रविवार, 25 जनवरी 2015

दिनेश चौहान का आलेख - 26 जनवरी के संदर्भ में : राष्ट्रीय पर्व सकारात्मकता उभारने का वाहक बने

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देश को आजादी मिले 67 साल हो चुके हैं औेर देश का संविधान लागू हुए भी 65 वर्ष पूर्ण होने को है। ये उपलब्धियां कोई छोटी मोटी उपलब्धियां नहीं थी बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास को प्रभावित करने वाली घटना थी। तब देश में उन लोगों का शासन था जो इस देश के मूल निवासी नहीं थे और जिनका यहां के मूल निवासियों से कोई भावनात्मक और संवेदनात्मक लगाव नहीं हो सकता था। वे विशुद्ध रूप से शासक थे और उससे भी बढ़कर व्यापारी। और हम थे शासित और शोषित दोनों। इन्हीं शासन और शोषण की स्थिति को बदलने का भगीरथी प्रयास था आजादी का आंदोलन। तब हमारे देश के रहनुमाओं ने सोचा था कि आजाद भारत एक ऐसा भारत होगा जो शोषण मुक्त होगा। एक ऐसा भारत होगा जहां कोई शासक और शासित नहीं बल्कि जनता ही सबकुछ होगी। जो जनता का प्रतिनिधि होगा वह जनाकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देगा और यह अहसास दिलाएगा कि इस देश का हर नागरिक महत्वपूर्ण है और उसकी बात सुनी जाती है। लेकिन आजादी के बाद यह अपेक्षा पूरी नहीं हुई जो आक्रोश के रूप में हर राष्ट्रीय पर्व को फूटता है और एक सैलाब सा आ जाता है व्यवस्था को कोसने का। और यह भी एक औपचारिकता निभाने के रूप में सम्पन्न होता है


    सवाल यह उठता है कि क्या हमारा कर्तव्य सिर्फ व्यवस्था को कोसने भर से पूरा हो जाता है। इस व्यवस्था को बदलने के लिए हम क्यों शुरूआत नहीं करते। क्यों सोचते हैं कि इसके लिए दूसरा आगे आए। अच्छा बहाना भी रहता है-हमारे एक के किए से क्या होगा, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर याद रखना चाहिए दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं वे एक अकेले धुन के पक्के की बदौलत हुए हैं। चाहे वे राजनेता हों चाहे समाज सुधारक। महात्मा गांधी, सुकरात जैसे महापुरुष जिनका गुणगान करते हम नहीं थकते, अपने जीवन भर विरोध का सामना करते रहे।  अंततः उनका जीवन विरोधियों ने ले लिया। दुनिया में जितने भी आविष्कार और खोज हुए वे अकेले व्यक्ति की कूवत से ही संभव हुए। सबको जान के खतरे तक विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन आज उन्हीं की पूजा होती है। तब क्यों नही हम वर्तमान व्यवस्था की सफाई के लिए आगे आते? क्यों हमारे राष्ट्रीय पर्व केवल व्यवस्था को कोसने के पर्व बनते जा रहे हैं? जो जितना  बढ़िया  तरीके  से व्यवस्था  की जुबानी धज्जियां उड़ाता है उतना ही वाहवाही का हकदार बनता है। वह सोचता है कि उसने बहुत बड़ा काम संपन्न कर लिया है और इससे ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है।


    सब कहते हैं कि भ्रष्टाचार ओर रिश्वतखोरी बहुत बढ़ गई है पर ये नहीं देखते कि इसके लिए खुराक-पानी का इंतजाम हम ही करते हैं। मानवीय प्रवृत्ति होती है कि उसे अपनी बुराई नहीं दिखती। कबीरदास की सीख को कोई जीवन में नहीं उतारना चाहता-'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।।' वह अपने किए को हर संभव तर्क देकर सही साबित करता है। पर दूसरा जब वही करे तो उस पर टिप्पणी करना और उसे बुरा साबित करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता है। अपना काम निकालने के लिए रिश्वत देने से नहीं चूकता और मौका मिलते ही भ्रष्टाचार की वैतरनी में डुबकी लगा लेता है। जब हम नहीं सुधर रहे हैं तो व्यवस्था में सुधार कैसे संभव होगा?


    आज हमें यह सोचना है कि इस राष्ट्रीय पर्व में हम क्या संकल्प लें कि यह यादगार बन जाए। हम नकारात्मक सोच से ग्रस्त पीढ़ी के युग में जी रहे हैं। हर तरफ नकारात्मकता, अनैतिकता, हिंसा, उपद्रव, झूठ, अनाचार और खुरापात हावी है। नकारात्मकता को हवा देने में मीडिया 24 घंटे लगा हुआ है। क्योंकि नकारात्मकता में ही सनसनी की गारंटी होती है। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया सनसनी ही उसकी खुराक है। इमानदारी, सच्चाई, नैतिकता, सद्भावना और सात्विकता से जुड़ी चीजे परिदृश्य से गायब की जा रही है। पि्रंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया, सिनेमा और इंटरनेट इन नकारात्मक सामग्रियों से भरे हैं जिससे लगने लगता है कि इस दुनिया को आबाद रहने की जरूरत नहीं है। इस दुनिया में कोई सुधार नहीं हो सकता। यह पतन की राह से लौट नहीं सकता।


    तो यह दुनिया क्यों आगे बढ़ती जा रही है? इसलिए कि जितनी बुराइयां बताई जा रही है उससे कई गुणा अच्छाई इस दुनिया में मौजूद है। जो इस दुनिया को आगे बढ़ा रही है पर उसे देखने के लिए हम अपनी आंखें खोलना नहीं चाहते। आइए हम उन अच्छाइयों को खोजें, देखें और प्रकाश में लाएं। राष्ट्रीय पर्व यही संकल्प लेने का अवसर है।
                         
                  छत्तीसगढ़ी ठिहा, नवापारा- राजिम,

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