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हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (अंतिम भाग)

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पिछले अंक 9 से जारी..ठीक दस बजे कलेक्टर ने बैठक ली। बैठक में ज़मीन से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी- एस.डी.एम., तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारी -ज़रूरी काग़ज़ात के साथ उपस्थित हुए। कलेक्टर मंत्री से बात करने में व्यस्त है। कलेक्टर जब कुर्सी पर बैठा और सारे अधिकारियों-कर्मचारियों पर एक नज़र डालकर मुस्कुराया जैसे कह रहा हो जल्द से जल्द काम करवा लो, आज भारी व्यस्तता है, ठीक उसी वक़्त मंत्री का फ़ोन आ गया। आधे घण्टे से मोबाइल पर बात चल रही है, कलेक्टर ‘जी सर’, ‘जी सर’ जैसे सम्बोधनों से सभी बातें निपटाता जा रहा है और बीच में एस.डी.एम. से संकेत में कह चुका है कि वो कुम्हार वाला मामला है न, उसे सामने रखो। हो चुकी है चर्चा, कितनी बार करेंगे आप लोग बात। हाँ, ये कुम्हार का शपथ-पत्र है, उसने स्वेच्छा से दिया है। और लोगों का नहीं है न कुछ। कोई बात नहीं। सारी बस्ती घेरनी है, ज़मीन उनकी नहीं है, कब्जे की है, होने दो कब्जे की, अपन सब घेर लेते हैं। काग़ज़ में ये है कि सिर्फ़ कुम्हार की जगह घेरी जा रही है, ठीक है... सभी अधिकारी-कर्मचारी विनीत भाव से सिर हिलाते जा रहे हैं। कलेक्टर बात के बीच काग़ज़ …

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (9)

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पिछले अंक 8 से जारी..आधी रात को कुम्हार की एक दुःस्वप्न में नींद खुल गई। उसका समूचा शरीर काँप रहा था और तेज़-तेज़ साँसें चल रही थीं। वह उठ बैठा। दुःस्वप्न में एक विशालकाय हाथी था जिसकी गर्दन पर महावत की जगह पटवारी बैठा था। पटवारी के हाथ में लोहे का भालेनुमा अंकुश था। पैरों के पंजों से वह हाथी को हँकाता हुआ मुँह से अजीबोगरीब आवाज़ निकाल रहा था जिसका आशय था कि अपनी मज़बूत सूँड़ से पहले कुम्हार का झोपड़ा गिरा, फिर बस्ती में जितने भी झोपड़े हैं एक-एककर उन्हें उजाड़ दो। हाथी के आगे-आगे बाबू है जो झोपड़ों की ओर इशारा कर रहा है कि इन्हें मिनटों में गिराओ, तनिक भी देर न करो। हाथी जब पटवारी और बाबू के इशारों पर कुम्हार के झोपड़े की ओर भयंकर चिंघाड़ के साथ बढ़ता है तो भोला और कुम्हारिन और गोपी उसके सामने दृढ़ता से खड़े हो जाते हैं। भोला तीखी आवाज़ में कहता है- हमारी जान लेकर ही झोपड़ा गिराया जा सकता है! पहले हमारी जान लो। पटवारी ग़ुस्से में अलफ। चीखता है- रौंद डालो! हाथी ऐसा करने को होता है कि... भोला की नींद खुल जाती है। झोपड़े के ऊपर से बड़ा-सा चाँद आसमान में उठ रहा था। लगता था जैसे वह काँप रहा हो। भोला को लगा…

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (8)

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पिछले अंक 7 से जारी..शाम को जब कुम्हार घर पहुँचा, मैना कर्कश स्वर में किटकिट करती मिली। उसे अंदेशा हुआ ज़रूर कोई गड़बड़ है। और यह गड़बड़ ख़ुद उसी से हुई है- अँगूठा लगा के! पटवारी ने साज़िश रच के उससे अँगूठा ले लिया जिसमें उसका सर्वस्व था जो अब उसका नहीं रहा। वह झोपड़े के बाहर पड़ी खाट पर बैठ गया, सिर थाम के। कुम्हारिन झोपड़े से बाहर निकली तो भोला को इस तरह बैठा देखकर बोली- अरे, तुम कब आए? मैं तो गोपी की वजह से नहीं आ पाई, उसको दस्त लग गए थे, लस्त पड़ा है, लगता है धूप लग गई... भोला उसी तरह बैठा रहा, कोई जवाब नहीं दिया, तो कुम्हारिन ने उसे झकझोर डाला- ये क्या है? मुँह क्यों लटकाए हो? साहब से भेंट हुई? बहुत ही मरी आवाज़ में भोला ने कहा - साहब मरदूद आया ही नहीं। दुःख की बात तो ये कि बस्ती का एक आदमी पास न था। कल काकी थीं और मैं। आज काकी भी नहीं आ पाईं- ऐसे में भला मैं क्या कर लूँगा! -हे भगवान! लगता है, किसी को अपनी ज़मीन से प्यार ही नहीं - कुम्हारिन बोली -ऐसे में गौरमिंट अपने हिसाब से सबको बेदख़ल कर देगी। हम लोग रह जाएँगे टापते। यकायक वह चुप हो गई, क्षणभर बाद आगे बोली - लेकिन - तुम्हें हार नहीं माननी ह…

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (7)

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पिछले अंक 6 से जारी..थोड़ी देर आराम करने के बाद पटवारी ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और उठ बैठा। उसकी ख़ैरियत जानने के लिए भोला, श्यामल का बाबू, बच्चू और काकी उसकी तरफ़ दौड़े। पटवारी ने हाथ के इशारे से कहा कि वह आराम से है, घबराने की कोई ज़रूरत नहीं, फिर धीरे से सबसे कहा- देखो, ये बाबू बहुत ही नालायक है। इसकी बातों में आप लोग न आना। इससे तो मैं निबट लूंगा। मुझे तो बाबू ने पीटा है- मैं यह कहता हूँ और आप लोगों ने उसे ऐसा करते देखा। लड़कों ने मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं की- आप चिंता न करें- कहता वह खाट पर लेट गया। थोड़ी देर सिर थामकर उठने के बाद वह आगे बोला- देखो, आप लोगों से एक विनती करना चाहता हूँ। विनती इसलिए कि हम आप लोगों से वर्षों से जुड़े हैं- दुख-दर्द में साथ-साथ चलते रहे हैं। दुःख ही एक ऐसा मोड़ होता है जहाँ पर ठहर कर लोगों की पहचान होती है कि कौन अपने हैं और कौन पराए। मैं एक ऐसे ही मुकाम पर हूँ जहाँ से मैं आप लोगों को छोड़ना नहीं चाहता। आप के साथ रहना चाहता हूँ, क्योंकि मैं भी आप लोगों की जमात से उठकर थोड़ा आगे बढ़ा हूँ लेकिन हालत आप लोगों जैसी है। -एक क्षण के लिए वह रुका, फिर बोला- भोला से मैं प…

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (6)

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पिछले अंक 5 से जारी..सुबह उठते ही, कुम्हार सीधे पटवारी के घर पहुँचा। उस वक़्त वह बाहर संडास में था। और इस तरह कराह रहा था जैसे कोई उसे हलाल कर रहा हो। भारी कराह के बीच उसने कुम्हार से थोड़ी देर इंतज़ार करने को कहा। कुम्हार बाहर ही खड़ा रहा। पटवारी बहुत ही गंदी गली में रहता था जिसकी दोनों तरफ़ बनी नालियों से इस वक़्त टट्टी बह रही थी। तीखी दुर्गंध उठ रही थी। कुम्हार का दम-सा घुटने लगा। बचाव के लिए धीरे-धीरे चलता वह गली के मुहाने पर आ गया। यहाँ भी भयंकर गंदगी और बदबू थी। सामने कूड़े का अम्बार लगा था। सूअरों और कुत्तों की नोंक-झोंक थी। कुम्हार रात भर इस कुड्डना में था कि उसे बेदख़ल करने के लिए कैसी चालें चली जा रही हैं। जिस जगह पर वह रह रहा है, वह उसके पुरखों की है और खेत भी उन्हीं के हैं जो उसे विरासत में मिले। अब यह कैसी चाल है कि उससे पट्टे के काग़ज़ माँगे जा रहे हैं। हमारे पास कहाँ से आया काग़ज़? किसी भी किसान के पास घर या खेत का काग़ज़ नहीं मिलेगा। यह काम तो पटवारी का है। खसरा-खतौनी किसलिए हैं? यह तो सरासर नाइंसाफी है और उसे सताने का नया तरीका। इसी बहाने सताया जाए, तंग किया जाए ताकि भाग खड़ा होऊँ औ…

हरि भटनागर का उपन्यास - एक थी मैना एक था कुम्हार (5)

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पिछले अंक 4 से जारी..रात में कुम्हार को भूख नहीं थी। पत्नी के बार-बार कहने पर उसने एक रोटी खाई और ढेरों पानी चढ़ा लिया। इस पर पत्नी नाराज़ हुई। उसने पत्नी की नाराज़गी पर ज़रा भी ध्यान न दिया। सीधे खाट पर पड़ गया। लेटते ही उसकी आँख लग गई लेकिन थोड़ी ही देर में वह जाग गया। उसे अजीब-सी बेचैनी हो रही थी। मन में बार-बार यह ख़्याल आ रहा था कि कहीं उसकी ज़मीन हाथ से जाने वाली तो नहीं। उसे लग रहा था कि हो न हो बड़े साहब की निगाह उसकी ज़मीन पर है तभी वह दौरे पर आए थे, उसके झोपड़े, ख़ाली पड़ी ज़मीन और नीम के विशाल पेड़ को लालच भरी निगाह से देख रहे थे। उन्होंने तभी पटवारी को तलब किया था जो दौड़ा हुआ उनके सामने जा खड़ा हुआ था। ज़रूर बड़े साहब ने पटवारी को हुक्म दिया कि यह ज़मीन मौक़े की है, इस पर कब्जा जमाओ... पटवारी उस वक़्त हाथ जोड़ के हुक्म की तामीली के लिए उनके सामने झुक गया था जैसे कह रहा हो कि हुजूर, यह काम हो जाएगा, आप निशाख़ातिर रहें। हे भगवान! क्या अनर्थ होने वाला है। घरवाली भी उसे सचेत कर रही थी। वह तो साफ़ कह रही थी कि यह पटवारी गड़बड़ आदमी है, कुछ न कुछ अंधेर ज़रूर करेगा। कुम्हार उठकर बैठ गया। तकिया के नीचे से …

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रचनाकार

रवि रतलामी

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