है जिससे इसके कारण शरीर के किसी भी हिस्से में पक्षाघात हो सकता है। 13 जनवरी, 2011 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में भारत में 18 माह की बच्ची का अंतिम मामला सामने आया। विश्व में भारत ऐसा देश था जहां से पोलियो का उन्मूलन सबसे मुश्किल माना जाता था। वर्ष 2009 में भारत में पोलियो के पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा 741 मामले सामने आएे। 2010 में 42 और 2011 में भारत में सिर्फ 1 मामला सामने आया। उसके बाद लगातार 3 वर्ष पूरे होने के बाद 11 फरवरी 2014 को भारत ने पोलियो के खिलाफ जीत की उपलब्धि हासिल की। लिहाज़ा पहली पोलियो वैक्सीन विकसित करने वाले डाक्टर सॉल्क को भला कैसे भुलाया जा सकता है।पोलियो की दवा इस महान आविष्कारक डॉ. जोनास सॉल्क का 23 जून, 1995 में 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

चिकित्सकों के मुताबिक़ पोलियो से बचाव के बचाव के लिए स्वच्छता सबसे पहला उपाय है। खाना खाने से पहले और शौच के बाद साबुन से हाथ धोना बहुत जरूरी है क्योंकि इस बीमारी का विषाणु मल के संपर्क में आने से ही फैलता है। इसलिए खाद्य एवं पेय पदार्थों को मक्खियों एवं इसी प्रकार के अन्य जीवों से दूर रखना चाहिए। ये एहतिहात तो मौजूदा दौर में भी हाथ धुलाई दिवस या दीगर शक्लों में नज़र आता ही है। फिर भी, दुःख इस बार का है कि गरीबी, कुपोषण और हमारी लापरवाही के चलते ऎसी सफाई और धुलाई भी चार दिन की चांदनी बन कर रह जाती है। 

पोलियो के बाद गंदगी को अलविदा

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जी हाँ ! भारत को पोलियो मुक्त करने के गर्व बोध पर पूरे देश का हक़ है किन्तु अभी गंदगी मुक्ति की बड़ी चुनौतियाँ मुंह बाए खडी है। फिर भी,यह क्या कम है कि लोग जाग रहे हैं। स्वच्छ भारत के लिए, स्वस्थ भारत के लिए चलाये जा रहे महायज्ञ में आहूति देकर हम सब पोलियो की विदाई की तर्ज़ पर ही सही लेकिन कुछ अलग अंदाज़ में जानदार नारा बुलंद कर सकते हैं - गंदगी भारत छोड़ो। 

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हिन्दी विभाग,दिग्विजय कालेज

स्कूल बैग की व्यथा(हास्य व्यंग्य)

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मैं हूँ बैग, आपने रोज मुझे सड़कों पर आते-जाते बच्‍चों के कंधों पर लटका देखा होगा। मेरी जिन्‍दगी की कहानी बड़ी दुखभरी हैं। मैं सुबह जल्‍दी उठता हूँ और रात भर देर तक जागता हूँ । कभी-कभी तो बच्‍चे मुझे तकिया बना लेते हैं। रोजाना छः बजे उठकर किसी के कंधे पर लटककर चलना, रात को उपेक्षित सा पड़ा रहना मुझे बुरा लगता हैं। जब बच्‍चे सुबह-सुबह ढेरों कॉपी-किताब भरकर कंधे पर लटकाते हैं तो मुझे उनकी पीठ से चुभन होती हैं, उनके उठते कंधे के दर्द से बैचेनी अनुभव करता हूँ। दर्द उन्‍हें होता हैं और हिलाते-डुलाते मुझे हैं। पुस्‍तकों के ढ़ेर से बच्‍चे परेशान होकर मुझे कोहनी तक मार देते हैं। मेरे वजन के बोझ से वे तो पैन किलर लेकर दर्द दूर कर लेते हैं, लेकिन मैं तो ये भी नहीं कर सकता।

बच्‍चे विद्यालय जाते हैं, उन पर जब मैं नहीं उठता हूँ तो उनके रिश्‍तेदार या माता-पिता मुझे लटकाकर ले जाते हैं। कभी-कभी तो दुःखी बच्‍चे मुझे उतारकर फेंक देते हैं जिससे मेरे कपड़े छिल जाते हैं। सुबह उठकर मुझे सभी की मनहूस गालियाँ तक सुननी पड़ती हैं। अध्‍यापकों तथा शिक्षाविभाग द्वारा निर्धारित कोर्स बच्‍चे मेरे अंदर रखकर विद्यालय जाते हैं, परेशान होते हैं और गालियाँ मुझे पड़ती हैं।

बच्‍चे मुझे हेय दृष्‍टि से देखते हैं, परिवार के लोगों का कोप मुझ पर बरसता हैं। इतना भी हो तो बस․․․․․। लेकिन बच्‍चे जब मुझे फाडकर नष्‍ट कर देते हैं तो वे बाजार से नया मंहगा बैग फिर खरीद लाते हैं। खर्चा परिवार का होता हैं, बच्‍चों की जिद होती हैं लेकिन मेरा दोष तनिक मात्र भी न होने पर डाँट मुझे ही पड़ती हैं, नाम मेरा ही आता हैं। मेरे अन्‍दर पड़ी पुस्‍तकों को कोई कुछ नहीं कहता, शिक्षा विभाग को कोई कुछ नहीं कहता। मुझे तो ये समझ नहीं आता कि क्‍या शिक्षा विभाग में निर्धारित पुस्‍तकों का निर्णय करने वाले अधिकारीगणों के बच्‍चे शिक्षा के इस बोझ तले नहीं दबते हैं क्‍या उनके बच्‍चों के हाथ-पैर मशीनी हैं।

लेकिन ․․․․․․․․ मैं अपनी व्‍यथा किससे कहूँ? मजबूर हूँ मानव के अत्‍याचारों को सह रहा हूँ, आप तक बात पहुँचाना चाहता था जो पहुँचा दी․․․․․․․․।

आगे आपकी मर्जी, अपुन को तो बस सहन करने की आदत सी पड गयी हैं

 

 

विनय भारत

कवि एवं साहित्यकार

बुलेट ट्रेन

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अभी हाल ही में केन्द्रीय सरकार ने घोषणा की है कि देश में जल्दी ही बुलेट ट्रेन चलाई जाएगी। यह खबर बहुत से परिवारों के लिए बिलकुल ऐसी है जैसे उन परिवार के राजदुलारों को नई दुल्हन की सौगात मिलने वाली हो। बुलेट ट्रेन मेल ट्रेनों का लेटेस्ट वर्जन है। नये वर्जन को हर राजदुलारा इस्तेमाल करना चाहता है। यह बुलेट ट्रेन नजाकत-नफासत से भरपूर, साज-सज्जा में अनूठी, इठलाती-बलखाती अति तीव्र गति वाली और अन्य मेल ट्रेनों से अधिक सुविधा देने वाली होगी। 
नवेली दुल्हन भी तो मनमोहने वाली, सुख देने वाली, इतर-फुलेल की गंध महकाने वाली और छम-छम पायल बजाकर घर को सुमधुर  करने वाली होती है। राजदुलारों के लिए जैसे बुलेट ट्रेन एक वस्तु है, एक सुविधा है, वैसे ही उनके लिए दुल्हन भी एक वस्तु होती है, एक सुविधा होती है। इसलिए हर राजदुलारे के मन में दुल्हन का भी नया वर्जन पाने का सपना हर समय पलता रहता है। ससुराल पक्ष वाले यदि पुराने वर्जन वाली दुल्हन को ही इस्तेमाल करने के लिए इन राजदुलारों को अन्य भौतिक वस्तुओं के लेटेस्ट वर्जन भेंट करते रहते हैं तो वे पुरानी दुल्हन को घर की सफाई, भजन-पूजा, रसोई और कभी-कभी वैकल्पिक सुविधा के रूप में इस्तेमाल करके मर्यादा को कायम रखे रहते हैं। ऐसे में वे अन्य तरीकों से दुल्हन के ‘यूज एंड थ्रो’ वाले नये-नयेे वर्जन इस्तेमाल करते रहते हैं।
चूंकि इन परिवारों के नौनिहालों को हर चीज का लेटेस्ट वर्जन चाहिए होता है। इसलिए उनके लिए बुलेट ट्रेन की खबर निश्चित ही सुख की अनुभूति कराने वाली है। और दुल्हन के नये वर्जन को पाने की सुस्त पड़ी इच्छा को जगाने वाली है। ये राजदुलारे साम-दाम-दंड-भेद के जरिए हर चीज का नया वर्जन प्राप्त कर लेते हैं। ओल्ड वर्जन की दुल्हन की जगह नये वर्जन की दुल्हन प्राप्त करना किसी सामान्य आदमी के लिए कठिन काम होगा, पर इन राजदुलारों के लिए नहीं। ये ओल्ड वर्जन की दुल्हन को विदा करने में नाइंटी परसेंट कामयाब रहते हैं और फिर आराम से लेटेस्ट कार, कैमरा, मोबाइल, बूट, चश्मों के नये वर्जन की तरह नये वर्जन की दुल्हन प्राप्त कर लेते हैं। 
अब आप राष्ट्रीय दृष्टिकोण से आम नागरिक की तरह सोचिये। जिस तरह आप किसी माल या आधुनिक गगनचुंबी इमारत के आगे खड़े होकर गर्व का अनुभव करते हैं कि दुनिया में सबसे अधिक गरीब आबादी वाले हमारे देश ने भी तरक्की की है और वह लंदन, पेरिस के मुकाबले आधुनिकता के मामले में सिर उठाए खड़ा है। उसी प्रकार आप बुलेट ट्रेन चलाये जाने की खबर पर गर्वित हो सकते हैं। खुश हो सकते हैं। अपने को सुखी महसूस कर सकते हैं कि हमारे भ्रष्टाचार में डूबे भारत में भी अभी इतना दम है कि वह दुनिया की सबसे अधिक गति की बुलेट ट्रेन चलाकर अपने नागरिकों को सुखी कर सकता है। इसीलिए बुलेट ट्रेन चलाये जाने की यह खबर सबके लिए निश्चित ही सुख देने वाली है।
बुलेट ट्रेन चल जाएगी तो निश्चित ही उससे देश के नागरिकों को फायदा होगा। अमीर उसमें यात्रा कर सकेंगे। गरीब  प्लेटफार्म टिकट लेकर स्टेशन पर जाकर बुलेट ट्रेन को छूकर और अन्दर झाँककर बुलेट ट्रेन को देख आनंदित हो सकेंगे, जिससे वे उसकी भव्यता का लोगों से जिक्र कर गर्व का अनुभव कर सकें। सुख प्राप्त कर सकें। हां भिखारियों को बुलेट ट्रेन छूने और अंदर जाकर उसकी भव्यता देखने की इजाजत नहीं होगी। वे सिर्फ दौड़ती हुई बुलेट ट्रेन को ही देख सकेंगे। हां यदि उनकी इच्छा ज्यादा ही बलवती हो तो वे चलती बुलेट ट्रेन के आगे कूदकर गोलोकधाम की यात्रा पर अवश्य जा सकते हैं। गोलोकधाम यात्रा पर वैसे कोई भी जा सकता है, इसके लिए सिर्फ उन्हें इस बात का ध्यान रखना होगा कि वे अपनी इस योजना का पूर्वाभास किसी को न होने दे, वर्ना बजाय गोलोकधाम की यात्रा के उन्हें जेल की यात्रा करनी पड़ेगी।
सोचिये कितना भव्य और मनमोहक नजारा होगा। सतरंगी परिधान पहने ड्रेगन-सुन्दरी रूपी यह बुलेट ट्रेन मधुर मिलन के लिए आतुर कामिनी के कर्णप्रिय स्वर में पुकारिती, बलखाती और फर्राटा भरती हुई पटरियों से गुजरेगी। पटरियों के दोनों ओर दर्शर्नार्थी पुलकित और कौतुक भाव से खड़े होंगे। इनमें वे लोग भी होंगे जो गोलोकधाम की यात्रा पर जाने की मंशा रखते़ होंगे। मेरा मानना है कि इस मनोरम ट्रेन को देखने के बाद गोलोकधाम जाने की इच्छा रखने वाले लोग अपना कार्यक्रम स्थगित कर देंगे, उनके हृदय में इच्छा जागेगी कि इस मनोरम ट्रेन को तो प्रतिदिन इसी तरह निहारा जाये।
राजधानी और जिन नगरों से होकर यह गुजरेगी वहां के वाशिंदों को बुलेट ट्रेन का दृश्यावलोकन सुख, स्पर्श सुख, ध्वनि श्रवण सुख और यात्रा सुख का सौभाग्य सबसे पहले मिलेगा।  बुलेट ट्रेन की सीटी आलसी लोगों को बार-बार आलाप लेकर जगायेगी कि जागो लोगों सुख के दिन आ गये। कुछ दिन बात तो देश के चारों कौनों में बुलेट ट्रेन दौड़ा करेंगी। देश में सुख ही सुख बरसेगा। 
अब गरीब को पूरी स्वतंत्रता होगी कि वह अपनी गरीबी का स्वर्गिक आनंद उठाये। इसी प्रकार अमीरों को भी पूरी स्वतंत्रता होगी कि वे अपनी अमीरी का पूरा नैसर्गिक आनंद उठायें।

 


-राजेन्द्र सारथी

परिचय: 

राजेन्द्र सारथी
जन्म : 01 सितंबर, 1949, प्रकाशित कृतियां : ‘कहीं कुछ जल रहा है!’ ‘तोड़ दो अपनी उदासी’ (कविता संग्रह) और ‘परिसंवाद’ (हरियाणा राज्य के 20 साहित्यकारों के साक्षात्कार)। ‘कहीं कुछ जल रहा है!’ वर्ष 2008-09 में हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत। ‘मानुष गाथा शतक’
(ब्रजभाषा में मानव जन्म से लेकर वर्तमान तक की विकास यात्रा 100 छंदों में) प्रकाशनाधीन.

वर्तमान स्थायी पता : राजनगर, शाहदरा, आगरा-28206

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1.ताराबाई ..(लघु कहानी)

ताराबाई ने ओंठों को भीचते हुए सर पर पानी से भरे दो घड़े रखें । दूसरे हाथ से नौ महीने के गर्भ को सम्हालते हुए दो कोस दूर टांडे की राह पकड़ी ।कुआँ पीछे छुट रहा था । सूर्य की किरने कोड़े बरसा रहे थे। चलते-चलते पगडंडी पर अचानक वेदना शुरू हो गई । एक पल के लिए आँखों के सामने अँधेरा छा गया । ऐसे में उसके हृदय से एक ही आवाज निकली,
"याडि ये.....।"(माँ...)
उसे होश आया, तो पता चला; उसका गर्भ खाली हो चूका है । मिट्टी से लिपटा गोरा नवजात शिशु मुस्कुरा रहा है।पास ही दोनों घड़े पानी से अब भी भरे हुए है ।

2.

दीयें....(लघु कहानी)

शहर चायनीज दीयों में जल रही बाती से जगमगा रहा था । पट़ाकें-फुलझड़ियाँ चल रही थी । दीये की रौशनी में रंगोली से लिखा था 'दिवाली' । ऐसे में एक कुम्हार बचे हुए मिट्टी के दीयों को कंधे पर लादे अपने घर लौट रहा था । एक पल उसने दीयों को देखा । सांसे भरी और सोचा,

" काश, यहाँ मेरे बनायें हुए दीये जल रहे होते ।"

और सांसे छोड़ता हुआ अपने घर चला गया ।

3.

प्रमाणपत्र (लघु कहानी )

"मेरे पास सेट-नेट ,पीएचडी की उपाधियाँ हैं । कई शोध पत्रिकाओं में शोध आलेख प्रकाशित हैं । कई प्रमाणपत्र हैं । लीजिये देखिये आप !"

उस संस्था चालक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया । मेरे हाथ को दायें हाथ से हटाते, बायें हाथ के अंगूठे को ऊँगली पर उछालते हुए कहा,

" मुझे इस प्रमाणपत्र की नहीं उस प्रमाणपत्र की आवश्यकता हैं ।"

4.

सभ्य..(लघु कहानी)

देश के राजा की बात सुनकर एक सभ्य बहुत प्रभावित हुआ । वह पुरे दिल से स्वच्छता अभियान में जुड़ गया । पिछड़े बस्ती में गंदगी साफ करने के बाद; एक गरीब दलित ने उसे अपने टूटे-फूटे घर में भोजन पर आमंत्रित किया । सभ्य ने मुस्कुरा कर कहा,

"मैं बाहर खाना नहीं खाता ।"

दलित बस्ती के बाहर उसे एक होटल में भोजन करते हुए पाया गया ।

5.

उस धर्म ( लघु कहानी)

एक नेता ने अपनी राजनीति गर्माने के लिए, अपने कुछ खास को बुलाकर कहा,

"चुनाव एक महिने बाद है । उस धर्म के चार-पाँच इंसानों का कत्ल कर दों । तो अपनी जीत तय हैं ।"

उसमें से एक खास ने ईसे धर्म के विरोध में बताकर प्रतिरोध किया । अगले दिन 'उस धर्म' की वेशभूषा में उसकी लाश पाई गई ।

6.

साहब के कपड़े..(लघु कहानी)

एक गरीब हिम्मत करके कपड़ों के स्टैंडर्ड दुकान में कपड़े खरीदने गया ।

"भाई साहब, मुझे कपड़े खरीदना हैं !"

भीड़ कम होने पर भी नौकर ने उसे रुकने के लिए कहा । वह बेचारा एक घंटे तक रुके रहा । जब उसकी बारी आयी, तब एक सूट पहने साहब आये । उसे देख कर नौकर ने उत्साह में कहा,

"साहब, आप को क्या चाहिए ?

और उसने साहब के पसंद के कपडे दिखाने शुरू कर दिये ।

7.

भिखारन ..(लघु कहानी)

स्टेशन के पादचारी पुल के सीढियों के नीचें एक भिखारन हाथ फैलायें बैठी थी । एक सज्जन को वहाँ से गुजरता देख; उसने कहा,

"ऐ बाबूजी ! भगवान के नाम पर एक रुपया दे दो।"

सज्जन उस और ध्यान न देकर जब आगे बढ़े, तब उसने कहा,

" जा , तेरा आज का दिन पूरा खराब हो । मुझ गरीब को देने के लिए तेरे पास एक रुपया नहीं ।"

और उसका पूरा दिन खराब गया

 

डॉ.सुनील जाधव,नांदेड

महाराष्ट्र,भारत।

कलम बनाम झाड़ू

दीपावली मंगल मिलन समारोह संपन्न हो गए हैं. पति लोग साफ -सफाई के कामों से फारिग हो गए हैं, पत्नियां शॉपिंग से फ्री हो गयी है, कामवाली बाईया काम पर लौट आई हैं, ऐसे नाजुक, विचित्र किन्तु सत्य समय पर यह परम रहस्योद्घाटन हुआ है कि आप लोगों ने कलम को झाड़ू बनाकर उसका सदुपयोग किया है।

साहित्य में कलम के सिपाही होते हे, लेकिन इधर झाड़ू के सिपाही, दरोगा मंत्री, अफसर और संत्री हो गए हैं. कलम को झाड़ू तक पहुंचाने का पवित्र काम संपन्न हो गया है. सरकार की पींठ पर उद्योगपति का हाथ है व सरकार हाथ मिला रही है। ये कैसा विचित्र संयोग हुआ है। सरकार की पीठ पर रखा हाथ सुरक्षा कर्मी ने हटाया क्यों नहीं।

सुरक्षा कर्मी क्या कर रहे थे? क्या वे कलम ढूँढ रहे थे ? या झाड़ू लेकर सरकार के दिमाग में लगे लगे , झड़ -जांखड साफ कर कर रहे थे? कलम के जादूघर सब चाय -चर्चा में मशगूल थे, सेल्फ़ी खिंच रहे थे प्रश्नो में क्या रक्खा हे, फिर कभी पूछ लेंगे. अभी तो सेल्फ़ी छापो।  कलम को पीछे कर सेल्फ़ी को सोशल साइट पर डालो . सम्बन्ध बनाओ , कभी न कभी काम आयेँगे.

टेंडरों का जमाना आ गया है. सत्ता के गलियारों में सत्ता के नए दलाल कलम ताल के बजाय कदम ताल करने लग गए हैं. लाखों-करोडों के टेंडर कलम के इंतज़ार में टेबल पर पड़े हैं

. कबीर कहता है -मन की गंगा को मैली मत होने दो. तन उजला मन मैला मत रखो, मगर कौन सुनता है.

कभी तोप का मुकाबला करने के लिए अख़बार निकला जाता था अब अख़बार मुकाबिल हो तो झाड़ू निकलवाओ। कभी कलम तलवार से तेज़ व् मारक होती थी अब हालात ये है कि कलम झाड़ू निकलने के काम आ रही हे. सेठ लोग वैसे भी कलम को झाड़ू ही समझते हे  , तू नहीं निकलेगा तो दूसरा , तीसरा निकालेगा। मन कि सफाई कोई नहीं चाहता तन कि सफाई करो. कलम चलने से कुछ नहीं होगा क्योंकि कलम कमल से ज्यादा नहीं हे. कलम छोडो झाड़ू पकड़ो -एक नया नारा है - मगर हे कौन्तेय कलम को ही पकड़ के रखना।

लेकिन विचार को झाड़ू से बुहारना संभव नहीं होगा। हे पार्थ कलम उठाओ। कलम में ही कल्याण है। कलम की कृपा से ही मंत्रियों की सम्पति दुगुनी हो गयी है। अभी तो पचपन महिने का सफर बाकी है और अगले पांच साल की गारंटी -वारंटी मिल गई है।

पार्थ सोचो मत, कलम उठाओ कलम की राह पकड़ो।

कलम का रंग केसरिया हो या लाल या हरा या सफ़ेद क्या फर्क पड़ता है  अक्षर तो सब काले ही छपते हे स्वर्णाक्षरों में लिखित इतिहास भी काला ही होता है।

 हे अर्जुन कलम उठाओ क्योंकि दिल्ली में विचारों की बड़ी कमी है।

००००००००००००००००००००००००००००००००००

यशवंत कोठारी, ८६, लक्ष्मी नगर , ब्रह्मपुरी बहार जयपुर-३०२००२

सही दृष्टिकोण की माँग करती कविताएँ

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लिखना कि जैसे आग विजय सिंह नाहटा जी का दूसरा कविता संग्रह है जो राजस्थान साहित्य अकादमी ,उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ है । नाहटा जी राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और उनके कई समवेत काव्य- संग्रहों में भी कविताएँ संकलित हैं । पुस्तक की शुरुआत धर्मवीर भारती की पंक्तियों से होती है -

अश्व घायल
कोहरे - डूबी दिशाएँ
कौन दुश्मन
कौन अपने लोग सब कुछ धंुध धूमिल
किंतु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
क्योंकि है सपना अभी भी

इन पंक्तियों का चुनाव कवि की ऊर्जा और अंधकार से लड़ने की असीम इच्छा को उजागर करता है और ये भाव उनकी कविताओं में बार बार विभिन्न बिम्बों के माध्यम से जगह-जगह दिखाई पड़ते हैं । आज समाज में छाया असत्य ,भूख ,असमानता कवि के भीतर गहन वेदना उत्पन्न करते हैं । कविता क्या जरूरी है ? में कवि अनायास ही कह पड़ते है -

सबूत नहीं होते
अक्सर-
बेबस दिखाई पड़ता सत्य
क्या जरूरी है
सत्य के लिए
बैसाखियों की ?
शिनाख्त की ??

भूख से जूझते एक व्यक्ति का चित्रण कविता - रोटी में कुछ इस तरह दिखता है -

गरीबी का अजीब सा गुरुत्वाकर्षण खींचता
पेट औ पीठ को रसातल की तरफ
ओ ! मेरी आत्मीय रोटी , मेरी अविकल
संगिनी..., जिंदगी का यह विराट आयोजन
महज तुम्हारे लिए .... ?

कविता दुष्चक्र में समाज में छाई असमानता को दर्शाते हुए कवि कहते हैं-

उनके रक्त मज्जा को आकण्ठ चूसकर
एक दुनिया चमकती धनपति कुबेरों की

और फिर विद्रोह की चिन्गारी कुछ इस तरह -

ठहरो ....। एक भी जीवंत कोशिका तैरती होगी
रक्त में विद्रोह की सजीव..... ?
इस दुष्चक्र के घमासान में टकराते काल के पहियों से
फूटती चिन्गारियों से

कविता बाढ़ : कुछ मनोचित्र में बाढ़ का बड़ा ही मार्मिक चित्रण मन को उद्वेलित करता है -

वाहन आ रहे कतारबद्ध
अनाम अज्ञात मदद को उठे अनगिनत हाथ
ये हमें मरने नहीं देंगे भूख से
जो बह गए सैलाब में
उनके स्मरण का दंश
जीने नहीं देगा चैन से

और फिर डूबते मकान का चित्रण कुछ इस तरह

गोबर लीपे मकान की एक जर्जर दीवार
अंजुली भर प्रार्थना सी खड़ी है
गोया आँख मिचौली- जो बच गई हो
धारा के प्रलयंकर प्रवाह से : एक चूक भर

और फिर दुख ने किसका साथ छोड़ा वो तो बस साथ-साथ ही रहा ।
कविता दुख में कवि कहते हैं -

माचिस की डिबिया की तरह जिन्दगी
उसमें नि:स्पृह लेटे दुख सुलगने को तैयार
हर बार
मेरी पीड़ा के रोगन पर
कोई घिसता रहा दुखों की अंतहीन तीलियाँ
फिर तापता रहा मेरे जख्मों की पुरातन सी
परिभाषा की आँच में

पर अगले की क्षण कवि नें दुख को इंद्रधनुषी दुख की उपाधि भी कुछ यूँ दे डाली

झिलमिलाएँगे अनंत ज्योतियों से आप्लावित
इंद्रधनुषी दुख
दुख तो है तभी उसके होने से सुख जो है  ?

दुख के भीतर से ही सुख की खोज का एक और उदाहरण कविता तब तक हम बचे रहेंगे में दिखता है -

नहीं हम नहीं जी रहे
सभ्यता के अंतिम दौर में
अभी भी है हवा में शेष थोड़ी सी नमी
घास में बचा हुआ है हरापन ।

और फिर कविता वही होगा प्रेम में जीवन की सच्चाई स्वत: ही बयाँ हो जाती है

कठिन समय में
एक दिन ईश्वर तुम्हें प्रश्न- पत्र देगा
हल करने
सबसे जटिल,दुरूह एवं गूढ़ मान
जिस प्रश्न को तुम छोड़ दोगे हतप्रभ - से
तुम्हारी अनुत्तर की शिला के नीचे छटपटाता
वही होगा प्रेम ।

पर प्रेम का मोती प्राप्त करना इतना भी आसान नहीं । कवि स्वयं ही कविता - क्या किसी सीप के मुख से में प्रश्न पूछते दिखते हैं

क्या किसी सीप के मुख से
निकल आएगा
कोई उनींदा मोती ?
जिन्दगी के इन उदास तटों पर ।

और फिर कविता - लिखना कि जैसे आग में कवि के भीतर की आग धधकती दिख़ती है जो अनखुली खिड़की के पट खोल देने को व्याकुल दिखती है , अनगिन दिलों में पक रही मुक्ति की छटपटाहट को आत्मा की सलाइयों पर बुनती दिखती है ,नश्वरता के प्रवाह में से दो चार अनश्वर पल अर्जित करती दिखती है । उन्हीं के शब्दों में -

लिखना
कि जैसे आग
प्रज्ज्वलित हर रक्त में,चैतन्य मे
हरेक मानव हृदय की दीवारों में महफूज
समान चरित्र,गुण,धर्म वाली अथाह आग ।

कवि द्वारा कविता के अंत में पूछा गया प्रश्न जो स्वयं ही उस प्रश्न का उत्तर है एक बार ठहर कर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है -

लिखना -
क्या उस आग को मनकों में पिरोना भर है ?

नाहटा जी की कविताओं को सरसरी निगाह से देखते हुए नहीं निकला जा सकता । कविताएँ समय माँगती हैं ठहर कर चिंतन मनन माँगती हैं । कविताओं की भाषा अच्छी है पर कहीं कहीं थोड़ी कठिन भी हो जाती है । कविताओं में नए बिम्ब उकेरे गए हैं । संग्रह में इतर मूड की भी कविताएँ हैं जैसे भोर के आकाश में - एक प्रेम कविता है । कविता प्रयाण - युगल प्रेमी के मिलन का अनूठा चित्रण है । कविता बेढ़ब सा कोलाज- में कवि नें रेगिस्तान की स्त्रियों का बड़ा ही सजीव चित्रण है -

औरत : काल के सूने मरुस्थल में
है जीवन की अपरिहार्य आश्वस्ति
ईश्वर इसे फुर्सत से पढ़ता है

कवि की दृष्टि में यहाँ कुछ भी नहीं बदलता । कविता कुछ नहीं बदलता के जरिए कवि कहते हैं कि यहाँ बस हमारा देखने का नजरिया बदलता है-

सब कुछ अविचल- अनवरत-अविराम
नहीं बदलता कोई भी रहस्य
बदलती है निश्छल अबोधता

कुछ नहीं बदलता, चिरंतर लयबद्धता में सराबोर
हर क्षण : सृष्टि की एक महागाथा
हर कण : सष्टि का एक महनीय दस्तावेज ।

और फिर कविता भिनाय में कवि की आंतरिक इच्छा स्वयं ही फूट पड़ती है -

गढ़ने हैं मुझे कई- कई नूतन आख्यान
जीवन के मर्म में प्रस्फुटित हो
फूटना चाहता हूँ महज एक अंकुर में

नाहटा जी की कविताओं में ये खासियत है कि कविताएँ समाज की वेदना को तो दर्शाती ही हैं पर साथ ही व्यक्ति में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती हैं सही होने के लिए सही दृष्टिकोण की माँग करती हैं ।


समीक्षक - पूनम शुक्ला (कवयित्री )
50- डी , अपना इन्कलेव , रेलवे रोड,गुड़गाँव, 122001


लिखना कि जैसे आग ( काव्य संग्रह ) : कवि : विजय सिंह नाहटा, प्रकाशक : बोधि प्रकाशन , एफ - 77 , सेक्टर - 9 ,रोड नंबर - 11,करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाइस गोदाम,जयपुर - 302006 , पृष्ठ - 216 ,मूल्य : 210 रुपए ।

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सूर्यषष्ठी-महोत्सव

(गोवर्धन यादव)

सूर्यषष्ठी प्रमुख रुप से भगवान सूर्य का व्रत है. इस पर्व में आदिदेव सूर्य का विधि-विधान से पूजन किया जाता है. पुराणॊं में ईश्वर के विभिन्न रुपों की उपासना के लिए तिथियों का निर्धारण किया गया है. जैसे भगवान गणेश की पूजा के लिए चतुर्थी, श्री विष्णु के लिए एकादशी आदि. इसी प्रकार सूर्य की पूजा-अर्चना के लिए सप्तमी तिथि मानी गई है. इसे सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी भी कहा जाता है. किंतु बिहार प्रान्त में इस व्रत के साथ ‍षष्ठी तिथि का समन्वय विशेष महत्व है.

ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखण्ड ( १/६) के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृतिदेवी स्वयं को पाँच विभागों में विभक्त करती है.,--दुर्गा, राधा, लक्ष्मी ,सरस्वती और सावित्री. ये पाँच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती है. इन्हीं प्रकृति देवी के अंश, कला, कलांश और कलांशांश भेद से अनेक रुप हैं, जो विश्व की समस्त स्त्रियों में दिखायी देते हैं.

त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता/ प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते.

मार्कण्डॆयपुराण का भी यही उद्घोष है- स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु. प्रकृतिदेवी के एक प्रधान अंशको “देवसेना” कहते हैं, जो सबसे श्रेष्ठ मातृका मानी जाती है. ये समस्त लोकों के बालकों की रक्षिता देवी है. प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इस देवी का एक नाम ‍षष्ठी भी है.

‌षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च ‍षष्ठी प्रकीर्तिता * बालकाधिष्ठातृदेवी विष्णुमाया च बालदा आयुःप्रदा च बालानां धात्री रक्षणकारिणी * सततं शिशुपार्श्वस्था योगेन सिद्धियोगिनी

ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृतिखण्ड (४३/४,६) के इस श्लोकों से ज्ञात होता है कि विष्णुमाया ‍षष्ठीदेवी बालकों की रक्षिका एवं आयुप्रदा हैं.

‍षष्ठीदेवी के पूजन का प्रचार पृथ्वी पर कब से शुरु हुआ, इस संदर्भ में एक कथा पुराण में आती है.---“प्रथम मनु” स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी. एक बार महाराज ने अपना दुख महर्षि कश्यप से व्यक्त किया और पुत्रप्राप्ति के लिए उपाय पूछा. महर्षि ने महाराज को पुत्रेष्टियज्ञ करने का परामर्श दिया. यज्ञ के फ़लस्वरुप महाराज की मालिनी नामक महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था. महाराज प्रियव्रत को अत्यन्त दुख हुआ. वे मृत शिशु को अपने वक्ष से लगाये उन्मत्तों की भाँति प्रलाप कर रहे थे. सारे परिजन किंमकर्त्तव्यविमूढ खडॆ थे. तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी. सभी ने देखा कि आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान पृथ्वी की ओर आ रहा है. विमान के समीप आने पर स्थिति और स्पष्ट हुई, उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी हुई थी. राजा के द्वारा यथोचित स्तुति करने पर देवी ने कहा--- मैं ब्रह्मा की मानसपुत्री ‌षष्ठीदेवी हूँ. मैं विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूँ एवं अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ---पुत्रदा S हम अपुत्राय”. इतना कहकर देवी ने शिशु की मृत देह का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा. महाराज ने अपने पुत्र को जीवित पा अनेकानेक प्रकार से देवी की स्तुति की. देवी ने प्रसन्न होकर राजा से कहा कि तुम ऎसी व्यवस्था करो, जिससे पृथ्वी पर सभी हमारी पूजा करें. इतना कहकर देवी अन्तर्धान हो गयीं. तदनन्तर राजा ने बडी प्रसन्नतापूर्वक देवी की आज्ञा को शिरोधार्य किया और अपने राज्य में “प्रतिमास के शुक्लपक्ष की ‍षष्ठी तिथि को ‍षष्ठी-महोत्सव के रुप में मनाया जाय” ऎसी राजाज्ञा प्रसारित करायी. तभी से लोक में बालकों के जन्म, नामकरण, अन्नप्राशन आदि सभी शुभावसरों पर ‍षष्ठी-पूजन प्रचलित हुआ.

इस पौराणिक प्रसंग से यह पूर्णतया स्पष्ट होता है कि ‍षष्ठी शिशुओं के संरक्षक एवं संवर्धन से सम्बन्धित देवी है तथा इनकी विशेष पूजा ‍षष्ठी तिथि को होती है, वह चाहे बच्चों के जन्मोपरान्त छटा दिन हो या प्रत्येक चान्द्रमास के शुक्लपक्ष की ‍षष्ठी. पुराणॊं के इन्हीं देवी का एक नाम कात्यायनी भी मिलता है, जिनकी पूजा नवरात्र में ‍षष्ठी तिथि को होती है. इसमे देवी के नैवेद्य में मीठे चावल का होना अनिवार्य है. आज भी शिशु के जन्म से छटॆ दिन ‍षष्ठी-पूजन बडॆ धूमघाम से लोकगीत (सोहर), वाध्य तथा पकवानों के साथ मनाने का प्रचलन है. प्रसूता को प्रथम स्नान भी इसी दिन कराने की परम्परा है.

ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णित इस आख्यान से ‍षष्ठीदेवी का माहात्म्य, पूजन-विधि एवं पृथ्वी पर इसकी पूजा का प्रसार आदि विषयों का सम्यक ज्ञान होता है, किंतु सूर्य के साथ ‍षष्ठीदेवी के पूजन का विधान तथा “सूर्यषष्ठी” नाम से पर्व के रूप में इसकी ख्याति कब से हुई ? यह विचारणीय विषय है.

भविष्यपुराण में प्रतिमास के तिथि-व्रतों के साथ ‍षष्ठीव्रत का भी उल्लेख मिलता है. यहाँ कार्तिकमास के शुक्लपक्ष की ‍षष्ठी का उल्लेख स्कन्द-‍षष्ठी के नाम से किया गया है. किंतु इस व्रत के विधान में प्रचलित सूर्यषष्ठी-व्रत के विधान में पर्याप्त अन्तर है. मैथिल “वर्षकृत्यविधि” में “प्रतिहार-‍षष्ठी” के नाम से बिहार में प्रसिद्ध “सूर्यषष्ठीव्रत” की चर्चा की गयी है. इस ग्रन्थ में व्रत, पूजा की पूरी विधि, कथा तथा फ़लश्रुति के साथ ही तिथियों के क्षय एवं वृद्धि की दशा में कौन-सी ‍षष्ठी तिथि ग्राह्य है, इस विषय पर भी धर्मशास्त्रीय दृष्टि से चर्चा की गयी है और अनेक प्रामाणिक स्मृति-ग्रन्थों से पुष्कल प्रमाण भी दिए गए हैं. कथा के अन्त में इति श्रीस्कन्दपुराणॊक्तप्रतिहारषष्ठीव्रतकथा समाप्ता लिखा है. इससे ज्ञात होता है “स्कन्दपुराण” के किसी संस्करण में इस व्रत का उल्लेख अवश्य हुआ होगा. अतः इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता भी परिलक्षित होती है,. प्रतिहार का अर्थ होता है—जादू या चमत्कार अर्थात चमत्कारिक रुप से अभीष्टॊं को प्रदान करने वाला व्रत.

‍षष्ठीव्रत कथा—नैमिषारण्य में शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूतजी लोककल्याणार्थ सूर्यषष्ठी व्रत का महात्मय, विधि तथा कथा का उपदेश करते हैं. इस कथा के अनुसार राजा कुष्ठरोग से ग्रसित एवं राज्यविहीन है, वे विद्वान ब्राह्मण के आदेशानुसार इस व्रत को करता हैं और फ़लस्वरुप रोग से मुक्ति पाकर राज्यारुढ एवं समृद्ध हो जाता हैं. स्कन्दपुराण के कथानुसार राजा सगर की कथा का उल्लेख मिलता है. सगर ने एक बार पंचमीयुक्त सूर्यषष्ठी-व्रत को किया था, जिसके फ़लस्वरुप कपिलमुनि के शाप से सभी पौत्रों का विनाश हो जाता है. इस दृष्टांत से इस व्रत की प्राचीनता सिद्ध होती है. व्रत की विधि में बतलाया गया है कि व्रती को कार्तिकमास के शुक्लपक्ष में सात्त्विक रूप से रहना चाहिए. पंचमी को एक बार भोजन करना चाहिए. उसे वाक्यसंयम रहना चाहिए. निराहार रहकार उसे फ़ल-पुष्प, घृतपक्व वैवेद्य आदि सामग्री लेकर नदी के तट पर जाकर गीत-वाद्य आदि से हर्षोल्लासपूर्वक महोत्सव मनाना चाहिए तथा भगवान सूर्य का पूजन कर भक्तिपूर्वक उन्हें रक्तचन्दन तथा रक्तपुष्प-अक्षतयुक्त अर्ध्य देकर निवेदन करना चाहिए.

इस व्रत का सर्वाधिक प्रचार बिहार राज्य में दिखायी पडता है. संभव है, इसका आरम्भ भी यहीं से हुआ हो और अब तो बिहार के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी इसका व्यापक प्रसार हो गया है. इस व्रत को सभी लोग अत्यन्त भक्ति-भाव, श्रद्धा एवं उल्लास से मनाते हैं. सूर्यार्ध्य के बाद व्रतियों के पैर छूने और गीले वस्त्र धोनेवालों में प्रतिस्पर्धा देखते ही बनती है, इस व्रत में प्रसाद माँगकर खाने का विधान है. सूर्यष्‍ष्ठी-व्रत के प्रसाद में ऋतु-फ़ल के अतिरिक्त आटे और गुड से शुद्ध घी में बने ठेकुआ” का होना अनिवार्य है. ठेकुआ पर लकडी के साँचें से सूर्यभगवान के रथ का चक्र अंकित करना आवश्यक माना जाता है. ‍षष्ठी के दिन समीपस्थ किसी पवित्र नदी या जलाशय के तट पर मध्यान्ह से ही भीड एकत्र होने लगती है. सभी व्रती महिलाएँ नवीन वस्त्र एवं आभूषणादिकों से सुसज्जित होकर फ़ल, मिष्ठान्न और पकवानों से भरे हुए नए बाँस से निर्मित सूप और दौरी( डलिया) लेकर ‍षष्ठीमाता और भगवान सूर्य के लोकगीत गाती हुई अपने-अपने घरों से निकलती हैं.

भगवान सूर्य के अर्ध्य का सूप और डलिया ढोने का भी बडा महत्व है. यह कार्य पति, पुत्र या घर का कोई सदस्य ही करता है. घर से घाट तक लोकगीतों का क्रम भी चलता रहता है. यह क्रम तब तक चलता है जब तक भगवान भास्कर सायंकालीन अर्ध्य स्वीकार कर अस्ताचल को न चले जायँ. सूपों और डलियों पर जगमगाते हुए घी के दीपक गंगा-तट पर बहुत ही आकर्षक लगते हैं. पुनः ब्राह्ममुहूर्त में ही नूतन अर्ध्य सामग्री के साथ सभी व्रती जल में खडॆ होकार हाथ जोडकर भगवान भास्कर के उदयाचलारूढ होने की प्रतीक्षा करते हैं. जैसे ही क्षितिज पर अरुणिमा दिखायी देती है वैसे ही मन्त्रों के साथ भगवान साविता को अर्ध्य समर्पित किये जाते है. यह व्रत विसर्जन, ब्राह्मण-दक्षिणा एवं पारणा के clip_image004 clip_image005

पश्चात पूर्ण होता है.

सूर्यषष्ठी-व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्ध्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर ‍षष्ठीदेवी का आवाहन एवं पूजन करते हैं. पुनः प्रातः अर्ध्य के पूर्व ‍षष्ठीदेवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं. मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती ‍षष्ठी का आगमन हो जाता है. इस प्रकार सूर्य भगवान के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फ़ल एक साथ प्राप्त होता है. इसीलिए लोक में यह पर्व सूर्यषष्ठी” के नाम से विख्यात है.

सांसारिक जनों की तीन एषणाएँ प्रसिद्ध है—पुत्रैषणा, वित्तैषणा तथा लोकैषणा. भगवान सविता प्रत्यक्ष देवता हैं, वे समस्त अभीष्ठों को प्रदान करने में समर्थ हैंकिं किं न सविता सूते. समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान सविता से हो जाती है, किंतु वात्सल्य का महत्व माता से अधिक और कौन जान सकता है ?. परब्रह्म की शक्तिस्वरूपा प्रकृति और उन्हीं के प्रमुख अंश से आविर्भूता देवी ‍षष्ठी, संतति प्रदान करने के लिए ही मुख्यतया अधिकृत हैं. अतः पुत्र की कामना भगवती ‍षष्ठीदेवी से करना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है.

सूर्यषष्ठी के पुनीत पर्व पर बिहार में महिलाओं द्वारा गाये जाने वाले लोकगीत में भी देखने को मिलते हैं.

काहे लागी पूजेलू तुहूं देवलघरवा (सूर्यमन्दिर) हे काहे लागी, कर ह छठी के बरतिया हे, काहे लागी अन-धन सोनवा लागी पूजी देवलघरवा हे, पुत्र लागी, करीं हम छठी के बरतिया हे, पुत्र लागी

इस गीत में समस्त वैभवों की कामना तो भगवान भास्कर से की गयी है, किंतु पुत्र की कामना भगवती ‍षष्ठी से ही की जा रही है. इस पुराणसम्मत तथ्यों को हमारी ग्रामीण साधु महिलाओं ने गीतों में पिरोंकर अक्षुण्य रखा है.

सविता और ‍षष्ठी दोनों की एक साथ उपासना से अनेक वांछित फ़लों को प्रदान करने वाला यह सूर्यषष्ठी-व्रत वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है.

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