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रवि श्रीवास्तव की कहानी - एक ऑफ़िस ऐसा भी

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रवि श्रीवास्तव,

कहानी
एक ऑफ़िस ऐसा भी। भाग -1
ऑफ़िस जाना है इसका ख्याल मन में आते ही लोगों को मन में कुछ अजीब सा ऐहसास होने लगता है। बहुत सारा काम करना पड़ेगा, बॉस की डॉट सुननी पड़ेगी, अच्छा काम किया तो तोड़ी सी सराहना मिलती है।
पर इस कहानी में एक ऐसा ऑफ़िस है जो आप को थोड़ा हैरान कर देगा। सुबह से शाम तक अब यहां एक ही काम होता है। बाजार में अपना वर्चस्व फैला रखी कम्पनी एमएनआई को मात देने की सोच के साथ टीएनएस नाम से कम्पनी ने अपनी शुरूआत की। शुरूआती कुछ दिनों में काम भी सही तरीके से चला। पर अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने सब कुछ बिखेर कर रख दिया। सारी बातें और सोच धरी रह गई। इसका हर कर्मचारी यहां परेशान आत्मा की तरह रहता है।

आदित्य: ऑफ़िस का मेरा पहला दिन कुछ जगह नौकरियों का तजुरबा लेने के बाद जब मैं इस ऑफ़िस में आया तो मुझे यहां काम कर रहे लोगों को देखकर उत्साहित हो उठा। मुझे लगा आगे बढ़ने और सीखने के लिए इससे अच्छी जगह क्या हो सकती है। कम वेतन में अच्छे भविष्य की तलाश में हामी भर दी। काफी अच्छे लोगों के बीच शुरूआती समय गुजरता गया। मेहनत और लगन से मैंने वहां काम सीखा। पर आज वही पूरा ऑफ़िस …

अशोक गुजराती की लघुकथाएँ

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स्‍वाभिमानउन्‍होंने अपने कम्‍प्‍यूटर पर नया-नया नेट का कनेक्‍शन ले लिया. उनकी उम्र के लोग कम्‍प्‍यूटर का ककहरा भी नहीं जानते. उन्‍होंने ले तो लिया पर ज़्‍यादा कुछ नहीं जानते थे. शुरुआत में उन्‍होंने फटाफट अपने अध्‍यवसाय से सम्‍बन्‍धित कुछेक लेखकों को फ़ेस बुक पर दोस्‍त बनाना प्रारंभ किया. ताज्‍जुब, गूगल स्‍वयं उनके रंग में रंग गया. अनगिनत साहित्‍यकारों की सूची उसमें आने लगी. उन्‍होंने भी कुछ मित्रता के अनुरोध भेजें, स्‍वीकार किये. कई अवांछित भी. ऐसे में एक नामी पत्रिका के संपादक को भी जोश-जोश में ‘रिक्‍वेस्‍ट' भेज दी, जो उसने अदेर मंज़ूर भी कर ली. वह उनकी कई लघुकथाएं प्रकाशित कर चुका था- परिचय इस तरह था ही. इधर उन्‍होंने अपनी एक दीर्घ और स्‍तरीय कहानी उसे भेजी. कई बार फ़ोन करने के बावजूद टालमटोल के जवाब- ‘अभी फ़ाइल नहीं देख पाया...' ; ‘लम्‍बी है ना, पढ़ूंगा...' ; ‘देखता हूं...' वग़ैरह. तीन माह बाद तो एक मर्तबा फ़ोन ही काट दिया. उसी सम्‍पादक का ऑन-लाइन निमंत्रण मिला कि उसकी किताब का अमुक स्‍थान पर, अमुक तारीख को, अमुक समय पर विमोचन का भव्‍य आयोजन है. उन्‍होंने सोचा, जान…

हरदेव कृष्ण का आलेख - सोने की दीवानगी

स्वर्ण धातु का भाव बाजार में कम या ज्यादा होता रहता है पर भारत में इस के प्रति दीवानगी कभी कम नहीं होती। यह प्रतिष्ठा और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है, आड़े वक्त में यह काम आता है। यह दो मुख्य कारण तो इसकी वैल्यु को कभी कम नहीं होने देंगे। परंपरागत रुप से, श्रेष्ठता क्रम में, सोने को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है- स्टैंडर्ड, आभुषण और गिन्नी। स्टैंडर्ड यानि 24 कैरेट सोने की शुद्धता 999.9 में आंकी जाती है। 22 कैरेट की शुद्धता का मान होता है-916.00। शुद्ध सोने से सभी प्रकार के गहने नहीं बनाए जा सकते। उसे मजबूती प्रदान करने के लिए 11 भाग सोना, एक भाग चाँदी व ताँबे का मिश्रण तैयार किया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय महिलाएं लगभग 100 टन सोने के गहने हर साल खरीदती हैं। हिन्दू समाज के लिए तो इसका धार्मिक महत्व है। धन की देवी लक्ष्मी को स्वर्ण धातु बहुत पसन्द है। लक्ष्मी पूजन के समय पीत वस्त्र धारण करना शुभ और फलदायी माना जाता है। अग्नि को शुद्धि करने वाला माना जाता है और स्वर्ण को उसका प्रतीक। इसी कारण सोने के आभूषण कमर से ऊपर पहनना ही ठीक समझा जाता है। इसके अतिरिक्त अक्षय तृतीया को …

गुरु प्रसाद द्विवेदी का व्यंग्य -- अच्छा वक्ता विरुद्ध अच्छा वक्ता

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अच्छा वक्ता विरुद्धअच्छा वक्ताएक समय की बात है, एक शहर में ढेंचू और घेंचू नामक दो मित्र रहते थे| दोनों ही प्रखर वक्ता थे, लेकिन घेंचू की माली हालत बहुत ही खराब होती जा रही थी| घेंचू जब भी मुंह खोलता तो पिटता| उसके लगभग सभी अंग काम करना बंद कर दिए थे| पिटने कि वजह से| वहीं ढेंचू दिन दूना रात चौगुना तरक्की कर रहा था| एक दिन संयोग से ढेंचू और घेंचू दोनों को एक ही विषय पर व्याख्यान देने के लिए बुला लिया गया| सबसे पहले घेंचू ने बोलना शुरू किया और समा बाँध दिया लेकिन भाषण का अंत होते-होते लोगों ने जूते-चप्पल कि बौछार कर दिया| ढेंचू ने बीच बचाव करके मामले को शांत किया और ख़ुद बोलने लगा| सब लोगों ने बहुत ही आदर भाव से सुना| घेंचू जब घर पहुँचा तो काफ़ी दुखी था, उसने ढेंचू से पूछा, क्या कारण है? लोग मेरी बातों को तवज्जोह नहीं देते! बात खतम होते - होते लोग मुझपर टूट पड़ते है! यहां तक कि लोग मेरे द्वारा लिखे गये ब्लॉग्स को भी पसंद नहीं करते! मुझमें क्या कमी है? इस पर ढेंचू ने घेंचू को ये बातें बताई। मित्र तुम बोलते अच्छा हो, हर पहलू पर बोलते हो लिखते हो, लेकिन बोलने और लिखने से पहले  सुनिश्चित कर…

पुस्‍तक समीक्षा छत्तीसगढि़या कंठ का मुक्‍ताहार- ‘‘धान के कटोरा‘‘

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ हल के फाल से धरती का सीना चीरकर अन्‍न उगाने वाले और दुनिया की भूख मिटाने वाले अन्‍नदाता छत्तीसगढि़या श्रमवीर किसान जब अपनी श्रमनिष्‍ठा के फलस्‍वरूप खेतों में लहलहाती हुई धान की सोने जैसी बालियों को देखता है तब मस्‍ती और उमंग के साथ बरबस गा उठता है कि ‘छत्तीसगढ़ ला कहिथे भैया धान के कटोरा, ये दे लक्ष्‍मी दाई के कोरा भैया धान के कटोरा।‘ मेहनतकश कृषक के कंठ से मुखरित यह गीत, गीतकार की लोकप्रियता का प्रमाण है। यह गीत केवल माटी की वंदना और मातृभूमि का गौरव गान ही नहीं बल्‍कि छत्तीसगढि़या स्‍वाभिमान का प्रतीक भी है। कला, साहित्‍य और संस्‍कृति से इतर लोग जो इस कालजयी गीत के गीतकार को चेहरे से नहीं पहचानते वे भी गीत के माध्‍यम से उन्‍हें जानते है। वैसे भी सर्जक की पहचान चेहरे से नहीं बल्‍कि उसकी सर्जना से होती है। कृतित्‍व ही व्‍यक्‍तित्‍व का दर्पण होता है। इस गीत के गीतकार डॉ जीवन यदु जी विद्वत समाज में लोक साहित्‍य के गंभीर अध्‍येता के रूप में प्रतिष्‍ठित और सम्‍मानित है। यदि डॉ जीवन यदु के छत्तीसगढ़ी साहित्‍यिक अवदान का समग्र मूल्‍यांकन करते हुए संक्षेप में कहें तो यह कहन…

वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ का व्यंग्य - फोटो खिंचवाने की बीमारी

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वीरेन्‍द्र ‘सरल‘ धर्मराज का दरबार लगा था। अपने चैम्‍बर में चि़त्रगुप्‍त टेबल पर पड़ी फाइलों पर नजर झुकाये बारीकी से निरीक्षण कर रहे थे। आस-पास रखी अलमारियों में भी फाइलें ठूंस-ठूंस कर भरी हुई थी। चित्रगुप्‍त के सामने मृत्‍यु लोक से आये जीवों की बड़ी लम्‍बी कतार थी। यमदूत कंधे पर गदा उठाए व्‍यवस्‍था बनाने में जुटे हुये थे। कुछ यमदूत फाइलों को इधर-उधर लाने और ले जाने का काम रहे थे। वहाँ का माहौल एकदम गरम था। बिलकुल वैसे ही जैसे चुनाव के समय कार्यालयों का होता है। मृत्‍युलोक से आए जीव बिल्‍कुल वैसे ही धक्‍का-मुक्‍की कर रहे थे जैसे चुनाव टिकट पाने के लिए टिकटार्थी करते हैं, फर्क बस इतना ही था कि वहाँ समर्थकों की भीड़ नहीं थी। वहाँ जो भी थे बस टिकिटार्थिर्यों की तरह ही थे। चित्रगुप्‍त बार-बार अपना चश्‍मा पोंछकर पहनते और फिर फाइलों पर झुक जाते। इधर लाइन में खड़े जीवों की हालत खराब थी। घंटो लाइन में खड़े रहने के कारण पैर दुखने लगे थे। वे फुसफुसाते हुए आपस में बातचीत कर रहे थे कि हद हो गई, अपने गुनाहों का हिसाब कराने के लिए भी घंटो लाइन लगाना पड़ रहा है। यहाँ भी कोई फास्‍ट ट्रैक कोर्ट की व्‍य…

इस्माइल खान की कहानी - ममदू

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ममदू ममदू की माँ थैला झटक कर खाली करते हुए ममदू पर झल्‍लाई-कितनी बार तुझ से कहा है कि सिर्फ पन्‍नी ही बीन कर लाया कर, ये ढेर सारे कागज़ क्‍यों भर लाता है। वो इब्राहिम पन्‍नी वाला सब छाँट-छाँट कर कागज़ अलग कर देता है, फिर तौलता है। जितना बोझ ढो कर लाता है उसमें तीन चार किलो ही पन्‍नी निकल पाती है, बाकी कागज़ का ढेर......। क्‍या फायदा ऐसी मेहनत का ? रोज़ मना करती हूँ पर मानता ही नहीं नासमिटा। अगर ढंग से बीने तो किलो दो किलो पन्‍नी तो और हो ही जाय, पर न जाने क्‍या धुन में रहता है यह लड़का....... ! छः सात साल का ममदू मुजरिम बना नीची निगाह किये माँ का उलाहना सुनता रहता चुपचाप। उसके मन में क्‍या चलता है, इससे किसी को क्‍या सरोकार। उसकी माँ के दिमाग़ में तो दो वक्‍त की रोटी की जुगाड़ के सिवाय कुछ आता ही कहाँ है। आज की साँसे खत्‍म हो रही है तो कल जीने की चिन्‍ता उसे दो रोटी के गोल चक्‍कर से बाहर निकलने ही नहीं देती। रोज सुबह वह भी काम पर निकल जाती और ममदू बड़ा सा मैला कुचैला थैला लेकर निकल जाता शहर की गन्‍दी और बदबूदार जगहों की सैर करने। उसकी मजबूर जगहें, गन्‍दी नालियाँ, नगर पालिका द्वारा जगह…

चन्द्रकुमार जैन का राष्ट्रीय एकता दिवस - 31 अक्टूबर पर विशेष आलेख - सरदार वल्लभ भाई पटेल

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अखंड भारत के अजेय शिल्पकार  : सरदार वल्लभ भाई पटेल  ------------------------------------------------------------------------------------------------------लौहपुरुष की व्यवहारिक दूरदृष्टि ने बचाया देश का विश्व-वैभव  डॉ.चन्द्रकुमार जैन  फ्रैंक मोराएस ने लिखा है  कि एक विचारक आपका ध्यान आकर्षित करता है,एक आदर्शवादी आदर का आह्वान करता है, पर कर्मठ व्यक्ति, जिसको बातें कम और काम अधिक करने का श्रेय प्राप्त होता है,लोगों पर छा जाने का आदी होता है, और पटेल एक कर्मठ व्यक्ति थे। शायद यही कारण है कि सरदार पटेल को भारत का बिस्मार्क कहा जाता है लेकिन उनकी सफलताएं उनसे भी बडी है क्योंकि उन्होनें ऐसे माहौल में काम किया जो कि बहुत कठिन थे। उन्होंने छोटी-छोटी रियासतो और जागीरों को, जहां अलग अलग भाषाएं, परंपराएं और धर्म थे, को एक देश के रूप में एकीकृत किया, जहां आज विश्व की 17.5 प्रतिशत आबादी रहती है। स्मरण रहे कि इस विश्व में सबसे बडी जनसंख्या के रूप मे भारत का प्रभाव सरदार पटेल के योगदान के कारण है। सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण जैसे असंभव दिखने वाले कार्य को उस समय अंजाम दिया जब विंस्टन चर्चिल इस …

शशांक मिश्र भारती का आलेख - मेरे अनुरणीय शिक्षक

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प्रेरक प्रसंगः-मेरे आदर्श शिक्षक आज भी अनुकरणीय हैं-शशांक मिश्र भारतीतीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।करता करै न कर सकै गुरु करै सो होय ।।उपर्युक्त पंक्तियों को सार्थक करने वाले गुरुजनों का संरक्षण किसके जीवन में जीवन्तता, परिवर्तन न ला देगा। निश्चय ही ऐसे गुरुजनों की खोज प्रत्येक जिज्ञासु शिक्षार्थी को रहती है। मैंने शिक्षा प्राप्त करने के विविध वर्गों-प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च-उच्चतर में बार-बार ऐसा अनुभव किया और जीवन को एक निश्चित दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करने वाले श्रद्धेय गुरुजन से प्रथम साक्षात्कार कक्षा ग्यारह में प्रवेश के समय साल 1989 जलाई पुवायां इण्टर कालेज पुवायां शाहजहांपुर उ.प्र. में हुआ। जी हां वह सम्मानित पूजनीय गुरुजन श्री मथुराप्रसाद शर्मा प्रवक्ता भूगोल तीन दशक से अधिक समय से शिक्षण में संलग्न थे। उनके पढ़ाये हुए छात्रों ने पहले से ही भयभीत कर रखा था, कि शर्मा जी बड़े सख्त हैं पूरा दुर्वासा समझो। समय से कक्षा में प्रवेश करते हैं तथा प्रत्येक विद्यार्थी की गतिविधियों पर दृष्टि रखते हुए समय पर ही शिक्षण कार्य समाप्त करते हैं। कभी -कभी आवश्यक होने प…

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - पोलियो के पहले टीके के जन्मदाता को भुला दिया ?

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पोलियो के पहले टीके के जन्मदाता को भुला दिया ?डॉ.चन्द्रकुमार जैन  शायद ही कोई ऐसा जागरूक नागरिक हो जो भारत के पल्स पोलियो अभियान और दो बूँद ज़िंदगी की जैसे कैम्पेन को न जानता हो। बच्चो के स्वच्छ और साफ़ सुथरे रहने का भी पोलियो से बचाव का गहरा नाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जोनास सॉल्क एक अमेरिकी चिकित्सा शोधकर्ता और विषाणुशास्त्री थे, जिन्हें पोलियो के पहले सुरक्षित और प्रभावी टीके के विकास के लिए जाना जाता है ?अगर नहीं तो गौर कीजिए कि न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में मेडिकल स्कूल में पढ़ते हुए सॉल्क ने एक चिकित्सक बनने की बजाए चिकित्सा अनुसंधान की ओर कदम बढ़ा कर अपने लिए अलग राह चुनी।वर्ष 1955 में जब सॉल्क ने पोलियो का टीका पेश किया। पोलियो को युद्ध के बाद के दौर का सबसे भयावह स्वास्थ्य समस्या माना जाता था। 1952 तक इस बीमारी से प्रतिवर्ष तीन लाख लोग प्रभावित और 58 हजार मौत हो रही थी, जो अन्य दूसरी संक्रामक बीमारी की तुलना में सबसे ज्यादा थी। इनमें से ज्यादातर बच्चे थे।  राष्टपति रूजवेल्ट की वह पहल ---------------------------------------याद रहे कि राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट इस बी…

विनय भारत का हास्य व्यंग्य - स्कूल बैग की व्यथा कथा

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स्कूल बैग की व्यथा(हास्य व्यंग्य) मैं हूँ बैग, आपने रोज मुझे सड़कों पर आते-जाते बच्‍चों के कंधों पर लटका देखा होगा। मेरी जिन्‍दगी की कहानी बड़ी दुखभरी हैं। मैं सुबह जल्‍दी उठता हूँ और रात भर देर तक जागता हूँ । कभी-कभी तो बच्‍चे मुझे तकिया बना लेते हैं। रोजाना छः बजे उठकर किसी के कंधे पर लटककर चलना, रात को उपेक्षित सा पड़ा रहना मुझे बुरा लगता हैं। जब बच्‍चे सुबह-सुबह ढेरों कॉपी-किताब भरकर कंधे पर लटकाते हैं तो मुझे उनकी पीठ से चुभन होती हैं, उनके उठते कंधे के दर्द से बैचेनी अनुभव करता हूँ। दर्द उन्‍हें होता हैं और हिलाते-डुलाते मुझे हैं। पुस्‍तकों के ढ़ेर से बच्‍चे परेशान होकर मुझे कोहनी तक मार देते हैं। मेरे वजन के बोझ से वे तो पैन किलर लेकर दर्द दूर कर लेते हैं, लेकिन मैं तो ये भी नहीं कर सकता। बच्‍चे विद्यालय जाते हैं, उन पर जब मैं नहीं उठता हूँ तो उनके रिश्‍तेदार या माता-पिता मुझे लटकाकर ले जाते हैं। कभी-कभी तो दुःखी बच्‍चे मुझे उतारकर फेंक देते हैं जिससे मेरे कपड़े छिल जाते हैं। सुबह उठकर मुझे सभी की मनहूस गालियाँ तक सुननी पड़ती हैं। अध्‍यापकों तथा शिक्षाविभाग द्वारा निर्धारित कोर…

राजेन्द्र सारथी का व्यंग्य -- बुलेट ट्रेन

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बुलेट ट्रेन
अभी हाल ही में केन्द्रीय सरकार ने घोषणा की है कि देश में जल्दी ही बुलेट ट्रेन चलाई जाएगी। यह खबर बहुत से परिवारों के लिए बिलकुल ऐसी है जैसे उन परिवार के राजदुलारों को नई दुल्हन की सौगात मिलने वाली हो। बुलेट ट्रेन मेल ट्रेनों का लेटेस्ट वर्जन है। नये वर्जन को हर राजदुलारा इस्तेमाल करना चाहता है। यह बुलेट ट्रेन नजाकत-नफासत से भरपूर, साज-सज्जा में अनूठी, इठलाती-बलखाती अति तीव्र गति वाली और अन्य मेल ट्रेनों से अधिक सुविधा देने वाली होगी। 
नवेली दुल्हन भी तो मनमोहने वाली, सुख देने वाली, इतर-फुलेल की गंध महकाने वाली और छम-छम पायल बजाकर घर को सुमधुर  करने वाली होती है। राजदुलारों के लिए जैसे बुलेट ट्रेन एक वस्तु है, एक सुविधा है, वैसे ही उनके लिए दुल्हन भी एक वस्तु होती है, एक सुविधा होती है। इसलिए हर राजदुलारे के मन में दुल्हन का भी नया वर्जन पाने का सपना हर समय पलता रहता है। ससुराल पक्ष वाले यदि पुराने वर्जन वाली दुल्हन को ही इस्तेमाल करने के लिए इन राजदुलारों को अन्य भौतिक वस्तुओं के लेटेस्ट वर्जन भेंट करते रहते हैं तो वे पुरानी दुल्हन को घर की सफाई, भजन-पूजा, रसोई और कभी-कभी व…

सुनील जाधव की लघुकथाएँ

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1.ताराबाई ..(लघु कहानी) ताराबाई ने ओंठों को भीचते हुए सर पर पानी से भरे दो घड़े रखें । दूसरे हाथ से नौ महीने के गर्भ को सम्हालते हुए दो कोस दूर टांडे की राह पकड़ी ।कुआँ पीछे छुट रहा था । सूर्य की किरने कोड़े बरसा रहे थे। चलते-चलते पगडंडी पर अचानक वेदना शुरू हो गई । एक पल के लिए आँखों के सामने अँधेरा छा गया । ऐसे में उसके हृदय से एक ही आवाज निकली,
"याडि ये.....।"(माँ...)
उसे होश आया, तो पता चला; उसका गर्भ खाली हो चूका है । मिट्टी से लिपटा गोरा नवजात शिशु मुस्कुरा रहा है।पास ही दोनों घड़े पानी से अब भी भरे हुए है । 2. दीयें....(लघु कहानी) शहर चायनीज दीयों में जल रही बाती से जगमगा रहा था । पट़ाकें-फुलझड़ियाँ चल रही थी । दीये की रौशनी में रंगोली से लिखा था 'दिवाली' । ऐसे में एक कुम्हार बचे हुए मिट्टी के दीयों को कंधे पर लादे अपने घर लौट रहा था । एक पल उसने दीयों को देखा । सांसे भरी और सोचा, " काश, यहाँ मेरे बनायें हुए दीये जल रहे होते ।" और सांसे छोड़ता हुआ अपने घर चला गया । 3. प्रमाणपत्र (लघु कहानी ) "मेरे पास सेट-नेट ,पीएचडी की उपाधियाँ हैं । कई शोध पत्रिकाओं …

यशवंत कोठारी का व्यंग्य - कलम बनाम झाड़ू

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कलम बनामझाड़ूदीपावली मंगल मिलन समारोह संपन्नहो गए हैं. पति लोग साफ -सफाईके कामोंसे फारिग हो गए हैं, पत्नियां शॉपिंगसे फ्री हो गयी है, कामवालीबाईयाकाम पर लौट आई हैं, ऐसे नाजुक, विचित्र किन्तु सत्य समयपर यह परमरहस्योद्घाटनहुआ है कि आप लोगों ने कलम को झाड़ूबनाकर उसकासदुपयोग किया है।साहित्य मेंकलम के सिपाही होते हे, लेकिन इधर झाड़ू के सिपाही, दरोगा मंत्री, अफसर और संत्रीहो गए हैं. कलम को झाड़ू तक पहुंचानेका पवित्रकाम संपन्नहो गया है. सरकारकी पींठ पर उद्योगपति का हाथहै वसरकारहाथ मिला रही है।ये कैसा विचित्र संयोग हुआ है। सरकारकी पीठपर रखा हाथ सुरक्षा कर्मी ने हटाया क्यों नहीं।सुरक्षा कर्मी क्या कर रहे थे? क्या वे कलम ढूँढरहे थे ? या झाड़ू लेकरसरकार के दिमाग में लगे लगे , झड़ -जांखडसाफ कर कर रहे थे? कलम के जादूघर सब चाय -चर्चा में मशगूलथे, सेल्फ़ी खिंचरहेथे प्रश्नो में क्या रक्खाहे, फिर कभी पूछ लेंगे. अभी तो सेल्फ़ी छापो। कलम को पीछे कर सेल्फ़ीको सोशल साइट पर डालो . सम्बन्ध बनाओ , कभी न कभीकाम आयेँगे.टेंडरों का जमाना आ गया है. सत्ता के गलियारों में सत्ता के नए दलालकलमताल के बजाय कदम ताल करने लग

पुस्तक समीक्षा -

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सही दृष्टिकोण की माँग करती कविताएँ लिखना कि जैसे आग विजय सिंह नाहटा जी का दूसरा कविता संग्रह है जो राजस्थान साहित्य अकादमी ,उदयपुर के आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ है । नाहटा जी राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और उनके कई समवेत काव्य- संग्रहों में भी कविताएँ संकलित हैं । पुस्तक की शुरुआत धर्मवीर भारती की पंक्तियों से होती है -अश्व घायल
कोहरे - डूबी दिशाएँ
कौन दुश्मन
कौन अपने लोग सब कुछ धंुध धूमिल
किंतु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
क्योंकि है सपना अभी भी इन पंक्तियों का चुनाव कवि की ऊर्जा और अंधकार से लड़ने की असीम इच्छा को उजागर करता है और ये भाव उनकी कविताओं में बार बार विभिन्न बिम्बों के माध्यम से जगह-जगह दिखाई पड़ते हैं । आज समाज में छाया असत्य ,भूख ,असमानता कवि के भीतर गहन वेदना उत्पन्न करते हैं । कविता क्या जरूरी है ? में कवि अनायास ही कह पड़ते है - सबूत नहीं होते
अक्सर-
बेबस दिखाई पड़ता सत्य
क्या जरूरी है
सत्य के लिए
बैसाखियों की ?
शिनाख्त की ??भूख से जूझते एक व्यक्ति का चित्रण कविता - रोटी में कुछ इस तरह दिखता है -गरीबी का अजीब सा गुरुत्वाकर्षण खींचता
पेट औ पीठ को रसातल की तर…

गोवर्धन यादव का आलेख - सूर्यषष्ठी-महोत्सव

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सूर्यषष्ठी-महोत्सव (गोवर्धन यादव)सूर्यषष्ठी प्रमुख रुप से भगवान सूर्य का व्रत है. इस पर्व में आदिदेव सूर्य का विधि-विधान से पूजन किया जाता है. पुराणॊं में ईश्वर के विभिन्न रुपों की उपासना के लिए तिथियों का निर्धारण किया गया है. जैसे भगवान गणेश की पूजा के लिए चतुर्थी, श्री विष्णु के लिए एकादशी आदि. इसी प्रकार सूर्य की पूजा-अर्चना के लिए सप्तमी तिथि मानी गई है. इसे सूर्यसप्तमी, रथसप्तमी, अचलासप्तमी भी कहा जाता है. किंतु बिहार प्रान्त में इस व्रत के साथ ‍षष्ठी तिथि का समन्वय विशेष महत्व है. ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखण्ड ( १/६) के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृतिदेवी स्वयं को पाँच विभागों में विभक्त करती है.,--दुर्गा, राधा, लक्ष्मी ,सरस्वती और सावित्री. ये पाँच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती है. इन्हीं प्रकृति देवी के अंश, कला, कलांश और कलांशांश भेद से अनेक रुप हैं, जो विश्व की समस्त स्त्रियों में दिखायी देते हैं. त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता/ प्रधानसृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते.मार्कण्डॆयपुराण का भी यही उद्घोष है- स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु. प्रकृतिदेवी के एक प्रधा…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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