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रवीश कुमार का व्यंग्य - नए वर्ष की दुर्भावनाएँ

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ये शुभकामना नहीं दुर्भावना है ठाकुर (आमतौर पर इंटरनेट की सामग्री को रचनाकार में रीसायकल नहीं किया जाता. यदा कदा अपवाद स्वरूप कुछ सामग्री अलबत्ता साझा जरूर की जाती है. प्रस्तुत आलेख सर्वत्र साझा करने योग्य है - बारंबार. आनंद लें, और तनिक विचारें!)सालागमन की पूर्व बेला पर नया लिखने के लिए कुछ नहीं है । सारी बातें कही और लिखी जा चुकी हैं । लोग इस कदर बोर हो चुके हैं कि शुभकामनाओं की रिसाइक्लिंग करने लगे हैं । शुभकामनाओं का भी अर्थशास्त्र के सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम के तहत मूल्याँकन होना चाहिए । एक ही शुभकामना अगर कई लोगों से होते हुए आप तक पहुँचे तो उसका क्या असर होगा । कई साल से इस्तमाल में हो तब क्या कोई असर बाकी रह सकता है । गन्ने की तरह हमने शुभकामनाओं से रसों को आख़िरी बूँद तक निचोड़ लिया है । मैं समझ सकता हूँ कि सबके लिए अलग से शुभकामना लिखने का न तो वक्त है न हुनर । जिनको अंग्रेज़ी नहीं आती उनका अंग्रेज़ी में न्यू ईयर विश देखकर टेंशन में आ जाता हूँ कि ये कब सीख लिया इसने । हर शुभकामना में समृद्धि
होती है । क्यों होती है और इससे क्या हम समृद्ध होते हैं ? कुछ लोग हैप्पी न्यू ईयर क…

ताराशंकर वंदोपाध्याय की कहानी – दीपा का प्रेम

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ताराशंकर वंदोपाध्याय की कहानी – दीपा का प्रेम यह मुझे पता था। कितनी बार मैंने कहा था। मगर कौन सुनता है। मैं क्या कोई आदमी हूँ कि मेरी बात सुनी जाए। अब हुआ, वही बात हुई न? चटर्जी गृहिणी ने तीन बार ‘अब हुआ’ कहने के बाद अपने माथे को तीन बार पीट लिया। चटर्जी यानी भवनाथ चटर्जी बंगाल के जाने-माने व्यक्ति थे। सिर्फ बंगाल में ही क्यों, वे भारत भर में प्रसिद्ध थे। वे अध्यापक और दार्शनिक थे। गंभीर प्रकृति के व्यक्ति थे। उनकी आर्थिक हालत ठीक थी। उन्होंने गला खंखारकर कहा 'मैं अपनी गलती मानता हूं। बार-बार स्वीकार करता हूं कि मुझे तुम्हारी राय मान लेनी चाहिए थी। अब तुम इस तरह से अपने माथे को पीटना बंद करो। ' चटर्जी -गृहिणी को और गुस्सा आ गया। उन्हें लगा उनके पति ने जैसे इस प्रकार की बातों से उनके बदन को गर्म छत्रे से दाग दिया हो। वे चिल्लाती हुई बोलीं, 'हर्गिज नहीं। मैं चुप नहीं रहूंगी, हर्गिज नहीं। 'क्या करोगी ? बताओ? क्या करना चाहती हो? 'क्या चाहती हूं 'हां ' यह पता हो जाए तो फिर मैं अपने अपराध का प्रायश्चित कर लूंगा। बताओ, मैं वही करूं। भवनाथ की पत्नी की उम्र साठ से ज…

दीपक आचार्य का नूतनवर्षाभिनंदन प्रेरक आलेख - बोझ त्यागने का वक्त आ गया

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(छाया - प्रमोद यादव)वक्त आ ही गया हैबोझ त्यागने का- डॉ. दीपक आचार्य9413306077 dr.deepakaacharya@mail.comआसमाँ की ऊँचाई पाना हममें से हर कोई चाहता है लेकिन उड़ान भरने लायक तैयारी कितने लोग कर पाते हैं, यह सोचने का विषय है। सभी की तमन्ना रहती ही है कि हर दृष्टि से हमारा कद, पद और प्रतिष्ठा बढ़े, हमारा व्यक्तित्व आसमान की ऊँचाइयां प्राप्त करे, और वह मुकाम पाए कि दुनिया में जहाँ कहीं पर हों, अपेक्षाकृत उच्च से उच्च स्थान पाते रहें और निरन्तर शीर्ष पर रहने का आनंद पाते रहें। यह शीर्ष बादलों और आसमान की तरह होना चाहिए जहाँ रहकर हम जमाने भर को देख भी सकें, आनंद भी पा सकें और दूसरों को आनंद से सरोबार भी कर सकें। अपना यह आनंद किसी का मोहताज न रहे, स्वेच्छा और संप्रभुता से हमें सब कुछ प्राप्त होता रहे। हम भी आनंदित होते रहें, औरों को भी  जी भर कर आनंदित करते रहेंं। सभी को सामूहिक ऊँचाइयों को पाने के अवसर प्राप्त हों, किसी को किसी दूसरे से ईष्र्या या भय न रहे, सभी लोग अपने-अपने हिसाब से आगे बढ़ते रहें, काम करते रहें और दुनिया को वह सब कुछ दे सकें जिसके लिए हमारा अवतरण हुआ है। हर साल के आखिर म…

प्रमोद यादव के नववर्षाभिनंदन चित्र

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स्वागत...नव वर्ष का...प्रमोद यादव प्रमोद यादव

प्रमोद भार्गव का आलेख - लीजिए, पेश है बोतल-बंद ताज़ी हवा.

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सदियों पहले किसी ने सोचा नहीं होगा कि बोतलों में पानी बिकेगा. आज यह वास्तविकता है. इसी तरह बोतलों में ताजी हवा मिलने लगी है. मनुष्य ने प्रकृति के सत्यानाश की ओर कदम बढ़ा लिए हैं.बाजार में बोतलबंद हवा प्रमोद भार्गव व्यावसायिक बुद्धि और नवोन्मेष की ललक हो तो बाजार में उम्मीदों के नए-नए द्वार आसानी से खुल जाते हैं। वैसे भी संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता। वाकपटु लोग गंजों को भी कंघी बेचने में कामयाब हो जाते हैं। कनाडा की कंपनी 'वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक'ने कुछ ऐसा ही अनूठा करिश्मा कर दिखाया है। कंपनी ने वनाच्छादित पहाड़ों और जंगलों की हवा को बोतलबंद पानी की तरह बेचने का धंधा शुरू किया है। बोतल में बंद हवा बेचने का यह अवसर दुनिया में बढ़ते वायु प्रदुषण ने दिया है। दूषित हवा से बेचैन और पीड़ित लोग इसे हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। महानगरों में बढ़ता वायु प्रदुषण,दूषित औद्योगिक कचरे और कारों से उगलते धुंए को माना जा रहा है। औद्योगिक घरानों के दबदबे के चलते औद्योगिक उत्पादन घटाना तो मुश्किल है,ऐसे में कारोबारियों को बोतलबंद हवा के रूप में नया सुरक्षा कवच मिल गया है। जाहिर है,भारत समेत दुनिया क…

नूतनवर्षाभिनंदन कविताएँ

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दोहे रमेश के नववर्ष पर
पन्नो मे इतिहास के, लिखा स्वयं का नाम !
दो हजार पंद्रह  चला,.....यादें छोड तमाम !!दो हजार पंद्रह  चला, छोड सभी का साथ !
हमें थमा कर हाथ में, नये साल का हाथ !!ढेरों मिली बधाइयाँ,........बेहिसाब संदेश !
मिली धड़ी की सूइंयाँ,ज्यों ही रात "रमेश"!!मदिरा में डूबे रहे, ......लोग समूची रात !
नये साल की दोस्तों, यह कैसी सुरुआत !!नये साल की आ गई, नयी नवेली भोर !
मानव पथ पे नाचता,जैसे मन मे मोर !!नये साल का कीजिये, जोरों से आगाज !
दीवारों पर टांगिये, .नया कलैंडर आज !!घर में खुशियों का सदा,. भरा रहे भंडार !
यही दुआ नव वर्ष मे,समझो नव उपहार !!आयेगा नववर्ष में, ...शायद कुछ बदलाव !
यही सोच कर आज फिर, कर लेता हूँ चाव !!
रमेश शर्मा, मुंबई.
9820525940.rameshsharma_123@yahoo.com-----------------
नये वर्ष मेंगीत खुशी के मिलकर गाएँ नये वर्ष में।
समरसता के दीये जलाएँ नये वर्ष में।
जीवन की सूनी राहों को रोशन कर,
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष में।बीज प्यार के मन में बोएँ नये वर्ष में।
सपने नये-नये संजोएँ नये वर्ष में।
कुछ करने की क़समें खाएँ नये वर्ष में।
जन-मन में उल्लास जगाएँ नये वर्ष मे…

शैलेन्द्र सरस्वती की कहानी - बन जा सांप!

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बन जा सांप!कहानी- शैलेन्द्र सरस्वती................................................................................................................................सदियों-सदियों पहले की बात है। हमारे देश भारत में एक सहस्रपाद नाम के ऋषिकुमार थे। सहस्रपाद में दूसरे ऋषिकुमारों की तरह उत्कृष्ट गुण तो थे लेकिन एक बहुत बड़ा अवगुण भी था। मौके-बे मौके वे अपने रिश्तेदारों,दोस्तों को हंसी-हंसी में चौंका व डरा दिया करते थे। अब आस-पास के लोग उनकी इस आदत से परिचित होने के कारण उनकी मजाकिया हरकतों पर गुस्सा नहीं होते थे..नजरअंदाज कर जाते थे।सहस्रपाद के आश्रम के समीप ही उनके एक मित्र रहते थे-खगम। खगम एक कठोर तपस्वी तथा परम सत्यवादी युवक थे। अपने सद्चरित्र के कारण वे लोगों में काफी लोकप्रिय थे। खगम यूं तो बड़े साहसी स्वभाव के थे। अब जो सदैव सत्य बोलता हो,उसे भय हो तो किसका?...बस,खगम डरते थे तो मात्र सांपों से। सांप देखा नहीं कि उनकी घिघ्घी बंध जाती।एक बार खगम हवन कर रहे थें। तभी सहस्रपाद वहां से गुजरे। उन्होंने खगम को हवन करते देखा तो मन में एक शरारत करने की सूझी। उन्होंने तुरंत पास के मैदान की सूखी घास…

ब्रजमोहन शर्मा की 10 ग़ज़लें

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1 रंगों के उत्सव में सब एक रंग हो जाओ
भेदभाव भूलकर सारे सबको गले लगाओ ।
चौपालों पर जमी हुई हुल्लड़बाजी में
शामिल हो होली को सबके साथ मनाओ ।
जो जीवन से लड़ते लड़ते ऊब चुके हैं
उन सबको आज फाग का राग सुनाओ ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई उठो और
सब मिलकर होली का उत्सव आज मनाओ ।
नए अन्न की खुशबू से आन्दोलित हो
दसों दिशा में गूँज उठाता ढोल बजाओ ।
प्रह्‌लाद जीवन सच है और झूठ होलिका
जीवन-सच सच बने होलिका आज जलाओ ।-------- 2 कुछ कहो पर सोच लो वह काम का है
जब मिलो उससे मिलो जो काम का है ।
जिन्दगी के अनुभवों से खुद कहोगे
आँख का तारा वही जो काम का है ।
देखकर उसको कभी मैं सोचता हूँ
काश मैं भी जानता वह काम का है ।
गर बदलकर खुद उसे तुम देख पाते
तो हमेशा सोचते वह काम का है ।-----------3अपनी जरूरत कम करो तो देखिए
जो है उसे सब कुछ कहो तो देखिए ।
तुम चाहो हर समय हो पास में
मन में उसे सोचा करो तो देखिए ।
गर चाहो तुम कमल-सा खिलकर रहो
तो हर सवेरे भास्कर को देखिए ।
सोचिए तो दिल सभी का एक मंदिर है
जिसमें सदा भगवान को तो देखिए ।----------4फुटपाथ पर जब कभी भी मौत होती है
मनुजता लाचार हो तब बोझ ढोती है ।
मरते दम तक वह अकेला ही दिखा था
आज सबको दे…

प्रतापनारायण मिश्र का व्यंग्य - उपाधि

यद्यपि जगत में और भी अनेक प्रकार की आधि-व्याधि है पर उपाधि सबसे भारी छूत है । सब आधि-व्याधि यत्न करने तथा ईश्वरेच्छा से टल भी जाती हैं पर यह ऐसी आपदा है कि मरने ही पर छूटती है । सो भी क्या छूटती है, नाम के साथ अवश्य लगी रहती है । हां, यह कहिए सताती नहीं है 1 यदि मरने के पीछे भी आत्मा को कुछ करना-धरना तथा आना-जाना या भोगना पड़ता होगा तो हम जानते हैं उस दशा में भी यह रांड पीछा ना छोड़ती होगी । दूसरी आपदा छूट जाने पर तन और मन प्रसन्न हो जाते हैं, पर यह ऐसा गुड़भरा हंसिया है कि न उगलते बने न निगलते बने । उपाधि लग जाने पर उसका छुड़ाना कठिन है । यदि छूट जाए तो जीवन को दुखमय कर दे । संसार में थुडू-थुडू हो और बनी रहे तो उसका नाम भी उपाधि है । हमारे कनौजिया भाइयों में आज विद्या, बल, धन इत्यादि कोई बात बाकी नहीं रही, केवल उपाधि ही मात्र शेष रही है । ककहरा भी नहीं जानते पर द्विवेदी, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, त्रिपाठी आदि उपाधि बनी है । पर इन्हीं के अनुरोध से बहुतेरे उन्नति के कामों से वंचित हो रहे हैं । न विलायत जा सके न एक-दूसरे के साथ खा सके, न छोटा-मोटा काम करके घर का दारिद्रम् मिटा सके । परमेश्वर न…

चन्द्रकुमार जैन का विशेष आलेख - मजदूर कभी नींद की गोली नहीं खाते !

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हाल ही में लम्बी ग़ज़ल वाली किताब मुहाजिरनामा घर ले आया। बहरहाल, मुनव्वर साहब के दिल से निकली कुछ बातों पर गौर फरमाइए - "अगर मेरे शेर इमोशनल ब्लैकमेलिंग हैं तो श्रवण कुमार की फरमां-बरदारी को ये नाम क्यों नहीं दिया गया। जन्नत मां के पैरों के नीचे है, इसे ग़लत क्यों नहीं कहा गया। मैं पूरी ईमानदारी से इस बात का तहरीरी इकरार करता हूं कि मैं दुनिया के सबसे मुक़द्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ़ इसलिए करता हूं कि अगर मेरे शेर पढ़कर कोई भी बेटा मां की ख़िदमत और ख़याल करने लगे, रिश्तों का एहतेराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए" मुनव्वर साहब  ने अपनी किताब ‘मां’ मे उक्त बेबाक बातें कहीं हैं। इस मशहूर शायर को इस साल के साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया है। उनकी किताब 'शहदाबा' के लिए उन्हें उर्दू भाषा का साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। वाणी प्रकाशन से छपी इस किताब में उनकी करीब 30 ग़ज़लें, 40 नज़्में और एक गीत है। अपने अंदाज़ का बाँकपन बरक़रार रखते हुए मुनव्वर फिर बोले, 'खराब खाना और खराब शायरी बर्दाश्त नहीं कर सकता।  याद रहे कि 201…

दीपक आचार्य का प्रेरणादायी आलेख - भाड़े के टट्टू करते हैं इधर की उधर

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आजकल भारवाहक, मालवाहक आदि से भी अधिक संख्या में वे लोग हैं जो इधर की उधर, उधर की इधर करने के आदी हैं। अपने आप को किसी छोटे-मोटे कियोस्क से लेकर हाथगाड़ी और ठेलागाड़ी के रूप में ढाल चुके ये लोग हमेशा वाहक, संवाहक और मालवाहक की भूमिका में हुआ करते हैं। इन बिना दिमाग की दुकानों में अपना कोई माल नहीं होता बल्कि हमेशा पराये माल को अपने में जमा करते हैं और इसमें नमक-मिर्च लगाकर और बहुधा फ्रॉय कर दूसरों तक पहुंचाते हैं और इस पूरी यात्रा में आवागमन, गंध और क्रिया-प्रतिक्रियाओं का आनंद पाते हैं। कहने को भगवान ने इन्हें दुर्लभ और बेशकीमती देह से नवाजा है लेकिन अपनी देह की कीमत ये मरते दम तक नहीं समझ पाते। इनकी देह का मूल्य दूसरे लोग अच्छी तरह आँक लिया करते हैं और उसी हिसाब से इनका बेचान और खरीदी कर लिया करते हैं। इन्हें कैसे, कब और कहाँ बेचना है, इनका खरीदार कौन होगा, यह बेचने वाले सब कुछ जानते हैं और बेचान-खरीद का समय और ठीक-ठाक घड़ी भी इन्हें अच्छी तरह पता होती है। आजकल बहुत सारे लोग इसी प्रकार के हो गए हैं। अब समय बहुद्देश्यीय व बहुआयामी परिवहन का है। सब लोग इधर से उधर कर रहे हैं अथवा करना …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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