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November 2014
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दौरों का दौर / प्रमोद यादव

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कार्टून-साभार-हरिभूमि,रायपुर

 

‘ गुरूजी...नमस्कार...’

शेविंग करने खिड़की पर दर्पण धरे गुरूजी बैठे ही थे कि सामने एकाएक गजोधर का कद्दुनुमा चेहरा उभर आया..

‘अरे गजोधर...नमस्कार..कैसे हो ? क्या हालचाल है ? ‘गुरूजी ने दाढ़ी में ब्रश से साबुन पानी फिराते पूछा.

‘ बस गुरूजी..दया आपकी..’ गजोधर बोला.

‘सबेरे-सबेरे कैसे भई ? कोई विशेष बात ? ‘ गुरूजी अन्दर से ही पूछे.

‘ नहीं गुरूजी..कोई ख़ास तो नहीं..पर एक-दो बातें पूछनी थी..’ गजोधर ने झिझकते कहा.

‘ अरे एक-दो नहीं..चार पूछो..लेकिन अन्दर आकर पूछो..बाहर खिड़की से ही सवाल-जवाब करोगे तो लोगबाग “ अद्धा-पौवा “ वाली खिड़की समझ..तुम्हारे पीछे लाईन लग जायेंगे..’ गुरूजी ने मजाक करते कहा.

‘ क्या गुरूजी..आप भी मजाक करते हैं..पूरे शहर वाले जानते हैं कि ये एक बुद्धजीवी की खिड़की है..यहाँ दूसरी तरह के नशे का सेवन (और उन्मूलन) होता है..’

‘ तो बताओ गजोधर..तुम किस नशे में अलसुबह गिरते-पड़ते यहाँ पहुँच गए ? ‘

‘ वो क्या है गुरूजी कि ...’

बात को बीच में ही काटते गुरूजी बोले- ‘ अरे पहले अन्दर तो आओ..दरवाजा खुला है..’

गजोधर दरवाजा धकेल अन्दर घुसते ही एक चिरपरिचित स्टूल को खींच गुरूजी के समीप बैठ गया.

‘ गजोधर...हर बार तुम ही पूछते हो...इस बार मैं पूछता हूँ..फिर तुम पूछना..’ गुरूजी बोले.

‘ क्या गुरूजी ? ‘ गजोधर सकपकाया.

‘ यार..पूरे दिन इस पानठेले से उस पानठेले...इस होटल से उस होटल..तरह-तरह के कई अखबार तुम पढ़ते हो..फिर भी दुनिया-जहान की सारी बातें मुझसे ही आकर क्यों पूछते हो ? ‘

‘ वो क्या है गुरूजी कि हर अखबार का हम केवल हेड लाईन भर पढ़ते हैं..इससे हमें प्रमुख और शीर्ष समाचार का ज्ञान हो जाता है..बस उसे याद रखते हैं और नीचे का मैटर आपसे पूछने के लिए रख लेते हैं...’

‘ अरे बंधू..जब इतना पढ़ लेते हो तो थोड़ा परिश्रम कर नीचे का डिटेल्स भी पढ़ लिया करो..’ गुरुजी ने मशविरा दिया.

‘ गुरूजी..इससे केवल टाईम ख़राब होता है...कई बार कोशिश की पर पल्ले कुछ नहीं पड़ा..लेकिन आप जब समझाते हैं तो सब कुछ अक्षरशः समझ आ जाता है..’

‘ अच्छा..पूछो..क्या पूछना है ? ‘

‘ गुरूजी..जब से नई सरकार बनी है, नये पी.एम.साहब धुंआधार विदेश दौरा कर रहे हैं..भूटान..नेपाल..ब्राजील..जापान..अमेरिका.. म्यामार.. आस्ट्रेलिया..फिजी..और अब फिर नेपाल..यह सिलसिला कब थमेगा ? ‘ गजोधर ने चिंता जाहिर की.

‘गजोधर..सिलसिला चले या थमें ..इससे तुम्हें क्या ? देश के प्रधान मंत्री हैं..वे जब जहाँ जी चाहे जा सकते है..’ गुरूजी ने कहा.

‘ नहीं गुरूजी मेरा मतलब था कि देश के भीतर अनेक समस्याएं हैं और वे ताबड़तोड़ दौरा कर रहे..सैर-सपाटा तो बाद में भी हो सकता है..पहले वो सब तो करे जिनका चुनावी दिनों में वादा किया था ..न कहीं महंगाई कम हो रही .. न विदेशों से काला धन आ रहा..न ही अच्छे दिन के कोई आसार दिख रहे ..अच्छे दिन तो केवल उनके ही दिखते हैं...’

‘ नहीं गजोधर...ऐसा नहीं कहते..तुम्हें याद नहीं..किस तरह छः-छः महीने वे पागलों की तरह रात-दिन भूख-प्यास तज चुनाव के दिनों रैली और सभाएं करते रहे..लगातार विमान में उड़ते रहे.. आदत छूटने में थोडा समय तो लगेगा भई ...और फिर थकान उतारने थोडा सैर-सपाटा कर ले तो क्या हर्ज है ?

‘ लेकिन गुरूजी..आपको लगता नहीं कि पी.एम.साहब कुछ ज्यादा ही सैर-सपाटा कर रहे ? इनके पहले भी तो कई पी.एम. हुए..उन्होंने कभी इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई.. नये तो छः महीने के कार्यकाल में पूरे एक महीने हवा में.. ( विदेश यात्रा में..) ‘

‘ अरे भई..तुम राजनीती नहीं समझोगे..उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार है..उन्हें किसी दल या घटक का कोई खतरा नहीं..वे महीनों विदेश घूम सकते हैं.. सालों घूम सकते हैं..’ गुरूजी ने समझाया.

‘ गुरूजी..पूर्ण बहुमत क्या होता है,मैं भी जानता हूँ..नेहरु,इंदिरा राजीवजी के पास भी तो स्पष्ट बहुमत की सरकारें थी..वे तो कभी इतना नहीं घूमे ? ‘ गजोधर ने ज्ञान बघारते कहा.

‘ हाँ गजोधर..ठीक कहते हो..मोरारजी भाई की भी सरकार ऐसी ही थी पर इन सब के दौर में ब्रिक्स,इब्सा,और पूर्व एशियाई सम्मलेन..शिखर सम्मलेन जैसे बहुस्तरीय अंतर्राष्ट्रीय मंच मौजूद नहीं थे..इसलिए इन सबको स्वदेश - यात्रा कर ही संतोष करना होता था..कभी-कभार ही इनका किसी रास्ट्राध्यक्ष की ताजपोशी या किसी पी.एम.- प्रेसीडेंट की मैय्यत में विदेश जाना होता था..’

‘ गुरूजी..इसके बावजूद भी इंदिरा,नेहरु ने काफी विदेश यात्राएँ की..इंदिरा जी ने तो लगभग दो सौ देशों की यात्राएं की थी ..’

‘ हाँ गजोधर..लेकिन लम्बे समय तक पी.एम. भी तो रही..इसलिए..’

‘ पर गुरूजी..नए पी.एम. जिस स्पीड से उड़ रहे हैं,उससे तो लगता है कि वे पांच साल में सारे पूर्व प्रधान मंत्रियों का रिकार्ड तोड़ देंगे..’

‘ वैसे गजोधर ..देखा जाए तो उनके सारे काम अभी “ रिकार्ड तोडू “ ही हैं ..चाय बेचने से पी.एम. बनने तक.. चुनाव-प्रचार से लेकर जीतने तक... विदेश-यात्राओं का रिकार्ड तो तोड़ ही रहे.. जहाँ बरसों से कोई भारतीय पी.एम. नहीं गए वहां-वहां जा रहे..28 साल बाद आस्ट्रलिया...33 साल बाद फिजी..ऐसा लगता है जैसे वे अटलस खोले बैठे हैं.. आज तक किसी पी.एम. ने गणतंत्र-दिवस में किसी अमेरिकन प्रेसीडेंट को आमंत्रित नहीं किया, वे कर रहे..ऐसा लगता है जब तक वे सारे रिकार्ड नहीं तोड़ेंगे, देश में नहीं बैठेंगे.. ’

‘ गुरूजी..गिनीस बुक वालों को खबर है कि नहीं ? ‘ गजोधर ने भोलेपन से पूछा.

‘ अरे भई.. 2012 से उनका नाम विधान सभा चुनाव में उनके भाषणों की थ्री-डी.रिकार्डिंग के लिए आलरेडी दर्ज है..’ गुरूजी ने बताया.

‘ गुरूजी..लेकिन ये सरासर गलत है कि खुद तो स्वक्छंद घूम-फिर रहे और देशवासियों पर एक से एक लगाम कस रहे..इतने नए-नए नियम कानून बना रहे कि आदमी पागल हो जाए..कहीं गैस सब्सिडी पर तो कहीं जन-धन पर..कुछ सरलीकरण भी हो रहे पर ऊंट के मुंह में जीरा जैसे..सरकारी कर्मचारियों को तो सांप ही सूँघ गया है..काम के घंटों और बंदिशों को देख कहने लगे हैं-अब सरकारी नौकरी में मजा नहीं...’

‘हाँ गजोधर..लेकिन फिर भी देश तो चल ही रहा है..पूर्व सरकार को दस साल झेले तो इन्हें दस महीने तो झेलो..’ गुरूजी बोले.

‘ इससे क्या होगा गुरूजी ? ‘ गजोधर ने भोलेपन से पूछा.

‘ होगा क्या ? फिर आदत पड़ जायेगी और तब तक दूसरे आम चुनाव का वक्त भी आ जाएगा..’ गुरूजी ने समझाया.

‘ फिर क्या होगा गुरूजी ? ‘

‘ अरे वही सब..जो अभी हो रहा है..कोई और सरकार काबिज हो जायेगी..’

‘ लेकिन रिकार्ड-तोड़ पी.एम. तो नहीं आयेंगे न ? ‘ गजोधर ने पूछा.

‘ हो सकता है कोई आ भी जाये-इनका रिकार्ड तोड़ने.. ‘

‘ तो साफ़ कहिये न..देश की तस्वीर नहीं बदलने वाली..’ गजोधर बोला.

‘ अरे हाँ भई..नहीं बदलने वाली...अब मुझे दाढ़ी बनाने दो..अपनी तस्वीर तो बदलने दो..जय राम जी की.’ गुरूजी ने थोड़े गुस्से से कहा.

गजोधर को समझ नहीं आया कि गुरूजी अचानक क्यों नाराज हो गए ? चुपचाप वह स्टूल से उठा और बड़े बेआबरू हो तेरे कूचे से निकले जैसे बाहर निकल गया.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

गुरुजन

सुनील जब हाई स्कूल में दाखिल हुआ तो जाना कि शहर के रेल्वे क्षेत्र के सभी स्कूलों के अग्रणी छात्र इसी स्कूल में आ गए हैं. सुनकर एक तरफ तो बड़ी खुशी हुई कि यहाँ की पढ़ाई बहुत अच्छी होती होगी, तभी तो सारे स्कूल के छात्र यहां आ गए हैं. लेकिन मन के अंदर एक डर भी था कि यदि पढ़ाई में ढिलाई हुई तो कक्षा के प्रथम तीन में स्थान प्राप्त करना आसान नहीं होगा. इसी डर के कारण मन ही मन धीरे - धीरे निश्चय बढ़ने लगा कि मन लगा कर पढ़ाई करनी पड़ेगी और करनी है. आईए सुनते हैं आगे की बात - सुनील के मुख से.

“वह दिन मुझे याद है जब कक्षा 7 वीं की मार्कशीट (अंकतालिका) देख कर पिताजी ने कहा था, - पिछले बरस भी तुम्हें इतने ही प्रतिशत अंक मिले थे. अब भी वही हैं, तो तुमने क्या प्रगति की ?” मैंने बड़े शान से कहा था कि वह कक्षा छः की पढ़ाई थी और यह कक्षा 7 की पढ़ाई हैं. यदि मेरे अंक प्रतिशत कायम हैं, तो मैंने कक्षा को स्तर के अनुपात में ही प्रगति की होगी, अन्यथा अंक प्रतिशत कम हो जाते. पिताजी उससे आगे कुछ बोल नहीं पाए या बोले नहीं. किंतु अब लग रहा था कि इतना काफी नहीं है – अब होड़ बढ़ गई है और प्रतिशत कायम रखने से नहीं चलेगा, इसे बढ़ाना पड़ेगा ताकि अन्यों की ललकार को चुनौती देते हुए, उनसे आगे रहा जा सके. इसी निश्चय के साथ हाई स्कूल में पढ़ाई शुरु हुई.

यह वही दौर था, जब भारतीय क्रिकेट टीम में मंसूर अलीखान पटौदी, सलीम दुर्रानी, दिलीप सरदेसाई अपने अंतिम पड़ाव पार कर रहे थे. जब भारत ने हालेंड को हराकर विश्व कप हॉकी पर कब्जा किया था. अजीत वाड़ेकर की कप्तानी में सुनील गवास्कर क्रिकेट खेलने भारतीय टेस्ट टीम नें शामिल किए गए थे. विश्व चेम्पियन मुक्केबाज कैसियस क्ले (मोहम्मद अली) पहली बार जो-फ्रेज्रियर से मात खाए थे. इसके बाद ही भारत की बदनाम इमर्जेंसी आई थी.

उम्र भी कुछ इसी पड़ाव पर थी. अंजाम यह हुआ कि खेलों में रुझान बढ़ गया. स्वाभाविकतः पढ़ाई में इसका असर झलका. मुझे वह दिन भी याद है जब एक फुटबॉल टूर्नामेंट में मैं सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था. पुरस्कार स्वरूप दो कापियाँ व एक पेंसिल दी गई थी. सेमी फाइनल में दो गोल दागने के कारण खुश एक दर्शक ने 25 पैसे इनाम दिए थे जिसका हम सब खिलाड़ियों ने चूईंग गम खरीद के खा लिया था. उन दिनों 25 पैसे की बहुत कीमत होती थी. चार बन्द-रोटियाँ मिल जाते थे. वो दिन मुझे आज भी याद है कि 40 किलो चावल का मोल भाव 1रु. 1पैसे व 1रु. 2पैसे के बीच फंसकर तय हो नहीं पाया था. आज के बालक ऐसी बातें सुनकर उनका मजाक उड़ाएंगे. सेमी फाईनल में खेलते हुए मेरे दाहिने पैर के अंगूठे का नाखून उखड़ गया था. किक मारते ही खून का फव्वारा निकलता था. गोलकीपर ने बॉल पकड़ते समय उस पर खून देखा. तहकीकात हुई और लोग जान गए, किंतु मैने ग्राउंड छोड़ना मुनासिब नहीं समझा. आखिर हम जीत गए. फाईनल में भी ऐसी ही हालत में खेला. हम फाईनल भी जीते और मैं टूर्नामेंट का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी घोषित किया गया था.

बात बहक सी गई है. इसके चलते इधर स्कूल में सब जान गए कि खेलों में मेरा मन लग गया है. हमारे आदरणीय गणित के सर श्री राधे श्याम सिंह जी को यह बिलकुल नहीं भाया. उनने बुलाकर जोरदार शब्दों में हिदायत दी कि इसी तरह गेंदा खेलता रहेगा तो दसवीं पास नहीं कर पाएगा. आए दिन वे मुझे देखते ही कहते या बुला भेजते यह कहने को कि सुनील, तुमने गेंदा खेलना कम नहीं किया है. कक्षा की खिड़की से, मैं अपने क्लास के दौरान, तुमको खेलते देखता हूँ. बेटा बात मान ले, ऐसे खेलने से परीक्षा पास नहीं कर पाओगे. बोर्ड की परीक्षा है. मैं उन्हें हामी दिलाता कि नहीं सर मैं खेलों के साथ पढ़ भी रहा हूँ. पास तो हो ही जाऊंगा और प्रथम श्रेणी भी कायम रहेगी,. वे कहते नहीं इतने से काम नहीं चलेगा. तुमको प्रतिशत बढ़ाना है. क्लास में और स्कूल में भी प्रथम आना है. मैं उन्हें आश्वासन देता कि आपकी हर बात पर खरा उतरूंगा, किंतु उनका मन है कि मानता ही नहीं. वे अपनी बात पर कायम रहते.

श्री सिंह अपने काम पर समर्पित थे. 104-5 की बुखार में भी वे कंबल ओढ़कर कक्षा में उपस्थित रहते और कोई सवाल देकर हल करने को कहते. फिर कक्षा के किसी छात्र से वे ब्लेक बोर्ड पर बनवाते. बाकियों से पूछते यह ठीक है? और नहीं तो किसी और से उसे ठीक करने को कहते. खुद सब कुछ देखते रहते और हिदायतें देते रहते. पता नहीं क्यों ? इतने ताप पर भी उन्हें घर बैठना भाता ही नहीं था. इससे हमें तो लगता था कि हम बच्चों से उन्हे इतना प्यार .या कहिए लगाव था कि अपनी तबीयत को भी वे हमारी खातिर नकार जाते थे.

गुरुजी के बार - बार कहने का असर मुझपर यह हुआ कि मुझे डर सा लगने लगा कि सर इतनी बार ऐसा क्यों कह रहे हैं ? फिर सोचता शायद मैं जो सोच रहा हूँ सही नहीं है, उधर खेलों में दिलचस्पी बढ़ने लगी. अंततः मन में भरे डर के कारण मैंनें खेलों के साथ - साथ पढ़ाई पर और जोर लगाया. मुझे इस बात का तो आभास था कि मेरे साथी छात्र भी तो जी तोड़ कोशिश कर रहे होंगे कि वे क्लास और स्कूल में प्रथम आएं. परीक्षा नजदीक आती गई और पढ़ाई की तरफ रुझान बढ़ता गया. एक समय खेलों का दौर रुक सा गया. मन में डर लगा था कि यदि मैं कहीं गुरुजी को दिया वचन निभा न पाया तो ? लेकिन ऐसा होने नहीं दिया जा सकता था. बात गुरुजी को दिए गए जुबान की थी, वो भी उनको जो मुझे बहुत मानते थे. बस लग गए जी पढ़ाई करने.

बोर्ड की हर परीक्षा के दिन एक बार तो कम से कम सर आते और पूछते – सुनील पेपर कैसा है ? सवाल बन रहा है ना ? जब हम बच्चों से हामी सुनते तो उनको आनंद होता था. अपने विषय के दिन तो वे दो - तीन बार कक्षा में धूमें. बार - बार पूछ रहे थे, जैसे उनको शक हो गया हो कि हम बच्चों से सवाल शायद हल नहीं हो पाएंगे. परीक्षा के बाद बाहर जाते समय रोकते और पूछते – कितने नंबर के प्रश्नों के जवाब लिखे, कितने मार्क्स मिल जाएंगे इत्यादि सवाल, जैसे परीक्षा हमारी नहीं उनकी हो रही है. कभी - कभी तो ऐसा लगता कि परीक्षा की चिंता, मुझे व मेरे अभिभावकों से ज्यादा गुरुजी को है. जिस दिन परीक्षाएं पूरी हुई उस दिन तो सर ने सवालों की झड़ी लगा दी. मैंने तुमसे कहा था ना कि गेंदा कम खेला करो, तुम रहे ढीठ, माने ही नहीं. अब देखना नतीजा – फर्स्ट क्लास आ जाए तो बहुत है. कितने नंबर मिलेंगे ? कितने प्रतिशत मिलेंगे ? बेहद डरा दिया था. बार - बार लगता था, सर ऐसे क्यों टोक रहे हैं ? मैंने पेपर तो ठीक ही किए हैं, नंबर भी अच्छे आएँगे. किंतु गुरुजी के विश्वास के सामने मुँह खोलने की हिम्मत हो, तब ना कुछ कहेंगे.

हम सब अपने - अपने घरों को रवाना हो गए. गर्मी की छुट्टियाँ मनाई. फिर आया, परीक्षा परिणाम का दिन. सब सुबह सुबह अखबार पाने के लिए स्टेशन वाली दुकान के पास, स्टेशन के सामने अखबार वाले के पास अलग - अलग अखबार खरीद कर, अपने - अपने रोलनंबर की तलाश में लग गए. अपना नंबर प्रथम श्रेणी में देखने के बाद साथियों का – जिनसे तुलना थी या कहे होड़ थी – नंबर देखते. सब प्रथम श्रेणी में पास हो गए हैं. अब आया प्रतिशत का खयाल. 60 प्रतिशत से ऊपर तो सभी प्रथम श्रेणी में हैं. पर कौन कितना ऊपर है, यह तो मार्क शीट ही बताएगा. परीक्षा की अंकतालिका दूसरे – तीसरे दिन स्कूल से मिलती थी. इसलिए स्कूल के चक्कर फिर शुरु हो गए. हर विद्यार्थी चाहता था कि मेरे अंक सबसे पहले मुझे ही पता चलें. इसलिए हर कोई स्कूल जाता था. तीसरे दिन सबह जब स्कूल पहुँचा तो देखा सिंह सर गेट के पास ही खड़े हैं.

पहुँचते ही पहला सवाल दागा –

कौन सा डिविजन लाए हो...

मैंने जवाब दिया सर पहला.

कितने प्रतिशत आए हैं.

सर पता नहीं मार्क शीट मिलेगा तो पता चलेगा.

बोले - जा मार्क शीट लेकर आ..देखते हैं.

मैंने पूछा - सर क्या मार्क शीट आ गई है ?

सर ने कहा - हाँ लेकिन प्रिंसिपल सर खुद बाँट रहे हैं.

मेरी हवा ही खिसक गई. प्रिंसिपल सर पिताजी को अच्छे से जानते थे. कहीं रिजल्ट के बारे पिताजी को बता दिया हो तो?

किसी तरह हिम्मत बाँध कर प्रिंसिपल सर के कमरे तक पहुचा. जैसे शायद वे मेरा ही इंतजार कर रहे हों, तुरंत पुकार कर बोले –आओ सुनील, आओ, अंदर आओ. मैं सहमें कदम सर की तरफ बढा.

पूछे - रोल नंबर क्या है ?

मैने बताया.

फाईल के पत्ते पलटते हुए, उनने मेरा मार्कशीट निकाला और बोले यहाँ दस्तखत कर दो. दस्तखत करते ही, मेरा मार्क शीट पकड़ाते हुए बोले देखें तो कैसे मार्क्स आए हैं. थोड़ी देर देखा फिर बोले - गुड़ 78 प्रतिशत.

अब मार्क शीट देखने की बारी मेरी थी. मैंने देखा प्राप्तांक 400 में से 312 थे. यानी 78 प्रतिशत.. दिल धक कर गया. 314 वाले को मेरिट स्थान मिला था. लगा काश दो अंक और मिल गए होते. पर अब क्या होना था. शहर के ही अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में एक लड़की को 314 अंक मिले थे.

बाहर निकला तो चेहरे पर खुशी के बदले मायूसी थी. गेट पर सर अब भी खड़े थे. पूछ पड़े – कितने आए. मैंने कहा 78 प्रतिशत. फिर पूछे दूसरों के कितने आए. मैन सिर हिला दिया – पता नहीं के अंदाज में. उनने मेरे मार्क शीट को गौर से देखा और बोले – शाबास सुनील – तुमने जो बोला कर दिखाया. मैंने सबका मार्क शीट देखा है. स्कूल में तुम्हारे ही सबसे ज्यादा नंबर आए हैं. लेकिन गेंदा नहीं खेलते होते तो तुम आज मेरिट में होते. मैंने सोचा शायद इन्हें ही शिक्षक कहते हैं जो कभी भी शिष्यों से संतुष्ट होने का भाव प्रकट नहीं करते ताकि उन्हें संतुष्ट करने के लिए शिष्य और भी मेहनत करें.

मार्क शीट लेकर आदतन मैं सीधे घर पहुँचा. घर पर सभी मेरे मार्क शीट का इंतजार कर रहे थे. सबसे पहले पिताजी को दिखाया.

कितना परसेंटेज है...

78.

मेरिट का लास्ट क्या है.

जवाब – 314.

थोड़ा दिल लगाते, मेहनत कर लेते तो तुम भी मेरिट में होते. शहर में सबसे ज्यादा किसके – कितने मार्क्स है.

अंग्रेजी माध्यम के एक लड़की के 314.

क्या – दो नंबर के लिए तुम एक लड़की से हार गए ?

पिताजी ने एकाध मिनट के लिए उस पर नजर दौड़ाई और फिर मार्क शीट लौटा दी. न ही शाबासी, न ही मुबारक बाद बस – तुम एक लड़की से हार गए. मन मसोस कर रह गया कि इनकी खुशी कब झलकेगी.

जब पढ़ाई पूरी हो गई और नौकरी करने लगा – तब बातों बातों में पता चला कि पिताजी ने मेरे इस सफलता पर ऑफिस में मिठाई बाँटी थी. लेकिन खुशी हम पर जाहिर इसलिए नहीं किया कि बरखुरदार कहीं संतुष्ट होकर न रह जाएं कि इतनी मेहनत बहुत है. अभी आगे की पढ़ाई भी करनी है.

तब कहीं जाकर दिल को चैन मिला कि मेरे पिता व गुरु ने एक ही रास्ता अपनाया कि शिष्यों पर अपनी संतुष्टि उन्हें जाहिर मत करो वरना उनकी संतुष्टि के काऱण आगे की प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी. अब लगता है कि कितनी मुश्किल से उनने अपनी खुशी जाहिर करने से अपने आप को रोका होगा. कितना बड़ा त्याग – बच्चों को लिए, शिष्यों के लिए.

ऐसा ही हुआ इंजिनीरिंग की परीक्षा पास करने पर. मैंने फोन पर खबर दी कि मैं फर्स्ट डिविजन में पास हो गया हूँ. जवाब आया थेंक्स. मैने दोबारा बताया और दोबारा वही जवाब. समझ नहीं आ रहा था कि उधर से कहना क्या चाह रहे हैं. मुलाकात पर मैने सीधे पूछ लिया. मैं आपको पास होने की खबर दे रहा हूँ और आप हैं कि थेंक्स कहे जा रहे हैं, न शाबासी, न ही मुबारकबाद, ऐसा क्यों ? जवाब मिला – तुम्हें हॉस्टल में रखकर पढ़ाने के लिए जो रुपए भेजता था, उससे कुछ की जिंदगी में कोई कमी तो आई ही होगी. तुम्हें भले इसका भान और ज्ञान न हो. पर सच्चाई तो यही है. मैंने थेंक्स इसलिए कहा कि तुमने परिवार वालों के उस त्याग का सही इस्तेमाल किया और उसे बेकार नहीं जाने दिया. तुम्हारे इस सहायक पूर्ण कार्य के लिए मैंने तुम्हें धन्यवाद दिया. मुझे लगा कि तुम्हारा इंजिनीयर बन जाने से बड़ा गुण यह है कि तुमने दूसरों के त्याग को सही अपनाया और उसका सफल प्रयोग किया. यह गुण तुम्हें जिंदरृगी में बहुत साथ देगा. दूसरों की सहयता को कभी भी बेकार न जाने देना.

आज भी, जब किसी के भी परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होने की बात आती है तो आँखें उन्हें याद करके नम हो जाती हैं. बस सबके सामने, हर जगह आँसू ढल नहीं पाते लेकिन आँखों में घूमते रहते हैं. आँखें नम तो हो ही जाती हैं.”

इतना कहते ही उसकी आँखें नम हो गई वह रुआँसा सा हो गया. साथ में बैठा मैं अपने आपको रोक नहीं पाया , मेरी मी आँखे नम हो गई.

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अयंगर

26.11.2014. कोरबा.

अयंगर.

M.R.Iyengar.

 

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दो जून की रोटी
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आंचल में दूध आंख में पानी भरा है, रह रह छलक जा रहा था क्योंकि आंचल का दूध तो अब सुख चूका था| नन्हा गुल्लू फिर भी चूस रहा था! भूख से अंतड़िया दिख रही थी| खुद को बेचने को मजबूर हो चुकी थी किसनी| पर उससे भी पूरी कहाँ हो रही दो जून की रोटी| बिकने वाली चीज सस्ती जो आंकी जाती है|
भूख से बिलबिला रहा था गुल्लू ,पर किसनी के पास उसके पेट की आग़ को बुझाने के लिये एक फूटी कौड़ी भी ना थी|
तभी एक दलाल की नजर पड़ी ,उसने बोला - "किसनी क्यों न इसे किसी अमीर परिवार के हवाले कर दें| वहां खूब आराम से रहेगा वह बच्चे की तलाश में है, तू कहें तो बात करूँ|"
सुनते ही किसनी ने सीने से चिपका लिया! कैसे दिल के टुकडे को अलग करने की हिम्मत जुटाती! आखिर इसी के लिये तो जी रही थी|
"मेरा यही सहारा है ये चला जायेगा तो मर ही जाउंगी मैं तो|"
दलाल के खूब समझाने पर उसके भविष्य के खातिर आख़िरकार किसनी राजी हो गयी पर शर्त भी रक्खी की उस घर में वो लोग नौकरानी ही सही उसे जगह दें तब|
आज अपने नन्हे को स्कूल ड्रेस में स्कूल जाते देख उसके आंसू झर-झर बहे जा रहे थे! वह उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हो ख़ुशी से फूले नहीं समा रही थी| उसका रोया-रोया आशीष रहा था गुल्लू के नये माँ बाप को| 

 


यमुना किनारा (छल )

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गाँव से खबर आई कि पड़ोस के जो की परिजन ही थे उनके बड़े बेटे की मृत्यु हो गयी है| शाम का समय था, शीला भूख से बिलखते अपने चार साल के बेटे के लिए मैगी बनाने के लिए स्टोव जलाने जा ही रही थी कि जेठानी ने रोका, "अरे यह क्या कर रही हो जानती नहीं हो ऐसे में कुछ भी नहीं बनता, और ना खाते- पीते है कुछ, आज दूध पिला दो रो रहा है तो|"
"अच्छा सुनो मैं तुम्हारे जेठ जी के साथ जरा यमुना किनारे जा रही हूँ , वही से कुछ फल-फूल लेती आऊंगी|" शाम ढल चुकी थी,जेठ जेठानी हँसते-खिलखिलाते आये, जेठानी ने आम पकड़ाते हुए कहा, "लो शीला बड़ी मुश्किल से मिला काट कर सबको दे दो|" 'दो आम और सब' मन में ही सोच रह गयी|
शीला उनकी उतारी साड़ी तह करती हुई बोली अरे दीदी "इस पर कुछ गिर गया है"
"हा तुम तो जानती ही हो लोग कितने बेवकूफ होते है, दोना फेंक दिया था मुझ पर..." "..हां दी होते भी है और दूसरों को समझते भी है" कह चुपचाप साड़ी तह करने लगी शीला ............|

मतदाता के गर्व और मतदान के फर्ज़ की आवाज़

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

मतदाता जागरूकता अभियान का असर देखिये कि विगत वर्षों के दौरान मतदाता पंजीकरण,विशेषकर युवाओं में, 10-15 प्रतिशत से बढ़कर 30-35 प्रतिशत हो गया है और 2010 के बाद हुए लगभग सभी राज्य विधानसभा चुनावों में बड़ी संख्या में मतदाता वोट डालने आये। इनमें युवाओं और महिलाओं की भागीदारी अधिक रही। निर्वाचन प्रबंध प्रक्रिया के केन्द्र में मतदाता पंजीकरण तथा निर्वाचक शिक्षा हैं, लेकिन गुणवत्ता तथा मात्रा की दृष्टि से भारत में मतदाता भागीदारी आदर्श भागीदारी वाले लोकतंत्र से अभी भी दूर है। इसे एक चुनौती के रूप में लेने की ज़रुरत ही नहीं, बल्कि ज़मीनी और विश्वसनीय प्रयासों से इस दूरी को पाटने की पहल भी ज़रूरी है। लेकिन, स्वीप प्लान इस दिशा में प्रभावी भूमिका का निर्वहन कर रहा है। 

मजबूत लोकतंत्र, जानदार थीम

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प्रारंभ भारत निर्वाचन आयोग ने 2010 में अपने हीरक जयंती समारोह में कम निर्वाचक जागृति तथा मतदाताओं के कम बाहर निकलने के विषय की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मजबूत लोकतंत्र के लिए विशाल भागीदारी को अपना थीम बनाया था। इसी वर्ष देश का मतदाता भागीदारी संबंधी सबसे बड़ा कार्यक्रम-एसवीईईपी, बिहार विधानसभा चुनावों में प्रारंभ हुआ। सरल शब्दों में एसवीईईपी नीति संबंधी पहल तथा गति‍वि‍धि‍यों की श्रृंखला है, जिनका उद्देश्य निर्वाचन प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी बढ़ाना है। यह तब से सूचना में अंतर,प्रेरणा तथा मदद की कमि‍यों को दूर करने तथा कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या बढ़ाने से जुटा है। 2009 के अंत में झारखंड के चुनावों में आईईसी (सूचना, शिक्षा तथा संचार) का उपयोग हुआ था और इसके बाद 2010 में बिहार विधानसभा चुनावों में चरणबद्ध मतदाता, शिक्षा तथा निर्वाचक भागीदारी (एसवीईईपी) कार्यक्रम आगे बढ़ाया गया और 2011 में तमिलनाडु, केरल, असम, पश्चिम बंगाल, संघ शासित प्रदेश पांडिचेरी के विधानसभा चुनाव में भी यह कार्यक्रम जारी रहा। यह पांच राज्यों-उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब, उत्तराखण्ड तथा मणिपुर में जारी रहा तथा फिर हिमाचल प्रदेश के दो आम चुनाव में तथा 2012 में गुजरात में और 2013 में पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा, मेघालय तथा नगालैण्ड में जारी रहा। 


मतदाता पंजीकरण की बयार

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ईपीआईसी/पहचान प्रमाण,मतदान केन्द्र स्थल, ईवीएम उपयोग,मतदान का समय,आदर्श आचार संहिता के संबंध में क्या करें तथा क्या न करें, उम्मीदवार या उनके सहयोगियों द्वारा मतदाता को प्रभावित करने के लिए धन, बाहुबल तथा शराब का इस्‍तेमाल शिकायत कैसे दर्ज करें। यह देखा गया कि मतदान न करने वालों में एक बड़ा हिस्सा युवाओं और महिलाओं का है। मतदाताओं के सभी वर्गों की भागीदारी बढ़ाने के लिए भारत निर्वाचन आयोग ने सूचना तथा प्रेरणा में अंतर को पाटने का निर्णय लिया तथा साथ-साथ मतदाता सूची में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया आसान और सहज बनाने तथा मतदान के अनुभव को मतदाताओं के अनुरूप बनाने का काम किया। 

यह हर नागरिक के लिए गर्व की बात है कि भारत निर्वाचन आयोग सृजनात्मक रूप से लोगों को निर्वाचन प्रक्रिया में शामिल होने के लिए उत्साहित करने में जुटा है। क्रियान्वयन चरणबद्ध मतदाता शिक्षा तथा निर्वाचक भागीदारी इकाई वोट देने वाली जनता, सिविल सोसाइटी समूहों तथा मीडिया से निरंतर संवाद करने के अतिरिक्त नीति और ढ़ांचा तय करती है, नीतिगत प्रयास करती है और क्रियान्वयन पर निगरानी रखती है। निर्वाचन प्रक्रिया में लोगों को शामिल करने के लिए एसवीईईपी में सूचना, प्रेरणा तथा सहायता (आईएमएफ) जैसे अनेक कदम होते हैं, जिनसे प्रयास किया जाता है। 


सहभागिता का बनता गया कारवां

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निर्वाचन आयोग ने 18-19 वर्ष के आयु वर्ग में नये मतदाताओं को जोड़ने के लिए शैक्षिक संस्थानों यथा एनवाईकेएस,एनएसएस,एनसीसी जैसे युवा संगठनों के साथ सहयोग किया। आयोग ने निर्वाचन प्रक्रिया के बारे में युवाओं तथा विद्यार्थियों के बीच और अधिक जागरूकता बढ़ाने तथा मतदाता पंजीकरण में उनसे सहायता मांगी। आयोग ने स्वास्थ्य, शिक्षा, डब्ल्यूसीडी, सहकारिता, कल्याण आदि जैसे केन्द्र तथा राज्य सरकारों के विभागों के साथ सहयोग किया, ताकि यह विभाग निर्वाचक शिक्षा तथा निर्वाचक तक पहुंच के लिए अपनी अवसंरचना तथा मानव शक्ति (फील्ड कर्मी) दे सकें। निर्वाचक भागीदारी के प्रति लोगों की जागरूकता बढ़ाने में सरकार तथा निजी मीडिया के साथ-साथ सिविल सोसाइटी तथा मान्य गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहयोग करने से मतदाता जागरूकता में मदद मिली। 2013 में भारत निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण (एनएलएमए) के साथ सहमति पत्र पर हस्ताक्षऱ किए। इसके बाद से निर्वाचक साक्षरता भारत सरकार के साक्षऱ भारत कार्यक्रम का प्रमुख अंग बन गयी। भारत निर्वाचन आयोग तथा यूएनडीपी के बीच मतदाता शिक्षा के क्षेत्र में करार हुआ। 

कैम्पस एम्बेसडर बनाये गए

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कैंपस एमबस्डर बनाये गये जो कैंपस में विद्यार्थी होता है और आयोग के दूत के रूप में काम करता है तथा शैक्षिक परिसरों में एसवीईईपी कार्यक्रमों में सहायता देता है। आज भारत निर्वाचन आयोग के एसवीईईपी कार्यक्रम को समर्थन देने के लिए निजी मीडिया घराने तथा कॉरपोरेट आगे आ रहे हैं। एसवीईईपी रणनीति के हिस्से के रूप में सहायता एसवीईईपी के तहत पंजीकरण, मतदाता पहचान-पत्र जारी करने तथा चुनाव प्रक्रिया को मतदाता के लिए सुविधाजनक बनाने के तौर-तरीके सुझाने जैसे क्षेत्रों में मतदाताओं को सहायता देने के नये कदम उठाये गए हैं। इन प्रयासों में सभी जिलों में मतदाता हेल्पलाइन, मतदाता सूची में इंटरनेट तथा एसएमएस के जरिये नाम खोजने, मतदाता सहायता बूथ, आदर्श चुनाव केन्द्र ईवीएम से परिचित कराने संबंधी शिविरों, मतदाता पर्ची तथा पहचान-पत्र का दायरा बढ़ाने यानी ईपीआईसी के अलावा अन्य प्रमाणों को मतदान के लिए वैध बनाने जैसे कदम शामिल हैं। 

भारत निर्वाचन आयोग ने लोगों तक पहुंचने के उद्देश्य से 2011 में अपना स्थापना दिवस 25 जनवरी, को राष्ट्रीय मतदाता दिवस के रूप में मनाने की प्रथा शुरू की। इसे एसवीईईपी के विभिन्न प्रयासों में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को पूर्ण वास्तविक रूप देने के लिए मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी को राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जाता है। युवा पीढ़ी को जिम्मेदार नागरिक का भाव देने तथा उन्हें मताधिकार के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारत निर्वाचन आयोग बड़ी तादात में मतदान केन्द्रों में नये योग्य पंजीकृत मतदाताओं की सहायता करता है। उन्हें फोटो युक्त पहचान-पत्र तथा बैच दिया जाता है। 

लोकप्रिय व्यक्तित्वों को अहमियत

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अन्य कदम भारत निर्वाचन आयोग ने जनता के साथ वि‍श्‍वसनीय सम्पर्क स्थापित करने के लिए लोकप्रिय छवि के लोगों की क्षमता की पहचान की और जागरूकता कार्यक्रमों को तेजी देने, तथा मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए राष्ट्रीय तथा राज्यस्तर पर लोकप्रिय छवि वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों की नियुक्ति की। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे.अब्दुल कलाम, एमएस धोनी,साइना नेहवाल तथा एमसी मेरीकॉम, आमिर खान राष्ट्रीय प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं। इनके अतिरिक्त राज्यों में ऐसे व्यक्तित्व हैं जो एसवीईईपी के प्रयासों में शामिल हैं।

आधुनिक टेक्‍नोलॉजी का सबसे बड़ा योगदान लोगों की जिंदगी तक इंटरनेट की पहुंच है। भारत निर्वाचन आयोग ने बदलते समय के साथ रहने के लिए अपनी वेबसाइट को नया रूप दि‍या, ताकि बिना किसी बाधा के नागरिकों को सभी तरह की सूचना और सेवाएं दी जा सकें। जिला तथा राज्‍य स्‍तर पर मतदाताओं की जागरूकता बढ़ाने तथा मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग किया जा रहा है। अधिकतर राज्‍यों के मुख्‍य निर्वाचन कार्यालयों के अपने फेस बुक पेज हैं, ताकि टेक्‍नोलॉजी प्रेमी युवा मतदाताओं तक पहुंचा जा सके। मतदाता का ऑन लाइन पंजीकरण भारत में एकमात्र प्रणाली है, जहां कोई व्‍यक्ति फोटो युक्‍त मतदाता पहचान-पत्र सरकारी कार्यालय गए बिना पा सकता है। वेबसाइट पर ऑन लाइन जनसांख्यिक ब्‍यौरा बदलने तथा आवेदन की नि‍गरानी जैसी सुविधाएं भी प्राप्‍त हैं। 

भारत निर्वाचन आयोग व्‍यक्ति की मत की शक्ति तथा उसकी अधिकारिता के बीच गहरे आपसी संबंध को जानने के लिए लगातार कार्यक्रम बना रहा है।इसमें जन सहभागिता एक ज़रूरी ज़िम्मेदारी है। 

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हिन्दी विभाग

शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय,

राजनांदगांव।

बुद्धुमल का ब्याह

बुद्धु शब्द शायद बुद्ध शब्द ही का कोई विकृत क्लोन हो सकता है,यह शब्द किसी जुबां के किसी लुगत में चाहे मिले या न मिले मगर इस शब्द के संबोधन के भावों को चरितार्थ करने वाले राष्ट्र,जाति पांति, धर्म, पंथ और संप्रदाय के दायरे से परे दुनिया के हर कोने में बहुतायत में मिल ही जायेंगे,इनकी नफरी को देखते हुए ये दूसरे ग्रहों पर भी मिल जाये इसकी भी प्रबल सम्भावनाये हैं। जो प्रबुद्ध होते हैं वो तो पुरजोर प्रयास करके इनको इसलिए ढूंढते हैं ताकि उनसे अपनी तुलना कर खुद ही अपने आप पर गर्व कर सकें और जो बुद्धुमल होते हैं वो कुम्भ के मेले में भी अपना जोड़ीदार बड़ी आसानी से तलाश लेते हैं कई सज्जन तो इस बुद्धुमल का लेबल चिपकाए सरेआम इस मकसद से घूमते रहते हैं ताकि जरूरतमंदों को उन्हें तलाश लेने में जरा सहूलियत हासिल हो सके। हां इसमे कई बार अपवाद भी सामने आ जाते हैं कि शिशु के नामकरण संस्कार के दिन पंडित महाशय तो यजमान के सामर्थ्य के अनुरूप अच्छी खासी दक्षिणा लेकर कई देर तक अपना पञ्चांग उलट पलट कर,काफी सोच विचार करने के बाद बालक का नाम बुधदेव रखते हैं मगर निक नेम की बीमारी और घरवालों का प्यार बोधक सम्बोधन उसे बुधदेव से बुद्धु बना देता है अगर दुर्भाग्य से वो किसी राजस्थानी भाषी की चपेट में आ गया तो वो कभी भी बुद्धु से सीधा बुध्द्या भी बन सकता है। इतना कह कर चाचा दिल्लगी दास ने थोड़ी सांस ली और एक छोटे से ब्रेक के बाद फिर बोल पड़े।

    चाचा ने ठीक से कुछ याद करने का एक उपक्रम सा किया और बोले,हुआ कुछ यूं था कि ऐसे ही एक शख्स मुझे भी एक दिन सिटी बस में मिल गये थे ।पहली ही मुलाकात में अपने परिचय के साथ साथ ही उसने मुझे कुछ ऐसे संकेत भी दे दिये थे कि वो पूरा बुद्धु हैं,मगर मुझे अब अह्सहास हो रहा है कि मैं भी बुद्धु ही था जो उसको तब बुद्धू नहीं समझा। चार दिन बाद ही अगली मुलाकात में जब वो फिर मिले तो उन्होंने  दुआ सलाम के साथ ही बताया कि चाचाजी आजकल मैं जरा मशरूफ हूं,मेरा ब्याह होने वाला हैं। मैंने उनकी उम्र आंक कर पूछा कि ब्याह कौन सी बार हो रहा है तो उन्होंने बड़ी शर्मिंदगी के साथ नज़रें झुका कर कहा सिर्फ पहली बार और अपनी मशरूफियत की वजह भी वैसे ही बयां की जैसे कि कोई गूंगा पहली बार गुड़ चख कर के उसके स्वाद का वर्णन अपने ढंग से करने का एक असफल सा प्रयास करता हैं।

   ठीक हैं वो तो मुझे अपना परिचय पत्र दिखा कर चलते बने मगर वो मेरे लिए बेवजह ही मशरूफ होने का काफी सामान छोड़ गये,इतने सवालात दे गये कि पूछो मत और मैं सोचने को मज़बूर हो गया कि लो फिर एक और बुद्धु का ब्याह होने जा रहा हैं,क्या ब्याह वो ही करते हैं जो बुद्धु होते हैं, क्या कोई भी बुद्धु कभी ब्याह से वंचित नहीं रहा,क्या ब्याह के बाद सभी को एक श्रेष्ठ बुद्धु बन कर के व्यवहार करना पड़ता हैं,या जो जन्म जात ही बुद्धु होते हैं उनकी तो खुदा ही जाने कि ब्याह के बाद बेचारों की क्या गत बन जाती होगी। जरा बताना तो कि इन बुद्धुमल जी ने अपने ब्याह की बात मुझसे ही क्यों बताई,क्या नको मेरे सिवाय और कोई दूसरा बुद्धु मिला ही नहीं था अपने जैसा। वैसे उनका ब्याह ही तो हो रहा हैं कोई गिनीज बुक में दर्ज होने जैसा तो कुछ नहीं ।क्या वो अब तक अपना ब्याह होने के प्रति बिलकुल निराश हो चुके थे जो इस कदर बौराए से फिर रहे थे,आदि आदि। वो निरा बुद्धु हैं तो क्या हुआ उनको इतना तो पता होना ही चाहिए था कि ब्याह तो संस्कारों की एक कड़ी है जो मुंडन संस्कार से शुरू होती हैं और अंतिम संस्कार पर ख़त्म होती हैं,सो ब्याह तो एक न एक दिन हो सबका हो कर ही रहना हैं,अक्सर लोग इसे विधाता का ही लेख मान कर कोई ज्यादा फिक्र नहीं करते। हां इससे जो बच जाते हैं वो आगे चल कर वो कर दिखलाते हैं कि ब्याह कर चुकने वाले उनका मुंह ताकते रह जाते हैं।

    अगर वो मुझे अगले फेरे में फिर मिल गये तो मैं उनको तुमसे जरूर मिलवाऊंगा क्यों कि वो एक भिन्न प्रकार के बुद्धु हैं जो कि बुद्धु के अब तक के स्थापित मूल्यों से काफी परे हैं,मसलन वो कहते फिर रहें हैं कि उनका ब्याह होने वाला हैं। अगर वो इस किस्म के बुद्धुमल नहीं हुए होते तो मैं उनके चहरे से ही पता लगा लेता कि वो ख़ुशी के मारे पगलाए फिर रहें हैं या मेरे से सहानुभूति के दो शब्द जुटाने की फिराक में हैं। खुदा करे बुद्धुमलजी का दाम्पत्य जीवन सुखी रहे ,वैसे सुख और दाम्पत्य दो अलग अलग विकल्प हैं। तुम्हें इतना तो पता होगा ही कि जब कोई किसी लम्बी यात्रा पर जाता है तो यात्रा के दौरान अमंगल से रूबरू हुए उसके फिक्रमंद उसको विदा करते समय कहते हैं कि ‘आपकी यात्रा मंगलमय हो’ ठीक उसी प्रकार से दाम्पत्य जीवन को भुगत रहे मित्र और परिजन नया नया ब्याह होने वाले को बधाई स्वरूप कहते हैं कि ‘आपका दाम्पत्य जीवन सुखमय हो ‘,जबकि उन्हें पक्का मालूम होता है कि उनकी ये दुआए क्या असर करने वाली हैं ।बस इतना कह कर चाचा रुसखत हुए ।

                 पुरुषोत्तम विश्वकर्मा

डिनर विद डब्बू / प्रमोद यादव

‘ एक बात तो बताओजी..आप का सिर कैसे घूम गया है ? ‘ पत्नी चाय का मग थमाते बोली.

‘ क्यों ? क्या हुआ ? मैंने क्या किया भई ? पति ने चौंकते हुए पूछा.

‘ अरे ..आप भी पूरे बुद्धू के बुद्धू ही ठहरे..आप से मेरा मतलब पार्टीवाले से है.. दिल्ली के मफलर वाले की पार्टी से..’

‘ अरे तो ऐसा कहो न..तुम आप-आप करोगी तो मैं खुद को ही समझूँगा न ..हाँ ..बोलो-क्या कह रही थी ? ‘

‘ अजी मैं सुनी हूँ कि वे कल मुंबई में डिनर पार्टी कर रहे हैं..’

‘ तो तुम्हें इससे क्या भई ? ‘ पति ने कहा.

‘ पहले पूरी बात तो सुना कीजिये..कहते हैं कि जिनको उनके साथ डिनर करना है वे बीस हजार रूपये देकर कर सकते हैं..इतनी महँगी थाली तो राजे-महाराजे भी कभी न खाए हों फिर ये जनाब क्यों इतनी महँगी थाली खाने-खिलाने पर तुले हैं..और फिर इनके साथ बैठकर खायेगा कौन ? मुंबई में तो बीस रूपये में भरपेट भोजन मिल जाता है..’ पत्नी बोली.

‘ अरे यार तुम कहना क्या चाहती हो ? ‘

‘ यही कि ये डिनर पार्टी का माजरा क्या है ? ‘

‘ भई ..वे पार्टी के लिए फंड जुटा रहे हैं..लोगों से दान मांग रहे हैं..लंच-डिनर केवल प्रतीक है..अब खाली-पीली कैसे रूपये लें इसलिए डिनर खिलाकर ले रहे..’ पति ने समझाया.

‘ बहुत खूब ..जब सारी पार्टियां चुनावी रणनीति बना रही है तो इन्हें अभी फंड सूझ रहा है ? एकदम ही ठन- ठन गोपाल पार्टी है क्या ? वैसे इन्हें कितने रूपये चाहिए ?’

‘ तुम तो ऐसे पूछ रही हो जैसे अभी अंटी से निकाल इनके फंड को लबालब कर दोगी..’

‘ अरे..मैं क्या लबालब करुँगी ? मैं तो यूं ही पूछ रही थी..’

‘ तो सुनो..पिछले चुनाव में शायद बीस करोड़ का फंड इकट्ठा किये थे..इस बार चालीस करोड़ का इनका टारगेट है..’

‘ क्या ??? चालीस करोड़ ???..अरे बाप रे..इतना कौन देगा ? और कैसे देगा ?..नहीं जी..इतने दानी तो हमारे लोग नहीं हैं..कुछ रकम ये उधार भी लेते होंगे..’ पत्नी बोली.

‘ अरे यार..राजनीति में कहीं कोई उधार नहीं होता ..सब नगद-नगद होता है..बेवकूफ होते हैं वे जो उधार ले चुनाव लड़ते हैं..चुनाव न तो घर के पैसों से लड़ा जाता है ना ही उधार के पैसों से..चुनाव हमेशा मतदाताओं के पैसों से लड़ा जाता है..इसलिए वे बीस हजारी डिनर में आमंत्रित कर रहे.. पहले इन्हें आन-लाईन ही काफी फंड मिल जाता था पर जबसे इस्तीफा दिया सारे लोग बे-लाईन हो गए..’ पति ने डिटेल में समझाया.

‘ वाह.. तरीका तो बढ़िया है..लेकिन ऐसी महँगी थाली खाता कौन हैं ? ‘

‘ अरे पिछले चुनाव में भी उन्होंने ये कार्यक्रम किया था..बंगलुरु और नागपुर में..तब डिनर का रेट दस हजार था..महंगाई बढ़ी है इसलिए इस बार बीस हजार किये हैं..’

‘ पहले बताईये तो सही कि ये लंच-डिनर इनके साथ करते कौन है ? ‘ पत्नी पूछी.

‘ भई ..जाहिर है पैसेवाले ही करेंगे..उद्योगपति..व्यापारी..सिने-स्टार..बैंकर्स आदि-आदि..’

‘ अरे ये तो सरासर अन्याय है..डिनर इन्हें खिलाएं और वोट आम आदमी से मांगे..’ पत्नी बोली.

‘ अरे भागवान जिसके पास जो होगा वही तो उससे मांगेंगे..अब भला किसी आम आदमी से वे डिनर में शामिल होने बीस हजार मांगे तो गरीब बन्दा कहाँ से दे ? वो तो केवल वोट भर दे सकता है..उसकी इतनी ही औकात है..’

‘ अच्छा..एक बात और बताईये...जो लोग उनके साथ डिनर करते हैं,क्या वे उन्हें या उनकी पार्टी को वोट देते हैं ? ‘

‘ डिनर खाने वाले जो होते हैं वे किसी भी पार्टी के नहीं होते जी ..जो पार्टी जीत जाती है..सरकार बनाती है, वे आटोमेटिकली फिर उसके हो जाते हैं..’

‘ मतलब कि सभी मतलबी होते हैं..काम से काम रखते हैं..बीस हजार लगाया तो वक्त आने पर बीस लाख वसूल लेते हैं..’ पत्नी हिसाब लगा बोली.

‘ वाह..बिलकुल ठीक कहा तुमने..तुम्हें तो राजनीति की अच्छी समझ है..’ पति ने तारीफ़ की.

‘ मैं एक बात सोच रही हूँ जी..क्यों न हम भी इसी तर्ज पर फंड इकट्ठा करें..उनकी पार्टी की तरह हम भी तो ठन- ठन गोपाल हैं.. ’ पत्नी कुछ गंभीर मुद्रा में बोली.

‘ मतलब ? ‘ पति चौंका.

‘ मतलब कि उधार तो तुम किसी से लेते नहीं..अपनी शान के खिलाफ समझते हो..और कोई उधार आपको देगा भी नहीं.. न ही कभी आपकी कोई लाटरी लगने वाली..तो हम भी यही करते हैं- डिनर विद डब्बू ... आप नगरीय निकाय के चुनाव में खड़े हो जाईये.. लंच-डिनर से जो पैसा आएगा उसमे से थोडा बहुत खर्च कर बाकी से सोने-चांदी के आठ-दस गहने बनवा लेंगे..आप तो बनवाने से रहे..’ पत्नी एक सांस में शिकायत भरे स्वर में बोली.

‘ अरे यार ..कैसी बात करती हो ? मैं और चुनाव ?..कोई भी पार्टी मुझे टिकिट नहीं देगा..’ पति बोला.

‘ अरे टिकिट का जिम्मा मैं लेती हूँ ..मेरे दिल्ली वाले चाचा दिला देंगे..आप केवल फंड का टारगेट बताओ..कितना खर्च करना है और कितना दबाना है.. पैसा दबाने में बड़ा मजा आता है..’

‘ तो बताओ..मेरा कितना पैसा दबाकर रखी हो ? ‘ पति ने अविलम्ब पूछा.

‘ अरे नहीं जी..यूं ही मुंह से निकल गया.. हाँ..तो कहिये आप तैयार हैं न चुनाव लड़ने ? ‘

‘ ठीक है..तुम कहती हो तो लड़ लेता हूँ पर फंड न आये तो लड़ना मत..मुझे नहीं लगता कि मेरे साथ कोई भलामानुष डिनर लेगा भी..’ पति ने संदेह व्यक्त किया.

‘ अरे शुभ- शुभ बोलो जी..हफ्ते भर के अन्दर ही सब कुछ होना है..मैं अभी चाचाजी से बात करती हूँ..परसों नामांकन भरना और उसी दिन से “ डिनर विद डब्बू “..’

पत्नी के असीम प्रेम और प्रयास से पति डब्बू को टिकिट मिल जाता है..वह फार्म भरता है..और उसी दिन वह “डिनर विद डब्बू” का एलान कर देता है. पत्नी चाहती थी कि डिनर - रेट दस हजार घोषित कर दे पर पति नहीं चाहता ..डरता है कि ऐसा करने से एक भी मतदाता नहीं आएगा और वह भारी मतों से हार जाएगा इसलिए पत्नी को समझाता है कि डिनर के बाद उन्हें बिल भेज देंगे..पत्नी कहती है कि अगर बाद में लोगों ने नहीं दिया तो ? पति समझाता है कि रेट घोषित करने से तो तय है कि अकेले उसे ही डिनर लेना होगा..फिर थोक में बचे भोजन का क्या होगा ? बड़ी विकट स्थिति हो जाती है..आखिरकार तय होता है कि डिनर पहले खिला दिया जाए..फंड बाद में माँगा जाए.. पत्नी अपनी जिंदगी भर की “ दबाई गई राशि “ को खर्च कर पांच सौ स्पेशल थाली बनवाती है और घर के पीछे विशाल बाड़े में पंडाल लगा सबको खिलाती है..मोहल्ले के सारे मतदाता हो-हल्ला करते पूरा डिनर टिड्डी दल की तरह मिनटों में चाट जाते हैं..

दूसरे दिन सारे मतदाताओं से घर-घर जाकर डब्बू मियाँ डिनर के एवज में दान मांगते हैं-वो भी प्रति व्यक्ति-दस हजार.. लोग इनकार करते उस पर हंसते हैं और उसे पागल कहते हैं..डब्बू उन्हें धमकी देता है..देख लेने की बात करता है..मतदाता उलटे उन्हें दिखा देते हैं..चुनाव में हरा देते हैं..वह पत्नी पर काफी बिगड़ता है..बात-बात पर उसे रगड़ता है..असफलता को लेकर दोनों एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं.. काफी तू- तू -मैं-मैं करते हैं.. दोनों में खूब लड़ाई होती है..तभी पोस्टमैन एक पत्र दे जाता है.. पत्र खोलकर दोनों पढ़ते हैं-उसमें लिखा होता है-

‘आदरणीय बंधू... नमस्कार.. हम दिल्ली विधान सभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए फंड इकठ्ठा करने आपके शहर आये हैं..सूचित करते हर्ष होता है कि हमारा फंड रेजिंग डिनर परसों जयंती स्टेडियम में आयोजित है.. हमारी टीम ने आपको चुना है..आप सादर आमंत्रित हैं..कृपया..साथ में बीस हजार रूपये नगद जरुर लायें..चेक-डी.डी. भी चलेगा..समय से आधा घंटे पूर्व पहुंचें और अपना दान जमा कराएँ..और पार्टी-प्रमुख के साथ डिनर का लुत्फ़ उठायें.. आप का दान-हमारा कल्याण ..धन्यवाद.. आप का ..’

पति एक झटके से पत्र को फाड़ देता है और पत्नी से कहता है- ‘ अब छोडो भी यार ..जो हो गया सो हो गया..थोबड़ा ठीक करो..डिनर विद डब्बू भूलो और “डिनर विद डियर” करो ..जैसा रोज करती थी- एकदम ही मुफ्त..हाँ डिनर के बदले अपने मन से कुछ फंड या दान देना चाहोगी तो बंदा हाजिर है.. देखो..आज मौसम भी काफी आशिकाना है..जो दोगी-कबूल..’

‘ धत्..’ कहते पत्नी शरमाकर किचन की ओर भाग जाती है.

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प्रमोद यादव

गयानगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

27 नवंबर को 107वीं जयंती पर विशेष

डॉ. हरिवंशराय बच्चन : भारत के बेमिसाल व सर्वाधिक लोकप्रिय कवि

डॉ. हरिवंशराय बच्चन का परिचय बहुत ही मुख्तसर सा है जो वे खुद दिया करते थे कि ''मिट्टी का तन, मस्ती का मन, क्षणभर जीवन, मेरा परिचय.''

छायावाद के प्रखर और आधुनिक प्रगतिवाद के मुख्य स्तम्भ माने जाने वाले डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री डब्ल्यू.बी.ईटस के कार्यों पर शोध कर प्राप्त किया था. यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे. अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी की उपाधि लेने के बाद उन्होंने हिन्दी को भारतीय जन की आत्मभाषा मानते हुए हिन्दी क्षेत्र में साहित्य सर्जन का महत्वपूर्ण फैसला लिया तथा आजीवन हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में लगे रहे. कैम्ब्रिज से लौटने के बाद डॉ. बच्चन आकाशवाणी के इलाहाबाद केन्द्र में कार्यरत रहे, बाद में अपने दिल्ली प्रवास के दौरान विदेश मंत्रालय में दस वर्षों तक हिन्दी विशेषज्ञ जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहे. इन्हें राज्यसभा में छह वर्ष तक के लिए विशेष सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया. 1972 से 1982 तक डॉ. बच्चन अपने पुत्रों अमिताभ व अजिताभ के साथ कभी दिल्ली व कभी मुम्बई में रहे. इसके पश्चात उन्होंने दिल्ली में ही रहने का फैसला किया और गुलमोहर पार्क में 'सौपान' में रहने लगे.

डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने हिन्दी में 'हालावाद' काव्य का सृजन किया जिसमें शराब व मयखाना के माघ्यम से प्रेम, सौन्दर्य, पीड़ा, दुख, मृत्यु और जीवन के सभी पहलुओं को अपने शब्दों में जिस तरह से पेश किया है, कि उनका काव्य आमलोगों के समझ में आसानी से आ जाता है और यही वजह है कि 'मधुशाला' को आज भी गुनगुनाया जाता है। हिन्दी कविता को 'मधुशाला' से एक नया आयाम मिला. 'मधुबाला, मधुशाला और मधुकलश' हालावाद के नाम से बच्चन काव्य में प्रसिद्ध हुआ.

बच्चन के काव्य की विलक्षणता उनकी लोकप्रियता है. निसंदेह सारे भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में 'बच्चन' का स्थान सुरक्षित है और आज भी उन्हें एक विस्तृत और विराट श्रेातावर्ग प्राप्त है. दरअसल बच्चन जिस समय लिख रहे थे उस वक्त के पाठकवर्ग छायावाद के अतिशय सुकुमार्य और मार्धुय से, उसकी अतीन्द्रिय और अतिवैयक्तिक सूक्ष्मता से, उसकी लक्ष्णात्मक अभिव्यंजना शैली से उकता गये थे परिणामस्वरूप हिन्दी कविता जनमानस और जन रूचि से बहुत दूर होती जा रही थी. बच्चन ने चालीस के दशक में जिसे व्यापक खिन्नता और अवसाद का युग भी कहा जाता है, मघ्यवर्ग के विक्षुब्ध, वेदनाग्रस्त मन को वाणी का वरदान दिया, उन्होंने सरल, जीवन्त और सर्वग्राह्य भाषा में छायावाद की लाक्षणिक वक्रता की जगह संवेदनासिक्त अभिद्या के माध्यम से अपनी बात कविता के माध्यम से कहना आरम्भ किया और पाठकवर्ग सहसा चौंक पड़ा क्योंकि बच्चन वही कह रहे थे जो पाठकों के दिलों की बात थी. बच्चन ने अनुभूति से प्रेरणा पायी थी और अनुभूति को ही काव्यात्मक अभिव्यक्ति देना उन्होंने अपना घ्येय बनाया. उन्होंने 'हालावाद' के माध्यम से व्यक्ति जीवन की सारी नीरसताओं को स्वीकार करते हुए भी उससे मुंह मोड़ने के बजाय उसका उपयोग करने की, उसकी सारी बुराईयों और कमियों के बावजूद, जो कुछ मधुर और आनंदपूर्ण होने के कारण ग्राह्य है, उसे अपनाने की प्रेरणा दी.

बचपन में ही बच्चन 'सरस्वती' पत्रिका में छपी उमर ख्याम की तस्वीर से जुड़े और कलांतर में उमर ख्याम से प्रभावित होते हुए, उमर ख्याम के फलसफा कि वर्तमान क्षण को जानो, मानो, अपनाओ और भली प्रकार इस्तेमाल करो, को अपना दर्शन बनाया, जो बच्चन के 'हालावाद' में दृष्टिगोचर होता है. बच्चन का 'हालावाद' 'गम गफलत करने का निमंत्रण है, गम से घबराकर खुदकुशी करने का नहीं.' उन्होंने पलायन पर जोर न देकर वास्तविकता को स्वीकारा और वास्तविकता की शुष्कता को अपने अंतरमन में सींचकर हरा-भरा बना देने की सशक्त प्रेरणा दिया. बच्चन ने आत्मानुभूति, आत्म-साक्षात्कार और आत्माभिव्यक्ति के बल पर काव्य की रचना की. कवि के अंह की स्फीती ही काव्य की असाधारणता और व्यापकता बन गई. समाज की आभावग्रस्त व्यथा, परिवेश का चकाचौंध भरा खोखलापन, नियति और व्यवस्था के आगे आम आदमी की असाघ्यता और बेबसी बच्चन के लिए सहज व्यक्तिगत अनुभूति पर आधारित काव्य विषय थे. उन्होंने सत्यता और साहस के साथ बहुत ही सरल भाषा और शैली में सामान्य बिम्बों से संजा-सवार कर अपने गीत हिन्दी जगत को दिए तथा हिन्दी जगत ने उत्साह से उनका स्वागत भी किया.

बच्चन की कविताओं की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय आंदोलन की विफलता की कड़वी घूंट हमें 'निशा निमंत्रण' तथा 'एकांत संगीत' नामक काव्यसंग्रहों में मिलता है, जो उनका सर्वोत्कृष्ट काव्योपलब्धि भी है. व्यक्तिगत-व्यावहारिक जीवन में सुधार हुआ, अच्छी नौकरी मिली, 'नीड़ का निर्माण फिर' से करने की प्रेरणा मिली और निमित्त की प्राप्ति हुई. बच्चन ने अपने जीवन के इस नये मोड़ पर फिर आत्म-साक्षात्कार किया और खूद से पूछा-'जो बसे है, वे उजड़ते है, प्रकृति के जड़ नियम से, पर किसी उजड़े हुए को फिर से बसाना कब मना है ?'

बच्चन के साहित्य में साधारणीकरण है, जो उन्हें बेमिसाल कवि बनाता है. उन्होंने कहा-'है चिता की राख कर में, मांगती सिन्दूर दुनियाँ'. व्यक्तिगत दुनिया का इतना सफल, सहज साधारणीकरण दुर्लभ है. उनकी कविता की लोकप्रियता का मुख्य कारण उसकी सहजता और संवेदनशील सरलता है और यह सहजता और सरल संवेदना उनकी अनुभूतिमूलक सत्यता के कारण उपलब्ध हो सकी. बच्चन 'मधुकलश' में 'कवि की वासना' कविता में कहते है-

'मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधु समझता

शत्रु मेरा बन गया है छल-रहित व्यवहार मेरा'

'सतरंगिनी' और 'मिलन यामिनी' में बच्चन के नये उल्लास भरे युग की सुन्दर गीतोपलब्धियां देखने-सुनने को मिलीं. उन्होंने महान अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयर के दुखांत नाटकों का हिन्दी अनुवाद करने के साथ-साथ रूसी कविताओं का हिन्दी संग्रह भी प्रकाशित करवाया. उनकी कविताओं में सभी प्रवृतियों यथा, छायावाद, रहस्यवाद, प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का एक साथ समावेश देखने को मिलता है. उन्हें 'दो चट्टानें' के लिए 1965 में हिन्दी कविता के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. बिड़ला फाउन्डेशन ने उनकी तीन खंड़ों में प्रकाशित आत्मकथा के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान दिया. उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के 'कमल पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था. साहित्य सम्मेलन द्वारा उन्हें साहित्य वाचस्पति पुरूस्कार से सम्मानित किया गया था. 1976 में उन्हें भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्यभूषण से सम्मानित किया गया था.

भारत के बेमिसाल, सर्वाधिक लोकप्रिय कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन को उनकी 107वीं जयंती पर मेरा नमन.

 

राजीव आनंद

 

प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा

गिरिडीह-815301

झारखंड

संपर्क-9471765417

डॉ․नन्‍दलाल भारती

एम․ए․ । समाजशास्‍त्र । एल․एल․बी․ । आनर्स ।

पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्‍ट (PGDHRD)

विद्यावाचस्‍पति (PhD)सम्‍मानोपाधि

हिन्‍दी जीवन मूल्‍यों की संवाहक है।

जैसाकि हम मानते हैं हिन्‍दी हमारी मातृभाषा है,राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा है,आजादी की भाषा है,जन-जन की भाषा है आम आदमी की भाषा है,राष्‍ट्रीय एकता विश्‍वबन्‍धुत्‍व की भाषा हिन्‍दी है परन्‍तु संवैधानिक रूप से हिन्‍दी को आज भी पूर्णतः न राष्‍ट्रभाषा का दर्जा प्राप्‍त है और नहीं राजभाषा का। यह हिन्‍दी का दुर्भाग्‍य नहीं देश और देशवासियों का दुर्भाग्‍य है। यदि देश और देशवासियों का दुर्भाग्‍य न होता तो क्‍या हम आजादी 67 के बाद भी हम आजाद देश में बिना हिन्‍दी राष्‍ट्रभाषा के सांस भर रहे हैं। यह वही हिन्‍दी है जिसे भारतवासी आजादी की भाषा कहते हैं,राष्‍ट्रीय एकता की भाषा कहते है परन्‍तु आजादी के 67 साल के बाद भी हिन्‍दी को राष्‍ट्रभाषा का पूर्णतः दर्जा नहीं प्राप्‍त हो सका है। हिन्‍दी को पूर्णतः राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा का दर्जा नहीं प्रदान किया जाना राजनैतिक इच्‍छाशक्‍ति की कमी ही का द्योतक है। ये कैसी आजादी है,कैसी राजनैतिक मजबूरियां है आजाद भारत की अपनी न तो पूर्णतः मान्‍य राजभाषा है न राष्‍ट्रभाषा। न्‍यायालयीन कार्य अग्रंजी में होते है। बैंक पासबुक,बीमा की नियमावलियां,सरकारी आदेश इत्‍यादि अंग्रेजी में पढ़ने और समझने को मिलता है।बीमा कम्‍पनियों के प्रतिनिधि दो चार इधर उधर की अच्‍छाई बताकर हस्ताक्षर करवा लेते हैं,बाद में पता लगता है कि हम ठगे गये। यदि सभी दस्‍तावेज हिन्‍दी में उपलब्‍ध होगे तो आमआदमी पूरी तरह पढकर आश्‍वस्‍त होकर निर्णय ले सकता है।

हम 21वीं शताब्‍दी में जी रहे है परन्‍तु आज भी देश में निरक्षरों की संख्‍या कम नहीं है,कुछ प्रतिशत लोग तो बस हस्‍ताक्षर ही करना सीख पाये है,दुर्भाग्‍यवश वे भी शिक्षित की श्रेणी में आते है। ऐसे देश में अंग्रेजी में काम करने और अंग्रेजी को बढावा देने का औचित्‍य क्‍या ? जबकि आमआदमी और देश के आत्‍मा की आवाज है हिन्‍दी। हिन्‍दी में बात और हर काम हिन्‍दी में किया जाना चाहिये, हिन्‍दी को बढ़ावा दिया जाना चाहिये। स्‍वतन्‍त्र भारत में हिन्‍दी उपेक्षा की शिकार है,इसके लिये हमारी सरकार जिम्‍मेदार है। केन्‍द्रीय सरकारी कार्यालयों में हिन्‍दी का प्रयोगावश खानापूर्ति होकर रह गया है। केन्‍द्रीय सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये था क्‍योंकि राजभाषा का सम्‍बन्‍ध तो प्रशासन और प्रशासकवर्ग से है। इसका प्रयोग मुख्‍यतः चार क्षेत्रों अर्थात- शासन,विधान,न्‍यायपालिका और कार्यपालिका में अपेक्षित है परन्‍तु हमारे देश में शासन और प्रशासन की भाषा अंग्रेजी है। आजादी के 67 साल के बाद भी हिन्‍दी न तो पूर्णतः राजभाषा और न ही राष्‍ट्रभाषा का सम्‍मानित स्‍थान प्राप्‍त कर पायी है तो अंग्रेजी के चक्रव्‍यूह के टूटने की बात कैसी की जाये।शासन और प्रशासन में ईमानदारी से राजभाषा हिन्‍दी का प्रयोग नहीं होने से देश में भ्रष्‍ट्राचार और घोटाले फलफूल रहे हैं।

देश के सामाजिक आर्थिर्क ही नहीं राजनैतिक विकास में देश की भाषा सेतु का काम करती है। अब वक्‍त आ गया है हिन्‍दी को उपेक्षा से बचाने के लिये इसे रोजगार से जोड़े जाने का प्रयास किया जाये । कई देश है जहां अंग्रेजी को तवज्‍जो नही दी जाती है, इसके बाद भी वे देश सामर्थ्‍यवान और पूर्णतः विकसित है तो भारत में अंग्रेंजी की बाध्‍यता क्‍यों ?देश को विकसित बनाना है तो इसके लिये जरूरी होगा कि शैक्षणिक एवं प्रशिक्षण संस्‍थानों को में शिक्षा का माध्‍यम हिन्‍दी हो शासन-प्रशासन हिन्‍दी के प्रयोग को लेकर ईमानदारी बरते। इसके लिये भारत सरकार ने प्रयास तो किये हैं जो हिन्‍दी को देश की राजभाषा के रूप में विकसित करने के लिये जरूरी थे परन्‍तु नीयत में शुद्धता नहीं होने के कारण संवैधानिक नियमों के होने के बाद भी प्रयास सफल नहीं हो पाये हैं।

हिन्‍दी को लेकर मान्‍यता है कि हिन्‍दी में पढ़ने से पांच गुना क्षमता बढ़ जाती है। एक समय था जब यात्रा के दौरान किताबे पढ़ना सुसभ्‍य एवं प्रतिभा की द्योतक हुआ करती थी परन्‍तु आज हिन्‍दी उपन्‍यास,कहानी कविता एवं अन्‍य किताबों से लोग दूर जा रहे है यही कारण है कि आज संस्‍कारहीनता का दौर शुरू हो गया है। इसे हिन्‍दी और साहित्‍य की उपेक्षा से जोड़कर देखा जाना चाहिये। चीन जैसे देश में हिन्‍दी लोकप्रिय हो रही है और हमारे देश में उपेक्षा की शिकार ये कैसी विडम्‍बना है। जाहिर होता है कि हिन्‍दी के लेखक और हिन्‍दी पुस्‍तकें सरकारी उपेक्षा की भी शिकार है,हिन्‍दी का प्रचार-प्रसार व्‍यापक पैमाने पर नही हो रहा है। चीन-सचिन चीन की हिन्‍दी पत्रिका है,जिसकी स्‍थापना 1957 में की गयी थी चीन-सचिन पत्रिका के माध्‍यम से भारतीय जनता को चीन की जानकारियां दी जाती है। इसमें चीन भारत के बीच ऐतिहासिक साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक जानकारी आदान प्रदान की जाती है। पेइचिंग विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दी में विभाग में प्रवेश देने के लिये हिन्‍दी सिखाई पढाई जाती है। यहीं बी․ए․एमए एंव पीएचडी के अध्‍ययन की विधिवत्‌ व्‍यवस्‍था है। ऐसे ही दुनिया के अन्‍य देशों में भी हिन्‍दी में पठन-पाठन कार्य हो रहा है वहां की युवा पीढ़ी हिन्‍दी की तरफ आकर्षित हो रही है परन्‍तु अपने देश में हिन्‍दी उपेक्षा का शिकार हो रही है इसका एक ही कारण उभरकर सामने आता है वह यह है कि शासन एंव प्रशासन वर्ग हिन्‍दी के प्रति अपने दायित्‍वों का निर्वहन जिम्‍मेदारी से नहीं कर पाना है। यह वर्ग कही ना कही किसी ना किसी रूप राजनैतिक सत्‍ता से पोषित है। राजनैतिक सत्‍ता ने अपनी शक्‍तियों को प्रयोग किया होता तो हिन्‍दी देश की पूर्णतः राजभाषा और राष्‍ट्रभाषा होता। अब राजनैतिक सत्‍ता को राजभाषा एवं राष्‍ट्रभषा की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता महसूस होने लगी है क्‍योंकि राजभाषा एवं राष्‍ट्रभाषा ऐतिहासिक साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक सद्‌परम्‍पराओं और जीवन मूल्‍यों की संवाहक होती है, भारतीय परिपेक्ष्‍य में हिन्‍दी मूल्‍यों को संरक्षित और सुरक्षित रखती हैं,दूसरे शब्‍दों में कहा जा सकता है कि हिन्‍दी जीवन मूल्‍यों की संवाहक है।

जैसाकि हम जानते है भाषा किसी राष्‍ट्र की साहित्‍य,संस्‍कृति परम्‍पराओं और जीवन मूल्‍यों की संवाहक होती है,इसलिये आवश्‍यक होता है कि राष्‍ट्र अपनी अस्‍मिता की रक्षा के लिये भाषा को सुरक्षित और संरक्षित रखता है। भाषा के समाप्‍त हाने की स्‍थिति में देश की पहचान समाप्‍त होने का खतरा रहता है। हमारे साहित्‍य संस्‍कृति आधुनिक युग में सुरक्षित है सिर्फ इसलिये क्‍योंकि ये हमारी अपनी भाषा में व्‍यक्‍त किये गये है। भाषा के महत्‍व को हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले समझ लिया था। आजादी के आन्‍दोलन में पूरा भारत एक था उसकी वजह थी हिन्‍दी भाषा। भारतवासियों ने एकजुट होकर हिन्‍दी को स्‍वीकार किया अन्‍ततःयह एकता काम आयी आजादी की भाषा हिन्‍दी बनीं। देश में राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी के अलावा और भी अनेक भाषा राज्‍य स्‍तर पर क्षेत्रीय स्‍तर पर प्रचलित है-उदाहरण के लिये मराठी गुजराती तमिल,पंजाबी,भोजपुरी एवं अन्‍य परन्‍तु राष्‍ट्रचिन्‍तकों ने भाषा और धर्म भेद को दरकिनार कर राष्‍ट्रहित में हिन्‍दी को प्राथमिकता दिया। देश को आजादी मिली हिन्‍दी को संघ की भाषा बना दिया गया। इसके बाद राजभाषाअधिनिय,राजभाषा नियम और संकल्‍प बनाये गये। गृह मन्‍त्रालय के अर्न्‍तगत राजभाषा विभाग की स्‍थापना हुई,हिन्‍दी का सरकारी कार्यालयों में प्रयोग बढाने के लिये प्रयास किया गया इसके बाद भी राजभाषा के कार्यान्‍वयन में पूर्ण सफलता नहीं मिल पायी है। ऐसा नही कि पूर्णतः सफलता नहीं मिलेगी अवश्‍य मिलेगी। हमें अपने और राष्‍ट्र के भविष्‍य के प्रति सचेत होना है, जब हम अपने सम्‍वृद्ध साहित्‍य संस्‍कृति भारतीय आघ्‍यात्‍मिक दर्शन और जीवन मूल्‍यों की गहराई को समझेंगे तब हमें इनका महत्‍व समझ में आयेगा कि ये सदियों के अनुभव साधना और ज्ञान पर आधारित जीवन दर्शन हमारी भाषा से मिले हैं जो हिन्‍दी है। वर्तमान को देखते हुए हमें हिन्‍दी के प्रति स्‍वाभिमानी बनने की जरूरत है,हम अपने स्‍तर पर हिन्‍दी में कार्य करें, अपने दायित्‍वों पर स्‍वयं की दृष्‍टि से खरे उतरें,हम अपनी बात हिन्‍दी में करें,हिन्‍दी में लिखे-पढ़े हिन्‍दी का अधिकतम्‌ प्रयोग करें तभी हमारा देश तरक्‍की कर पायेगा अन्‍यथा अंग्रेजी के मद में हम अपनी सभ्‍यता-संस्‍कृति सामाजिक सरोकारों से हाथ धो बैठेंगे। बदलते हुए युग में हमें हिन्‍दी के प्रति उत्‍तरदायी होना होगा,हिन्‍दी के संरक्षण के प्रति जागरूक होना तभी हिन्‍दी राजभाषा एवं राष्‍ट्रभाषा का पूर्णतः दर्जा प्राप्‍त कर पायेगी यकीनन यह हमारे स्‍वाभिमान की अभिवृद्धि होगी क्‍योंकि हिन्‍दी जीवन मूल्‍यों की संवाहक है

 

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उपन्‍यास-चांदी की हंसुली,सुलभ साहित्‍य इंटरनेशल द्वारा अनुदान प्राप्‍त

नेचुरल लंग्‍वेज रिसर्च सेन्‍टर,आईआईआईटीहैदराबाद द्वारा भाषा एवं शिक्षा हेतु रचनाओं पर शोध कार्य ।

कवि केदारनाथ सिंह ने नांदगाँव में पढ़ी थी कविता

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ज्ञानपीठ पुरस्कार पर संस्कारधानी की सगर्व बधाई


डॉ.चन्द्रकुमार जैन 


राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने हाल ही में प्रख्यात हिन्दी कवि केदारनाथ सिंह को एक भव्य आयोजन में 49वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। पुरस्कार समारोह का आयोजन संसद भवन के बालयोगी ऑडिटोरियम में किया गया। गौरतलब है कि राजनांदगांव में मुक्तिबोध स्मारक-त्रिवेणी संग्रहालय की स्थापना के सिलसिले में 2005 में आयोजित एक काव्य गोष्ठी में श्री केदारनाथ सिंह में काव्य पाठ किया था। मुझे उस यादगार काव्य गोष्ठी के संचालन का सौभाग्य मिला था। आज वास्तव में संस्कारधानी भी सगर्व कह सकती है कि भारत के सर्वोच्च साहित्य सम्मान से विभूषित कवि ने हमारे यहाँ कविता पढ़ी है। इतना ही नहीं, मुलाक़ात के दौरान जब मैंने मुक्तिबोध जी के साथ डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र जी के स्मारक को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह जी की मंशा के अनुरूप, जिला प्रशासन और मुक्तिबोध स्मारक समिति की पहल से यह आकार देने की परियोजना की कहानी बताई तो उन्होंने देश में इसे मौजूदा सदी के आगाज़ की एक बड़ी साहित्यिक उपलब्धि निरूपित किया था। इससे स्वाभाविक है कि हमारी कर्मभूमि का नाम रौशन हुआ।

यथार्थ और कल्पना की जुगलबंदी

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केदारनाथ जी की कविताएं यथार्थ और कल्पना की खोज का एक कोलॉज है। उनकी कविताओं में पारंपरिक दृष्टिकोण के साथ आधुनिक सौंदर्यशास्त्र का भी बोध होता है। उम्मीद है कि आने वालों दिनों में कविताओं के माध्यम से केदारनाथ सिंह युवाओं को प्रेरित करते रहेंगे। गौरतलब है कि केदारनाथ सिंह को साहित्य अकादमी से भी सम्मानित किया जा चुका है। केदारनाथ सिंह ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले हिंदी के छठें लेखक है। 

स्मरणीय है कि पहले प्रख्यात कवि सुमित्रानंदन पंत, रामधारी ‌सिंह ‌दिनकर, निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल और अमराकांत को ये सम्‍मान दिया जा चुका है। श्रीलाल शुक्ल और अमरकांत को ये पुरस्कार संयुक्त रूप से दिया गया था। अभी बिल्कुल अभी, जमीन पक रही है, यहाँ से देखो, बाघ, अकाल में सारस, तालस्ताय और साइकिल केदारनाथ सिंह के महत्वपूर्ण कविता संग्रह है। उन्होंने आलोचनाओं की भी कई किताबें लिखी हैं। 

सधी हुई रचनाओं का समर्थ संसार

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केदारनाथ जी का कविता संग्रह प्रकृति पर पहरा हाल ही में प्रकाशित हुआ है। केदारनाथ सिंह का जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के चकिया गाँव में हुआ था. उऩ्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से 1956 में हिंदी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि हासिल की। गोरखपुर में उन्होंने कुछ दिन हिंदी पढ़ाई और जवाहर लाल विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा विभाग के अध्यक्ष पद से रिटायर हुए। उन्होंने कविता व गद्य की अनेक पुस्तकें रची हैं. इससे पहले उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, कुमार आशान पुरस्कार (केरल) और व्यास पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं.

केदारनाथ सिंह की प्रमुख रचनाएं हैं- जमीन पक रही है,यहां से देखो,बाघ,अकाल में सारस,मेरे समय के शब्द,कल्पना और छायावाद,हिंदी कविता बिंब,विधान और कब्रिस्तान में पंचायत। जटिल विषयों पर बेहद सरल और आम भाषा में लेखन उनकी रचनाओं की विशेषता है. उनकी सबसे प्रमुख लंबी कविता 'बाघ' है। इसे मील का पत्थर कहा जाता है। केदारनाथ सिंह के प्रमुख लेख और कहानियों में 'मेरे समय के शब्द', 'कल्पना और छायावाद', 'हिंदी कविता बिंब विधान' और 'कब्रिस्तान में पंचायत' शामिल हैं.ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएँ, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका) और शब्द (अनियतकालिक पत्रिका) का उन्होंने संपादन भी किया।इन दिनों वे दिल्ली के साकेत में रहते हैं.

हाथ की तरह गर्म दुनिया की चाह

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उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा, दुनिया को हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए। हाथ कविता की ये लाइनें लिखने वाले मशहूर कवि केदारनाथ जी अपनी कविताओं के जरिए हमें अनुप्रास और काव्यात्मक गीत की दुर्लभ संगति दी है। पढ़िए केदारनाथ सिंह की कविता दाने -

नहीं, हम मण्डी नहीं जाएंगे

खलिहान से उठते हुए

कहते हैं दाने

जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आएंगे

जाते- जाते, कहते जाते हैं दाने

अगर लौट कर आए भी

तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे

अपनी अन्तिम चिट्ठी में

लिख भेजते हैं दाने

इसके बाद महीनों तक

बस्ती में

कोई चिट्ठी नहीं आती।

जटिल विषयों पर बेहद सरल और आम भाषा में लेखन उनकी रचनाओं की विशेषता है। याद रहे कि उनकी सबसे प्रमुख लंबी कविता बाघ  है. इसे मील का पत्थर कहा जाता है। बहरहाल पूरे यकीन के साथ कहा जा सकता है कि आने वाले वर्षों में केदारनाथ सिंह हिंदी साहित्य को और भी समृद्ध करेंगे। केदारनाथ जी को संस्कारधानी की साहित्यिक-सांस्कृतिक बिरादरी की बधाई। 

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प्राध्यापक,शासकीय दिग्विजय

पीजी कालेज, राजनांदगांव

दूरियों के दर्द का सवाल और पीढ़ी अंतराल

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

पीढ़ियों का अंतराल तो हमेशा होता है

समय के आगे -

हर अगला कदम पिछले कदम से

खौफ खाता है

कि हर पिछला कदम अगले कदम से बढ़ गया है

रश्मि प्रभा की ऊपर दी गईं पंक्तियाँ चंद अल्फ़ाज़ों में पीढ़ी अंतराल की एक दास्तान का मुकम्मल बयान मालूम पड़ती हैं। बहरहाल, एक और सीन देखिये। ब्रिटिश अखबार गार्डियन में प्रकाशित अपने लंबे लेख के एक अंश 'वट्स रॉंग विद मॉडर्न वर्ल्ड' में अमेरिकी लेखक जोनाथन फ्रेंजन ने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर सलमान रुश्दी ने प्रतिक्रिया क्या दी थी शुरू हो गया एक लिटरेरी ट्विटर वार। आइए देखें, इस झगड़े की जड़ क्या है। आखिर जोनाथन ने कहा क्या-

अगर मैं सन् 1159 में पैदा हुआ होता, जब दुनिया काफी विश्वसनीय हुआ करती थी, तो शायद अभी की अपनी 53 बरस वाली उमर में यह महसूस कर पाता कि आने वाली पीढ़ी मेरे मूल्यों के महत्व को समझते हुए उन्हें सराहेगी। वह उन चीजों की तारीफ करेगी, जिनकी तारीफ मैं कभी किया करता था। तब शायद उसमें अनुमान जैसा कुछ न होता। लेकिन मैं पैदा हुआ सन् 1959 में।

यह वह समय था जब लोग टीवी को सिर्फ प्राइम टाइम में ही देखा करते थे। लोगबाग खूब चिट्ठियां लिखा करते थे और उन्हें डाक से भेजा करते थे। उस जमाने में हर मैगजीन और अखबार में किताबों पर चर्चा के लिए अच्छी-खासी जगह हुआ करती थी। उस वक्त सम्मानित प्रकाशक युवा लेखकों पर लंबे समय तक खूब इन्वेस्ट किया करते थे। इस दौर में न्यू क्रिटिसिज्म का अंग्रेजी विभागों में खूब जोर रहा।

तब एंटीबायटिक्स का इस्तेमाल गम्भीर संक्रमण के दौरान ही किया जाता था। स्वस्थ गायों को उनका इंजेक्शन उन दिनों हरगिज नहीं दिया जाता था। ऐसा नहीं था कि वह एक बेहतरीन दुनिया थी, क्योंकि तब भी हमारे पास बम शेल्टर थे और अनुपयोगी घोषित कर दिए गए स्वीमिंग पूल भी। लेकिन मेरे सामने एक यही दुनिया थी जिसे मैं जानता था और जिसमें मुझे अपने लिए एक लेखक के तौर पर जगह बनाने की कोशिश करनी थी। और आज करीब 53 बरस बाद लेखक क्राउस की एकमात्र शिकायत मुझे ठीक नहीं लगती।

वह कहते हैं कि टैक्नोलॉजी और मीडिया के दबाव के चलते लोगबाग अब महज वर्तमान तक सीमित रहने लगे हैं। वे अपने अतीत से कट गए हैं। क्राउस ऐसे पहले उदाहरण हैं जो यह समझ सके कि कैसे आधुनिकता और बदलाव इंसान की समझ को प्रभावित करते गए। स्वाभाविक तौर पर वह पहले थे, इसलिए बदलाव उनके लिए बहुत अद्भुत और खास किस्म के हो गए। लेकिन वह दर्ज यह करा रहे थे, जैसे वे ही अपने समय को आधुनिकता से जोड़ने वाले हैं।

दरअसल हर अगली पीढ़ी का अनुभव पिछली से इतना अलग होता गया कि अतीत के जीवन मूल्य खोते चले गए। जब तक आधुनिकता बनी रहेगी, तबतक हमेशा यही लगता रहेगा कि हर दिन एक तरह से मानवता के आखिरी दौर का दिन है। अगर देखा जाये तो मूल्यों के क्षरण की बात कोई नई नहीं है, किन्तु कोई संदेह नहीं कि इन्हें लेकर जैसी चिंता आज के समय में व्याप्त है वैसी शायद पहले नहीं थी।  मर्यादा टुकड़े-टुकड़े होकर निरीह खडी सी मालूम पड़ती है और हम और हमारे रखवाले कुछ नहीं कर पाते हैं।  

आजकल युवा पीढ़ी ये इल्जाम लगाए जाते हैं की आजकल के युवा बुजुर्गों का आदर नहीं करते, उनकी देखभाल नहीं करते, उनको समय नहीं देते। लेकिन,यह एक सोचने वाली बात है क़ि पुरानी पीढ़ी और एक नई पीढ़ी का अंतराल है तो क्या पुरानी पीढ़ी नए जमाने के साथ अपनी सोच,अपनी आदतें अपना सहयोग कायम रखतीं हैं ? हमारे जमाने का गुणगान करने की जगह नए जमाने में हो रहे बदलाव को अपनाएँ। अपने बच्चों को आजकल के प्रतियोगी ,भाग-दौड़ वाली जिंदगी में कदम से कदम मिला कर चलने में सहयोग करें। जो काम वो घर में रहकर आराम से कर सकतें हैं उसको करने में संकोच ना करें और न ही अपना अहम् बीच में लायें। इससे उनका समय भी अच्छे से बीतेगा और उनका और आपका मान भी अपने आप बढेगा।

मूल्यों का अस्तित्व रहेगा तभी मानवता की रक्षा सम्भव है। वरना हाल बस वैसा ही रह जायेगा जैसा कि इस मशहूर शेर में कहा गया है -

न ख़ुदा ही मिला, न विसाले सनम

न इधर के रहे, न उधर के रहे

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय 

पीजी कालेज, राजनांदगांव 

मोबाईल का मर्ज

     आज जब में चाचा दिल्लगी दास से मिला तो देखा कि जनाब व्यस्त का कम अस्तव्यस्त ज्यादा लगे। मेरे शुभ प्रभात का प्रतुत्तर दुए बिना ही मुझे अपने पीछे पीछे आने का इशारा कर सीढियों की और दौड़ पड़े।उन्हें सीढियों पर ऐसे बन्दर की भांति कुलांचें भरते हुए देख कर कोई सोच भी नहीं सकता कि बुढऊ घुटनों के पुराने दर्द का रोगी हो सकता है। देखा तो चाचा छत के एक विशेष कौने में एक खास दिशा की ओर मुंह कर के बड़े जोर जोर से बोल रहे थे कि हाँ हाँ अब थोड़ा थोड़ा सा टावर मिल रहा है। वो क्या है कि हमारे यहां टावर की बड़ी समस्या रहती है । कभी तो नो नेटवर्क कवरेज,कभी नेटवर्क इज बिजी ही मिलता है,अब आप समझे नहीं तो यूं समझ लो कि ट्रेफिक जाम ही मिलता है, इसकी शिकायत भी की मगर आज तक तो कुछ नहीं हुआ। कॉल करने वाले की बात का जवाब हाँ हूँ में ही देकर अपने मोबाइल इंस्ट्रूमेंट,उसके कवर,केस,ब्लेक में खरीदी गई सिम आदि के ही के बार में अजीब अजीब किस्म की मालूमात देते रहे,जब अगले ने अपना मोबाइल सेट स्विच ऑफ़ कर दिया तब जाकर के उसका पिण्ड छोड़ा।

चाचा बड़े ही अनमने भाव से अपने मोबाइल इंस्ट्रूमेंट को अपनी लठ्ठे की बनियान की जेब के हवाले करते हुए मेरी तरफ मुखातिब हुए और बोले कपूत तू कब आया । कब आया सो आया बता क्यों आया।आओ नीचे चलते है,यहां हवा बड़ी सर्द चल रही है,धूप भी तो नहीं है, कहते हुए चाचा घुटनों को दोनों हाथों का सहारा देते हुए धीरे धीरे सीढियां उतरने लगे। अभी आधी ही सीढियां उतर पाए थे कि चाचा के लैंड लाइन टेलीफोन की घंटी बजने लगी।मैंने कहा चाचा नीचे लैंड लाइन फोन  बज रहा है, तुम घुटनों के दर्द से परेशान हो कहो तो मैं उठा लूं ,तो चाचा उस बेसिक फोन की घंटी को अनसुनी कर के बुदबुदाए,रहने दो किसी को दरकार होगी तो मोबाइल पर कर लेगा बात,कहते हुए चाचा सीढियों पर वापस मुड़ गए और जा कर जम गए छत के उसी तयशुदा कोने में चाचा काफी देर तक छत के उसी तयशुदा कोने में घंटी आने के इंतजार में जमे रहे मगर उनके मोबाइल को नहीं बजाना था सो नहीं बजा।

       जब काफी देर बाद चाचा नीचे आये तो चाय की जगह मोबाइल की चर्चा छिड़ते देख मैंने टोका, चाचा पान वाले भैया के शादी में शरीक होने नहीं जाना है क्या,अब और देरी से पहुचे तो वो हमारे लत्ते लेगा,शादी निपटने के बाद तक तुम्हारी और उसकी नोक झोंक चलेगी। बात चाचा के समझ में आ गयी और बोले जल्दी चलो ताकि टेम्पो का किराया केवल पान वाले भैया के घर तक का ही भुगतना पड़े,लेट हो गए तो पंद्रह बीस रूपयों की चप्पत और लग जायेगी। चाचा और मैं एक टेम्पो में बैठ गए,टेम्पो वाला और सवारियां होने के इंतजार में था कि उसका मोबाइल भी यकायक बज उठा और उसने हमसे कहा भाई जान माफ़ करें आपको टेम्पो से उतरना पड़ेगा,मेरे कहीं की बुकिंग आ गई है। हम दूसरे टेम्पो के इंतजार में खड़े थे,हमारे वहां खड़े खड़े ही एक गधा छकड़ी वाले ने अपना मोबाइल कान से लगाये लगाये ही गोदाम नंबर दो में पहुँचाने की कह कर अपनी गधा छकड़ी का मुंह विपरीत दिशा में मोड़ लिया।

   हम पड़ते उठते जैसे तैसे पान वाले भैया के घर तक पहुंचे तो बारात चल पड़ी थी,हम भी साथ हो लिए। यहां भी बारातियों की जेबों में मोबाइल की घंटियां ऐसे बज रही थी मानो चलती भेड़ों के झुण्ड में भेड़ों के गले में पड़ी घंटियां बजा करती हैं। बारातियों की तो ही क्या बेंड वालों तक की घंटियां बज रही थी,खुद दूल्हा मियां दोनों हाथों में मोबाइल शरीके हयात के घर जा रहे थे,सबको अपने अपने मोबाइल से काम था,कोई कोई तो मोबाइल के चक्कर में चलते चलते नाली में गिरे तो दो चार को घोड़ी की दुलत्ती खानी पड़ी । मैंने अब तक अपना मोबाइल स्विच ऑफ कर रखा था,पर अब  सब्र नहीं रहा,मुझे भी स्विच ऑन करना पड़ा ।

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चाचा कभी चुनाव कराने गए थे

   अब तक तो मैं यही मान कर चल रहा था कि चाचा दिल्लगी दास मुझसे कुछ भी नहीं छिपाते हैं और मेरा ऐसा मान कर चलना कोई बेबुनियाद इस लिए नहीं था क्यों कि चाचा जैसे हज़रात के पास छिपा कर रखने जैसा होता ही क्या हैं ? इस घुटनों तक की धोती,बिना आस्तीन की लठ्ठे की बनियान और दिन भर रेडियो की भांति बजने वाला एक शख्स किससे,क्या,कैसे और कहां छिपा पाएगा। इसके अलावा अगर इनके पास छिपा कर रखने जैसा कुछ हो भी तो वो लाख चाहने के बावजूद भी छिपा नहीं सकते। और अगर इनके पास कुछ छिपाने लायक होता और छिपा कर रखना चाहते भी तो कम से कम मुझ से तो नहीं छिपा पाते। राजनीति में हमारे यहां तो ‘पारदर्शिता‘ के ढोल बजने अब शुरू हुऐ है जबकि चाचा तो पैदाईशी पारदर्शी हैं। मगर इस मामले में भी चाचा से गच्चा खा गया,वो भी एक मुअम्मा यानि कि एक पहेली निकले,जो छिप छिप कर एक डायरीनुमा कुछ लिख रहे थे जिसमें अपनी जिंदगी के अहम और खास वाक़यात दर्ज करते आ रहे थे जिसका पता मुझे आज तब चला जब वो इन्तेखाबात के नताईज सुन कर वो बेहोश हो गए थे। 

    हां तो आज तो चाचा चुनाव परिणाम सुन कर के बेहोश हो गए थे,ठीक है ये तो परिणाम थे ही कुछ ऐसे जिन्होंने एक बारगी तो सबको झकझोर कर रख दिया था,अगर ये नताईज इसके अलावा कोई और तरह के होते तो भी चाचा को तो गश आना ही था,क्यों कि चाचा जान हैं कि  बेनुक्स से बेनुक्स सूरतेहाल में भी कोई न कोई नुक्स तो तलाश ही लेते हैं और सब्र तो होता नहीं नतीजा बेहोशी। वैसे चाचा टाइप लोगों के लिए बेहोश शब्द का इस्तेमाल बेमानी जरूर हैं क्यों कि जनाब होश में रहते ही कब हैं जो बेहोश होंगे।मैंने उनके मुंह पर पानी के छींटे मारे और उनके आँखें खोलने और कैंची कि तरह चलने वाली जुबान की जुम्बिश का इंतजार करने लगा। 

     इस दौरान उनके सिरहाने रखे रोजनामचे पर मेरी निगाह गई जिसमें चाचा ने अपनी शादी के जमा खर्च से लेकर सेवानिवृति पर मिली रकम तक का ब्यौरा था।इसके अलावा चाचा ने जिस जिस वाकये को तरजीह दी,उसे भी इसमें रकम कर लिया,जिसमे एक चीज थी चाचा का संस्मरण जो उन्होंने तब लिखा होगा जब जो सरकारी सेवा में रहते हुए कभी चुनाव करवाने गए होंगे। वैसे ये कोई कम बात नहीं कि बोर्ड पर चौक से लिख कर हाथो हाथ डस्टर से साफ करते रहने वाले कागज पर कलम से लिखें और उसे सहेज कर भी रखें। चाचा ने लिख रखा था कि चुनावों कि घोषणा से या तो हुक्मरान पार्टी को झुरझुरी आती हैं या फिर हम चुनाव ड्यूटी अंजाम देने वाले अहलकारान को।कुछ लोग तो इस गाज से बचना जानते हैं सो बच जाते हैं, बाकी इसको अपनी बदकिस्मती समझ कर मरे मरे कदमों से घरवालों को लगभग अलविदा कहते हुए गले पड़ी ड्यूटी अंजाम देने चल पड़ते हैं। आगे लिख रखा था कि ऐसा मेरे साथ भी कई बार हो चुका है और हर बार कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता हैं कि जिसे लाख कोशिश के बाद भी भुलाया नहीं जा सकता और कुछ वाकियात ऐसे भी होते हैं जिनको भूल जाने के डर ले लिख लिया जाता हैं।  

    चाचा के रोजनामचे में दर्ज था कि जब हम पहले पहल इस काम के लिए गए तब हमें ऐसी बस मिली जिसकी आधी सीटें और पूरे के पूरे कांच टूटे हुए थे। जिसे एक मरियल सा ड्राईवर पूरी बोतल पी कर चला रहा था सो सर्द रात में भी हमारी पूरी टीम को पसीने छूट रहे थे और डर के मारे सारे के सारे हनुमान चालीसा पढ़ते जा रहे थे सो हम ड्यूटी वाले गांव कब पहुँच गए किसी को पता ही नहीं चला। मगर जब ड्यूटी वाली जगह पहुँचे तब पता चला कि जगह सड़क,पानी,बिजली तक जिस जगह आज तक नहीं पहुंच पाए,हमारी टीम आज उस जगह जरूर पहुंच गयी थी। हमने सामूहिक यह  निर्णय लिया कि चलो नहाने धोने का तो क्या देव कृपा से यदि वापिस जीवित लौटे तो घर जा कर ही कर लेंगे, वैसे भी कौन से रोज नहा कर ही स्कूल जाते हैं। अब रही बात सोने की तो बैडिंग साथ लाये हैं सो खोल कर कहीं भी टांगें सीधी कर लेंगे। मगर खाने का तो कोई न कोई पुख्ता  इंतजाम करना ही पड़ेगा,तो तय हुआ कि खाने पीने का सामान सब मिल कर ले आयेंगे,चपरासी साथ हैं जो खाना बना ही देगा। मगर किसी को किसी पर भरोसा करने जैसी परिस्थितयां ही  नहीं थी सो पूरी की पूरी टीम परचूनी की दूकान तक गई,पूरे मोल भाव के बाद खाने पीने का सामान ख़रीदा,खाने की पुख्ता व्यवस्था कर के ही हम सब ने दम लिया।

    सब कुछ ठीक ठाक चला,मगर जिस दिन काम ख़त्म हुआ उस दिन तो झगडा होना ही था सो हुआ। झगड़े का कारण खाने पीने का सामान था जिसके बच जाने का अंदेशा सबको था,सो सबने एक राय हो कर तय किया कि बचे खुचे मिर्च मसाले पूरे के पूरे सब्जी में डाल दिये जाए,सारे के सारे  आटे की रोटियां बना ली जाये,अगर ठूंस ठूंस कर खा चुकने के बाद भी रोटियां बच जाये वो बराबर बराबर बांट ली जाये। सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ मगर एक समस्या खड़ी हो गई, आज सब्जी में जरूरत से भी कहीं ज्यादा डालने के उपरांत भी थोडा सा तेल बच गया,अगर पिछले दिनों सब्जी में तेल डालने में कंजूसी नहीं की होती तो सब्जी खाने लायक बन जाती और आज यह समस्या सामने ही नहीं आती। उस बचे तेल की समस्या पर गहन विचार विमर्स करने पर उसका निराकरण यह यह सूझा कि तेल बालों में डाल लिया जाये,सबने अपने अपने बाल ‘नागौरी मालपुए’ जैसे कर लिए मगर फिर भी कुछ तेल बच ही गया जिसे हाथ पैरों पर चुपड़ने पर सब सहमत हो गए,और चुपड लिया। हमने अगर एक साबुन ख़रीदा होता और वो बच जाता तो उसे भी यकीनन छः टुकड़ों में विभक्त कर बराबर बांटा जाता। मैं इतना ही पढ़ पाया था कि चाचा ने आँखें खोल दी और पूछा क्यों कपूत क्या कर रहे हो ।           

सड़कों पर बढ़ रहे हादसे - कारण अनेक
- ट्रैफिक नियमों को सख्त करना जरूरी -


    यूँ तो समस्याएँ हर देश में होती हैं। कहीं ज्यादा तो कहीं कम, कहीं विकास से संबंधित समस्याएँ तो कहीं आवास की समस्याएँ, बेरोजगारी और जनसंख्या समस्या भी अनेक देशों के लिए विकराल रूप लेती जा रही हैं। हमारा भारत वर्ष ऐसी ही अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। एक ओर जहाँ हम जनसंख्या और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे है वहीं दूसरी ओर आतंकवाद और नक्सलवाद हमारे सीने पर मूँग दल रहा है। ये कुछ ऐसी समस्याएँ है जिससे लगभग विश्व के सभी देश त्रस्त है, किन्तु भारत वर्ष में मूलभूत सुविधाओं में शामिल सड़क सुविधा ने एक अलग ही समस्या खड़ी कर दी है। हम अपने देश के नागरिकों को सड़क पर चलते समय सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण सड़कों की खराब स्थिति ही है। केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार तक कि यह जवाबदारी है कि वह अपने नागरिकों को यातायात की सुरक्षित व्यवस्था उपलब्ध कराये। सड़क सुरक्षा के मामले में भारतवर्ष विश्व के दूसरे देशों से बहुत पीछे है। भारतवर्ष के संदर्भ में यदि यह कहा जाये कि सड़क सुरक्षा संबंधी समस्याएँ आतंकवाद और नक्सलवाद से भी बड़ी समस्या है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।


    भारतवर्ष सड़क यातायात के मामले में विश्व के तीसरे सबसे बड़े नेटवर्क के रूप में काम कर रहा है, किन्तु इसी से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्था में वह फिसड्डी सिद्ध हो रहा है। हमारे देश में सड़क सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएँ संतोषजनक स्थिति में नहीं हैं। जहाँ तक मैं समझता हूँ भारतवर्ष नयी सड़कों के निर्माण और पुरानी के रख-रखाव में जो राशि खर्च करता है वह किसी विकसित राष्ट्र से कहीं अधिक है। फिर ऐसी कौन सी कमजोरी है कि हम सड़कों की स्थिति ठीक नहीं रख पा रहे है। हमने सी.सी. रोड से लेकर डामरीकृत सड़कों का जाल बिछाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी हैं। केन्द्रीय सरकार ने प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत फण्ड जारी किये तो स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भी मुख्यमंत्री सड़क योजना के नाम से इस हेतु राशि उपलब्ध करायी है। बावजूद इन प्रयासों के हमारे संकल्प अधूरे ही हैं। कारण की तलाश करें और गहरायी में झांकें तो भ्रष्टाचार ही एकमात्र कारण दिखायी पड़ता है। सड़कों की सुन्दरता के लिए गौरवपथ योजना को सरकारों ने अमल में लाया। महज एक से दो किलोमीटर या इससे भी कम लंबाई की सड़कों के लिए करोड़ों रूपयों का भुगतान ठेका एजेन्सियों को किया गया। गौरवपथ निर्माण के कुछ ही महिनों बाद जर्जर गौरवपथ अपने सीने पर बिछायी गयी रेत, गिट्टी और सीमेन्ट की, निकृष्टता की कहानी बयाँ करता दिखायी पड़ने लगा। बावजूद इसके सरकार  ने न तो ठेकेदार से गुणवत्ताहीन निर्माण के लिए सवाल-जवाब किया और न ही किये गये अनुबंध के अनुसार उन पर कोई ठोस कार्रवाई की गयी।


    सवाल यह उठता है कि हमारे देश में सड़क सुरक्षा का दृश्य इतना भयावह क्यों है? दूसरा प्रश्न यह भी है कि सड़कों पर होने वाले हादसों पर हमारी सरकारों, निजी निर्माण कंपनियों एवं सामाजिक संगठनों के संदर्भित मायने कहाँ तक खरे उतर रहे हैं? वास्तव में यातायात की बढ़ती माँग आधुनिक शैली की मूलभूत आवश्यकता है। हमारे देश में सड़क सुरक्षा से जुड़े जो भी प्रयास अब तक किये गये हैं, वे या तो निष्प्रभावी रहे हैं या फिर आंशिक सफलता पर आकर दम तोड़ चुके हैं। हमारी केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक ने दुर्घटनाओं पर नियंत्रण एवं समाधान हेतु राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा परिषद का गठन तो किया, किन्तु अब तक सुरक्षा की दृष्टि से कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं कर पायी है। सड़क दुर्घटना में होने वाली मौतों के लगातार बढ़ते आंकड़ों के बावजूद भी ऐसी कोई राष्ट्रीय नियंत्रण योजना कार्यरूप नहीं ले पायी है जैसी कि पोलियो, क्षयरोग, मलेरिया या अन्य बीमारियों का सामना करने के लिए बनायी गयी है। सामाजिक तथा नागरिक प्रतिष्ठानों की ओर से भी सड़क दुर्घटनाओं के विरोध में उस तरह की गूँज सुनाई नहीं पड़ती जिस तरह की अन्य मुद्दों पर स्पष्ट दिखायी देती है।


    यातायात से संबंधित इस संवेदनशील मुद्दे पर यदि हम तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचें तो हमारे देश में उदारीकरण के बाद से वाहनों की संख्या जिस रफ्तार से बढ़ी है उस रफ्तार से उन साधनों में वृद्धि नहीं की गयी जिन पर वे दौड़ रही हैं। वाहनों के बढ़ते दबाव के अनुरूप सड़कों की गुणवत्ता और विस्तारीकरण पर जरूरी ध्यान नहीं दिया गया है। छोटे शहरों की बात तो दूर जिला मुख्यालयों और राजधानियों में भी सड़कों की दुर्दशा सरकारों को आईना दिखा रही है। बावजूद इन विरोधाभासों के न तो हमारी सरकारें नींद से जागी हैं और न ही सड़कों पर चलने वाले हमारे देशवासी चौकन्ने हुए हैं। सड़क दुर्घटनाओं के दूसरे पहलू पर यदि हम गौर करें तो राज्य सरकारों द्वारा अपनायी गयी लाइसेंसिंग प्रणाली पुराने नियमों पर ही दौड़ लगा रही हैं। आर.टी.ओ. कार्यालय से जारी किये जाने वाले दुपहिया-चौपहिया वाहनों के लाइसेंस प्रायः बिना जाँच परख के जारी कर दिये जाते हैं। आर.टी.ओ. की यह लापरवाही भी छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक में देखी जा रही है। इस तरह की लापरवाही के पीछे सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार के रूप में सामने आ रहे हैं। भरपूर लाइसेन्स शुल्क नियमों के विरूद्ध वसूल करते हुए, राज्य सरकार के उक्त विभाग द्वारा एक बड़े उद्योग का रूप अख्तियार कर लिया गया है। सड़क दुर्घटनाओं का एक प्रमुख कारण समय बाधित हो चुके वाहन भी बन रहे हैं। केन्द्र सरकार के सर्वे आंकड़ों के अनुसार 1.5 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएँ खराब सड़कों के कारण हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर लगभग 1.75 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएँ खराब वाहनों के कारण होती दिखायी दे रही हैं। इसी तरह लगभग 1 प्रतिशत दुर्घटनाओं के पीछे खराब मौसम कारण बनकर सामने आ रहा है।


    सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ रहे मामले जो गंभीर चिन्ता का कारण हैं उनके पीछे हमारे देशवासियों में ट्रैफिक सेन्स का अभाव होना भी मुख्य कारक रहा है। कुल दुर्घटनाओं के 75 प्रतिशत हादसे ड्राइविंग संबंधी त्रुटियों से हो रहे हैं। सड़कों पर पैदल चलने वाले या सायकिल से अपना काम निपटाने वाले लोग भी सड़कों पर गैर-जिम्मेदाराना बर्ताव कर सड़क हादसों को जन्म दे रहे हैं, रही-सही कसर सड़कों पर मंडराने वाले मवेशी-गाय, बैल, भैंस, कुत्ते आदि पूरा कर रहे हैं। आंकड़ों के आईने में झांका जाये तो उक्त कारणों से 4 प्रतिशत के बराबर हादसे हो रहे हैं। यह चौंकाने वाली बात है कि हमारा देश सड़क दुर्घटनाओं के मामले में विश्व में प्रथम स्थान पर खड़ा है। भारतवर्ष सहित विश्व के सौ से अधिक देशों ने संयुक्त राष्ट्र की पहल पर सन् 2010 से 2020 तक के दशक को सड़क सुरक्षा दशक के रूप में मनाने की स्वीकृति दी है। इसका एकमात्र उद्देश्य सन् 2020 तक सड़कों पर होने वाले हादसों को नियंत्रित कर एक संदेश देना ही है


    सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं को कम करने के लिए कुछ सख्त कदम उठाये जाने चाहिए। उदाहरणतः राष्ट्रीय राजमार्गों पर सरकारी मदिरा दुकानों सहित अवैध रूप से मदिरा बेचने पर प्रतिबंध लगाया जाये। नशे की हालत में वाहन चालन की दशा में चालक पर कठोर कानूनी कदम उठाये जायें। राज्यवार सड़क सुरक्षा कोष तथा जिला स्तरीय सड़क सुरक्षा समितियों का गठन करते हुए कोष में जुर्माने की कम से कम 50 प्रतिशत राशि जमा करायी जानी चाहिए। स्थायी वाहन चालक लाइसेन्स जारी करने से पूर्व प्रशिक्षण अनिवार्य करते हुए भी सार्थक प्रयास किये जा सकते हैं। इसी तरह के अन्य मूलभूत संशोधनों को लागू करते हुए सड़क हादसों को नियंत्रित किया जा सकता है। समस्या विकराल है, किन्तु पुलिस, जनता, कानून आदि मिलकर काम करें और अपनी जवाबदारी का निर्वाह ईमानदारी पूर्वक करें तो सड़क हादसों में टूट रहे परिवार बचाये जा सकते हैं। संयुक्त प्रयास ही नियंत्रण की बैशाखी का काम कर सकता है।


 


                                               प्रस्तुतकर्ता
                                       (डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                     dr.skmishra_rjn@rediffmail.com

हिंदुस्तान में हर बच्चे को बचपन में खरगोश और कछुए की कहानी सुनाई जाती है। जिसमें खरगोश और कछुए के बीच रेस होती है। खरगोश जल्दी-जल्दी फुर्ती से चलता है और अंततः हार जाता है। तथा कछुआ धीरे-धीरे रेंगते हुए चलता है और अंततः विजयी हो जाता है। हिंदुस्तानियों के मन-मस्तिष्क में यह कहानी बसी हुई है। तथा इसके असर से हिंदुस्तानियों की सारी फुर्ती गायब हो गई है। हर कोई हर काम में यही सोचता है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’ ?

यदि उपरोक्त कहानी का कोई दोष नहीं है तो हिंदुस्तानियों के डीएनए में ही जरूर कोई न कोई ऐसा दोष है जो हमेशा इनके मष्तिष्क को संदेश देता रहता है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’? इसलिए ही यहाँ के लोग नम्बर एक के कामचोर और आलसी होते हैं। ये या तो काम करते ही नहीं या फिर मस्ती से इतना धीरे-धीरे करते हैं कि लगता है कुछ हो ही नहीं रहा है।

सुबह सोकर उठने के लिए पत्नी दस बार भी कहे तो लोग यही कहते हैं कि इतनी जल्दी भी क्या है ? अभी तो पाँच ही बजे हैं। जब तक आठ न बज जाय अधिकांश हिंदुस्तानियों की नीद नहीं जाती। जो लोग सुबह समय पर उठ भी नहीं सकते वे कोई काम समय पर कैसे करेंगे ? लेकिन सुबह जल्दी उठने वाले समय पर सारे काम करेंगे, इसकी कोई गारंटी थोड़े है। फर्क तो हिंदुस्तानी होने से पड़ता है।

हिंदुस्तानी विद्यार्थी सोचता रहता है कि पढ़ाई करने की इतनी जल्दी भी क्या है? जब परीक्षा आएगी तो पढ़ लेंगे। अध्यापक सोचता है कि अभी तो पूरा सत्र पड़ा है। पढ़ा देंगे, इतनी जल्दी भी क्या है ? डॉक्टर कहता है कि अरे भाई अभी तो केवल चार विजिट किए हो। ठीक हो जाएगा, इतनी जल्दी भी क्या है ? परेशान होने की जरूरत नहीं है। वकील लोग तारीख पर तारीख दिलाने को सोचते रहते हैं। मुवक्किल को समझाते रहते हैं कि इतनी जल्दी भी क्या है ? अमुक का चालीस साल का केस अभी कल फायनल हुआ है।

इसी तरह जब किसी को किसी नोटिस का जबाब देना होता है तो वह सोचता हैं कि दे देंगे अभी दस दिन शेष है , अभी पाँच दिन शेष है और अभी कम से कम दो दिन तो शेष है ही, इतनी जल्दी भी क्या है ? और उसके बाद समय सीमा बढ़ाने की अपील लगा देते हैं। यह हिंदुस्तानियों की दिनचर्या में शामिल है।

इसी तरह आधुनिक प्रेमिका अगर भूल से कभी शादी का नाम ले भी लेती है तो शातिर प्रेमी बोलता है कि सब कुछ वैसा ही तो है फिर इतनी जल्दी भी क्या है ? इसी तरह से हमारे नेता भी यही सोचते रहते हैं कि अभी चुनाव हुए दो साल ही हुए हैं। अभी तीन साल शेष हैं तो इतनी जल्दी भी क्या है ? यही सोचते-सोचते जब आधा साल शेष रह जाता है तो साढ़े चार साल का बाकी काम छे महीने में कैसे हो ? फिर आनन-फानन में थोड़ा-बहुत हो पाता है और फिर चुनाव ही नजर आता है।

यदि विश्व के सभी देशों में आलसियों का पता लगाने का अभियान चलाया जाय और आलसियों की संख्या के आधार पर सभी देशों की सूची बनाया जाय तो हिंदुस्तान का सबसे बड़ा नाम हो जाएगा। क्योंकि बड़े से बड़े यानी अजगर जैसे आलसी यहाँ पाए जाते हैं। यह यानी आलसी होने की विशेषता हिंदुस्तानियों को बड़ा से बड़ा पदक दिला सकती है।

कबीरदास जी ने हिंदुस्तानियों के इस विशेषता को देखकर ही कहा था-

काल्हि करे सो आज कर , आज करे सो अब।

पल में प्रलय होयगी, बहुरि करेगा कब’।।

यह दोहा यहाँ के लोगों को रास नहीं आया। बिल्कुल ही नहीं जमा। क्योंकि इसमें केवल काम करने को ही नहीं कहा गया था बल्कि जल्दी अर्थात कल का काम आज ही करने की सलाह दी गई थी। और हिंदुस्तानी सोचता है कि आखिर इतनी जल्दी भी क्या है ? न हम भागे जाते हैं और न काम। कई तो यहाँ तक कहते हैं कि दुनिया में कई लोग ऐसे हैं जिनके पास काम ही नहीं है। और यदि हमारे पास काम है तो हम काम करके बेकाम क्यों बनें ? पता नहीं कल हो न हो। इसलिए धीरे-धीरे काम करना चाहिए। काम आता रहे, इकट्ठा होते रहे तो लोगों को भी पता चलता है कि इसके पास काम है। और बॉस यह कभी नहीं सोचता कि यह बेकाम है तथा दूसरा काम जल्दी देने के लिए सो बार सोचता है।

एक बार उपरोक्त दोहा सुनाकर एक आलसी से पूछा गया भाई पूरा का पूरा दिन ऐसे बात और मुलाकात में बिता देते हो कुछ करते ही नहीं हो। आलसी बोला बाबा डरा रहा है। प्रलय का डर दिखा रहा है। लेकिन हम इतना भी मूर्ख नहीं हैं, जब पल में प्रलय होनी है तो कुछ करने की जरूरत ही कहाँ है ? कई आलसी खुश थे कि २०१२ में प्रलय हो जायेगी लेकिन यह भी वैसे ही चला गया।

हिंदुस्तानी आलसियों को उपरोक्त दोहे से कहीं न कहीं शियाकत रहती थी तो सबने इसका इंतजाम करके अपने मनोकूल एक छंद कुछ इस प्रकार तैयार किया-

आज करे सो काल्हि कर, काल्हि करे सो परसों।

पल में प्रलय होयगी, मौज करो न तरसो।।

कबीरदास जी को ही नहीं हिंदुस्तानियों ने सभी संतो, महात्माओं, पूर्बजों और उनके उपदेशों को किनारे कर दिया। और खुद छंद रचना करने लगे, उपदेश देने लगे। अपनी-अपनी कथा कहने लगे। जन सभाएं करने लगे। परिणाम क्या हुआ रचनाकारों की बाढ़ आ गई। उपदेशक यहाँ-वहाँ घूमने लगे, पकड़-पकड़ कर उपदेश देने लगे। कथा कहने वाले चप्पे-चप्पे पर जम गए। जन सभाएं करने वाले लोग जो लोगों को बरगलाने में सफल हुए वे नेता कहलाये और देश की वागडोर हाथ में ले ली। सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया।

रचनाओं से रचना गायब हो गई, उपदेश में से सदुपदेश चला गया। कथा में से कथा चली गई। अपनी-अपनी व्यथा गाने लगे। आज का काम कल होने लगा, कल का परसों और परसों का वर्षों में होने लगा। फिर क्या था देर से ढेर ने जन्म ले लिया। दफ्तरों में फाइलों का ढेर, न्यायालयों में मुकदमों का ढेर यानी जहाँ देखो वही ढेर कारण एक ही- देर।

साठ साल पहले वाली समस्याएँ आज भी मुँह फैलाए खड़ी हैं। गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, रोटी, कपड़ा, मकान, सड़क, बिजली और पानी की समस्याएँ अब भी हटने का नाम नहीं ले रहीं हैं। इनको भी हिंदुस्तान से और हिंदुस्तान के आलसियों से मोह हो गया है और इन्हें भी लगने लगा है कि ‘इतनी जल्दी भी क्या है’ ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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अन्तरराष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए)

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

संसार में बहुत सी भाषाएँ हैं जो बोली तो जाती हैं मगर उनकी कोई लिपि नहीं है। इनका भाषावैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए संसार भर की भाषाओं में बोली जाने वाली भाषाओं की ध्वनियों (speech sounds) और स्वनगुणिमिक अभिलक्षणों (prosodic features) के मानकीकृत प्रतिनिधित्व के लिए अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक एसोसिएशन की स्थापना हुई। इसकी शुरुआत तो सन् 1886 में फ्रांसीसी एवं अंग्रेजी के अध्यापकों की सम्बंधित सोच से मानी जा सकती है। इस एसोशिएशन की स्थापना सन् 1887 में हुई तथा फ्रांसीसी भाषा में इसको ‘ l’Association phonétique internationale’ नाम दिया गया। बाद में, इस एसोशिएशन ने मुख्य रूप से लैटिन वर्णमाला के आधार पर ध्वन्यात्मक अंकन की एक वर्णमाला प्रणाली विकसित की जिससे संसार की किसी भी भाषा को ध्वन्यात्मक रूप से अंकित किया जा सके। यह ध्यान में रखना चाहिए कि यह किसी भाषा विशेष की लिपि नहीं है।

जिन भाषाओं की अपनी लिपियाँ हैं, वे परम्परागत लिपि कहलाती हैं। संसार की परम्परागत लिपियों में, देवनागरी लिपि अपेक्षाकृत सबसे अधिक वैज्ञानिक है। जैसा बोला जाता है, उसको वह करीब करीब उसी रूप में अंकित करती है। भारत के संदर्भ में, संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, नेपाली तथा नेपाल में बोली जाने वाली अन्य उपभाषाएँ, तामाङ भाषा, बोडो, संताली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में गुजराती, पंजाबी, बिष्णुपुरिया मणिपुरी, और उर्दू भाषाएँ भी देवनागरी में लिखी जाती हैं। परम्परागत देवनागरी लिपि में किंचित संशोधन करने मात्र से उसमें भारत की अन्य प्रमुख भाषाओं को लिपिबद्ध किया जा सकता है। इसका प्रमाण भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा प्रकाशित ‘भारतीय भाषा कोश’ है। इस कोश में भारत की देवनागरी लिपि से भिन्न लिपियों में लिखी जाने वाली भाषाओं के शब्दों को भी देवनागरी की परम्परागत लिपि में किंचित संशोधन करके लिपिबद्ध किया गया है। इन भाषाओं के नाम हैं –

· 1.पंजाबी 2. उर्दू 3. कश्मीरी 4. सिंधी 5. गुजराती 6. बंगला 7. असमिया 8. उड़िया (अब नाम – ओडिया) 9. तेलुगु 10. तमिळ 11. मलयालम 12. कन्नड़।

उपर्युक्त 12 भाषाओं की परम्परागत लिपियाँ निम्न हैं –

भाषा का नाम

लिपि का नाम

· पंजाबी

गुरुमुखी

· उर्दू

अरबी / फारसी

· कश्मीरी

पश्तो

· सिंधी

अरबी

· गुजराती

गुजराती

· बंगला

बांगला

· असमिया

असमिया

· उड़िया (ओडिया)

ओड़िया

· तेलुगु

तेलुगु

· तमिळ

तमिळ

· मलयालम

मलयालम

· कन्नड़

कन्नड़

इन भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखने के लिए केवल किंचित संशोधन करने होते हैं। उपर्युक्त लिपियों में उर्दू की अरबी-फारसी, कश्मीरी की पश्तो एवं सिंधी की अरबी लिपि को छोड़कर शेष सभी लिपियों (गुरुमुखी, गुजराती, बांगला, असमिया, ओड़िया, तेलुगु, तमिळ, मलयालम, कन्नड़) का विकास भी देवनागरी लिपि की भाँति ब्राह्मी लिपि से ही हुआ है। संसार की भाषाओं की परम्परागत लिपियों के संदर्भ में, मैं यह रेखांकित करना चाहता हूँ कि किसी भी भाषा की कोई भी परम्परागत लिपि पूर्णरूपेण ध्वन्यात्मक लिपि नहीं होती। व्यवहार में पूर्णरूपेण ध्वन्यात्मक लिपि की जरूरत भी नहीं होती। प्रत्येक भाषा में सभी ध्वनियाँ व्यतिरेकी अथवा विषम वितरण में वितरित नहीं होतीं। जो ध्वनियाँ व्यतिरेकी अथवा विषम वितरण में वितरित होती हैं, उनके लिए अलग अलग वर्ण जरूरी होते हैं। दो भाषाओं में दो ध्वनियों का प्रयोग हो सकता है मगर उन भाषाओं में उनका वितरण भी व्यतिरेकी अथवा विषम हो, यह जरूरी नहीं है। उदाहरण के लिए हिन्दी और तमिल में ’क’ और ’ग’ का प्रयोग होता है। मगर हिन्दी एवं तमिल में इनका वितरण समान नहीं है। इनका प्रकार्यात्मक मूल्य समान नहीं है। हिन्दी में इनका वितरण व्यतिरेकी अथवा विषम है। इसी कारण हिन्दी में इनके लिए अलग अलग वर्ण हैं। तमिल में इनका वितरण व्यतिरेकी अथवा विषम नहीं है। तमिल में इनका वितरण परिपूरक है अर्थात शब्द की जिन स्थितियों में / जिन परिवेशों में एक आती है उनमें दूसरी नहीं आती। दूसरी शब्द की जिन स्थितियों में / जिन परिवेशों में आती है उनमें पहली नहीं आती। इस परिपूरक वितरण के कारण वे भाषा में अर्थ भेद नहीं कर पातीं। तमिल में एक वर्ण दोनों को अंकित कर देता है। हिन्दी में यदि हम ’क’ और ’ग’ दोनों का प्रयोग नहीं करेंगे तो फिर ‘काल’ एवं ‘गाल’ शब्दों की अर्थ प्रतीति किस प्रकार सम्भव हो सकेगी। कहने का अभिप्राय यह है कि परम्परागत लिपियाँ पूर्णरूपेण ध्वन्यात्मक लिपियाँ नहीं होती हैं। इनके लिए ऐसा होने की कोई आवश्यकता और सार्थकता भी नहीं है। परम्परागत लिपि अपनी भाषा में बोली जाने वाली समस्त ध्वनियों (sounds) को अंकित करने के लिए नहीं होती। इसका प्रयोजन अपनी भाषा के ध्वनिमिकों (phonemes) को अंकित करना होता है। जो लिपि इस आधार को जिस मात्रा में पूरा कर पाती है, वह लिपि उसी मात्रा में उस भाषा को लिपिबद्ध करने का दायित्व पूरा करने में समर्थ होती है। किसी भाषा की ध्वनिमिक व्यवस्था (phonemic system) के अध्ययन का सबसे अधिक महत्व इसमें है कि इस कारण हम उस भाषा के लिए न्यूनतम वर्णों का निर्धारण कर सकते हैं।

ध्वनिविज्ञान (Phonetics) विषय में सबसे पहले अध्येता को अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण और उसके ध्वन्यात्मक मूल्य का ज्ञान कराया जाता है। इसको अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए) के नाम से जाना जाता है। इसमें संशोधन होता रहता है। सन् 2005 में इसमें जो संशोधन किए गए हैं, उसके हिसाब से इस वर्णमाला में 107 वर्ण (letters), 52 विशेषक चिह्न (diacritics), तथा 19 अधिखंडात्मक अभिलक्षण (supra-segmental features) एवं / अथवा स्वनगुणिमिक अभिलक्षण (prosodic features) हैं। किसी भाषा में केवल स्वर एवं व्यंजन ही महत्वपूर्ण नहीं होते, अधिखंडात्मक अभिलक्षण (supra-segmental features) एवं / अथवा स्वनगुणिमिक अभिलक्षण (prosodic features) का भी महत्व होता है। यह बात अलग है कि भाषाओं में इनका महत्व समान नहीं होता। उदाहरण के लिए हिन्दी में अनुनासिकता (nasalization) का ध्वनिमिक महत्व है और चीनी भाषा में अनुतान (intonation) का ध्वनिमिक महत्व है। बलाघात, सुर, अनुतान आदि इनके उदाहरण हैं। अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए) के 107 वर्णों (letters) एवं 52 विशेषक चिह्नों के संयोगों, क्रमों और क्रमचयों के कारण हजारों ध्वनि भेदों को अंकित किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला (आईपीए) के वर्णों (letters) को तालिका में इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है - clip_image002

व्यंजनों को विस्तार से इस प्रकार दिखाया जा सकता है

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(विकिपीडिया से साभार)

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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कुलदीप ठाकुर
 

जन्म तिथि- 4 सितंबर 1984
शिक्षा- एम.ए.
प्रकाशित कृतियाँ- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्प्रति- हिमाचल सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत 


विशेष- 100 प्रतिशत दृष्टिहीन, संगीत में विशारद


पता: गाँव बानसा [मचोदी], तहसील रोहड़ू जिला शिमला
ई-मेल- kuldeepsingpinku@gmail.com


प्यार कभी मरता नहीं है।
प्यार कभी मरता नहीं, जीवित रहता है, मरने के बाद भी
प्यार तन से नहीं होता, प्रेम प्यास है आत्मा की।
शायद इस दुखयारी की, आस्था नहीं है भगवान में,
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
वृक्ष के नीचे पूजा करके, दीपक वहाँ जलाती है,
फिर नैनों के जल से उस दीपक को बुझाती है,
जाते हुए कुछ सूखे फूल, बिखेरती उस स्थान में।
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
उस के जाने के बाद वहां कोई, रोता हुआ आता है,
उन सूखे हुए फूलों  को, सीने से लगाता है।
फिर बुझा हुआ दीपक जलाकर, उड़ जाता है आसमान में,
नित्य पूजा की थाली लेकर, जाती है शमशान में।
 

सपने।
मेरी आंखों में जब देखे सपने,
मुझसे बोला  मुझे दे दो सपने,
पैसा चाहे जितना भी ले लो,
बेच दो मुझे अपने सपने।
पैसे नहीं है तुम्हारे पास,
क्यों सजाये है सुनहरे सपने,
नहीं कर पाओगे पैसे बिना,
पूरे तुम अपने सपने।
क्रोधित होकर बोला  मुझसे,
ले ले  पैसे, दे दे  सपने।
 
नहीं नहीं मैं नहीं दूंगा,
अपनी आंखों के सपने,
मैं कंगाल हूं, नहीं है पैसे,
मेरे पास है केवल सपने,
चन्द पैसों में  बेच दूं  अगर,
अपनी आंखों के सुनहरे  सपने,
कल पैसों में भी नहीं मिलेंगे
ऐसे सुन्दर प्यारे सपने।
कभी सोता हूं राज महल में,
कभी देखता हूं गाड़ी के सपने।
करता हूं विवाह अप्सरा से,
देखता हूं कई रानियों के सपने।
 
नहीं नहीं मत छीनो मुझसे,
रहने दो मेरी आंखों में सपने,
हम गरीब हैं, हम तो बस,
देख सकते हैं केवल  सपने।
धन नहीं है, दौलत नहीं है,
हमारे पास है केवल सपने।
 

मैं तो तेरी जननी हूं।
खोल  गेट का ताला बेटा,  मैं सड़क पे, तू बिस्तर पे लेटा?
मत मुझ पर अत्याचार कर, मैं तो तेरी जननी हूं।
नौ मास तक कोख में पाला, हाथ पकड़ के चलना सिखाया,
पढ़ा लिखाकर शोहरत दिलायी, मैं तो तेरी जननी हूं।
सब कुछ है तेरा कुछ न मेरा, मांग लेता, सब कुछ दे देती।
क्यों घर से मुझे निकाल दिया, मैं तो तेरी जननी हूं।
कल भूखी  रही मैं तेरे लिये,  तू रोटी न देता मैं चुप रह जाती,
ये घर है मेरे प्यार का मन्दिर, मैं तो तेरी जननी हूं।
सोचा था बेटा राम होगा, रावण ने भी मां की पूजा की,
लोग गैर  पीड़ितों की पीड़ा हरते हैं, मैं तो तेरी जननी हूं।
 
कल तुझ पर हंसेंगे सब, मुझे सड़क पर देखकर,
कोई मां बेटा न चाहेगी, मैं तो तेरी जननी हूं।
 
 

मैं कहना चहाता हूं।
मैं कहना चाहता हूं, इक बात दीवाने से,
कुछ भी हासिल न होगा, व्यर्थ में आँसू बहाने से।
उसे तुझ से प्यार होता, तेरा जीवन तबाह न करती,
पत्थर दिल नहीं पिघलते, किसी के रोने और  मिट जाने से।
सूख रहा है एक गुल, बुलबुल की याद में,
हस्ती तेरी मिट जायेगी, गुल तेरे मुरझाने से।
शमा को तुझसे प्यार नहीं, मत जा तू उसके पास।
जलाकर राख कर देगा, कहता हूँ परवाने से।
भोली भाली एक चकोरी, चाँद को पाना चाहती है,
दिल नहीं है चाँद के पास, क्या लाभ है उसे चाहने से।
किसी को भी इतना मत चाहो, जी न पाओ उसके बिना,
जीवन नहीं मरा करता है, किसी के दूर जाने से।
 

फूट पड़ी है गीत बनकर।
कन्ठ में मेरे, स्वर है तेरे, गीत हैं प्रेम के अधरों पर,
नैनों में है जो  छवि तुम्हारी,  फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
 
तन सुन्दर मन सुन्दरतम,सुन्दर हो तुम जग में सबसे,
तन की पावनता, मन की सुन्दरता,  फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
तुम रति हो या मेनका, या किसी  नव लोक से आयी हो,
तुम्हारे अधरों की मधुर मुस्कान, फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
कालीदास के नैनों में भी, तुम सी सुन्दर कोई छवि होगी,
जो दिखती  होगी हर शै में, फूट पड़ी है गीत बनकर।
 
मधुर वाणी, पुष्प सा  स्वभाव, नैनों से छलकता  प्रेम,
तुम्हारी आहट मेरी प्रतीक्षा, फूट पड़ी है गीत बनकर।
 

मैं खड़ा इस पार।
    मैं खड़ा इस पार, तुम हो उस पार प्रिय,
मुद्दतें  हो गयी मिले नहीं, बुलाता है मेरा प्यार प्रिय।

    वसन्त आया फूल खिले, देता था सुनायी कोकिल का गान,
झूम रही थी प्रकृति सारी, न थी जीवन में बहार प्रिय

।    घिर आये नब में बादल देखो, आया है सावन तुम भी आओ।
 
कई वर्ष  हो गये दूर रह कर, क्या कहेगा संसार प्रिय।

    मौसम बदला, रस्में बदली, वक्त के साथ हर चीज बदली,
तुम कभी न बदलना,तुम हो जीवन की धार प्रिय।

    कोई रोके तुम्हें तो रुकना न, आना पवन की तीव्र गति में,
जो तुम्हे आने से रोके, गिरा देना वो दीवार प्रिय।

 

15 अगस्त।
मैं 15 अगस्त हूं कहता हूं तुम से, सोचो  हम क्यों गुलाम हुए,
वो सब कुछ हम फिर न करें, जिस कारण हम गुमनाम हुए।
मैंने खुद रोते देखा था,  अपनी प्यारी भारत मां को,
राम कृष्ण के वंशज होकर भी,  हम जग में  बदनाम हुए।
हर हिन्दुस्तानी का जीवन था केवल,  पिंजरे में बन्द पंछी सा,
नारी का अस्तित्व, पुरूष का पौरुष, हमारे  ख्वाब तक भी  नीलाम हुए।
कुछ महापुरूषों ने सपना देखा, खुशहाल स्वतंत्र भारत का,
इस सपने को पूरा करने, कई देश भक्त महान हुए।
मैं साक्षी हूं हर कुर्बानी  का, मैंने हर शहीद  पर सुमन चढ़ाये,
शव गिनते गिनते थक गया था,  असंख्य वीर कुर्बान हुए।
मैं 15 अगस्त करता हूं आवाहन, भ्रष्टाचार को जड़ से  मिटाओ,
देखो हमारी उन पुरानी भूलों के, क्या क्या  भयानक परिणाम हुए।

 


प्रकृति की तरह...


मुझे लगता है
अब पंछियों की चहचाहट भी
कम हो रही है
...मानवीय  संवेदना की तरह...

अब तो बसंत में भी
मुर्झा कर   गुल
बिखर रहे हैं इधर उधर
...हमारे सपनों की तरह...

अब तो पिंजड़े में बंद
पंछियों को भी
स्वीकार है बंधन में रहना
....हमारे बच्चों की तरह...

नहीं सुनाई देती है अब
कहानियों में परियां
उन्हें भी मार दिया होगा
...अजन्मी बेटियों की तरह...

कहीं 21वीं सदी में
हमारा अस्तित्व भी
खतरे में तो नहीं है
प्रकृति की तरह...

...जीने के लिये तुम्हारे शब्द ही काफी हैं...


   
    उस दिन जब
मेरा वहां अंतिम दिन था
मुझसे कहा था तुमने
लबों की इस प्यारी मुस्कान को
....कभी मिटने न देना...

आशीषों भरा
आप का कहा हर शब्द
याद रहेगा
जीवन भर मुझे
...हालात भी न छीन सकेंगे  मुझसे...

पर वो मुस्कान
अब लबों पर नहीं है
जो बहुत पहले
भेंट चढ़ गयी हालात की
...जीने के लिये तुम्हारे शब्द ही काफी हैं...

 

 

देश की इस धुंधली तसवीर को।

मैंने अपना मत
दिया था जिसे,
मतगणना में
उसे शिकस्त मिली।

न क्षेत्र देखा
न  जाती
न हवा की तरफ
अपना मत बदला।

दल को मैं
महत्व नहीं देता,
आश्वासन,  भाषण
बहुत सुन चुका।

देखा था मैंने
व्यक्तित्व उसका
वो बदल सकता था
देश की इस धुंधली तसवीर को

 

हम कहां व्यस्त हैं?
मैं सोचता हूं कि
हमारा अधिकांश काम
आज  होता है मशीनों से
फिर भी हम
व्यस्त हो गये
मशीनों  से भी अधिक।

आज हमारे पास
किसी के लिये ही
यहां तक की खुद के लिये भी
वक्त नहीं है।

बिलकुल भी संदेह नहीं
मशीनें हम से अधिक
और अति शीघ्र काम करती है।
फिर सोचिये जरा
हम कहां व्यस्त हैं?

 

ये क्रांति लाना चाहता हूं...

तुम दे दो अपने शब्द मुझे,
मैं गीत बनाना चाहता हूं,
सोए हैं जो निद्रा में,
उन्हें जगाना चाहता हूं...

नहीं मिलती, मजदूर को मजदूरी,
कर रहा है किसान आत्महत्या,
गांव गली के  हर बच्चे को,
स्कूल भिजवाना चाहता हूं...

प्रताड़ित हो रही   है औरत घर में,
लड़कियों के लिये   पग-पग पे खतरा,
गर्भ में पल रही बेटियों का,
जीवन बचाना चाहता हूं...

मृत हो गया है यौवन आज,
नशे से अनेकों होनहारों का,
नशे के सभी   गिरोह को,
फांसी पे चढ़ाना चाहता हूं....

शोषण न हो किसी का,
सभी को न्याय मिले,
अंजान न हो   अधिकारों से कोई,
ये क्रांति लाना चाहता हूं...

 

दीवार...
ये दीवार
जो सहारा देती रही
हर उस आदमी को
जिसे आवश्यकता थी
इसके सहारे की...
आज ये दीवार
गिरने वाली है,
जिसे सहारा देने को
कोई भी तैयार नहीं है...

इसके पत्थर भी,
जिन्हें छुपा रखा था,
प्रेम से अपने आगोश में
भी अलग होना चाहते हैं...

 

बापू...
बापू
मैंने सुना है
किताबों में भी पढ़ा है
तुम भारत के सब से
निर्धन आदमी की तरह
जीवन जीते थे।

मैं ये भी जानता हूं
तुम अपना  हर  काम
स्वयं करते थे।
तुम तो
पहनने के लिये कपड़ा भी
अपने हाथों से बुना करते थे।
तुम्हारा चरित्र तुम्हारी लिखी
किताबों के दर्पण में
देखा है मैंने।

 

इस लिये आज
मैं महसूस कर सकता हूं कि
तुम्हारी आत्मा भी
आहत होगी
जब हर नेता की
प्रतिमाएं बनाने के लिये
हो रहा है खर्च
वो पैसा जिससे
देश के कई जनों को
रोटी,
फुटपातियों को
घर,
अभागों को
शिक्षा,
मिल सकती थी।


आवारा न कहें...
हर उत्सव,  त्योहारों पर,
होती थी मेरी पूजा,
हर पूजा, यज्ञ   के भोग का,
प्रथम अंश  खिलाते थे मुझे।
तुम कहते थे अक्सर
33 करोड़ देव बसते हैं,
होता है जहां मेरा वास,
भूत पिशाच भी नहीं आते वहां
जहां  मिलता है  मुझे मान।

बस में था तब तक मैंने,
जीवन भर अपना दूध पिलाया
पर आज दूध देना मेरे बस में नहीं।
तुम्हारे घर को सदा ही
मैंने अपना घर समझा।
सदा ही  तुम्हारे घर में
खुशहाली लाई,
आज मैं बूढ़ी हूं,
केवल घास फूस तो खाती हूं,
कल लगता था मेरा गोबर भी पावन,
आज बोझ मैं ही लगती हूं।
जब आज    मुझे घर से निकाला,
रोई मैं भी मां की तरह,
इससे तुम्हारा कहीं अहित न हो,
मांगती हूं ईश्वर से  ये मन्नत बार बार।
मैं दूध का कर्ज नहीं मांग रही,
न ही  चाहिये मुझे तुमहारे हिस्से की
कोई भी  चीज।
तुम मेरे लिये बस इतना करो,
मुझे भय है कहीं लोग,
  मुझे भी आवारा न कहें...

 

तो हम कह सकेंगे कि नशा जहर है...
कौन कहता है
नशा जहर है,
जहर मारता है केवल  एक बार,
नशे से मरते हैं बार बार...

जहर  को पीकर,
मरते हैं केवल खुद,
नशा लेने वाला,
मारता हैं औरों को भी...

जहर पीना तो शायद,
किसी की मजबूरी भी  हो सकती है,
पर नशा करना तो,
केवल आदत है...

किसी का प्रिय  मित्र
कभी भी जहर पीने को नहीं देता,
पर खुशी खुशी से,
नशा करने को कह सकता है...

हमारी अपनी नादानी देखो,
हम जहर  को तो  बच्चों से दूर रख देते हैं,
  पर सिगरेट या शराब को
टेबल पर सजाते हैं...

जहर की तरह अगर हम और सरकार,
        इन नशीले पदार्थों को बिकने से रोकें,
बच्चों को ये देखने को भी न मिलें,
तो बचा सकते हैं हम  आने वाले कल को...

जब जहर की तरह नशे से भी,
भयभीत होगा हमारा समाज,
नशे को भी आत्महत्या माना जाएगा,
तो हम कह सकेंगे  कि  नशा जहर है...

 

ख्वाब देखने से डरता है...
हर एक आदमी
चाहे  छोटा हो या बड़ा,
अमीर हो या गरीब,
ख्वाब तो देख सकता है...

ख्वाब देखने के लिये,
न कहीं जाना पड़ता है,
न कुछ देना पड़ता है,
न किसी के आगे गिड़गिड़ाना पड़ता है...

न रिश्वत देनी पड़ती है,
न रूपये पैसे की जरूरत होती है,
डिगरी भी हो या न हो,
ख्वाब तो देखे जा सकते हैं...

पर ख्वाब पूरा करने के लिये,
ये सब कुछ करना पड़ता है,
फिर भी पता नहीं,
ख्वाब पूरा  हों या न हो...

इसी लिये आज भी
भारत का युवक,
अनेकों डिगरियां होने पर भी,
ख्वाब देखने से डरता है...

 

आंसू भी हैं...
ठेके पर बिकने वाली,
हर बोतल में,
केवल शराब ही नहीं,
आंसू भी हैं...
उस औरत के आंसू,
जो दिन भर परिश्रम करके,
शाम को घर में आकर,
हिंसा का शिकार होती है...
उस बच्चे के आंसू,
जिस की फीस के पैसे,
स्कूल में नहीं,
ठेके पर दे आये....
उस मां के आंसू,
जिस की दवा के लिये,
उस के बेटे के पास,
पैसे न होने का बहाना है...
ये आंसू,
शराब से भी अधिक
खतरनाक हैं,
इन से बचके रहना...

 

तुम तो खुद भी औरत हो
आयी थी मैं जब  इस घर में,
कहां था मैंने तुम को मां,
तुमने भी बड़े प्रेम से,
मुझे बेटी कहकर पुकारा था,
आज तुम्हीं कह रही हो,
क्या दिया तुम्हें,  क्या लाया।
समझो मेरे मन के दर्द को।
तुम तो खुद भी  औरत हो,

मेरी शिक्षा की खातिर,
पिता ने दिन रात एक किये हैं,
मेरे विवाह की खातिर,
उन्होंने कई कर्ज लिये हैं,
कहां से देंगे वो इतना दहेज,
ये सुन, मां मर जाएगी,
मां उन्हें  भी  जीने दो,
तुम तो खुद भी  औरत हो,

7 फेरे लेकर मैं,
आयी हूं  इस घर में,
अर्थी मेरी जाएगी,
केवल अब  इस घर से।
रूप रंग मेरे गुण देखो,
आयेगी लक्ष्मी,  तुम्हारे घर चलकर,
मुझे स्नेह,  सम्मान दो,
तुम तो खुद भी  औरत हो,

 

हमें है पथ बनाने की आदत...
हमें हैं धोखा खाने की आदत,
अपने गमों को छुपाने की आदत,
पथरीला  है ये  रास्ता,
हमें वहीं है जाने की आदत...

मांगा सूरज से प्रकाश,
पर सूरज ने दी तपिश,
होने वाली  है अब शाम,
न है दीपक जलाने की आदत...

कहती है अक्सर मां,
मैंने तुमको दिया सब कुछ,
भाग्य तो तुम्हारा अपना है,
उन्हें मंदिर जाने की आदत...

मंजिल मिले या  न मिले,
चलना है बस  केवल हमें,
काम है किसी का शूल बिछाना,
हमें है पथ बनाने की आदत...

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