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2015
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ये शुभकामना नहीं दुर्भावना है ठाकुर

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(आमतौर पर इंटरनेट की सामग्री को रचनाकार में रीसायकल नहीं किया जाता. यदा कदा अपवाद स्वरूप कुछ सामग्री अलबत्ता साझा जरूर की जाती है. प्रस्तुत आलेख सर्वत्र साझा करने योग्य है - बारंबार. आनंद लें, और तनिक विचारें!)

सालागमन की पूर्व बेला पर नया लिखने के लिए कुछ नहीं है । सारी बातें कही और लिखी जा चुकी हैं । लोग इस कदर बोर हो चुके हैं कि शुभकामनाओं की रिसाइक्लिंग करने लगे हैं । शुभकामनाओं का भी अर्थशास्त्र के सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम के तहत मूल्याँकन होना चाहिए । एक ही शुभकामना अगर कई लोगों से होते हुए आप तक पहुँचे तो उसका क्या असर होगा । कई साल से इस्तमाल में हो तब क्या कोई असर बाकी रह सकता है । गन्ने की तरह हमने शुभकामनाओं से रसों को आख़िरी बूँद तक निचोड़ लिया है ।

मैं समझ सकता हूँ कि सबके लिए अलग से शुभकामना लिखने का न तो वक्त है न हुनर । जिनको अंग्रेज़ी नहीं आती उनका अंग्रेज़ी में न्यू ईयर विश देखकर टेंशन में आ जाता हूँ कि ये कब सीख लिया इसने । हर शुभकामना में समृद्धि
होती है । क्यों होती है और इससे क्या हम समृद्ध होते हैं ? कुछ लोग हैप्पी न्यू ईयर का वर्ण विस्तार करेंगे । एच से कुछ बतायेंगे तो वाई से कुछ । हम तो स्कूल में यही पढ़ कर निकले कि वाई से सिर्फ याक होता है । किसी ने नहीं बताया कि ईयर भी होता है ।

मैं शुभकामनाओं के आतंक से घबराया हुआ हूँ । बाज़ार में वही पुरानी शुभकामनायें हैं । जिनमें साल हटाकर कभी होली तो कभी दीवाली लिख देते हैं । अकर-बकर कुछ भी बके जा रहे हैं लोग । अकर-बकर आबरा का डाबरा का भोजपुरी रूपांतरण है । हम सब अपना और समाज का फालतूकरण कर रहे हैं । अंग्रेज़ी शब्द एब्सर्ड के एंबेसडर हो गए हैं । मेरा बस चलता तो एक शुभकामना पुलिस बनाता । जो भी पिछले साल की शुभकामनाओं का वितरण करता पाया गया उसे कमरे में बिठाकर एक हज़ार बार वही शुभकामनाएँ लिखवाता ताकि उसे जीवन भर के लिए याद रह जाता कि ये वही वाली शुभकामना है जिसे भेजने पर पुलिस ले गई थी ।

मैं भारत में आए शुभकामना संकट को राष्ट्रीय संकट मानता हूँ । इस संकट को दूर करने के लिए अखिल भारतीय शुभकामना आयोग बनाना ही पड़ेगा । ईश्वर के लिए इस आयोग का चेयरमैन रिटायर्ड जज नहीं होगा । मैं रिटायर्ड जज वाले आयोगों से भी उकता गया हूँ । जैसे किसी आयोग का जन्म रिटायर्ड जज के पुनर्जन्म के लिए ही होता है। आयोग से जजों का आतंक दूर करना भी मेरा मक़सद है । इसलिए शुभकामना आयोग का चेयरमैन ख़ुद बनूँगा । दुनिया से आह्वान करूँगा कि पुरानी शुभकामनाएँ न भेजें । इससे लगता है कि पुराना साल ही यू टर्न लेकर आ गया है । अगर आप शुभकामना नहीं भेजेंगे तब भी सालागमन तो होना ही है । जो लोग नया नहीं रच पायेंगे उनके लिए मैं मनोवैज्ञानिक चिकित्सा उपलब्ध कराऊँगा । ताकि उन्हें यक़ीन रहे कि बिना शुभकामना भेजे भी वो नए साल में जीने योग्य होंगे ।

प्लीज, पुरानी शुभकामनाओं से नए साल को प्रदूषित न करें । कुछ नया कहें । कुछ नया सोचें । आपके आशीर्वाद से कोई समृद्ध होने लगे तो नेता आपके हाथ काट ले जायेंगे । अपने दफ्तर में टाँग देंगे । इसलिए खुद को ही शुभकामना दीजिये कि आपको सालागमन पर किसी की शुभकामना की दरकार ही न हो । समृद्धि एक सामाजिक स्वप्न है या व्यक्तिगत हम यही तय नहीं कर पाये । सरकार सोचती है कि सबको समृद्ध करें । इंसान सोचता है कि खाली हमीं समृद्ध हों । लेकिन शुभकामनाओं की ये ग़रीबी मुझसे बर्दाश्त नहीं होती है ।

इसलिए हे प्रेषकों, आपके द्वारा प्रेषित शुभकामनाओं से सदेच्छा संसार में बोरियत पैदा हो रही है । आप किसी के द्वारा प्रेषित घटिया शुभकामना को किसी और के इनबाक्स में ठेलकर बदला न लें । जो जहाँ है, वहीं रहे । ये साल आकर चला जाएगा । कुछ काम नहीं है तो टाटा-407 बुक कीजिये । दस दोस्तों को जमा कीजिये और कहीं चले जाइये । मीट मुर्ग़ा भून भून के बनाते रहिए । स्वेटर उतार कर कमर से बाँध लीजिये या कंधे पर रख लीजिये । एक ठो म्यूज़िक सिस्टम लेते जाइयेगा । जब तक धूप रहे खान पान और डाँस करने के बाद घर आ जाइयेगा ।

चला चलंती की बेला में ये साल सला सल का ठेला है । अल्ल-बल्ल कुछ भी बकिये लेकिन जान लीजिए कि हमारी आपकी जीवन पद्धति का बंदोबस्त हो चुका है । शहर, पेशा और वेतन के अंतरों से ही अंतर क़ायम है वर्ना हमारी दुनिया एकरस हो चुकी है । लोड मत लीजिये । ऐश कीजिये । मस्ती का बहाना जिसके आने जाने से मिले, वही स्वागतयोग्य है । बस ध्यान रहे कि कूकर की सीटी सुनाई दे । वरना मुर्ग़ा जल-भुन गया तो मूड ख़राब हो जाएगा । आप अपना देखो जी । हम अपनी देखते हैं । दुर्भावनाओं से लगने वाले पकाऊ थकाऊ और उबाऊ शुभकामनाएँ न भेजें ।

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ताराशंकर वंदोपाध्याय की कहानी – दीपा का प्रेम

यह मुझे पता था। कितनी बार मैंने कहा था। मगर कौन सुनता है। मैं क्या कोई आदमी हूँ कि मेरी बात सुनी जाए। अब हुआ, वही बात हुई न?

चटर्जी गृहिणी ने तीन बार ‘अब हुआ’ कहने के बाद अपने माथे को तीन बार पीट लिया।

चटर्जी यानी भवनाथ चटर्जी बंगाल के जाने-माने व्यक्ति थे। सिर्फ बंगाल में ही क्यों, वे भारत भर में प्रसिद्ध थे। वे अध्यापक और दार्शनिक थे। गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। उनकी आर्थिक हालत ठीक थी। उन्होंने गला खंखारकर कहा 'मैं अपनी गलती मानता हूं। बार-बार स्वीकार करता हूं कि मुझे तुम्हारी राय मान लेनी चाहिए थी। अब तुम इस तरह से अपने माथे को पीटना बंद करो। '

चटर्जी -गृहिणी को और गुस्सा आ गया। उन्हें लगा उनके पति ने जैसे इस प्रकार की बातों से उनके बदन को गर्म छत्रे से दाग दिया हो। वे चिल्लाती हुई बोलीं, 'हर्गिज नहीं। मैं चुप नहीं रहूंगी, हर्गिज नहीं।

'क्या करोगी ? बताओ? क्या करना चाहती हो?

'क्या चाहती हूं

'हां ' यह पता हो जाए तो फिर मैं अपने अपराध का प्रायश्चित कर लूंगा।

बताओ, मैं वही करूं।

भवनाथ की पत्नी की उम्र साठ से ज्यादा हो चुकी थी। वे पुराने जमाने की परपंराप्रिय खानदान की बेटी और बहू थीं। उन्हें ज्यादा पढ़ने-लिखने का मौका नहीं मिला था। सुविधा होते हुए भी उन्हें पढ़ाई का मामूली अवसर नहीं मिला था।

ग्यारह साल की उम्र में उनकी शादी हो गयी थी। उनके स्कूली जीवन की .वहीं समाप्ति हो गयी। भवनाथ के आज के इस सवाल का वे जवाब कैसे देतीं?

वे शिकायत करके ही खलास हो गयीं। उन्होंने कहा, 'मुझे पता नहीं। मेरा दिल कसक रहा है। मेरे नवेन्दु की इकलौती लड़की दीपा, ओह, तूने यह क्या किया दीपा।

भवनाथ बोले, अरे छी: छी: ऐसे नहीं रोते। तुम भी क्या करती हो। उसने जो कुछ भी किया, आज इस शुभ दिन में इस तरह रोकर उसका अमंगल मत करो। '

भवनाथ गृहिणी को यह बात पसंद नहीं आयी। बोलीं, 'तेरा नाश हो दीपा। भगवान् तुझे उठा लें।'

भवनाथ चटर्जी के बड़े लड़के का नाम था नवेन्दु। आज अठारह साल हुए उसकी अकाल मौत हो गयी थी। उस वक्त दीपान्विता यानी दीपा पांच साल की थी। दीपा की मां शोभा जैसी गुणी औरत आज के जमाने में बहुत कम होती हैं। अठारह साल से वह अपने सास-ससुर के पास नव वधू की तरह ही रह रही थी। नहीं यह कहना भी गलत होगा, वह उनकी बेटी ही बन गयी थी। ससुर अपने स्वास्थ्य के बारे में जरा भी लापरवाही बरतते तो उन्हें डांट देती, सास के हाथों से छीनकर घर का काम करती। अपनो लड़की दीपा के लाड़-दुलार के मामले में वह अकेली ही दोनों से झगड़ा करती।

दीपा के प्यार की भी सीमा नहीं थी, लाड़ की भी नहीं। ससुर भी जब तक विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे-अभी हाल तक वे घर लौटते हुए कोई न कोई चीज जरूर ले आते। उनका मन नहीं मानता था। घर आते ही मीठी आवाज में पुकारते, दी-पा !'

दीपा भी भागती हुई आती-दा-दू 'दा' शब्द पर काफी बल देती, फिर 'दू को संक्षिप्त कर देती। जिस तरह से भवनाथ बाबू दी-पा पुकारते थे। इसमें एक संगीतमय ध्वनि होती। वह सामने आकर अपना हाथ फैलाकर कहती-ला-ओ। ला-ओ वाह, वाह! तुझे दूं क्या ?'

'जो चीज लाये हो।'

'अपना चेहरा करीब लाओ।'

दीपा अपना चेहरा करीब लाती। भवनाथ बाबू उसके गालों को चूमकर कहते, 'यह लो! पुच्च'

दीपा हाथ-पैर झटकते हुए ऊं-ऊं करके रोने लगती। उसके रोने में न कोई वाक्य होता, न आखों में आसू चेहरे पर कातरता, क्षोभ या वेदना की छाया भी नहीं होती थी-बल्कि देखकर लगता शायद वह हंस रही हो; हाथ-पैर झटकने में भी एक लय रहता था। दायां हाथ और बायां पैर एक साथ ही हिलता था और उसी तरह बायां हाथ और दाहिना पैर।

भवनाथ बाबू हंसने लगते। भवनाथ गृहिणी भी हंसतीं। फिर कहती, 'अब जो लाये हो, दे भी दो। नाहक क्यों रुला रहे हो?'

भवनाथ बाबू जेब से लेमनचूस निकालकर उसे देते और अपनी पत्नी को जर्दा का डिब्बा। रंगबिरंगा डिब्बा देखकर दीपा मचलते हुए कहती, 'नहीं, मैं लेमनचूस नहीं लूंगी, मैं वह लूंगी। '

'अरे, यह तो जर्दा है। '

'वही लूंगी। ' आ-आ-आ-आ।

जर्दा लेकर क्या करेगी ?'

'पान में डालकर खाऊंगी। -। '

'अरे तू पान-जर्दा खायेगी?'

'क्यों नहीं खाऊंगी। तुम भी तो खाते हो। '

अब शोभा से बर्दाश्त नहीं होता था। अपना काम छोड्‌कर वह झटपट आकर बिगड़ते हुए कहती, 'तू जर्दा खायेगा? दादी जर्दा खाती है तो तू भी खायेगी ?' 'हां खाऊंगी !'

'ठहर, तुझे खिलाती हूं। जर्दा खायेगी- '

'खाऊंगी।'

चुप

'खाऊंगी।'

'चुप।'

शोभा उसका हाथ पकड़ लेती, दीपा भी जोर-जोर से रोने लगती। भवनाथ बाबू उसे रोकते हुए कहते, 'हाथ छोड़ दो ख मां। छोड़ दो।'

उसका हाथ छोड्‌कर शोभा कहती, 'पिताजी, यह दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है। किसी की परवाह नहीं करती। मुझे भले ही न माने, आपकी भी परवाह नहीं बनती। आप इसकी शैतानी नहीं जानते। उस दिन आपकी एक जली हुई चुरुट मुंह में दबाकर कुर्सी पर बैठी हुई थी। मैं देख लेती तो उसका मुंह दाग देती। मां ने देखा था। मां से ही मुझे पता चला था। मां ने मना किया था-नहीं तो- ' अपनी बात अधूरी छोड्‌कर वह बोली, 'अब इसका फल देखिए, अब जर्दा खाना चाहती यह सुनकर भवनाथ बाबू बड़ी गंभीरता से कहते, 'तुमने जली सिगार मुंह में रखी थी? ऐं।' '

दीपा उनकी ओर देखते हुए कहती, 'तुम्हीं तो रख गये थे। मैं क्या करती। ' 'तुमने उसे छुआ क्यों एं

'वाह, मैं तो उसे देख रही थी।'

उसकी मां कहती, 'तुम झूठ बोल रही हो दीपा, तुमने मुंह में नहीं लगाया था?'

'वही तो बताने जा रही थी। मैंने उसे उलट-पुलटकर मुंह में लगाकर देखा कि उससे धुआं निकलता है कि नहीं। उसमें आग है या नहीं।'

भवनाथ बाबू ठठाकर हंसने के बाद कहते, 'वंडरफुल! तुम मुंह में डालकर देख रही थीं कि धुआं निकलता है कि नहीं। वह भी उसमें आग है कि नहीं यह देखने के लिए। यह बात तो छूने से ही पता चल जाती।'

'वाह, हाथ नहीं जल जाता'

भवनाथ बाबू फिर हंसकर कहते, 'तुम्हें फूल मार्क मिला है। सारा कसूर माफ ' अगर गलती किसी की है तो वह इस दादू की है। उसका पनिशमेंट यह है कि चुरुट पीना छोड़ना पड़ेगा। अगर नहीं छोड़े तो दीपा हैजू एवरी राइट टु स्मोक ' उसी के बाद से भवनाथ गृहिणी कहतीं, 'तुम इस लड़की का भविष्य बिगाड़ दोगे।

भवनाथ बाबू ने तभी से चुरुट पीना छोडू दिया था। मगर उनकी पत्नी जर्दा-पान नहीं छोडू पायीं। दीपा ने भी कभी जर्दा-चुरुट यहां तक कि पान भी नहीं छुआ। बल्कि, इनके बारे में उसकी राय थी कि दोनों ही गंदी आदतें हैं। बेहद गंदी आदत। पान-जर्दा ज्यादा गंदी चीजें होती हैं और सिगरेट-चुरुट अनहेल्दी, खतरनाक और दुर्गन्धयुक्त। बाप रे, खांस-खांसकर हालत खराब हो जाती है। एक बार कश लेने से दिन-भर खांसी आती रहती है। उससे तो शराब बेहतर है, अगर वह तेज न हो।

भवनाथ बाबू ने चकित होकर अपनी पोती से पूछा, 'इस मामले में तुम्हारा कोई अपना अनुभव है क्या? तुमने कभी पिया था या पी रही हो?

हंसकर दीपा अपने शैम्पू किये बालों को झटकते हुए बोली, ' अगर अनुभव की बात कहूं तो इसमें भी दादू तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं, लेबोरेटरी में कैमेस्ट्री के प्रैक्टीकल क्लास में जवाब देने के लिए जरूरत भर चखी थी। दैनिक जीवन में इससे कोई लेना-देना नहीं है। गणित के अभ्यास की तरह यह भी पढ़ाई का हिस्सा है, उससे ज्यादा कुछ नहीं। '

एमए. की पढ़ाई के बाद ये बातें हो रही थीं। भवनाथ बाबू अवाक् होकर कुछ क्षण तक अपनी पोती की ओर देखते रहे, फिर उनका ध्यान टूटा। क्योंकि वर्तमान काल यानी सन् 1962-63 तक के छात्रों का उन्हें भी काफी अनुभव था। उनके जीवन तरंग का उल्लास एवं उच्छ्वास और क्षोभ-विक्षोभ के वेग को उन्हें खींचकर संयत करना पड़ा था। जीवन-भर अपने काम में वे विशिष्ट माने जाते थे। अपना व्यक्तित्व भी उन्होंने अर्जित किया था। मगर उनको भी हार मानकर सिर झुकाकर वहां से चले आना पड़ा था। कॉलेज के अध्यक्ष के पद से करीब आठ महीने पहले वे सेवामुक्त होकर घर बैठ गये थे। दीपा ने उस समय एम. ए की पढ़ाई पूरी ही की थी। वह भी घर में बैठकर संगीत, सिनेमा, साहित्य में अपने को व्यस्त किये हुए थी। उसी ने अपने दादा से कहा था, 'दादू तुम नौकरी छोडू दो। तुम इनसे नहीं जीत सकते। तुम इस युग के आदमी नहीं हो। '

उसकी ओर देखकर भवनाथ ने कहा था, 'ठीक कहती है। ' उसकी सलाह पर भवनाथ ने नौकरी से छुट्टी लेकर उसी बीच सेवा से अवकाश ले लिया था। घर में बैठकर उन्होंने कल्पना की थी कि दीपा की पढ़ाई-लिखाई में वे उसकी मदद करेंगे।

शायद अपने परिपक्व जीवन का रस से भरपूर बीज संपन्न फल भी उसे सौंप सकते हें। उन्होंने आरंभ भी कर दिया था। लेकिन ठीक इसी वक्त दीपा का परीक्षाफल निकला। दीपा इतिहास में फर्स्ट क्लास पास करके अपनी सफलता की खुशी में लगभग तीन महीने तक घर से बाहर उनुक्त विचरती रही थी। भवनाथ बाबू उसकी इस हरकत पर वात्सल्य से हंसे थे। लेकिन दीपा की दादी यानी भवनाथ बाबू की पत्नी शंकित होकर उसका रास्ता रोककर खड़ी हो गयी थीं। उनके पीछे दीपा की मां शोभा भी थी।

दादी ने विरोध करते हुए कहा था, 'इस तरह से घूमना फिरना, मस्ती करना ठीक नहीं है। तूने सोचा क्या है? तू सोच रही है कि एम. ए पास करने के बाद तेरे पंख निकल आये हैं?'

दीपा हंसकर बोली थी, 'ऐसा होता तो मैं अभी आसमान में उड़ जाती। ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे जाने दो, काम है। '

दादी ने अपने पति की ओर देखते हुए कहा, 'मैं जाने कब से कह रही हूं कि दीपा की शादी कर दो। पढ़ना-लिखना भी हो तो शादी के बाद करे। लेकिन मेरी बात कौन सुनता है? लड़की तो अपने दादाजी के बढाबे पर अपने को रानी लक्ष्मीबाई समझती है, अब रानी दुर्गावती बनना चाहती है। '

'नहीं दादी, मैं सिर्फ दीपा हूं-दीपान्विता चटर्जी। लेकिन तुम मेरा रास्ता छोडू दो, मैं इस तरह रोके जाने को अपना अपमान समझती हूं। इसे मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।'

मां ने पूछा, 'अपमान? अपमान की क्या बात हुई?'

'तुम लोग मुझ पर अविश्वास कर रही हो। परीक्षा खत्म होने के बाद से आज तक मैं पचास बार सुन चुकी हूं कि मुझे ख्याल रहे मैं लड़की हूं। '

'तू लड़की नहीं है?'

'पहले मैं इन्सान हूं फिर लड़की और वह भी सिर्फ दुर्घटनावश। अब पहले का जमाना नहीं रहा। मिसेज भंडारनायके कुछ दिन आगे तक श्रीलंका की प्रधानमंत्री थीं। श्रीमती कृपलानी .अब भी यू पी. र्को चीफ मिनिस्टर हैं। इसलिए लड़की होने के कारण घर में रहना ही सबसे ज्यादा सुरक्षित है और यही कर्त्तव्य है इसे मैं नहीं मानती। दादू से ही पूछकर देख लो। '

दादू ने सिर झुकाकर जमीन की ओर देखते हुए कहा, था, 'वही बात सोच रहा हूं दीपा। तूने कुछ दिन पहले धूम्रपान और मदिरापान के बारे में जो कहा था- ' 'माफ करना दादू तुम्हें टोक रही हूं। धूम्रपान या मदिरापान शब्द का प्रयोग मेरी उस दिन की बातों के संदर्भ में करना उचित होगा? मान लो, बीमारी में किसी को ब्रांडी या अंडा लेना पड़े। काफी लोग ब्रांडी लेते हैं, लेकिन उन्हें पियक्कड़ नहीं कहा जा सकता। उसी तरह इन दोनों का स्वाद जानने की भी अगर कोई कोशिश

करता है तो उसे भी गलत नहीं ठहराया जा सकता। क्या तुमने इन दोनों शब्दों पर अनावश्यक जोर नहीं दिया? लेकिन दादू मुझे देर हो रही है। मेरे दोस्त इंतजार कर रहे हैं। '

भवनाथ बाबू ने कहा था, 'उसे जाने दो बहू मां! और सुनो, तुम भी रास्ता छोड़ दो। '

'रास्ता छोडू दूं?'

'देना पड़ेगा। नहीं तो शायद प्रवाह में तुम्हें भी बह जाना पड़ेगा। विष्णु के चरणों से उत्पन्न गंगा को ब्रह्मा ने कमंडल में रखा था। गंगा बूंद-बूंद बढ़ते हुए जिस दिन उफना गई, उस दिन उसने ऐरावत को भी बहा दिया था। '

'दादू तुम भी क्या खूब हो! यह सब पुराण-बुराण मुझे ज्यादा अच्छा नहीं लगता। लेकिन तुम इतनी बढ़िया उपमा देते हो कि क्या कहूं! वंडरफुल! तुम चिंता मत करो। आई मीन डोंट वरी। तुम्हारे ऐरावत सरीखे बदमाशों को बहाने की क्षमता वाकई मुझमें है। '

यह सब झूठ हो गया था। आज ही अभी सांझ के वक्त किसी अनजान महिला ने टेलीफोन पर यह भयानक सूचना दी थी। वह बोली थी, 'आप लोग मुझे पहचानते नहीं हैं। मैं दीपा-दीपान्विता- आपकी पोती के साथ पड़ती थी, एक साथ ही पास भी किया है। दीपान्विता की आज शादी हो गयी है। करीब दो घंटे पहले। दीपा ने अपनी चिट्ठी में सारी बातें स्पष्ट रूप से लिख दी हैं। वह चिटुईा मैं खिड़की से भीतर फेंक आयी हूं। मैंने सोचा था, आपके हाथ में ही दूंगी, लेकिन घर के दरवाजे पर पहुंचकर हिम्मत नहीं हुई-डर गयी। आप ढूंढेंगे तो वह चिट्ठी मिल जायेगी। '

इतना कहकर उसने टेलीफोन रख दिया था। वृद्ध भवनाथ बाबू नं .कई बार हैलो-हैलो करके रिसीवर रखकर लगभग हड़बड़ाते हुए नीचे उतरकर बैठकखाने में ?? जाकर उस चिट्ठी को छूकर उसे पढ़ा। पढ़ने के बाद एकाएक उनकी समझ में नहीं आया कि वे क्या करें।

'दादू तुम लोग मुझे माफ करना। खासकर तुम। क्योंकि तुमसे लेन-देन का मैंने पूरा हिसाब रखा हुआ है। जो मुइाए मिलना चाहिए तुमने मुझे उससे कहीं ज्यादा दिया है। दूसरों की मैं चिंता नहीं करती। उनसे मैं क्षमा भी नहीं मांग्ती। जरूरत भी नहीं है। मैंने आज शादी कर ली है। उसे मैं काफी दिनों से प्यार करती हूं। जाने कब से। इतने दिनों तक शादी इसलिए नहीं की थी क्योंकि इसे लेकर मैं ही अंतर्द्वद्व में थी। अब तक कुछ फैसला नहीं कर पा रही थी। आज शादी कर ही ली। लड़के को तुम जानते हो। हमने घर में जो सत्यदासी थीं, उन्हीं सत्यदासी का नाती देवप्रिय हालदार है। उसकी तुम्हें जरूर याद होगी- वह अक्सर हमारे यहां आता

था तुमने उसकी अनेक बार सहायता की थी। हायर सेक.डरी की फीस के लिए तुमने उसे पचास रुपये दिये थे। आज मैंने उसी से शादी कर ली। हम दोनों काफी दिनों से एक-दूसरे से प्यार करते थे। देवप्रिय का परिचय आज सिर्फ सत्यदासी के नाती के रूप में ही नहीं है, बल्कि अब वह एम. ए पास करके नौकरी करता है। मेंने भी कल से एक नयी नौकरी पकड़ ली है, तुम्हें नहीं बता पायी थी। मैं एक कॉलेज में पड़ाने लगी हूं।

अब तुम लोगों से मुझे कुछ और नहीं लेना है। मकान या जो भी रुपये उत्तराधिकारी के तौर पर मुझे मिलने हों, मैं उन सवसे अपना दावा खारिज कर रही हूं। मैंने अन्याय किया है इसलिए अपना दावा खारिज कर रही हूं ऐसी बात नहीं है; यह तो इसलिए कर रही हूं क्योंकि तुम लोग मुझे दंड देने के लिए एक यही काम करके खुश हो सकते हो। इसीलिए यह काम मैं खुद ही कर रही हूं।

तुम हम लोगों का प्रणाम स्वीकार करना। दादी और मां को हमारा प्रणाम ग्रहण करने में कोई बाधा है या नहीं, पता नहीं, 'कहीं इसमें उनके परलोक जाने वाली साफ-सुथरी चिकनी सड़क पर मैं कांटे न बिछा दूं। इति।

दीपान्विता

2

किसी ने ध्यान नहीं दिया था। ध्यान देने लायक वह बात भी नहीं थी। ऐसा तो इस पूछी पर हमेशा ही घटता रहता है।

सत्यदासी उस घर की चौबीस घंटे की नौकरानी थी। भवनाथ बाबू के यहां ही उसने लगभग अपना अंतिम समय बिताया था। सत्य मर गयी थी लेकिन सत्यन्यात्या नामक शब्द आज भी मौजूद है। भवनाथ गृहिणी अभी तक कहती हैं, 'सत्य तो चली गयी लेकिन सत्यन्यात्या' नित्य सत्य कर गयी है।

'नित्य सन्द' शब्द भवनाथ बाबू का ही था। वह भवनाथ गृहिणी के अंतर में वैठ गया था। सत्य जिस लत्ते से जूठी जगह साफ करती थी, उसे कभी धोती नहीं थी अंतत: कभी ऐसा नजर नहीं आया। भवनाथ बाबू की पत्नी इस बात को लेकर उसे झिड़कती थीं लेकिन सत्य उसे अनसुनी कर देती। वह चुपचाप अपना काम किये जाती। वह लत्ता बरामदे के किनारे पड़ा रहता था-जब भी कोई खाकर उठता सत्य जूठी थाली उठाकर उस लत्तें से उस जगह पर पोंछा मारकर जूठी थाली लेकर बाहर निकल जाती। बरामदे के निर्धारित स्थान पर उस लत्ते को धप्प से गिराकर -टूटे बर्तन लेकर नल के नीचे रख आती।

बहू की नजर पड़ने पर वह कहती 'सत्य, यह क्या कर रही हो? जूठी जगह इस तरह साफ हो गयी?'

लेकिन कौन किसकी सुनता? सत्य रसोई के दरवाजे पर आकर रसोइये से

झगड़ा या बातें करने लगती।

गृहिणी नाराज होकर चीखतीं-सत्य।

इस बार सत्य गर्दन घुमाकर पूछतीं, 'क्या कह रही हो?

'इस तरह से झूठा फर्श साफ किया जाता है? लत्ता तो खुद ही जूठा था। उसे धोया तक नहीं। '

'जूठन साफ करने वाला लत्ता भी भला कितनी बार धुलता है? अगर साफ करने बैठूं तो कितनी बार कचारंग और तुम लोग भी मुझे लत्ते के लिए कितने कपड़े दोगी'

'लेकिन यह तो जूठा है।'

'नहीं, जूठा कैसे हुआ?'

'जूठन साफ करने पर वह जूठा नहीं हुआ पा '

'नहीं, मैं लत्तें को तड़के धोकर उस पर रोज गोबर छिडक देती हूं। गोबर देने से ही तो वह शुद्ध हो जाता है।'

भवनाथ बाबू सुनकर हंसते हुए बोले थे, 'उसका नाम है सत्य! और उसका लत्ता। वह तो एक साथ ही सत्य और नित्य वस्तु है। सत्यनित्य लता। उससे पूरी दुनिया पवित्र और साफ हो जाती है।'

? 'यह बात आपने ठीक कही बाबूजी! दिन-रात जूठे का चक्कर, जब देखा तब जात चली जाने का डर, छूत का चक्कर-यह सब क्या है? बच्चा खाकर कपड़े .! में हाथ पोंछकर उठ जाता है। बाबू लोग दावत खाकर गिलास में हाथ डुबोकर ! रूमाल से हाथ पोंछकर उसे जेव में रखकर उठ जाते हैं। अगर ऐसी बात है तो फिर ६ पहनावे के शाल-दुशाले सभी जूठे हो जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता। कौन यह सब कचारता है? जूठा समझो तो जूठा, नहीं तो नहीं।'

सत्य दखिनही थी। चौबीस परगना की रहने वाली। जात की कावड़ा जोगी या ऐसी ही किसी जात की रही होगी, इस बारे में किसी ने जानने की जरूरत नहीं समझी थी। भवनाथ बाबू वगैरह सब कलकत्ता के निवासी थे। उस पर सन् 1930 के बाद का समय था। छुआ-छूत, जात-पांत सव खत्म करने का जमाना आ गया था इसके अलावा लड्‌कियां भी रसोईघर से कड़ाही कलछुल छोड्‌कर घर कै कामकाज की दुनिया से बाहर आकर सम्मानजनक काम करेंगी-वातावरण में ऐसी हवा चलने लगी थी घरेलू काम के लिए अब किसी भी जात की होने से काम चलने लगा था। यही प्रचलन में आ गया था। भवनाथ बाबू की गृहिणी की घर से बाहर नौकरी करने की न रुचि थी और न क्षमता ही, लेकिन घरेलू काम करने की भी रुचि और क्षमता दोनों ही नहीं थीं। इसीलिए जात-पांत मानकर चलने से कोई लाभ नहीं था 1 सिर्फ काम करने वाली का चेहरा ही उन्होंने देखा था, जिसके हाथ का पानी पीने में कोई अरुचि न हो। सत्य का चेहरा बुरा नहीं था। इसके अलावा

सत्य का एक और गुण था, वह विपत्ति के समय खूब सेवा करती थी। सत्य का दिल भी बड़ा कोमल था। वह सबसे प्रेम का व्यवहार करती थी।

यह उसी सत्यबाला का नाती था। सभी को उसकी याद थी। एक आठ-नौ साल का काले रंग का स्वस्थ बालक जिसका नाम देबू था, उनके यहां आया करता था। वह अपनी नानी के पास ही आता। वह नानी के पास किताब के लिए या अपने कपड़ों के लिए रुपये लेने आता। सिर पर तेल, वह भी सरसों का, खूब चुपड़े होता। पहनावे में पेंट बल्कि कहा जाए तो छींट का जांघिया और एक हाफ शर्ट होता। वह बच्चा पाठशाला में पड़ता था। पढ़ने-लिखने में होशियार था, लेकिन उसका बाप उसे किताब, कापी, लेट, पेंसिल, कपड़ों के लिए पैसा नहीं देता था, इसलिए उसकी मां उसे अपनी मां के पास भेज देती थी।' मां कलकत्ता में एक बाबू के यहां काम करती है, बाबू कॉलेज में मास्टर हें, भले आदमी हैं। सत्य को भी खुराकी के अलावा हर महीने पांच रुपये मिलते थे। -उसके रुपये खर्च नहीं होते थे, बचते ही थे; उन जमा रुपयों से वह पांच-सात रुपये, जो संभव होते, नाती की पढ़ाई में खर्च कर देती।

भवनाथ बाबू को वह लड़का अच्छा लगा था। वे हर साल दुर्गापूजा के वक्त उसके लिए खाकी पेंट-शर्ट, गंजी और सैंडिल खरीदते थे। इसके अलावा स्कूल का सत्र शुरू होते समय किताब-कापियां, उसकी जरूरत के अनुसार उपलब्ध कराते

उस समय दीपा कितने साल की थी?

जब देबू पहली बार आया उस वक्त उसकी उम्र आठ-नौ साल की थी, दीपा पांच-छह साल की। छह नहीं-पांच ही, क्योंकि उसी साल दीपा के पिता नवेन्दु की मृत्यु हुई थी।

दीपा का लाड़-प्यार उस समय सावन-भादों की अमावस्या की बढ़ी नदी की तरह उफना उठा था।

अपने पिता का अभाव वह न महसूस कर पाए, इस मर्मभेदी वियोग की असहनीय वेदना उसके मन को आहत न करे इसलिए वह जव भी जो कुछ भी मांगती उसे दिया जाता और न चाहते हुए भी उसे ढेर सारी चीजें लाकर दी जाती और वह भी सब महंगी-महंगी। महंगे कपड़े, जूते से लैकर महंगे खिलौने, रेलगाड़ी, उड़ने वाला जहाज वगैरह ढेरों चीजें। सुबह से शाम तक वह कम से कम छ: बार अपना फ्रॉक बदलती। ढेर सारे खिलौनों के बीच बैठकर वह खेला करती। उसके पास एक खूबसूरत सेत्थूलॉयड की गुड़िया थी, जिसे लिटाने पर वह आख बंद कर लेती थी और उठाकर खड़ी कर देने पर वह आ की आवाज करके औखें खोलती थी। उसे दूध पिलाने के लिए उसने उसके होंठ की जगह पर एक छेद कर दिया था और उसे वाकई सुतई या चम्मच से दूध भी पिला देती थी।

देबू चकित होकर उसे देखता और दीपा के किसी भी आदेश के पालन में खुद को धन्य महसूस करता।

सिर्फ खिलौने, कपड़े-जूते में ही दीपा का ऐश्वर्य सीमित नहीं था, उसके पास ढेरों चित्रों वाली किताबें भी थीं। भारतीय, विलायती, रूसी, अमरीकी हर तरह की। इसके अलावा तस्वीर बनाने का सामान भी था। सुंदर कापी, रंगीन पेंसिलें, वाटर कलर बाक्स, बुश, हारमनिका-उसके साथ खिलौना बंदूक-पिस्तौल-क्या कुछ नहीं था!

देबू ललचायी नजरों से इन सबको देखता। कभी-कभी डरते-डरते बड़े संकोच से इन्हें छूता, इन्हें हाथ में लेकर देखता।

कभी दीपा उसके हाथ से छीन लेती। कभी कहती, लेगा? तुझे चाहिए? तुझे खरीद दूंगी। दादू से कह दूंगी वे ला देंगे।

कभी-कभी थोड़े समय के लिए वह एक-आध चीज दे भी देती। कहती-ले, तुझे दे रही हूं मगर बाद में उसे छीन भी लेती-मुझे लौटा दे।

देबू सारे समय खामोश बैठा रहता। उससे अच्छी बात कही जाती तब भी खामोश रहता, बुरी बात कही जाती तब भी। सत्यदासी और भी पांच साल तक जिंदा रही थी। देबू इस बीच दस-बारह बार आया होगा। आखिरी बार जब वह आया था तब वह चौदह-पंद्रह साल का रहा होगा। वह अपने गांव के स्कूल में कक्षा सात में पड़ता था। सत्यदासी का निधन हो गया था, उसके श्राद्ध के लिए वह अपनी मां को लेकर कुछ रुपयों की सहायता लेने आया था।

हायर सेकेंडरी इन्तहान के वक्त उसकी मां की चिट्ठी आयी थी कि उसके पास देबू की फीस भरने के लिए रुपये नहीं हैं। रुपये न जमा करने पर देबू इन्तहान नहीं दे पाता। भवनाथ बाबू ने रुपये भेज दिये थे। पचास रुपये! उनकी पत्नी ने 1, एतराज किया था मगर भवनाथ बाबू ने कहा, 'जब चिट्ठी आयी है तो रुपये भेज ही दूं। जरा यह भी देखो, उसकी नानी नौकरानी का काम करती थी। उसके ' मां-बाप बेहद गरीब हैं। अगर उनका लड़का पढ़-लिखकर लायक बन जाए तो उसका कुछ पुण्य हम सबको भी मिलेगा। वह हर जगह तुम्हारा एहसान मानेगा। ' पत्नी ने इसके बाद कुछ नहीं कहा। दीपा भी खुश हुई थी। और वह सीधा- सादा लड़का भी हैरान हुआ था। ओफ दादी तुम्हें क्या बताऊं कि वह कितना सीधा और डरपोक था। वह सारे समय मुंह बाये मुझे ही देखता रहता था।

दीपा उस वक्त नवीं पास करके दसवीं' में गयी थी। उसके बाद फिर ' सत्यदासी के नाती की खबर किसी ने नहीं रखी।

इं भवनाथ बाबू की पत्नी माथा पीटकर रोने लगीं। छि: छि: छि:! सत्यदासी के ऐ उसी नाती के साथ-ओह आखिरकार उसमें उसे क्या नजर आया? उसे क्या मिल गया? उसने भी एम. ए तक पढ़ाई की है, दीपा ने भी की है। न वह कोई डाक्टर-

बैरिस्टर है, न कोई प्रेमचंद-रायचंद। तब? क्या है वह? रूप? गुण? क्या है उसमें उसे कौन-सी सुंदरता नजर आयी?

3

गाढ़े शहद जैसा रंग था देवप्रिय हालदार का। वह कम बोलता था, हरदम खामोश रहने वाला या कहा जाए बेहद अहंकारी था। वह लगभग छ: फुट लम्बा था।

देखने में हष्ट-पुष्ट था। तीखी नाक थी। आखें कुछ छोटी थीं लेकिन असाधारण रूप से तेज थीं। सिर के बाल घने कड़े और सीधे खड़े रहते थे। सिर के बाल काफी छोटे कटवाने के कारण वे कटे धान के को की तरह खड़े रहते थे।

यूनिवर्सिटी में वह औसत दर्जे का ही विद्यार्थी था, उससे ज्यादा कुछ नहीं।

.नहीं-दादू वह खेलकूद में अर्जुन-कर्ण कुछ भी नहीं है न पढ़ाई-लिखाई में बुध-बृहस्पति। अभिनय-वभिनय में भी वह शिशिरकुमार, उत्तमकुमार यहां तक कि अधमकुमार भी नहीं है। गाने में भी वह पंकज मलिक, हेमंत मुकर्जी नहीं है।

उसमें यह सब कोई प्रतिभा नहीं है। फिर भी वह मुझे क्यों अच्छा लगा, कह नहीं सकती। बस, वह मुझे अच्छा लग गया। यहां तक कि सत्यदासी के नाती होने के कारण भी वह मुझे अच्छा नहीं लगा था। क्योंकि तब तक मैं उसके बारे में कुछ ' नहीं जानती थी। मैंने उसे पहचाना भी नहीं था। देबू को मैं देबू के रूप में ही ' जानती थी, उसका पूरा नाम देवप्रिय हालदार मैंने नहीं सुना था।

मुझे वह अच्छा लगा था।

.. .यूनिवर्सिटी में एक ऐसा लड़का पड़ता था जो पेंट नहीं पहनता था, टी-शर्ट नहीं पहनता था। कोछ।' मारकर धोती पहनता और शेक्सपियर कालर वाला पूरे हाथ का टेनिस शर्ट; पैरों में सैंडल के बजाय कपड़े के जूते पहनता, बालों में तेल लगाता, आमना-सामना होने पर वह चुपचाप बगल से निकल जाता। उसकी दोस्ती भी काफी कम लड़कों से थी। इसके बावजूद उसकी ओर मेरा ध्यान गया।

यूनिवर्सिटी में भर्ती होने के बाद जब मैंने उसे शमि के यहां देखा था, तब उससे पूछा था, 'यह बांगहसा दिखने वाला लड़का कौन है'

शमि को तुम जानते हो दादू! मैंने शमि को ही तुम्हें चिट्ठी देने भेजा था। उसी ने तुम्हें फोन किया था। वह घर के बारह पहुंचकर भी तुमसे भेंट करने का साहस नहीं जुटा पायी। उसने तुम्हारे कमरे में चिट्ठी डालकर घर वापस लौटकर तुम्हें फोन किया था। हालांकि तुम जानते ही हो कि शमि कितनी प्रोग्रेसिव है, अपने घर में वह किसी की परवाह ही नहीं करती।

शमि ने मुझे बताया कि वह उसके बड़े भाई के साथ पता है। नाम है देवप्रिय हालदार। हमारे भतीजों को पड़ाने आता है, क्या तुमने उसे किसी दिन देखा नहीं? '

भवनाथ बाबू ने दीपा का पता ढूंढ निकाला। उनके साथ वहां उनकी पत्नी और दीपा की मां शोभा भी गयीं। दीपा के साथ ही उनकी ये सब बातें हो रही थीं। दो कमरे का छोटा-सा फ्तैट था। इयूवमेंट ट्रस्ट ने आम लोगों के रहने के लिए जो नये फ्लैट बनाये थे, मानिकतला नाले के इस तरफ के उन्हीं फ्लैटों में से वह एक फ्लैट था। इसी में उसने अपनी गृहस्थी संवार ली थी। सामान के नाम पर बस थोड़ी-सी चीजें थीं। दो सिंगल बेड तख्तपोश को एक-दूसरे से सटाकर उसने डबल बेड बना लिया था। बिस्तर नये थे। सस्ती लकड़ी की चार मेजें थीं। दो मेजों को जोड़कर उस पर प्लास्टिक का टेबल क्लॉथ बिछाकर खाने की मेज बना ली गयी थी। और एक मेज ड्रेसिंग टेबल थी। दीवार से सटाकर उस मेज को रखकर उस पर एक आईना और प्रसाधन सामग्री रखी थीं। एक मेज पर उनकी किताब-कापियां थीं। घर में 'एक काम करने वाली नौकरानी थी। रसोई वह खुद ही 1 पकाती थी। दीवाल पर उनकी कई तस्वीरें लगी थीं। देखकर साफ लगता था यह मामला काफी दिनों से चल रहा था। बीज धीरे-धीरे जमीन के नीचे से अंकुरित होकर बड़ा होकर पुष्पित-पल्लवित हुआ था।

भवनाथ बाबू दीपान्विता की इस नयी गृहस्थी का रूप देखकर अवाक् या हतवाक् रह गये। इतने अभाव और दीनता के बीच दीपान्विता एक दिन भी बिता सकेगी, यह उन्होंने सोचा तक नहीं था।

भवनाथ बाबू ने जीवन में कम नहीं कमाया था। उन्होंने सरकारी कॉलेज में। लम्बे- समय तक पढ़ाया था। पूरे चालीस साल तक। चालीस साल पहले डेढ़ सौ रुपयों से उन्होंने शुरुआत की थी। इसके बाद उनकी तनख्वाह हजार से ऊपर हो 1 गयी थी। इसके अलावा एक-दो छात्रों को भी वे पढ़ाते थे-राजा-महाराजाओं के। इसके अलावा कुछ किताबें भी उन्होंने लिखी थीं। वे बिकने वाली किताबें थीं। उन्होंने अपना मकान बना लिया था। बाकी रुपये उन्होंने समझ-बूझकर अच्छे शेयरों में लगा दिये थे। आज भी किताबों और शेयरों से उन्हें आठ-नौ सौ रुपये मिल जाते थे। उनके घर में दीपा ही उन सभी का भरोसा और आशा थी। उसे उन्होंने विलासिनी नहीं बनाया था। दीपा के प्रसाधन की मेज पर कभी रूज-लिपस्टिक नजर नहीं आया था लेकिन उसके कपड़े चाहे वे सफेद हों या रंगीन वे कभी गंदे या फीके नजर नहीं आते थे। वह इतिहास की छात्रा थी। लेकिन उसके कमरे में भवनाथ बाबू ने साहित्यिक किताबों का अच्छा खासा संग्रह सजा दिया था। दीपा को यामिनी राय गोपाल घोष के चित्र पसंद थे। उन्होंने खुद वे चित्र खरीदकर दीपा के कमरे में लगा दिये थे। उसे अच्छे रेकार्ड खरीद दिये थे। उसके कमरे में एक सुंदर सिंगल पलंग पर बढ़िया बिस्तर बिछा रहता था। इसके अलावा एक सिंगापुरी बेंत का सोफा सेट भी था। अभी तक उसकी दादी अपने सामने उसे दोनों वक्त दूध पिलाती थीं। वह मजबूरी में छोटी बच्ची की तरह बाप रे-बाप रे, ग्रैनी तुम्हारे पांव पड़ती हूं प्लीज प्लीज' करके उछलती-कूदती। कहती, प्लीज ग्रैनी माफ करो। मैं इतनी मोटी हो जाऊंगी। प्लीज !'

फिर भी वह बच नहीं पाती थी। उसकी दादी वैसे तो ठीक-ठाक थीं लेकिन बिगड़ने पर शामत आ जाती। फिर तो वे दूध का गिलास नाली में उड़ेलकर भी शांत नहीं होती थीं, गुस्से में वे दूध की पूरी कड़ाही ही उलट देती थीं। मुंह फुलाकर वे एक तरफ बैठ जातीं। उनसे किसी को कुछ कहने की हिम्मत नहीं होती थी। कुछ देर बाद किसी बहाने से फर्श पर उनका सिर पटकना बालू हो जाता। वे दीपा की गृहस्थी को खुद देखने आयी थीं और बेहद चकित होकर यह सोच रही थीं कि इतनी तकलीफ में दीपा खुश कैसे है? किस बात ने उसे भुला लिया? किस आशा का फूल उसके मन में खिल गया?

दीपा ने कहा 'दादू उसके रूप में मैंने एक शिष्ट और समर्थ व्यक्ति को महसूस किया है। मैं यह नहीं कह रही कि उसे मैं दुनिया का श्रेष्ठ पुरुष मानती हूं। इस तथ्य से मैं परिचित हूं।'

वह एक मामूली लड़का है। यूनिवर्सिटी में किसी रूप में भी लोकप्रिय नहीं था। उस तरह होना भी उसने नहीं चाहा था। फिर भी मुझे वह अच्छा लगा। मैं उसके प्यार में पड़ गयी।

हमारे उस प्यार में कोई चालू रोमांस नहीं था। शमिता के यहां मैंने उसे पहली बार देखा था। शमिता के बड़े भाई के साथ देवप्रिय पड़ता था। उसके अभावों की बात तो तुम्हें बताने की जरूरत नहीं; वह तुम्हारे घर की सत्यदासी नौकरानी का नाती है। हायर सेकेन्टरी पास करने के बाद उसने इतिहास से आनर्स लेकर सेकेंड क्लास में पास किया था। एम. ए पढ़ने की भी उसकी कोई कल्पना नहीं था। बी ए पास करने के बाद वह बारासात में एक हायर सेकेंडरी स्कूल में नौकरी करने लगा था। साल-भर पूरे होने के पहले ही उसकी मां ने मरकर उसे मुक्ति दे दी। उसके बाप ने तुरंत दूसरी शादी कर ली। उसका एक छोटा भाई था, वह कक्षा आठ तक पढ़ने के बाद पॉलिटिकल लीडर बनने की ख्वाहिश में बहक गया, वह भी घर-बार का मोह त्यागकर निकल गया। देवप्रिय स्कूल की नौकरी छोड़कर एम. ए. पढ़ने कलकत्ता चला आया।

उसके बाप ने कहा था, “मैं कानी कौड़ी नहीं दूंगा। जो कुछ जमीन-जायदाद है वह भी तुम लोगों को नहीं मिलेगी। मैंने पढ़ा लिखाकर लायग बना दिया है, अब खुद कमा-धमाकर खाओ।” उसने शमिता के भाई के साथ यूनिवर्सिटी में नाम लिखा लिया। वह रोज बारासात से आता-जाता था। सीधा-सादा, शर्मीले स्वभाव का देवव्रत शमिता के भाई रंजित का बड़ा अनुगत था। रंजित पढ़ने-लिखने में अच्छा था, इतिहास लेकर उसने प्रथम श्रेणी में बी.ए. पास किया था। लेकिन स्वभाव का बहुत चंचल था। ऐसा न होता तो वह स्टैंड कर सकता था। शांत, औसत बुद्धि वाले देवव्रत ने रंजित से उसकी नोट-बुक नकल करने के लिए मांगी थी। दोनों में परिचय का सूत्र यही हुआ। अनुगृहीत व्यक्ति के प्रति स्नेह हो ही जाता है। रंजित को भी उससे स्नेह हो गया था। इसके अलावा देवप्रिय में एक खूबी है, उसके हाथ की लिखावट बहुत अच्छी है। रंजित के नोट की वह नकल करता था, मगर दूसरों के नोट की भी नकल करके वह रंजित को देता. था। स्कूल में नौकरी करके उसने थोड़े रुपये बचाये थे। उनके खर्च हो जाने के बाद उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। उसकी कठिनाई का समाधान करने के लिए रंजित ने उसे अपने यहां अपने दो भतीजों को ह्यशन पड़ाने का काम दिलवा दिया। वह रोज शाम को उन्हें पढ़ाकर बारासात लौट जाता।

हम लोग उस वक्त कॉलेज में पढ़ते थे। यूनिवर्सिटी पहुंचने में अभी दो साल की देर थी। मैं शमिता के यहां आया-जाया करती थी। लेकिन यकीन करो दादू साल-भर तक वह मुझे नजर नहीं आया। शमिता को भी उसका आना पता नहीं चलता था। उसने कभी उसके बारे में मुझसे चर्चा भी नहीं की थी। उसने कभी उसके बारे में मुझसे चर्चा भी नहीं की थी। देवप्रिय ने कभी शमिता की ओर औख उठाकर देखा भी नहीं। शमिता ने भी उसकी परवाह नहीं की।

सालभर बाद एक दिन यूनिवर्सिटी में यूनियन के किसी मामले में एक लम्बे ' धोती-कुर्ता के इस पहने युवक को रंजित के साथ देखकर मैं चौंकी। बालों में उसने ' खूब तेल लगा रखा था। मैंने शमि से पूछा, 'यह बेवकूफों जैसा नजर आने वाला ?? कौन है रे? तेरे भाई के साथ धूम रहा है। '

शमि बोली ' भैया के साथ पढ़ता है, भैया का चला है। नाम है देवप्रिय '' हालदार। मेरे दोनों भतीजों को पढ़ाता है। उसे हमारे यहां देखा नहीं ?'

मैंने कहा 'नहीं तो। तूने कभी बताया नहीं।'

'नहीं बताया? मुझे याद नहीं।'

' अच्छा यह वाकई ऐसा सीधा-सादा है या कोई स्टाइल है?

ँ क्त उक्का अल्पभाषी होना स्टाइल है, या वह वाकई ऐसा है? ' वाकई ऐसा ही है। '

'ऐसा ही? पैरों के कपड़े वाले जूते से लेकर डवल शर्ट तक !'

“अब कसम खाकर तो यह बात नहीं कह सकती। लेकिन यह विनयी और कुछ शर्मीला भी है। थोड़ा अक्खड़ भी है। जिसे बुलडॉग टेनासिटी कहते हैं, कुछ उस प्रकार का, जैसा भैया ने मुझे बताया है। मैं ज्यादा बात नहीं करती, बस नमस्कार वगैरह तक ही सीमित है। मुझे वह बेहद अनइंटरेस्टिंग लगता है।“

दो महीने बाद रंजित के जन्मदिन पर उससे मेरा परिचय हुआ, निहायत मामूली परिचय। उसका नाम देवप्रिय हालदार, रंजित दा का दोस्त और मेरा नाम दीपान्विता चटर्जी, शमिता की दोस्त हूं-बस इतना ही परिचय हुआ, इससे ज्यादा नहीं।

वह सीधा-सादा व्यक्ति मुझे अच्छा ही लगा, लेकिन कोई राग-अनुराग पैदा करने वाली या लड़कियों को पागल बनाने वाली बात उसमें नहीं थी। उस वक्त मैं क्षण-भर के लिए भी इस बात पर यकीन नहीं कर -सकती थी कि मैं कभी उसके प्रति आकर्षित हो सकती हूं। इसके बावजूद मैंने एक दिन महसूस किया कि वह मुझे बेहद अच्छा लगने लगा है, इसका कारण क्या था पता नहीं, फिर भी वह मुझे अच्छा लगने लगा था। इम्तहान की तैयारी के कारण उसने ट्यूशन छोड दी थी, शमि के यहां अब वह नहीं आता था। यूनिवर्सिटी भी नहीं जाता था। उसे बिना देखे मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मुझ पर उदासी छा गयी। दादू मैंने इस पर खूब सोचा है। जो कुछ निर्णय मैंने किया है, उसे सुनकर तुम्हें दुःख होगा, तुम सिहर उठोगे। मुझे इस रोमान्स का कोई अपराध बोध नहीं है। यह किसी घटनाचक्र के लेन-देन के बावत ऋणी मन का, कृतज्ञ मन का आत्मसमर्पण नहीं है; यह सिर्फ बॉयलॉजी है। मनुष्य की सभ्यता की दृष्टि से शायद शर्मनाक बात, लेकिन यथार्थ यही है। पुराने जमाने में स्वयंवर सभा में राजकुमारी से विवाहेच्छुक राजकुमार कतार में बैठे रहते थे, वह राजकुमारी हाथ में माला लेकर हर व्यक्ति के सामने खड़ी होकर उसे देखती चारण का विवाह तय कराने वाला उस राजकुमार के गुणों का बखान करता। आखिरकार राजकुमारी अपनी पसंद के युवक के गले में वरमाला डाल देती। किसी को देखकर अच्छा लगने की बात हर युग में रही है, आगे भी रहेगी। धन मान, गुण, यश, प्रतिष्ठा सबका स्थान इसके बाद है।

हृदय का मेल मन का मेल तो बाद में आता है, नजरों से अच्छा लगने की बात पहले आती है। उसके प्रति मेरे आकर्षण की वात मेरी समझ में तब आयी जब मैंने देवप्रिय को कई दिनों तक नहीं देखा।

अचानक एक दिन शमि ने मुझसे कहा, ‘आज बड़ी गड़बड़ हो गई है रे दीपा! मुझे बहुत खराब लग रहा है’

‘क्या हुआ?’

“आज सुबह देवप्रिय हमारे यहाँ आया था। इंद्रजित और अभिजित को पढ़ाने के एवज में उसके सौ या अस्सी रुपये बकाया थे। उसने जरूरत पड़ने पर लेने के लिए ही उन रुपयों को हमारे यहाँ छोड़ रखा था। मगर उन रुपयों को भैया ने पिताजी से लेकर खर्च कर दिया। उसे यह बात मालूम नहीं थी। देवप्रिय जब सुबह आया था तब रंजित घर में नहीं था। विवश होकर देवप्रिय ने एक स्लिप लिखकर इंद्रजित के हाथों पिताजी के पास भिजवा दिया। उसे रुपयों की सख्त जरूरत थी। मेरे पिताजी इन मामलों में बड़े टची हैं। वे मारे क्रोध के वहाँ आकर बोले, रुपए? किस बात के रुपए?अपने हिसाब के पाई-पाई पैसे तो तुम ले गये हो।” उस बेचारे के मुंह से निकल गया, 'जी नहीं उसे मैंने बाद में लेने की सोचकर उस वक्त नहीं लिया था।' पिताजी बोले, 'नहीं, रंजित ने तुम्हें जरूर दे दिया होगा, मैंने खुद तुम्हें देने के लिए उसके हाथों में दिये थे, मुझे खूब याद है। उसने मुझसे कहा था, पिताजी देवप्रिय को पैसे की सख्त जरूरत है। मैंने कहा, 'ठीक है, उसे जाकर दे दो। उसने तुम्हें दिया नहीं होगा, ऐसा हो ही नहीं सकता। ' वह अचंभे में पड़ गया। उसके दो-तीन बार नासमझ की तरह जी-जी करते ही पिताजी ने आवेश में उसे खरी-खोटी सुना दी। इंद्रजित का रिजल्ट अच्छा नहीं हुआ था, इसलिए पिताजी ने कहा, 'रुपये तो तुमने बिना पढाये ही ले लिये। ऊपर से एक बार रुपये पाने के बाद भी इस तरह दुबारा मांगने चले आये? गेटआउट गेटआउट बेचारा वहीं से सिर झुकाकर चला गया। बाद में भैया ने आकर मुझसे कहा, 'वाकई शमि, यह तो बड़े अन्याय की बात हो गयी। रुपये तो उसके बकाया हैं ही। मैंने उन्हें खर्च कर दिया है.। मुझे उसे यह बात बता देनी चाहिए थी कि जरूरत पढ़ने पर रुपये मुझसे ले लेना, पिताजी के पास मत चले जाना, या उनसे मत मांग बैठना। मेरे भैया आज उससे मिलने बारासात जायेंगे। मुझे बहुत बुरा लग रहा है। '

... .यह बात सुनकर उस दिन मुझे भी बहुत खराब लगा था। शमि के पिता या भैया का देवप्रिय के साथ दुर्व्यवहार या अन्याय किया जाना उतना नहीं खल रहा था, खल रहा था देवप्रिय की हालत के बारे में सोचकर। मुझे सुनकर बहुत खराब लगा, साथ ही साथ उस पर विचित्र किस्म का गुस्सा भी आया, जिसमें उसके प्रति सहानुभूति ही मुख्य थी। एक सीधे-सादे आदमी को कैसा भुगतना पड़ा। वह इस तरह क्यों भुगतता है? क्यों वह सिर झुका लेता है? वह विरोध क्यों नहीं करता?

देवप्रिय ने हंसते हुए कहा था, 'मैं गुस्सा नहीं कर पाता। यह मुझसे नहीं होता। मुझे अच्छा नहीं लगता। '

शमि ने उसके बारे में जिस दिन हमें यह सब बताया उस वक्त हम दोनों यूनिवर्सिटी में क्लास से निकलकर लाइब्रेरी जा रहे थे। इसके बाद लाइब्रेरी से निकलकर शाम को शमि के यहां न जाकर मैं सीधे घर लौट रही थी। मेरी बस श्याम बाजार पंचमुहानी के मोड़ से बाग बाजार स्ट्रीट जंक्शन पार करके एक जगह रुक गयी थी। तभी मैंने देखा कि थोड़ी दूर से एक आदमी लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ चला आ रहा है। उसका सिर एकदम तना हुआ था और उसकी चाल में जरा भी थकान नहीं थी। मुझे रानी रोड तक जाना था लेकिन उसे देखकर मैंने अपने मन में उस क्षण एक विचित्र आकर्षण अनुभव किया, जिसकी उपेक्षा करके बस मैं बैठे रहना मेरे लिए असंभव हो गया। मैं बस से उतर गयी। और जरा ऊंचे स्वर में उसे पुकारा 'देवप्रिय बाबू! देवप्रिय बाबू !'

वह चौंककर रुक गया और इधर-उधर देखने लगा। मैंने फिर पुकारा। इस बार उसकी नजरें मुझसे मिलीं। मैंने उसी क्षण सड़क के इस तरफ खड़े होकर महसूस किया कि सड़क के दूसरी तरफ खड़े देवप्रिय बाबू के चेहरे पर सहसा किसी ने टार्च की रोशनी फेंकी हो। मैं भी शायद शर्म से लाल हो गयी थी।

4

दीपा कहते-कहते रुक गया। इसके बाद हंसते हुए बोली, 'यही शायद सनातन स्थायी एक्सप्रेशन है दादू! एक-दूसरे को देखकर खुश हो जाना, शर्मा जाना। तुम लोग जो बुजुर्ग लोग हो, तुम लोगों से प्रेमी या प्रेम की खबर जरूर छिपायी जाती है लेकिन आज की मतलब सन् 1960 के बाद की किसी कुमारी युवती के लिए रास्ते के लोगों के सामने अपने प्रेमी को देखकर शर्माने का कोई सवाल नहीं पैदा होता।

खैर। हम दोनों ने ही अपने को संभाल लिया। बल्कि उस वक्त मैं थोड़ा चकित भी हुई थी क्योंकि मैं उसे प्यार- करती थी यह तो उस वक्त भी बहुत स्पष्ट नहीं था। बल्कि मैं खुद चकित होकर सोच रही थी कि उसे बुला तो लिया, मगर बुलाया क्यों? उससे बात क्या करूं यह भी नहीं सूझ रहा था। लेकिन उसके चेहरे पर क्षण-भर के लिए जो रोशनी नजर आयी थी उसने मुझे बेहद पुलक से भर दिया था। उसने आकर बड़ी इज्जत से पूछा, 'आप मुझसे कुछ कहना चाहती हैं? मैंने कहा, 'हां ओं लेकिन कहूं क्या? अचानक मेरे मुंह से निकला, 'आप अब कैसे हैं?' 'कैसा हूं!' उसने बड़े शांत भाव से पूछा।

' शमि के पिताजी द्वारा किया गया अपमान आपने खामोशी से बर्दाश्त क्यों कर लिया? जरा भी विरोध नहीं किया। छि: छि:? '

वह सिर झुकाकर हंसा।

मैंने कहा, 'उनसे पैसे अब आप मत लीजियेगा। '

बिलकुल नहीं लूंगा। इसका फैसला मैं कर चुका हूं।'

'रंजित आपके यहां बारासात गया हुआ है। '

'मुझसे उसकी यहीं भेंट हो चुकी है। उसे वहां जाना नहीं पड़ा। वह मुझे रुपये दे रहा था मैंने नहीं लिये। रंजित के पिता ने अपने बच्चों के रिजल्ट के बारे में जिस तरह मुझसे कहा, उसके बाद रुपये लेने का कोई मतलब नहीं है। लेना उचित भी नहीं होगा। मेरी रंजित से थोड़ी कहा-सुनी भी हो गयी। '

'इधर कहां गये थे?'

'जरा काम से गया था।'

'क्या रुपये के लिए 7 माफ कीजिए, यह पूछने का मुझे अधिकार तो नहीं है।' 'नहीं आप कुछ भी पूछ सकती हैं। सब कुछ आपके अधिकार में है। '

मेरे मन में कुछ उमड़ने-घुमड़ने लगा। दिल में एक विचित्र किस्म का बोझ-सा

महसूस हुआ। कुछ खटका, 'इसके कहने का आशय क्या हे?'

शायद यही सुनना चाहती थी-उसने कहा 'ठीक है, मुझे भी नाराजगी जाहिर करनी ही पड़ेगी। दिखावे की नहीं। उचित ही। '

उसने कहा ' आपके 'अधिकार की परिधि में मेरा जीवन और जगत् समाया हुआ है।'

उसके बातों के लहजे से मैं नाराज नहीं हो पायी, उसे चकित होकर देखती रही। उसने कहा, आप लोगों का मैं काफी आभारी हूं। '

'हम लोगों का? ऐसा क्या किया?'

' आप सबके ढेरों उपकार हैं। जब मेंने हायर सेकेंडरी का इन्तहान दिया था तव आपके नाना ने मेरी. फीस भरी थी। इसके पहले हर साल आपके नाना मेरी किताब-कापी खरीदने के पैसे देते थे। कमीज, हाफपैंट, जूते खरीद देते। तभी से केड्‌स शू पहनने की आदत पड़ गयी है। मेरी नानी आपके यहां की नौकरानी थीं।

मैं सत्यदासी का नाती हूं। आपको उनकी याद है?'

.. .दादू मुझे उसी दिन उसे घर लाकर तुमसे मिला देना उचित होता। शायद तब उससे हमारी अंतरंगता प्रेम. में परिणत नहीं होती। अंतरंगता को एक संकोचपूर्ण गोपनीयता की आड़ में न छिपाने से बीज से फिर प्रेम का अंकुर नहीं फूटता। दादू ' शायद मैं भी उसे मन ही मन चाहने लगी थी इसीलिए उसे तुम्हारे यहां न ले जाकर ' मैंने उससे कहा था, ' आप कल बेलेगेछे के परेशनाथ के बगीचे में आइयेगा। बारह बजे। मैं वहां मिलूंगी। आपको कितने रुपये चाहिए, बता दीजिए ले आऊंगी। आपको कितने रुपये चाहिए, बता दीजिए मैं ले आउंगी। आप मुझसे रुपये लेने में कतई संकोच न कीजिए। अगर संकोच हो तो बाद में नौकरी मिल जाने के बाद मुझे चुका दीजियेगा।

दूसरे दिन बेलेगेछे के परेशनाथ के बगीचे में मैंने उसे डेढ़ सी रुपये दिये थे।

इसके बाद हम दोनों काफी हाउस जाकर दिन-भर साथ रहकर शाम को लौटे थे।

उस वक्त हम दोनों एक-दूसरे के लिए 'आप' से 'तुम' हो गये थे। देवप्रिय ने अपनी जेब से एक फोटो निकालकर मुझे दिखाकर कहा था, 'बचपन में तुम्हारे यहां से मेंने यह तस्वीर चुरायी थी। इसे मैं हमेशा जेब में रखे रहता हूं। ' यह कहकर वह हंसने लगा था। मैं शर्म से लाल हो गयी। प्रेम जैसे कि उस तस्वीर में ही छिपा हुआ था। वह तस्वीर तब की थी जब मैं सात-आठ साल की थी।

.दूसरे दिन शमि ने बड़ी चिंता से कहा, 'कल बारासात में उनके यहां बैठकर दिनभर इंतजार करती रही, मगर उनसे भेंट नहीं हुई। न जाने कहां चले गये थे।'

.दादू कुल मिलाकर कहानी यह है। तुम लोगों को मेरी बातों से तकलीफ हुई होगी, दादू तुम्हें तो ज्यादा नहीं, मगर मां तथा दादी को ज्यादा हुई होगी, मुझे पता है कि सबके कलेजे पर चोट लगी होगी। तुम भी ऊपर से भले ही हंसो लेकिन दुःख तुम्हें भी हुआ है। '

.दादी और मां जात-धर्म मानती हैं, शायद उसकी आर्थिक हैसियत का भी ख्याल होगा। सत्यदासी-मेरी दासी सास ही इस घटनाक्रम मैं मुख्य हैं। तुम लोगों के लिए यह बड़ी अहम् बात है। लेकिन हम लोगों के लिए यह कोई समस्या की बात नहीं है दादू!

प्रेम तो हमेशा से ही अस्तित्व मैं रहा है। राजकुमारी का प्रेम चरवाहे से हो जाता है। चरवाहा अपनी शक्ति से रोजा बनता है। वह राजकुमारी का दिल जीत लेता है। हार जाने पर वह जान दे देता है। राजकुमारी वियोग में रोती है या तो वह भी जान दे देती है या फिर आसू पोंछकर, माथे, का सिंदूर पोंछकर दुबारा शादी करके प्रेम पर्व की समाप्ति कर देती है। जो बिना शादी किये प्रेम के लिए अपनी जान देता है, वही जीतता है।

... .लेकिन आज का जमाना दूसरा है। वक्त भी अलग है। इस जमाने में अव किसी चीज की बाधा नहीं है दादू! अब सत्यदासी का नाती होने के कारण उसे दोषी नहीं ठहराया (ना सकता। वह ब्राह्मण नहीं है इस बात से भी उसकी पात्रता में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उससे मैं प्रेम करती हूं इसीलिए मैंने शादी की है। . मेंने तो चिट्ठी में लिखा था दादू-तुम सबको दुःखी करके मुझे भी कम दुःख नहीं हुआ। आपकी जवान से भी यही बात कहती हूं। दुःख मैंने तुम सबको हमेशा ही पहुंचाया है, लेकिन अन्याय, पाप या अपराध मैंने जरा भी नहीं किया है। इसके लिए मैं तुम लोगों का तिरस्कार क्यों सहूं

भवनाथ बाबू स्तब्ध बैठे थे। थोड़ी दूर बैठी हुई शोभा-दीपा की मां रो रही थी। भवनाथ बाबू की पत्नी पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी हुई थीं।

दीपा ने फिर कहा, 'दादी कहेंगी-ब्राह्मण की लड़की होकर-सीता, सावित्री के देश की कन्या होकर-देवप्रिय से शादी करके मैंने महापाप किया है। मगर दादी, बुरा मत मानना ब्राह्मण युग की वात उाब ध्यान से निकाल देनी पड़ेगी। जात-पांत भी अब कोई नहीं मानता। तुम्हें पता है मैं भी नहीं मानती। तुम लोगों ने भी मुझे इसी तरह बड़ा किया है। लेकिन देखा जाए तो एक दृष्टि से मैंने सावित्री जैसा ही काम किया है जिसे मेंने मन ही मन प्यार किया, दूसरी जात का होने के कारण उसे छोड़कर मेंने किसी और से शादी नहीं की। सावित्री ने जब मन ही मन सत्यवान का वरण करके अपने पिता से आकर कहा था कि सत्यवान को उसने मन ही मन अपना पति मान लिया है, उस वक्त नारद वहां मौजूद थे, उन्होंने ठीक अइया लगाते हुए कहा था 'ऐसा कैसे हो सकता है, सावित्री, सत्यवान तो राजपाट खोया हुआ राजपुत्र है। ' सावित्री ने कहा था, 'फिर भी वह मेरा पति है। वे लोग वनवासी हैं फिर भी वह मेरा पति है। ' आखिरकार नारद बोले, 'सवसे खराव बात यह है कि सत्यवान की आयु कम है। ' सावित्री ने कहा, 'फिर भी वही मेरा पति है।

-मैं भी यही कहती हूं दादी, भले ही मैंने रजिस्ट्री से शादी की है। चाहे तो इसे अपराध कह सकती हो, पर अपराध ही क्या है, अगर प्रेम झूठा साबित हो, यदि जीवन असहनीय हो जाए तब में तलाक भी ले सकती हूं लेकिन अब तक जो कुछ मेंने किया है, उसमें अन्याय जरा भी नहीं है। बिल्कुल नहीं है।'

में तुम लोगों से कुछ मांग भी नहीं रही हूं।

न तम लोगों की जमीन, न तुम लोगों की जायदाद। अगर संपर्क नहीं रखना चाहोगे तौ उसके लिए भी नहींर कहूंगी। मैंने उसके साथ घर बसा लिया है, अपनी गृहस्थी को लेकर मैं खुश रहूंगी।'

भवनाथ बाबू ने अब मुंह खोला। बोले, 'चलो जी, अब यहां से चलें। शोभा बेटी, जरा सोचकर देखो। मैं जरा भी बाधा नहीं दूंगा। अगर तुम चाहो-।'

शोभा मुंह से कुछ वॉल नहीं पायी, लेकिन इकार मैं जौर से गर्दन हिलाने लगी-नहीं, नहीं, नहीं।

१ भवनाथ बाबू बोले, 'तब तो बेटी यह बात भूल जाओ कि दीपा नाम की तुम्हारी कोई थी। आओ चलें।'

वे लोग चले गये।

।र दीपा खामोश बैठी रही। उसके अंदर जो अंतर्मथन चल रहा था, लग रहा था .' उसके दबाव- से उसकी पसलियां टूट जायेंगी। लेकिन नहीं-हर्गिज नहीं-।

'दीपा !'

दीपा ने मुड़कर देखा। देवप्रिय कमरे में आ गया था। वे लोग जब तक यहां थे वह तव तक बाहर ही था। सड़क पर घूम रहा था। दीपा ने ही उससे कहा था, 'तुम यहां मत रहना। तुम रहोगे तो वे लोग खासकर दादी अगर बुरा-भला कह, तो मुझसे वर्दाश्त नहीं होगा।' तुम बाहर ही रहना।'

'वे लोग चले गये?'

दीपा से जबाव देते नहीं बना। वह कुर्सी से उठ खडी हुई, उसके साथ ही उसके आसुओं का बांध टूट पड़ा।

'दीपा।'

दीपा ने देवप्रिय को बांहों से जकड़कर उसके सीने में अपना सिर रखकर कहा 'तुम मेरे अतीत को विस्मृत करा दो। अपने प्रेम से सब कुछ विस्मृत करा दो।'

देवप्रिय ने उसे जोर से अपनी बांहों में भींच लिया।

5

भवनाथ बाबू ने अपनी पुत्रवधू से कहा था, ‘दीपा नाम की कोई थी, इसे बहू तुम भूल जाओ।’ भवनाथ बाबू की पत्नी को भी यह कहने की जरूरत थी, भवनाथ

बाबू के यह ध्यान में नहीं आया था। उनकी पत्नी ने उस दिन भी दीपा के यहां से निकलकर टैक्सी में सवार होते वक्त कहा था, 'अरी दीपा, में प्रार्थना करती हूं कि तू मर जा!

विचित्र व्यक्ति थीं न, लेकिन सिर्फ वही क्यों विचित्र थीं, वे सभी लोग जो भवनाथ बाबू की पत्नी की तरह पहले जमाने के अपरिपक्व लोग थे, दुर्बल लोग थे, वे ही शायद इसी तरह के विचित्र लोग हो सकते थे। अपनी आखिरी बीमारी के दिनों में वे दीपा के लिए बेचैन हो गयीं, 'दीपा, ओ दीपा, तुझे मैं एक बार देखना चाहती हूं। दीपा....।'

दो साल बाद!

भवनाथ बाबू कलकत्ता छोड्‌कर काशी चले गये थे। वे वहीं रहने लगे थे। कलकत्ता से अपना संपर्क उन्होंने खत्म कर लिया था। अपना मकान बेचकर सारा रुपया बैंक में रखकर पति-पत्नी अपने जीवन के बाकी दिन वहीं बिता रहे थे। पुत्रवधू शोभा अब उनके साथ नहीं रहती थी। वह अब एक गुरु का सहारा लेकर उन्हीं के साथ जगह-जगह घूमती रहती थी। उस घटना के कुछ दिन बाद ही-लगभग तीन महीने बाद- शोभा अपने गहने और पति के लाइफ इंश्योरेंस के रुपये, जो उसके नाम बैंक में फिक्सड डिपोजिट थे, उन्हें लेकर एक दिन घर से चली गयी। भवनाथ बाबू ने सोचा था शायद दीपा के आकर्षण के कारण शोभा वहीं चली गयी होगी। लेकिन नहीं। उन्होंने पता लगाकर देखा कि शोभा वहां नहीं थी।

शोभा-दीपा की मां की उम्र पैंतीस-छत्तीस की थी। वह देखने में सुंदर थी। दीपा से कहीं ज्यादा सुंदर। दीपा आधुनिक जमाने की लड़की थी, थोड़ी कड़क और तेज-पुरुषों की तरह। शोभा कोमल और संकोची थी। इसलिए भवनाथ बाबू उसके लिए चिंतित हो गये। लेकिन बाद में उन्हें खबर मिली कि शोभा अपने मायके चली गयी थी। वहां उस वक्त उनके संन्यासी गुरु आये थे। उनसे दीक्षा लेकर अब वे गुरु के साथ ही घूमती थी। गुरु का बहुत बड़ा आश्रम था। वे पूरे देश में घूमते रहते थे। शोभा वहां प्रसन्न थी। उसने अतीत को भुला दिया था। निंदा करने वाले तरह-तरह की बातें करते थे। उसे परवाह नहीं थी।

सब कुछ रहने के बाद भवनाथ बाबू अपनी पत्नी को लेकर काशी मैं रहने लगे थे। अचानक भवनाथ बाबू की पत्नी ने खाट पकड़ ली। उन्हें अपनी पुत्रवधू को देखने की ख्वाहिश नहीं हुई, मगर दीपा को देखने के लिए वै तड़पने लगीं। 'दीपा को एक बार दीपा को देखना चाहती हूं। उसे बुला दो।'

भवनाथ बाबू से इनकार करते नहीं बना। उनका हृदय भी प्रतिदिन तूफान से लाये हुए बालू की तरह मरुभूमि बनता जा रहा था। निरंतर तृष्णा से उनका मन व्याकुल रहता था। पत्नी की उस कातर इच्छा की ध्वनि जैसे वहां प्रतिध्वनित होने लगी। उन्होंने दीपा के पते पर तार भेज दिया। साथ ही दीपा जिस कॉलेज में पढाती थी. वहां भी टेलिग्राम किया। इसके अलावा जिन छात्रों को वे बेटों की तरह मानते थे और जो शिक्षा विभाग में काम करते थे, उन्हें भी चिट्ठी लिखी उनमें दीपा के नाम चिट्ठी भी रख दी। उन्हें लिखा-मेरी पौत्री दीपा-दीपानिता, जो अब हालदार हो गयी है, वह हम लोगों की इच्छा के विरुद्ध शादी करके अलग गृहस्थी बसाकर हमसे अपना रिश्ता तोड़ चुकी है। मेरी पत्नी इस वक्त मृत्युशप्या पर हैं। किसी तरह दीपा का पता लगाकर उसे यहां भेज दो। मेरी पत्नी की सांसें इतनी तकलीफ में भी सिर्फ उसी के लिए अटकी हुई हैं।

आखिरकार दीपा आयी।

उस दिन अपराह्न बेला थी। एक टैक्सी आकर खड़ी हुई, जिसमें से दीपा उतरी। टैक्सी का होंने सुनकर भवनाथ बाबू खिड़की पर आकर खड़े हो गये। हां दीपा ही तो थी। उन्होंने उसी क्षण एक नजर में दीपा को पहचान लिया। दीपा कुछ लम्बी लग रही थी। लम्बी हुई थी या दुबली हो गयी थी? वे ठीक समझ नहीं पाये।

वह अकेली ही आयी थी। साथ में देवप्रिय नहीं था। वह खुद नहीं आया था ३ या दीपा ने साथ आने से मना किया था? दीपा ने ही नहीं आने दिया होगा। यही हुआ होगा। मगर यह बड़े अन्याय की बात है?

भवनाथ बाबू झटपट दरवाजा खोलकर बाहर निकल आये। उन्होंने अपने नौकर रामभरोसे को आवाज लगायी- भरोसे बाहर से सामान ले आओ।

दीपा ने नजदीक आकर कहा, 'दादू !'

उसकी छुट्टी के नीचे हाथ लगाकर उसका चेहरा ऊपर करके भवनाथ बाबू उसे देखने लगे। उनके होंठ थर-थर कांप रहे थे। आखें आसुओं से भर गयीं।

दीपा की आखें भी भर आयीं; लेकिन उसने मुस्कराने की कोशिश की। दोनों ने ही अपने आंसू पोंछे। दीपा बोली, 'दादी कैसी हैं?'

'तेरे लिए ही अब तक जिंदा है। बुढ़ापे की बीमारी है। ऐसे तो कुछ नहीं है मगर कब क्या हो जाए कोई कह नहीं सकता। लेकिन-तू देवप्रिय को साथ क्यों नहीं लायी? अकेली क्यों आयी दीपा?'

क्या?

'उसे साथ क्यों नहीं लायी? तूने क्या यह सोचा कि हमने तुझे बुलाया है, उसे नहीं? मैंने तो लिखा था- '

'हां, दादू!'

'तो फिर तूने क्या सोचा-कुछ और- '

'दादू!' कुछ कहते हुए रुक गयी।

'तू उसे टेलीग्राम कर दे। '

वह-वह तो- '

दीपा का गला भर आया।

'दीपा!'

अपना गला झाडकर दीपा बोली, 'दादू वह तो अब इस दुनिया में नहीं रहा।' दी-पा भवनाथ बाबू के गले से चीख निकल गयी। वे थर-थर करके कांपने लगे। दीपा उनसे लिपटकर बोली--दादू! दादू!

'दीपा !' भवनाथ बाबू सिसककर रोने लगे। आंसुओं के कारण उन्हें कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। उन्होंने अपने आंसुओं के पर्दे को भेद करके दीपा को देखने की कोशिश की। हां वाकई। दीपा के शरीर पर सफेद-काले रंग को छोड्‌कर और दूसरा रंग नहीं था। काला भी थोड़ा-सा, ज्यादा सफेद ही था। वह सफेद रंग, जैसे आंसुओं के कुहासे में और सफेद नजर आ रहा था। उसके हाथ में चूड़ी और गले में एक पतला सोने का हार था। शायद इतने से ही किसी को विधवा नहीं कहा जा सकता था-लेनिक विधवा होने के बाद इससे ज्यादा गहने कोई नहीं पहनता, न उसके। कपड़ों का इससे अलग कोई रंग ही होता है।

वह लम्बी नहीं, दुबली-कमजोर हो गयी थी। दीपान्विता म्लान हो गयी थी। दीपा विधवा हो गयी थी।

दादू ''

'दीपा !'

'तुम दादी से मत कहना। मैं उसे नहीं बताना चाहती। '

'दीपा, यह कब की बात है?'

' आठ महीने होने को आये दादू !'

'तूने -खबर तक नहीं भेजी। '

'हां, खबर नहीं भेजी। '

'हम लोगों पर नाराज थी। तुझे लगता था- '

तुझे अभिमान हुआ था। वह भी अकारण। लेकिन उसे खत्म नहीं कर पायी थी। लेकिन तुम्हारे अभिशाप से ऐसा हुआ, यह मैं सोच भी नहीं सकती। यह तो एवसर्ड है। ' दीपा के चेहरे पर फीकी मुस्कान थी, 'उसकी अचानक मौत हो गयी। वह इंटरव्यू देने दिल्ली गया था। मैं भी साथ गयी थी। वहां हम लोग खूब। घूमे-फिरे। अचानक एक दिन उसका हार्टफेल हो गया। '

भवनाथ बाबू स्तब्ध हो गये।

दीपा भी खामोश थी। वह उदास नजरों से सामने देख रही थी। भीतर से भवनाथ बाबू की पत्नी की आवाज आयी-दीपा ' दीपा!

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' दीपा जैसे चौंककर जाग उठी। गहरी सांस लेकर बोली, 'दादू चलो, दादी बुला रही हैं। '

साथ चलते हुए वह बोली, 'रंजित से मुझे मां की खबर मिली। उसने कहा- बहुत खराब बात उसने कही दादू! मतलब बहुत खराब ढंग से उसने कहा। बीस्ट! ब्रूट! मुझसे आकर कहने लगा, 'मैं तुम्हें प्यार करता हूं। ' मैं बोली, 'मगर मैं नहीं करती। जिसे मैंने प्यार किया था, उसे ही आज भी प्यार करती हूं रंजित! मैं मानती हूं कि इस दुनिया में धर्म, ईश्वर-सब झूठ है, लेकिन प्यार झूठा नहीं होता। अगर एक बार किसी से प्यार हो जाए तो उसे छोड्‌कर दूसरे से प्यार नहीं किया जा सकता। मैंने देवप्रिय से ऐसा ही प्यार किया था। उसे इसी तरह सारी जिंदगी चाहती रहूंगी। उसे भुला नहीं सकती। कम से कम इस वक्त तो यही लगता है। ' फिर वह थोड़ा मुस्कराकर बोली, 'रंजित ने मुझे व्यंग्य करते हुए मेरी मां के बारे में बताया। कहा 'ठीक है, अंत में अपनी मां की तरह ही किसी बाबाजी की चेली बन जाना।' उसे मैंने भगा दिया।'

उसकी आवाज रूखी हो गयी थी। उसने कहा, 'दादू! प्रेम से बड़ी, किसी को चाहने से बड़ी चीज और कोई नहीं होती। यही मधुरतम है। मिलन में मधुर, विरह में मधुर-हंसी में रुदन में-। जरा ठहरो दादू मैं खुद को संभाल लूं। दादी से छिपाना होगा न! आह !'

(छाया - प्रमोद यादव)

 

वक्त आ ही गया है

बोझ त्यागने का

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@mail.com

आसमाँ की ऊँचाई पाना हममें से हर कोई चाहता है लेकिन उड़ान भरने लायक तैयारी कितने लोग कर पाते हैं, यह सोचने का विषय है।

सभी की तमन्ना रहती ही है कि हर दृष्टि से हमारा कद, पद और प्रतिष्ठा बढ़े, हमारा व्यक्तित्व आसमान की ऊँचाइयां प्राप्त करे, और वह मुकाम पाए कि दुनिया में जहाँ कहीं पर हों, अपेक्षाकृत उच्च से उच्च स्थान पाते रहें और निरन्तर शीर्ष पर रहने का आनंद पाते रहें।

यह शीर्ष बादलों और आसमान की तरह होना चाहिए जहाँ रहकर हम जमाने भर को देख भी सकें, आनंद भी पा सकें और दूसरों को आनंद से सरोबार भी कर सकें।

अपना यह आनंद किसी का मोहताज न रहे, स्वेच्छा और संप्रभुता से हमें सब कुछ प्राप्त होता रहे। हम भी आनंदित होते रहें, औरों को भी  जी भर कर आनंदित करते रहेंं।

सभी को सामूहिक ऊँचाइयों को पाने के अवसर प्राप्त हों, किसी को किसी दूसरे से ईष्र्या या भय न रहे, सभी लोग अपने-अपने हिसाब से आगे बढ़ते रहें, काम करते रहें और दुनिया को वह सब कुछ दे सकें जिसके लिए हमारा अवतरण हुआ है।

हर साल के आखिर में आज के दिन हम सोचते हैं कि आने वाले कल से कुछ नया करेंगे, कर दिखाएंगे और हर साल नया-नया करते हुए अपने आपको भी निखारेेंगे तथा जमाने भर को निखारने के लिए भी कुछ करेंगे ही।

जो आसमान की ऊँचाइयों को पाने के इच्छुक हैं उनके लिए सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त यही है कि हमारे पास ऎसा कोई भारी सामान न हो, जिससे कि उड़ पाने में किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत न हो।

जो जितना अधिक हल्का होता है वह उतने अधिक ऊँचे तक उड़ान भर सकता है, सारा जहां एक ही निगाह में देख पा सकता है और दुनिया भर में अपने आपको मुक्त एवं मस्त होकर वह सब कुछ पा सकता है जिसे देख पाने और अनुभव करने के लिए बरसों से तमन्नाएं संजोयी होती हैं। इस मामले में इंसान को पंछियों का स्वभाव अपनाना चाहिए। न कहीं किसी से मोह, न अपेक्षा या उपेक्षा।

आज का इंसान इतना अधिक सामथ्र्यशाली है कि वह कुछ भी कर सकता है, आसमान की उड़ान से लेकर आक्षितिज पसरे नैसर्गिक वैभव को पा सकता है लेकिन यह सब तभी संभव है जबकि उसके मन-मस्तिष्क और तन में भारी तत्वों का बोझ न हो।

आजकल जो इंसान इस बोझ से मुक्त है वही ऊँचाइयों को पा सकता है। लेकिन अधिकांश लोग ऎसा नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वे बिना किसी जरूरी कारकों के बोझ के कारण भारी से भारी हो गए हैं इस कारण उड़ान भर पाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

साल का आज आखिरी दिन है। इस दिन हर इंसान यही प्रण लेता है कि जो हो गया वो हो गया, अब कल से वह सब नहीं होने देगा। लेकिन वह कल कभी नहीं आता है। हम सभी के लिए आज का दिन अंतिम है, इस मायने में कि कल से नया वर्ष आरंभ होगा और इस नए साल में हम कुछ नया करना चाहते हैं, आसमान की ऊँचाई पाना चाहते हैं।

इस दृष्टि से हम सभी को चाहिए कि जीवन में बुराइयों, नीचता, अंधकार, काम, क्रोध, लोभ, मद-मात्सर्य, भाई भतीजावाद, बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता, सिद्धान्तहीनता, दुष्टता, आसुरी भावों, विघ्नसंतोष, नालायकियों और तमाम प्रकार की नकारात्मकताओं का भार लेकर हम ऊँचाइयों को प्राप्त नहीं कर सकते, उड़ान नहीं भर सकते।

क्यों न हम आज के दिन इन सभी प्रकार के भारों से मुक्त होने का प्रयास करें और एक-एक कर सारे बोझ त्यागते चले जाएं ताकि हम अनावश्यक बोझ से मुक्त होकर इतने हल्के हो जाएं कि जीवन में भारीपन और किसी भी प्रकार की बोझिलता रहे ही नहीं, आसमान में उड़ने लायक हल्कापन आ जाए और पूरी दुनिया को अपनी मानकर निहारते चले जाएं।

आज का दिन हमारे इसी संकल्प को पूरा करने के लिए है। आईये हमारे सारे अनावश्यक बोझ के लबादों को उतार फेंके और कल से नई उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाएं।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

सदियों पहले किसी ने सोचा नहीं होगा कि बोतलों में पानी बिकेगा. आज यह वास्तविकता है. इसी तरह बोतलों में ताजी हवा मिलने लगी है. मनुष्य ने प्रकृति के सत्यानाश की ओर कदम बढ़ा लिए हैं.

बाजार में बोतलबंद हवा

प्रमोद भार्गव

व्यावसायिक बुद्धि और नवोन्मेष की ललक हो तो बाजार में उम्मीदों के नए-नए द्वार आसानी से खुल जाते हैं। वैसे भी संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता। वाकपटु लोग गंजों को भी कंघी बेचने में कामयाब हो जाते हैं। कनाडा की कंपनी 'वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक'ने कुछ ऐसा ही अनूठा करिश्मा कर दिखाया है। कंपनी ने वनाच्छादित पहाड़ों और जंगलों की हवा को बोतलबंद पानी की तरह बेचने का धंधा शुरू किया है। बोतल में बंद हवा बेचने का यह अवसर दुनिया में बढ़ते वायु प्रदुषण ने दिया है। दूषित हवा से बेचैन और पीड़ित लोग इसे हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। महानगरों में बढ़ता वायु प्रदुषण,दूषित औद्योगिक कचरे और कारों से उगलते धुंए को माना जा रहा है। औद्योगिक घरानों के दबदबे के चलते औद्योगिक उत्पादन घटाना तो मुश्किल है,ऐसे में कारोबारियों को बोतलबंद हवा के रूप में नया सुरक्षा कवच मिल गया है। जाहिर है,भारत समेत दुनिया के कई महानगरों में कारों पर नियंत्रण की जो मुहिम शुरू हुई है,उसे धक्का लग सकता है। इसके उलट यही कारोबारी कार के साथ हवा की बोतलें बतौर उपहार देने का फंडा भी शुरू कर सकते हैं। मसलन बाजार में कारों के साथ हवा का बाजार तो बढ़ेगा,किंतु इस महंगी हवा को खरीदकर इस्तेमाल करना गरीब के वश की बात नहीं है।

ब्रह्मण्ड में पृथ्वी एक मात्र ऐसा गृह है,जहां वायु होने के कारण जीवन संभव है। वायु में नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक 21 प्रतिशत होती है। इसके अलावा ऑक्सीजन 0.03 प्रतिशत और अन्य गैसें 0.97 प्रतिशत होती हैं। वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार पृथ्वी के वायुमंडल में करीब 6 लाख अरब टन हवा है। हवा,पृथ्वी,जल,अग्नि और आकाश जैसे जीवनदायी तत्वों में से एक तत्व है। कोई भी प्राणी भोजन और पानी के बिना तो कुछ समय तक तो जीवित रह सकता है,लेकिन हवा के बिना कुछ मिनट ही बमुश्किल जीवित रह सकता है। मनुष्य दिन भर में जो भी कुछ खाता-पीता है,उसमें 75 फीसदी भाग हवा का होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य एक दिन में 22000 बार सांस लेता है। इस तरह से वह प्रतिदिन 15 से 18 किलोग्राम यानी 35 गैलेन हवा ग्रहण करता है। ऐसे में हवा दूषित मसलन जहरीली हो तो मानव शरीर पर उसके दुष्प्रभाव पड़ना तय है। वायु प्रदुषण के चलते वायु में भौतिक,रसायनिक या उसके जैविक गुणों में ऐसा कोई भी अवांछित परिवर्तन हो जिसके द्वारा स्वयं मनुष्य या अन्य जीवों को जीने में परेशानी अनुभव होने लगे या सांस लेने में दिक्कत आने लगे तो जान लीजिए हवा प्रदूषित हो रही है। हवा में प्रदुषण बढ़ने के साथ प्राकृतिक संपदा भी नष्ट होने लग जाती है। भारत की बात तो छोड़िए अमेरिका जैसे सुविधा संपन्न देश में भी हर साल 32 करोड़ 50 लाख टन से अधिक मूल्य के खाद्यान्न नष्ट हो जाते हैं।

वायु के ताप और आपेक्षिक आद्रता का संतुलन गड़बड़ा जाने से हवा प्रदुषण के दायरे में आने लग जाती है। यादि वायु में 18 डिग्री सैल्सियस ताप और 50 प्रतिशत आपेक्षिक आर्द्रता हो तो वायु का अनुभव सुखद लगता है। लेकिन इन दोनों में से किसी एक में वृद्धि,वायु को खतरनाक रूप में बदलने का काम करने लग जाती है। 'राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मूल्यांकन र्काक्रम' ;एनएसीएमपीद्ध के मातहत 'केंद्रीय प्रदूषण मंडल' ;सीपीबीद्ध वायु में विद्यमान ताप और आद्रता के घटकों को नापकर यह जानकारी देता है कि देश के किस शहर में वायु की शुद्धता अथवा प्रदूषण की क्या स्थिति है। नापने की इस विधि को 'पार्टिकुलेट मैटर' मसलन 'कणीय पदार्थ' कहते हैं। प्रदूषित वायु में विलीन हो जाने वाले ये पदार्थ हैं,नाइट्रोजन डाईऑक्साइड और सल्फर डाईऑक्साइड सीपीबी द्वारा तय मापदंडों के मुताबिक उस वायु को अधिकतम शुद्ध माना जाता है,जिसमें प्रदूषकों का स्तर मानक मान के स्तर से 50 प्रतिशत से कम हो। इस लिहाज से दिल्ली समेत भारत के जो अन्य शहर प्रदूषण की चपेट में हैं,उनके वायुमंडल में सल्फर डाईऑक्साइड का प्रदूषण कम हुआ है,जबकि नाइट्रोजन डाईऑक्साइड का स्तर कुछ बड़ा है।

सीपीबी ने उन शहरों को अधिक प्रदूषित माना है,जिनमें वायु प्रदूषण का स्तर निर्धारित मानक से डेढ़ गुना अधिक है। यदि प्रदूषण का स्तर मानक के तय मानदंड से डेढ़ गुना के बीच हो तो उसे उच्च प्रदूषण कहा जाता है। और यादि प्रदूषण मानक स्तर के 50 प्रतिशत से कम हो तो उसे निम्न स्तर का प्रदूषण कहा जाता है। वायुमंडल को प्रदूषित करने वाले कणीय पदार्थ,कई पदार्थों के मिश्रण होते हैं। इनमें धातु,खनिज,धुएं,राख और धूल के कण शामिल होते हैं। इन कणों का आकार भिन्न-भिन्न होता है। इसीलिए इन्हें वगीकृत करके अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी के कणीय पदार्थों को पीएम-10 कहते हैं। इन कणों का आकार 10 माइक्रॉन से कम होता है। दूसरी श्रेणी में 2.5 श्रेणी के कणीय पदार्थ आते हैं। इनका आकार 2.5 माइक्रॉन से कम होता है। ये कण शुष्क व द्रव्य दोनों रूपों में होते हैं। वायुमंडल में तैर रहे दोनों ही आकारों के कण मुंह और नाक के जरिए श्वास नली में आसानी से प्रविष्ठ हो जाते हैं। ये फेफड़ों तथा हृदय को प्रभावित करके कई तरह के रोगों के जनक बन जाते हैं। आजकल नाइट्रोजन डाईऑक्साइड देश के नगरों में वायु प्रदूषण का बड़ा कारक बन रही है।

वैसे तो अमेरिका और मध्य पूर्व के कई देशों में हवा का कारोबार मृगछौने की तरह खूब कुलांचें मारने लगा है,लेकिन चीन के वायुमंडल में छाये वायु प्रदुषण से इसमें भारी उछाल आया है। हालत यह है कि चीन में लोग उपहार के तौर पर बोतलबंद हवा अपने रिश्तेदारों और मित्रों को देने लगे हैं। ऐसे में सोचनीय प्रश्न है कि हवा का यह कारोबार भारत में कारगर साबित होगा ? उललेखनीय है कि विश्व आर्थिक मंच ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि दुनिया के 20 प्रदूषित शहरों में 18 एशिया में हैं। इनमें भी 13 भारत में हैं। भारत में वायु प्रदूषण का सबसे बढ़ा कारण बढ़ते वाहन और उनका सह उत्पाद प्रदुषित धुंआ माना जा रहा है। हवा में घुलते इस जहर का असर केवल महानगरों में ही नहीं,छोटे नगरों में भी प्रदूषण का सबब बन रहा है। यही कारण है कि दिल्ली,लखनऊ,कानपुर,अमृतसर,इंदौर और अहमदाबाद जैसे शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर की सीमा लांघने को तत्पर दिखाई दे रहा है।

दिल्ली में लुटियंस क्षेत्र आबोहवा की दृष्टि से सबसे अधिक खुशनुमा इलाका माना जाता है,लेकिन इसी क्षेत्र में आने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निवास स्थल 7 रेसकोर्स भी दूषित हवा की चपेट में है। इस आवास के बाहर पीएम ट्रैकर से प्रदूषण का स्तर हाल ही में जांचा गया तो आंकड़े हैरान करने वाले आए। यहां कणीय पदार्थ यानी पीएम की मात्रा 2000 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के ऊपर थी। जबकि दिल्ली में 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर को एकदम साफ प्राकृतिक हवा का कारक माना जाता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवारमेंट की मशीन ने भी यहां प्रदूषण का स्तर औसत स्तर से करीब 14 गुना ज्यादा दर्ज किया है। साफ है,दिल्ली के वायुमंडल में जहरीली हवा तैर रही है।

केंद्रीय प्रदूषण मंडल भी देश के 121 शहरों में वायु प्रदूषण का आकलन करता है। इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक देवास,कोझिकोड एवं तिरूपति को अपवादस्वरूप छोड़ दें तो बांकी सभी शहरों में प्रदूषण एक बड़ी समस्या के रूप में वायुमंडल में जगह बनाता जा रहा है। इसकी वजह तथाकथित वाहन क्रांति है। जिस गुजरात को हम आधुनिक विकास का मॉडल मानकर चल रहे हैं,वहां भी प्रदूषण के हालात भयावह हैं। कुछ समय पहले टाइम पात्रिका में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के चार प्रमुख प्रदूषित शहरों में गुजरात का बापी शहर भी शामिल है। यहां 400 किलोमीटर लंबी औद्योगिक पट्टी है। इन उद्योगों में कामगर और बापी के रहवासी कथित औद्योगिक विकास की बड़ी कीमत चुका रहे हैं। बापी के भूगर्भीय जल में पारे की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से 96 प्रतिशत ज्यादा है। यहां की वायु में धातुओं के कण बड़ी संख्या में हैं,जो फसलों पर संक्रमण का कहर ढहा रहे हैं।

देश में फैल रही इस जहरीली हवा की पृष्ठभूमि इस बात की तस्दीक है कि यदि बोतलबंद हवा का कारोबार भारत में शुरू होता है तो इसका विस्तार दिन दूना,रात चौगूना फैलने की उम्मीद है। लेकिन इससे शंका यह उभरती है कि हवा का कारोबार कहीं प्रदूषण मुक्ति के स्थायी सामाधान के उपायों पर भारी न पड़ जाए ? इस बोतलबंद हवा की जानकारी आने से पहले दिल्ली में बड़ी कारों के पंजीयन पर रोक और एक दिन सम और दूसरे दिन विषम संख्या की कारों को चलाने की व्यवस्था शुरू हुई है। हवा को स्वच्छ बनाए रखने के ये उपाय कारगर और बहुजन हितकारी हैं। लेकिन अब कार निर्माता कंपनियां बोतलबंद हवा के जरिए शुद्ध हवा का विकल्प उपहार में देकर सरकार के समक्ष नई कारों के पंजीयन से रोक हटाने का सुझाव रख सकती हैं। क्योंकि जब दिल्ली सरकार ने सम-विषम संख्या की कारें चलाने का फॉर्मूला पेश किया था,तब ये कंपनियां इस फॉर्मूले को लागू करने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय चली गई थीं। तब न्यायालय ने दलील दी थी कि 'आपको कारें बेचने की पड़ी है,जबकि लोगों के प्राण जोखिम में हैं।' वैसे भी बोतलबंद हवा,वायु की शुद्धि का तात्कालिक व्यक्तिगत उपाय तो है,लेकिन वायुमंडल से प्रदूषण मुक्ति का व्यापक एवं स्थायी हल कतई नहीं है।

कंपनी ने फिलहाल 'बैंफ एयर' और 'लेक लुईस' नाम से दो प्रकार की हवाबंद बोतलें बाजार में उतारी हैं। बैंफ एयर की तीन लीटर की बोतल की कीमत 20 कनाडाई डॉलर,यानी भारतीय मुद्रा में करीब 952 रुपए है। लेक लुईस बोतल में 7.7 लीटर हवा है। इसकी कीमत 32 कनाडाई डॉलर,मसलन 1532 रुपए है। फिलहाल भारत में इस हवा का व्यापार शुरू नहीं हुआ है,लेकिन जिस तेजी से इस कारोबार में उछाल आ रहा है,उस परिप्रेक्ष्य में तय है,देर-सबेर हवा की बोतल भारतीय बाजार का हिस्सा बन जाएगी। साफ है,इस बोतल का उपयोग धनी लोग ही कर पाएंगे।

वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक कंपनी ने 2014 में प्रयोग के तौर पर हवा भरी थैलियां बेचने की शुरूआत की थी। उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि यह पहल भविष्य में वाणिज्यिक दृष्टि से कितनी महत्वपूर्ण होने जा रही है। कंपनी के संस्थापक मोसेज लेक का कहना है कि उनके द्वारा बाजार में लाई गई थैलियों की पहली खेप तुरंत बिक गई। इससे उनके हौसले को बल मिला और फिर इस कारोबार को फुलटाइम व्यवसाय में बदल दिया। कंपनी ने हाल ही में चीन में बोतलबंद हवा का व्यापार शुरू किया है। यहां कारोबार के उद्घाटन वाले दिन ही 500 बोतलें हाथों-हाथ बिक गईं और अब अमेरिका व मध्य पूर्व के देशों के बाद चीन बोतलबंद हवा का खरीददार सबसे बड़ा देश बन गया है। भारत में खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी इस जहरीली हवा के चलते कंपनी भारत में भी बाजार तलाश रही है। यदि इस हवा की आमद भारत में हो जाती है तो जिस तरह से प्रदूषित हो रहे जलस्त्रोतों को प्रदूषण मुक्त बनाने की कोशिशें नाकाम होती रही हैं,उसी तरह वायु को प्रदूषण मुक्त बनाने की संभावनाएं भी हवा के कारोबारी ठप कर देंगे।

 

प्रमोद भार्गव

शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224

फोन 07492-232007, 233882

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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दोहे रमेश के नववर्ष पर
पन्नो मे इतिहास के, लिखा स्वयं का नाम !
दो हजार पंद्रह  चला,.....यादें छोड तमाम !!

दो हजार पंद्रह  चला, छोड सभी का साथ !
हमें थमा कर हाथ में, नये साल का हाथ !!

ढेरों मिली बधाइयाँ,........बेहिसाब संदेश !
मिली धड़ी की सूइंयाँ,ज्यों ही रात "रमेश"!!

मदिरा में डूबे रहे, ......लोग समूची रात !
नये साल की दोस्तों, यह कैसी सुरुआत !!

नये साल की आ गई, नयी नवेली भोर !
मानव पथ पे नाचता,जैसे मन मे मोर !!

नये साल का कीजिये, जोरों से आगाज !
दीवारों पर टांगिये, .नया कलैंडर आज !!

घर में खुशियों का सदा,. भरा रहे भंडार !
यही दुआ नव वर्ष मे,समझो नव उपहार !!

आयेगा नववर्ष में, ...शायद कुछ बदलाव !
यही सोच कर आज फिर, कर लेता हूँ चाव !!


रमेश शर्मा, मुंबई.
9820525940.rameshsharma_123@yahoo.com

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नये वर्ष में

गीत खुशी के मिलकर गाएँ नये वर्ष में।
समरसता के दीये जलाएँ नये वर्ष में।
जीवन की सूनी राहों को रोशन कर,
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष में।

बीज प्यार के मन में बोएँ नये वर्ष में।
सपने नये-नये संजोएँ नये वर्ष में।
कुछ करने की क़समें खाएँ नये वर्ष में।
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष में।

जो भी त्याज्य है, उसको त्यागें नये वर्ष में।
आलस्य छोड़कर नींद से जागें नये वर्ष में।
सच्चाई का साथ निभाएँ नये वर्ष में।
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष में।

आज के काम न कल पर टालें नये वर्ष में।
काम समय पर ही कर डालें नये वर्ष में।
सोच-समझ कर कदम बढ़ाएँ नये वर्ष में।
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष में।

नभ में नई उड़ान के लिए नये वर्ष में।
मंगलमय आह्वान के लिए नये वर्ष में।
खुशियों से आँगन महकाएँ नये वर्ष में।
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष में।


आचार्य बलवन्त
विभागाध्यक्ष हिंदी
कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज
450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-560053
मो. 91-9844558064   
Email- balwant.acharya@gmail.com
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***मुबारक़ नया साल***
आज मैने आसमा को चमकते देखा है ।
मैने आज तारों को लिपटते देखा है
आज मैने सूरज को मुस्कराते  देखा है
मैने आज चाँद को उतरते देखा है
आज मैने बादलो को ठुमकते देखा है
मैने आज धरा को खिल-खिलाते देखा है
आज मैने पर्वतों को इतराते देखा है
मैने आज पेड़ो को इठलाते देखा है
आज   मैने  सागर को  लहराते  है
मैने आज लहरो को ठहरते देखा है
आज मैने नदियों को बतलाते देखा है
मैने आज सदियों को जगमगाते देखा है
आज मैने पक्षिओ को हा-हा हँसते देखा है
यही है कवि कल्याण का कमाल
**मुबारक हो नया साल-नया धमाल ***
आज मैने किसी शेर ओर बकरी को
**एक घाट पे पानी पीते देखा है**
मैने आज दुश्मनी को सिसकते देखा है
आज मैने दोस्ती महकते देखा है
आज मैने खुशियों को बटते देखा है ।।

कवि –कल्याणराज

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नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है।
दुःख-चिंता का पतन कर,
सुख-समृद्धि का उत्कर्ष लाया है।

प्रेम-बंधुत्व की गठरी में ,
पर्व समेटे भांति-भांति,
ईद,दिवाली,क्रिसमस,वैशाखी,
ओणम,ईस्टर और सक्रांति।
सब धर्मो के पर्व मनाना,
ये संदेशा  लाया  है।
नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है।

वर्ष बढ़ा है, उम्र बढ़ी  है,
अब सोच बढ़ानी होगी,
बड़ी सोच से बड़ा  नतीजा,
ये बात बतानी होगी।
सब धर्मो से बड़ा धर्म,
दिनेश ने  मानवता  को  पाया  है,
नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है।

वर्ष पुरातन से अनुभव पाया,
नूतन वर्ष  में इसे लगाना है,
नए  वर्ष  में  नयी  आशाएं                                                                            

और नयी  उपलब्धि पाना  है।
शांति,सफलता और स्नेह  को,
नया  वर्ष  ले  आया  है।

नव वर्ष  आया  है,
हर्ष लाया है,
दुःख-चिंता का पतन कर,
सुख-समृद्धि का उत्कर्ष लाया है।


Regards
दिनेश कुमार 'डीजे'
तिथि -    10.07.1987
शिक्षा-     १. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा कनिष्ठ शोध छात्रवृत्ति एवं राष्ट्रीय     पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण     
२. समाज कार्य में स्नातकोत्तर उपाधि
३. योग में स्नातकोत्तर उपाधिपत्र
प्रकाशित पुस्तकें - दास्तान ए ताऊ, कवि की कीर्ति एवं प्रेम की पोथी
स्थाई पता-     मकान नंबर 1,बाडों पट्टी, हिसार (हरियाणा)- 125001
वर्तमान पता-इज़्ज़तनगर, बरेली
फेसबुक . www.facebook.com/kaviyogidjblog 
मोबाइल नंबर- 9720226833
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कविता.’’नया.साल’’

क्या बताऊँ मेरा क्या हाल है,
मेरा दिल अब तो बेहाल है।
अब तो सिर्फ इम्तहान का सवाल है,
क्योंकि आने वाला इक नया साल है।।

नये साल आयेंगे ,नये यार आयेंगे,
आकर दिल बहलायेंगे ,फिर भी पुराने याद आयेंगे।
हम सब मिलकर ,गमों को भुलायेंगे,
कुछ याद आयेंगे ,कुछ याद रह जायेंगे।।

कुछ पल आयेंगे ,कुछ पल जायेंगे,
कभी वो हंसायेंगे ,कभी वो रूलायेंगे।
साल आते रहेंगे ,साल जाते रहेंगे,
खुसियाँ लाते रहेंगे ,गम भुलाते रहेंगे।।

प्यार का अहसास ,दिलाते रहेंगे,
वादा ये अपना ,निभाते रहेंगे।
प्यार मे दिल अपना ,बिछाते रहेंगे,
जब तक दुनिया रही ,याद आते रहेंगे।।

रचनाकार.
बी.के.गुप्ता’’हिन्द’’
मो.9755933943

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‘‘आईनो का सच’’

बनकर राम घूम रहे हैं,
दिल मे छिपा जिनके रावण।
नैतिकता का पाठ पढ़ाते,
बातें करते हैं मनभावन।।

सम्हाल कर रहना यारो इनसे,
अब राम नहीं बस हैं रावण।
सबको दिखता अपना स्वार्थ,
कैसे होगा अब मन पावन।।

आईने बदल रहे दिन प्रतिदिन,
कैसे देखें अब हम दर्पण।
प्रेम,दया, जब दिल में न हो,
कैसे होंगे प्रभू के दर्शन।।

रचनाकार.
बी.के.गुप्ता’’हिन्द’’
मोब.975593394
 
कवि नाम.बी.के.गुप्ता’’हिन्द’’
पूरा नाम.बृज किशोर गुप्ता
पिता का नाम.श्री लक्ष्मी प्रसाद गुप्ता
माता का नाम.श्रीमती ऊषा गुप्ता
वर्तमान पता. बी.के.गुप्ता
कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स बड़ामलहरा जिला.छतरपुर म.प्र.
पिन.471311
स्थाई पता.बी.के.गुप्ता
ग्राम़$पोस्ट.चन्दौरा तहसील.अजयगढ
़जिला.पन्ना(म.प्र.) पिन.488220
मोब..9755933943
ई.मेल. bाgupta193@gmail.com
जन्मस्थान. ग्राम़$पोस्ट.चन्दौरा तहसील.अजयगढ
़जिला.पन्ना(म.प्र.)
जन्मतिथि.1जुलाई सन्1982
शिक्षा.बी.ए.(समाज शास्त्र) एवं कम्प्यूटर पी.जी.डी.सी.ए.
व्यवसाय.कम्प्यूटर शिक्षक
कैपीटल कम्प्यूटर आई.टी.एण्ड साइन्स बड़ामलहरा,जिला.छतरपुर म.प्र.
लेखन विधा.कविता,गजल,गीत,मुक्तक,निबंध।
 


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कुछ ऐसा नया साल हो


शांति और समृद्धि के बीच
हो एकता की बात ।
साक्षरता का ज्ञान दीप
जलती रहे दिनरात ।
बेकारी गरीबी भूख से
या मुक्ति सब खुशहाल हों ।
प्यार और सहयोग पूर्ण
कुछ ऐसा नया साल हो ।

संकीर्णता से मुक्त रहकर
विश्वहित करते रहें ।
रिक्तता को पूर्णता से
हम सदा भरते रहें ।
द्वेष घृणा बैर पीड़ित
अब प्रेम से निहाल हों ।
श्रद्धा विश्वास जीवन मे आए
कुछ ऐसा नया साल हो ।

गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा


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बन जा सांप!

कहानी- शैलेन्द्र सरस्वती

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सदियों-सदियों पहले की बात है। हमारे देश भारत में एक सहस्रपाद नाम के ऋषिकुमार थे। सहस्रपाद में दूसरे ऋषिकुमारों की तरह उत्कृष्ट गुण तो थे लेकिन एक बहुत बड़ा अवगुण भी था। मौके-बे मौके वे अपने रिश्तेदारों,दोस्तों को हंसी-हंसी में चौंका व डरा दिया करते थे। अब आस-पास के लोग उनकी इस आदत से परिचित होने के कारण उनकी मजाकिया हरकतों पर गुस्सा नहीं होते थे..नजरअंदाज कर जाते थे।

सहस्रपाद के आश्रम के समीप ही उनके एक मित्र रहते थे-खगम। खगम एक कठोर तपस्वी तथा परम सत्यवादी युवक थे। अपने सद्चरित्र के कारण वे लोगों में काफी लोकप्रिय थे। खगम यूं तो बड़े साहसी स्वभाव के थे। अब जो सदैव सत्य बोलता हो,उसे भय हो तो किसका?...बस,खगम डरते थे तो मात्र सांपों से। सांप देखा नहीं कि उनकी घिघ्घी बंध जाती।

एक बार खगम हवन कर रहे थें। तभी सहस्रपाद वहां से गुजरे। उन्होंने खगम को हवन करते देखा तो मन में एक शरारत करने की सूझी। उन्होंने तुरंत पास के मैदान की सूखी घास काटी और उससे घास का एक सांप बना लिया। सहस्रपाद चुपके से खगम के पीछे गये और घास का बना सांप खगम के गले में डाल दिया। अचानक गले में घास के सांप के गिरने से खगम बेहद घबरा गये और बेहोश हो गये। खगम को बेहोश होता देख सहस्रपाद एक पात्र में जल ले कर आये और खगम की आंखों पर पानी छिड़क कर उसे होश में लाने का प्रयत्न करने लगे।

थोंड़ी देर बाद जब खगम को होश आया तो उन्होंने सहस्रपाद पर क्रोधित होते हुए उसे श्राप दिया-''मुझे घासपात से बने सांप से डराने वाले,जा तू विषरहित सांप की योनि में जन्म ले!''

इस श्राप को सुन सहस्रपाद की आंखों में आंसू आ गये। अब उन्हें अपनी गलती का पछतावा होने लगा। उन्होंने खगम के चरणों में गिर कर अपनी भूल की माफी मांगी। दयावान खगम मित्र को अपने चरणों में पा कर भावुक हो गये।

-''मित्र! मेरा श्राप अब व्यर्थ नहीं जा सकता। शायद यही ईश्वर की कामना है। फिर भी जब तुम भृगु वंश में जन्मे प्रमति के पुत्र रूरू से मिलोगे तो तुम्हें मेरे श्राप से तत्काल मुक्ति मिल जायेगी'',खगम ने सहस्रपाद से कहा।

खगम के श्राप के फलस्वरूप सहस्रपाद को डुंडुम जाति का सांप होना पड़ा। काफी समय बाद जब रूरू की पत्नी की जब सर्पदंश से मौत हो गयी तो पत्नी की मौत से पगलाये रूरू हाथ में एक मोटा डंडा लिय पृथ्वी के सभी सांपों को मारने घर से निकल पड़े।

एक दिन मार्ग में रूरू की भेंट सांप बने सहस्रपाद से हो गयी। जब रूरू ने अपना मोटा डंडा सहस्रपाद को मारने के लिये उठाया तो सहस्रपाद ने मनुष्य वाणी में उन्हें रोकते हुए कहा-''हे तात्! मुझ विषहीन प्राणी को आप अपने गुस्से का शमन करने के लिये मार रहे हैं,क्या यह पाप नहीं?....सर्प,विद्युत अथवा रोग आदि तो मात्र मृत्यु के कारण हैं। जन्म और मृत्यु ईश्वर की प्रेरणा से ही होते हैं। अतः आप अपने अज्ञान को दूर करें। असली धर्म निरिह प्राणियों को अभय देना अथवा अहिंसा करना है।''

सांप बने सहस्रपाद की बातें सुन रूरू का अज्ञान दूर हो गया। एक अज्ञानी को अपने प्रवचन से सत्पथ पर लाने के कारण सहस्रपाद को तुरंत सर्प की योनि से मुक्ति मिल गयी।

( प्रस्तुत रचना मौलिक,अप्रकाशित तथा अप्रसारित है एवं शिवपुराण की एक कथा पर आधारित है। )

 

शैलेन्द्र सरस्वती

नारायणी निवास

मोबाइल टॉवर के सामने

धरनीधर कॉलोनी

उस्ता बारी के बाहर

बीकानेर- 334005 (राज)

मो- 7877986321

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1

रंगों के उत्सव में सब एक रंग हो जाओ
भेदभाव भूलकर सारे सबको गले लगाओ ।


चौपालों पर जमी हुई हुल्लड़बाजी में
शामिल हो होली को सबके साथ मनाओ ।


जो जीवन से लड़ते लड़ते ऊब चुके हैं
उन सबको आज फाग का राग सुनाओ ।


हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई उठो और
सब मिलकर होली का उत्सव आज मनाओ ।


नए अन्न की खुशबू से आन्दोलित हो
दसों दिशा में गूँज उठाता ढोल बजाओ ।


प्रह्‌लाद जीवन सच है और झूठ होलिका
जीवन-सच सच बने होलिका आज जलाओ ।

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2

 

कुछ कहो पर सोच लो वह काम का है
जब मिलो उससे मिलो जो काम का है ।


जिन्दगी के अनुभवों से खुद कहोगे
आँख का तारा वही जो काम का है ।


देखकर उसको कभी मैं सोचता हूँ
काश मैं भी जानता वह काम का है ।


गर बदलकर खुद उसे तुम देख पाते
तो हमेशा सोचते वह काम का है ।

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3

अपनी जरूरत कम करो तो देखिए
जो है उसे सब कुछ कहो तो देखिए ।


तुम चाहो हर समय हो पास में
मन में उसे सोचा करो तो देखिए ।


गर चाहो तुम कमल-सा खिलकर रहो
तो हर सवेरे भास्कर को देखिए ।


सोचिए तो दिल सभी का एक मंदिर है
जिसमें सदा भगवान को तो देखिए ।

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4

फुटपाथ पर जब कभी भी मौत होती है
मनुजता लाचार हो तब बोझ ढोती है ।


मरते दम तक वह अकेला ही दिखा था
आज सबको देखकर एक सोच होती है ।


देखकर उसको सभी चुपचुप गुजरते थे
इस दर्द को पी रात हर रोज रोती है ।


चाँद को वह मीठी सी रोटी समझता था
भूख में कब सोचने की होश होती है ।

उम्र भर दुख भोग पहुँचा चाँद-तारों में
सोचता होगा यही तो मोक्ष होती है ।

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5

सोचकर ही दोस्तों हर बात कहूँगा
कर सको जो फैसला हर बात कहूँगा ।


आप अपने ख्यालों में खोए हुए हैं.
जब सुनो तुम गैर से हर बात कहूँगा ।


बेवजह कब कौन यहाँ सुनता किसी को
जब करो महसूस तो हर बात कहूँगा ।


अभी तो वक्त है कुछ सज सँवर लो
जब ढलेगा रूप तो हर बात कहूँगा ।

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6

मैं जिन्दगी को ऐसे जिए जाता हूँ
कि हर कदम पर ठोकरें खाए जाता हूँ ।


दुश्मनों से भी मिलाया हाथ मैंने
तभी तो सबसे मात खाए जाता हूँ ।


जिन्दगी को धरम सा समझा हमेशा
पर सियासत में उलझ ठगा जाता हूँ ।


जितना अधिक धोता स्वयं को कीच से
कीचड़ में उतना ही धँसा जाता हूँ ।

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7

मत कभी सोचो गर तुम अकेले आज हो,
बस यह क्या कम कि तुम तो अपने साथ हो ।


गगन के लाख तारे कब मिटा पाए अँधेरा,
जो हरे तम को तुम वह अकेले चाँद हो ।


आधियों के सामने तो कौन कब टिकता
पर जो बढे हर पल, वह अकेली घास हो ।


तुम कभी जग से नहीं, तुमसे जमाना है,
जिससे चले यह जग, वह अकेले आप हो ।

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8

बात करते हो गगन को गिराने की
ताकत नहीं है खुद को उठाने की ।


कहते हो जमीं पर स्वर्ग लाने को
समझ नहीं है खुद को इन्सां बनाने की ।

 

कहते हो सबके बराबर हक होंगे
यह एक चाल है खुद को छिपाने की ।

 

बात करते हो जगत को जीतने की
जरूरत है तुझे खुद को जगाने की ।

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9

सरहदों को पाकर कोई बढ़ा है
मुल्क को ललकार कर कोई बढ़ा है ।


स्वर्ग सी सुंदर जमीं पर पैर रख कर
कारगिल को छीनने कोई बढ़ा है ।


पोखरन तो आत्मरक्षा का कवच है
किस वहम को पाल फिर कोई बढ़ा है ।


जब बढ़ा तब हारकर पीछे मुड़ा है
पर भुलाकर सब विगत कोई बढ़ा है ।


मर मिटेंगे हम वतन की आबरू पर
जब कभी हमको लगे कोई बढ़ा है ।

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10

जो हिमालय चीरकर गंगा बहाते हैं,
वे पुरुष इस लोक में सत्पुत्र कहाते हैं ।


मात-पिता का रंजोगम दर्द है उनका,
जिस जगह पर वे सदा सपने खिलाते हैं ।


कपिल ने किया था भस्म जिनको शाप से,
उनकी मुक्ति से वे भगीरथ कहाते हैं ।


समय की शिला पर उनका नाम खुदता है,
जो नया इतिहास रच सबको दिखाते हैं ।


सगर बोले, गर पुत्र हो तो भगीरथ हो,
जो पिता के दर्द को झटपट मिटाते हैं ।

--

डॉ. ब्रजमोहन शर्मा के ग़ज़ल संग्रह 'ग़ज़ल' से साभार.

यद्यपि जगत में और भी अनेक प्रकार की आधि-व्याधि है पर उपाधि सबसे भारी छूत है । सब आधि-व्याधि यत्न करने तथा ईश्वरेच्छा से टल भी जाती हैं पर यह ऐसी आपदा है कि मरने ही पर छूटती है । सो भी क्या छूटती है, नाम के साथ अवश्य लगी रहती है । हां, यह कहिए सताती नहीं है 1 यदि मरने के पीछे भी आत्मा को कुछ करना-धरना तथा आना-जाना या भोगना पड़ता होगा तो हम जानते हैं उस दशा में भी यह रांड पीछा ना छोड़ती होगी । दूसरी आपदा छूट जाने पर तन और मन प्रसन्न हो जाते हैं, पर यह ऐसा गुड़भरा हंसिया है कि न उगलते बने न निगलते बने । उपाधि लग जाने पर उसका छुड़ाना कठिन है । यदि छूट जाए तो जीवन को दुखमय कर दे । संसार में थुडू-थुडू हो और बनी रहे तो उसका नाम भी उपाधि है ।

हमारे कनौजिया भाइयों में आज विद्या, बल, धन इत्यादि कोई बात बाकी नहीं रही, केवल उपाधि ही मात्र शेष रही है । ककहरा भी नहीं जानते पर द्विवेदी, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, त्रिपाठी आदि उपाधि बनी है । पर इन्हीं के अनुरोध से बहुतेरे उन्नति के कामों से वंचित हो रहे हैं । न विलायत जा सके न एक-दूसरे के साथ खा सके, न छोटा-मोटा काम करके घर का दारिद्रम् मिटा सके । परमेश्वर न करे, यदि इत दीन दशा में कोई कन्या हो गई तो और भी कोढ में खाज हुई । घर में धन न ठहरा, बिना धन बेटी का ब्याह होना कठिन है । उत्तर के ब्याह दें तो नाक कटती है । न व्याहें तो इज्जत, धर्म, पुरुषों के नाम में बट्टा लगने का डर है । यह सब आफतें केवल उपाधि के कारण हैं ।

शास्त्रों में पढ़ाने वाले को उपाध्याय कहते हैं । यह पद बहुत बड़ा है पर उपाधि और उपाध्याय दोनों शब्द बहुत मिलते हैं, इससे हमारी जाति में उपाध्याय एक नीच पदवी (धाकर) मान ली गई है । इस नाम के मेल की बदौलत एक जाति को नीच बनना पड़ा । पर नीच बने भी छुटकारा नहीं है । वे धाकर हैं, उन्हें बेटी ब्याहने में और भी रुपया चाहिए । वरंच बेटा ब्याहने के लिए भी कुछ देना ही पड़ता है । यह दुहरा घाटा केवल उपाधि के नाम का फल है । हमारे बंगाली भाई भी कान! कुल ही के हैं पर उन्होंने मुखोपाध्याय, चट्टोपाध्याय इत्यादि नामों में देखा कि उपाधि लगी है, कौन जाने किसी दिन कोई उपाधि खड़ी कर दे इससे बुद्धिमानी करके नाम ही बदल डालें, मुकर्जी, चटर्जी आदि बन गए । यह बात कुछ कनौजियों ही पर नहीं है, जिसके नाम में उपाधि लगी होगी उसी को सदा उपाधि लगी रहेगी ।

आज आप पंडित जी, बाबू जी, लाला जी, शेख जी आदि कहलाते हैं, बड़े आनंद में हैं । चार जजमानों को आशीर्वाद दे आया कीजिए या छोटा-मोटा धंधा या दस-पांच की नौकरी कर लिया कीजिए, परमात्मा खाने पहिनने को देता रहेगा । खाइए, पहनिए, पांव पसार कर सोइए, न ऊधव के लेने न माधव क देने । पर यदि प्रज्ञा, विद्यासागर, बीए, एम.ए. आदि को उपाधि चाहनी हो तो किसी कालेज में नाम लिखाइए, परदेश जाइए, 'नींद नारि भोजन परिहरही' का नमूना बनिए, पांच-सात बरस में-उपाधि मिल जाएगी । घर में चाहे खाने को न हो पर बाहर बाबू बनके निकलना पड़ेगा । चाहे भूखों मरिए पर धंधा कोई न कर सकिएगा । नौकरी भी जब आप के लायक मिलेगी तभी करना नहीं तो बात गए कुछ हाथ नहीं है ।

एक प्रकार की उपाधि सरकार से मिलती है । यदि उसकी भूख हो तो हाकिमों की खुशामद तथा गौरांगदेव की उपासना में कुछ दिन तक तन, मन, धन से लगे रहिए । कभी आप के नाम में भी सीएसआई. अथवा एबीसी. से किसी अक्षर का पुछल्ला लग जाएगा अथवा राजा, रायबहादुर, खां बहादुर अथवा महामहोपाध्याय की उपाधि लग जाएगी । पर यह न समझिए कि राजा कहलाने के साथ कहीं की गद्दी भी मिल जाएगी अथवा सचमुच के राजा आपको कुछ गनै गूंथैगे । हां, मन में समझे रहिए कि हम भी कुछ हैं, पर उपाधि की रक्षा के लिए कपड़ा-लता, हरा-मुहरा, सवारी-शिकारी, हजूर की खातिरदारी आदि में घर के धान पयार में मिलाने पड़ेंगे ।

अपने धर्म, कर्म, देश, जाति आदि से फिरंट रहना पड़ेगा, क्योंकि अब तो आपके पीछे उपाधि लग गई है! इसी से कहते हैं, उपाधि का नाम बुरा । उपाधि पाना अच्छा है सही पर ऐसा ही अच्छा है जैसा बैकुंठ जाना, पर गधे पर चढ़ के!

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हाल ही में लम्बी ग़ज़ल वाली किताब मुहाजिरनामा घर ले आया। बहरहाल, मुनव्वर साहब के दिल से निकली कुछ बातों पर गौर फरमाइए - "अगर मेरे शेर इमोशनल ब्लैकमेलिंग हैं तो श्रवण कुमार की फरमां-बरदारी को ये नाम क्यों नहीं दिया गया। जन्नत मां के पैरों के नीचे है, इसे ग़लत क्यों नहीं कहा गया। मैं पूरी ईमानदारी से इस बात का तहरीरी इकरार करता हूं कि मैं दुनिया के सबसे मुक़द्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ़ इसलिए करता हूं कि अगर मेरे शेर पढ़कर कोई भी बेटा मां की ख़िदमत और ख़याल करने लगे, रिश्तों का एहतेराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए"

मुनव्वर साहब  ने अपनी किताब ‘मां’ मे उक्त बेबाक बातें कहीं हैं। इस मशहूर शायर को इस साल के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। उनकी किताब 'शहदाबा' के लिए उन्हें उर्दू भाषा का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। वाणी प्रकाशन से छपी इस किताब में उनकी करीब 30 ग़ज़लें, 40 नज़्में और एक गीत है। अपने अंदाज़ का बाँकपन बरक़रार रखते हुए मुनव्वर फिर बोले, 'खराब खाना और खराब शायरी बर्दाश्त नहीं कर सकता। 

याद रहे कि 2013 में उर्दू के लिए जावेद अख्तर और हिंदी के लिए मृदुला गर्ग को यह पुरस्कार मिल चुका है। उर्दू अदब में कृष्ण कुमार तूर, खलील मामून, शीन काफ निजाम, गुलजार, बशीर बद्र, निदा फाजली और कैफी आजमी जैसे दिग्गज इस सम्मान की शोभा बढ़ा चुके हैं। उर्दू का पहला साहित्य अकादमी पुरस्कार 1955 में जफर हुसैन खान को मिला था। पेश हैं मुनव्वर की जिंदगी के रदीफ-काफिये - सबसे पहले ये रहे शहदाबा से कुछ शेर -

आंखों को इन्तिज़ार की भट्टी पे रख दिया

मैंने दिए को आंधी की मर्ज़ी पे रख दिया

अहबाब का सुलूक भी कितना अजीब था

नहला धुला के मिट्टी को मिट्टी पे रख दिया

सच बोलने में नशा कई बोतलों का था

बस यह हुआ कि मेरा गला भी उतर गया

और लीजिये पढ़िए राणा साहब की बुनियादी फितरत का बयां करती एक लाज़वाब ग़ज़ल -

हसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते

बच्चे है तो क्यो शौक से मिट्ठी नहीं खाते


तुझ से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन

तुझसे न मिलेंगे ये कसम  भीं नही खाते


सो जाते है फुटपाथ पे अखबार बिछाकर

मजदूर कभी नींद की गोली नही खाते


बच्चे भी गरीबी को समझने लगे शायद

अब जाग भी जाते है तो सहरी नहीं खाते


दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे कलंदर

हर एक के पैसे की दवा भी नहीं खाते


अल्लाह गरीबो का मददगार है 'राना'

हम लोगो के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते

ये रही मुहाजिरनामा की चर्चा जिसे इस लेख के शुरूआत में मैंने जानबूझकर कुछ देर तक मुल्तवी कर रखा था। तो बात ऎसी है कि सन 1947 की कड़वी यादों ने कुछ लोगो को ताउम्र के लिए आंसू दिए जिनमे उनके अपने सीमापर कर नए मुल्क, नयी आज़ादी की उम्मीद में पाकिस्तान में चले गए परन्तु वहा उनको अपनापन नहीं मिला। भारत से गए इन लोगो को वहा मुज़ाहिर (निर्वासित ) का नाम दिया गया। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने उनके इस दर्द को अपने अल्फाज़ दिए है, कहा जाता है की ये 'मुज़ाहिर नामा' उन्होंने अपने किसी सम्बन्धी से प्रेरित होकर लिखा था जो कुछ दिन बाद भारत यात्रा पर वापस आये थे। तो कुछेक शेर मुलाहिज़ा फरमाइए -

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,

तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है,

कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,

पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,

वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।


अंत में रिश्तों के सरोकार को आवाज़ देते मुनव्वर साहब के कुछ अशआर और साझा कर लूँ तो कोई बात बने -


लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है,

मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूं, हिन्दी मुस्कुराती है


उछलते खेलते बचपन में बेटा ढूंढती होगी,

तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है,


तभी जा कर कहीं माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है,

कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है


चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है,

कली जब सो के उठती है, तो तितली मुस्कुराती है

हमें ऐ ज़िन्दगी तुझ पर हमेशा रश्क आता है,

मसाइल से घिरी रहती है,फिर भी मुस्कुराती है

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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

लेखक दिग्विजय कालेज,

राजनांदगांव में प्राध्यापक हैं।

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आजकल भारवाहक, मालवाहक आदि से भी अधिक संख्या में वे लोग हैं जो इधर की उधर, उधर की इधर करने के आदी हैं। अपने आप को किसी छोटे-मोटे कियोस्क से लेकर हाथगाड़ी और ठेलागाड़ी के रूप में ढाल चुके ये लोग हमेशा वाहक, संवाहक और मालवाहक की भूमिका में हुआ करते हैं।

इन बिना दिमाग की दुकानों में अपना कोई माल नहीं होता बल्कि हमेशा पराये माल को अपने में जमा करते हैं और इसमें नमक-मिर्च लगाकर और बहुधा फ्रॉय कर दूसरों तक पहुंचाते हैं और इस पूरी यात्रा में आवागमन, गंध और क्रिया-प्रतिक्रियाओं का आनंद पाते हैं।

कहने को भगवान ने इन्हें दुर्लभ और बेशकीमती देह से नवाजा है लेकिन अपनी देह की कीमत ये मरते दम तक नहीं समझ पाते। इनकी देह का मूल्य दूसरे लोग अच्छी तरह आँक लिया करते हैं और उसी हिसाब से इनका बेचान और खरीदी कर लिया करते हैं।

इन्हें कैसे, कब और कहाँ बेचना है, इनका खरीदार कौन होगा, यह बेचने वाले सब कुछ जानते हैं और बेचान-खरीद का समय और ठीक-ठाक घड़ी भी इन्हें अच्छी तरह पता होती है।

आजकल बहुत सारे लोग इसी प्रकार के हो गए हैं। अब समय बहुद्देश्यीय व बहुआयामी परिवहन का है। सब लोग इधर से उधर कर रहे हैं अथवा करना चाहते हैं। सब के पीछे अपने ही अपने नाम, काम और संसाधनों का मोह व्याप्त है और मोह के घने बादलों के बीच जीते हुए सभी अपनी ही अपनी मान-बड़ाई में रमे हुए हैं।

इन दिनों इधर से उधर करने वाले लोगों की प्रजाति सर्वाधिक प्रचलन में है। पहले केवल वाणिक विलास और अफवाहों के भरोसे ही इधर-उधर करने की परंपरा चल रही थी। अब संचार क्रांति ने हमें बहुत सारे संसाधन दे दिए हैं जिनका इस्तेमाल हम कहीं भी बैठे कर सकते हैं।

इससे बड़ी सुविधा हमें और कोई नहीं दे सकता। हमारे लिए कितना अधिक आसान हो गया है इधर की उधर करना। हममें से अधिकांश लोगों का रोजमर्रा का काफी हिस्सा इसी में गुजर रहा है।

हमारी पूरी की पूरी दिनचर्या और रात्रिचर्या अब मैसेज पढ़ने, फोटो एव वीडियो देखने का आनंद पाने और दूसरों तक पहुंचाकर स्वर्ग समान सुख प्राप्त करने, अपने आपको सबसे पहले जागरुकता का पहरूआ सिद्ध करने, महान आविष्कारक, चिन्तक, कल्पनाशील और विद्वान सिद्ध करने के सदुपयोग में ही काम आ रहा है।

अब तो लगता है कि हमारा जन्म ही इधर से उधर करने के लिए हुआ है। हमारा अपना कुछ नहीं, जो आ रहा है, उसे ही दूसरों के पास भेजा जा रहा है। हम जो कुछ ले रहे हैं, यहीं से ले रहे हैं, जो दे रहे हैं यहीं दूसरों को दे रहे हैं। इससे बड़ा गीता का कर्मयोग अपनाने वाला हमारे सिवा और कौन हो सकता है।

धन्य हैं वे लोग जो इधर की उधर करते हुए जमाने भर में हलचल बनाए रखते हैं और अपना वजूद भी सिद्ध करते हैं, साथ ही अपनी तरह के दूसरे संवाही और मालवाही लोगों के अस्तित्व को परिपुष्ट करते रहते हैं।

हम सभी को पूरी ईमानदारी के साथ यह स्वीकार करना ही होगा कि जो लोग इधर-उधर की करने में माहिर हैं वे अपने पिछले जन्म में जरूर भाड़े के टट्टू ही रहे होंगे। और इनमें भी जो लोग अभिजात्यों की बस्तियों में रहने वाले हैं वे केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, वैष्णोदेवी, अमरनाथ सहित पर्वतीय तीर्थों में या तो खच्चरों की भूमिका में रहे होेंगे या फिर बिजनैसी टट्टूओं के रूप में भाड़ा लेकर इधर का उधर करने के आदी रहे होंगे। और इसी तीर्थ यात्रा के पुण्य की बदौलत  अभिजात्य परिवारों में पैदा हो गए हैं। 

पर भाड़े के टट्टूओं के पुराने संस्कार कहाँ जाएं। अब भार पीठ पर न सही, अपने दिमाग और दिल में सारी दुनिया का बोझ उठा कर चलते हैं और यहाँ-वहाँ इसे उतारते-लादते रहते हैं। यही उनका जीवन हो गया है, जीवन का लक्ष्य हो गया है।

पुरानी आदतों से लाचार इन लोगों को यह तक पता नहीं है कि आखिर इस जनम में जो कुछ ये लोग कर रहे हैं, वह उनकी पूर्वजन्म की आदत है जो अभिजात्यों के संग रहते हुए पॉवर और मनी का खाद-बीज पाकर पल्लवित और पुष्पित हो रही हैं तथा यही कारण है कि सब कुछ होते हुए भी ये अपनी इधर से उधर करने की आदत को छोड़ नहीं पा रहे हैं।

इनकी इसी आदत की वजह से दुनिया में बहुत सारे लोग रोजाना परेशान हो रहे हैं और इनका किसी न किसी प्रकार से खामियाजा भुगत रहे हैं। पूर्व जन्म के संस्कार जाएं तो कहाँ जाएं?  बरसों तक भाड़े के टट्टूओं की तरह चाबुक खा-खाकर सामान और इंसानों का भार ढोने वाले इन भाड़ाई टट्टूओं के भरोसे बहुत सारे लोग जी रहे हैं, आगे बढ़ते जा रहे हैं।

इस प्रकार सब तरह के टट्टू परस्पर एक-दूसरे के काम आ रहे हैं, अहो रूप - अहो ध्वनि के साथ आगे बढ़ रहे हैं और पूरी दुनिया में इधर से उधर करने के तमाम तिलस्मों का सहारा लेकर अपना वजूद सिद्ध कर रहे हैं।

हर तरफ इन्हीं का बोलबाला है। लोग-बाग भी इनसे हैरान हैं क्योंकि इस प्रजाति का कहीं कोई भरोसा नहीं होता। कब किसके बारे में क्या कान भर दें, कौन सा मंत्र फूूंक डालें, किस बात पर किसी को भरमा डालें, कुछ नहीं कहा जा सकता है।

असल में ये ही वे लोग हैं जो कि समाज और देश के लिए किसी भी समय घातक हो सकते हैं, जब कहीं इनका कोई सा स्वार्थ जग जाए, ये न देश की परवाह करते हैं, न समाज की।

एक बार जब कोई इंसान बिकाऊ हो जाता है, जिसका मोल-भाव तय हो जाता है, उसे कोई भी खरीद सकता है। ऎसे लोग स्वामीभक्त नहीं हो सकते, किसी के वफादार नहीं हो सकते, और इन्हें किसी भी प्रकार से भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।  सवाल इस बात का नहीं है कि कौन कितने मूल्य में बिकने वाला है।

बात इसी पर आधारित है कि बिकना शुरू हो जाना अपने आप में बिकाऊ हो जाने की यात्रा का शुभारंभ है फिर चाहे मूल्य कुछ भी क्यों न हो। अमूल्य का जब मूल्य निर्धारण हो जाता है तब वह मूल्यहीन हो जाता है। हमारे आस-पास भी ऎसे खूब सारे लोग हैं जो धडल्ले से बिक रहे हैं, और अपने आपको बिकाऊ मान कर भी स्वाभिमानी और सम्मानित कहने लगे हैं। इन्हें शर्म भी नहीं आती अपने आप पर।

यह जरूरी नहीं कि कोई वैभवशाली इंसान ही खरीद सकता हो। ऎसे बिकने वालों की कीमत कोई भी लगा सकता है। कोई अपराधी भी इन्हें खरीद सकता है और कोई दलाल भी, कोई हैवान भी खरीद सकता है और दूसरों का कोई सा गुलाम भी।

बाजार भरे पड़े हैं बिकने वालों से और खरीदने वालों से।  एक बार जब मण्डी में किसी ने अपना मोल लगा लिया, फिर क्या फर्क पड़ता है, एक बार बिके या बार-बार बिकता चला जाए। जो एक बार बिकाऊ हो जाता है, उसकी सारी लाज-शरम टूट जाती है।

वह सैकड़ों-हजारों और लाखों बार बिक जाने को सदैव तैयार रहता है। बिकाऊ किसी के यहाँ टिकाऊ नहीं हुआ करते। ये बिकने के लिए ही पैदा हुए हैं और मरते दम तक बिकते रहेंगे।  ये न पूछो कि कितनी बार यों ही बिकते रहेंगे, कितने में  बिकते रहेंगे और इन्हें बिकने की क्या जरूरत है। 

इंसान के कुछ शौक ऎसे होते हैं जिनका कोई सामाजिक, प्राकृतिक और वैज्ञानिक आधार नहीं होता, एक बार कुछ अच्छा लग जाए, मन-तन को भा जाए, तो फिर सारी लाज-शरम छोड़ कर वह उसे अपनाएगा ही।

उसका अपना आनंद है, औरों को इससे दुःखी  या परेशान होने की जरूरत नहीं है। ये ही अप्राकृतिक चरित्र वाले लोग हैं जिन्हें इधर-उधर की करने में मजा आता है। इनसे दूरी बनाए रखें और इनकी अस्वाभाविक हरकतों से बेफिक्र होकर आगे बढ़ते रहें।

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दीपक आचार्य के प्रेरक आलेख inspirational article by deepak aacharya

- डॉ0 दीपक आचार्य

dr.deepakaacharya@gmail.com

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(ऊपर का चित्र - कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)

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