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January 2015
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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(कविता)
मां
कितना कष्ट उठाती होगी
जब गर्भ से रहती होगी मां
करती होगी परहेज कितना
जब गर्भ में पलता है लल्ला।

क्या है उसे खाना
क्या नहीं खाना
रखती है हरदम
ख्याल अपना।

असहनीय दर्द भी
कभी कमर कभी घुटने
कभी उदर पीड़ा को भी
सहती है मां।

जब होता है प्रसव तो
पीड़ा कितनी उठाती होगी मां
ये तो वही जाने
जिसने झेली होगी प्रसव पीड़ा।

बाद प्रसव के तो
मल-मूत्र में ही
लिपटी सी रहती है मां
आती है गंध कुछ
अजीब सी वहां
जहां प्रसव के बाद
होती है संग लल्ला के मां।

सोती है खुद
बिस्तर गीले में
सुलाती है सूखे में
लल्ला को मां।

तड़प उठती है
मां की ममता
जब जी तोड़ के
रोता है लल्ला।

उठाती है दौड़ के
लगाती है सीने से
काम सारे छोडकर
पिलाती है दूध
आंचल अपने में
छिपाकर मां।

हाथों को अपने बनाती है
झूला मां
हिलारती-दुलारती
गाती है लोरिया
दिल के टुकड़े को
सुलाने को मां।

ताकि निपटाले काम सारे
घर के तसल्ली से मां।

पकड़कर हाथ अपने से
सिखाती है चलना मां
सपने सैकड़ों दिल में
संजोंये रहती है मां।

 

 

 


(कविता)
(कर्मवीर)

कर्मवीर बन बढ़ता चल तू
लक्ष्य अपना चुन लेना तू
कठिन विपदाएं भी है आगें
पीछे कभी न हटना तू।।

जग जीवन की पीड़ा गहरी
करले दिल से सच्ची करनी
ईश्वर को सब याद है तेरी
पंहुचे इक दिन मंजिल अपनी।।
कर्मवीर बन बढ़ता चल तू
लक्ष्य अपना चुन लेना तू
कठिन विपदाएं भी है आगें
पीछे कभी न हटना तू।।

राह में तेरे विकट है मंजर
कंकड़ पत्थर झाड़-झंड़कर
हृदय हो तेरा पाक समन्दर
दूर न कोई तुझसे मंजिल।।

कर्मवीर बन बढ़ता चल तू
लक्ष्य अपना चुन लेना तू
कठिन विपदाएं भी है आगें
पीछे कभी न हटना तू।।

 

        )

 

 

 



(एकता का मंत्र)

हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
हम सब एक दूजे के भाई
मजहब चाहे अलग-अलग
खून तो एक है सबकाई।।

जात-पात भेदभाव का
नहीं किसी के रोग हो
सबका मालिक एक है
ऐसा सबका सोच हो।।

अनेकता में एकता का
सबमें बड़ा जोश हो
रीति-रिवाज़ वेशभूषा
चाहें सबकी अनेक हो।।

आजादी की वर्षगांठ पर
मंच हमारा एक हो
डांगोरिया एक है हम
गुलशन हमारा एक हो।।

 

 

 



सज्जनता
जो तुम सज्जन बनना चाहो
सबसे प्रीत करो भाई
जाति सम्प्रदाय का भेद मिटादो
घट-घट बिराजे हैं सांई।।

सद् कर्मों से ही मानव तो
बन पाता है सदाचारी
छल-कपट को मन से त्यागो
ये तो बड़े ही दुराचारी।।

जो तुम सज्जन बनना चाहो
सबसे प्रीत करो भाई
जाति सम्प्रदाय का भेद मिटादो
घट-घट बिराजे हैं सांई।।

धन यौवन के लालच में तुम
मत बनना अत्याचारी
दुर्गुण दिल से बाहर करदो
कितने ही मर गये बलकारी।।

जो तुम सज्जन बनना चाहो
सबसे प्रीत करो भाई
जाति सम्प्रदाय का भेद मिटादो
घट-घट बिराजे हैं सांई।।

अविद्या विकारो में डांगोरिया
कितने ही चले गये अभिमानी
अपना आचरण नहीं सुधारा
अन्त हो गये नरक गामी।।

जो तुम सज्जन बनना चाहो
सबसे प्रीत करो भाई
जाति सम्प्रदाय का भेद मिटादों
घट-घट बिराजे हैं सांई।।

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जीवन का आधार

जीवन का है यही आधार
सादा जीवन उच्च विचार।।

काम, क्रोध और लोभ तो दुश्मन
इनसे मिले नरक का द्वार।।

जीवन का है यही आधार
सादा जीवन उच्च विचार।।

काम तो वासनाओं का भंडार
जिसमें मोहित सब संसार।।

जीवन का है यही आधार
सादा जीवन उच्च विचार।।

क्रोध है बुद्धि का सरताज
करता हानि बिना विचार।।

जीवन का है यही आधार
सादा जीवन उच्च विचार।।

लोभ न करता किसी से प्यार
अपना पराया सब बेकार।।

जीवन का है यही आधार
सादा जीवन उच्च विचार।।

डांगोरिया मत उलझो यार
यह तो सारे मन के विकार।।

जीवन का है यही आधार
सादा जीवन उच्च विचार।।


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है नाथ अब अवतार धरो

है नाथ अब अवतार धरो
पीड़ित प्रजा विषम स्थिति
सज्जन जन कल्याण करों
है नाथ अब अवतार धरो।।

तेरा जग ये तेरी प्रजा
तेरा ही गुणगान यहां
सज्जन मानव तड़प रहा है
बढ़ रही हिंसा घोर यहां।।

है नाथ अब अवतार धरो
पीड़ित प्रजा विषम स्थिति
सज्जन जन कल्याण करो
है नाथ अब अवतार धरो।।

युग-युग तुमने अवतरित होकर
हिंसा का सर्वनाश किया
अब क्यों विलम्ब करो तुम प्रभु
पाप का भार हटाओ धरा।।

है नाथ अब अवतार धरो
पीड़ित प्रजा विषम स्थिति
सज्जन जन कल्याण करो
है नाथ अब अवतार धरो।।

डांगोरिया कर जोड़ पुकारे
भक्त जनों की हरलो पीड़ा
भक्त सज्जन आस करें तेरी
धर्म स्थापित करों यहां।।

है नाथ अब अवतार धरो
पीड़ित प्रजा विषम स्थिति
सज्जन जन कल्याण करो
है नाथ अब अवतार धरो।।

                   

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ये इतिहास भी याद करो

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

गुरू द्रोण तो घृणा कर गये
धनुष विद्या सिखाने में
एकलव्य का अंगूठा लीना
छल किया था वन में
दलित वर्ग में आज भी उनको
नही कोई सम्मान मिला।
कौरव दल में शामिल हुये तो
आखिर उनका अन्त हुआ।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

शुद्र वर्ण में जन्मी भीलनी
सत्य भक्ति मन में
झूठे बैर राम ने खाऐं
नहीं घृणा थी मन में।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

दासी पुत्र विदुर जी हो गये
हो गये द्वापर युग में
दुर्योधन के मेवा त्याग हरि
साग विदुर घर खावें जी।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

काशी नगर में राजा हरिश्चन्द्र
बढ़े हुए थे सत्यवादी
कलुआं मेहतर के रहे चाकर
मरघट की थी रखवाली।।
ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

शुद्र वर्ण है केवट जाति
महाभारत में सत्यवती
जिसके पुत्र रिषि वेदव्यास
कौरव पांडव वंशधनी।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

शूद्र वर्ण में हुए रविदास
भक्त हुये थे शिरोमणी
रतनसिंह राजा की बेटी
मीरा हो गई थी चेली।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

नारद रिषि थे चतुर सुज्ञानी
सर्व विद्या परवीना
शूद्र धींवर से दीक्षा लेकर
तीन लोक यश कीना।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।।

युग-युग महिमा कहां तक वर्णु
जिसका कोई पार नही
डांगोरिया हरि अनन्त है लीला
मेरी कोई औकात नही।।

ये इतिहास भी याद करों
घृणा का परित्याग करों
घट-घट एक सांई बिराजे
सबका ही सम्मान करों।

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जागो अब देश की नारी

जागो अब देश की नारी
यह अभियान चलाना है।
भ्रष्टाचार मिटाकर अब तो
स्वच्छ राज अब लाना है।।

सरकारी सेवा में पति तो
उनको यह समझाना है।
वेतन के अलावा पैसा लायें
उसको तुम्हें ठुकराना है।।

अगर है व्यापारी पति तो
सच्चा व्यापार चलाना है।
मिलावट खोरी नहीं करोगे
यह जनहित में फरमाना है।।

हर नारी यदि ठान ले मन में
यह संदेश हमारा है।
शोषण मुक्त होवेगा भारत
निश्चित सफलता पाना है।।

समस्त संस्थाओं की नारियों से
यह आह्वान हमारा है।
संघठित हो प्रचार करों तुम
जड़ से इसे मिटाना है।।

 


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जागो-जागो देश के युवा

जागो-जागो देश के युवा यह आह्वान हमारा है
मतदान अवश्य करना यह अधिकार तुम्हारा है।।

लोकतन्त्र के महायज्ञ में अपना कर्तव्य निभाना है
तब ही तन्त्र मजबूत बनेगा यह अनुरोध हमारा है।।

जागो-जागो देश के युवा यह आह्वान हमारा है
मतदान अवश्य करना यह अधिकार तुम्हारा है।।

जैसे पक्षी उड़े गगन में पंख दो ही से वह उड़ता है
वैसे ही अधिकार-कर्तव्य लोकतन्त्र का गहना है।।

जागो-जागो देश के युवा यह आह्वान हमारा है
मतदान अवश्य करना यह अधिकार तुम्हारा है।।

डांगोरिया जन सोच समझकर मत प्रयोग तो करना है
लोकतन्त्र के महायज्ञ में सबको आहुति देना है।।

जागो-जागो देश के युवा यह आह्वान हमारा है
मतदान अवश्य करना यह अधिकार तुम्हारा है।।

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यातायात

अब तो सड़क पर बेधड़क चलते हैं कई लोग
वाहनों को तेज गति से दौड़ाते हैं लोग।।

करते नहीं है परवाह खुद अपनी कुछ लोग
औरों की क्या करेंगे यह तेज चलने वाले लोग।।

बाजारों में अब तो गिनती के चलते हैं पैदल लोग
बेवजह यह पैदल ही कुचले जाते हैं लोग।।

सफर मोटर साईकिलों से करते हैं बहुत लोग
दौ से चार बैठाकर सफर करते हैं लोग।।

नियमों कायदों का ध्यान क्यों रखते नहीं लोग
बिना हेलमेट के ही वाहन चलाते हैं लोग।।

कार चालक भी अब तो हो गये हैं बेखोफ
कार भरने के बाद भी लटकते हुये जाते हैं लोग।।

डांगोरिया आगे निकलने की जिद करते हैं चालक लोग
रस्ते में बेहूदा बात पर ही झगड़ते हैं लोग।।

यातायात नियमों का पालन क्यों करते नहीं लोग
अपनी लापरवाही से चालान अदा करते हैं लोग।।

 

   
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यह अभियान चलाना है

यह अभियान चलाना है
सबको जाग्रत करना है
खंडित होती धरा सम्पदा
इसकी रक्षा करना है।। यह अभियान .......................
पत्थर बजरी अवैध खनन का
माफियों के गैर नियम का
उजड़ते जंगल पहाड़ वनों का
सबको बीड़ा उठाना है।।         (1)
यह अभियान .......................
मानव वृक्षों को काट रहा है
घने जंगलों को उजाड़ रहा है
पर्वतों को भी तोड़ रहा है
पठारी भूमि खोद रहा है
अब पाबन्द इसपे लगाना है।।    (2)
यह अभियान .......................
प्राकृतिक सौन्दर्य नर बिगाड़ रहा है
श्रृंगारित आभा उजाड़ रहा है
अपने स्वार्थ के वश क्यों मूर्ख
भविष्य का सिर फोड़ रहा है
अब सौगन्ध सभी को खाना है।।        (3)
यह अभियान .......................
डांगोरिया यह गजब हो रहा है
खनिज सम्पदाओं का हनन हो रहा है
मानव संसाधनों का विदोहन हो रहा है
प्रशासन क्यों अनजान हो रहा है
अब जन चेतना जगाना है।।    (4)
यह अभियान चलाना है
सबको जाग्रत करना है
खंडित होती धरा सम्पदा
इसकी रक्षा करना है।।
यह अभियान ......................


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वृक्ष जहान

जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।
क्यों करता रे इनपे वार।
ये तो औषधियों का है भंडार।।
जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।
वृक्षों से जंगल और बरसे सावन।
जीव जगत लगे अति मन भावन।।
जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।
पशु पक्षी और मानव जनका।
करते हित ये हर जीवन का।।
जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।
वृक्ष काटे क्यों बने नादान।
इनसे वसुन्धरा शोभायमान।।
जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।
आबाद है इनसे भारत महान।
अर्थ व्यवस्था बढ़े चौगान।।
जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।
करले प्रतिज्ञा अब अरे इन्सान।
करेगा रक्षा वृक्ष तमाम।।
जाग-जाग अरे ओ इन्सान।
मत काटे रे वृक्ष जहान।।


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मालिक व मजदूर

मालिक कैसे बना है मालिक
यह मजदूर की ही तो बदौलत है
अगर ना होता मजदूर तो
मालिक कहा से बनता
यह उसी की अभिव्यक्ति है।

बदौलत है मजदूर की जिसने
अपना पसीना बहाया है
और बहाता आ रहा है
सर्दी में गर्मी में
बरसात में भी वह
पसीने में नहाया है।

डांट को फटकार को भी वह
सहता हुआ आया है
धंधा बिजनेस वालों का
बिजनेस चलाया है
धनवान बनाया है।

आलीशान इमारतों में
मालिक को सुलाया है
महंगी-महंगी गाड़ियों में
मालिक को घुमाया है
खान-पान रहन-सहन के
स्तर को बढ़ाया है।

जय हो उस मजदूर की जो
झोंपड़ी में रहता आया है
जिसने कमाई सिर्फ
दो वक्त की रोटी
वह भी उसको समय पर
नसीब नहीं होती।
निपटा न दे जब तक काम
मालिक का तब तक वह
भूख को भी दबा लेता है।

चाय पानी से कचोरी एक खाकर
और पी लेता है बीड़ी
ऐसे दे लेता है अपने
मन को तसल्ली।

क्योंकि वह जानता है कि
मेरे अभाव में काम ठप्प है
मीलों-कारखानों में उसने ही
उत्पादन को बढ़ाया है
खेतों में भी उसने ही
हल को चलाया है।

रिक्शे को ठेले को भी
उसने ही दौड़ाया है
रिक्शे में इंसानों को
ठेले में सामानों को
उसने ही गंतव्य तक पहुंचाया है।

रेत ईंट पत्थरों को भी
वही ढोता आया है
सड़को व पुलो को भी
ऊंची-नीची इमारतो को भी
उसने ही बनाया है।

बहुत किये निर्माण उसने
फिर भी वह हमेशा
मजदूर ही कहलाया है।
मजदूर ही कहलाया है।
मजदूर ही कहलाया है।


      --


मैं हूं एक पुष्प

मैं हूं एक पुष्प
सुनो मेरी दांस्ता
खिला था मैं एकचमन में
पाला था एक बागवान ने मुझे
अपने श्रम से बड़े ही परिश्रम से
किया था मेरी पौध को बड़ा उसने।
फिर मेरे-
योवनावस्था मे आने के बाद
खिलता हुआ मेरे हो जाने के बाद
सबकी तारीफ़ों के बाद
कर दिया मुझे उसने
दूसरों के हाथ।
मैं मन्दिरों-मस्जिदों
गुरूद्वारों-चर्चों में चढ़ा
नवयोवना का गजरा बना
लोगो के गले का हार बना
दुल्हा-दुल्हन का श्रृंगार बना
मुहब्बत करने वालो का पैगाम बना
इतना काम आने के बाद
फिर मेरे-
कुम्हलाऐं जाने के बाद
बदसूरत मेरे हो जाने के बाद
खुशबु मेरी उड़ जाने के बाद
मुझे नकारा समझा गया
सड़कों पर फेंका गया
पैरों तले कुचला गया
कचरे में डाला गया
इतनी दुर्दशा के बाद तो
मैं खाद्य में तब्दील हो गया
फिर भी मैं-
खेतों में डलकर भूमि को उपजाऊं
बनाता रहा- बनाता रहा- बनाता रहा।



विरह वेदना श्रृंगार रस

उमड़-घुमड़कर बदरा छावें।
सावन घटा घनघोर गरजावे।।
चम-चम चम-चम बिजली चमके।
झरमर-झरमर मेघा बरसे।।
नाचे मोर पपीहा बोले।
नव-यौवना का मनवा डोले।।
मन्द पवन शीतल पुरवाई।
फड़के यौवन ले अंगडाई।।
कोयल ज्यों मल्हार सुणावें।
पिया-मिलन की याद सतावें।।
पिया गये परदेश हमारे।
मेवा मिष्ठान मोहे ना भावे।।
सगरो सणगार यो फीको लागे।
पिया घर होवें तो नीको लागे।।
माथे की चुन्दड़ी उड़-उड़ जावे।
हार नौलखो रोल मचावें।।
भाल की बिन्दिया हो गई मैली।
पायल छत्तीसो राग सुणावें।।
ज्यों-ज्यों मेघा झरमर बरसें।
नेणा नीर म्हारें सागर झलके।।
द्वार खड़ी मैं पंथ निहारूं।
राह थक-थक नेणा हारें।
डांगोरिया यह विरह की आंधी
बिना नीर ज्यों मछली तड़पे।।

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परिचय:

नाम                :        रामनिवास डांगोरिया(वाल्मीकि)
पिता का नाम        :        स्व. श्री दरियावराम (वाल्मीकि)
जाति                :        मेहतर (वाल्मीकि)
जन्मतिथि            :        30.06.1971
जन्म स्थान            :        बारां जिला बारां
वैवाहिक स्थिति        :        विवाहित
लिंग                :        पुरूष
भाषा                :        हिन्दी, हाड़ौती
राष्ट्रीयता            :        भारतीय
वर्ग                :        एस.सी.
धर्म                :        हिन्दू
स्थाई पता            :        शिवाजी नगर, मारवाड़ा बस्ती, बारां
                        तहसील बारां, जिला बारां (राज.)
                        पिन - 325205

शैक्षणिक योग्यता        :        मैट्रिक पास
सदस्य                :        अखिल भारतीय साहित्य परिषद,
                        राजस्थान (इकाई) बारां
लेखन                :        कविता, गजल एवं लेख
सम्प्रति            :        जिला स्तरीय समाचार पत्रों में कविताएं प्रकाशित

                           
                        रामनिवास डांगोरिया (साहित्यकार)
                        साहित्य परिषद बारां (राजस्थान)


खटका



   शोभा ताई को आज लौटने में देर हो गयी थी. धारावी के अपने झोंपड़-पट्टी इलाक़े में ज्यों ही वह दाख़िल हुई, रोज़ से अलग सुनसान रास्ते देख चौंक गयी. और हां, यहां-वहां पुलिस भी खड़ी दीख रही थी. उसने पास के घर की खिड़की से झांक रही स्त्री से पूछ ही लिया, 'काय झालं बाई ?'
   उसने 'दंगा झाला...' कहते हुए फ़ौरन खिड़की के पट भेड़ लिये.


   डरी-सहमी-सी शोभा ताई आगे बढ़ी. इधर-उधर बिखरे पुलिस वालों ने संभवतः उसके पहराव आदि के कारण उसे उसी मोहल्ले की जान रोका नहीं. तभी सामने से इन्स्पेक्टर और उसके संग चार-पांच बंदूकधारी आते नज़र आये. इन्स्पेक्टर चलते-चलते अचानक थम गया और झोंपड़ियों के पीछे से आ रही खट-खट-सी ध्वनि को सुनने का प्रयास करने लगा. शोभा ताई एक तरफ़ से होकर जाने लगी तो उसने ठहरने का संकेत करते हुए पूछा, 'यह जो मशीनें चलने की आवाज़ें आ रही हैं, क्या बनता है वहां ?'
   शोभा ताई कुछ हिचकी, फिर साहस कर बोली, 'अरे! आपको नहीं पता, वहां गोलियां बनाते हैं... हम भी ख़रीदते हैं उनसे.'
   'क्या ?' इन्स्पेक्टर एकदम सीधा खड़ा हो गया और उसने अपने अधीनस्थों को तुरंत आदेश दिया- 'अपनी-अपनी बंदूकें सम्भालो और घुस पड़ो इस गली में.' तत्पश्चात उसने शोभा ताई को हड़काया- 'चल, तू भी चल हमारे साथ!'


   वहां कारखाने का दरवाज़ा अन्दर से बन्द था. मशीनें चल रही थीं. इन्स्पेक्टर के कहने पर पुलिस वालों ने दरवाज़े को ज़ोरदार धक्का देकर भीतर प्रवेश किया. वहां पांच-छह मज़दूर अपने काम में व्यस्त थे. इन्स्पेक्टर ने देखा- कहीं रैपर का ढेर लगा था, कहीं चीनी की बोरियां खुली पड़ी थीं, कहीं एसेंस के टीन पड़े थे, कहीं...
   वह शोभा ताई की ओर पलटा- 'क्या कह रही थी तू... यहां गोलियां बनती हैं...'
   शोभा ताई सारा घालमेल समझ गयी थी, बोली- 'साब, खाने की खट्टी-मीठी गोलियां बनती हैं. मेरे बेटे की यहीं छोटी-सी दुकान है. हम इनसे ही ख़रीदते हैं- सस्ती पड़ती हैं.
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दुर्योग



(ज्यां पॉल सार्त्र की कहानी 'दीवार' से अनुप्राणित)
   श्रमेश जी के घर में ओजस किराये से रहता था. ज़हीन था, जेएनयू में हिन्दी स्नातकोत्तर के द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा था. उसकी एक सहपाठिनी कालजयी अक्सर उसके कमरे पर आती रहती थी. श्रमेश जी को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी. वे आधुनिकता में विश्वास रखते थे. नहीं कर पाये अपने जीवन में पर किसी और को यह करते देख उन्हें अतिरिक्त प्रसन्नता होती थी.
   कालजयी हरयाणा से थी. वहां तक उसके इस प्यार की आहट देर-सबेर पहुंच ही गयी. होते हैं इस तरह के लोग जो श्रमेश जी के विपरीत दो प्रेमियों के मिलन से डाह खाते रहते हैं. खाप पंचायत के कानों में इस वाक़ये ने तुरंत खलबली मचा दी. वे अज्ञानी बेचैन हो गये. कालजयी के माता-पिता को उन्होंने आड़े हाथों लिया. कालजयी के परिजन झुक गये कि उनके सम्मुख कोई और चारा न था.


   अंजाम यह हुआ कि कालजयी के पिता के साथ पंचायत के कतिपय सदस्यों ने श्रमेश जी के घर पर धावा बोल दिया. उनको आज ओजस जाते समय बता गया था, 'अंकल, आज रविवार है. हम दोनो ने दिल्ली हाट जाने का प्रोग्राम बनाया है. ख़रेदी-खाना वग़ैरह निपटाकर मैं कुछ देर से लौटूंगा...'
   जब उनसे सरपंच ने पूछा, 'कहां है वो बहन... ओजस ? हमें मालूम है, वो जयी के संग है.'
   'मुझे नहीं पता...' उन्होंने अनभिज्ञता का सहारा लिया.


   सरपंच के बराबर खड़े खूंख़ार-से लगते युवक ने छुरा निकाल लिया. उनकी छाती पर उसे टिकाते हुए चिल्लाया- 'झूठ मत बोल... स्साले, वो दोनों कहीं रंग-रेलियां मना रये हैं... हमको पूरी जानकारी है... बता, कहां गये हैं वो...'
   दूसरा एक गुंडा-सा लगता अधेड़ तलवार लहराते सामने आया- 'बुड्ढे, तू जानता है सब कुछ, हमें ख़बर है... मादर... तूने नईं बताया तो तेरे पूरे परिवार को हम नर्क में भेज देंगे... चल जल्दी से मुंह खोल...'
   वे भयभीत थे किन्तु दृढ़. उन्होंने एक पल सोचा, फिर हाथ जोड़ते हुए बोल पड़े- 'वे दोनों इंडिया गेट गये हैं...' वे ख़ुश थे कि समय पर उन्हें सही जवाब सूझ गया.
   सरपंच ने जाते-जाते धमकी दी- 'अगर तू सच नईं बोल रिया है तो समझ ले तेरा आख़िरी बखत आ गया है. तूने उनको मोबाइल भी लगाया तब भी मरेगा ही मरेगा...' उसके पलटते ही सब उसके पीछे हो लिये.


   उन्होंने राहत की सांस ली. उन्हें एकाएक याद आया कि वे फ़ोन कर देंगे यदि, इन नामाक़ूलों को क्या तो पता चलेगा... सतर्क कर देने से ओजस-कालजयी कमसकम यहां नहीं लौटेंगे... लेकिन फ़ोन था कि लग ही नहीं रहा था. उन्होंने तय कर लिया कि अगर वे यहां आ भी गये, उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करनी ही है.
   वे आश्वस्त थे परन्तु विचलित भी हो गये थे. किसी तरह अपना रोज़मर्रा का काम करते रहे. बीच-बीच में ओजस को फ़ोन भी लगाते रहे. स्वीच-ऑफ़ ही मिलता रहा. वे चिन्तित होने लगे थे.


   तभी उनके बेटे अयान का फ़ोन आया. उन्होंने उसे इस संकट के बारे में बताया तो वह हड़बड़ा गया- 'क्या!... आपने उन लोगों को इंडिया गेट भेज दिया ?... पापा, मुझे ओजस थोड़ी देर पहले मिला तो उसने अपने प्रोग्राम में हेर-फेर कर लिया था. वे दोनों इंडिया गेट जा रहे थे... ख़ैर ! आप फ़िक्र मत करना, मैं इंडिया गेट के पास ही हूं.'
   वे अवसन्न-से लाचार बैठे रह गये.
   घंटी बजी. उन्होंने अनलॉक किया. अयान ही था- 'पापा, ओजस-जयी को घेर कर उन हरामियों ने टुकड़े-टुकड़े कर डाला...'
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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095.

भारत सहित तमाम विश्व  की ऊर्जा संबंधी दीर्घकालीन आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ति में में हरित ऊर्जा सहित परमाणु ऊर्जा का भरपूर दोहन की एकमात्र विकल्प होगा.

असैन्य परमाणु ऊर्जा का रास्ता साफ


प्रमोद भार्गव

    अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत-यात्रा के पहले दिन ही छह साल से अटके असैन्य परमाणु ऊर्जा अनुबंध पर समझौता हो गया। इस करार की बड़ी सफलता यह रही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व कौशल के चलते भारत को झुकना नहीं पड़ा और अमेरिका संतुष्ट हो गया। इस मुद्दे के सिलसिले में दोनों देशों ने चतुराई यह बरती है कि परमाणु ऊर्जा नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम में संशोधन की जरूरत नहीं पड़ेगी। करार से जुड़ी अमल संबंधी बाधाएं दूर होने के बाद व्यावसायिक सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। पूछा जाए तो अमेरिका और भारत के बीच यह मुद्दा ऐसा केंद्र बिंदु साबित होगा,जो दोनों देशों के बीच विकसित हो रहे रिश्तों की आधारशिला को मजबूती देगा। इससे भारत बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगा और कालांतर में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। इस द्विपक्षीय वार्ता की दूसरी बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि रक्षा क्षेत्र में आधुनिक तकनीक के मुद्दे पर दोनों देशों ने रक्षा फ्रेमवर्क अनुबंध का भी आगामी 10 साल के लिए नवीनीकरण कर दिया है। इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास,गुप्तचर सूचनाओं का आदान-प्रदान और समुद्री सुरक्षा शामिल है। आतंकवाद से जूझ रहे भारत को ये सुविधाएं बहुत जरुरी हैं


    परमाणु करार को अमल में लाने के बाबत सबसे बड़ी बाधा 'परमाणु ऊर्जा नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम का उपबंध 17 था। इस धारा में प्रावधान हैं कि यदि अमेरिकी उपकरणों के कारण भारत में कोई त्रासदी होती है तो परमाणु संयंत्र प्रदायक कंपनी को नुकसान की भरपाई करनी होगी। जाहिर है, यह शर्त दुर्घटना होने की स्थिति में आपूतिकर्ता को सीधे-सीधे जिम्मेवार ठहराती है। इसीलिए 2008 में इस समझौते के हो चुकने के बावजूद कोई विदेशी परमाणु ऊर्जा कंपनी भारत नहीं आई। जबकि डॉ मनमोहन सिंह नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने इस करार को लागू करने के लिए सरकार ही दांव पर लगा दी थी। इस कानून में संसद में वामदलों की मांग के चलते यह कठोर शर्त जोड़ी गई थी। इस शर्त को शिथिल किए जाने के सिलसिले में अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों का कहना था कि भारत वैश्विक नियमों का पालन करे। इन नियमों के तहत दुर्घटना की प्राथमिक जिम्मेबारी संचालित कंपनी की होती है। इस क्रम में भारत की दुविधा यह थी कि हमारे यहां सभी परमाणु संयंत्रों का संचालन सरकारी कंपनी 'भारतीय नाभिकीय ऊर्जा निगम' करती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने का मतलब था,दुर्घटना की स्थिति में सरकार को मुआवजे की अदायगी झेलने की मजबूरी। उत्तरदायित्व कानून में एक अन्य विवादास्पद शर्त दुर्घटना के समय असीमित जिम्मेदारी की भी जुड़ी थी। इस शर्त की वजह से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा कंपनियों को बीमाकर्ता कंपनी तलाशने में मुश्किलें पेश आ रही थीं, क्योंकि कोई भी बीमा कंपनी परमाणु संयंत्रों से जुड़ी दुर्घटना का संपूर्ण बीमा भार झेलने का जोखिम नहीं उठाती। दरअसल ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमाणु दुर्घनाएं इतनी बड़ी और व्यापक हो सकती हैं कि कोई एक दो बीमा कंपनियां इसकी भरपाई कर ही नहीं सकतीं ? रुस के चेरनोबिल और जापान के फुकूशिमा में घटी परमाणु दुर्घटनाएं इसकी बानगियां हैं।

 
नरेंद्र मोदी पिछले चार माह से स्वच्छ परमाणु ऊर्जा के विकल्पों का ऐसा आधार तलाशने में लगे थे, जिससे 2008 में हुए परमाणु करार का रास्ता साफ हो जाए। इस बाबत मोदी ने पिछले साल सिंतबर में की अमेरिका यात्रा में तो ओबामा से विस्तृत चर्चा की ही,साथ ही इस बातचीत को ओबामा से म्यांमार और आस्ट्रेलिया में हुई मुलाकातों में भी आगे बढ़ाया। इसके अलावा इस करार को गति देने की दृष्टि से परमाणु संपर्क समूह की भी चार बैठकें जिनेवा और लंदन में हो चुकी हैं। इन बैठकों में भारत ने लचीला रुख अपनाने के संकेत दे दिए थे। इसी का परिणाम है कि ओबामा की तीन दिवसीय भारत यात्रा के पहले दिन ही हैदराबाद हाउस में चाय सुड़कते हुए असैन्य परमाणु करार संभव हो गया। इस करार से भारत बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की दिशा में तो आगे बढ़ेगा ही, साथ ही वह परमाणु संपन्न समुदाय की मुख्यधारा में भी शामिल हो जाएगा। इस लिहाज से देश के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है।


    परमाणु करार इसलिए संभव हो पाया क्योंकि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही बराक ओबामा से संवाद संप्रेषण बनाए रखे हुए थे। इस वजह से दोनों के बीच जिस तरह से दोस्ती प्रगाड़ हुई, उसके चलते दोनों ही देश इस मुद्दे पर थोड़ी-थोड़ी नरमी दिखाते हुए इसे कामयाबी के शिखर पर ले पहुंचे। इस सफलता में 'बराक' और 'मोदी' के संबोधन का आत्मीय भाव भी सहायक रहा है। परमाणु करार से जुड़ी अमेरिका ने दो शर्तें मान ली हैं। एक तो वह भारत पहुंचने वाली परमाणु सामग्री पर निगरानी नहीं रखेगा। दूसरे, अमेरिका दुर्घटना की स्थिति में अपने देश की चार बड़ी बीमा कंपनियों को मुआवजे के लिए तैयार करेगा। ये कंपनियां आकस्मिक दुर्घटना सहायता के लिए सेतु की तरह परस्पर मिल-जुलकर काम करेंगी।
    इसी तर्ज पर भारत ने भी नरम रुख अपनाया है। भारत की भी चार बड़ी बीमा कंपनियां दुर्घटना की स्थिति में अधिकतम पीड़ितों को 750 करोड़ रुपए का बतौर मुआवजा भुगतान करेंगी। जबकि बाकी खर्च भारत सरकार उठाएगी। नागरिक उत्तरदायित्व परमाणु हानि अधिनियम 2010 में किसी भी परमाणु दुर्घटना की आशंका में 1500 करोड़ रुपए की धनराशि पहले से ही सुरक्षित रखने का प्रावधान है। जिससे पीड़ितों को दुर्घटना के तत्काल बाद मुआवजे का प्रबंध किया जा सके। भारत ने इस मुद्दे पर नरम पड़ते हुए,परमाणु ऊर्जा निगम की तरफ से 750 करोड़ रुपए की गारंटी जोड़ दी है। साथ ही 750 करोड़ रुपए भारत सरकार देगी। इस तरह से पिछले छह साल से लटके इस अहम् मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सहमति बन गई। इस समझौते की खास बात यह रही है कि अब मोदी सरकार को परमाणु ऊर्जा नागरिक उत्तरदायित्व अधिनियम 2008 और 2010 में किसी संशोधन के लिए बाध्य होना नहीं पड़ेगा। यह संशोधन संभव भी नहीं था,क्योंकि राजग गठबंधन राज्यसभा में बहुमत में नहीं है।


इस करार से काकरापुर,जैतापुर और राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के जल्दी शुरु होने की उम्मीद बढ़ गई है। अमेरिकी कंपनियों के सहयोग से बन रहीं ये परियोजनाएं लगभग पूरी हैं। रुस के सहयोग से बनी तमिलनाडू की कुडनकुलम परमाणु परियोजना से एक साल पहले ही बिजली उत्पादन का कार्य शुरु हो गया है। अन्य परियोजनाएं भी यदि इस साल के अंत तक शुरु हो जाती है तो देश को 4800 मेगावाट अतिरिक्त परमाणु विद्युत मिलने लग जाएगी। इससे औद्योगिक विकास होगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। इस लिहाज से ओबामा की यह दूसरी भारत यात्रा मील का पत्थर साबित होती हुई,करीबी रणनीतिक साझेदारी के रुप में भी सामने आई है। इस यात्रा के दीर्घकालिक और भी अच्छे नतीजे सामने आएंगे।


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

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आजकल तनाव हमारे वर्तमान जीवन की परिभाषा बन गयी है। रोजमर्रा की जिन्दगी में हैरान, परेशान होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे होते हुए हम सारा दोष दूसरों के मत्थे मढ़ते रहते हैं और यह पूरी तरह से बिसरा देते हैं कि इसके लिए कहीं हम खुद भी जिम्मेदार हो सकते हैं। जीवन के प्रति हमारा अपना नजरिया-आस-पास के लोगों के प्रति अपना स्वयं का दृष्टिकोण भी जिम्मेदार हो सकता है।

मनोवैज्ञानिकों की सलाह मानें तो सबसे पहले हमें अपनी खीज-तनाव के कारण खुद में खोजने चाहिए। आस-पास के लोगों, परिस्थितियों के प्रति अपने नजरिए की छान-बीन करनी चाहिए। ऐसा कर सके तो पता चलेगा कि सारी उद्विग्नता का कारण हमारी मानसिकता का बाहरी वातावरण से संगीत न बैठना है और इसके लिए वातावरण की अपेक्षा हम खुद जिम्मेदार हैं।

एलन वाट्स ‘प्रेग्रासिंग आँफ द माइन्ड’ में कहते हैं कि वातावरण जड़ है, सोच-विचार रहित है, जबकि हम स्वयं सचेतन हैं। अपने सोचने-विचारने के तौर-तरीकों में फेर-बदल करना हमारे लिए एक आसान बात है। थोड़े से प्रयास के साथ ही हम वातावरण से समस्वरता स्थापित कर सकते हैं। इसी तरह आस-पास के लोगों के व्यवहार पर टीका-टिप्पणी करना, उन्हें अनर्गल बकते-झकते रहना, रह-रहकर उन पर दोषारोपण करना, समस्या का कोई सार्थक समाधान नहीं है। क्योंकि सभी-अपनी प्रवृत्तियों एवं संस्कारों के वशीभूत हैं, फिर औरों पर अपना क्या वश? ऐसे में उन पर खीजने, झल्लाने से हमारा तनाव कम होने की बजाय बढ़ेगा ही, तब क्यों न हम समस्याओं के समाधान अपने अन्दर खोजें।

एक सत्य और है-बाहरी माहौल को प्रभावित करने वाले घटकों की संख्या भी काफी है। चाह कर भी सब पर एक साथ काबू पा सकना हमारे वश में नहीं है। बहुत कोशिशों के बावजूद हम कुछ हद तक ही परिस्थितियों को बदल सकते हैं। हाँ! अपने आन्तरिक दृष्टिकोण में परिवर्तन करना अपना बिल्कुल निजी मामला है। इसके फेर-बदल में हम पूरी तरह स्वतन्त्र ही नहीं सक्षम भी हैं। स्वस्थ एवं सुखी जीवन का यह एकमात्र कारगर उपाय है। जब हम अपने परिकर के साथ सहअस्तित्व की अनुभूति के साथ रहते हैं तो तनाव अपने आप दूर हो जाता है। लेकिन निषेधात्मक चिन्तन और मन में संचित घृणा, द्वेष, ईर्ष्या और भय के संस्कारों के कारण वातावरण से तालमेल बिठाना थोड़ा मुश्किल जरूर है।

इसके लिए आवश्यक है कि मन से बुरे विचारों का कूड़ा-कचरा निकाल फेंका जाय। लेकिन होता इसका उल्टा है। हममें से प्रायः प्रत्येक व्यक्ति सफलता पाने की तीव्र तृष्णा से ग्रसित है। हर वक्त उसे यह भय सताता रहता है कि कहीं वह असफल न हो जाय। जिससे उसे अपने परिवार तथा परिचितों के बीच शर्मिन्दा न होना पड़े। उसके इस भय को अभिभावक और शिक्षक मिलकर बढ़ा देते हैं। अपनी अस्मिता से जुड़ा यह सवाल इस कदर उसके मन पर छा जाता है कि वह लगातार भर और चिन्ता से ग्रसित रहने लगता है। जीवन का हर कृत्य उसके लिए आपातकालीन कार्य बन जाता है और वह लगातार तनाव में रहने लगता है। ऐसा नहीं हैं कि सफलता के लिए प्रयास कना कोई बुरी बात है। लेकिन यदि अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन किया जा सके तो इसे कर्तव्य भावना से तनाव रहित होकर भी किया जा सकता है। 

तनाव मुक्त होकर किए गए प्रयास में सफल होने की उम्मीदें भी अधिक होंगी। यदि इसके साथ देशहित और लोकहित की उदात्त भावनाएँ जोड़ी  सकें तो मन हर-हमेशा उत्साह एवं प्रफुल्लता से भरा रहेगा। हमारे किए गए काम के सौंदर्य में भी भारी निखर आ जाएगा। इस प्रकार हमारी पूर्व मान्यताएँ जिन्हें साइकोलॉजिस्ट मेण्टल प्रोग्रामिंग कहते हैं, हमारे जीवन का निर्धारण करती है। गलत एवं निषेधात्मक मेण्टल प्रोग्रामिंग हमारे गलत चिन्तन एवं गलत शिक्षा का परिणाम है। इस पर चिंतन ही नहीं, सुविचारित कदम भी उठाये जाने चाहिए। 

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(कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण और आम आदमी का कार्टून)


आर के लक्ष्मण का नाम कार्टून का पर्याय बन गया था, सोमवार 26 जनवरी को उनकी कलम हमेशा के लिए रूक गई लेकिन पांच दशकों लंबी फैली उनकी कार्टून स्ट्रिप हमारी बहुमूल्य धरोहर है। आम आदमी के सुख-दुख, सपनों और इच्छाओं को उनके बनाए चरित्र 'कॉमन मैन' ने दुनिया के सामने रखा। लक्ष्मण की खासियत यह थी कि उन्होंने हमेशा ताकतवर पर तंज किया और आम आदमी के साथ खड़े दिखे। लक्ष्मण का 'आम आदमी' राजसता को हर रोज आईना दिखाता रहा। चेक का कॉलरदार जैकेट, धोती व गोल ऐनक पहने सिर पर थोड़े से सफेद बालों वाला बूढ़ा इंसान एक वाक्य में ही सब कुछ कह जाता था, जिसे कहने में अखबार की खबर भी कभी-कभी कम पड़ जाती थी। पांच दशकों से अधिक समय से अपने कार्टून 'कॉन मैन' के जरिए लक्ष्मण ने भारतीय समाज और राजनीति के तमाम पहलुओं को उकेरा। सही मायने में वे आम आदमी के प्रखर प्रवक्ता थे


    अखबारों में विचारों को कार्टून के माघ्यम से एक धारदार हथियार बनाने वाले लक्ष्मण ने किसी को नहीं बख्शा, उनके कार्टून बोलते थे। शब्द कैसे तलवार से भी तेज हो सकते हैं, यह उनके कार्टूनों में देखा जा सकता है। लक्ष्मण के कार्टून की लोकप्रियता इतनी थी कि उनकी बीमारी के दौरान उनके पुराने कार्टूनों को प्रकाशित किया जाता था। उनकी जगह खाली नहीं छोड़ी जा सकती थी। लक्ष्मण की कला और कार्टून के प्रति प्रतिबद्धता से आज के कार्टूनिस्टों को बहुत कुछ सीखना चाहिए। उनके लिए कार्टून ही जीवन था, वह हमेशा कार्टून में ही डूबे रहे। यह समर्पण कार्टूनिस्टों की आज की पीढ़ी में न के बराबर है, आज कमाई मुख्य लक्ष्य बन गया है। लक्ष्मण की लगन और प्रतिबद्धता का ही नतीजा था कि वे पांच दशकों तक कार्टून बनाते रहे और लोगों द्वारा सराहे भी जाते रहे।


    लक्ष्मण के कार्टूनों की दुनिया इतनी विस्तृत है कि उसमें समाज, साहित्य, राजनीति, धर्म, अर्थ सभी समाए हुए हैं। लक्ष्मण रचित 'आम आदमी' भारतीय आम आदमी का सुख-दुख, मायूसी, सपनों, इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता नजर आता है। लक्ष्मण के 'कॉमन मैन' की लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2007 में वोरली में कॉमन मैन की प्रतिमा लगायी गयी थी तथा 2011 में कॉमन मैन की आठ फीट की एक प्रतिमा पुणे में लगायी गई थी।


    24 अक्टूबर 1921 को जन्मे रासीपुरम लक्ष्मण अपने छह भाईयों में सबसे छोटे थे तथा 'मालगुडी डेज' के रचियता आर के नारायण के छोटे भाई थे। स्कूली शिक्षा के बाद मुम्बई के प्रसिद्ध जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिले के लिए आवेदन किया तो स्कूल के डीन ने उन्हें स्कूल में दाखिल होने की योग्यता न होने के कारण उनका आवेदन खारिज कर दिया। उसके बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल की। शिक्षा खत्म होने के बाद मुबंई के 'द फ्री प्रेस जर्नल' में राजनीतिक कार्टूनिस्ट के रूप में नौकरी शुरू की, बाद में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से जुड़े। इसी अखबार में रहते हुए उन्होंने अपना प्रसिद्ध 'द कॉमन मैन' का चरित्र गढ़ा, जो देश की समस्याओं, लोकतंत्र के विकसित होते रूप, भ्रष्टाचार समेत जीवन के विविध पहलुओं को रेखांकित करता तकरीबन पांच दशकों तक तीक्ष्ण कटाक्ष करता रहा। लक्ष्मण ने 1954 में एशियन पेंटस ग्रुप के शुभंकर 'गट्टू' की रचना की, वहीं गुरूदत कृत हिन्दी फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' में उनके कार्टून प्रदर्शित हुए तथा अपने बड़े भाई आर के नारायण की पुस्तक 'मालगुडी डेज' पर आधारित टेलीविजन धारावाहिक के स्केच भी उन्होंने तैयार किए। 1984 में जर्नलिज्म के लिए रेमन मैगसेसे पुरूस्कार तथा 2005 में पद्य विभूषण से सम्मानित किए गए।


    आर के लक्ष्मण भले ही आज हमारे बीच नहीं रहें लेकिन उनका गढ़ा 'आम आदमी' आज भी हमलोंगो के बीच अपना वजूद बनाए हुए है और भविष्य में भी बनाए रहेगा। उनकी स्मृति को विनम्र श्रदांजलि।

 

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड

 

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1.

इक जिद थी बड़े होने की लाखों कोशिशों के बाद
जब बड़े होने लगे अहसास हुआ की कुछ पीछे छूट रहा है।
बीते लम्हे याद आने लगे जब देखता हूँ खुद को पीछे मुड़कर इक कहानी नजर आती है।

कुछ पलों को बाँटना चाहा कहाँ अब वो साथ ना रहा।
कुछ बिछड़ गए कुछ साथ रहें हमेशा जिन्दा रहेंगे मेरे साथ ,
भूलकर भी भूलना चाहूँ फिर ज्यादा याद आते है
वो बीते लम्हें
वो गुजरा कल
वो याद आता पल
अनजाने सफर के हमजोली मेरे यार मेरे दोस्त
वो जमाना गुजर गया तुम्हें देखें.....

2.

चला जाऊँगा इक दिन मैं भी इस दुनिया से
खुद को लेकर अपने, और मैं को इस दुनिया से

ख्वाहिशें कुछ ऐसी है मरने के बाद इस दुनिया से
हमारी, आगे हम होंगे , पीछे दुनिया लाखों होंगी।

चाहते भी होगी चाहतों का दौर भी होगा पर
हम साथ तुम्हारे नहीं होंगे।
मोहब्बतें भी बेजुबां होंगी पर इंसा हमारे जैसे नहीं होंगे।

चलो फिर लौट चलें उन हसीन लम्हों की महफ़िलों को।
अब ठुकरा कर भी क्या चलें ज़िन्दगी को, फिर क्या मुहब्बत करने को ज़िन्दगी ना मिले।।

3.

इश्क़ समन्दर की तरह ठहरा है
शांत लहरें भी खामोश है इसलिये
चलती है लहर दर लहर खामोश राहों से
कोई ना कोई भीग जाता है इस आसमाँ के नीचे
प्यार मुहब्बत की ठंडी लहरों से
जम जाती है ठंडी बर्फ की तरह
जब पिघलती है तो धीरे धीरे गुल जाती है
इक दूजे के दिल में
लगता है इश्क समन्दर की तरह ठहरा है
आज ख़ामोश लहरों में कुछ हलचल है

4.

तलाश है खुद की इन भीड़ में खोज रहा हूँ कहीं
यहीँ थमा था यही गुमा था। ढूंढ रहा हूँ कहीँ।
ख़ामोश राहों के इर्द गिर्द ठहरे मुसाफिरों को पूछ रहा हूँ।।
बता दो मेरी मंजिल लौटना है खुद को
चलते चलते ठहरना है घर को

5.

वक़्त खाली सा है पास मेरे
यूँही बैठे रहने को...
आईना सा साफ़ नजर आता है पास मेरे
स्मृतियों को बटोरने को....
धुंधली तस्वीरों ने कैद कर रखा है।
जकड़े सलाखों सी जंजीरों में 'मैं' को

6.

इस शहर में कोई जगह है जहाँ दो पल ठहर सकूँ।
हर बात अपने दिल को कह सकूँ।।
कोई है तो मुझे बतला दो बड़ा अहसान होगा
मुझ पर तुम्हारा...
जहाँ दो पल सांस ले सकूँ इस घुटन भरी दुनिया से निकल सकूँ।
कोई अल्फाज दबा सीने में उसे कागज़ पर उतार सकूँ।।

इस शहर में कोई जगह है जहाँ दो पल ठहर सकूँ।।।
कहीं अपने दिल को आवाज दे सकूँ

7.

तलाश है खुद की इन भीड़ में खोज रहा हूँ कहीं
यहीँ थमा था यही गुमा था। ढूंढ रहा हूँ कहीँ।
ख़ामोश राहों के इर्द गिर्द ठहरे मुसाफिरों को पूछ रहा हूँ।।
बता दो मेरी मंजिल लौटना है खुद को
चलते चलते ठहरना है घर को

8.

हर लम्हा तेरे साथ गुजारना चाहता हूँ ।
तुम्हें यूँही देखना चाहता हूँ।।
हँसते हँसाते जब तुम बोलती हो,
खुद को खोया सा महसूस होता है।
तुझमें ...बस तेरे साथ जीने का मन करता है।।
इक फलक चाँद तारों को पाता हूँ तो
दूजा कहीं गहरे समंदर में पाता हूँ।

जीना चाहता हूँ तेरे साथ...

9.

अहसास है तेरे छूने का खुद को।
खुद को तुझ में, तुझ को मुझ में कोई उतरन है।।
लबों पे आवाज़ नहीं तो अहसास की गहराई है।
आँखों में कोई नमकीन मस्ती सी तीर आई है।।

बालों की लटों को सुलझाने में भी या तेरे कोई पास तहजीब है।
लगता है की अहसास की लहरों पे कोई उतर आया है।।

10.

पास जो तुम बुलाओगे मैं चला आऊंगा।
जब सांस लोगी तो रूह में समा जाऊंगा।।

उन रास्तों को चलूं जो तेरे दर तक आये।
हर शाम को इंतज़ार करूं तू जो फलक तक आये।।

जहॉ रात चाँद सितारों को देख कर गुजर जाती है।
वहाँ जुल्फों के नरम साँसों में उमर सारी गुज़र जाती है।।

mukeshkumarmku@gmail.com

प्राथमिक शिक्षा को रामभरोसे न छोड़ें

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कई गंभीर मुददों में से एक हमारे देश की प्राथमिक शिक्षा है प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक इसलिए है क्योंकि इसी के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का जीवन भर विकास होता है। यदि प्राथमिक शिक्षा अधूरी रह जाए तो बच्चे के भीतर प्रतिभा होते हुए भी वह अपनी प्रतिभा को निखार नहीं पाएगा। यदि बहुत बड़ी बात न की जाए , शिक्षा की उपादेयता को बढ़ा-चढ़ाकर न भी कहा जाए तो इतनी जरूरत तो हर किसी को है कि वह कम से कम  किसी एक भाषा में लिखे हुए को समझ के साथ धाराप्रवाह पढ़ सके और अपने विचारों को कम से कम किसी एक भाषा में अभिव्यक्त कर सके, लिख सके। यदि हम इतनी योग्यता हासिल कर लेते हैं तब हम साक्षर कहलाते हैं।

शिक्षा हमारे साथ कम से कम इतनी दूर तक जानी चाहिए कि हम समाज के आदर्शों के मुताबिक रहन-सहन सीख जाएं और समाज में स्थापित आदर्श के साथ अपनी आजीविका का चयन कर सकें।

सामान्य तौर पर कक्षा 5वीं तक की शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा कहा जाता है। कक्षा-5वीं तक में बच्चे को धाराप्रवाह वाचन के साथ ही अभिव्यक्ति करने की क्षमता, सामाजिक परिवेश की जानकारी और गणित की सभी सामान्य संक्रियाओं की जानकारी हो जानी चाहिए। अधिकतर राज्यों में प्रथम कक्षा से ही दूसरी भाषा का भी अध्ययन कराया जाता है और अपेक्षा होती है कि कक्षा 5 वीं तक के बच्चे को उस दूसरी भाषा के सरल शब्दों का वाचन कर लेना चाहिए और सरल वाक्यांशों के अर्थ समझ लेना चाहिए।

आपको स्थिति की सच्चाई का पता लगाने के लिए निकट के किसी शासकीय विद्यालय का दौरा करना चाहिए। विशेषकर ग्रामीण शासकीय विद्यालयों का दौरा करना चाहिए। यदि अपवादस्वरूप आप किसी बहुत अच्छे शासकीय विद्यालय में नहीं पहुंच गए हैं तो आप अफसोस कर रहे होंगे कि हमारी प्राथमिक शिक्षा की इतनी बुरी स्थिति है। संभवतः आंकड़े ये होंगे कि आधे से अधिक बच्चे जो कक्षा 5 वीं या 4थी में होंगे वे धाराप्रवाह पुस्तक का वाचन नहीं कर  पा रहे होंगे। इन्हीं कक्षाओं के कुछ बच्चे ऐसे होंगे जिन्हें वर्णमाला का ज्ञान नहीं होगा। तो यह है हमारा ग्रामीण भारत और उसकी शिक्षा व्यवस्था।

यह कोई नहीं जानता कि प्राथमिक शिक्षा की ऐसी बुरी स्थिति कब से है ? क्या ऐसी स्थिति  हमारी आजादी और इसके पूर्व से है या फिर किसी काल विशेष में ऐसी गुणात्मक गिरावट आई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बात को आप दस्तावेजों में ढूढ़ने का प्रयास करेंगे तो स्थिति उलट जाएगी। किसी भी विद्यालयीन रिकॉर्ड में यह नहीं दिखाया जाता कि उनके स्कूल का कक्षा -5वीं का ऐसा कोई बच्चा है जो मूलभूत दक्षताओं को पूरा नहीं करता ।स्कूल तो उन्हें मूलभूत दक्षताओं में पूर्णता का प्रमाण -पत्र जारी करता है जिसके आधार पर बच्चे को कक्षोन्नति प्राप्त होती है। परंतु व्यावहारिक तौर पर सच्चाई कुछ और है।

यह सच्चाई समाज के समक्ष समस्या के रूप में कभी सामने नहीं आ पाती। उसकी कई वजह हैं। ग्रामीण विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे उनके होते हैं जिन्हें अपनी आवाज उठाने का कोई माकूल प्लेटफॉर्म उपलब्ध नहीं है। या ये कहें कि जीवन कि मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में ही वे इतने टूटे होते हैं कि अपने बच्चे की उपलब्धि झांकने की उनमें फुर्सत नहीं होती। वे स्वयं भी इतने योग्य नहीं होते `कि वे ऐसा कर सकें। दूसरा , ग्रामीण विद्यालयों में अध्ययनरत जागरूक अभिभावकों के माता-पिता स्वयं अपने बच्चों को घर में पढ़ाते हैं जिसके आधार पर उनका बच्चा कक्षा में अव्वल रहता है, ऐसे लोग दो- चार ही होते हैं। वे स्कूल के भरोसे नहीं होते। इसलिए उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्कूल के बाकी बच्चों की स्थिति क्या है।

सरकारी स्तर पर इस बात का अंदाजा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि सरकार की मशीनरी चलाने के लिए जितने लोगों की जरूरत है , उनसे कई गुना लोग निजी विद्यालयों और संपन्न घरानों से तैयार हो जाते हैं। फिर भी आपको यह जानकर हैरत होगी कि जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा स्थान रखने वाले भारत में अच्छे शिक्षकों की आज भी कमी है।इसका ताजा उदाहरण यह है कि मध्यप्रदेश में हुए शिक्षकों की एक प्रतियोगी परीक्षा में अंग्रेजी और विज्ञान के कुछ जटिल विषयों के बहुत कम अभ्यर्थी पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण कर पाए हैं। प्राथमिक शिक्षा में आई गुणात्मक गिरावट का संभवतः यह  प्रथम उदाहरण है।

जब हम यह कहते हैं कि प्राथमिक शिक्षा की स्थिति बुरी है तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि ऊंची कक्षाओं की स्थिति बहुत अच्छी है। बल्कि इसका तात्पर्य यह है कि बाकी कक्षाओं की स्थिति समझ लेने लायक है। वैसे भी जिस परीक्षा में 33 प्रतिशत अंक प्राप्त परीक्षार्थी उत्तीर्ण घोषित किए जाते हों, ऐसी बोर्ड परीक्षा में आधे के करीब बच्चों का अनुत्तीर्ण हो जाना हमारी शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए पर्याप्त है। यदि हमारी प्राथमिक शिक्षा मजबूत होती तो हमारी बोर्ड परीक्षाओं का प्रदर्शन इतना खराब कभी नहीं होता।

हम हमेशा प्राथमिक शिक्षा की स्थिति का आकलन  सरकारी विद्यालयों के संदर्भ में करते हैं। जबकि प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने वाले बहुत से निजी विद्यालय भी  हैं जिनके कक्षा 5 वीं में अध्ययनरत बच्चों की वही स्थिति है जो सरकारी स्कूल के बच्चों की है। वास्तव में बहुत से निजी स्कूल उनके निकट के सरकारी स्कूल को अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं और वे सिर्फ इतना प्रयास करते हैं कि उनके स्कूल के बच्चों की स्थिति निकट के सरकारी स्कूल से अच्छी हो। कहने का तात्पर्य यह है कि सरकारी स्कूलों में गुणवत्ता का गिरना , निजी स्कूलों के फलने-फूलने का अवसर देता है और अपेक्षाकृत उन विद्यालयों का भी स्तर गिराने का सहयोगी होता है।

यह देखा जाता है कि ऊंची कक्षाओं में जाने पर बच्चे की समझ काफी विकसित हो जाती है। बहुत से प्रश्नों के उत्तर वह बिना पुस्तकीय ज्ञान के, मात्र समझ के आधार पर दे सकता है। किंतु भाषायी अक्षमता के कारण वह सही तरीके से लिख नहीं पाता। वह पुस्तक का वाचन नहीं कर पाता। यही वह समय है जब उसका भाषायी अल्पज्ञान उसके आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है। वह समझ सकता है कि शिक्षक उसके परिवेश की कौन सी बात कर रहा है परंतु वह आंखें होते हुए भी यह नहीं देख पाता कि वो सारी बातें उसके पुस्तक में लिखी हुई हैं। अपने समूह में ऐसे बच्चे संकोच और शर्म का एहसास करने लगते हैं। उन बच्चों की कोशिश होती है कि वे कक्षा की अंतिम पंक्ति में बैठें। उन्हें हमेशा डर होता है कि कहीं शिक्षक उनकी अभ्यास-पुस्तिका देख न ले।

कोई भी शिक्षक भारी-भरकम पाठ्यक्रम को छोड़कर दक्षता संवर्धन का जोखिम नहीं उठाता। और जैसे ये कक्षा एक से कक्षा 5 आए थे वैसे ही ये कक्षा 6 से कक्षा 8 पहुंच जाते हैं और अगले दो सालों के लिए कक्षा 9 भी पक्की हो जाती है। एक वर्ष 8 वीं उत्तीर्ण के रूप में और एक वर्ष 9 वीं अनुत्तीर्ण के रूप में । आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ऐसे बच्चे की उम्र क्या होगी? 10वीं पढ़ने वाले बच्चे की उम्र क्या होगी? 15 वर्ष। अब यह बच्चा अपने आप आरटीई यानी सरकारी जिम्मेदारी से बाहर हो जाता है। यानी कि एक अंगूठा छाप किंतु 9 अनुत्तीर्ण का प्रमाण-पत्र लेकर ऐसा बच्चा अपने जिंदगी को 15वें वर्ष में आ जाता है। इनमें से अधिकांश बच्चे मजदूरी का रास्ता अपनाते हैं। अनुत्तीर्ण हो जाने और कुछ न जान पाने की इनके भीतर अथाह कुंठा  होती है। होनी भी चाहिए। ऐसा बच्चा किशोर वय का बच्चा होता है। ऐसी अवस्था जिसमें भविष्य के सपने पल ही नहीं रहे होते बल्कि आसमान में उड़ान भर रहे होते हैं। लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता कि उड़ने के लिए उनके पर उगने ही नहीं दिए गए ।और गंभीर बात तो ये कि उन्हें आभास भी नहीं होने दिया गया कि ये बे-पर हैं।  ऐसे बच्चों की उम्र मजदूरी करने की नहीं होती। ज्यादातर मामलों में ये मजदूरी के नौसिखुआ होते हैं। तात्पर्य ये कि इन्हें यह ज्ञान नहीं होता कि कौन -सी मजदूरी करने लायक है और कौन सी नहीं। ऐसे निरपराध बच्चे लालच में यदि किसी जोखिम भरे काम में , जिसमें अपराध भी शामिल हो ,में लिप्त हो जाएं तो इसमें उनका क्या दोष? कहना न होगा कि ऐसे बच्चे ही अपराध जगत रचते हैं। असामाजिक तत्व ऐसे ही बच्चों को बुराई फैलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह एक भयावह स्थिति है। जनसंख्या में वृद्धि के साथ ही यह समस्या और बढ़ने वाली है।

प्राथमिक शिक्षा की बुरी स्थिति की पीछे वजह यह है कि शिक्षा के प्रति सरकार का रवैया बदला है। दो-चार उदाहरण होंगे जहां सरकारी शिक्षकों ने अपने स्थान पर स्कूल में किसी और से अध्यापन कार्य कराया होगा और उसके बदले उसे अपने वेतन का अति अल्प भाग दिया होगा। परंतु इस दोष को पूरे शिक्षाजगत में मढ़ देना कहां न्यायोचित है? शिक्षकों की भर्ती नीति में आमूल-चूल बदलाव किए गए और नियमित सरकारी शिक्षकों के वेतन के दशांश वेतन में तथाकथित कई पैरा नामों से शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया को अमल में लाया जाने लगा। सरकार को उस समय के शिक्षक के एक वेतन से पांच-पांच शिक्षकों की नियुक्ति करने में सफलता क्या मिली , सरकार ने इसे स्थायी नीति बना लिया। सरकारी पद एक ऐसा लालच है कि कदाचित कुछ लोग  अवैतनिक आमंत्रण भी स्वीकार कर लेंगे। परंतु क्या सरकार को इसे स्थायी नीति बना लेना चाहिए? परिणाम यह हुआ कि सरकार के पैरा नामों से की गई भर्ती से पहुचे शिक्षकों ने इसे कभी भी अपना प्राथमिक व्यवसाय स्वीकार नहीं किया। उन्होंने इसके साथ अन्य धंधों में अपना दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया। जिसके कारण उनके मनोमस्तिष्क में शिक्षक की छवि कभी बन ही नहीं पाई। दूसरे , जिन्होंने स्वरुचि के कारण इसे प्राथमिक व्यवसाय माना उन्होंने मनोमस्तिष्क में सरकार में प्रति आक्रोश भर लिया जो जब-तब आंदोलनों के रूप में दिखाई पड़ता है।

अल्पवेतन के कारण अधिकारियों का दृष्टिकोण भी बदला है। इतना कम वेतन कि ऐसे शिक्षकों पर कार्यवाही करने में या तो शर्म आती है या तरस। मध्यप्रदेश में शिक्षाकर्मियों का एक संवर्ग था जिसे बदलकर अब अध्यापक कर दिया गया है। जब तक यह संवर्ग शिक्षाकर्मी के रूप में था , तब तक शायद की किसी शिक्षाकर्मी के विरुद्ध किसी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्यवाही की गई हो। हां, अध्यापक संवर्ग के गठन के बाद अवश्य कुछ कार्यवाहियां हुई हैं। यद्यपि अधिकांश कार्यवाहियां  अनुपस्थिति या अन्य कारणों पर होती हैं बच्चों की गुणवत्ता का उससे कोई लेना -देना नहीं होता है। इस प्रकार मात्र शिक्षकों की भर्ती नीति में बदलाव के कारण प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित होती चली गई।

हमने अभी 66वंा गणतंत्र दिवस मनाया है। इतने वर्षों में हमारे यहां कोई भी व्यक्ति सेवानिवृत्ति को प्राप्त हो जाता है। परंतु शिक्षा के क्षेत्र में किए गए प्रावधानों के शून्य परिणामों से पैदा हुई हमारी छटपटाहट यह बताती है कि शिक्षा के क्षेत्र में विशेषकर ग्रामीण भारत की शिक्षा में हम अभी भी शैशवकाल में हैं। हम कुछ भी नहीं कर सकते यदि कोई अभिभावक अपने बच्चे को नियमित विद्यालय नहीं भेजता। न तो ललचाने के लिए कोई पुरुस्कार है और न ही भय पैदा करने के लिए कोई दण्ड। एक सरकारी शिक्षक अंगूठे छाप को 5वीं , 8वीं और उससे भी उच्चतर कक्षा उत्तीर्ण का प्रमाण-पत्र सौंप देता है , और हमारा तंत्र हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाता है। इससे साफ स्पष्ट होता है कि प्राथमिक शिक्षा के संबंध में अभी भी हमने इतनी सुविधाएं नहीं बनाईं हैं कि कोई सामान्य बच्चा प्राथमिक शिक्षा की इतनी बुरी स्थिति  को प्राप्त न  हो। और इसीलिए हम शिक्षकों को जैसा वे करते हैं, करने देते हैं।

शिक्षा व्यवस्था में खाना-पूर्ति का जमाना जाना चाहिए। मास्साबों को वो सारी सुविधाएं दी जानी चाहिए जिसके वे हकदार हैं। समाज में उन्हें प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए। वेतन -भत्तों और अन्य सुविधाओं के लिए उन्हें अधिकारियों और बाबुओं के सामने गिड़गिड़ाने की , हाथ जोड़ने की जरूरत न पड़े। शिक्षकों की किसी भी समस्या को राजनैतिक रंग देकर वोट बैंक बनाने की पुरानी कुत्सित सोच से सरकारों को अलग होना होगा। शिक्षकों की सारी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने की सरकार की नीति होनी चाहिए।साथ ही शिक्षकों को चाहे वे किसी भी नाम से क्यों न पुकारे जाते हों , इतना दायित्वबोध होना चाहिए कि उनकी जिम्मेदारी में कई भविष्य पल रहे हैं। शिक्षक को हुल्लड़बाजी , गुटबाजी और कुछ भी करके स्कूल में समय गुजारना शोभा नहीं देता। जब-जब शिक्षा की बुरी तस्वीर अखबारों में छपेगी ,तब-तब पार्श्व में जिम्मेदारी के प्रति उदासीन, गैरजिम्मेदार शिक्षक की तस्वीर भी होगी। सरकार के सारे उपाय बेकार हो जाएंगे ,जब तक शिक्षक उन उपायों को अमल में लाने के लिए उत्साहित नहीं होगा। यहां पर सरकार की बड़ी जिम्मेदारी है कि वह शिक्षकों का उत्साह बनाए रखे किन्तु सरकार से भी बड़ी जिम्मेदारी शिक्षकों की है कि वह समाज के प्रति अपने पुनीत कर्तव्य को सरकार की किसी सुविधा का मोहताज न बनाए। यदि एक शिक्षक पढ़ाना चाहे तो वह बेहतर जानता है कि वह किस तरह पढ़ाए। शिक्षक इतना करना तो आरंभ ही कर दे कि उसके कुछ करने और न करने का फर्क समझ में आए। प्राथमिक शिक्षा के प्रति गंभीर होना उतना ही जरूरी है जितना कि देश की सुरक्षा के प्रति गंभीर होना ।                                                                    

-सुरेन्द्र कुमार पटेल,वार्ड क्रमांक 4, ब्योहारी जिला-शहडोल मध्यप्रदेश  

अच्छा बोल कर बढ़ा सकते हैं आप अपनी अहमियत

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

नए युग में कार्य-व्यापार से लेकर जीवन-व्यवहार और रोजगार के क्षेत्र में भी संवाद कौशल व सम्प्रेषण का महत्व बढ़ता जा रहा है,लेकिन, याद रहे कि कुछ लोग हैं जिनके पास कहने योग्य कुछ भी नही होता पर वो अक्सर कुछ न कुछ कह बैठते हैं. दूसरी तरफ ऐसे लोग भी हैं जिनके पास कहने के लिए पूरा खजाना ही साथ-साथ चलता है पर दुर्भाग्य ही समझिये कि वे चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाते हैं. मौखिक और लिखित संचार और संवाद के साथ किसी संस्थान में समूह के बीच रहकर काम करने तथा संस्था के हितों को प्रगतिगामी बनाने पर ही उसकी सफलता निर्भर करती है। लेकिन, यह अफ़सोस और आश्चर्य की बात भी है कि बोलने की कला और अभिव्यक्ति के तौर तरीकों पर इतना जोर दिए जाने के बावजूद बहुतेरे लोग हैं जिनके लिए यह काम पहाड़ जैसा है।

झिझक, संकोच. भय, आशंका, आत्महीनता न जाने कितनी चीजें बोलने वालों की राह में अवरोधक बनकर खड़ी हो जाती हैं. कभी वे चाह कर भी बोल नहीं पाते हैं, कभी उनके भीतर अपनी बात कहने की तत्परता ही नहीं दिखती, पर सच तो यह है कि बोलना अक्सर उनके लिए एक दूभर कार्य हो होता है. लिहाज़ा होता यह है कि ठीक समय पर, सही ढंग से अपनी बात न कह पाने के कारण वे प्रगति की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। आज सूचना-संचार के अंतहीन विस्तार के दौर में तो यह कहना अधिक सही है कि जो अपनी बात ठीक ढंग से कहेगा वही इस दुनिया के बाज़ार में रहेगा। इसलिए सोचकर कहने के साथ-साथ कहने पर सोचने से भी परहेज़ करना ठीक नहीं है।  

कहना न होगा कि सफलता, संचार और संवाद कुशलता पर काफी हद तक निर्भर करती है।  इसके लिए गहराई से समझना जरूरी है कि आपका सन्देश क्या है, यानी आप वास्तव में क्या कहना और सुनने वाले तक क्या पहुंचाना चाहते हैं. यह भी कि समय और आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आपने सही माध्यम का चुनाव किया भी है या नहीं है. 

ज़ाहिर सी बात है कि अपने सन्देश को प्रभावशाली ढंग से निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए संचार के इन सभी स्तरों पर किसी भी प्रकार की बाधा को दूर करना पड़ेगा मिसाल की तौर पर सन्देश को ही लीजिये. यदि सन्देश बहुत लंबा. अस्पष्ट या अनगढ़ होगा तो उसकी सार्थकता नहीं रह जायेगी. 

दरअसल नपे-तुले शब्दों में, समय और ज़रुरत का ध्यान रखकर कही गई बात की अहमियत बढ़ जाती है .यदि ऐसा न हो सका तो यह भी संभव है कि आपकी बात का गलत अर्थ निकाल लिया जाये या फिर उसकी किसी अन्य सन्दर्भ में गलत व्याख्या कर दी जाये. इसलिए, जिन्हें अभिव्यक्ति की शक्ति का भान है वे कुछ कहने की साथ-साथ अच्छा कहे हुए को सुनने के लिए सदैव तत्पर देखे जा सकते हैं. और उनकी तो चर्चा ही व्यर्थ है जो कहने और सुनने के बदले महज़ कहा-सुनी में मशगूल होते है. यहाँ संचार के सारे नियम ध्वस्त हो जाते हों तो आश्चर्य क्या है?

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लेखक प्रखर वक्ता, कुशल प्रशिक्षक

और दिग्विजय कालेज में प्रोफ़ेसर है।

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व्यंग्य
खुशखबरी! देश में लकड़बग्घों की संख्या तेज़ी से बढ़ी!
डॉ. रामवृक्ष सिंह

हाल ही में देश में बाघों की गणना की गई। पता चला कि बाघों की संख्या 2010 की तुलना में लगभग 30% बढ़कर 2226 हो गई है। पृथ्वी पर इन्सानों और बनैले जानवरों के अपने-अपने रिहाइशी क्षेत्र बँटे हुए हैं। प्राकृतिक संतुलन के लिए ज़रूरी है कि दोनों अपने-अपने इलाके में फलें-फूलें और चैन से रहें। बाघ हमारे देश के संरक्षित पशु हैं और उनके शिकार पर पाबंदी है। लिहाज़ा बाघों की संख्या में वृद्धि होना प्रसन्नता का विषय है। इसके लिए लड्डू बाँटे जाने चाहिए। लेकिन दिक्कत की बात यह है कि बाघ जैसे प्यारे राष्ट्रीय पशु के साथ-साथ, अपने देश में लकड़बग्घों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। लकड़बग्घा प्रजाति के इन्सानों और उन्हें चाहने वालों के लिए यह खुशी की बात हो सकती है, किन्तु शरीफ और निरीह भारतवासियों के लिए यह घोर चिन्ता का विषय है। और दिक्कत यह भी है कि शरीफ आदमी प्रायः निरीह ही होता है, उसका मुँह तो कुत्ता भी चाट जाता है। लकड़बग्घा तो खैर उसे खाकर हजम ही कर डालता है।

लकड़बग्घे आसानी से पहचान में नहीं आते। यानी यदि किसी को लकड़बग्घे की सही पहचान न हो तो वह उसे अपना वफादार साथी यानी छोटे आकार का गधा, कुत्ता, बकरी आदि समझकर निरापद भी मान सकता है। लकड़बग्घे प्रायः भेस बदलकर रहते हैं और प्रथम दृष्टि में भले दिखते हैं। इसीलिए मुहावरा प्रचलित है भेड़ की खाल में भेड़िया।

अपने समाज में लकड़बग्घों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। और सबसे बड़ी परेशानी का सबब यह है कि लकड़बग्घे दो पैर वाले, सफेद अथवा शुभ्र वस्त्र-धारी भी हो चले हैं। वे हें-हें करके हँसते हैं, हाथ जोड़े आपके इर्द-गिर्द घूमते हैं, आपका सेवक होने का ढोंग रचते हैं। यानी आपके मन और मस्तिष्क पर पूरी तरह काबिज हो जाते हैं। आपको अपने चंगुल में फँसा लेते हैं और आप जैसे ही तनिक असावधान अथवा आश्वस्त होते हैं, वे चट से आपको अपना शिकार बना लेते हैं।

हमारे प्रान्तों और देश की राजधानी में कुछ विशेष इमारतें और संस्थाएं ऐसी हैं, जहाँ ये छद्म भेसधारी लकड़बग्घे आराम से घुसपैठ कर लेते हैं और उन इमारतों और संस्थाओं को अपनी सुरक्षित माँद की भांति इस्तेमाल करते हैं। एक बार ये वहाँ घुस गए तो माननीय कहलाने लगते हैं और फिर इनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

कई बार तो लकड़बग्घे पैदाइशी होते हैं, किन्तु बहुधा वे गुणान्तरण और व्यवसायान्तरण की प्रक्रिया से भी वर्तमान स्वरूप को प्राप्त होते हैं। आपने चुहिया वाली कहानी तो पढ़ी होगी, जिसमें एक ऋषि महोदय एक निरीह चुहिया को धीरे-धीरे शेर बना देते हैं। वही स्थिति हम आम हिन्दुस्तानियों की है। प्रजातंत्र ने समूहबद्ध नागरिकों को असीम शक्ति प्रदान की है। हम उन ऋषि-मुनियों की भांति हैं जो निरीह प्रतीत होनेवाली चुहिया की याचना से द्रवित होकर उसे कालान्तर में सर्वशक्तिमान शेर बना देते हैं और बाद में वही शेर हमें मार-मारकर खाने लगता है, हमारे संसाधनों को चट करने लगता है। चुहिया और शेर के दृष्टान्त में हम शेर को हटाकर लकड़बग्घा रख दें, तो पूरा परिदृश्य उभरकर सामने आ जाता है। लिहाज़ा, सौ की एक बात यह कि लकड़बग्घे हमारे चारों ओर किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं और हमने उन्हें मूषक से लकड़बग्घा तो बना डाला है, किन्तु हिंसक और हमारी जान-माल के दुश्मन हो चुके लकड़बग्घों को पुनः मूषक बनाना हमारी औकात के बाहर की बात है।

जैसाकि हमने बताया कुछ लकड़बग्घों को सफेद खद्दर पहनकर देश की निरीह जनता और उसके संसाधनों का भक्षण करना पसंद है। कुछ लकड़बग्घे सार्वजनिक संस्थाओं में चले आते हैं और वहीं से अपने अधिकार-क्षेत्र के समस्त संसाधनों का भरपूर दोहन करते हैं। कुछ लकड़बग्घे बाबाजी और बापू जी का बाना धारण कर लेते हैं और बकरियों, खरगोशों, गायों-बैलों के सदृश मनुष्यों को प्रवचन देते-देते उन्हीं में से किसी-किसी का शिकार कर लिया करते हैं।

लकड़बग्घों के बारे में एक चीज़ जो बहुत कॉमन है, वह है उनकी धन-लोलुपता और काम-लिप्सा। कभी-कभी तो वे अपने जीते-जी प्रकाश में आ जाते हैं और धरकर सलाखों के पीछे पहुँचा दिए जाते हैं। किन्तु कभी-कभी जीते-जी पकड़ में नहीं आते और मरने के बाद जब उनकी माँद खोदी जाती है, तब पता चलता है कि अरे इस लकड़बग्घे ने तो इतने क्विंटल सोना-चाँदी, नकदी और अकूत संपदा अपनी माँद में छिपा रखी थी। लकड़बग्घों की काम-लिप्सा की शिकार महिलाएँ और बच्चियाँ यहाँ-वहाँ गुहार लगाती फिरती हैं। कभी-कभी उनकी गुहार सुन ली जाती है, लेकिन अकसर उनकी करुण पुकार सत्ता के गलियारों तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती है। कारण यह कि वहाँ भी जहाँ-तहाँ लकड़बग्घों के ही यार-दोस्त, भाई-बंधु विराजमान होते हैं, जो मामले को दबा देते हैं। इसे देखकर हमें एक नया मुहावरा रचने का मन करता है- लकड़बग्घा लकड़बग्घा भाई-भाई।

अपने देश की न्याय-प्रणाली और शासन-व्यवस्था यथाशक्य ऐसे लकड़बग्घों को सबक सिखाने की कोशिश भी करती है। उनके लिए विशेष चिड़ियाघर खोले गए हैं, जहाँ उनके जैसे अन्य जानवर रखे जाते हैं। कुछ लकड़बग्घों को इन्सानी बस्तियों से पकड़-पकड़कर इन विशेष चिड़ियाघरों में पहुँचाया जा चुका है, किन्तु अभी बहुत बड़ी संख्या में लकड़बग्घे हमारे आस-पास छुट्टा घूम रहे हैं और पूरा देश लकड़बग्घों का अभयारण्य बना हुआ है। पता नहीं, कब हमारा देश लकड़बग्घों की इस बढ़ती हुई प्रजाति से मुक्त होगा! फिलहाल तो आइए बाघों की गणना के बढ़े हुए आँकड़ों का आनन्द लूटें, तब तक, जब तक कि कोई स्वयंसेवी संगठन आकर यह न प्रमाणित कर दे कि अरे, ये आँकड़े तो बिलकुल बेबुनियाद और झूठे हैं! लेकिन यकीन जानिए देश में लकड़बग्घों की तेजी से बढ़ती जनसंख्या की खबर बिलकुल सच्ची है। यकीन न हो तो आप खुद आजमा कर देख सकते हैं। और भगवान न करे कि कभी आपका उनसे पाला पड़ जाए। बड़े घटिया जानवर होते हैं साहब!
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मैं लालकिले के पास बस का इंतजार करता फटे पोस्टर में से निकलने वाले हीरो के बारे में सोच रहा था कि तभी भीड़ में से अचानक चार जने मेरी ओर लपके।  झक्क कुरते पायजामे में। सच कहूं,  मैंने ऐसे साफ सुथरे लागे कुरते- पायजामों में चुनाव के दिनों को छोड़कर आजतक नहीं देखे। क्या मजाल जो उनके कपड़ों पर एक भी दाग खुर्दबीन तक से दिख जाए।
गौर से देखा तो चुनावी सीजन के मित्र के साथ तीन  में से दो जने जो काफी मोटे तगड़े थे  तथा उन्हें देखकर ऐसा ही लग रहा था मानो मित्र ने उन्हें पाला ही चुनाव के दिनों के लिए हो।  तीसरे सिर पर भारी गांठ थी। जब ध्यान से देखा तो उसमें से कुरते- पायजामें  बाहर निकलने को बेताब!  सोचा, मित्र ने देश सेवा करने के धंधे के बदले कुरते- पायजामे बेचने का धंधा कबसे शुरू कर दिया होगा!


चुनावी मित्र ने  गले मिलने, हाय- हैलो करने के बदले उन दो मुस्टंडा वर्करों को  मेरी ओर नजरें घुमा टेढ़ी नजर से तिल भर इशारा किया कि चेहरे से ध्याड़ी पर लगने वालों  ने मुझे एक पल भी दिए बिना मेरी पैंट खींचनी शुरू कर दी तो मैं न चिल्लाने लायक न हंसने लायक।  चिल्लाऊं तो  किस पर? हंसू तो किस पर? 


बिन कोई पल गवांए इससे पहले कि मेरी पैंट का लालकिले के पास हरण हो जाता,  मैं जितनी अपनी पैंट को उनसे खींचने से बचाने की कोशिश कर रहा था, वे दोनों उससे भी अधिक कोशिश से मेरी पैंट उतारने पर उतारू थे।  लगा, आज लालकिले के पास महाभारत अपने को दोहराकर रहेगा। हे प्रभु! पहले आपने भरी सभा में द्रोपदी की लाज बचाई थी, अबके मेरी बचा दो तो समझूं कि भगवान कलियुग में भी  जनता की लाज बचाने आते हैं। हे प्रभु! इससे पहले की लालकिले के पास एक मर्द की पैंट खिंच जाए, कुछ करो प्लीज!  जीव तो आखिर जीव होता है। स्त्री -पुरूष तो बस सब माया का हेर- फेर है।


वहां पर सब खड़े - खड़े तमाशा देखते रहे, मुंह पर हाथ धरे हसंते रहे। वे मेरी पैंट खींचते रहे और मैं अपनी पैंट खींचने से बचाता रहा। पर कोई मेरी सहायता के लिए नहीं आया तो नहीं आया। आखिर जब  मेरे विरोध की तारें तड़कने को हुईं तो मेरे चुनावी मित्र आगे मुस्कराते बोले,'  थक गए??  पर यार! कैसे बंदे हो तुम भी ? हम चाहते हैं कि... और तुम हो कि....'
' मित्र! ये कैसी मित्रता है? अपने मुस्टंडों से मेरी पैंट खिंचवा रहे हो और वह भी .....'


' ये तुम्हारी पैंट नहीं खींच रह,े तुम्हारा सत्रहवां सस्ंकार कर रहे हैं,' मित्र ने मुस्कराते कहा और आंखों ही आंखों में मुझे और बेकार का विरोध न करने की सलाह दी,' बेकार में आपनी अनर्जी बरबाद क्यों कर रहे हो! चलो,अब इसे देश हित में लगाओ तो बात बने!'
' मतलब???'
' हम तो चाहते हैं कि तुम हमारी पार्टी का पायजामा पहनो और...... परे करो ये जनता वाली पैंट! पैंट वालों पर राज करो। हम तो तुम्हारे भले के लिए तुम्हारा कल्याण करना चाहते हैं  और एक तुम हो कि.... लालकिले से सामने भी विरोध जता रहे हो!.'
' पर देश सेवा तो पैंट पहने भी हो सकती है न मित्र? पैंट और पायजामे से देश सेवा का क्या संबंध?'


' है। ड्रेसकोड भी कोई चीज होती है कि नहीं? अब अगर पुलिसवाला खाकी नहीं पहनेगा तो  रहेड़ी- पटड़ी वालों को कैसे पता चलेगा कि हफ्ता वसूली वाला बंदा सही है? ऐसे ही जो  हम पैंट में देश सेवा करने उतर गए तो जनता को कैसे पता चलेगा कि बंदा देश चलाने वाला है या... दूसरे पैंट का साइज जितना हो  उसमें उतना ही पेट आता है। सिचुएशन के हिसाब से बड़ा छोटा पेट नहीं किया जा सकता। उसे मौके के हिसाब से  ढीला- तंग नहीं किया जा सकता। अगर उसमें साइज से बड़ा पेट रखने की कोशिश करो तो जनता को दिखने के  हंडरड परसेंट चांस होते हैं। बदनामी  का एकदम खतरा!  और पायजामे में नाड़े की सहूलियत होने से पेट जितना बढ़ा लो, बढ़ा लो पता ही नहीं चलता!
' मतलब???'
' मतलब यही कि आज हम तुम्हें तुम्हारी पैंट उतार अपनी पार्टी का पायजामा पहना कर रहेंगे,' कह उन्होंने अपने मुस्टंडों से जबरदस्ती करने की हिदायत दी तो मैंने  लालकिले की ओर दुहाई देते दोनों हाथ जोड़े। पर उस वक्त वहां था ही कौन जो मुझे बचाता?


सामने तीसरा अपने हाथ में पायजामा लिए मेरे आगे ऐसा लहरा रहा था जैसे कोई मरियल सांड के आगे लाल कपड़ा लहरा रहा हो।
मैंने एकबार फिर उनके आगे दोनों  हाथ जोड़ते कहा,' मित्र!  अगर तुम करना ही चाहते हो तो ऐसा करो कि मुझे अपनी पार्टी का पायजामा दे दो। मैं इसे  पैंट के ऊपर से पहन लेता हूं,' तो वे गुर्राते बोले,' नहीं! डुप्लीकेसी कतई नहीं। हमारी पार्टी में ये हरगिज नहीं चलता कि बंदा बाहर से कुछ और  हो और भीतर से कुछ और.... चलो, यार! जल्दी करो! घर जाने से पहले दस जनों की पैंट खींच उन्हें भी पायजामे पहनाने हैं।  हमारा आजका टारगेट है कि डिनर करने से पहले....'


' मतलब??'


'अरे यार! पार्टी सदस्यता अभियान है, और क्या?? अगर चुनाव न होते तो तुम्हें तो क्या, हम खुद पायजामा नहीं पहनते। चुनाव के बाद तुमने हमें देखा कभी पायजामे में? नहीं न!  खींचने को तो हम किसी और की पैंट खींच उसे पार्टी का  पायजामा पहना सकते थे , पर तुम दूर से दिख गए तो सोचा, अपने दोस्त की पैंट खींच उसे ही क्यों न पायजामा पहना स्वर्ग जाने का मौका दें... बहुत हुआ सौ -सौ के लिए जनता की फाइलें ऊपर की नीचे- नीचे की ऊपर करना। चलो शान से सत्र में कुर्सियां चलाओ और हीरो हो जाओ।  पर एक तुम हो कि.... इस देश में अगर किसीका भला करने की सोचो भी तो वह .... कैसे उद्धार होगा इस देश का ? '


और मैंने न चाहते हुए भी जमाने की आंखों पर पट्टी बांध  उनकी सहायता कर उनसे अपनी पैंट खींचवा दी


अशोक गौतम,
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

हुसैन न केवल चितेरे थे, बल्कि हास्य-व्यंग्य में भी अपनी कूंची चलाया करते थे - अक्सर अपने पत्रों में. प्रस्तुत हैं उनके हास्य-व्यंग्य और हास-परिहास के कुछ नमूने  - बियांड द कैनवास, एन अनफ़िनिश्ड पोर्ट्रैट ऑव एम एफ हुसैन - बाय इला पाल से साभार.

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बाघों की वृद्धि अच्छी खबर


प्रमोद भार्गव
    देश में लुप्त हो रहे बाघों की संख्या बढ़ रही है,यह अच्छी खबर है,वरना 2006 के आसपास तो हालात ऐसे बन गए थे कि बाघों के किताबों और फिल्मों में ही सिमटकर रह जाने की उम्मीद जताई जाने लगी थी। क्योंकि सारिस्का और पन्ना बाघ आरक्षित क्षेत्रों में एक भी बाघ शेष नहीं रह गया था। प्रत्येक 4 साल में बाघों की गिनती होती है। पिछले दो मर्तबा से यह गणना खुश-खबरी दे रही है। गोया,2006 और 2010 के बीच जो गिनती हुई,उसके अनुसार बाघ 1411 से बढ़कर 1706 हुए और फिर 2010 से 2014 के गिनती के परिणामों ने बाघों की संख्या 2226 तक पहुंचा दी। मसलन बीते 4 सालों में बाघों की वृद्धि में 30 प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि यह गिनती भी अभी संपूर्ण और विश्वसनीय नहीं है,क्योंकि एक तो इसमें पूर्वोत्तर के राज्यों और मध्यप्रदेश के सतपुड़ा बाघ आरक्षित वनों की गिनती दर्ज नहीं है। दरअसल यह गिनती अभी की ही नहीं की गई है। दूसरे,नक्सल प्रभावित राज्य ओडीसा और झारखंड की गिनती भरोसे लायक नहीं है,क्योंकि इन क्षेत्रों के बाघ रहवास वाले सभी वन-खंडों में न तो कैमरे लगाए जा सके हैं और न ही वन-कर्मचारी दुर्गम इलाकों में नक्सलियों के भय के चलते पहुंच पा रहे है। जाहिर है,यदि जारी की गई गिनती सटीक है तो बाघों की संख्या इस गिनती से कहीं और ज्यादा है ?


    इस बार बाघों की गणना के आंकड़े वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जारी किए। इस अवसर पर खुशी जाहिर करते हुए उनका कहना था, ''दुनियाभर में बाघों की संख्या घट रही है,जबकि भारत में बढ़ रही है। यह हमारी बाघ सरंक्षण की दिशा में सफलता की कहानी है। इस पर हम गर्व कर सकते हैं।' इस बार कर्नाटक,उत्तराखंड,मध्यप्रदेश,तमिलनाडू और केरल में बाघों की संख्या बढ़ी है। सबसे ज्यादा 406 बाघ कर्नाटक में,फिर उत्तराखंड में 346,मध्यप्रदेश में 308 और तमिलनाडू में 229 बाघ हो गए हैं। इन राज्यों में क्रमशः 35.33,52.42,44.43 और 40.49 फीसदी की दर बढ़त दर्ज की गई है। बावजूद ओडीसा और झारखंड में बाघ घटे है। बाघों की गिनती बेहद जटिल और जोखिम भरी है। क्योंकि बाघों का आवासीय क्षेत्रफल 3 लाख 78 हजार वर्ग किमी में फैला हुआ है। हालांकि इस बार की गिनती के नतीजे बाघ आरक्षित राज्यों के वन-प्रांतरों में लगाए गए 9,735 कैमरों के द्वारा खींचे गए छायाचित्रों के आधार पर आए हैं। राष्ट्रीय बाघ सरंक्षण प्राधिकरण ने दावा किया है कि भारत के पास 80 प्रतिशत बाघों की विलक्षण तस्वीरें हैं। दुनिया में कहीं भी इतने स्वचालित कैमरे लगाकर बाघों की न तो गिनती कर पाना संभव हुआ है और न ही फोटो खींचना। वाकई यदि ऐसा है तो यह काम अद्वितीय है,इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होना चाहिए।


    यदि गणना से छूट गए इलाकों में रह रहे बाघ भी गिनती में शामिल हो जाएं तो भारत में उम्मीद से कहीं ज्यादा बाघों की संख्या हो जाएगी। फिलहाल नक्सल प्रभावित ओडीसा एवं झारखंड में संपूर्ण बाघों की गिनती नहीं हो पाई है। 2010 की गिनती के मुताबिक ओडीसा में 32 और झारखंड में 10 बाघ थे। जबकि 2014 के मुताबिक इनकी संख्या घटकर ओडीसा में 28 और झारखंड में 3 रह गई है। 2010 की गिनती इन क्षेत्रों में पंरपरागत पद्धतियों से की गई थी। तब 2006 की तुलना में नक्सली क्षेत्रों में बाघों संख्या बढ़त में दर्ज की गई थी। लेकिन तब इस गिनती पर यह सवाल भी उठा था कि जब इन दुर्गम जंगलों में नक्सलियों के भय से वनकर्मी प्रवेश ही नहीं कर पा रहे हैं तो गिनती कैसे संभव हो गई ? इसलिए वन्य जीव प्रेमियों व पर्यावरणविदों ने अंदाज लगाया था कि यह गिनती अनुमान आधारित है। हालांकि नक्सली भय का दूसरा पहलू यह भी है कि इन इलाकों में शिकारियों का भी प्रवेश वार्जित है,इसलिए निसंदेह इन जंगलों में वास्तविक गणना हो जाए तो बाघों की आशातीत वंशवृद्धि देखने में आएगी


    पूर्वोत्तर के राज्यों में भी गिनती नहीं हो पाई है। जबकि यहां अकेले सुदंरवन में 80 बाघों के होने का अनुमान हैं। सुदंरवन का बड़ा इलाका दलदली क्षेत्र होने के कारण पहुंच से बाहर है। इस अभयारण्य में पतवार से चलने वाली छोटी नावों से ही चलना संभव हो पाता है। दलदली और उथला क्षेत्र होने के कारण मोटर वोंटे यहां चल नहीं पाती। नरभक्षी बाध भी इसी सुदंरवन में सबसे ज्यादा हैं। क्योंकि इस इलाके के जो मूल निवासी है,उनकी आजीविका इस दलदली पानी से मछली बटोर कर चलती है। ऐसे में बाघ इन लोगों का आसानी से भक्षण कर लेते हैं। इसलिए यह इलाका नरभक्षी बाघों के लिए वरदान बना हुआ है। और इसी वजह से यहां कभी भी बाघों की गणना विश्वसनीय नहीं रही।

 

मध्यप्रदेश में नौकरशाही की मनमानी के चलते सतपुड़ा बाघ सरंक्षण क्षेत्र में बाघों की गिनती का काम ही शुरू नहीं हो पाया है। होशंगाबाद,छिंदवाड़ा और बैतूल जिलों के 2200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में यह अभयाण्य फैला हुआ है। वनाधिकारियों को ऐसा अनुमान है कि इस क्षेत्र में 50 बाघ हो सकते हैं। बाघों के आवास,आहार और प्रजनन के लिए इस वनखंड को एनटीसीए ने देश के 10 प्रमुख बाघ संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों में से तीसरे स्थान का दर्जा दिया हुआ है। इस गिनती के पहले बाघों की गणना और सर्वक्षणों से जुड़े जो प्रतिवेदन आते रहे हैं,उनको यदि प्रामाणिक मानें तो 90 प्रतिशत बाघ आरक्षित बाघ अभयारणयों के बाहर रहते हैं। इन बाघों के संरक्षण में न वनकर्मियों का कोई योगदान होता है और न ही बाघों के लिए मुहैया कराई गई धनराशि बाघ सरंक्षण के उपायों में खर्च होती है। इस तथ्य की पुष्टि 2010 की बाघ गणना जारी करते हुए तात्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी की थी। उन्होंने कहा था,'नक्सल प्रभावित जो जंगल हैं,जिनमें वन अमले की पहुंच मुमकिन नहीं हैं,वहां और ऐसे अन्य जंगलों में बाघों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हुई है। लेकिन इनमें से ज्यादातर क्षेत्रों में गिनती संभव नहीं हो सकी है। यह हकीकत इसलिए भी उचित लगती है क्योंकि कि श्योपूर के कूनो-पालपूर अभयारण्य,शिवपुरी के माधव राष्ट्रीय उद्यान और मुरैना के जंगलों में हर साल बाघ की आमद दर्ज की जाती है,पदचिंह लिए जाते हैं,किंतु गिनती में इस क्षेत्र में मस्ती मार रहे बाघों को शामिल नहीं किया जाता। दरअसल एक बार गिनती में आने के बाद जंगलों में स्वछंद मटरगस्ती कर रहे बाघ पर निरंतर नजर रखना मुश्किल काम होता है,इसीलिए वनाधिकारी अपने कार्यक्षेत्रों में बाघ की उपस्थिति को टालते हैं,जिससे जिम्मेबारी से बचा जाए।


    2010 की बाघ गणना का सबसे शर्मनाक पहलू यह था कि सारिस्का और पन्ना अभयारण्यों में एक भी बाघ की आमद दर्ज नहीं की गई थी। इसके उलट 2006 से 2010 के बीच सारिस्का में 24 बाघों के मारे जाने और पन्ना में 16 से 32 बाघों के अवैघ शिकार कि पुख्ता खबरें आई थीं। इनकी पुलिस रिपोर्टें भी हुई थी। किंतु अब देश के सर्वाधिक सुरक्षित इन दोनों ही उद्यानों में बाघ की आमद दर्ज कर ली गई है। इससे उम्मीद जगी है कि कालांतर में मध्यप्रदेश का 'टाइगर स्टेट' का दर्जा बहाल हो जाएगा। फिलहाल कर्नाटक ने यह दर्जा मध्यप्रदेश से हासिल कर लिया है।


    बाघों की भविष्य में संख्या इसलिए और बढ़ सकती है,क्योंकि बाघ के अवैध शिकार और इसके अंगों की तस्करी के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े तस्कर संसारचंद्र और ठोकिया का अंत हो गया है। पारदी जैसी जनजातियां जो वन्य-जीवों के शिकार से ही आजीविका चलती थी,उन्होंने कानून के भय के चलते अपना धंधा जड़ी-बूटियों तक सीमित कर लिया है। साथ ही बाघ सरंक्षण की दिशा में न्यायालय,स्वंय सेवी संस्थाएं और आरटीआई कार्यकर्ता भी सजग हुए हैं। जनहित याचिकाएं लगाकर बाघ जैसे दुर्लभ प्राणियों के सरंक्षण की दिशा में अह्म पहलें की है। बावजूद 2013 में 63 और 2014 में 66 बाघ मारे गए हैं। इनमें से 10 फीसदी बाघों की ही आपसी झगड़े में अथवा स्वाभाविक मौतें हुई हैं, बांकि तो शिकारियों के हत्थे ही चढ़े है।
पर्यटन के लिए अभयारणय क्षेत्रों में होटल,मोटल,रिजॉर्ट व मनोरंजन पार्क बनाए जाने के विस्तार पर प्रतिबंध जनहित याचिकाओं के माध्यम से ही लगा है। इसी तर्ज पर इन अभयराण्ओं में चल रही खनन परियोजनाओं को नियंत्रित किया गया है।

इस लिहाज में उधानों में बाघों की जो संख्या बढ़ी है,उसके लिए वन अमले के इतर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय,स्वंय सेवी संगठन और आरटीआई कार्यकताओं की भूमिका भी सराहनीय रही है। केंद्र व राज्य सरकारें यदि पर्यटन से होने वाली आय को थोड़ा सीमित कर लें और बाघ के अंदरूनी अवास स्थालों तक पर्यटकों की पहुंच प्रतिबंधित कर दें तो अगली बाघ गणना में यह संख्या और बढ़ सकती है।

 

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

आज 26 जनवरी 2015, जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र का राष्ट्रपति बराक ओबामा हमारी ख़ुशी में शामिल होने आयें है, तो एक यह सोच अवश्यम्भावी होनी ही चाहिये कि हमारे अपने देश में इस ख़ुशी में कौन-कौन और क्या-क्या शरीक है| आज ही का दिन है जब यह विचार करने की आवश्यकता है कि कौन हैं जो देश की गणतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग हैं और क्या ऐसी व्यवस्थाएं हैं, प्रक्रियाएं हैं, सेवाएँ हैं, जिम्मेदारी हैं और अधिकार हैं जो गणतांत्रिक हैं? और जो कुछ गणतांत्रिक नहीं है वो यदि भारत का अंग है तो जीवित कैसे हैं? हमारे देश की आधी आबादी पढ़ना-लिखना भी नहीं जानती हो, जिसे जीने का हक भी मुश्किल से हासिल हो रहा हो क्‍या लोकतंत्र में उसकी भागीदारी का कोई अर्थ है ?

हम कहते हैं कि देश की जनता राज करती है सारे देश में गणतंत्र है तो फिर ये “रूलिंग पार्टी” क्या बला है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पिछले कई वर्षों से भारतीय लोकतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था राज कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है, उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ जाती है?

कितने प्रश्न हैं, जिन्हें सुलझाना आवश्यक है, प्रश्न यह भी है कि सुलझाये कौन? इतना शिक्षित कौन है, देश के वो लोग जो केवल मंहगाई का रोना रोते रहते हैं या फिर वो लोग जो किसी न किसी तरह से भ्रष्टाचार कर देश का नुकसान कर रहे हैं? जो बचे हुए हैं वो मौन हैं|

तो मेरे अनुसार, सबसे पहले जो आवश्यकता महसूस की जानी चाहिए वो है गणतंत्र की शिक्षा की, हालाँकि यह दुःख का विषय है लेकिन इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी गणतंत्र की शिक्षा और शिक्षा में गणतंत्र दोनों की बेहद आवश्यकता है| शिक्षा में शासन पद्धति अपनी मनमानी करती आ रही है, उचित शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री से लगाया जा रहा है या फिर छोटा-मोटा शोध करने से, लेकिन जन-जन की शिक्षा जो जनतांत्रिक हो, उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है| शिक्षा में जब निर्णय लेने का अधिकार जनता को अर्थात सभी हितधारकों (stakeholders) को मिल जायेगा तभी शिक्षा में गणतन्त्र सफल है|

और रही बात गणतंत्र की शिक्षा की, पिछले कई वर्ष तो भारतीय गणतंत्र के नाम पर एक शासन व्‍यवस्‍था के रहे हैं, शासन जो लोकतंत्र के नाम पर राज करता है। हमारे देश में लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देने के कर्तव्य और वोट देने के ही अधिकार से लगाया जाता है| उसके पश्चात एक शासन प्रणाली आ जाती है|

एक ख़ुशी का विषय यह है कि मौजूदा प्रधानमंत्री जन जन को देश की विभिन्न गतिविधियों से जोड़ने का प्रयत्न कर रहे हैं| E-Governance का नाम उन्होंने Democratic Governance दिया है और इस दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल कर दी हैं| My Government परियोजना से जुड़ कर भारत का प्रत्येक नागरिक अपनी राय दे सकता है| लेकिन यह केवल एक कदम है, अभी मीलों का सफ़र बाकी है|

हमारे समाज के आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक रूपांतरण के लिए एक शांतिपूर्ण क्रांति लाने की क्षमता केवल शिक्षा में ही है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित न रह जाए। इसमे सड़ी गली रूढि़यों और सामाजिक विषमता को उखाड़ फेंकने की ताकत भी होनी चाहिए।

1986 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय (अमेरिका) में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि ‘‘मैं नहीं समझता कि साक्षरता लोकतंत्र की कुंजी है, हमने देखा है, और मैं सिर्फ भारत की ही बात नहीं कर रहा हूं, कि कभी-कभी साक्षरता दृष्टि को संकुचित बना देती है, उसे विस्तृत नहीं बनाती।’’ यह हमारे देश की शिक्षा का हाल किसी न किसी तरह बयाँ कर ही रहा है, उचित शिक्षा की आवश्यकता तब भी राजीव गांधी ने अनुभव की थी और आज नरेंद्र मोदी भी कर रहे हैं|

सच तो यही है कि शिक्षा गणतांत्रिक हो और शिक्षा गणतंत्र को मज़बूत करे तभी वो सार्थक शिक्षा है| सार्थक शिक्षा के सभी पहलुओं पर ध्यान देने के महती आवश्यकता है और इसका एक महत्वपूर्ण पहलू है गणतंत्र की शिक्षा जो केवल सैद्धांतिक ही नहीं हो वरन व्यवहारिक भी हो| उसके पश्चात यह कहते हुए सच्ची ख़ुशी का अनुभव होगा – “मेरा गणतंत्र महान”|

- चंद्रेश कुमार छतलानी

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Regards,
Chandresh Kumar Chhatlani

http://chandreshkumar.wikifoundry.com

 

जसबीर चावला


लाल क़ालीन और पड़दादा
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मैं शर्मिंदा हूँ आज अपने दादा के पड़दादा पर
मैंने नहीं खोजा उनका नाम
उनके निजी कारनामे
दिलचस्पी नहीं किसी पंडे की बही में
सत्रह सौ सत्तावन प्लासी युद्ध के दिन
तब कहाँ थे मेरे दादा

मीर जाफ़र ही भीतरघाती नहीं था
जगतसेठ भी क़तार में थे
रायदुर्लभ ओम/स्वरूप/मेहताबचंद हैं चंद नाम
अंग्रेज़ों के साथ खड़े थे लाव लश्कर के साथ
जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश भी संभाला
तब कहाँ थे मेरे दादा

कहाँ है दर्ज विरोध की आवाज
इतिहास के पन्ने कोरे अधूरे हैं
'राष्ट्रवादी' पडदादे संग संग मूत देते
मुट्ठी भर अंग्रेज़ बह जाते
शर्म आती है उनकी स्वार्थी चुप्पी पर
तब कहाँ थे मेरे दादा

आज मैं भी चुप्पा दादा हूँ
नहीं कर रहा दादागिरी
ईस्ट इंडिया कंपनी बन देश व्यापार राज कर रहा
बिछा रहे लाल क़ालीन दिल्ली के दादा
शायद शर्म से ग़ुस्साए पड़पोते पूँछें
तब कहाँ थे मेरे दादा

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राजीव आनंद

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं
कि पैदा किए जाने का
दंड माँ-बाप को क्यों दिया जाए ?
अगर वे बचे हुए है तो !

उस घर को माँ-बाप के पनाह में
जहाँ बचपन बिता, जवानी पाया
क्यों यातना-घर बना दिया जाए ?
माँ-बाप के लिए

क्यों बेताब रहा जाए
माँ-बाप को जला देने के लिए
मरने से पहले
मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं ?

बूढ़ा असहाय बाप
घिघियाने के सिवा
आततायी बेटे के सामने
और कर भी क्या सकता है ?

जिस हाथों में उसी का लहू
ताकत बन कर दौड़ रहा
उस ताकत का इस्तेमाल आज
बाप को पिटने में क्यों किया जाए ?

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं

माँ जो अब खाना बमुश्किल खाती है
दे नहीं सकती
उसे जिंदा जला देने की बार-बार
धमकी क्यों दिया जाए ?

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं

बेटे की आवाज क्यों दहला देती है
माँ-बाप को क्यों नहीं लगती
उस की पहली आवाज सी
जिसे माँ-बाप ने ही सिखाया था उसे

मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं


राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरंगडा
गिरिडीह-815301
झारखंड
0000000000000000000000

राम शरण महर्जन


१ )    वक्त ही बताते
         **********
कठोर होता ये वक्त
प्यारा भी होता ये वक्त |
 
उमंगों से भरे तो जीवन
रिश्तों को निभाते जब सब
जन्मों से पाया ये निराला सुख
तब तो प्यारा होते ये वक्त |
 
अह्म से जब अन्धे होते
दुनियां डूब मरे सुख तो 'मेरे' को
रिश्ते-नाते क्या चीज है 'मेरे' को
और को दुःख, तड़प, सताना है 'मेरे' को
तब तो कठोर होता है वक्त
ज़िंदा जब थे सब का बद्दुआ लगे
मरा भी जब ये भटकते आत्मा रहे |
 
२ )  जीने की वो अंदाज
      *************
जन्मों का नाता जीवन की वो प्यार थी
प्राणों से बड़ा जीने की वो अंदाज थी |
 
वक्त की पहेली में खोने लगी वो जब से
हँसता-खिलता दुनिया मुर्झाने लगी तब से |
 
सुख क्या है, प्यार क्या है, भूलने लगी अब
सब कुछ होते भी वो सूनापन में जीते अब  |
 
कौन संभालें अह्म के खायी में गिरे उसको
इंसानियत भी छोटे पड़े जीने की अंदाज से |
 
जन्म बड़ा है जन्मों से बड़ा और कुछ है
तन बड़ा है तन से भी बड़ा और कुछ है |
 
३ ) ईश्वर के वरदान से बड़ी
     ***************
जन्म देने औरत माँ नहीं बन सकी
माँ का प्यार ईश्वर के वरदान से बड़ी |
 
दुनिया दारी में उलझते संस्कार ही भूली
सीरियल की औरत की दिमाग आजमायी |
 
गर्भ की सुख रक्त की नाता को दाग लगाती
नयी सिख आगे बढ़ने की ये क्या राह अपनायी |
 
मातृत्व, प्यार सामान होते अपने संतान पे
कहावत बने रहे जीने की ये आज का ढंग से |
 
अपने ही घर अपने ही हाथों बिखरते चले
अपनी ही संतान खून की प्यासे रिश्ते-नाते तोड़े |
 
सुख भी कैसा प्यास भी कैसा कोई न जानता
तन की सुन्दर मन की काली कब बनी कोई न जानता |
 
४ ) दौलत भी क्या चीज है
     ***************
जीवन अपनी अपने ही हाथों बरबाद की
बदला की तड़प में औरों की राहों में चली |
 
क्या कुछ न की अपनी सपना सजाने में
दौलत को चुनी छोड़ी सही-गलत परखने में |
 
दौलत भी क्या चीज है देखने वाले बातें करें
जीना भी क्या जीना है ज़िंदा लाशें सब ने कहे |
 
क्या सोचा हो क्या पाया ये अपनी ही कर्मों से
दिल को तोड़ने से सपनों में भी लगती हाय दुखियों की |
 
५ ) आत्मा की आवाज
     ************
बच्चों से मिले हो जाते बूढ़े भी बच्चे
दिल से पूछे तो उम्र भी वो भूल जाते |
 
खेल देखते खेलप्रेमी खो जाते खेल में
झूमने व हकीकत में होती बड़ी फ़ासले |
 
आत्मा की आवाज बुलंद होती सदा
बल की शक्ति से कभी दवा नहीं सकता |
 
काट न सका बातों को खून पीया जुबां को
पत्थर भी पिघले दर्द दिल की कहर से |
 
दिल धड़क रहे
*********
 
कोहरे ढकें
गाँव हुई अँधेरे
पथिक डरें
आगे-पीछे शून्य है
अपना रास्ता
मालूम नहीं कहाँ
स्वर भी नहीं
कौन सा खाई है ये
दैव ही जानें
दिल धड़क रहे
जीवन भी है
समय का खेल है
कोई न जानें
कब क्या क्या होता है
जड़ ना होते
सब बदलते है
संयम रहें
चले रहे रास्ते पे
डरना मत
कब चूमें मंजिल
दंग रहें आप से |
   0000000000000000

बलजीत सिंह


उल्फत

मैं
अब से पहले
कंदीर-ए-उजास की मानिंद
अपनी खामोशिओं से उपजे
शोर में जलती थी
अब
आँखें रचने लगी हैं
निराकार सपने
ख्वाबों के महीन धागे
अब टूटते नहीं
मानों बन गयी हूँ मैं
अपनी ही ख्वाहिशों का पर्याय
मेरे मन में कैद रिंद आवारगी
ले जाना चाहती हैं मुझे
बहुत दूर उथले बादलों में
जहाँ की बेपनाह ख़ामोशी
मेरी रूह की
इखलास-ए-इर्शना पहचानती है
मैं खोने लगी हूँ
शर्म्म-ए-संसार में
जहाँ मुझसे जन्मे शब्द
खोने लगते हैं
क्षणिक
चिरपरिचित उजास में
मगर
मेरी आवाज़ की मंजिल पर
मेरे अल्फाज़
शायद कभी दस्तक नहीं देंगें
इसलिए डरती हूँ
इस शहजोर ख्वाइश को
इस अजन एहसास को
शायद
तुम
कभी समझ न सको !


000000000000000000

वीरेन्द्र 'सरल'


मैं माटी हिन्दुस्तान की हूँ
मेरे रोम-रोम में है ईश्वर, मैं वाणी वेद-पुराण की हूँ।
इतिहास मेरा गौरवशाली, मैं माटी हिन्दुस्तान की हूँ।।
सागर है मेरे चरणों पर, मस्तक पर हिमालय की चोंटी।
संस्कार मिला है मुझे ऐसा, मैं बाँट के खाती हूँ रोटी।
मेरे कोख में रतनों की खानें, है गोद में नदियों का कलकल।
है हरियाली मेरे आँगन में, आँचल में हरे-भरे जंगल।
मैं जननी सूर, कबीरा और तुलसी, मीरा, रसखान की हूँ।
इतिहास मेरा गौरवशाली, मैं माटी हिन्दुस्तान की हूँ।।
कहते हैं अन्नपूर्णा मुझको, कण-कण मेरा उपजाऊ है।
मेहनत करने वाले मेरे, बेटे हलधर बलदाऊ है।
है धैर्य-शौर्य गहने मेरे और स्वाभिमान श्रृंगार मेरा।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक, है बहुत बड़ा परिवार मेरा।
प्रतिबिंब मैं त्याग-तपस्या की और कथा अमर बलिदान की हूँ।।
दौलत है ईमान मेरा और सद्साहित्य है समृद्धि।
लक्ष्मी है मेरे बाँहों में, है बाजुओं में रिद्धि-सिद्धि।
हर साँस में मेरा रामायण, शिक्षा में गीता ज्ञान की हूँ।।
इतिहास मेरा गौरवशाली मैं माटी हिन्दुस्तान की हूँ।

 

वीर जवान

देश पे मरने वालों की जहां, अमर चिताएं जलती है।
देशभक्ति की खूशबू लेकर वहां हवाएं चलती है।
समर भूमि में देशभक्त के खून जहां पर गिरते हैं।
उस पावन भू को महकाने फूल वहां पर खिलते हैं।
यही फूल जरूरत पड़ने पर बन जाते हैं अंगारे।
मातृभूमि की रक्षा करने फिर धरती पर है आते।
मतृभूमि की रक्षा करने, जो देते हैं जीवन दान।
मरते नहीं अमर होते हैं देश के ऐसे वीर जवान।

नक्सली हमले में देश के लिये मर मिटने वाले जवानों की शहादत को नमन और उन्हें अश्रूपरित श्रद्धाजंली।

 

कविता कवि की वाणी

कभी शोला हूँ, कभी शबनम हूँ, कभी आग कभी मैं पानी हूँ।
तलवार की ताकत है मुझमें, मैं कविता कवि की वाणी हूँ।।
सागर से गहरे भाव भरे, है मुझमें नभ की ऊँचाई।
बेअर्थ नहीं मेरे अर्थों की, है दूर क्षितिज तक लम्बाई।
कब सिमटी हूँ सीमाओं में, है दुनिया भर विस्तार मेरा।
संवेदनशील सृजनशिल्पी , है सच में पहरेदार मेरा।
फूलों की तरह कोमल हूँ मैं, लहरों की मस्त रवानी हूँ।
तलवार की ताकत है मुझमें, मैं कविता कवि की वाणी हूँ।।
हर जोर जुल्म के टक्कर में, हरदम आवाज उठाती हूँ।
भरती हूँ जोश शिराओं में, वीरों का बल बढ़ाती हूँ।
माँ की ममता मेरे भीतर, है करूणा की अश्रुधारा।
अन्याय कभी बर्दाश्त नहीं, मुझे न्याय सदा ही है प्यारा।
दुष्टों के लिए अंगार हूँ मैं, सज्जनों के लिए कल्याणी हूँ।
तलवार की ताकत है मुझमें, मैं कविता कवि की वाणी हूँ।।
इतिहास गवाही है मैंने, मुर्दों को जीवनदान दिया।
पथ दिखलाया पथभ्रष्टों को, जग को अच्छा इंसान दिया।
जो हार चुके थे जीवन से, उनको जीने की दी शक्ति।
कई हृदय शून्य पाषाणों को, मैंने ही दी प्रभु की भक्ति।
मैं हरिशचन्द्र सम सतवादी और कर्ण, दधीचि दानी हूँ।
तलवार की ताकत है मुझमें, मैं कविता कवि की वाणी हूँ।
मैं सदविचार संवेदना हूँ, केवल शब्दों का मेल नहीं।
नवयुग गढ़ना है लक्ष्य मेरा, मैं मनोरंजन य खेल नहीं।
कवि धर्म नहीं निभता जिनसे, दौलत के लिए जो लिखते हैं।
नफरत है मुझको उनसे जो, अन्याय के हाथों बिकते हैं।
मैं ही शिवा, राणाप्रताप और झांसी वाली रानी हूँ।
तलवार की ताकत है मुझमें, मैं कविता कवि की वाणी हूँ।

बेटियां

बेटी गंगा-सी पावन है, बेटी तुलसी है आंगन की।
बेटी धड़कन दिलों का है, बेटी सांसे है जीवन की।
बेटी सृष्टि की जननी है, बेटी श्रृंगार है जग का,
बेटी उल्लास है मन का, बेटी मधुमास मधुबन की।

बेटी करती नहीं मां-बाप से, अधिकार की बातें।
बेटी करती सभी से है, हमेशा प्यार की बातें।
बेटी बोती नहीं हैं बीज नफरत के किसी दिल में,
बेटी शबनम-सी है करती नहीं अंगार की बातें।

बेटी फूलों की डाली है, बेटी पूजा की थाली है।
बेटी लक्ष्मी है, सीता है, बेटी दुर्गा है, काली है।
बेटी है चांद-सी शीतल ,बेटी में तेज सूरज का,
बेटी के ही रौनक से तो होली है दीवाली है।

बेटी फूलों-सी कोमल है, उन्हें अपनी महक दे दो।
बेटी चंचल किरण-सी है, उन्हें अपनी चमक दे दो।
उन्हें मत कोख में मारो ,उन्हें दुनिया में आने दो,
बेटी महकायेगी जग को उन्हें जीने का हक दे दो।


हो यही भावना सबकी

बोये बीज शहीदों ने और हमको मिली फसल है।
मुफ्त में नहीं मिली आजादी बलिदानों का फल है।
कितने शीश कटे और कितनी बही खून की गंगा।
लाखों कुर्बानी के बदले हमको मिला तिरंगा।
आजादी के लिए लड़े जो, दी अपनी कुर्बानी।
नमन आज हम उन्हें करें जो, हुए अमर बलिदानी।
कुर्बानी की गीता पढ़कर, देशभक्ति हम सीखें।
आजादी के कल्पवृक्ष को, तन-मन-धन से सींचे।
आओ शपथ उठायें माटी, तेरा मान रखेंगे।
जान भले ही जाये पर जिन्दा, स्वाभिमान रखेंगे।
अमर तिरंगे झण्डे को हम, झुकने कभी ना देंगे।
आजादी की दिव्य ज्योति को, बुझने कभी ना देंगे।
गणतंत्र के पावन दिन पर, यही कामना सबकी।
प्रगति पथ पर देश बढ़े हो, यही भावना सबकी।

बेटी को भी पढ़ने दो

बेटी वेदों की ऋचाओं की पावन-सी कहानी है।
बेटी मानस के दोहें हैं,बेटी गुरूग्रंथ की वाणी है।
बेटी है नूर आंखों का, बेटी खूशबू है सांसों की,
बेटी बहते हुये दरिया के लहरों की रवानी है।

बेटी सरगम सुरों का है, मधुर संगीत है बेटी।
गुनगुनाये जो मन हर पल इक ऐसा गीत है बेटी।
निराशा के क्षणों में हौसला हरदम बढ़ाती है,
जिन्दगी के हर एक जंग में दिलाती जीत है बेटी।

सपने बुनने दो जीवन के रास्ते स्वयं गढ़ने दो।
मंजिलें तय करने दो, शिखर पर नाम करने दो।
जिगर में हौसला भर दे, उन्हें संस्कार ऐसा दो,
दे दो चाबी सफलता की, बेटियों को भी पढ़ने दो।

वीरेन्द्र'सरल'
बोड़रा ,मगरलोड़
पोष्ट-भोथीडीह
जिला-धमतरी छ ग

 

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पद्मा मिश्रा

आप सभी को गणतंत्र -दिवस की शुभ-कामनाएं
गणतंत्र हमारा ---
बलिदानो की तप्त धरा पर,शोभित है गणतंत्र हमारा,
संघर्षों के उच्च शिखरपर , फिर गूंजा 'जय-हिन्द'का नारा,
भारत माँ के चरणों पर अर्पित है सर्वस्व हमारा ,
राष्ट्र--ध्वजा के तीन रंग में,आदर्शों की पावन धारा ,
युवा सोच हो,सुदृढ़ इरादे,संकल्पों का वैभव सारा,
संघर्षों के उच्च शिखर पर , फिर गूंजा 'जय-हिन्द'का नारा,
अंधियारे को भेद खिलेगा,उम्मीदों का स्वप्निल सूरज,
नवल प्रगति की दिशा गढ़ेगा,जगमग होगा देश हमारा,
लोकतंत्र की धरती ने फिर नई सुबह को आज पुकारा,
संघर्षों के उच्च शिखर पर , फिर गूंजा 'जय-हिन्द'का नारा,
नव हरीतिमा से पुष्पित हो,जीवन का उल्लास ,सहारा ,
सदा सादगी ,सच्चाई में ,करुणा में विश्वास हमारा ,
आगे बढ़ते प्रगति -चक्र से गतिमय हो परिवेश हमारा ,
संघर्षों के उच्च शिखर पर , फिर गूंजा 'जय-हिन्द'का नारा,
 
ये चरण  शिखर की ओर चलें,
ये चरण शिखर की ओर चलें ,
चाहे कितनी घिरें आँधियाँ -
बाधाएं घनघोर पलें -
संग लेकर सपनों की थाती,
हम नए क्षितिज की ओर चलें,
ये चरण शिखर की ओर चलें ,
जग उठे उम्मीदों का सूरज ,
अभिलाषाओं की भोर तले ,
बढ़ चले कदम फिर रुकें नहीं ,
दृढ़ संकल्पों की ज्योति जले,
ये चरण शिखर की ओर चलें ,
हम नवयुग के जागृत प्रहरी,
संघर्षों में भी झुके नहीं,
साहस के आगे नतमस्तक
मुश्किल पथ पर भी थमे नहीं,
आँखों में जीत भरा सपना,
मंजिल की थामे डोर चले ,
ये कदम शिखर की ओर चलें,
भारत की माटी चंदन है !
चन्दन है भारत की माटी,
जहाँ सत्य-अहिंसा कण कण में,
जन -मन का सहगान बनी,
गांधी के पावन सपनों का ,
साकार रूप -प्रतिमान बनी,
उस माटी को शत बार नमन,
सतकर्मों की सुंदर थाती,
चन्दन है भारत की माटी,
जग में बिखरा अँधियारा तम ,
हमने सूरज बन दिशा गढ़ी
जो नानक-गौतम-ईसा के,
उपदेशों की पहचान बनी,
भारत है जीवित भास्कर सम,
यह सिखलाती श्रम की धरती ,
चन्दन है भारत की माटी,

निराला के प्रति,,,
तुम महाप्राण!,तुम विश्व वन्द्य!,
निर्झर बसंत के गान तुम्ही,
गर्वित तुमसे ही मुक्त छंद ,
जग  की करुणा के प्रिय गायक !,
भाषा के हित  अर्पित जीवन,
माँ वाणी के सम्मान तुम्ही,
तुम नील गगन के ''सूर्य-कांत''
छाया की माया में पलती ,
सपनों की भावभरी दुनियां,
गीतों में मधुर तरलता थी,
छंदों में बहती थी खुशियां,
हिंदी-गौरव,-अभिमान तुम्ही !
कोमल भावों के सरल बंध  !
था मुक्त ह्रदय,-संवेदनता,
''दुःख ही जीवन की कथा रही,''
शब्दों में मेह बरसता था,
पीड़ा भी छू न सकी जिसको,
अंतर में स्नेह बिहँसता था,
कविता के थे दिनमान तुम्ही,
तव अभिनन्दन ,हे सृजन -मान!,


 
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जय प्रकाश भाटिया

गरीब माँ ,
उसकी हाथों की लकीरे मिटती गई,
लोगों के झूठे बर्तन मांज मांज कर,
उसकी छाती पे धूल जमती रही,
लोगों के गंदे घर बुहार बुहार कर,
धोती रही घर घर जाकर मैले कपड़े ,
सर्दियों में होकर गीली ठिठुर ठिठुर कर,
कभी आराम नहीं किया --
जिस से चलता रहे उसका घर ,
पुराने चीथड़ों में भी करती रही गुज़ारा -
यह सोच सोच कर की मेरे बच्चे,
अच्छा पहने, अच्छा खाएं ,
और अच्छी तालीम पाएं--
समय गुजरता गया-- ,
बच्चे पढ़ लिख गए,
बड़े हुए, अपने पैरों पर खड़े हुए,
अच्छी नौकरी में लग गए,
ऐशो आराम की ज़िंदगी बिताने लगे,
पर वह गरीब माँ ,
उसकी हाथों की लकीरे मिट गई,
माँ के इस त्याग से ,
बच्चों की किस्मत की लकीरे भी बदल गई,
और यह क़्या --
उनके दिल भी बदल गये.... और
वह गरीब माँ-
आज भी घर घर जाकर
लोगों के झूठे बर्तन मांजती है,
अपना पेट पालने के लिए. - --
24/01/2015


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विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

अरे कोई तो बतलाओ...****(गीत)
       --------------------
किसने किया श्रृंगार प्रकृति का
     अरे, कोई तो बतलाओ !
  डाल-डाल पर फूल खिले हैं
ठण्डी  सिहरन  देती  वात                     
पात गा रहे गीत व कविता                    
कितने सुहाने दिन और रात
       मादकता मौसम में कैसी ,
       अरे ,कोई तो समझाओ ।

    खेत -खेत में बिखरा सोना
     कौन लुटाये बन दातार
    रसबन्ती, गुणबन्ती देखो
     धरा करे किसकी मनुहार
          रंग-महल सी बनी झोंपड़ी,
          कारण कैसा, समझाओ ।

     स्वागत में किसके ये मन
     खड़ा हुआ है बन के प्रहरी
     उजड़ा-उजड़ा सँवरा फिर से
     बात समझ ना आये गहरी
            मेरे मन की,तेरे मन की,
            गुत्थी अब तो सुलझाओ ।

      भ्रमरों का मधुरिम गुंजन
      और तितली का मँडराना
     चप्पा-चप्पा बरसे अमृत
     नहीं कोई भी बिसराना
            आया है 'ऋतुराज' आज अब,
             स्वागत में कुछ तो गाओ ।
>
        - विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'
                   (गीतकार )
    कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी,
    स. मा. (राज.)322201


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मनोज कुमार श्रीवास्तव

मेरा देश आगे बढ़ रहा है,
विकास की सीढ़ी चढ़ रहा है,
हम अज्ञानता के दाग धो रहे हैं,
अब लोग डिजिटल हो रहे हैं,
सब मिलकर बताने वाले हैं,
अब अच्छे दिन आने वाले हैं।
हवा का रूख बता रही है,
जागरूकता तो आ रही है,
विचारों में की स्वच्छता हो रही  है,
कुविचारों की छंटाई हो रही है,
दकियानूसी विचार कतराने वाले हैं,
क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं।
नवपीढ़ी का साथ निभाएं,
अधिकारों को कर्तव्य सिखाएं,
तो आओ हम सब जोर चलें,
नवभारत की ओर चलें,
सफलता थाल में सजाने वाले हैं,
अब 'अच्छे दिन' आने वाले है।

(मौलिक व अप्रकाशित)
देशभक्ति
क्या तुम्हारी आत्मा में आवाज है?
अपने दुष्कृत्यों पर तुम्हें लाज है?
क्या तुम्हें छोटों से स्नेह है?
क्या परमार्थ तुम्हारा ध्येय है?
क्या तुम्हारी वाणी नर्म है?
क्या मानवता तुम्हारा धर्म है?
क्या गरीबों से दुआएं लेते हो?
क्या असहायों को स्नेह देते हो?
अधिकारों के साथ कर्तव्य निभाते हो?
बड़े तो हो पर बड़प्पन दिखाते हो?
अन्याय देखकर तुम्हारा मन तुम्हें धिक्कारता है?
तुम्हारे अपराध को तुम्हारा हृदय स्वीकारता है?
अपने स्वार्थ की होली क्या तुमने कभी जलायी है?
क्या तुम्हारे विचारों में देश की भलाई है?
अगर इन बातों को सहज ही,
तुझमें स्वीकारने की शक्ति है,
तो मैं भी गर्व से कहता हूं,
ये तुम्हारी सच्ची देशभक्ति है।

मनोज कुमार श्रीवास्तव
शंकरनगर नवागढ़
जिला बेमेतरा
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अंजली अग्रवाल

मेरी उड़ान
अब मैं भी स्‍कूल जाऊँगी......
अपने सपनों को पंख लगाऊँगी......
जिन्‍दगी को जिन्‍दगी बनाऊँगी......
तोड़ दूँगी में ये झूठी जंजीरों को.....
अब चली मैं उड़ने को......
क्‍या रोकेगा मुझे ये जमाना,
मैं वक्‍त को अपने साथ लेकर चली......
कह देना ऊपर वाले से..........
मैं अपनी तकदीर खुद लिखने चली....
हौसलों से भरी मेरी नाव को किनारे तक मैं लगाऊँगी......
पराया धन को अब किस्‍से कहानी मैं बनाऊँगी......
ढूँढ लिया है मैंने अपने आशियाने को......
चली मैं आसमान छूने को......
बुझी हुई आग थी मैं जिसे चिंगारी मिल गयी.....
अंधकार से भरी इस जिन्‍दगी को रोशनी मिल गयी.....
उठ गयी हूँ मैं ....
खुली आँखें से सपने देखने को....
अपनी कटी पतंग उड़ाने को.....
चली मैं आसमान छूने को......
अपने हौसलों की उडा़न भरने को......

 

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देवेन्द्र सुथार 'बालकवि'


ऊँचा है मस्तक राजस्थान का

वे जौहर वाली धरती है स्वतंत्रता की दीवानी।
टूट गई पर झुकी नहीँ इसकी चट्टानेँ तूफानी॥
जब जब दुश्मन ने ललकारा चमक उठे बरछी भाले।
सर से कफन बाँध कर निकलेँ केसरिया बाने वाले॥

इसके प्राणोँ मेँ ज्वाला है युग व्यापी हुंकार की।
इस धरती का कण कण मानी धनी रही तलवार की॥
गोरा बादल समर भूमि मेँ प्रलय मेघ बन टूटे थे।
काँप उठी थी वसुन्धरा खिलजी के छक्के छूटे थे॥

उधर पद्दिमनी के जौहर ने पानी रखा मान का।
जिससे हिमगिरी सा ऊँचा है मस्तक राजस्थान का॥
राख हुई जलती ज्वाला मेँ कलियाँ जुही गुलाब की।
बिखर गये मोती सारे पर इज्जत मिटी न आब की॥

जब भी सरहद से दुश्मन ने पौरुष को ललकार दी।
तब इस धरती ने सोई तलवारोँ को झंकार दी॥
इसने साँगा को जन्म दिया जिसने दिल्ली तक दहला दी।
जिस दिन बाबर ने ललकारा धरती शोणित ने नहला दी॥

अस्सी घावोँ पर भी साँगा तुमने तलवार नहीँ छोडी।
इस वीर प्रसूता धरती के गौरव की आन नहीँ तोडी॥
कट गया पैर,कट गई भुजा घावोँ से रक्त बह रहा था।
फिर भी राजस्थानी नाहर घावोँ पर घाव सह रहा था॥

वह गंगा का पावन जल था अपनी गति मेँ निर्बाध रहा।
अस्सी घावोँ वाला साँगा अन्तिम क्षण तक आजाद रहा॥
पूछो खूनी चट्टानोँ से क्या कहती है हल्दीघाटी।
सचमुच वीरोँ का चन्दन है जिसकी बलिवेदी की माटी॥

सावन मेँ पर्वत की धारा चट्टानी सीना चीर बही।
उस तरफ प्रतापी पौरुष से मेवाड धरा की लाज रही॥
जिस दिन चेतक की टापोँ से रण का विप्लव आरंभ हुआ।
आजादी के उस दिन से ही दुर्जय नारा प्रारंभ हुआ॥

राणा प्रताप के हाथोँ मेँ जिस दिन अजेय भाला आया।
उस दिन स्वतंत्रता का दीपक जल प्राणोँ मेँ ज्वाला लाया॥
तोपेँ गोले बरसाती थीँ,होता था शोणित से तर्पण।
राणा प्रलयंकर शंकर से करते रण मेँ ताण्डव नर्तन॥

आखिर मेँ वह क्षण भी आया घिर गये वैरियोँ से राणा।
कोहराम मच गया सेना मेँ, दौडो मरमिटो घिरे राणा॥
बस उसी समय राजस्थानी धरती का मतवाला आया।
वह मूर्तिमन्त कुर्बानी सा ज्वाला बनकर झाला आया॥

अपने ही शोणित से रक्षा की थी उस दिन बलिदान ने।
जब जब जौहर का ज्वार जगा घुटने टेके तूफान ने॥
लिखे खून से इतिहासोँ के पन्ने राजस्थान ने।
हर हर महादेव का स्वर दुहराया हर चट्टान ने॥

-देवेन्द्र सुथार 'बालकवि'
गांधी चौक, आतमणावास, बागरा,जिला- जालौर,राजस्थान 343025

ई मेल-devendrasuthar196@gmail.com

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