मंगलवार, 13 जनवरी 2015

मंतव्य 2 - आलेख व समीक्षाएं

(मंतव्य 2 ईबुक के रूप में यहाँ प्रकाशित है, जिसे आप अपने कंप्यूटिंग/मोबाइल उपकरणों में पढ़ सकते हैं. मंतव्य 2 संपादकीय यहाँ तथा राम प्रकाश अनंत का लघु उपन्यास लालटेन यहाँ पढ़ें)

 

 

मर्म मीमांसा

मोदियानो

स्मृति में जीवन उकेरता साहित्यकार

विजय शर्मा

छोटे-बड़े सब पुरस्कारों की भाँति नोबेल भी विवादों के घेरे में रहा है। कभी उसकी नीतियों की आलोचना होती है, कभी एक ऐसे रचनाकार को चुनने की जिसे पाठक जानते-पहचानते नहीं हैं और घोषणा से चौंक कर पूछते हैं, ‘‘कौन?’’ सबने एक सुर में ऐसा पूछा था, जब 2009 में हेरटा मूलर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। पुरस्कार की घोषणा से बाहर हलचल मचती है। पुरस्कार निर्धारण के वक़्त भीतर भी जमकर खींच-तान चलती है। जब एलफ्रेड जेलिनिक को पुरस्कार के लिए चुना जा रहा था, तो एक सदस्य इतना क्रोधित हुआ कि उसने समिति का बहिष्कार कर डाला। नोबेल पुरस्कारों को लेकर खूब सट्टेबाज़ी होती है और इस साल भी कई साहित्यकारों पर दाँव लगाये गये थे। जापानी (हारूकी मूराकामी), अफ्रीकी (गूगी) और अमेरिकी साहित्यकार (फ़िलिप रॉथ) पर बड़ी राशि लगी हुई थी। औरों की छोड़ भी दें, तो अमेरिका की चौधराहट को धता बताते हुए जब 2014 के साहित्य के नोबेल की घोषणा हुई, तो बाकी सब धराशायी हो गये। समिति ने एक ऐसे लेखक को चुना था जिसे विश्व के बहुत कम लोगों ने पढ़ा था। इसका मुख्य कारण था उनकी किताबों का इंग्लिश में अनुपलब्ध होना। 1968 से प्रकाशित हो रहे और चालीस से अधिक किताबें लिखने वाले पैट्रिक मोदियानो की मात्र नौ किताबों का इंग्लिश अनुवाद प्राप्त था। अब इस लेख के लिखने तक स्थिति अवश्य बदल गयी होगी। नोबेल ख्याति के साथ-साथ विभिन्न भाषाओं में अनुवाद को भी प्रोत्साहन देता है। जब खुद मोदियानो को पुरस्कार की सूचना मिली, तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, वे हैरान थे। इस ख़बर को अविश्वसनीय और अप्रत्याशित मान रहे थे। पुरस्कार की घोषणा के वक़्त वे सड़क पर टहल रहे थे। वे इस समाचार से बेहद खुश हुए, खुशी का एक अन्य कारण भी था। उनका नाती स्वीडेन में रहता है। नोबेल पुरस्कार की घोषणा के तत्काल बाद नोबेल समिति एक साक्षात्कार की भी व्यवस्था करती है। इस साक्षात्कार में मोदियानो ने कहा कि पुरस्कार स्वीडन से आया है और मेरा नाती भी वहीं का है, अतः मैं यह पुरस्कार उसे ही समर्पित करता हूँ।

11 लाख डॉलर की राशि के साथ मिलने वाले इस वर्ष के नोबेल पाने वाले दुनिया के लिए भले ही अजनबी हों, मगर अपने देश फ्रांस में बहुत प्रसिद्ध हैं। वैसे जब उन्होंने लिखना शुरू किया था, तो उनके सामने कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं था, लेकिन लिखते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य को पा लिया है। उन्हें अपने उपन्यास ‘मिसिंग पर्सन’ के लिए 1978 में फ्रांस का सर्वोच्च सम्मान ‘ग्रॉन प्री लिटरेरी अवॉर्ड’ तथा ‘प्री गॉनकोर्ट सम्मान’ भी प्राप्त हुआ था। इसका इंग्लिश अनुवाद बहुत बाद में 1980 में आया। 2012 में उन्हें यूरोपियन साहित्य के लिए ऑस्ट्रियन स्टेट प्राइज़ मिला था।

नोबेल समिति के सचिव पीटर इंग्लंड ने अपनी घोषणा में कहा, ‘‘पैत्रिक मोदियानो का सम्मान असल में स्मृतियों को सजीव करने की कला का सम्मान है। उन्होंने अपनी स्मृतियों के द्वारा अपनी रचनाओं में मानव नियति के अनजाने रहस्यों को उद्घाटित करने का अद्भुत प्रयास किया है।’’ उन्होंने अपनी रचनाओं में दुर्बोध नियति का अन्वेषण किया है। समिति के सचिव ने कहा कि उनकी किताबें सदैव विभिन्नता के साथ समान थीम पर हैं। और यह थीम है स्मृति, स्मृति लोप, विनष्टि, अस्मिता-पहचान, खोज-अन्वेषण और अपराध बोध। घोषणा में यह भी कहा गया कि मोदियानो पाठक के लिए कठिन नहीं हैं। उन्हें आसानी से पढ़ा जा सकता है। आप एक किताब दोपहर को पढ़ सकते हैं, फिर खाना खाकर शाम को उनकी एक अन्य किताब पढ़ सकते हैं। वैसे मेरे विचार से पीटर का यह कथन, आप एक दिन में उनकी दो-दो किताबें पढ़ सकते हैं, मोदियानो की प्रशंसा नहीं करता है, भले ही ये किताबें आकार में छोटी मात्र 100-150 पन्नों की क्यों न हों। नोबेल समिति लोकप्रियता से अधिक गुणवत्ता को तवज्जो देती है।

इतना ही नहीं, पीटर इंग्लंड ने उन्हें ‘आधुनिक युग का मार्शल प्रूस्त’ भी कहा। फ्रांस के ही प्रूस्त से उनकी समानता दिखाने का एक बड़ा कारण है, दोनों अपने लेखन में स्मृतियों को आधार बनाते हैं। प्रूस्त की प्रसिद्ध और विशद कृति का नाम ही है, ‘रिमेंबरेंस ऑफ़ थिंग्स पास्ट’। मोदियानो के इंग्लिश में उपलब्ध उपन्यासों के नाम ‘नाइट राउन्ड्स’, ‘रिंग रोड्स’, ‘ए ट्रेस ऑफ़ मेलिस’, ‘मिसिंग पर्सन’, ‘विला ट्रिस्टे’, ‘हनीमून’, ‘आउट ऑफ़ डार्क’, ‘डोरा ब्रुडर’, ‘कैथरीन सर्टीट्यूड/इल’,

Accident nocturne हैं। उन्होंने लुई माले के साथ मिल कर ‘लाकोम्ब लूसिएनः द कम्प्लीट सेनारियो ऑफ़ द फ़िल्म’ तथा जीन-पॉल रपैन्यू (Jean-Paul Rappeneau) के साथ मिल कर वॉन वॉयज़ (Bon Voyage) के स्क्रीन प्ले लिखे। उनके दो उपन्यासों पर फ़िल्म बनी हैं।

वे कान फ़िल्म समारोह की जूरी के सदस्य भी रहे हैं। उनकी कृतियाँ फ्रेंच भाषा के अलावा स्पैनिश, स्वीडिश तथा जर्मन भाषा में भी उपलब्ध हैं। पैट्रिक मोदियानो पर खूब शोध कार्य होते हैं और सेमीनार में उनके काम पर पेपर पढ़े जाते हैं। मार्च 2004 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैन्ट में एक ऐसा ही सेमीनार हुआ था जिसमें पढ़े गये पेपर का संपादन और भूमिका लिखने का कार्य जॉन फ्लॉवर ने किया है। इस सेमीनार में दस देशों के विद्वानों ने भाग लिया था और यह द्विभाषीय था। वैश्विक फ़लक पर उनके काम की चर्चा करते हुए जॉन फ्लॉवर अपनी भूमिका में कहते हैं कि बीस सालों से मोदियानो के गंभीर और सारगर्भित लेखन ने आलोचनात्मक ध्यानाकर्षण किया तथा करता रहा है, हालाँकि इसमें से अधिकांश फ्रांस के बाहर संपन्न हुआ है।

मोदियानो के यहाँ कथानक में पेरिस अक्सर उपस्थित है। दो बेटियों के पिता मोदियानो अपनी पत्नी के साथ पेरिस में रहते हैं और सारे समय लेखन के लिए समर्पित हैं। उनका सारा लेखन आत्मकथात्मक है, जिसे ‘ऑटोफ़िक्शन’ की संज्ञा दी जाती है। 2005 में आयी कृति ‘अन पेडिग्री’ उनकी इस विशेषता को बहुत शिद्दत के साथ सिद्ध करती है। लेखन में वे खुद को पहचान देने का प्रयास करते हैं। साथ ही इसमें जर्मनी नात्सी द्वारा अधिकृत फ्रांस के समय का चित्रण मिलता है। 30 जुलाई 1945 को पेरिस के एक उप नगर में जन्मे मोदियानो के पिता एलबर्टो मोदियानो इटली से आने वाले यहूदी थे और माँ बेल्जियम की थीं। माँ लाउसी कॉलपेन एक अभिनेत्री थीं। स्कूली पढ़ाई-लिखाई तो बहुत नहीं हुई, खुद कहते हैं कि उनके पास कोई डिप्लोमा-डिग्री नहीं है। वैसे बचपन में वे पेरिस के लीसी हेनरी स्कूल गये और वहाँ के गणित शिक्षक रेमंड क्यूनीयु ने उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया। वह खुद भी लेखक था। इसी शिक्षक ने बाद में एक मुलाक़ात के दौरान उनका परिचय फ्रांस के एक प्रसिद्ध प्रकाशक गैलीमॉर्ड से करवाया। इसी प्रकाशक ने 1968 में मोदियानो का पहला उपन्यास ‘ला प्लेस दे ले’एटोइल’ प्रकाशित किया।

मोदियानो के अनुसार उनकी जड़ें और विरासत बहुत अज़ीबोगरीब हैं। वे परिवार की उपेक्षा के शिकार थे। नात्सी बर्बरता के दौरान कुछ यहूदी भी उनका साथ दे रहे थे और मोदियानो के पिता उनमें से एक थे। वे मुख़बिरी किया करते। यह बात उन्हें बराबर सालती है और उनके उपन्यासों में भी अक्सर आती है। यहूदी होने की त्रासदी, उपेक्षित बचपन, स्वार्थी माँ, अभावग्रस्त जीवन उनके लेखन का स्रोत है। 22 वर्ष की अल्पायु में लिखे उनके पहले उपन्यास से उनके पिता बहुत खफ़ा हुए। उस उपन्यास में उन्हें खुद की तस्वीर नज़र आ रही थी। अतः उन्होंने बेटे को धमकी दी, मगर मोदियानो लिखते गये और नोबेल के मंच तक पहुँचे। डेविड गोडिन ने उनकी ‘मिसिंग पर्सन’ प्रकाशित की थी। उसी ने जे. एम. जी. क्लेजियो की किताब भी प्रकाशित की थी, क्लेजियो जिसे 2008 का साहित्य का नोबेल प्राप्त हुआ था।

पैट्रिक मोदियानो अपनी रचनाओं की सामग्री अतीत से उठाते हैं। कभी-कभी साक्षात्कारों, अख़बारी कतरनों से भी लेते हैं। वे खुद मानते हैं कि वे एक ही उपन्यास निरंतर लिख रहे हैं। उनके उपन्यास एक ही थीम पर होने के बावजूद खुद को दोहराते नहीं हैं। मोदियानो अपनी किताबों को नहीं पढ़ना चाहते हैं इसलिए नहीं कि वे उन्हें पसंद नहीं हैं अथवा अच्छी नहीं हैं। बल्कि इसलिए क्योंकि वे नात्सी अधिकृत फ्रांस को स्मरण नहीं करना चाहते है। यह उन्हें आंतरिक पीड़ा पहुँचाता है। इतिहास और अधिकृत पेरिस उनके सारे लेखन में सूत्र का काम करते हैं। एक व्यक्ति बार-बार उनके यहाँ आता है। फ्रांकोइस धेनाइन (Françoise Dhénain) मनोवैज्ञानिक आधार पर सिद्ध करते हैं कि मोदियानो के लिए लिखने की प्रक्रिया प्रेत निवारण का एक आवश्यक तरीक़ा है। लिखना उनके लिए कैथारसिस है। उनके उपन्यासों में यहूदी सदा से हर स्थान पर बाहरी रहे हैं। फ्रांस और फ्रांसिसियों द्वारा अस्वीकृत जिससे असुरक्षा उत्पन्न होती है। हालाँकि वे अपने उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं मगर उन्होंने बाल साहित्य पर भी क़रीब दो दर्ज़न किताबें लिखी हैं। बच्चों के लिए लिखने वाले आइजक बासविक सिंगर को भी 1978 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। मोदियानो की बच्चों के लिए की गयी रचनाएँ माँ की एक नयी छवि प्रस्तुत करते हैं। ये कहानियाँ उनके भाई रूडी की बातें भी करती हैं।

मोदियानो अतीत और इतिहास की वह झाँकी प्रस्तुत करते हैं जो अक्सर इतिहासकारों की आँखों से ओझल रहती है। वे लेखकों की उस कड़ी का हिस्सा हैं जिन्होंने नात्सी अत्याचार और उससे जुड़ी समस्याओं का सामना किया है। इस शृंखला में हम इमरे कर्टीज़, गुंटर ग्रास, चश्लाव मिलोश, आइज़क बाशविस सिंगर आदि को याद कर सकते हैं। वे युद्ध से जुड़ी यादों और समाज और लोगों के मन पर पड़नेवाले प्रभावों को बेहतर ढंग से सामने रखते हैं। उन्नीस सौ अठहत्तर में फ्रेंच में छपा और उन्नीस सौ अस्सी में अंग्रेजी में अनूदित उनके उपन्यास ‘मिसिंग पर्सन’ ने खूब शोहरत बटोरी थी। इस उपन्यास का केंद्रीय पात्र रोलांड एक जासूस है जो स्मृति लोप का शिकार है। अपनी स्मृति वापस लाने की कोशिश करता हुआ यह जासूस इतिहास में निरंतर आवाजाही करता है। इसके अलावा ‘ट्रेस ऑफ़ मलाइस’ और ‘हनीमून’ उनके दो और प्रसिद्ध उपन्यास हैं। अभी हाल में ही उनकी नवीनतम रचना ‘सो दैट यू डोंट देट लॉस्ट इन द नेबरहुड’ प्रकाशित हुई है। अन्य लेखन की भाँति यह रचना भी आत्मकथात्मक या यूँ कहें कि ऑटोफ़िक्शन है। 1997 में आया और 1999 में इंग्लिश में अनुवादित ‘डोरा ब्रूडर’ डॉक्यूमेंट्री प्रकृति का कार्य है, हालाँकि इसका आधार भी द्वितीय विश्वयुद्ध है। इसमें वे एक सत्य घटना का आश्रय लेते हैं।

पंद्रह साल की एक युवती पेरिस में नात्सी अत्याचार का शिकार बनती है। काल्पनिक उपन्यास होते हुए भी इसमें तथ्यों की तलाश है और अपना पूरा प्रभाव डालने में सक्षम है। 1999 में आयी रचना ‘डेस इनकोन्नुएस’ में पहली बार वे एक स्त्री स्वर (फ़ीमेल व्यॉस) का प्रयोग करते हैं।

स्वयं मोदियानो के अनुसार यदि उनकी रचनाओं का विश्लेषण किया जाये, तो उनमें फ्रांस की चर्चित अपराध कहानियों के अध्याय निकल आएँगे। आलोचक भी उनकी कृतियों की तुलना डिटेक्टिव फ़िक्शन से करते हैं। मगर अपराध कथाओं और मोदियानो के लेखन में एक फ़र्क है। मोदियानो का साहित्य प्रश्न और समस्याएँ खड़ी करता है लेकिन पाठक को प्रश्नों और समस्याओं का कोई बना-बनाया उत्तर या हल नहीं सौंपता है। उनका नायक और वे खुद पाठक के साथ खोज में निकलते हैं लेकिन उनकी पड़ताल असमाप्त रहती है। एक मानसिक जाल है, भूलभुलैया है, जहाँ वे जानते हैं कि उन्हें ज्ञात है पर यह भी जानते हैं कि वे जानते नहीं हैं। मोदियानो के काम का विश्लेषण करती हुई मार्टिन जियोट-बेंडर कहती हैं कि उनका साहित्य अधिकृत फ्रांस की स्मृति तो है मगर यह बहुत खंडित, अस्थिर तथा स्वप्न-जैसे समयखंड को उठाता है और चुनौती प्रस्तुत करता है। एक तरह से यह सटीक या स्थिर विचारशीलता को स्थापित करने के अस्वीकार का साहित्य है।

उनके साहित्य में कुछ भी तयशुदा या स्थिर या सुस्पष्ट नहीं है, इसके स्थान पर इसमें अनेकार्थता और अस्पष्टता मिलती है। उनके नायकों के तो घर तक स्थायी नहीं होते हैं, वे होटलों में अथवा झूठे पतों पर रहते हैं। रेलवे स्टेशनों पर रहते हैं कभी भी चल पड़ने को तैयार। अक्सर उनके पात्र पेरिस में घूमते हुए इतिहास का संधान करते हैं। उनका पेरिस अतीत का महौल लिए चलता है, जहाँ वर्तमान विलय होने लगता है। वर्तमान से पलायन कर पेरिस शहर भूत-प्रेतों के शहर में परिवर्तित हो जाता है। यतीत की यातना उन्हें कचोटती है, बचे यहूदियों की भाँति उन्हें अपराध बोध सताता है। इसीलिए वे कई बार यह इच्छा करते हैं कि वे पेरिस में मात्र एक पर्यटक बने रहें, बिना अपनी या किसी अन्य की स्मृति के।

साथ-ही-साथ आलोचक मोदियानो के गद्य में काव्यात्मकता का गुण देखते हैं और कहते हैं कि इनके वाक्यों में लयात्मकता है, इनमें मिथक भी देखे जा सकते हैं। ख़ासकर घुमक्कड़ यहूदी का मिथक। उनके नायक टहलते-घूमते हुए खोज़ में लगे रहते हैं मगर उन्हें खो जा रही अपनी चीज़ मिलती नहीं है। आलोचक मोदियानो की थीम से अधिक उनकी शैली पर बात करते हैं। इसी पर शोध भी ज्यादा हुए हैं। उनके लेखन को आधुनिकोत्तर साहित्य का दर्ज़ा दिया जाता है। उन्होंने अपने लेखन से समकालीन साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया है और इतिहास चिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। मोदियानो मीडिया से दूर रहना पसंद करते हैं, साक्षात्कार भी विरले ही देते हैं। इससे उनकी निजी छवि एक रहस्यमय व्यक्ति की बनती है लेकिन इसमें शक नहीं है कि साहित्य जगत में उन्होंने अपना स्थान सुरक्षित कर लिया है।

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326, न्यू सीताराम डेरा, एग्रीको, जमशेदपुर- 831009

 

ईमेल :

vijshain@gmail.com

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मर्म मीमांसा

नदीन गोर्डिमर

रंगभेद के खिलाफ़ एक गुरिल्ला कल्पना-शक्ति

विनोद तिवारी

Colonialism is not satisfied merely with holding a people in its grip and emptying the nativels brain of
all form and content. By a kind ofperverted logic, it runs to the past ofthe oppressed people, and distorts,
disfigures and destroys it.

(उपनिवेशवाद केवल इसी बात से संतुष्ट नहीं हो जाता कि उसने उपनिवेशित लोगों को अपने अधिकार एवं नियंत्रण में ले लिया है और वहाँ के लोगों के मन-मस्तिष्क में मौज़ूद सभी तरह के रूपों व छवियों से पूरी तरह उन्हें खोखला कर दिया है। इससे आगे, वह एक विकृत सोच के तहत दमित-शोषित लोगों को उन्हीं के भूत से हाँकता है और उनकी पहचान से उन्हें विरूपित कर विनष्ट कर देता है। )

-Frantz Fanon

पूरी दुनिया में उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद के दमन, शोषण, अत्याचार और लूट का दंश जिन देशों ने झेला है, उनमें अफ्रीका का इतिहास काफी लम्बा है। शताब्दियों तक यह देश गुलामी, दासता और नृशंस शोषण का उपनिवेश बना रहा। विकसित कहे जाने वाले पहली दुनिया के देशों ने अफ्रीकी, एशियाई और लातीन अमरीकी देशों और वहाँ के काले, पीले और मिश्रित रंग के लोगों के प्रति नस्लभेद और रंगभेद की अमानवीयता का जो सभ्य (?) खेल खेला वह मनुष्यता के इतिहास का सबसे नियोजित घिनौना और बर्बर उदहारण है। इस पूँजी आधारित बर्बर सभ्यता ने उपनिवेशित देशों और वहाँ के मूल निवासियों के ऊपर जो कानून और व्यस्थाएं लादीं, वह निश्चित ही अन्यायपूर्ण, निर्दयी और मनुष्यता के इतिहास में सभ्य-प्रवाह के विपरीत थीं। प्रगति, विकास, सभ्यता, शासन आदि के नाम पर साम्राज्यवादी शक्तियों ने दुनिया भर में जो ‘पाठ’ बनाया, वह कितना झूठा और बेमानी था, इसकी पोल आज खुल चुकी है। इंटरनेशनल कांफ्रेंस सेंटर, हवाना, क्यूबा में साउथ सम्मिट के समापन सत्र में 14 अप्रैल, 2000 को दिये गये अपने भाषण ‘तीसरी दुनिया की एकता’ में फिदेल कास्त्रो का यह कथन देखा जाना चाहिए- ‘‘वे यह भूल जाते हैं कि जब योरोप में ऐसे लोगों का वास था जिन्हें रोमन साम्राज्य वहशी कहता था, उस समय चीन, भारत, मध्य-पूर्व, तथा दक्षिण और मध्य-अफ्रीका में सभ्यताएं थीं और उन्होंने उन चीज़ों का सृजन कर दिया था जिन्हें दुनिया के अजूबे कहा जाता था। यूनानियों द्वारा पढ़ना सीखे जाने और होमर द्वारा इलियड लिखे जाने से पहले उन्होंने लिखित भाषाएँ विकसित कर ली थीं। हमारे अपने गोलार्द्ध में ‘माया’ और ‘इंका’ पूर्व सभ्यताओं ने वह ज्ञान अर्जित कर लिया था, जिससे आज भी दुनिया चकित रह जाती है।’ (नव उदारवाद का फासीवादी चेहरा- फिदेल कास्त्रो, हिन्दी अनुवाद-रामकिशन गुप्ता, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली) उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में तीसरी दुनिया का पूरा साहित्य साम्राज्यवादी शोषण, लूट, अत्याचार और बर्बरता के विरुद्ध संघर्ष का साहित्य है। बीसवीं सदी में दक्षिण अफ्रीका ने जो महत्वपूर्ण लड़ाकू नेता और साहित्यकार दिये हैं; जिन्होंने नस्लभेद और रंगभेद जनित असमानता और अमानवीयता के विरुद्ध लड़ाइयाँ लड़ी हैं; उनमें नोबेल सम्मान से सम्मानित कथाकार नदीन गोर्डिमर काम अत्यंत महत्व का है। उनके इस महत्पूर्ण योगदान के लिए उन्हें 1991 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। यह पुरस्कार पाने वाली वह विश्व की सातवीं महिला और दक्षिण अफ्रीका की पहली साहित्यकार थीं। 20 नवम्बर, 1923 को दक्षिण अफ्रीका के सोने की खान वाले एक छोटे से शहर स्प्रिंग्स, ट्रांसवाल में नदीन गोर्डिमर का जन्म एक निम्न मध्यवर्गीय यहूदी परिवार में हुआ। 90 वर्ष का सक्रिय रचनात्मक जीवन जीने के बाद 14 जुलाई 2014 को उनका निधन हो गया। उनकी माता हन्नाह म्येर्स लन्दन की थीं और पिता इसिडोर लातिवियन थे। पिता ने लातिविया किशोरवय में ही छोड़ दिया और अपने बड़े भाई के पास रोज़गार की तलाश में दक्षिण अफ्रीका आ गये थे। घड़ीसाज के रूप में उन्होंने अपने भाई के साथ काम शुरूकिया, बाद में खुद की आभूषणों की दूकान खोल ली। अंग्रेजी भाषी और श्वेत होने के कारण अन्य दक्षिण अफ्रीकी श्वेत परिवारों की तरह उन्हें भी कुलीनता और उच्चता के वे सारे अधिकार मिले थे, जो ‘रुलिंग कास्ट’ के नाते गोरों की सरकार और सत्ता ने अपने लिए बना रखे थे, पर इस विशेष सुविधा प्राप्त प्रभु-वर्ग का होने के नाते गोर्डिमर को अपने परिवार में ही नज़दीक से उस मानसिकता को जानने-समझने का मौक़ा मिला जो बाद में उनकी रचनाओं की संवेदनात्मक आधारभूमि प्राप्त करता है।

नदीन गोर्डिमर की पढ़ाई-लिखाई में उनकी माँ का विशेष हाथ रहा। स्प्रिंग्स में ही एक कैथोलिक कान्वेंट स्कूल से उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। अपनी पढ़ाई-लिखाई का सबसे अधिक श्रेय वे उस छोटे से शहर में मौजूद पुस्तकालय को देती हैं जिसके बारे में उनका कहना है कि, बिना उस पुस्तकालय के शायद उनका लेखक बनना संभव न होता। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने विट्स विश्वविद्यालय, जोहान्सबर्ग में प्रवेश लिया। पहली बार यहीं पर उन्होंने अपने ‘कलर बार’ से बाहर अश्वेत लोगों से दोस्ती कायम की। जोहान्सबर्ग से ही लगे एक सबर्ब ‘सोफियाटाउन’ में उनका परिचय कई दक्षिण अफ्रीकी अश्वेत लेखकों और बुद्धिजीवियों से हुआ जिनमें एस्किया माफ्हेले, नात नकासा, टॉड मात्शिकिज़ा लेविश न्कोसी जैसे प्रमुख लोग थे। गोर्डिमर ने बीच में ही अपने पढ़ाई छोड़ दी और जोहान्सबर्ग में ही बसने का निर्णय लिया। गोर्डिमर ने दो शादियाँ की। पहले पति गेराल्ड गैव्रोन से एक लड़की हुई। 1954 में उन्होंने दूसरी शादी एक पूंजीपति व्यवसायी रेनाल्ड कैसिरर से की, जिससे एक लड़का है। रेनाल्ड नाज़ी जर्मनी के समय के एक शरणार्थी थे और दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजी सेना की और से लड़ाई में शामिल हुए थे।

नदीन गोर्डिमर ने बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक से अपना लेखन कार्य शुरूकिया। जब वे 15 साल की थीं, तब उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई। इस कहानी के सन्दर्भ के लिए वे गोरी चमड़ी वालों का काले लोगों के प्रति जो अमानवीय भेदभावपूर्ण बर्ताव था, उसका ज़िक्र करती हैं जिनके चलते बाल मन में काले लोगों के प्रति एक ऐसी संवेदना ने जन्म लिया जो जीवन भर उनके हक़ और अधिकार की पुरज़ोर लड़ाई लड़ता रहा। अपने बचपन की दो घटनाओं का ज़िक्र करते हुए बताती हैं कि कैसे इन दो घटनाओं ने उनके बाल मन को झकझोर कर रख दिया था। पहली घटना के सम्बन्ध में वे बताती हैं कि जब वे आठ साल की थीं, तो एक बार अपने कान्वेंट स्कूल में छुट्टी के समय निकल कर घूमते हुए थोड़ा आगे की ओर निकल गयीं, जहाँ सोने की खानों में काम करने वाले काले मज़दूरों की बस्ती थी। घर आकर माँ से उन्होंने जब यह बताया, तो बहुत ही सख्ती के साथ उन्हें चेताया गया कि भूलकर भी उधर मत जाना अन्यथा वे लोग तुम्हारे साथ बहुत बुरा बर्ताव कर सकते हैं। गोर्डिमर कहती हैं कि अब मैं सोचती हूँ तो बहुत गुस्सा आता है कि क्या सचमुच, वे काले मज़दूर इसी ताक में बैठे रहते हैं कि कब कोई गोरी चमड़ी वाली लड़की दिखे और वे उस पर टूट पड़ें। दूसरी घटना तब की है, जब वे ग्यारह या बारह साल की थीं, वे एक जनरल स्टोर में माँ के साथ कुछ सामान ख़रीदने गयी थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि काले लोगों के लिए रस्सी के सहारे एक कतार बनायी गयी है और आगे के सिरे पर जाकर उस रस्सी को एक बैरियर की तरह घेरकर बाँध दिया गया है जिसके आगे काले लोग नहीं जा सकते हैं। वे वहीं से जो भी सामान चाहिए उसे चिल्लाकर माँगते और एक टोकरी में वह सामन उनके पास पहुँचा दिया जाता था। उसी टोकरी में वह उस सामान की कीमत रख देते थे। गोरे लोगों की तुलना में न तो स्टोर में सामान तक उनकी पहुँच संभव थी, न भुगतान के लिए काउंटर तक ही वे जा सकते थे। उन्हें जान-बूझकर दूर रखा जाता था। इस नस्ली असमानता और अन्याय से नदीन गोर्डिमर बहुत बेचैन होती थीं। नस्ली भेदभाव तो दक्षिण अफ्रीका में औपनिवेशिक काल से ही चला आ रहा था, पर रंगभेद की नीति को तो 1948 में गोरे लोगों की सरकार ने बाक़ायदा कानून बनाकर सरकारी नीति के तहत लागू किया। इस नये क़ानून में लोगों को चार समूहों में बाँटा गया- काले, गोरे, मिश्रित और भारतीय। इन समूहों के लिए अलग-अलग रिहाइशी क्षेत्र निर्धारित किये गये। इन सबके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य नागरिक सुविधाओं में पर्याप्त भिन्नता और असमानता रखी गयी। सबसे बुरी हालत काले लोगों की ही थी। बीसवीं शताब्दी के छठे दशक से दक्षिण अफ्रीका में जो आन्दोलन शुरूहुआ, वह इसी अन्यायपूर्ण और अमानवीय सरकार और क़ानून के ख़िलाफ था।

नदीन गोर्डिमर ने अपनी कलम की ताकत और कल्पना शक्ति से इस बर्बर यथार्थ को सशक्त रचनात्मक आवाज़ दी। उन्होंने इस नस्ली भेदभाव और रंगभेद को दूर करने संबंधी अपनी सोच और सपने को ऐसी ताकत दी कि रंगभेद के खिलाफ़ उनके लेखन को ख़तरनाक समझा जाने लगा। उनकी कई किताबें सेंसर और प्रतिबंधित हुईं। यह कार्य उन्हीं गोरे प्रभु वर्ग के लोगों ने किया जो उन्हें अपने वर्ग का मानते थे, पर इससे उनकी आवाज़ मद्धिम नहीं हुई, वरन वह और ताकतवर होकर सामने आयी। जब उनके उपन्यास ‘दि कन्ज़र्वेस्निस्ट’ (1974) को बुकर सम्मान मिला, तो पहली बार दुनिया की नजरों में उनका लेखकीय संघर्ष और प्रतिरोध सामने आया। 1991 में जब उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तो पूरी दुनिया के साथ खुद दक्षिण अफ्रीका में वे महत्वपूर्ण लेखक के रूप में स्वीकृत हुईं। स्वीडिश एकेडेमी ने पुरस्कार देते समय कहा कि नदीन गोर्डिमर ने अपने देश दक्षिण अफ्रीका के नस्लभेद संबंधी सचाई को सामने लाने वाले महाख्यान रचे हैं। सच तो यही है कि, गोर्डिमर ने जीवन भर दक्षिण अफ्रीका की समस्याओं को ही अपने लेखन का केंद्र बनाया। 1991 में रंगभेद के खिलाफ़ लम्बी लड़ाई के बाद जब नेल्सन मंडेला को जेल से रिहा किया गया और पूरी दुनिया में जीत का जश्न मनाया गया, तो एक साक्षात्कारकर्ता ने जब उनसे यह पूछा कि, अब अप क्या करेंगी, अब तो आपके लेखन का जो एजेंडा था, जो मोटिव्स थे, वो पूरे हुए? तो गोर्डिमर का जवाब था, ‘‘क्या सचमुच दक्षिण अफ्रीका के लोगों की समस्याएँ खत्म हो गयीं? अभी तो उनके जीवन स्तर की अनेक समस्याएँ हैं, जिनसे लड़ना बाकी है।’’ सच में, गोर्डिमर का बाद का लेखन सेक्स और एड्स की समस्या, राजनीतिक दमन, भ्रष्टाचार आदि समस्यायों को केंद्र बनाता है। गोर्डिमर अपने समय की विश्व की सर्वाधिक राजनीतिक चेतना सम्पन्न उपन्यासकार हैं। नेल्सन मंडेला उनके अच्छे मित्रों में से थे। वे अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस  की एक जुझारू सदस्य थीं। पार्टी के भीतर अपनी सोच और सही मंतव्यों के नाते उनकी एक महत्वपूर्ण जगह थी। 1994 में जब पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए, तो उन्होंने बढ़-चढ़ कर उसमें भागीदारी की। जोहान्सबर्ग में अपने क्षेत्र में ‘जैकब जुमा’ के साथ चुनाव प्रचार किया। अब नयी सरकार से उनकी उम्मीद थी कि एक बेहतर संविधान बने। नागरिक अधिकारों का एक विश्वस्तरीय क़ानून बनाया जाय। दक्षिण अफ्रीका एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बने, पर ऐसा संभव नहीं हुआ। जब ‘स्टेट इन्फोर्मेशन बिल ’ लाया गया, तो

गोर्डिमर ने इसका खुलकर विरोध किया। यह बिल खुलेआम भ्रष्टाचार को प्रश्रय देता था और भ्रष्टाचारियों के पक्ष में जाता था। वह थाबो मबेकी के प्रशंसकों में से थीं, पर नहीं, उन्होंने ‘कांग्रेस’ छोड़ दी। नदीन ने अपने उपन्यास ‘नो टाइम लाइक प्रेजेंट’ (2012) में इसका पुरजोर क्रिटिक रचा है।

लगभग 75 साल के अपने लम्बे रचनात्मक जीवन में नदीन गोर्डिमर ने कुल 200 कहानियाँ और 30 उपन्यास लिखे हैं। उनकी सभी कहानियाँ पाँच संकलनों- ‘नॉट फॉर पब्लिकेशन’ (1965), ‘लिविंगस्टोन’स कम्पेनियन’ (1971), ‘जम्प’ (1991), ‘लूट’ (2003) और ‘लाईफ टाइम’ (2011) में संकलित हैं। उनकी ‘कामरेड्स’ और ‘लूट’ कहानियाँ खूब चर्चित हुई थीं। ‘कामरेड्स’ तो पेंगुइन द्वारा प्रकाशित ‘इंटरनेशनल विमेंस शार्ट स्टोरीज’ में भी संकलित है। इसके अलावा उनका वह आलोचनात्मक लेखन ओर अभिमत भी है जो स्टीफन क्लिंगमैन के सम्पादन में ‘दि एसेंशियल जेस्चर’ (1988) में संकलित है। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास ‘दि लाइंग डेज’ (1953) है। यह एक अर्द्धआत्मकथात्मक उपन्यास है जिसमें खंडित होते, ढहते औपनिवेशिक पृष्ठभूमि को चित्रित किया गया है।

इसके बाद गोर्डिमर ने तीन उपन्यास दिये- ‘ए वर्ल्ड ऑफ स्ट्रेन्जेर्स’ (1958), ‘ऑकेजन फॉर लविंग’ (1963), और ‘दि लेट बोर्जुवा’ ज वर्ल्ड’ (1966)। अब तक गोर्डिमर को लगता था कि उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना है, जिस पर शायद उन्हें अकेले चलना है क्योंकि समकालीन दक्षिण अफ्रीकी कथाकारों के बीच उनकी कहीं कोई जगह नहीं थी। उन्हें बाहरी ही माना जाता था, एक तो अपने औपन्यासिक एजेंडे के कारण। दूसरे अंग्रेजी भाषा के कारण। पर उनके उपन्यास ‘दि लेट बोर्जुवा’ ज वर्ल्ड’ के प्रकाशित होने के साथ ही एक उपन्यास के रूप में उनके औपन्यासिक क्षमता को धीरे-धीरे स्वीकृति और मान्यता मिलने लगी। इस उपन्यास में गोर्डिमर एक आतंरिक आलोचक की तरह एक ऐसे समय को खरोंचती हैं जिसमें

पूरा बोर्जुआ समाज प्रश्नांकित होता है। इस उपन्यास में गोर्डिमर पहली बार औपनिवेशिक दायरे के सीमित प्रेम, नैतिकता और भ्रष्टाचार के जेनर से बाहर निकलती हैं। अपने कहन के लिए जिस एस्थेटिक की, वह लगभग दो दशकों से तलाश कर रही थीं, अब वह साधता हुआ दिखता है। एक तरह से यह उपन्यास नेल्सन मंडेला के सत्याग्रह के जज़्बे को परिलक्षित करता है। अपने उपन्यासों में अब तक जो एक ‘लिबरल-कंजर्वेटिव’ वाली पोज़ीशन अख़्तियार करती दिखती थीं, वह टूटता है। उनके अगले उपन्यास (जिस पर संयुक्त रूप से उन्हें बुकर सम्मान मिला) ‘दि कन्जर्वेस्निस्ट’ (1974) में तो वह एक रेडिकल मॉडर्निस्ट के रूप में प्रकट होती हैं। अब वह उन सच्चाइयों को खरोंचती हैं, उनको सामने ले आती हैं जो खुद उन्हीं के वर्ग और समुदाय की सच्चाइयाँ हैं। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में एक साक्षात्कार के दौरान पूछे गये इस सवाल का कि, ‘‘अब आपके ही जो ‘लिबरल’ विचार वाले लोग हैं, आपके बारे में क्या सोचते हैं?’’ उनका जवाब था, ‘‘मैं पैदाईशी श्वेत हूँ, पर मैं लिबरल नहीं हूँ।’’ फिर तत्क्षण उनका वाक्य था, ‘‘आई एम लेफ्टिस्ट माई डियर’’। ‘दि कन्जर्वेस्निस्ट’ एक पूँजीपति फ़ार्म के मालिक मेहरिंग की कहानी है। इस फ़ार्म में एक बड़े व्यवसायी का बड़ा इन्वेस्टमेंट है। उसने टैक्स बचाने के लिए यह इन्वेस्टमेंट किया है। यह वह ‘ब्लैक मनी’ है जिसे उसने टैक्स बचाने के लिए इन्वेस्ट किया है। उसकी वामपंथी पत्नी यह सब जानती है, फिर भी वह उसका संरक्षण करती है। मेहरिंग अपने फ़ार्म में काम करने वाले काले लोगों के साथ अनेकशः बर्बर और अमानवीय व्यवहार करता है। इस किये का उसे कोई पछतावा भी नहीं, वरन वह बार-बार इसे वैध और ठीक ठहराता रहता है। ‘इन पर शासन करने के लिए ही हमें बनाया गया है’ यही उसका टोन है। यह ‘टोन’ केवल मेहरिंग का ही नहीं, वरन उस पूरी 13 प्रतिशत गोरी आबादी का ‘टोन’ है जो काले लोगों पर शासन करने के लिए ही बनाये गये हैं। यह उपन्यास नौकर और मालिक के रिश्तों का ऐसा दस्तावेज़ है जिसे गोर्डिमर बहुत समय से चित्रित करने का साहस कर रही थीं, पर कह पायीं इस उपन्यास में। उनका अगला उपन्यास ‘बर्गर’स डाटर’ (1979) एक बहुत ही सशक्त राजनीतिक उपन्यास है। यह उपन्यास उनके अफ्रीकी मित्र और नेल्सन मंडेला के साथ-साथ रंगभेद के ख़िलाफ संघर्ष करने वाले अन्य अफ्रीकी लोगों की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले वकील ब्रैम फिशर को फोकस कर लिखा गया है। यह उपन्यास एक तरह से साहित्यिक विधि संहिता है जिसे गोर्डिमर ‘कोडेड होमेज़’ के रूप में

प्रस्तुत करती हैं। दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने गोर्डिमर के जिन कुछ उपन्यासों को प्रतिबंधित किया, उनमें से यह भी एक है। माना जाता है कि यह गोर्डिमर के उपन्यासों में सर्वाधिक मुखर राजनीतिक उपन्यास है। 1981 में नौकर और मालिक के रिश्तों पर उनका एक अन्य उपन्यास ‘जुलाई’स पीपल’ (Julyls people) आता है। यह उपन्यास रंगभेद के ख़िलाफ काले लोगों द्वारा भविष्य में होने वाले भीषण विद्रोह का बहुत ही मुखरता से एक ‘रोड मैप’ प्रस्तुत करता है। उपन्यास में दक्षिण अफ्रीका की अश्वेत पुलिस अपने ही लोगों को गिरफ़्तार करने से मना कर देती है। सभी तरह की नागरिक सुविधाएँ ठप्प कर दी जाती हैं। संघर्ष केवल शहरों तक ही नहीं सीमित रहता, वरन गाँवों तक फैल जाता है। इस बार विद्रोही पूरी तरह से खूनी लड़ाई की तैयारी कर चुके हैं। उनके पास भारी मार्क क्षमता वाले शस्त्र और हवाई जहाज हैं। वे अपने पड़ोसी अश्वेत राष्ट्रों- बोत्स्वाना, ज़िम्बाब्वे, जाम्बिया, नामीबिया और मोजाम्बिक तक इस लड़ाई में एक-दूसरे की मदद करते हैं। क्यूबा और सोवियत संघ उनके इस संघर्ष में मदद पहुँचा रहे हैं। गोर्डिमर का यह उपन्यास भी प्रतिबंधित किया गया। आरोप यही कि यह उपन्यास गृहयुद्ध को जन्म दे सकता है।

वस्तुतः नदीन गोर्डिमर का समूचा साहित्य दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, पूरे दुनिया में रंगभेद के खिलाफ संघर्षरत उन करोड़ों लोगों की आवाज़ को मुखर करता है जो अपने ही देश में अपनी ही जमीन पर एक ऐसी ज़िन्दगी जीने के लिए विवश और बाध्य हैं जिसे कहीं से भी मनुष्य का जीवन नहीं कहा जा सकता। गोर्डिमर अपने उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से उस समाज को गहरे घुसकर छेदती और छीलती हैं जो सभ्यता, मानवता, आधुनिकता आदि का दंभ भरता है। वह गोरे प्रभु वर्ग के राजनीतिकों, बुद्धिजीवियों और व्यापारियों के आपसी रिश्ते और चालाकियों को सामने ले आती हैं। उनकी हिप्पोक्रेसी को वे तारतार करती हैं। गोर्डिमर बड़े ही रचनात्मक ढंग से पूँजीवाद, उदारवाद और मार्क्सवाद की साझेदारियों और उनके झूठ और छद्म के व्याकरण को प्रस्तुत करती हैं। वास्तव में गोर्डिमर का पूरा लेखन आधी शताब्दी के दक्षिण अफ्रीका के समाज और मनोविज्ञान का एक साहित्यिक दस्तावेज़ है जिसके सहारे आप उस

इतिहास को जान-समझ सकते हैं। जब उपनिवेशी दौर से मुक्त होकर यह देश 1948 में लोकतान्त्रिक चुनाव की प्रक्रिया के बाद एक नये तरह के अन्याय, शोषण और दमन के चक्र में मात्र 13% गोरे लोगों के शासन के अधीन आता है। गोर्डिमर का साहित्य अब तक विश्व की लगभग तीस भाषाओं में अनुदित हो चुका है। नदीन गोर्डिमर 14 जुलाई, 2014 को हमारे बीच से विदा ले चुकी हैं पर इस धरती पर कहीं भी जब तक जाति, रंग या नस्ल के नाम पर भेदभाव, अन्याय, दमन और शोषण का साम्राज्य बना रहेगा, उनका साहित्य उससे लड़ने और मुक्त होने की प्रेरणा देता रहेगा।

(इस लेख के लिए सारे तथ्य रोनाल्ड सुरेश रॉबर्ट द्वारा लिखित गोर्डिमर की जीवनी ‘नो कोल्ड किचन’ से लिये गये हैं। कुछ सन्दर्भ ‘दि गार्डियन’, ‘दि न्यूयार्क टाइम्स’ और ‘टेलीग्राफ’ से लिये गये हैं)

सी-4/604, ऑलिव काउंटी, सेक्टर-5, वसुंधरा, गाज़ियाबाद-201012

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मर्म मीमांसा

लेडी विन्डरमेयर्स फैन

स्त्री की पहचान और स्वीकृति का सवाल

सुधा सिंह

ऑस्कर वाइल्ड की यह रचना सन् 1893 में पहली बार प्रकाशित हुई। (देखिए, www.thefloatingpress.com)

सन् 2009 में द फ्लोटिंग प्रेस से इसका नया संस्करण आया। यह नाटक औद्योगिक लंदन के शहरी जीवन पर केन्द्रित है। इस नाटक पर कई फिल्में बन चुकी हैं। 1917 में मूक फिल्म बनी और 1925 में वार्नर ब्रदर्स ने इस पर आधारित फिल्म बनायी। 1945 में भी इस नाटक पर फिल्म बनी है। यह नाटक बहुत ही कसा हुआ और मुद्दे पर केन्द्रित है। इस नाटक का देशकाल-वातावरण चौबीस घंटे की समयावधि में अवस्थित है। लंदन के परिवेश पर आधारित इस नाटक का समय ‘वर्तमान’ है और किसी भी वर्ष के किसी भी महीने के मंगलवार की शाम पाँच बजे से बुधवार की दोपहर डेढ़ बजे इस नाटक का समय व्यतीत होता है। चार अंकों का यह नाटक लंदन के उच्च मध्यवर्ग के आंतरिक जीवन की कहानी है। विशेषकर उच्च मध्यवर्गीय अंग्रेज़ घरों में परिवार की संरचना कैसी है, वह किन नैतिक-अनैतिक मानदंडों पर टिकी है? कुलीन स्त्रियों का सार्वजनिक जीवन कैसा है? एक युवा कुलीन लड़की के जीवन का लक्ष्य क्या है? कुलीन पुरुष स्त्री को समग्र रूप में और अपनी स्त्री को विशेष रूप में कैसी देखना चाहता है? उसमें किन गुणों और भावों की कामना करता है? स्त्री स्वयं को इस समाज में कैसे देखती है? इस समाज के साथ अपने दुरूह सम्बंधों को कैसे देखती है? उच्च मध्यवर्गीय कुलीन अंग्रेज़ स्त्रियाँ अपने लिए जीवन से हासिल क्या करना चाहती हैं? उनमें अपने व्यक्तित्व के विकास की कोई जद्दोजहद है या नहीं? ऑस्कर वाइल्ड की इस नाटकीय कृति को पढ़ते समय ये सारे सवाल अपने-आप उठते हैं।

नाटक का आरंभ लेडी विन्डरमेयर के घर के शाम के दृश्य के साथ होता है। लेडी विन्डरमेयर उच्चमध्यवर्गीय कुलीन समाज के पुरुष लॉर्ड डार्लिंगटन के साथ बातचीत कर रही है, साथ ही इस अनाहूत मेहमान पर अपनी व्यस्तता भी ज़ाहिर कर रही है कि आज शाम की नृत्य पार्टी में कई मेहमान आने वाले हैं जिनके लिए उसे घर को अच्छी तरह सँवारना-सजाना है। अचानक मेहमान की निग़ाह एक खूबसूरत फैन पर जाती है। वह इसके बारे में जिज्ञासा प्रकट करता है। लेडी विन्डरमेयर उसे बताती है कि यह उसके पति का उसके लिए उपहार है, क्योंकि आज उसका जन्म दिन है। लॉर्ड डार्लिंगटन अफ़सोस प्रकट करता है कि उसे मालूम नहीं था कि आज लेडी विन्डरमेयर का जन्म दिन है अन्यथा वह अपनी पसंदीदा स्त्री के लिए दुनिया का बेहतरीन उपहार लेकर आता। वह पूछता है कि अब इस स्थिति में वह क्या करे? लेडी विन्डरमेयर हँसी में कहती है कि वह मीठी-मीठी बातें करे, वही उसका उपहार होगा।

बातचीत के दौरान अंग्रेज़ी समाज में विशेष कर लंदन के कुलीन परिवारों के अंदर स्त्री और पुरुष के सम्बंधों की चर्चा होती है। पुरुषों में प्रचलित विवाहेतर सम्बंधों पर चर्चा होती है। बातचीत में ही लॉर्ड डार्लिंगटन लेडी विन्डरमेयर के प्रति अपने लगाव का ज़िक्र करता है और कहता है कि वह एक नेक दिल और पवित्र स्त्री है, ऐसी स्त्री को अपने जीवन में पाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है। उसे अपना पूरा जीवन दे सकता है।

लेडी विन्डरमेयर इस बातचीत में भाग लेते हुए कहती है कि कुलीन समाज में मर्दों की यह स्थिति है कि वे अपनी पत्नी के अलावा अन्य कई स्त्रियों से सम्बंध रखते हैं, लेकिन अगर उसके साथ ऐसा कुछ होगा, तो वह निर्णय लेने में देर नहीं करेगी। वह ऐसी स्थिति में उसके प्यार को अपमानित करनेवाले अपने पति को त्याग देगी।

इसी समय डचेज ऑफ़ बेरविक अपनी बेटी लेडी अगाथा के साथ प्रवेश करती है। वह लार्ड विन्डरमेयर के श्रीमती एर्लिन के साथ सम्बंधों के बारे में बताती है। साथ ही यह भी बताती है कि श्रीमती एर्लिने ने इस सम्बंध से काफ़ी धन हासिल किया है और अब वह कुलीन अंग्रेज़ स्त्रियों के साथ दोस्ती करके सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेकर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करना चाहती है। लेडी विन्डरमेयर कहती है कि वह विश्वास नहीं कर सकती है कि उसका पति उससे प्यार नहीं करता और उसे धोखा दे रहा है। इन लोगों के जाने के बाद वह अपने पति का बैंक खाता जाँचती है और पाती है कि वहाँ श्रीमती एर्लिन के नाम दी जानेवाली रक़म दर्ज़ है। इसी समय लार्ड विन्डरमेयर आ जाता है और पत्नी द्वारा अपना बैंक खाता जाँचे जाने पर क्रोध प्रकट करता है। उसकी पत्नी कहती है कि उसे पूरा क़ानूनी अधिकार है अपने पति के बैंक खाते को जाँचने का। वह उससे श्रीमती एर्लिने के बारे में दरियाफ़्त करती है। लॉर्ड विन्डरमेयर उसे एक भली कुलीन स्त्री बताता है जो कुलीनता से च्युत हो गयी है और पुनः अपने समाज में वापस लौटना चाहती है। वह चाहती है कि लेडी विन्डरमेयर उसकी मदद करे। लार्ड विन्डरमेयर चाहता है कि उसकी पत्नी श्रीमती एर्लिन को अपने जन्मदिन की पार्टी में आमंत्रित करे। लेकिन लेडी विन्डरमेयर इसके लिए राज़ी नहीं होती। लॉर्ड विन्डरमेयर स्वयं ही ख़त लिखकर आमंत्रण भेजता है। श्रीमती एर्लिन पार्टी में आती है। वह पार्टी में स्त्री-पुरुष सबके आकर्षण का केन्द्र बन जाती है। लेडी विन्डरमेयर चाहती थी कि वह श्रीमती एर्लिन का अपमान करे, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती। वह लॉर्ड डार्लिंगटन को उलाहना देती है कि वह उसे अपना मित्र मानती थी और उसने भी जानते हुए भी साफ़ तौर पर नहीं बताया कि उसके पति के श्रीमती एर्लिन के साथ सम्बंध हैं। वह इस बात से आहत होती है। लॉर्ड डार्लिंगटन कहता है कि अब वह उसके साथ सब कुछ छोड़कर निकल पड़े क्योंकि उसने कहा था कि पति के बेवफ़ा होने पर वह उसे त्याग देगी। लेकिन लेडी विन्डरमेयर ऐसा कुछ नहीं करती, वह अपने को कायर कहती है। लार्ड डार्लिंगटन साफ़ तौर पर कहता है कि वह आज ही फ़ैसला करे, नहीं तो फिर कभी नहीं। वह आज ही लंदन छोड़कर चला जाएगा। पार्टी समाप्ति पर होती है। लेडी विन्डरमेयर अपने कश्मकश से बाहर आती है और अपने ईमानदार और दृढ़ स्वभाव का परिचय देते हुए पति के नाम एक पत्र लिखकर लॉर्ड डार्लिंगटन को अपने जीवन में स्वीकार करने के लिए उसके घर चली जाती है। लेकिन वहाँ पहुँचकर उसे अफ़सोस होता है कि वह क्यों उत्तेजना में यहाँ आ गयी।

लेडी विन्डरमेयर का पत्र श्रीमती एर्लिन के हाथ लग जाता है, वह उसे पढ़कर चिंतित हो जाती है। उसे लगता है, उसके जीवन की परिस्थितियाँ एक बार फिर मूर्त हो गयी हैं और अपनी त्रासदी को दोहराने लगी हैं। वह किसी भी तरह इस परिवार को टूटने से बचाने के प्रयास में लग जाती है। लॉर्ड विन्डरमेयर को कह देती है कि मारर्ग्रेट यानि लेडी विन्डरमेयर बहुत थक गयी हैं और सोने चली गयी हैं। निर्देश दे गयी हैं कि कोई उन्हें न जगाये। वह लॉर्ड ऑगस्टस को कहती है कि वह लॉर्ड विन्डरमेयर को लेकर अपने क्लब में जाये और जितनी देर उसे वहाँ रोककर रख सकता हो, रखे।

उधर लेडी विन्डरमेयर को लॉर्ड डार्लिंगटन अपने घर ले जाता है, पर वह घर पर नहीं होता। उसका इंतज़ार करते हुए वह तरह-तरह की बातें सोचती है। वह यह भी सोचती है कि उसे घर से निकल कर यहाँ नहीं आना चाहिए था। कौन-सी स्थिति बुरी है? उस आदमी की दया का इंतज़ार करना जो उसे प्यार करता है या उस आदमी की पत्नी बने रहना जो अपने घर में उसका अपमान करता है? स्त्री क्या चाहती है? स्त्री इस पूरी दुनिया में क्या अस्तित्व रखती है? क्या यह आदमी जिसे वह अपना पूरा जीवन देने जा रही है, हमेशा प्यार करेगा? वह उसे क्या दे सकेगी? होंठ जो खुशी का आस्वाद भूल गयें हैं, आँखें जो रो-रोकर आँसुओं से तर हैं, ठंडे हाथ और बर्फ़ जैसा हृदय! वह उसे कुछ नहीं दे सकती। उसे लौट जाना चाहिए। लेकिन वह लौट नहीं सकती क्योंकि अब तक तो उसके पति ने वह पत्र पढ़ लिया होगा। वह उसे कभी वापस नहीं स्वीकारेगा। (ऑस्कर वाइल्ड, लेडी विन्डरमेयर्स फैन, 1893, द फ्लोटिंग प्रेस, 2009, तीसरा अंक, पहला दृश्य ) श्रीमती एर्लिन, लेडी विंडरमेयर को खोजती हुई लॉर्ड डार्लिंगटन के घर आती है और तरह-तरह से उसे अपने पति के घर लौट जाने को मनाती है। इनकी बहस के दौरान ही लॉर्ड विंडरमेयर, लॉर्ड आगस्टस, डम्बी, लॉर्ड डार्लिंगटन, सेसिल ग्राहम आदि पार्टी और क्लब से लौटकर वहाँ आते हैं। श्रीमती एर्लिन लेडी विंडरमेयर को छिपने को कहती है और आश्वस्त करती है कि वह उन लोगों को संभाल लेगी। इन पुरुषों की बातचीत में प्यार, औरत आदि की चर्चा के दौरान लॉर्ड डार्लिंगटन खुलासा करता है कि वह एक ऐसी स्त्री को प्यार करता है जो घर-गृहस्थी वाली है और अपने पति को प्यार करती है। संकेत पर्याप्त था लेकिन उसे पुष्ट करने के लिए एक और घटना घट जाती है। कमरे के सोफे पर रखा लेडी विंडरमेयर का फैन सेसिल ग्राहम की नज़र में आ जाता है। वह लॉर्ड डार्लिंगटन का मजाक उड़ाता है कि वह प्रेम की पवित्रता की बात करता है और घर में हमेशा एक औरत को छिपाए रखता है जिसका यह पंखा है। लॉर्ड विंडरमेयर जो अब विदा लेना चाहता था, उसे सेसिल ग्राहम चिल्लाकर बुलाता है और कहता है कि लॉर्ड डार्लिंगटन ने अपने घर में एक औरत को छिपा रखा है, जिसका यह पंखा है। लॉर्ड विंडरमेयर अपनी पत्नी के पंखे को पहचान लेता है और डार्लिंगटन से सवाल करता है कि मेरी पत्नी का पंखा तुम्हारे घर में क्या कर रहा है? वह सारे घर की तलाशी लेना चाहता है। दोनों में झगड़ा होता है। इतने में पर्दे के पीछे छिपी श्रीमती एर्लिन सामने आती है और कहती है कि उसे खेद है कि लॉर्ड विंडरमेयर के घर से निकलते समय गलती से वह उसकी पत्नी का पंखा लेकर चली आयी। सभी अलग-अलग मुद्राएँ बनाते हुए चुप हो जाते हैं।

चौथे और अंतिम दृश्य में लेडी विंडरमेयर अपने घर लौट आती है। वह समझ नहीं पाती कि श्रीमती एर्लिन ने उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार कर उसे मुसीबत से क्यों उबारा; जबकि वह उसका अपमान करना चाहती थी! लॉर्ड डार्लिंगटन और श्रीमती एर्लिन की बातचीत से पाठक पर स्पष्ट होता है कि लेडी विंडरमेयर श्रीमती एर्लिन की माँ है और श्रीमती एर्लिन को चुप रहने और जीवन यापन के लिए लॉर्ड विंडरमेयर पैसे दिया करता था। लेकिन अब श्रीमती एर्लिन कहीं बाहर जाना चाहती है, शायद दक्षिण लंदन में। क्योंकि उसका हृदय यहाँ प्रभावित हो रहा है, जो वह नहीं चाहती। (वही, चौथा अंक, पहला दृश्य) लेडी विंडरमेयर उसके प्रति कृतज्ञता से भरी हुई है। जाते समय श्रीमती एर्लिन लेडी विंडरमेयर की

युवावस्था और बच्चे के साथ की तस्वीरें साथ ले जाने के लिए माँगती है जो लेडी विंडरमेयर खुशी-खुशी देती है। लेडी विंडरमेयर अपने पति से कहती है कि श्रीमती एर्लिन उससे भी कहीं बहुत अच्छी महिला हैं। लॉर्ड आगस्टस, श्रीमती एर्लिन से प्रेम करता है और स्थायी रूप से उसका साथ चाहता है। वे दोनों पति-पत्नी बनकर जीवन बिताने का निर्णय लेते हैं। लेडी विंडरमेयर लॉर्ड आगस्टस को कहती है वह एक बहुत भली महिला से विवाह कर रहा है। नाटक इस दृश्य पर समाप्त हो जाता है।

इस नाटक में लंदन के उच्च मध्यवर्गीय परिवारों के जीवन का बारीक़ विवरण है। लंदन के शहरी जीवन और उसकी आदतों का वर्णन है। इन कुलीन कहे जानेवाले परिवारों में सामंती और आधुनिक युग के संस्कारों और मूल्य बोध की टकराहट है। कहानी में परिवार संस्था के विघटन को रोकना महत्वपूर्ण दिखता है। लेकिन इससे आगे भी कई सवाल नाटक में कौंधते रहते हैं। पहला तो यही कि इस विघटन को किसके लिए रोका जाना ज़रूरी है? स्त्री के लिए या पुरुष के लिए? अथवा दोनों के लिए? विघटन की क़ीमत स्त्री को ही भारी पड़ती है या पुरुष को भी उन्हीं स्थितियों में वही क़ीमत देनी होती है? परिवार से बाहर जानेवाली स्त्री के साथ सामाजिक व्यवहार इतना कठोर और हृदयहीन क्यों होता है कि स्त्री की पहचान का ही अपहरण हो जाता है? उस परिस्थिति में घिर गयी औरत अपने हृदय का हनन करके ही पुरुष आकर्षण और मनोरंजन का साधन बनी रह सकती है? पत्नी और अन्य स्त्री का चरित्र इतने कालेसफ़ेद रंगों में क्यों रंग दिये गये हैं? पत्नी के बंधन से पति की इज्ज़त कैसे हो सकती है? प्रेम क्या है?

स्त्री-पुरुष मित्र क्यों नहीं हो सकते? क्या उनके बीच केवल शारीरिक आकर्षण ही होता है? शरीर के अलावा स्त्री की सत्ता क्या हो सकती है? इस तरह के बहुत से सवालों का जबाव इस नाटक में गूँथे हुए हैं।

इन सवालों पर कोई बहुत बड़ी-बड़ी बहसें नहीं हैं, चरित्र छोटे-छोटे संवादों में अपनी बात कह जाते हैं। घटनाएँ नाटक को आगे बढ़ाती हैं। उन्हीं घटनाओं में से चरित्र का चेहरा भी बनता है। आधुनिक युग की नीरसता और शुष्कता पर टिप्पणी करता हुआ लॉर्ड डार्लिंगटन कहता है कि आजकल हम सब इतने कठिन समय से गुज़र रहे हैं कि हम केवल एक ही अच्छी चीज़ दूसरों को दे सकते हैं, वह है मौखिक प्रशंसा। दरअसल यह प्रशंसा कुलीन मध्य वर्ग में स्त्रियों को एक निर्रथक मायाजाल में फँसाए रखता है। लेडी विन्डरमेयर स्पष्ट कहती है-‘‘मैं प्रशंसा पसंद नहीं करती और मैं नहीं जानती कि क्यों पुरुष ऐसा सोचते हैं कि वे स्त्री को बहुत खुश कर रहे हैं जब वे उन्हें गट्ठर भर कर खोखले वाक्य कहते हैं।’’ (वही, प्रथम अंक)

हम अच्छा क्यों दिखना चाहते हैं, जबकि हम सबमें एक हिस्सा बुरा होता है। यहाँ अच्छा दिखने से अर्थ है भद्र और कुलीन दिखने के लिए जिस नाटकीयता को ओढ़े रहना होता है, वह। जहाँ कुछ भावनाओं को खुलकर सामने व्यक्त करने की मनाही होती है, लेकिन पर्दे के पीछे सब कुछ करने की छूट। अच्छा दिखना इसलिए ज़रूरी होता है कि दुनिया आपको गंभीरता से ले।

इस नाटक के दो पक्ष हैं। एक तो इंग्लैंड के भद्र समाज के खोखलेपन पर गंभीर कटाक्ष और दूसरा स्त्री के सम्बंधों का समाज और पुरुष के साथ उसका व्यक्तिगत और सामाजिक तौर पर खुलासा। इस दूसरे पक्ष में स्त्री के लिए भद्र-कुलीन समाज में उपलब्ध, व्यवहृत और अपेक्षित सामाजिक स्पेस की स्थितियाँ भी शामिल हैं। स्त्री की राय का भद्र समाज में अनुकूलन भी शामिल है। उसकी बाहर निकलने की छटपटाहट और विकल्पहीनता की स्थितियाँ भी शामिल हैं। नाटक के पहले अंक में ही स्त्री-पुरुष सम्बंधों के कई रूप दिखाई देते हैं। लेडी विन्डरमेयर जिसका नाम मार्ग्रेट है, के दो साल के सुखी पारिवारिक जीवन की झलक उस पंखे के रूप में प्रकट होती है जो उसका पति उसके जन्म दिन के तोहफ़े के रूप में उसे देता है। इस सम्बंध के सफल होने का संकेत भी एक विडंबनापूर्ण स्थति से मिलता है।

लॉर्ड डार्लिंग्टन सोफे पर रखे उस पंखे को देखता है और उसके बारे में पूछता है। मार्ग्रेट कहती है कि आज उसका जन्म दिन है और उसके पति की तरफ से यह पंखा भेंट में दिया गया है। डार्लिंग्टन और कुलीन समाज की निग़ाह में मार्ग्रेट का पति एक बड़ी उम्र की स्त्री के संपर्क में है जिसके चरित्र के बारे में संशय की स्थिति है। डार्लिंग्टन यह बात जानता है और संकेतों में मार्ग्रेट से कहता है कि ‘‘मैं सोचता हूँ कि हम ख़ास दोस्त बन सकते हैं क्योंकि एक दिन तुम्हें दोस्त की ज़रूरत पड़ेगी।’’ नाटक में यह दृश्य बहुत मायने रखता है और दोस्ती को लेकर स्त्री-पुरुष के नज़रिए के फर्क़ को उद्घाटित करनेवाला है। कह सकते हैं कि आरंभ का यह दृश्य न होता, तो नाटक एक बहुत ही रूढ़ उपदेशात्मक फॉर्मेट में ही बँधा रह जाता। नाटक का यह दृश्य और इसमें अभिव्यक्त भावनाएँ बीच के एक दृश्य में फिर दोहराई जाती हैं। आख़िरी दृश्य और उसमें लेडी विन्डरमेयर उर्फ़ मार्ग्रेट की दुविधा जैसे इस दृश्य के दो हिस्सों में उठाये गये सवालों को पूरा करनेवाली साबित होती है। एक स्त्री का द्वन्द्व, उसका कश्मकश और भद्रकुलीन समाज में उसके लिए विक़ल्पहीनता की स्थिति सब कुछ जैसे इन तीन अलग-अलग लेकिन एकदूसरे से जुड़े हिस्सों में पूरा हो जाते हैं।

स्त्री-पुरुष सम्बंधों का एक रूप है, जो विवाह के ढाँचे के भीतर है और दूसरा वह रूप है, जो विवाह के ढाँचे के बाहर है। इसका चित्रण नाटककार ने बड़ी गंभीरता के साथ स्त्री और पुरुष दोनों पक्षों के संदर्भ में किया है। स्त्री के पक्ष से अलग सामाजिक व्यवहार को चित्रित किया है और पुरुष के पक्ष से अलग। स्त्री-पुरुष के संदर्भ में अलग सामाजिक नज़रिये का उत्स वर्चस्व की पुंसवादी सत्ता में निहित है। आरंभ के दृश्य में जहाँ लॉर्ड डार्लिंग्टन लेडी विन्डरमेयर को अर्थपूर्ण शब्दों में कहता है कि वह उसका ‘ख़ास दोस्त’ बनना चाहता है, लेडी विन्डरमेयर को भविष्य में दोस्त की ज़रूरत पड़ेगी, तब लेडी विन्डरमेयर सहज शब्दों में जवाब देती है कि ‘हम तो अभी भी दोस्त हैं!’ लेडी विन्डरमेयर स्त्री और पुरुष की दोस्ती को देह और यौनिकता के फ्रेमवर्क से बाहर रखकर देख रही है। वह निस्संकोच कहती है कि ‘मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ और तुम इसे जानते हो।’ लेडी विन्डरमेयर के शब्दों और उनसे जाहिर विचारों में

यह साफ़ है कि वह स्त्री और पुरुष का आपसी दोस्ताना व्यवहार चाहती है। यह स्त्री के लिए पति और परिवार की दुनिया से बाहर का सम्बंध है। यह दोस्ती का सम्बंध है जिसके दायरे में वह पुरुष को भी रखना चाहती है। दिलचस्प चीज़ यह है कि मध्यवर्गीय कुलीन सामाजिक स्पेस में स्त्रियाँ पुरुष से दोस्ती के आधार पर शामिल हों, यह संभव नहीं होता। वे स्त्री को दोस्ती के आधार पर सामाजिक स्पेस में शामिल नहीं करते, जब तक कि वह अपनी शर्तों और अपने व्यक्तित्व के साथ रहकर दोस्ती करना चाहे। वे स्त्री को जब तक सम्बंधों में बाँध नहीं देते; उसकी भूमिका और पहचान को सम्बंधों के आधार पर आसानी से पहचाना जा सकनेवाला नहीं बना लेते; स्त्री को सामाजिक और सार्वजनिक स्पेस में प्रवेश नहीं मिलता। यह एक भयानक त्रासद स्थिति है जो स्त्री की अस्मिता को रिड्यूज़ करता है। उसके लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ता।

लेडी विंडरमेयर के चरित्र में कहीं कोई क्रांतिकारी छोर नहीं है। वह अपने को शुद्धतावादी कहती है और दुनिया को बहुत सीधे-सरल ढंग से विरुद्धों में देखने के बजाय सपाट ढंग से देखती है। जैसा कि विक्टोरिया युग की भद्र नैतिकतावादी दृष्टि ने स्त्री को स्वयं को देखने और स्त्री द्वारा समाज को देखने की ज़रूरत को पैदा किया था, लेडी विन्डरमेयर उससे बाहर नहीं जाती। वह बहुत सीधे और सपाट तरीक़े से स्त्री-पुरुष के सम्बंधों के बारे में अपनी राय रखती है, विशेषकर विवाहित जोड़ों के सम्बंध में। एकदम परंपरित सामाजिक ढाँचे में वह विवाहित स्त्री और पुरुष के सम्बंध की विभिन्न स्थितियों में करनीय और अकरनीय की लिस्ट लॉर्ड डार्लिंग्टन को बताती है। यहाँ तक उसके चरित्र का कोई विशिष्ट पक्ष नहीं दिखाई देता। ऑस्कर वाइल्ड ने आभिजात्य समाज और उसकी नैतिकता को ध्यान में रखकर यह नाटक लिखा था और इसके मंचन के क्रम में बराबर यह ध्यान रखा गया कि शहर के आभिजात्य इलाक़ों में ही इसका मंचन हो ताकि इसे विशिष्ट दर्शक मिलें। इस नाटक को अपार सफलता मिली थी और 1892 में लिखे जाने और लगातार एक वर्ष मंचित होने के बाद यह नाटक 1893 में गुटनबर्ग प्रेस, लंदन से छपकर सामने आया। जाहिर है, रंगमंच के लिहाज़ से नाटक अत्यंत कसा हुआ और सफल रहा। शिल्प की तुलना में इसका विषय आज ज्यादा चुनौतीपूर्ण लगता है। एक ऐसे नाटक को जो नैतिक पाठ को उपदेशात्मकता की हद तक बयान करता हो, कैसे पढ़ें; यह चुनौती है।

नैतिकता का उत्स क्या है? यह सवाल उठाया जाना ज़रूरी है। विक्टोरियन युग की सामाजिक नैतिकता का उत्स पितृसत्तात्मक वर्चस्ववादी दृष्टि है। उसे केन्द्र में रखकर ही नैतिकता के नियम बनाये जा रहे हैं। उसका एक पक्ष अमिश्रित शुद्धतावाद का भी है जिसमें काला, काला दिखता है और सफ़ेद, सफ़ेद! इसमें मिलावट नहीं हो सकती। इसमें सही-गलत, न्याय-अन्याय के पक्ष तय हैं, उसकी सजा भी तय है। लेडी विन्डरमेयर का चरित्र एक सामान्य कुलीन विक्टोरियन युग की स्त्री की छवि बनकर रह जाता, अगर जैसा कि वह बार-बार दावा करती है कि शुद्धतावादी है और समाज में स्त्री या पुरुष के ‘ग़लत’ व्यवहार को नापसंद करती है। लेडी विन्डरमेयर की दृष्टि में किसी भी क़िस्म का विचलन ग्राह्य नहीं है। कोई दुर्बलता स्वीकार्य नहीं है! इस नाटक में ऑस्कर वाइल्ड ने भद्र समाज की झूठी नैतिकता का खूब मज़ाक बनाया है। लॉर्ड डार्लिंग्टन जिस तरह से समाज में अच्छे और बुरे मनुष्य की परिभाषा करता है और स्वयं के लिए खराब मनुष्य कहलाना पसंद करता है, वह लंदन के भद्रलोक की मानसिकता पर गंभीर टिप्पणी है। लेडी विंडरमेयर के सामने चयन का संकट है। उसे जिस तरह से पाला-पोषा गया है, वह विक्टोरिया युग की नैतिकता का आदर्श नमूना है, इस पर लेडी को गर्व भी है लेकिन वह लॉर्ड डार्लिंग्टन को इसलिए पसंद करती है कि वह अन्य पुरुषों से भिन्न है। उनकी तरह ‘शरीफ इन्सान’ के रूप में नहीं जाना जाता। विक्टोरिया युग की नैतिकता स्त्री के लिए प्रावधान करती है कि अगर उसका पति किसी और स्त्री के प्रति आकर्षित है, तो वह उसका किसी प्रकार तिरस्कार न करे बल्कि स्वीकार और समझौते के रूप में वह तथाकथित कुछ आजमाए टोटकों का प्रयोग करे। जैसे बीमार पड़ जाये और पति को कुछ समय के लिए उस शहर से बाहर ले जाये, उसके प्रति सहानुभूति रखे क्योंकि ऐसे हर सम्बंध से पति बेचारे कुछ-न-कुछ टूटते-फूटते हैं! डचेज़ ऑफ बेरविक, विक्टोरिया युग में कुलीन स्त्रियों के लिए मान्य नैतिकता और अपनी गृहस्थी बचा ले जाने की कुटिल चालाकियों का आदर्श उदाहरण है। वह स्त्री और पुरुष के लिए नैतिकता के अलग पैमानों की मुखर प्रवक्ता है। वह कहती है कि पुरुषों के बारे में स्कैण्डल महत्वपूर्ण नहीं होते।

और कुलीन भली महिलाओं को अपने पतियों की हरकतों की जानकारी रखना ज़रूरी होता है क्योंकि वे ऐसा न करें, तो पति उनका अस्तित्व ही भूल जाएँ! ऐसा करना उनका क़ानूनी अधिकार भी है। नाटक में ऑस्कर वाइल्ड बहुत प्रच्छन्न तरीके से स्त्री-पुरुष के बारे में इस तरह की अलग-अलग मान्यताओं का मज़ाक उड़ाते नज़र आते हैं। शुद्धतावादी लेडी विन्डरमेयर, अपने पति का सम्बंध किसी अन्य स्त्री से जानकर घर छोड़कर लॉर्ड डार्लिंग्टन के प्रेम को स्वीकार करने निकल पड़ती है, लेकिन इस प्रेम को लेकर वह बहुत उत्साहित नहीं है, क्योंकि वह यह जानती है कि लॉर्ड डार्लिंग्टन के लिए स्त्री-पुरुष सम्बंध का केवल एक ही मतलब है, स्त्री और पुरुष का दैहिक सम्बंध! वह सर्वोच्च जो उसे दे सकता है, वह है विवाह और समाज में स्वीकृति! लेडी विन्डरमेयर पर उस समय यह ज़ाहिर नहीं होता कि वह स्त्री जिससे उसके पति के सम्बंधों की चर्चा है, दरअसल उसकी अपनी माँ है जो बचपन में उसे और अपने पति को छोड़कर प्रेमी के साथ भाग गयी थी। उसका प्रेमी बहुत जल्दी ही उसे छोड़कर चला गया और समाज की उपेक्षा-आलोचना की शिकार वह स्त्री हुई जिसने पति और प्रेमी में से प्रेमी को चुना था। भद्र समाज में वापस लौटने की उसकी सारी कोशिशें बेकार हुईं और वह लॉर्ड विंडरमेयर के माध्यम से पुनः एक बार वही प्रयास कर रही है। श्रीमती एर्लिन का चरित्र ऐसी स्त्री का है जो भद्र समाज की नैतिकता और पितृसत्तामक सोच की धज्जियाँ उड़ाता है। अपनी उम्र के बावजूद उसमें सलीक़ा है, सुंदर है और कुलीन स्त्रियों के लिए वह ईर्ष्या का केन्द्र है और पुरुषों के लिए आकर्षण का! लेकिन पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से प्यार करने पर उस पुरुष का और समाज का उसके साथ जो व्यवहार है, वह स्त्री और पुरुष के लिए दोहरे मानदंड का नमूना है। उसके प्रेमी पुरुष का पता नहीं, क्योंकि वह श्रीमती एर्लिन को छोड़कर भाग गया है। लेकिन श्रीमती एर्लिन के लिए समाज में अब कोई जगह नहीं है। वह पथभ्रष्ट और बिगड़ी हुई स्त्री है जो समाज में अन्य कुलीन स्त्रियों के लिए ख़राब उदाहरण है। नाटक में महत्वपूर्ण है यह देखना कि कैसे एक शुद्धतावादी, भद्र, कुलीन स्त्री लेडी विन्डरमेयर का नज़रिया श्रीमती एर्लिन के सम्बंध में बदलता है। नाटक के आख़िरी दृश्य में वह लॉर्ड आगस्टस को जो श्रीमती एर्लिन के साथ जीने का इच्छुक है, उससे विवाह करना चाहता है, कहती है कि तुम एक बहुत ही भली महिला से विवाह करने जा रहे हो। जबकि उस पर ज़ाहिर नहीं है कि वह स्त्री उसकी माँ है! यहाँ वह श्रीमती एर्लिन का मूल्यांकन किसी सम्बंध से नहीं बल्कि मानवीय गुणों के आधार पर करती है। यही इस नाटक की विशेषता है जो कुलीन भद्र कहे जानेवाले समाज में; तमाम सम्बंधों के बीच अटकी हुई नैतिकता के लेप को हल्का करके मनुष्य होने का अधिकार स्त्री को देना चाहता है। उन सारी परिस्थितियों पर नाटक में तीक्ष्ण व्यंग्य है जो स्त्री को अनेक तरह की नैतिक जटिलताओं में जकड़ देते हैं और उसकी सामान्य मानवीय स्वतंत्रता और पहचान को नष्ट कर देते हैं। स्त्री का स्त्री के प्रति मानवीय नज़रिये का विकास भी उतना ही ज़रूरी और अपेक्षित है अन्यथा स्त्री अपने अलावा अन्य स्त्रियों का मूल्यांकन उन्हीं पितृसत्ताक मर्यादाओं के आधार पर करेगी जो समाज में स्त्री के लिए मान्य हैं।

एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-110007

ईमेल-

singhsudha.singh66@gmail.com

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मर्म मीमांसा

केरल में स्त्रियों की स्थिति

(सन्दर्भ- ‘अग्निसाक्षी’ उपन्यास)

आकांक्षा

1977 ई. में ललिताम्बिका अन्तरजन्म द्वारा रचित उपन्यास ‘अग्निसाक्षी’ केरलीय समाज के लोगों के मनोभावों और इस समाज में स्त्रियों की वास्ताविक स्थिति को बयां करनेवाली एक उत्तम कृति है। पंद्रह हजार वर्ग मील में फैला केरल राज्य भारत के पश्चिम-दक्षिण कोने में स्थित है। ऊँची पर्वत-श्रेणियाँ, हरेभरे जंगल, नदियाँ, नारियल, सुपारी, कटहल और आम के वृक्ष इस राज्य को सुशोभित करते हैं। अत्यंत उपजाऊ भूमि और रमणीय वातावरण के कारण प्रसिद्ध यह राज्य हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है।

पौराणिक दंत-कथाओं के अनुसार यहाँ का शासक महाबलि था और राजधानी ‘तृक्कक्करा’ (वर्तमान में एरणाकुलम) थी। यह मान्यता है कि यहाँ की प्रजा सब प्रकार से सुखी, सम्पन्न एवं सुशिक्षित थी। आदिकाल में नम्पूतिरी ब्राह्मण ही केरल में शासन करते थे क्योंकि ये राज-काज चलाने में अत्यंत निपुण माने जाते थे। केरल में नम्पूतिरी ब्राह्मणों के कुल 64 गाँव थे। ये गाँव भी चार भागों में विभाजित थे जिन्हें ‘तलि’ के नाम से जाना जाता था। इनमें से कोई एक सुयोग्य व्यक्ति चुना जाता था जो बारह वर्षों तक राज-काज चलाता था। इनके पद को ‘रक्षा-पुरुष’ के नाम से जाना जाता था। ‘रक्षा-पुरुष’ की सहायता के लिए चार प्रादेशिक अधिपति मनोनीत किये जाते थे जो कि ‘तलियातिरी’ नाम से जाने जाते थे। ‘तलियातिरी’ ही तलि के प्रतिनिधि होते थे।

आपसी झगड़ों की वजह से इन नम्पूतिरियों का शासन तंत्र कमजोर पड़ गया। नम्पूतिरियों ने राज-काज चलाने के लिए किसी सुयोग्य क्षत्रिय को चुनने का निश्चय किया और चोल, पाण्ड्य, चेर, आदि पड़ोसी राज्यों के राजाओं को बारी-बारी से आमंत्रित किया। यह गद्दी ‘पेरुमाल’ के नाम से जाना जाने लगा। केरल में 113 ई. पू.- 427 ई. पू. तक ‘पेरुमाल शासन काल’ जारी रहा। यह मान्यता है कि केरल में जब बुद्ध मत का प्रचार हुआ, तब हिन्दू धर्म की रक्षा के उद्देश्य से ‘कुशलशेखर’ नामक पेरुमाल राजा ने एक शिव मन्दिर का निर्माण कराया था जिसे आज के कोचिन राजवंश के लोग अपने कुल के आराध्य देव मानते हैं। स्पष्ट हो जाता है कि इस समय भी केरल में धर्म/समुदाय के नाम पर भेदभाव हो रहा था। पर, कहा यह जाता है कि इन ‘पेरुमाल’ शासकों ने ईसाइयों, मुस्लिम, यहुदी आदि सभी धर्माबलम्बियों के साथ हमेशा उदारता और मैत्री का व्यवहार किया था। इनका शासन काल केरल का ‘स्वर्णयुग’ माना जाता है। ‘पेरुमाल शासन काल’ के अन्तिम पेरुमाल भास्कर रवि वर्मा थे। इनके बाद केरल में सामंत राजाओं की प्रधानता हो गयी जिसमें से एरनाट, वल्लुवनाट, ओणाट, समोतिरी, पेरुम्पटप्पु, कटत्तनाटु, वेणाटु, चम्पक्श्शेरी, तेटक्कुंकूर, वटक्कुंकूर, पम्तलम आदि प्रमुख हैं। इस समय केरल की स्त्रियाँ भी लड़ाई के क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर बहादुरी और साहस के साथ युद्ध कौशल दिखाती थीं और वीर गति पाना गौरव की बात मानती थीं। सामंत राजाओं की तरह रानियाँ भी सेना संचालन और शत्रु से डटकर युद्ध करना अपना कर्त्तव्य समझती थीं। यह युग ‘युद्ध कला’ और ‘वीर पूजा’ का युग कहलाता था।

भारत के अन्य प्रांतों तथा यूरोप, अरब आदि देशों से जो लोग केरल में आकर बसे, उन्हें हमारे इतिहासकारों ने ‘अभ्यागत लोग’ नाम दिया और इन्हीं अभ्यागत लोगों में ‘नम्पूतिरी’ और ‘नायर’ जाति के लोग आते हैं और ये सबसे प्राचीन माने जाते हैं पर, इन दोनों में भी काफी भिन्नता है। ‘नम्पूतिरी’ शुद्ध आर्य रक्त के ब्राह्मण(श्रेष्ठ) तथा ‘नायर’ आर्य और द्रविड़ के मिश्रित रक्त के ‘शुद्र’ (तुच्छ) समझे जाते हैं। इतिहास में जाने पर यह स्पष्ट होता है कि पहले इन दोनों जातियों को यहाँ प्रतिष्ठा प्राप्त थी। यहाँ के आदिम निवासी ‘पुलयर’ एवं ‘चेरुमल’ इत्यादि किसान और गुलामों की तरह रहते थे। श्रेष्ठ या ब्राह्मण होने की वजह से ऐतिहासिक युग के आरम्भ में केरल की सारी भूमि पर यहाँ के नम्पूतिरियों का ही अधिकार था और श्रमिकों का कार्य ‘पुलयर’ एवं ‘चेरुमल’ नामक जाति के लोग करते थे। इन कार्यों की देख-रेख करने काम नायरों का था। उन दिनों जमीन के मालिक (नम्पूतिरियों) को ‘जन्मी’ अर्थात जमींदार कहा जाता था और इनके अधीन किसानों को ‘कुटिया’ (असामी) कहा जाता था।

नम्पूतिरी और नायर लोगों के अलावा केरल में ‘चन्नार’ या ‘तीय्यर’ नामक जाति के लोग रहते थे। इनका जातीय पेशा नारियल के पेड़ों की खेती करना और नारियल से ताड़ी निकालना था। इनके अलावा ‘अय्यर’ और ‘वालर’ नामक जाति के लोग भी रहते थे। ये मुख्यतः समुद्र किनारे रहते थे और मछली पकड़ना एवं मछली का व्यवसाय करना इनका जातीय पेशा था। वर्तमान में भी कई ईसाई खानदान के लोग यहाँ अपने आपको नम्पूतिरियों के वंशज बताते हैं। यहाँ कई मुसलमान परिवार भी निवास करते हैं। यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में केरल में नम्पूतिरी, नायर, तीय्यर, अय्यर, जैसे हिन्दुओं के साथ- साथ ईसाई और मुसलमान भी निवास कर रहे हैं।

केरल की सामाजिक स्थिति की बात की जाये, तो यह तो स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि यहाँ धर्म और जाति को लेकर काफी भेदभाव थे पर, इसे हमारे इतिहासकारों ने गौण कर दिया। यहाँ जाति के आधार पर काम भी बँटे हुए थे। जैसे, नम्पूतिरी ब्राह्मण जमींदार, नायर कामों की देखरेख करने वाला, पुलयर और चेरुमल श्रमिक का कार्य करते थे। चान्नार एवं अय्यर जाति के लोग भी अपने जातीय व्यवसाय करते थे। इतना ही नहीं यदि हम नम्पुतिरी जाति को भी देखें तो इनमें भी कई वर्ग होते हैं। कुछ ख़ास खानदावालों को ही ‘आयुधमेटुक्कल’ (शास्त्र ग्रहण) की शिक्षा ही दी जाती थी बाकी के लोगों को सिर्फ ‘सन्धानुष्ठान’ की शिक्षा ही जाती थी। उसी प्रकार, नायर जाति में भी है। अभी भी केरल में नायर के कुछ ख़ास खानदानों का ज़िक्र मिलता है। जैसे- कर्त्ता, मेनोन, पणिक्कर, नम्पियार आदि।

अतः, यहाँ के समाज में जातीय आधार पर भिन्नता तो है ही। यहाँ स्त्रियों की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इस समाज में उन्हीं स्त्रियों को थोड़ा-बहुत स्थान मिला है जो कि उच्च वर्ग की थीं। ये स्त्रियाँ अधिकांशतः, सामंत, राजाओं इत्यादि की स्त्रियाँ हुआ करती थीं। अन्य स्त्रियों (निम्न वर्ग की नम्पूतिरी स्त्री) को ‘असूर्यस्पर्शा’ कहा जाता है। ये पर्दा प्रथा की शिकार थीं। अन्य निम्न जाति की स्त्रियों को तो इतना भी अधिकार नहीं प्राप्त था कि वे अपने शिरीर ढँकने के लिए पूरी तरह से वस्त्र भी पहने, इन्हें ब्लाउज पहनने का अधिकार नहीं था। 1829 ई. में जब तिरुअन्तपुरम में चान्नार समाज के लोगों ने इसके लिए आन्दोलन (चान्नार आन्दोलन) चलाया, तब जाकर चान्नार स्त्रियों को ब्लाउज पहनने का अधिकार प्राप्त हुआ। ये भी वही चान्नार स्त्रियां थीं जो ईसाई धर्म अपनायी थीं। अन्य हिन्दू चान्नार स्त्रियों को यह अधिकार 1859 ई. में मिल पाया। अतः, कहा जा सकता है कि केरल में जाति एवं धर्म दोनों के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव किया जाता था। कहने के लिए तो आज भी यहाँ का समाज मातृवंशात्मक है पर, यहाँ की स्त्रियों की स्थिति भी उसी प्रकार है जैसा कि अन्य पितृवंशीय समाज में होता है। केरलीय समाज में जाति प्रथा, सामंती प्रथा, सवर्ण-अवर्ण में भेदभाव तथा स्त्रियों की स्थिति काफी सोचनीय थी। जहाँ तक स्त्रियों की शिक्षा का सवाल है, तो यहाँ भी कुछ ही ऐसी स्त्रियाँ, वह भी उच्च वर्ग की थीं जो कि शिक्षित थीं और साहित्यिक लेखन कर रही थीं। जैसे, ‘पूनम नम्पूतिरी’ जिन्होंने कि ‘रामायण चम्पू’ नामक काव्य की रचना की।

इन सारे भेदभावों को ध्यान में रखते हुए 1856 ई. में श्रीनारायणगुरुने आह्वान किया। इसमें निम्न जातियों को सार्वजनिक सड़कों पर चलने का अधिकार, मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार, स्कूल जाने का अधिकार मिल पाया। 1908 ई. में योगच्छेमसभा के उपरांत स्त्रियाँ भी ‘असूर्यस्पर्शा’ से ‘सूर्यस्पर्शा’ बनीं। 1931 ई. में ‘अन्दरजनसमाजम’ में महिलाएँ भी आगे आयीं। 1932 ई. में ‘नम्पूतिरी युवजनसमाजम’ की स्थापना हुई। इसी समय बी. टी. भट्टादरीपाल नामक एक व्यक्ति ने उमा देवी अन्तरजनम (विधवा) से विवाह किया। केरलीय समाज में यह पहला विधवा विवाह था।

इन सारी बातों से यह स्पष्ट हो जाता है कि 1932 ई. तक आते-आते केरलीय समाज में विधवा विवाह का भी प्रचलन हो गया था। स्त्रियाँ घर पर ही सही पर शिक्षित हो रही थीं। 1977 ई. में ललिताम्बिका अन्तरजनम नामक महिला ने केरल की तात्कालिक सामाजिक स्थिति से सभी को परिचित कराने की कोशिश की और ‘अग्नीसाक्षी’ नामक उपन्यास की रचना की। इस उपन्यास में 18 अध्याय हैं जिसमें से 15 अध्याय तेतिकुट्टी नामक स्त्री पात्र से सम्बंधित हैं। उपन्यास में लेखिका सारी बात तंकम नायर नामक एक स्त्री पात्र के माध्यम से बताती है। यह पात्र नायर जाति की है जिसे केरलीय समाज में निम्न जाति माना जाता है।

लेखिका का जन्म 30 मार्च, 1909 ई. में दक्षिणी केरल के जिला कोल्लम में हुआ। इनकी पढ़ाई घर पर ही हुई। कुछ-कुछ शिक्षा तो इन्होंने अपनी माँ से लीं, इसके अलावे इन्हें पढ़ाने के लिए घर पर ही एक गुरुभी आते थे। 1923 ई. में ‘शारदा’ पत्रिका में इनकी पहली रचना ‘अभिनवपार्थसारथी’ जो महात्मा गांधी से सम्बंधित थी, प्रकाशित हुई। बाद में इन्होंने घर के अन्दर रहने वाली स्त्रियों से सम्बंधित 12 कहानियों का संग्रह भी निकाला। 1927 ई. में नारायणन नम्पूतिरी नामक व्यक्ति से इनका विवाह हुआ।

उपन्यास ‘अग्नीसाक्षी’ में तंकम की माँ नेत्यारअम्मा नायर जाति की थीं और पिता नंपूतिरी ब्राह्मण थे। केरलीय समाज में नम्पूतिरी ब्राह्मण नायर स्त्रियों के साथ विवाह तथा सम्बंध बना सकते थे, पर विवाहित नायर स्त्री को भी वे अपने मूल घर में नहीं रख सकते थे क्योंकि उनकी जाति तुच्छ और वे शूद्रा मानी जाती थीं। कितनी अज़ीब बात है कि किसी भी समाज में ख़ास तौर से अंतर्जातीय विवाह के मामले में किसी-न-किसी रूप में सज़ा की हकदार स्त्रियाँ ही होती हैं जबकि, विवाह स्त्री-पुरुष दोनों का होता है। मातृवंशीय परंपरा होने के बावजूद भी यहाँ स्त्रियों का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। इन्हीं सारी बातों को लेकर ही परेशान रहती हैं उपन्यास की नायर स्त्री पात्र ‘तंकम’। ‘तंकम’ को यह बात बार-बार सोचने को मज़बूर करती है कि यह कौन-सी सामाजिक प्रथा है जिसके अनुसार ‘नेत्यारअम्मा’ अपने पति नम्पूतिरी चाचा के साथ उनके मूल घर में नहीं रहकर ‘कचहरी बंगला’(घर के बाहर का बंगला) में रहती थीं।

एक घटना जिसमें तंकम नायर को अपने ही सौतेले भाई की शादी के दौरान उसके मूल घर से उसे शुद्रा कहकर निकाल दिया गया। तंकम उस समय चौदह वर्ष की थी और समाज की रुढ़िवादिता की गहरी समझ नहीं रखती थी। उसी उम्र से तंकम स्त्रियों की स्थिति पर सोचना शुरू कर देती है। उसे लगता है कि वह तो मानवपल्ली घराने (नम्पूतिरी चाचा के मूल घर) में सिर्फ़ भाई उण्णिदादा की शादी की रीतिरिवाज़ों को देखने के उद्देश्य से वहाँ गई थी, पर वहाँ के लोगों ने उसे शूद्रा कहकर वहाँ से हटा क्यों दिया? उसे बार-बार लगता है कि उणिणदादा ने तो मुझसे कहा था कि ‘वह उसके लिए भाभी लाकर देंगे’। फिर, ऐसी कौन-सी बात है या फिर उसमें क्या कमी है कि उसे इस प्रकार हटा दिया गया जबकि, उसके पिता भी इसी घर के हैं। बचपन से ही उसके मन में एक बात और भी खटकती रहती थी कि उसकी माँ उसे हमेशा मना करती थी कि ‘बार-बार अपने पिता को मत छुआ कर उन्हें नहाना पड़ेगा।’ मतलब यह कि वह शूद्रा है और उसके छूने से पिता अशुद्ध हो जाएंगे। केरलीय समाज में जब शूद्रा स्त्री के छूने से व्यक्ति अशुद्ध हो सकता है, तो फिर यह कैसा प्रचलन है कि नम्पूतिरी ब्राह्मण किसी भी नायर (शूद्र) स्त्री से सम्बंध बना सकता है। क्या, उस समय इस समाज के संरक्षक इस परंपरा को भूल जाते हैं या नजरअंदाज़ कर देते हैं? क्योंकि, इससे उनकी (उच्च जाति की) स्वतंत्रता बाधित हो जाने ख़तरा है। क्या उस समय इनकी जाति भ्रष्ट नहीं होती है? हमारे भारतीय समाज में उच्च जाति के पुरुषों के लिए हर ऐसी चीज़ माफ़ है जो समाज की स्त्रियों के लिए ‘पाप’ माना जाता है। ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा शिकार होती है ‘स्त्री जाति’ क्योंकि, इन्हें हमारे भारतीय समाज में ‘वीकर सेक्स’ के रूप में देखा जाता है। इस उपन्यास में भी केरलीय समाज के संदर्भ में इन्हीं सारी बातों को दर्शाया गया है।

तंकम की माँ तो अपनी बेटी को आधुनिक शिक्षा देने के पक्ष में थीं पर, पिता इस पक्ष में नहीं थे। अपनी पत्नी से लगाव की वजह से उन्होंने तंकम के लिए घर पर शिक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था कर दी।

उपन्यास में एक और स्त्री पात्र है-तेतिकुट्टी, जो रिश्ते में तंकम की भाभी लगती है और ‘मानवपल्ली’ घराने में रहती है। विवाह के बाद इनका नाम बदलकर ‘देवकी मानवपल्ली’ कर दिया जाता है। ऐसे तो तेतिकुट्टी के भाई काफी प्रगतिशील सोच वाले शिक्षित व्यक्ति थे पर, ससुरालवाले काफी रूढ़िवादी थे। यहाँ के वातावरण में तेतिकुट्टी को घुटन सी महसूस होती थी। कुछ समय ससुराल में बिताने के बाद पत्र द्वारा तेतिकुट्टी ने अपने भाई को बताया कि ‘यहाँ मेरा मन घबराता है’ तो भाई ने जवाब दिया, ‘अभी चुप रहो, बर्दाश्त करो।’ कुछ समय बाद फिर से भाई को बताया कि ‘ये कुछ नहीं समझते, यह तो देवता हैं। क्या मेरी और इनकी पटेगी?’ पर, भाई ने फिर से वही सलाह दी। इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि इस समय की स्त्रियाँ काफी हद तक सजग थीं और अपनी स्थिति की समझ भी रखती थीं, पर समाज में पुरुषों के वर्चस्व की वजह से सब कुछ समझते हुए भी चुप रहना पड़ता था।

एक और स्त्री पात्र हैं-पगली चाची, जो कि ब्राह्मण समाज में व्याप्त अनीतियों की वजह से पागल घोषित कर दी गयी थीं। इनकी शादी अठारह वर्ष की उम्र में हुई, पर इनके पति ने पहले से एक और विवाह (विजातीय) माधवीवरस्यार नामक महिला से किया था। यह महिला काफी तेज़ और चालाक थी। उनके बच्चे पगली चाची से भी उम्र में बड़े थे। पगली चाची के पति इनके साथ किसी प्रकार का सम्बंध नहीं रखते थे। इस परिस्थिति ने पगली चाची को पागल बना दिया।

उण्णिदादा जो कि तंकम के भाई और तेतिकुट्टी के पति हैं, काफी शांत व्यक्ति हैं। इनमें निर्णय लेने की शक्ति नहीं है। यह कहा जा सकता है कि पुरुष होते हुए भी यह पूर्ण रूप से पितृसत्तात्मक मानसिकता के दबाव में हैं। इन्हें अपनी पत्नी तक के कमरे में जाने के लिए भी अपनी माँ (घर की मुखिया) की अनुमति लेनी पड़ती है। इस वजह से पत्नी तेतिकुट्टी काफी दुखी रहती थीं। एक बार की घटना है, तेतिकुट्टी की माँ बीमार हो जाती है और ससुरालवाले उसे अपनी माँ के पास जाने की अनुमति नहीं देते हैं, पर वह अपनी मर्ज़ी से ही चली जाती है। उसके ससुरालवाले उसे वापस ही नहीं लाते हैं। ‘कलंक’ कहकर उसे अपमानित करते हैं। तेतिकुट्टी भी इन सारी बातों को नजरअंदाज़ कर अपनी पढ़ाई-लिखाई जारी रखती है और समाज सुधारक बन जाती है। समाज सुधारक के रूप में इनका नाम ‘देवी बहन’ हो जाता है। बहुत दिनों बाद तेतिकुट्टी का देवर उसे ले जाने आता है, तो वह कहती है- ‘‘मैं आऊँगी लला, उनके लिए मैं बहुत दूर तक आऊँगी पर, इसके लिए उनको (उण्णिदादा को) भी कुछ आगे आना होगा।’’ इस बात से पता चलता है कि इस समय तक महिलाएँ अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए सजग हो चुकी थीं।

बाद में तेतिकुट्टी गाँधी जी के शरण में आ जाती है। 1942 ई. के भारत छोड़ो आन्दोलन में ये पूर्णतः, गाँधीजी के साथ रही। कुछ समय बाद ये सेवाग्राम महिला आश्रम में आ जाती हैं। यहाँ यह कल्याणी देवी नामक एक महिला से मिलीं और इन्होंने भी आन्दोलन में इनका साथ दिया। कल्याणी देवी ने पाकिस्तान से आयी एक शरणार्थी लड़की को भी शरण दिया और उसका भी नाम रखा तंकम। कुछ समय बाद शरणार्थी लड़की का किसी लड़के से सम्बंध बन जाता है और वह गर्भवती हो जाती है और अपनी बच्ची को जन्म लेते ही मार डालती है। इस घटना के बाद ‘देवी बहन’ सन्यासिनी बन जाती है और यहाँ इनका नाम ‘सुमित्रानंदा योगिनी’ हो जाता है।

इस उपन्यास के राजनीतिक तथा सामाजिक किसी भी परिदृश्य पर गौर किया जाये, तो स्पष्ट हो जाता है कि केरल में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। निम्न जाति की नम्पूतिरी स्त्री भी इन सारे अधिकारों से वंचित थीं। निम्न जाति की स्त्रियाँ तो उच्च जाति के पुरुषों की इच्छा पूर्ति की साधन से ज्यादा और कुछ नहीं थीं। निम्न जाति वर्ग की भी कुछ-कुछ स्त्रियाँ शिक्षित हो रही थीं। अपने अस्तित्व को भी समझ रही थीं पर, जाति और जेंडर आधारित भेदभाव के मामले में वे कुछ भी नहीं कर पा रही थीं। सब कुछ समझते हुए भी वे उसी प्रथा को स्वीकार कर रही थीं।

उच्च जाति की महिलाओं की भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। बहुत कम ऐसी स्त्रियाँ थीं जो सामाजिक मान्यता से अलग हटकर अपनी अलग पहचान बनाकर जीने की कोशिश कर रही थीं। जैसे, इस उपन्यास में ऐसी अपवाद स्त्री के रूप में तेतिकुट्टी को दिखाया गया है। इस बात पर भी गौर किया जा सकता है कि शरणार्थी लड़की तंकम अपनी नवजात पुत्री की हत्या कर देती है। सवाल यह उठता है कि यदि वह बच्चा लड़की न होकर लड़का होता तो क्या वह या उसके पति उसकी हत्या करते? यदि वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को भी देखा जाये, तो यही सवाल उठता है कि क्यों हमारा समाज स्त्रियों के अस्तित्व को ही ख़त्म करना चाहता है? इस उपन्यास में भी यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि स्त्री की अपनी कोई पहचान नहीं होती। यह कहा भी जाता है कि स्त्री पिता के घर पिता तथा पति के घर में पति के नाम से जानी जाती है और यही हुआ है इस उपन्यास में तेतिकुट्टी के साथ। यह महिला भी जहाँ गयी, इसका नाम परिवर्तित होता गया। अतः, इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रहा।

शोधार्थी, स्त्री अध्ययन, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

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मर्म मीमांसा

संशय और सच के दावों के बीच

तरुण भटनागर

हाल में माओवादी हिंसा पर ख़ासकर उसके स्वरूप में आये बदलाव पर काफी चर्चाएँ हुईं। आज के फ्रैगमेण्टेट रूप में दिखाये जाने वाले सत्य और एकदम से हिंसा के नकार के भावुक आग्रहों और माओ के चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में इन घटनाओं के मूल्यांकन तथा ऐतिहासिक सन्दर्भों को टटोलते हुए शुभ्रांशु चौधरी का अनुसंधानात्मक उपन्यास ‘लैट अस कॉल हिम वासु’ देखने की दरकार महसूस होती रही। इसे 'least partisan account of Maoist in recent times' के रूप में पेंगुइन ने प्रस्तुत किया है। शायद यह इशारा करते हुए कि दण्डकारण्य में जो घटित हुआ या हो रहा है, उस पर राजनैतिक झुकाव के साथ लेखन की भरमार रही है, जो काफी हद तक सत्य भी है। वाम और दक्षिण के अत्यन्त विरोधी दावों के बीच उलझे इस मुद्दे के सत्य को निष्पक्षता की दरकार रही है, यद्यपि संशय और अविश्वास से लबरेज आधुनिकता में शायद ही इस विषय पर लिखी किसी रचना को निष्पक्षता जैसे मूल्य के दायरे में रखने का कोई दावा किया जा सकता है। इसे ढं१३्र२ंल्ल बताने का दावा करना भी किसी संदेह से मुक्त नहीं। यथार्थ से किसी लेखन के विलगाव को देखने के अपने मापदण्ड होते हैं, उसे पहले ही तय करना प्रश्न तो खड़ा करता ही है। इसमें इसके ढं१३्र२ंल्ल होने को इस तरह देखा जा सकता है कि यह दोनों तरफ की कुछ बेहद आधारभूत प्रस्थापनाओं को, ऐसी प्रस्थापनाओं को जिन्हें राजनैतिक घेराबंदी से अलग नहीं किया जा सकता है, प्रश्नांकित करती है या उनसे इतर एक नया आयाम लिखती है और यह भी कि कथानक और गल्प के विस्तार की बजाय यह वास्तविक लोगों की सत्य कहानियों और दृश्यों को बताती चलती है, जिसके प्रमाणिक होने या प्रमाणिकता के साक्ष्य का भी लेखक ने खुलासा किया है। पर साथ ही एक सन्तुलन भी है, एक सतर्क सन्तुलन जो उन आवश्यक तत्त्वों के साथ जिससे यह रचना एक उपन्यास जैसी शक्ल अख़्तियार कर लेती है। एक रुचिपूर्ण आख्यान होकर बार-बार बेचैन करने वाले सत्य के साथ और उसके प्रतिपक्ष को बेनकाब करते हुए भी।

दो सौ सत्तर पेजों का यह उपन्यास काफी तरल और आसान अंग्रेज़ी में लिखा गया है, कुछ उस तरह की अंग्रेज़ी, जैसी परम्परागत भारतीय-अंग्रेज़ी लेखन में बहुलता से है। तथ्यों और अनुसंधानों को ग्यारह भागों में संयोजित कर एक ऐसी रचना गढ़ी गयी है, जो न सिर्फ़ पढ़ने में रुचिकर है, बल्कि दण्डकारण्य में माओवाद की अन्दरुनी परतों और समस्याओं को कई स्तरों पर उद्घाटित करती है, चौंकाती है, यह सोचने को मजबूर भी कि यह कैसा भयावह समय और सत्य है। लेखक ने अपनी तरफ़ से बहुत कम लिखने का दावा किया है, ज्यादातर या तो माओवादियों के रहन-सहन, उनसे हुई चर्चाएँ, उनके बीच लेखक के गुज़रे दिनों की यादें, वहाँ के दृश्य ही हैं। लगभग सात वर्षों तक माओवादियों के बीच रहकर

दण्डकारण्य के सत्य को न सिर्फ़ तलाशने की कोशिश की गयी है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति और स्थान के नामों के साथ यथासम्भव यथार्थ को जैसे का तैसा रखने की कोशिश भी। यद्यपि जो मुख्य पात्र है, एक माओवादी जिससे लेखक की ख़ासी दोस्ती हो जाती है, वह उसका असली नाम न लिखकर उसे ‘वासु’ कहता है, जो कि एक छद्म नाम है। शायद उससे उसकी हुई मित्रता के कारण ताकि उसकी पहचान गुप्त बनी रहे। यह व्यक्ति उसे रायपुर में मिला था, वहाँ वह उसे अक्सर मार्क्स की किताबें पढ़कर सुनाता था और बाद में बड़ी कोशिशों के बाद वह उसे बस्तर के जंगलों में मिलता है और उसे वह पूरी दुनिया दिखाता है। उपन्यास में कोई पात्र काल्पनिक नहीं है, सिर्फ़ ‘वासु’ के नाम के अलावा बाक़ी सब वे लोग हैं जिनमें से कुछ के नाम लोगों ने सुने हैं- कमाडेण्ट कोसा, रमन्ना, विनायक सेन, शंकर गुहा नियोगी और उनके बेटे-बेटियाँ, महेन्द्र कर्मा, कोटेश्वर राव... आदि। यद्यपि ज्यादातर पात्र माओवादी या राजनेता ही हैं, शायद इसलिए भी कि यह पूरा मामला यहीं कहीं बनता और घटित होता है। वे आदिवासी भी हैं, जो माओवादी बने, उनकी कहानियाँ, उनका जीवन और त्रासदी।

हमारे यहाँ अनुसंधनात्मक उपन्यासों की कमी का कारण बहुलतावादी आर्म्ड चेयर राइटिंग की परम्परा को माना जा सकता है। इसका स्वरूप बहुत कुछ ऐसा ही है। यूँ सृजनात्मक लेखन के लिए अनुसंधान आवश्यक तत्त्व नहीं है, परन्तु समाज और समय के सत्य के साथ तादम्य और उसका उद्घाटन शायद इसलिए भी ज़रूरी है कि वह लिखे की प्रामाणिकता को बनाने के साथ ही लोगों के जीवन और उनकी त्रासदियों की सम-सामयिकता का लेखन बनता है। सत्य के अन्वेषण की एक कीमत भी है- समय और जीवन दोनों स्तरों पर- ख़ासकर ऐसे समय में जब हम अपने इतिहास के कुछ बेहद भयावह और त्रासद पलों को घटता हुआ देख रहे हैं।

भारत में जहाँ समसामयिकता और इतिहास दोनों से समाज का एक तरह का विलगाव या यूँ कहें उसकी प्रतिक्रियात्मक चेतना कमतर हो, वहाँ इस तरह के लेखन की अपनी उपस्थिति तो बनती ही है। कोई भी लेखन अपने समय के लोप के अपराधों से मुक्त नहीं होता है, ख़ासकर हिन्दी में तो और भी जहाँ आर्म्ड चेयर राइटिंग बहुलता से है और ऐसे में ही अनुसंधानात्मक लेखनों को रेखांकित करने और उनकी ज़रूरत की दरकार होती है। परन्तु गम्भीर साहित्य के आवश्यक तत्त्वों को समाहित करने की अनिवार्यता के कारण वह कोई तथ्यात्मक आलेख होने की बजाय कथा कहने और भाषा प्रयोग के बेहद बुनियादी बिन्दुओं पर ही लिखा जा सकता है। ‘लेट अस कॉल हिम वासु’ इस तरह से कोई साहित्यिक कार्य तो नहीं है, पर इसकी कहानी जिस तरह से लेखक ने लिखी है और जिस तरह भाषा का प्रयोग किया है, वह इसे पठनीय तो बनाता ही है और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता की लेखकीय ज़रूरत को भी जो दण्डकारण्य और माओवाद के बहुस्तरीय सत्य की समझ को विकसित करने के लिए आवश्यक है। इस तरह कुछ सुस्पष्ट चीज़ें तो हैं ही जो किताब को समझने और जानने की गुंज़ाइश को गढ़ती हैं।

मुझे लगता है, उपन्यास की पूरी कथा पर बात करने के बजाय उन बिन्दुओं को देखा जाना ज्यादा लाज़मी है, जो दण्डकारण्य में माओवाद को लेकर हमारी अवधारणाओं की कुछ नयी प्रस्थापनाओं को सामने रखते हैं। प्रस्थापनाएँ जो घटित होने के रूप में हैं, जो लोग करते हैं, देखते हैं, उनकी कहानियों के रूप में, जो वे बताते हैं, उनका रहन-सहन, उनका दुःख उनकी घटित होती त्रासदी आदि-आदि, जिनसे उन बातों को कई स्तरों पर जानने-समझने का मौका मिलता है। अध्याय ह्यअ३ ३ँी ीस्र्रूील्ल३१ीह्ण लम्बे समय तक क्षेत्र में माओवादी मुखिया कमाण्डेण्ट कोसा के यहाँ बतायी गयी विवरणात्मक कथाओं, दृश्यों और तथ्यों का संकलन है। यहाँ कोसा की पूरी कहानी है, पर जो बात चौंकाती है, वह है, वे लोग जो उसके साथ हैं और बताते हैं कि क्यों वे माओवादी बने और यह भी कि क्या वे वापस लौट सकते हैं? एक महिला निर्मला बताती है कि एक लड़की इसलिए नक्सल बनी, क्योंकि उसके माता-पिता उसकी शादी कहीं और कर देना चाहते थे और राधा नामक एक माओवादी इसलिए वापस नहीं लौटना चाहती, क्योंकि अब उसकी उम्र भगवान के घर जाने की हो गयी है, सो लौटना बेमानी है, तो एक पुलिस के भय के कारण लौटने से इन्कार करती है। एक लड़की इसलिए शामिल हुई कि सलवा जुडुम ने उसके घर को जला दिया था, तो एक लड़का यह कहता है कि पढ़ाई-लिखाई उनकी अपनी गोंडी भाषा में नहीं होती है, हिन्दूकरण हो रहा है, तो बेहतर है वह माओवादियों के साथ हो ले...। ऐसी कई कहानियाँ हैं, जो कहीं-न-कहीं शोषण और अन्याय, ख़ासकर पुलिस और तंत्र की यातनाओं से पीड़ित होकर नक्सल बनने की परम्परागत सोच पर फिर से ग़ौर करने की दरकार करती है। इन दर्ज़नों कहानियों में कहीं भी विस्थापन और खनिज साधनों की लूट की प्रतिक्रिया से उनके जुड़ने के किस्से नहीं हैं, जैसा कि बस्तर जैसे क्षेत्र के सन्दर्भ में बताया और समझा जाता है।

एक अध्याय ‘द पीस मार्च’ काफी विस्तार और विवरणों के साथ लिखा गया है। यह सलवा जुडुम के अनाचारों, हत्याओं और अन्याय का विस्तृत आलेख है, जिसमें गाँवों के नाम, वहाँ के पीड़ित हुए लोगों की दर्ज़नों कहानियाँ, हत्याओं और घरों को जलाये जाने के विवरण दर्ज़ हैं। एक भयावह त्रासदी जिस पर हमारा मीडिया, लेखक समाज और जनमानस बरसों तक चुप्पी लगाये रहा। लेखक ने बड़ी मेहनत, संज़ीदगी और साहस के साथ वे कहानियाँ ढूँढ़ी हैं जो लगभग अज्ञात रह आयीं। यह माओवादियों की अपनी त्रासदी का आलेख भी है, जो वासु जैसे चरित्र के माध्यम से सामने आता है। वासु जो बरसों से रायपुर में रह रहे अपने बेटे से नहीं मिला, वह नहीं मिल सकता और लेखक को विदाई देते समय

कहता है- ‘उसे अपनी बाहों में भरना’, बताता है कि चे गुवेरा क्यों यह कहता था कि एक क्रान्तिकारी को सच्चा प्रेमी भी होना चाहिए। माओवादियों के संगठन के अन्दर होती टूट-फूट और उनकी बातें न सुने जाने की दुःखद पीड़ाएँ भी इस उपन्यास में कई-कई जगहों पर हैं। पॉलित ब्यूरो के कुछ बेहद गोपनीय निर्देश जो अनुशासनहीनता और संगठन में आती गिरावटों से निबटने के बेहद कड़े नियामक जारी करते हैं। उन लोगों की कहानियाँ भी जो उनके मित्र थे, अपने ही लोगों के हाथों मारे गये, क्योंकि निर्देश था कि यह करो। वे लोग जिनकी बातें उनके अपने ही नहीं सुनते।

एक नक्सली है सोनू जो बिहारी दास को इसलिए क्रिटिसाइज़ करता है कि उसने अपने हिन्दू एजेण्डे को लागू करने के लिए घोटुलों को बंद किया। लेखक बताता है कि ऐसा अंग्रेज़ों ने भी किया। फिर उससे कहता है, ‘घोटुल’ तो आपने भी बंद करवाये?’ सोनू जवाब देता है कि उसने पोलित ब्यूरो को कहा था कि यह ठीक नहीं है, चीज़ों को बदलने में समय लगता है, पर वह मज़बूर है, उसे उनके आदेश मानने ही हैं। वे जिस जगह काम कर रहे हैं, वहाँ खुलकर प्रतिकार नहीं कर सकते। घोटुल के मुद्दे पर जंगल में संघर्षरत लोगों की बातों को पॉलित ब्यूरो नहीं मानता। नक्सल कई बार खुद को पाक साफ़ बताते हैं। ख़ासकर उनके आय के स्रोतों के मुद्दों पर। एक मामला एस्सार कम्पनी से एक करोड़ रुपये लेने का है, जिसे पार्टी के ‘आन्ध्र-ओडिसा सीमा राज्य’ के सचिव बालकृष्णन् से प्राप्त दस्तावेज़ों के आधार पर लेखक तस्दीक करता है और कोसा को आरोपित भी कि उसके लोगों ने एस्सार से पैसे लिए (लेखक के साहस की तारीफ़ होनी चाहिए)। कोसा नाराज़ हो जाता है, तब फिर सोनू आता है और सिर्फ़ इतना कहता है कि वह एक गलती थी।

इसमें उन लोगों की कहानियाँ भी हैं, जो पहले-पहल पार्टी की ओर से बस्तर में काम करने आये थे। उन लोगों ने पार्टी को बताया था कि बस्तर इस अभियान के लिए उपयुक्त जगह नहीं है। क्यों उपयुक्त नहीं है, इसका खुलासा इस किताब में नहीं है। यह एक रोचक बात है कि क्यों प्रारम्भ में आये लोग यह मानते थे कि बस्तर उपयुक्त नहीं है। वह क्यों उन्हें वर्ग संघर्ष के लिए एक मुफ़ीद जगह नहीं लगी? इसके कई सन्दर्भ इसमें मिलते हैं, जैसे तब जब लेखक से दंतेवाड़ा का एक अधिकारी कहता है, ‘त्रासदी यह है कि आदिवासी लालची नहीं हैं।’ पूँजी के प्रति विलगाव और पूँजी की आधारभूत अवधारणा का लोप जिसकी ओर तमाम समाजशास्त्रियों ने ध्यान आकृष्ट किया, बताया कि बस्तर की जनजातीय अर्थव्यवस्था एक ‘उत्पादन उपभोग आर्थिकी’ थी, जहाँ अतिशेष का सिद्धान्त नहीं था। मार्क्स ने भी जिसे पूँजी की पहली अवस्था अर्थात् अतिशेष के रूप में बताया है। क्या यही वह कारण था, जो उस समाज को वर्ग संघर्ष के लिए सही नहीं मानता, उन माओवादियों के अनुभव से भी जो पहले-पहल यहाँ आये होंगे?

पोलित ब्यूरो ने उन लोगों को अकर्मण्य कहा और वह दौर के. सत्यनारायण द्वारा भेजे गये 49 कामरेडों के पहले ही समाप्त हो गया।

यद्यपि इस उपन्यास में कुछ चीज़ें सिरे से गायब हैं। इसमें एकाध जगहों के अलावा पुलिस या सी.आर.पी.एफ. की कहानी नहीं है, उन सैकड़ों जवानों की कहानी जो मारे गये। इसमें गाँव-गाँव में काम करने वाले और रहने वाले लोगों की कहानी भी माओवादियों के पक्ष या प्रतिपक्ष के रूप में ही आती है, सरकारी कर्मचारी, किसान, आम आदिवासी, एन.जी.ओ., राजनैतिक दल... आदि-आदि जो प्रत्यक्षतः इस समस्या को अपनी-अपनी तरह से भोग रहे हैं, कहीं नहीं है। अचरज यह भी कि सी.आर.पी.एफ. के मारे गये हज़ारों जवानों में से किसी की कहानी यहाँ नहीं है। एक जगह स्थानीय पुलिस और उसके मुखबिर के मार्फ़त उनका पक्ष आता है, पर यह उस तरह से नहीं है। मुझे लगता है कि नक्सल तथा उसके पक्षप्रतिपक्ष तक सीमित लोगों के परे अगर यह उपन्यास जाता, तो कुछ और नयी बातें निकलकर आतीं।

बहरहाल यह संशयों के साथ एक दस्तावेज़ तो है ही। संशय इसलिए, जैसा कि दण्डकारण्य में इस सत्य पर कई-कई पर्दे रहे हैं और अपने-अपने दावे भी। इस उपन्यास में भी एक नक्सल लेखक को कहता है- क्या पता आप भी सी.आई.ए. के एजेण्ट हों? फिर भी सात वर्ष के लम्बे अनुसंधान और लेखन के ढं१३्र२ंल्ल होने के स्थूल तर्क के साथ, यह एक ऐसा वृत्तान्त तो है ही जो कथानक के परे, बल्कि उससे पहले बटोरी गयी बहुत-सी अनुसंधानपरक चीज़ों पर टिकता है और इसी वजह से सतर्कता के साथ पढ़ा- देखा जाना चाहिए, ख़ासकर इसलिए भी कि माओवाद को लेकर पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों में बनी स्टीरियोटाइप अवधारणाओं को इसमें बटोरे गये साक्ष्य प्रश्नांकित तो करते ही हैं।

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मर्म मीमांसा

अपने संघर्ष में

अकेले लोगों की कहानियाँ

अरुणेश शुक्ल

वंदना राग युवा पीढ़ी की एक ऐसी समर्थ रचनाकार हैं जिनकी प्रत्येक कहानी अलग ढंग से पढ़े व समझे जाने की माँग करती है। उनकी हर कहानी का पैटर्न पिछली कहानी से अलग व नया होता है। इस कारण वंदना को पढ़ते हुए आलोचक के साथ यह सुविधा नहीं होती कि किसी खास फ़ामूर्ले, बने-बनाये आलोचकीय टूल्स व प्रचलित विमर्शों से उनकी कहानियों का मूल्यांकन कर सके। वंदना की कहानियाँ हमें इस बात की छूट तो कतई नहीं देतीं कि महिला कथाकार होने के कारण उनके लेखन को सिर्फ़ महिला लेखन के दायरे व टूल्स से देखा-समझा जाये। हालांकि उनके लिखे में उनका स्त्री होना अनिवार्यतः शामिल है। पुख्ता वैचारिक समझ, समाजार्थिक यथार्थ व उसमें होने वाले बदलावों की समग्र पहचान, गहन मानवीय संवेदना, मानव मन के गहन कोने-अंतरों में झाँकने की ताकत, मुकम्मल इतिहास दृष्टि, व्यक्ति व समूह के द्वंद्व की सटीक अभिव्यक्ति जैसी तमाम चीज़ें हैं, जो वंदना की कहानियों को अलग पहचान व विस्तृत दायरा प्रदान करती हैं। उनकी कहानियाँ अपने समकालीनों में एक अलग स्थान इसलिये भी रखती हैं क्योंकि उनमें शिल्प, कंटेंट, भाषा आदि स्तरों पर दुहराव से बचने की भरसक कोशिश होती है। इसी कारण उनकी कहानियों पर बात करते हुए प्रत्येक कहानी के भीतर से ही आलोचना के टूल्स डेवलप करने पड़ते हैं। ‘हिज़रत से पहले’, ‘दो ढाई किस्से’, ‘ख्यालनामा’, ‘क्या देखो दर्पण में’, ‘आँखें’, ‘सिनेमा के बहाने’ आदि कुछ ऐसी ही कहानियाँ हैं, जिन पर बात करते हुए वंदना राग के लेखन के बारे में एक समझ बनती है। ये सारी कहानियाँ अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग ट्रीटमेंट के साथ लिखी गयी हैं।

वंदना की कहानियों का यथार्थ अस्सी और ख़ासकर नब्बे के बाद का है। सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों व संघर्ष पर उनकी सचेत निग़ाह है। ख़ासियत यह कि वह समकालीन यथार्थ व समय के जिन प्रश्नों से मुठभेड़ करती हैं, उसे विविध आयामी रूप में देखने-समझने की कोशिश करती हैं। ‘हिज़रत से पहले’ नक्सलवादी संघर्ष व हिंसा पर बहस की कहानी है, लेकिन कहानी के पूरे वितान व ट्रीटमेंट में वंदना नक्सलवादी हिंसा के बहाने हिंसा के औचित्य-अनौचित्य, विकास के मॉडल के कारण समाज में हो रहे बदलाव के साथ-साथ बहुत सूक्ष्म संकेतों में बड़े उद्देश्य हेतु की जा रही हिंसा के बदले में सिमटते जाने को रेखांकित करती हुईं कहीं न कहीं इस संघर्ष के अंतर्विरोध व मार्क्सवाद की दार्शनिक सीमाओं को भी कहानी में समेटकर रेखांकित करती हैं। कहानी का प्रमुख पात्र जंगल की पारंपरिकता व वर्तमान में हो रहे बदलावों के साथ-साथ, जंगल बचाने के लिए जारी संघर्ष का साक्षी है। कहानी की शुरुआत में वह धरना देने वालों के बीच ‘होप’ का प्रतीक है। बारिश के कारण मची भगदड़ में भी ‘‘पतली बाँस की खपच्ची में बँधा उसका पतले कपड़े का लाल झंडा कैसे थोड़ा झुका हुआ तो है लेकिन बंधन से आज़ाद बिलकुल नहीं।... मानो यह झंडा तो फहराने के लिए ही बना है।’’ दरअसल कहानी में आया यह वाक्य वर्तमान समय के लाल झंडे (मार्क्सवाद) की स्थिति पर एक टिप्पणी है कि आज भले ही मार्क्सवाद, मार्क्सवादी संघर्ष, मार्क्सवाद के फेल्योर पर तमाम तरह की बातें हो रही हैं किन्तु

हक़ीक़त यही है कि तमाम आपदाओं के बावजूद लाल झंडा या मार्क्सवाद अब भी गरीबों व शोषित लोगों की उम्मीदों का, उनके संघर्ष का प्रतीक है। मुख्य पात्र लदरु अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर गाँव लौट आया है। वंदना लिखती हैं,‘‘ हालांकि गलत काम की परिभाषा गाँव में बदल गयी है और लुदरु ने आज से पैंतालिस साल पहले का गाँव देखा है और फिर आज का देख रहा है, पिछले दस सालों से। इस फ़र्क को चुभन की हद तक महसूस करता है वह। जंगल में बहुत कुछ बदला है। नयी पीढ़ी को अपने पारंपरिक लोकगीत, रीति-रिवाज़ कुछ भी याद नहीं हैं। गीत की पंक्तियाँ भूल रहा लुदरु, अपनी बहू की ओर देख, जानना चाह रहा है, सब पुराना बिसरा रहे हो तुम नये लोग। सचमुच जो समंदर में

बूँद की तरह बदल गया है, वह तो शहरी जैसा है। तुम्हारे कपड़े, तुम्हारे रीति-रिवाज़ और गीत-संगीत भी। फिर भी यह बार-बार जंगल बचाने की बात कैसे कर रहे हो? कौन से अपने आपको बचाना चाहते हो?’’ और बचाने के नाम पर हो क्या रहा है? बोरे के बोरे हथियार लाये जा रहे हैं। हिंसा का खेल खेला जा रहा है जिसमें तमाम बेगुनाह भी मारे जा रहे हैं। दरअसल इन वाक्यों के सहारे वंदना एक बड़ी बहस कहानी में उठाती हैं। लेकिन उस पर बात थोड़ा आगे। पहले जंगल से जुड़ी कुछ और वाजिब बातें जो कहानी में हैं, उनका रेखांकन यहाँ जरूरी है। ईनू जोशी जो कि न्यूज एंकर है, वह कहती है, ‘‘...यह दंडकारण्य है...रामायण के युग का दंडकारण्य। यहीं राम, सीता और लक्ष्मण ने अपने बनवास के वर्ष बिताये और फिर तभी से उस कहावत की शुरुआत हुई कि जो निर्वासित है, यह उनका घर है।’’ जाहिर है ऐसे में बंगाली औरतों को देखकर लुदरु का यह सोचना जायज है कि बाहरी होकर भी ये लोग बाहरी नहीं रहे, तो जंगल और बाहर वालों में फ़र्क कहाँ से बढ़ता जा रहा है? दरअसल सब कुछ स्वार्थ और लोभ-लाभ के कारण हो रहा है। इसलिए फ़र्क सिर्फ़ जंगल और बाहर वालों में नहीं बढ़ा है बल्कि आस-पड़ोस के गाँव एक-दूसरे के दुश्मन बन चुके हैं और हालत यहाँ तक है कि बाप-बेटे के बीच भी फ़र्क पैदा हो गया है। यह सोचकर रूह सिहर जाती है कि यदि लुदरु ने ईनू जोशी को कुछ बता दिया होता, तो लक्ष्मण व जीवन क्या इसे भी मार डालते? शायद हाँ। जंगल में हिंसा इतनी बढ़ी है कि रिश्तेनाते का महत्व नहीं। दुर्भाग्य से इस तरह की हिंसा को विचारधारा का नाम देकर जायज ठहराने की कोशिश भी आज समाज में हो रही है। उस जंगल में चीज़ें हिंसा से तय हो रही हैं, जहाँ ‘बहस निपटाएंगे शांति से’, यही पुराने लोग सिखाते आये हैं। आशय यह कि जंगल में अब तक़रीबन सब कुछ बदल चुका है। यहीं हमें उस बहस पर आना होगा जिसकी बात हमने पूर्व में की थी। वह बहस बहुत गहरे दार्शनिक स्तर की है। अगर हमने पूँजीवादी व्यवस्था अपनायी है, तो उसके साइड इफेक्ट्स भी झेलने होंगे। जब लुदरु कहता है कि सब कुछ तो बदल चुका है तो उसका अर्थ यही है कि जंगल का मतलब सिर्फ पेड़ नहीं होता। जंगल का मतलब उसके आचार-विचार, नियम रीति-रिवाज़, लोकगीत आदि का पूरा तंत्र होता है। जहाँ हिंसा नहीं अपितु सहकार प्रधान होता है। जंगल स्वीकार करना जानता है। वह राम को शरण देता है, तो असुरों को भी अपने भीतर समेटता है। वह निर्वासितों का घर है। जहाँ पेड़ को काटने से पहले उसको मनाया जाता हो, वहाँ हिंसा का इतना प्रसार? विचारधारा, समाज, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने की बात करने वालों को जो लगातार यह तर्क दते रहते हैं कि बाहर से लोग आकर इन पर अपने नियम थोप रहे हैं, विस्थापित कर रहे हैं, शोषण कर रहे हैं, वे जंगल के नियम-कानूनों, रीति-रिवाज़ों को कहाँ तक संरक्षित कर रहे हैं? क्या वे उन पर हिंसा नहीं थोप रहे हैं? किसे बचाना चाहते हैं? दरअसल मार्क्सवाद से खाद-पानी ग्रहण करने वाले नक्सल संघर्ष के साथ दिक्कत विचारधारात्मक ही है। इस पर बहस की ज़रूरत भी है, वह यह कि प्राकृतिक संसाधनों को बचाने हेतु लड़ी जाने वाली तथाकथित लड़ाई इंडस्ट्री का विरोध तो करती नहीं। और अगर इंडस्ट्री लगेगी तो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो होगा ही। वह चाहे पूँजीवादी व्यवस्था में हो या साम्यवादी। रूस और चीन का उदाहरण सामने है। सिर्फ पावर शिफ्टिंग ही होगी। एक तो यह दिक्कत और दूसरा यह कि हिंसा का प्रयोग करके स्टेट को यह नैतिक आधार भी प्रदान करते हैं कि वह और हिंसक हो। वैसे भी हिंसक संघर्ष में जो ज्यादा हिंसक होता है, जीतता वही है। मूल्य या सत्य नहीं जीतता। वंदना की यह कहानी इस बड़े प्रश्न व फेनामिना को संबोधित करती है। लुदरु सोचता है, क्या हक़ की लड़ाई आदमी के भीतर से उसकी सरलता भी चूस लेगी? और क्या उनकी लड़ाई बदले में घट कर रह जाएगी? कहानी में इन सारे सवालों और स्थितियों से गुज़रते हुए गाँधी की याद बेसाख्ता आती है। इसलिए भी क्योंकि गाँधी के यहाँ यह नहीं है कि आप उद्योग भी अपनायें और जंगल बचाने के लिए लड़ाई भी लड़ें। दोनों चीज़ें एक साथ संभव नहीं हैं। गाँधी यह जानते थे। इसीलिए वह आधुनिक सभ्यता व भारी मशीनों का विरोध करते हुए स्वदेशी का मॉडल देते हैं। अर्थात् स्थानीय लोगों द्वारा स्थानीय संसाधनों के उपयोग से स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से किया गया उत्पादन व वितरण। ज़ाहिर तौर इसमें इकोलाजिकल संतुलन व स्थानीयता के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी समाहित है। गाँधी के संघर्ष तो अहिंसक हैं ही। दरअसल विकास का गाँधीवादी मॉडल सहकार पर आधारित है। उस मॉडल को अपनाने से ही सही मायने में जंगल बचेगा। अन्यथा सिर्फ़ निज़ाम बदलेगा, समस्याएं ज्यों की त्यों रहेंगी। वंदना की इस कहानी में हालांकि यह बहस सरफेस नरेशन पर नहीं हैं किन्तु कहानी के डीप नरेशन में यह बहस अनिवार्यतः अंतर्विन्यस्त है। वैसे भी ‘‘निर्दोष लोगों की हत्या चाहे वह किसी भी पक्ष के हों, कैसे जायज मान ली जाय?’’ यह वाक्य कहानी का ही है। यह फिर गाँधी की याद दिलाता है जो यह मानते थे कि आधुनिक सभ्यता हिंसा की नींव पर खड़ी है। यह सभ्यता अनिवार्यतः हमें हिंसक ही बनाती है।

वंदना राग अपनी कहानियों में डिस्कोर्स को अभिव्यक्त नहीं करतीं, बस कहानी में डिस्कोर्स निर्मित करती हैं। वह बड़ी खूबसूरती से ‘हिज़रत से पहले’ में हिंसा और वर्तमान सभ्यता पर एक डिस्कोर्स रचती हैं। जो अंडरटोन ज्यादा है। लुदरू की बेनाम शहादत हमें दुःख से भर देती है। जंगल का सच यही है कि वह दूसरों को बचाने हेतु खुद का बलिदान देता जाता है। खुद कटकर दूसरों का घर बनाता है। वंदना की निग़ाह भूमंडलीकरण के चलते हर क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन पर है। पारंपरिक चीज़ें, समाज किस तरह से बदल रहा है, उसका एक रूप तो हम ‘हिज़रत से पहले’ में देख ही चुके हैं। हमारी विडंबना यह बनी हुई है कि हम बदलाव को स्वीकार भी कर रहे हैं और उससे बचे रहना भी चाहते हैं। यह जीवन के हर क्षेत्र में हो रहा है। क़िस्सागोई जिसे हम पारंपरिक रूप से कथा कहने की शैली के रूप में जानते हैं, वह भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं है। एक सचेत लेखक की ऐसे में यह ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वह प्रथमतः तो इस परिवर्तन को, इसके स्वरूप को पहचाने। जीवन व कथा शैली पर पड़ने वाले इसके प्रभावों की पड़ताल करे तथा साथ ही उसके मूल स्वरूप को बचाये रखने की कोशिश भी करे। वंदना की कहानी ‘दो-ढाई क़िस्से’ इस पूरे फेनामिना को संबोधित करती है। पहले यह दिलचस्प व मानीखेज संवाद देख लिया जाये‘‘निगम साहब ने जिस नज़र से मुझे देखा, मैं पूछ बैठा- क्या सौदा करना है? उनकी पनीली आँखों में हैरत टपाक से कूद कर तैरने लगी-तुम्हें कैसे मालूम?

बस जानता हूँ। बिरहा, तारा...क़िस्सा सब सौदे की ओर ले जाते हैं। पर साहब मुहल्ले वाले जो कहें, रंडी नहीं है वो।’’

स्पष्ट है कि यह बात क़िस्सागोई पर भी लागू होती है, किन्तु भूमंडलीकरण के इस दौर में सौदा होता है क़िस्सागोई का। क़िस्सागो लंदन और अमेरिका पहुँचता है और अपने क़िस्सा कहने की अदा के बूते

वह स्टार बन जाता है। दरअसल वंदना यह जानती हैं कि हमारे समय के यथार्थ को ब्लैक एंड ह्वाइट में नहीं समझा जा सकता। उसको उसकी धूसरता में ही समझा जा सकता है। भूमंडलीकरण के चलते, तमाम ऐसी कलाएं जो अब तक विलुप्त हो चुकी होतीं, नया जीवन पा चुकी हैं। बस्तर बैंड, पांडवानी गायन जैसे तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं। ‘दो ढाई किस्से’ में वंदना यह बताती हैं कि भूमंडलीकरण के चलते पारंपरिक क़िस्सागोई में कितना परिवर्तन हुआ है। भूमंडलीकरण ने जहाँ उसे एक नया जीवन प्रदान किया है, वही उसमें बाज़ार व ग्लोबल दबावों व रूचियों के कारण आमूलचूल परिवर्तन भी हुआ है। ‘‘क़िस्सागो हर वक़्त भटक क्यों जाता है? यहाँ नियम नहीं है न कोई? न मन का, न तंत्र का। इस देश में-इस देश के इस शहर में कुछ भी कहने पर पाबंदी नहीं है यहाँ, कुछ न कहने पर भी नहीं। मिज़ाज में भी कोई पाबंदी नहीं। वहाँ इंग्लैण्ड में तो हर चीज़ का नियम था। भटकने का स्कोप नहीं था, सब कुछ सिलसिलेवार चलना था। उसी के पैसे भी थे। अगर क़िस्से में कुछ टूट-फूट, ऊबड़-खाबड़ हो जाती, तो पैसे कटने का डर था। इसलिए डर कर सब लोग ठीक से काम करते हैं वहाँ।’’ आशय यह कि इस ग्लोबल व्यवस्था व बाज़ार ने कला को बाज़ार में लाकर खड़ा तो किया, उसे चमक भी प्रदान की। उत्तर आधुनिकता के टर्म में कहें तो चमक को और भी गहरा किया, किन्तु जिस क़ीमत पर वह ऐसा कर रहा है, वही कला और कलाकार के साथ सबसे बड़ी त्रासदी व मज़ाक है। बाज़ार कला व कलाकार की स्वतंत्रता की कीमत पर ऐसा कर रहा है। कहानी में वंदना यह साफ़ दिखाती हैं कि आज का समय ऐसा है जिसमें हम चारों तरफ़ भयानक रूप से दृश्य माध्यमों से घिरे हुए हैं। इसलिए परफारमेटिकल होने का दबाव कलाकार व कला पर भी है। और चूँकि यह सब कुछ खरीदे और बेचे जाने का समय भी है। ऐसे में क़िस्सागो को भी अपना क़िस्सा उतने समय में ही पूरा करना है, जितना समय लोगों ने ख़रीदा है। यानी उसे सब कुछ पहले से तय करना होगा। मौलिक सोच, विचार, क्षेपक, अवांतर प्रसंग आदि वे तमाम चीज़ें तो तत्काल दिमाग में कौंध कर क़िस्से का अनिवार्य हिस्सा बन जाती थीं, रचनाकार की सोच ख़ासकर समकालीन दौर व मुद्दों पर उसकी पकड़ को जो सूचित करती हैं और जिसके सहारे वह कला का समकालीन दायित्व और प्रतिरोधी तेवर बरकरार रखता था, उसको बहुत ही षड्यंत्रपूर्ण ढंग से सेंसर कर दिया गया है। कलाकार को भी ऐसा बनाया जा रहा है कि वह भी राज्य के बनाये नियमों को मजबूत करे, उसके प्रतीकों को माने और उसे मजबूत करे। इस व्यवस्था में न तो व्यक्ति का राजनीतिक दायित्व व हस्तक्षेप है और न ही कला का। कला को एक बार फिर से मनोरंजन मात्र का साधन बनाने का उपक्रम चल रहा है। ऐसे में यह अकारण नहीं जैसा कि कहानी में आया कि इंग्लैण्ड, अमेरिका में क़िस्सागो राम, कृष्ण की मिथक कथा बहुत ही भव्य ढंग से प्रस्तुत कर रहा है। दरअसल मिथक एक लंबे समयगत प्रक्रिया की सामाजिक निर्मिति होते हैं। उनमें समयानुकूल परिवर्तन भी कथाओं के माध्यम से होते रहते हैं। आज की व्यवस्था उन मिथकों को सिर्फ़ धार्मिक प्रतीकों में रिड्यूस कर बाज़ार में तब्दील कर देना चाहती है। अब क़िस्से मसले हल करने का साधन नहीं रह गये। अब मिथक व कथाएं पश्चिम के लिए बाज़ार हैं जो बहुत नास्टैल्जिया से भारत की तरफ देखते हैं। पश्चिम द्वारा बनायी गयी हमारी छवि को तोड़ते-तोड़ते हम फिर उसी छवि में क़ैद होते जा रहे हैं। कहानी में क़िस्सागो के बहाने कथन है,‘‘ वहाँ इंग्लैण्ड में जाकर देखा। मेरे पहुँचने से पहले मेरी शोहरत पहुँच चुकी थी। लोग बहुत उम्मीद से मुझे सुनने आये थे। वे लोग अभी भी देश को हसरत भर नास्टाल्जिया से देखते हैं। (क़िस्सागो का शब्द ज्ञान, ख़ास तौर से अंग्रेज़ी का निगम साहब की ही देन है।) वे आँखों की भाषा से अपने जुड़ाव को व्यक्त कर रहे थे। क़िस्सागो के मंच पर पहुँच कुछ भटक जाने पर वे कहने लगे, आज के इंडिया के क़िस्से नहीं, स्टोरी टेलर... तुम्हारे शहरों, मुहल्लों के क़िस्से नहीं चाहिए हमें।...... मस्ट बी समथिंग प्रेजेंट ... नो, नो तारा... नो प्रेजेंट। पास्ट...पास्ट... पास्ट चाहिए हमें।’’ अर्थात् वर्तमान समस्याओं से काटकर अतीत में ले जाने, सुकून तलाशने का पुराना षड्यंत्र। जिससे लड़ते हुए हम यहाँ तक पहुँचे हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कला को समकालीन सरोकारों से काट देने की आकांक्षा। कलाकार, कला को इतना बदल देना कि वह अपने आप को, अपने सारे दायित्वों को भूल जाये। निगम साहब से जब क़िस्सागो सफ़ेद पोशाक में परफारमेंस देने की गुज़ारिश करता है- ‘‘सफ़ेद पोशाक में परफारमेंस दूँ? मुझे असली लगेगा, पुराने क़िस्साग़ो जैसा। तब निगम साहब उससे कहते हैं, नहीं भाई, जब तुम पुराने नहीं रहे, तो पुरानी पोशाक का मोह कैसा? तुम्हारे क़िस्से भी नये हो गये हैं। उनमें रंग भर गया है। ड्रामाई रंगीन तत्व भर गये हैं, तो सफ़ेद का ये फिक्शेसन क्यों? न... तुम्हें अपने स्वभाव और पसंदों में भी बदलाव लाना होगा... मंच की आवश्यकता अनुसार।’’ क़िस्से व क़िस्सागोई, कला व कलाकार की असल त्रासदी कहानी में आगे दिखती है, जब क़िस्सागो अपने शहर में क़िस्सा सुनाने वापस आता है। उसे लगता है कि यह तो अपना शहर है। यहाँ वह अपने मिज़ाज से, अपने अनुसार स्वतंत्रता लेकर क़िस्सा सुना सकता है। किन्तु अब यह शहर भी बदल चुका है। ‘‘वह दंग है। शहर से सारी सरलता गायब हो गयी है क्या? या लोग जीवन को इतनी अधिक सरलता से जीने लगे हैं कि, एक ही किस्सा, सबकी ज़ुबां पर रटा हुआ क़िस्सा ही, बार-बार सबके मुँह से सुनना चाहते हैं, ताकि कोई कन्फ्यूज़न न रहे।’’ अपनी संरचना, मिज़ाज, लहज़े, भाषा, तहज़ीब सब में शहर पूरी तरह बदल चुका है। त्रासदी यह है कि क़िस्सागो व उसका क़िस्सा तो अमेरिका, इंग्लैण्ड जाकर बदला जबकि शहर तो यहीं रहकर बदल गया।

दरअसल कहानी अपने पूरे वितान में यह सच सामने लाती है कि भूमंडलीकरण के कारण हो रहे परिवर्तनों को न तो शायद रोका जा सकता है और न ही नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। कहानी के अंत में यह वाक्य है, ‘‘क़िस्सागो अब समय में और आगे चला गया है। उसके सपने में अब तारा नहीं आती।

वह अब रूक कर तारा के बारे में निगम साहब को समझाने की कोशिश भी नहीं करता। तारा का बीतना भी अब उसे नहीं अखरता। आख़िर तारा ने ही उसे नकार दिया था। अब क़िस्सागो रंगीन कपड़े शौक से पहन अपने पात्र जीता है। सपने में उसे समुद्र पार करते राम दिखते हैं। क़िस्सागो का मन अमेरिका के लिए श्रद्धा से भर जाता है। वहाँ उसका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। वहाँ से लौटने के बाद देश में भी उसकी इज्ज़त बहुत बढ़ गयी है।’’ अर्थात् अमेरिकामुखी समय हमारा यथार्थ है। हमारा सब कुछ अमेरिका से ही तय होता है। हमारी इज़त, हमारा लेखन आदि सब कुछ। हमारे पास मानो अपना विवेक बचा ही नहीं है। और वैसे भी उत्तर आधुनिकता में विवेक को इच्छा ने रिप्लेस कर ही दिया है। बहरहाल, कहानी की सफलता इसमें नहीं है कि वह बदलावों को दिखा पा रही है, बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा इसमें है कि यह कहानी बिना किसी शोर के यह प्रकट करती है कि रचनाकार के सामने आज विविध आयामी चुनौती है। उसे अब वह कला विकसित करनी होगी कि बाज़ार द्वारा दिये गये स्पेस पर खड़े होकर ही बाज़ार का विरोध किया जाये। यह हक़ीक़त है कि हम पीछे नहीं लौट सकते उसी रूप में क्योंकि सब बदल रहा है और दूसरे की शर्तों पर कम से कम रचनाकार तो आगे नहीं बढ़ता है।

वंदना की कहानियों में कहानी के भीतर एक वैचारिक कथा लगातार चलती रहती है। बिना विचार को ठीक से समझे व डिकोड किये उनकी कहानियों का मर्म नहीं समझा जा सकता। वंदना जिस ज़मीन पर अपनी कहानियों में खड़ी हैं, ज़ाहिर तौर पर वह ग्लोबलाइज़ेशन के चलते हो रहे परिवर्तनों की ज़मीन है। शायद इसीलिए वंदना की कहानियों में कोई आयडियल या हीरो नहीं होता। न ही अपनी कहानियों में हर जगह वह अच्छे-बुरे का निर्णय देती चलती हैं। दरअसल अपनी कहानियों में वंदना हमारे समय को एक ओपन टेक्सट की तरह देखती हैं। एक ऐसे टेक्सट के रूप में जो लगातार लिखा जा रहा है। वंदना उस टेक्सट को कहानियों में चित्रित करती हैं। पक्ष-विपक्ष दोनों साथ रचती चलती हैं। कृत्रिम विचारधारात्मक निष्कर्ष देने से तो वे प्रायः अपनी कहानियों में बचती ही है। ठोस वैचारिक गद्य, छोटेछोटे वाक्यों, संवादों का इस्तेमाल कर पात्रों के मानसिक लोक में घुसकर वे द्वंद्वों के लिए कहानी में

जगह बनाती हैं। ‘आँखें’ स्त्रियों ख़ासकर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण व उनके साथ होने वाली यौन हिंसा को लेकर लिखी गयी कहानी है। इस कहानी मेंवंदना पहले लड़कियों के सहज जीवन, जिसमें स्वतंत्रता है,क्लास में होने वाले हँसी-मज़ाक हैं, दादागीरी है, अध्यापिकाओं पर किये जाने वाले कमेंट्स हैं आदि का सुंदर चित्रण करती हैं। उस पूरे चित्रण को पढ़ते हुए महसूस होता है कि मानो हम खुद क्लास या स्कूल का हिस्सा हों। लड़कियाँ फिल्मों पर बात करती हैं आपस में, हँसी-मज़ाक भी करती हैं। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है। लगता ही नहीं कि इनके जीवन में भी कोई दुःख हो सकता है। किन्तु क्लास (उस ग्रुप) का माहौल धीरे-धीरे तब बदलने लगता है, जब नेहा ठाकुर का एडमिशन उस क्लास में होता है और उसे टीचर पीछे की बेंच पर शरारती लड़कियों के साथ बैठा देती है। कहानी में धीरेधीरे वंदना नेहा ठाकुर की ज़िंदगी हमारे सामने खोलती हैं। एकदम अचानक से नहीं। पहले संकेतों में और अंत में स्पष्टता के साथ। कहानी यह दिखाती है कि नेहा ठाकुर के पिता न होने के कारण उसे किस तरह की समस्याओं का सामना घर से लेकर बाहर (स्कूल) तक करना पड़ता था। कहानी में वंदना यह बताने में सफल रहती हैं कि यौन हिंसा पर बात करना भले ही एक स्त्री की बात करना ही क्यों न हो, एक अलग बात है और यौन हिंसा का विक्टिम होना अलग है। विक्टिम होना कितना भयावह व त्रासद होता है, यह कहानी पढ़कर हमें पता चलता है। यौन हिंसा नेहा ठाकुर से उसका बचपन, उसका कैशोर्य छीन लेती है। शायद पूरा जीवन ही। वह अपने क्लास की लड़कियों से मिक्स नहीं हो पाती। एकाकी रहती है। सबसे कटी-कटी। स्कूल के बाहर चाकलेट के बहाने पुरुष द्वारा लिंग दिखाने की घटना को, जहाँ उसकी सहेलियाँ मज़ाक के रूप में लेती हैं, वही नेहा ठाकुर डर जाती है क्योंकि वह उसकी भयावहता से वाकिफ़ होती है। उसका बचपन, कोमलता, सहजता सब तो नष्ट हो चुका। सामाजिक संरचना ऐसी कि किसी की दरिंदगी से असमय बड़ी बना दी गयी नेहा ठाकुर इस दुःख को किसी से बाँट भी नहीं पाती है। दरअसल हमारे समाज में सेक्स पर बात करना वर्जित है। लड़कियों को तो एकदम। योनि शुद्धता उनकी इज्जत से जुड़ी है। इसलिए लोक-लाज व शर्मिंदगी के कारण यौन हिंसा की शिकार महिलाएँ, लड़कियाँ जल्दी या कभी भी किसी को कुछ बता नहीं पाती। प्रतिरोध की कौन कहे, ‘आँखें’ कहानी से वंदना कहीं न कहीं यह मैसेज भी देती हैं कि नारीवाद में शाश्वत भगिनीवाद जैसे नारों के बावजूद अभी भी कहीं न कहीं प्रत्येक महिला का दुःख अलग ही है। स्त्री का दुःख समझती तो प्रत्येक स्त्री है, पर उनमें अभी इतनी ताकत भरी जानी बाकी है कि वे संगठित हों। इस तरह की चीजों का सड़क पर उतर कर प्रतिरोध कर सकें।

वंदना की कहानियों में पात्र अपने संघर्ष में प्रायः अकेले होते हैं। चाहे लुदरु हो या क़िस्सागो या फिर नेहा ठाकुर। वंदना दुःख को सामूहिकता में विस्तारित तो करती हैं पर प्रतिरोध को सामूहिक नहीं बनातीं। कहानी कहने का उनका ढंग पारंपरिक किस्सागोई का नहीं है, बल्कि वेस्टर्न स्टोरी टेलिंग का है। हालांकि ज़मीन उनकी देशज ही है। वंदना के लेखन की बड़ी ख़ासियत यह भी है कि वह मनोभूमि में हो रहे बदलावों को भी कहानी में नोट करती हैं। अपने लेखन को वे किसी ख़ास वाद या दायरे में बँधने नहीं देतीं। हाँ लेखन वह ज़रूर डिस्कोर्स ओरियेंटेड करती हैं। डिस्कोर्स ओरिएंटेड ही नहीं, डिस्कोर्स मेकिंग की कहानियाँ भी लिखती हैं वंदना।

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सृजन की कसौटी

सुरेश कुमार

प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति ग्रमीण जीवन के जासूस हैं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि वे अपने लेखन में गाँव से जुड़ी प्रत्येक समस्या पर बड़ी पैनी दृष्टि रखते हैं। शिवमूर्ति की नवीनतम पुस्तक ‘सृजन का रसायन’ उनके विचारों की जमा पूँजी ही नहीं बल्कि इसमें उनकी रचनाधर्मिता के कारण बनने वाले तमाम व्यक्तियों की जीवटता का वर्णन है। पुस्तक में उनके ऐसे संस्मरण और आत्मकथ्य हैं जिन्हें पढ़कर उनके लेखक और गाँव के लोगों के संघर्ष का पता चलता है। उन्होंने इस किताब को नौ अध्यायों में विभाजित किया है। इनमें ‘सृजन की कोख’,‘बीज’, ‘मृत्यु का स्वागत’, ‘वर्तमान का एक बिंब’, ‘योगी भी भोगी भी’,‘तिरिया चरित्तर की नयिका के नाम पत्र’, ‘लेखक की भूमिका’ और ‘अभी तो हम मुस्तैद पिछलग्गू भी नहीं’ हैं। इन अध्यायों में साहित्य सृजन की प्रक्रिया के साथ ही जियावान दर्जी, सन्तोषी काका, नरेश गडरिया, ललता मौर्या, जंगली अहीर, पल्टन यादव, रामबाबू कुशवाहा, जोखु चौधरी, मंगल सिंह, गुरुनाई, रामनिंरजन, रामदीन, रंगई, अलगू, अंजोरवा, बरसाती पासी, दलित हलवाहा, धन्नू बाबा, लाल बिहारी, लाल मोहम्मद, नट परिवार, नकछेद पांडे, पंडित देवमणि, शीतला पंडित, डा.बक्शी, शिवकुमारी, मुराइन अइया, कोइला अइया, रज्जु बुआ, जगु बहू, मनी बहू, चंपा, शकुन्तला और सियादुलारी आदि के जीवन संघर्ष को लेखक ने संवेदना के साथ उजागर किया है। इसी के साथ झबरा कुत्ता और मकरा बैल के संघर्ष को भी लेखक ने बड़ी शिद्दत के साथ रखा है।

प्रथम अध्याय में लेखक ने सृजन प्रक्रिया पर विचार किया है। वे बताते हैं कि किसी लेखक के भीतर दो व्यक्ति होते हैं। एक तो वह है, जो अपने आस-पास घट रही घटनाओं को देखता है। दूसरा व्यक्ति वह होता है, जो घटित घटनाओं पर विचार करता है। जब ये विचार पूर्ण आकार लेते हैं, तब किसी रचना का जन्म होता है। लेखक के अन्दर बैठा दूसरा व्यक्ति किसी के दुख को अपना दुख मान लेता है। ऐसे में किसी व्यक्ति के अनुभव लेखक के अनुभव हो जाते हैं। शिवमूर्ति लिखते हैं,‘‘जब वह दूसरा व्यक्तित्व अपने किसी पात्र में इस झेले, भोगे गये अनुभव को आरोपित करता है, तब तक यह अनुभव खुद लेखक का अनुभव बन चुका होता है, इसीलिए काल्पनिक पात्र के काल्पनिक दुख को चित्रित करते समय निकलने वाले उसके आँसू वास्तविक होते हैं।’’ यदि कमज़ोर व्यक्ति अपने साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाता है, तो ऐसा व्यक्ति किसी के लिए प्रेरणा बन सकता है। लेखक ऐसे व्यक्ति के संघर्ष को संवेदना के साथ अपनी रचना में उजागर करता है। मगर यदि किसी लेखक में सच को उजागार करने का साहस नहीं है, तो ऐसा लेखक समाज की समस्या नहीं उजागर कर सकता है। वे आगे लिखते हैं कि फसल की तरह लेखक भी ‘अपनी ज़मीन’ की उपज होता है। लेखक का ‘ज़मीन’ में जैसा प्रवेश होगा, उसकी रचना भी उसी प्रवेश की होगी। शिवमूर्ति मानते हैं कि सहित्य सृजन के लिए अनुभव, संघर्ष, यथार्थ और विचारधारा का होना ज़रूरी है। मुक्तिबोध ने भी सृजन प्रक्रिया पर विचार किया है। मुक्तिबोध ने सृजन प्रक्रिया के तीन क्षण बताये हैं। उन्होंने सृजन प्रक्रिया के लिए अनुभव, संघर्ष, विचारधारा और फैण्टेसी को महत्वपूर्ण माना है। लेकिन शिवमूर्ति सृजन प्रक्रिया के लिए ‘कल्पना’ के साथ ही ‘यथार्थ’ को ज़रूरी मानते हैं। किसी भी रचना की कसौटी क्या होनी चाहिए? लेखन की पहली कसौटी भारत का ‘संविधान’ होना चाहिए। दूसरी कसौटी यह हो सकती है कि लेखक की कथनी और करनी में अन्तर नहीं होना चाहिए। यदि कोई लेखक कथनी और करनी में अन्तर करता है, तो ऐसा लेखक समाज के लिए आदर्श नहीं हो सकता है। किसी भी लेखक का जीवन उसकी रचना की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

तीसरी कसौटी यह हो सकती कि वंचित समुदाय के लोगों के संघर्ष को अपने लेखन में वह किस तरह और कितना ला पा रहा है। किसी भी लेखक में रचना के ‘बीज’ यूँ ही नहीं पड़ते। लेखक समाज में घटनेवाली घटनाओं से पहले संवेदना के साथ जुड़ता है, फिर उसका चित्रण कर पीड़ित और शोषित के पक्ष को उजागर करता है। शिवमूर्ति का मानना है कि ‘मेरा अनुमान है कि हर लिखने वाला प्रारम्भ में या तो किसी चरित्र को देखकर उसका रेखाचित्र उतारता होगा या किसी घटना अथवा दृश्य को देखकर उसका वर्णन करता होगा। यह दृश्य या चरित्र नवजात या जन्म ले रहे लेखक का अंडा है। इसे वह सेता रहा, सेता रहा तो एक दिन वह उसे मुकम्मल चूजे में बदल लेने में कामयाब हो जाता है।’ इस प्रकार किसी कृति का जन्म होता है। शिवमूर्ति के लिए लेखन के मायने क्या हैं? गौरतलब है कि उनके लेखन में जिन संघर्षों और दुख की अभिव्यक्ति हुई है, वे बनावटी और काल्पनिक नहीं हैं। वे बचपन से ही सांमतों के द्वारा किये जा रहे अत्याचार को देखते आये हैं। वे खुद इसके शिकार रहे हैं। वे यह भी देख रहे थे कि किस तरह से दलितों और पिछडों पर असामाजिक संहिताएं लादी जा रही थीं। जहाँ सामन्तों द्वारा दलितों और पिछड़ों का शोषण अपने चरम सीमा पर था, वही इसका वंचित समुदाय के लोगों द्वारा प्रबल विरोध भी हो रहा था। लेखक के पिता द्वारा किया गया ज़मीन के लिए संघर्ष या फिर जमींदारी और हलवाही के ख़िलाफ अंजोरवा का विद्रोह, सामन्तवाद के ख़िलाफ़ नरेश का विद्रोह, शिवकुमारी की जीवटता, जगू बहू के आंसू, गरीबी और भुखमरी में किया गया लेखक का स्वयं का संघर्ष, गाँव के जमीदारों के ख़िलाफ़ सन्तोषी काका का विद्रोह इन स्थितियों ने ही शिवमूर्ति के अन्दर लेखन का बीज डाला। लेखक की दृष्टि ऐसी होनी चाहिए कि वह रेगिस्तान में भी पानी की बूँदें देख ले और जीवट ऐसा कि बंजर भूमि में भी फसल उगाने की चेष्टा करे। शिवमूर्ति ऐसे ही लेखक हैं। वे अपने लेखन के बारे में लिखते हैं, लिखना मेरे लिए कबाड़खाने से

साइकिल कसने जैसा है, तो वे बिलकुल सही लिखते हैं। शिवमूर्ति इस किताब में यह भी बताते हैं कि एक लेखक की समाज में भूमिका क्या होनी चाहिए। वे मानते हैं कि लेखक को योगी और भोगी दोनों एक साथ होना चाहिए। योगी होने का मतलब यह नहीं कि लेखक समाज को छोड़कर संन्यासी हो जाये। बल्कि कथनी और करनी में वह कोई भेद ना करे। इसी तरह भोगी होने का अर्थ यह नहीं कि किसी का शोषण करता रहे। भोगी होने का अर्थ है कि लेखक समाज में घटित घटनाओं के प्रति निरपेक्ष ना रहे। किसी के साथ हो रहे अन्याय के प्रति उसकी सजगता हो। शिवमूर्ति यह मानते हैं कि लेखक को आंकड़ेबाज नहीं होना चाहिए क्योंकि लेखक की भूमिका समाज के लिए ‘आंकड़ेबाज’ की न होकर समाजिक विसंगतियों पर कुठाराघत करने की होती है। वे आगे यह भी कह देते हैं कि लेखक को विशेषज्ञ भी नहीं होना चाहिए। इसके पीछे उनका यह तर्क है- ‘विशेषज्ञता सहजबोध की दुश्मन है।’ लकिन वे यह मानते हैं कि आलोचक को विशेषज्ञ जरूर होना चाहिए। इस किताब से यह भी पता चलता है कि शिवमूर्ति ने बचपन से ही बड़े दुख उठाये हैं। जब शिवमूर्ति कक्षा सात में पढ़ रहे थे, तभी पिता गृहत्यागी हो गये। वे लिखते हैं, ‘पिता जी जब गये, तो मै दर्ज़ा सात में था। और बहन दर्ज़ा दो में । उनके गृहत्याग को हमने नियति का क्रूर मजाक मानकर स्वीकार कर लिया।’ वे आगे विस्तार में जाकर लिखते हैं, ‘जब मैं दर्ज़ा सात में था, उस साल वे कुटी पर गये तो लौटे ही नहीं। वही रम गये। दो महीने हो गये, खेती-बारी का नुकसान होने लगा। मामा उन्हें खोजते हुए पहुँचे, तो उन्होंने दो टूक अपना फ़ैसला सुना दिया-अब हम घर-गृहस्थी के जंजाल में नहीं पड़ेंगे। गौरतलब है कि इस घटना के बाद घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी शिवमूर्ति और उनकी माँ पर आ गयी। इधर वही पिता आख़िर चौदह वर्ष के बाद लौटे और कबीरपंथी होकर घर पर रहने लगे। जाहिर है इस विडंबना ने लेखक मनोजगत को गहरे से प्रभावित किया और उसके संघर्ष को भी तीखा बनाया। मध्यवर्गीय लेखक इस अनुभव को और इससे जुड़ी दुनिया को समझ ही नहीं सकता।

लेखक ने स्त्री समस्या पर खुलकर विचार किया है। इस किताब में ऐसी तमाम स्त्रियों से जुड़े संस्मरण हैं, जिनकी जीवटता और संघर्ष लेखक के सृजन के लिए प्रेरणा बने। शिवमूर्ति के यहाँ स्त्री का संघर्ष एकांतिक नहीं है, वह विविध आयामी है। उनके लेखन में एक ओर मुराइन अइया के दुख हैं, तो दूसरी तरफ तिवराइन अइया के द्वारा लेखक को बचपन में दी गयी रोटी की सुगन्ध ताज़ा है। इतना ही नहीं, उनके लेखन में परदेसिन अइया और जग्गू बहू और मनी बहू का रुदन भी बड़े मर्मिक ढंग व्यक्त है। वे लिखते हैं कि ‘‘चिट्ठी लिखने के दौरान जग्गू बहू और मनी बहू का रोना मुझे अभी तक याद है। दोनों स्त्रियाँ कब की दुनिया छोड़ चुकी हैं। रोने-कलपने और वियोग में बीता यौवन और अभाव-असुरक्षा में बीता बुढ़ापा। गंवई स्त्री के यौवन की दीप्ति, उसकी सुगन्ध अवधि कितनी अल्प होती है। उनके जीवन में रात बीस घन्टे की और दिन सिर्फ़ चार घंटे का क्यों होता है।’ शिवमूर्ति शिवकुमारी के संघर्ष बताते हैं, तो दूसरी तरफ़ ‘तिरिया चरित्तर की नयिका के नाम पत्र’ वाले अध्याय में विमला पर किया गया पंचायत का अत्याचार भी उजागर करते हैं। शिवमूर्ति को इस बात का बड़ा दुख है कि ‘तिरियाचरित्तर’ कहानी में विमला की पीड़ा को ठीक से उजागर नहीं कर पाये। वे लिखते हैं कि ‘इस कहानी में मैं तुम्हारे इस महादुख को मूर्त करना चाहता था। जैसे तेल में पनही सीझती है, तुम्हारे इस दर्द के समुंदर में पाठकों के दिल को सिझाना चाहता था, लेकिन पता नहीं, बात कहाँ हाथ से फिसली। उस दर्द का शतांश भी काग़ज़ पर नहीं उतार पाया। शायद इसके लिए ज्यादा ताकतवर कलम की दरकार थी।’ यह लेखक की सादगी और ईमानदारी है वरना कहाँ कोई लेखक अपनी रचना के बारे में इस तरह की आत्मस्वीकृति करता है। वे विमला की पीड़ा को उजागर करते हुए लिखते हैं,‘तुम सुबह-शाम अँधेरे में दिशा-मैदान के लिए बाहर निकलती और दिन-रात अपनी अँधेरी कोठरी में पड़ी रहती। कभी-कभी माँ या दादी तुम से कुछ पूछती, तो तुम्हारी आँखों से धारोधार आँसू बहने लगते। मुझे लगता जैसे ये प्रश्न जान-बूझकर तुम्हें कष्ट पहुँचाने के लिये किये जाते थे।’ ‘सृजन का रसायन’ किताब न सिर्फ़ शिवमूर्ति की रचना प्रक्रिया व उनकी रचनाओं के पर्दे के पीछे की दुनिया को उजागर करती है बल्कि वह साहित्य की कसौटी भी निर्धारित करती है। सहित्य के पुराने मानदंड के फोल्ड से बाहर निकलकर लेखन के नये मानदंड निर्धारित करती है। नये लेखकों और शिवमूर्ति के पाठकों के लिए यह किताब एक अनिवार्य पाठ है। यह किताब वर्तमान विसंगतियों को उजागर करती है और पूर्व की विसंगतियों पर भी प्रकाश डालती हैं। शिवमूर्ति इस किताब में यह भी बता गये हैं कि किस तरह भूमि उन्मूलन में ज़मीन का बन्दरबाँट हुआ था। यह किताब भू-स्वामियों और सामंतों की दबंगई को उजागर करती है। इस तरह इस किताब को आजादी के बाद के सामाजिक यथार्थ को समझने के लिए भी पढ़ा जा सकता है। ‘सृजन का रसायन’ किताब दलित और स्त्री समस्या को बड़े व्यापक स्तर पर उठाती है। इस किताब में लेखक ने सौ के क़रीब लोगों का संघर्ष दर्ज़ किया है, जो कि बहुत साधारण लोग हैं। सत्ता में रहने वाले लोगों का ही संघर्ष लिखा जाता रहा है, शिवमूर्ति ने शोषितों का संघर्ष लिखा है। शिवमूर्ति एक ज़िम्मेदार लेखक हैं, इसके बावजूद वे भूलवश दलितों के लिए एक ऐसे शब्द का प्रयोग कर गये हैं, जो अब कानून की दृष्टि में प्रतिबंधित है।

पुस्तक : सृजन का रसायन, लेखक : शिवमूर्ति, प्रकाशक : राजकमल, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, मूल्य : 250

68, बीरबल साहनी शोध छात्रावास, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ-226007,

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पहले से ही सब कुछ होता है तय

अनुराग मिश्र

अनिल त्रिपाठी के नवीनतम काव्य संग्रह ‘अचानक कुछ नहीं होता’ के शीर्षक वाक्य को संग्रह में आयी अन्य कविताओं के साथ रखते हुए ध्यान दें तो हम देख सकते हैं कि अपनी व्यंजना में वे दो परस्पर विरोधी विचार, जीवन या अनुभव दशाओं को उनके अर्थपूर्ण संकेतों के साथ अपनी काव्य-संरचना में समाहित करती हैं। एक ‘दशा’ तो वह है जो कविता का प्रतिपक्ष है और मोटे तौर पर जिसे हम आधुनिक सभ्यता के उन अभिलक्षणों के रूप में चिह्नित कर सकते हैं जो उसकी गहरी अंतरंग विशेषताओं व उनके अंतिम परिणामी ‘उत्पादों’ के रूप में प्रकट होती हैं, तो दूसरा छोर कविता का वह अपना पक्ष है जो इस समय की पड़ताल को एक सभ्यतामूलक वैचारिक पड़ताल के रूप में तब्दील करता है- एक ऐसी पड़ताल जहाँ विचार या फिर संवेदना को मनुष्य की आनुभविकता की संगति में रखकर देखा जा सके। आकस्मिकता का प्रत्यय संरचना में दिये गये निषेध के बावजूद फिर कवि के उस काव्य-सामर्थ्य पर जा टिकता है जिसमें वह वस्तुओं, घटनाओं या विवरणों को अपनी कविताओं में एक दूसरी भूमिका में प्रत्यक्ष करता है। एक कवि के तौर पर अनिल उस आकस्मिक-सी दिखती हुई ‘स्थिति’ को सामने रखते, और उस तरफ़ ध्यान खींचते हैं जहाँ समय या सभ्यता की अवस्थिति अपनी पूरी स्वघोषित वैधता, तार्किकता और अमानवीय यांत्रिकता के साथ मौज़ूद है और जो इस रूप में पाठक के प्रत्यक्ष अनुभव में आकस्मिक लगती हुई भी सुदीर्घ नियोजित या अनाकस्मिक है। संग्रह की शीर्षक कविता में जब वह कहते हैं- ‘‘अचानक कुछ नहीं होता/ बस एक परदा है/ जिसके पीछे पहले से ही/सब कुछ होता है तय/ और सामने आने पर/ लगता है अचानक’’ तो यह स्पष्ट है कि वह स्थितियों को सांयोगिक या स्वतःस्फूर्त मानने की उस धारणा का खंडन कर रहे होते हैं जो मूल कारणों को अपने निहित उद्देश्यों की वजह से नेपथ्य में रखती है ताकि ‘आकस्मिकता’ का यह संसार अपनी ‘निरन्तरता’ में बनाये रखा जा सके, लेकिन घटनाओं या स्थितियों को पहले से ही निर्धारित मानने का अर्थ कवि की दुनिया में किसी नियतिवाद की ओर बढ़ना नहीं है। यह केवल हमारे उस चल रहे परिदृश्य को समझना है जिसने हमारे ‘अंतःकरण के आयतन’ पर एक धुँधलका बिछा दिया है और मनुष्य को एक ‘विस्तृत शिकारग़ाह’ में एक वध्य स्थिति में ढकेल दिया है। इस शिकारग़ाह से ही गोधरा फूटता है, निठारी जन्म लेता है या फिर सद्दाम की फाँसी जैसी घटनाएँ, जहाँ नैतिकता एक तमाशबीन की तरह थके-हारे लोगों का संलाप बन जाती है। एक कवि को इस नुमाइशी, जड़ीभूत और अभ्यस्त हो चुकी नैतिकता की आत्मबद्ध संकीर्णता से ऊपर उठकर अपने प्रतिरोध के स्वर को मुखर करना होता है, यह जताते हुए कि कवि की आत्मा की चिल्हकन जब तक देश की आत्मा की चिल्हकन से नहीं जुड़ती तब तक मनुष्यता के शव पर ‘महाभोज’ का यह आयोजन चलता ही रहेगा - ‘‘और अब वहाँ चील हैं, गिद्ध हैं/ चील पहले से ही हैं/ हड्डियों में बचे/ तोले भर मांस की आशा में / जबकि गिद्ध जुट रहे हैं/और उनकी आँखों में/ ज़िन्दा गोश्त चमक रहा है।’’

समकालीन हिन्दी कविता की एक प्रमुख विशेषता उसका सांप्रदायिकता के मुद्दे को काव्य संवेदना में विस्तार से जगह देना है। अवध से जुड़ा रहा कवि जब इस विषय पर कुछ लिखता है, तो हमारा ध्यान अनायास ही इस तथ्य की ओर जाता है कि अवध का क्षेत्र इस अर्थ में बेहद संवेदनशील रहा है, जहाँ के जीवन से प्रतीकों को एक विशेष राजनैतिक व सत्तात्मक आग्रहों के लिए चयनित और विरूपित किया जाता रहा है। साम्प्रदायिक शक्तियों का वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था से गठजोड़ अब वैसा स्थूल और इकहरा नहीं रहा जिसे आसानी से लक्ष्य किया जा सके। इसने सूचना प्रौद्योगिकी, जनसंचार व बाज़ार की भाषा को हमारे दैनंदिन के यथार्थ और उसकी अभिव्यक्ति को अनुकूलित करने और राष्ट्रीय स्तर पर उसका एक प्रामाणिक पाठ निर्मित करने में एक माध्यम की तरह कार्य किया है। अनिल के संग्रह में ‘गुजरात 2002’ जैसी घटना को सीधे संबोधित करती वर्णन प्रधान कविताएँ हैं, तो ‘भेड़िए-एक’, ‘भेड़िए-दो’ और ‘इन दिनों’ जैसी अर्थ-संश्लिष्ट कविताएँ भी, जो समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिघटनाओं की वास्तविकता और उनके सूक्ष्म परिवर्तनों पर अपने को एकाग्र करती है - ‘‘चिड़ियाघर मेरी पत्नी की तरह/इस शहर की सच्चाई है/जिसने देखा है बंद पिंजरे में/आधा सच।/ एक ऐसा सच/जो ख़ामोश है/जिसके आतंक और दहाड़ को/नहीं जाना जा सकता/ लोहे की सींखचों के पीछे।’’

समसामयिक कविता लेखन की दृष्टि में प्रतिरोध का रास्ता अभिव्यक्ति व लेखन की विधाओं से होकर गुज़रता है, और व्यापक तौर पर अधिकांश लेखन-कर्म इस वास्तविकता को कभी सच्चाई तो, कभी थोड़े संशय के साथ स्वीकार भी करता है। यदि यह लेखन वृहत्तर समाज की पाठकीय पहुँच से बाहर हो, यदि यह एक सीमित अकादमिक उद्यम तक सिमट कर रह गया हो, तो प्रतिरोध की शक्ति कमतर होती है। यह अंतर्द्वंद्व और उससे बाहर निकलने की बेचैनी इन कविताओं में प्रकट होती है- ‘‘अनुभव की छाती पर /केवल विचारों का पंखा झलूँ/ यह मुझे मंजूर नहीं/जब जो जैसा देखता हूँ/बस लिखना चाहता हूँ।’’ यह देखने की बात है कि विचारों से अनुभव की ओर बढ़ती यात्रा विचारों को अपदस्थ नहीं बल्कि विचारों का हमारी आनुभविकता में सर्ज़नात्मक रूपांतरण करती है कि उसे सामान्य तौर पर लोगों के लिए संवेद्य बनाया जा सके। कवि को अहसास है कि सांप्रदायिकता से पुरज़ोर तरीके से लड़ते हुए कई बार सदिच्छा के सिवाय (मेरे पास कोई चारा नहीं/सिवाय इस सदिच्छा के/कि गुज़र जाये रात) कुछ नहीं होता तो कई बार प्रतिहिंसा की सीमा तक उफनता आवेग कि ‘‘आते रहे अनर्गल विचार/बुदबुदाता रहा अपने से/कि सामने वाले पर जड़ दूँ/ दो-चार तमाचे/और भरी भीड़ में उसे गाली दूँ।’’ कविताओं, चिट्ठियों और आलेखों के लिखे जाने के स्थान पर तमाचे जड़ने और अपशब्द कहने का यह नव्य-बोध क्या नागरिक दायित्व की पूर्ति कर सकता है? इसकी निरुपाय ईमानदार अभिव्यक्ति कुछ अन्य सम्भव रास्तों की खोज़ का एक अर्थपूर्ण संकेत भी हो सकती है। कविताओं में प्रकट होते ये सारे अंतर्द्वन्द्व कवि को समकालीन जटिल और सूक्ष्मतर होती सामाजिक सच्चाइयों के बरअक़्स उसकी सृजनगत कठिनाइयों के साथ पारदर्शी व वस्तुपरक ढंग से खड़ा करते हैं।

प्रसिद्ध चेक लेखक मिलान कुन्देरा अपने एक उपन्यास में कहते हैं कि ‘‘सत्ता और स्मृति में हमेशा एक द्वंद्वमूलक संघर्ष रहा है।’’ सत्ता, वह राजनैतिक संरचना की हो या फिर सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना की; उसमें विस्थापन और विलोपन की एक बाध्यकारी शक्ति हमेशा सक्रिय रहती है। विलोपन या अवचिह्नीकरण की प्रक्रिया एक साथ कई संस्तरों पर घटित होती है, जिनकी सूक्ष्मताओं को समझ पाना बहुधा आसान नहीं होता। एक कवि के तौर पर अनिल त्रिपाठी सत्ता की इस बुनियादी संरचनात्मक अवधारणा को थोड़ा और व्यापक करते हुए उसे आधुनिकता के विकास प्रतिरूपों तक ले आते हैं। यहाँ आधुनिकता के संकट की पड़ताल उस उत्तरआधुनिक ज़मीन पर नहीं है जहाँ अर्थों (अर्थसूच्यों) की एक असमाप्य संचरणशीलता दिये गये ‘पाठ’ की क्रीड़ा भूमि बन जाती हो, बल्कि यह पड़ताल उस प्राक्आधुनिक ज़मीन पर है जिसमें काल से अतीत हो जाने का जोख़िम तो है लेकिन मनोरंजन के उपभोक्तावादी संसार में ‘अर्थातीत’ होने का नहीं - ‘‘जो हमारे भरोसों के साथी थे/आओ उन्हें सहेजे/और कुछ उपाय करें/ताकि न टूटे/ ज़िन्दग़ी का ज़रूरी नाता/मसलन कुएँ और बावड़ी/जिन पर सबसे ज्यादा है/तकनीक की मार/भले ही आज जो लगते हैं/ सबसे अधिक प्रासंगिक।’’

संग्रह की अनेक कविताओं में ये चिन्ताएँ और भी घनीभूत होती हैं-कभी चेतावनी के लहज़े में, कभी सहज-निश्छल ग्राम्य जीवन को पुनरायत्त करने के संवेदन क्रम के रूप में, तो कहीं नागरिक होने की उस प्रतिबद्धता के रूप में जो पर्यावरण और सामाजिक संवेदन से लेकर भाषा व अभिव्यक्ति के मौलिक रूपों तक को अपने में समेटता है। चीज़ों को बचाये रखने का निरंतर कवि सुलभ प्रयास किसी संग्रहालय की ओर अपने क़दम बढ़ाना नहीं है बल्कि यह मानवीय जीवन को उसकी समग्रता में उन चीज़ों के साथ देखना है जिसकी उपस्थिति हमारे समकालीन अनुभव बोध में लगातार अप्रासंगिक और हाशियाकृत होती जा रही है- ‘‘चेतना की ओरदावन तो/सबसे बेशक़ीमती है/और जो सबसे बेशक़ीमती है/ज़ाहिर है सबसे सख्त/ज़रूरत भी उसी की है।/क्योंकि मेरे समय की/खाट बहुत ढीली है’’ विकास के इस तीव्रतम समय में जबकि चेतना को सर्वाधिक उन्नत होना था, मनुष्य और उसके जीवन को उसकी समूची सम्भावनाओं के साथ ध्वनित करते हुए, यह विडम्बना ही है कि समय के एकायामी विस्तार ने उसे अन्य दिशाओं से विभक्त या अवधी के एक ठेठ देशज प्रयोग में ‘विकल’ कर दिया है। चेतना के लिए ‘ओरदावन’ का यह बिम्ब बेहद मार्मिक है, इस बात को समझने के लिए कि मानवीय प्रज्ञा का समस्त भार आधार के रूप में उसी पर है और सड़ांध से बचने का निष्क्रमण भी सम्पूर्णतः वही पर। यह संयोग नहीं कि मध्यकालीन भक्ति कविता में ‘ओरदावन’ शब्द उसके पूरे काव्य रूपक के सन्दर्भ में एक बीज-शब्द की तरह बार-बार व्यवहृत हुआ है। हमारे आधुनिक समय में, जब सामाजिक सम्बन्धों के सृजन और उसकी अभिव्यक्ति के रोज़ ही नये बाज़ार समर्थित उल्लासपूर्ण ‘सोशल मीडिया’ के केन्द्र विकसित हो रहे हैं, यह विडम्बनापूर्ण है कि माँ, पिता या अन्य निकटतम सम्बन्ध हमारे जीवन और उसकी अर्थवत्ता के लिए निरर्थक और अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ़ की दावत’ की याद आती है जिसमें अतिथियों के वैभवपूर्ण स्वागत के सन्दर्भ में माँ को एक समस्या समझकर उसे एक कोने में डाल दिया गया है- ‘ठीक हमारी परम्पराओं की तरह’। आधुनिक सभ्यता के इस आलोचनात्मक कथा रूपक को अनिल ने कविता के भीतर भाषा के रूपक में इस तरह स्थानान्तरित किया है कि नये सन्दर्भों में वे हमारे अस्तित्व के लिए अपरिहार्य हो उठते हैं। विश्वास और विडम्बना का सहवर्ती ‘अंडरटोन’ इन कविताओं की तनावपूर्ण संरचना को उसकी पूरी लम्बाई में संतुलित करता है- ‘‘वे हर्फ़ों की दुनिया में/रेफ़ की तरह हैं/जो कभी-कभार ही आते हैं काम/लेकिन वे होते हैं विकल्पहीन/जिनके बिना/शब्द हकलाने लगते हैं।’’

परिवार और सामाजिक सम्बन्धों की ऊष्मा इन कविताओं की संवेदना की मुख्य पहचान है। यह केदारनाथ सिंह, रघुवीर सहाय, त्रिलोचन और सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की काव्य परंपरा का सहजवर्ती विकास है जिसमें घर-परिवार और गाँव-मिट्टी की भीनी गंध भी है और मकरा व रहीम मियाँ जैसे आधुनिकता-दंशित उपेक्षणीय चरित्रों का वह सन्दर्भ भी, जो कविता के देशकाल को हमारी भाषा व संवेदना के भूगोल में अवस्थित करता है। अनिल त्रिपाठी के इस नये संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता उनका भाषा के उस रूप का पुनराविष्कार है जिस पर संज़ीदगी से समकालीन कवियों ने प्रायः कम ही ध्यान दिया है। संग्रह की कई कविताओं जैसे ‘आ- धार’, ‘तैयारी’ या ‘खिलेगा तो देखेंगे’ आदि में हिन्दी के अन्य लेखकों की काव्य-पंक्तियों को जोड़कर एक नये तरह का ‘अन्तर्पाठ’ बनाने की कोशिश है जो समकालीन हिन्दी कविता लेखन की एक विरल काव्य प्रवृत्ति है। यह कविता का कविता से एक नया संवाद बनाने का प्रयत्न भी है जो उन्हें साहित्य के एक वृहद् भूगोल में पारस्परिक साझेदारी के साथ खड़ा करता है।

अचानक कुछ नहीं होता (कविता संकलन): अनिल त्रिपाठी, प्रकाशकः शिल्पायन, दिल्ली, मूल्यः 150 रुपये

5/4/75 ए, लक्ष्मणपुरी कॉलोनी (बिस्किट बेकरी के सामने) अमानीगंज, फैजाबाद-224 001

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अपनी जड़ों की तलाश

सुरेश सेन निशांत

कविता लिखना उतना आसान नहीं, जितना दिखता है। सरल कविता लिखना तो और भी कठिन। एक जोख़िम भरी गली से गुज़रने जैसा...। सबसे बड़ा डर यह बना रहता है कि सरलता के चक्कर में कहीं आप बयानबाज़ी का शिकार तो नहीं हो रहे हैं। कहीं आपकी कविता छोटे-छोटे वक्तव्यों का कोलाज बनकर तो नहीं रह गयी है। दूसरी सबसे बड़ी बात, सरलता के चक्कर में कुछ आलोचकों या कविता समीक्षकों की नज़र में चुक जाने का या आउट डेटेड दिखने का डर बना रहता है। यह डर ही है जो आज के बहुत से युवा कवियों को उनकी राह से भटका रहा है क्योंकि इधर कुछ इस तरह की कविताओं और कवियों को एक पोल्टीकल ऐजेंडे के तहत प्रमोट किया जा रहा है जिनकी कविता में समाज या लोक एक सिरे से गायब है...। कुछ इस तरह के कवि ख़ास चर्चा में आ रहे हैं जिनकी कविता की जड़ें अपने देश की माटी में हैं ही नहीं। विदेशी कवियों की भाव भूमि उन्हें जीने और कविता लिखने की जमीन मुहैया करवाती है और वे चर्चा में रहने के शॉर्ट कट से शॉर्ट कट रास्ते भी निकाल लेते हैं। उनकी कविता पढ़ने के बाद लगता है, जैसे वे इस देश में पैदा ही नहीं हुए हैं। उनकी कविता का सच हमारे समाज के सच से कोसों दूर है। उनके लिए विचारधरा, वर्गीय संघर्ष, जीने की ईमानदारी सब फ़िजूल बातें हैं। भले ही चर्चा में रहने के लिए वे अपनी एक-आध कविता पर प्रगतिशीलता का ठप्पा लगवा लें।

मगर अभी भी ऐसे कवि हैं जो अपनी जड़ों की तलाश में लगे हैं, जिन्हें अपनी नहीं, अपने जन की फ़िक्र है। जो सच उनकी कविता में दिखता है, वही सच समाज में भी दिखता है। वे अपने को दूर विदेशी भूमि में नहीं, अपितु अपनी परम्परा में तलाश करते हैं, उससे अपने आप को जोड़ते हैं। वह परम्परा जो कबीर, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल में दिखती है। सतीश नूतन का कविता संग्रह ‘घोंसला चिरई का’ पढ़ते हुए यह आश्वस्ति जगती है कि अभी भी ऐसे कुछ कवि हैं जिनकी कविता सामाजिक हलचलों से अपना रूप ग्रहण करती है, उनके पक्ष में खड़े होकर हमसे इस तरह बतियाती है जैसे हमारा ही दर्द, हमारी ही कोई टीस कविता का रूप धरकर हमारे सामने आ बैठी हो। सतीश नूतन की कविताओं की सादगी हमें गाँव-घर के लोगों की सादगी लगेगी। उनकी सादगी में एक भोलापन है, लोकगीतों की एक लय है जो ‘बसन्त’ जैसी कविताओं में देखी जा सकती है। ‘‘हरि चाचा ने गाई/ प्रभाती/और उनके बथान के सामने वाले/ पीपल की साख पर/ चहचहा उठा बसन्त। / रमुआ ने उछाला/अपने बच्चे को/लहलहाती फ़सलों के बीच/ उसके अबोध चेहरे पर /खिलखिला उठा बसन्त।’’

इस बसन्त को देखने के लिए गँवई संस्कारों वाली आँख चाहिए। इसके लिए हमें अपने गाँव-ज्वार के बीच घूमना होगा। अपने आप से संघर्ष करते हुए एक विचारक के रूप में इनके पक्ष में खड़ा होना होगा। स्वयं से बहस करते हुए हमारे भीतर एक हलचल पैदा होती है, तब जाकर इस तरह की पंक्तियों का निर्माण होता है। यह बसन्त शहर की चमचमाती सड़कों पर नहीं दिख सकता। ये काफी हाऊसों की उथली बहसों में भी नहीं देखा जा सकता। इस बसन्त को देखने के लिए पाठक को भी अपने संस्कारों के साथ वैचारिक संघर्ष करना होगा। तब वह इस बसन्त में खिले हुए फूलों और मुस्कुराती पत्तियों को देख सकता है। तब कहीं जाकर उसे अबोध बच्चे की हँसी में सार्थकता नज़र आएगी।

सतीश नूतन की कविताओं की एक ख़ास बात यह भी है कि वे अन्डर टोन हैं। वे ज़रा भी लाउड नहीं हैं, अपितु संयत ढंग से बड़ी देर तक पाठक से बतियाती रहती हैं। ‘नूतन’ कविता में कम से कम शब्दों का प्रयोग करते हुए बहुत बड़ी बात कहने की कुव्वत रखते हैं। जैसे कि उनकी ‘थोड़ा सा’ कविता में देखा जा सकता है- ‘‘जब भी जाता हूँ/ झरने के पास/माँगने उल्लास/ थोड़ा सा/वह समा जाता है/ मेरी आँखों में।’’ यहाँ झरने को देखना संघर्ष करने की तरह है। एक पारदर्शी ईमानदारी है प्रकृति के साथ जुड़ने की, उससे उल्लास माँगने की। सतीश नूतन जहाँ समाज के नेगेटिव पक्ष के साथ सीधे-सीधे टकराते हैं, वही प्रकृति की शाश्वत चिंता से भी अपने को दूर नहीं रखते हैं अपितु उसके दर्द को अपने मन की पीड़ा से जोड़कर कविता रचते हैं, जो उन्हें बहुत से अपने समकालीन कवियों से अलग खड़ा करती है। ऐसा भी नहीं कि अपने आस-पास घटित बाज़ारवादी चमक, उसका प्रभाव उनमें बेचैनी पैदा नहीं करता। वे उस बेचैनी को भी शिद्दत से ‘जनसेवा एक्सप्रेस’ जैसी कविता में उकेरते हैं- ‘‘सीटी बजाते / डब्बों में लादे/ गाँव-गाँव की जवानियाँ/ चली जा रही जनसेवा/ सहरसा से पंजाब।’’ इस कविता को पढ़ते हुए बरबस अरुण कमल की एक कविता की पंक्तियाँ याद आ जाती हैं जिसमें उन्होंने पंजाब से कलकत्ता जाते हुए मज़दूरों का बहुत ही भावमय जीवन चित्रण किया है, पर इस कविता का निर्वहन नूतन ने जिस तरह किया है, वह कहीं भी अरुण कमल की उस कविता की कॉपी नहीं लगता अपितु उस कविता का, उस विस्थापन का अगला पड़ाव लगती है यह कविता। ‘‘हमारे टीसन पर रोज रुकती है/आज कुछ ज्यादा ही देर रुकी जनसेवा। ’’

‘जनसेवा’ का ज्यादा देर रुकना गाँव के ज्यादा लोगों का विस्थापन है। गाँव के और ज्यादा खाली हो जाने की सूचना है। इस कविता में शब्दों का चयन, इसकी लय पाठकों को देर तक मथती रहती है। यह मथना ही है जो इस कविता को यादगार बनाता है। नूतन की कविताओं में गाँव बार-बार आता है, जैसे चन्द्रकान्त देवताले जी की कविताओं में पत्थर और आग आती है, जैसे पाब्लो नेरूदा की कविताओं में समन्दर बार-बार आता है। अष्टभुजा शुक्ल ने सतीश नूतन की कविताओं के बारे में बहुत ही सटीक टिप्पणी की है- ‘‘एक पारदर्शी भाषा के साथ जीवन चिन्हों के सहारे कविता में प्रस्थान के लिए तैयार सतीश नूतन हमारे हिंसक समय से सामना करने के लिए प्रश्न उठाने वाले कवि हैं। परिपक्व होने के पहले का कच्चापन - यानि कि कविता का प्रथम पाठ उन्हें संभावनाशील बनाता है। ऐसे युवा कवियों का पहला संकलन हमें और हमारी हार्दिकता को आमंत्रित करता है।’’

घोंसला चिरई का (कविता संकलन), कविः सतीश नूतन, प्रकाशक : यश पब्लिकेशंस, दिल्ली-110032

गाँव- सलाह, डाकघर- सुन्दर नगर-1, तहसील सुन्दर नगर, जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश-175018

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विकास का सच : गायब होता देश

राकेश कुमार

कथाकार रणेंद्र का दूसरा उपन्यास है ‘गायब होता देश’। उपन्यास का शीर्षक एक विचित्र जिज्ञासा के भाव से पाठकों को भर देता है कि देश भी कहीं गायब होता है? पर मुंडाओं का ‘सोना लेकन दिसुम’ यानी सोने जैसा देश सच में गायब हो गया है। रणेंद्र इस उपन्यास के माध्यम से मुंडाओं के जल, जंगल, ज़मीन, भाषा और जीवन के जीवंत संघर्ष को पाठकों के सामने उपस्थित कर देते हैं।

डायरी और खोज़ी पत्रकारिता की शक़्ल मे लिखे गये, इक्यावन छोटे-बड़े अध्यायों में बँटे इस उपन्यास की शुरुआत होती है एक ख़बर से कि ‘किशनपुर एक्सप्रेस’ के पूर्व पत्रकार किशन विद्रोही की हत्या हो गयी है। प्राध्यापक के. के. झा से किशन विद्रोही और फिर बड़ी पूँजी के आतंक और दबाव में ‘टोटल चेंज’ जैसी भूमाफिया समर्थक पत्रिका के सम्पादक केके की हत्या की पड़ताल के दिलचस्प कथानक में बुनी यह कथा अनेक उतार-चढ़ाव के साथ आगे बढ़ती है। ‘किशनपुर एक्सप्रेस’ के पत्रकार किशन विद्रोही के पास नक्सल प्रभावित हीराहातु से ख़बर आती है कि पुलिस ने एक बड़े नक्सल नेता परमेश्वर पाहन को मार गिराया है। सम्पादक के कहने पर किशन विद्रोही वास्तविकता का पता लगाने निकलते हैं तो परत-दर-परत कहानी खुलती चलती है। और कहानी में ग्रीन एनर्ज़ी जैसी बड़ी कम्पनी के बाँध का विरोध करते आदिवासी सामने आते हैं। पूर्व सैनिक परमेश्वर पाहन और सोनामनी पाहन के संघर्ष से उसका परिचय होता है। बड़ी पूँजी, अपराध, भ्रष्ट राजनीति और प्रशासन का अमानवीय-अनैतिक गठजोड़ सामने आता है। वह अनुभव करता है कि किस प्रकार आदिवासी अधिकारों की बात करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को नक्सली और देशद्रोही करार दिया जाना कितना आसान है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत भी हो सकती है। रणेंद्र इस उपन्यास में उन हथकंडों को उजागर करते हैं जिनको अपना कर आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से बेदखल कर दिया जाता है। मुंडारी भाषा में बाहरी लोगों को इसीलिए दिकु कहा जाता है जो दिक करे या तंग करे वह दिकु। उपन्यास का एक पात्र वीरेन एक स्थान पर कहता है, ‘‘बाहर से जो भी आया, सबको जमीन की भूख, पैसे की भूख, ताकत की भूख, औरत की भूख, एक भूख हो तो बताया जाये।’’ इसी क्रम में अशोक पोद्दार, सविता पोद्दार, निरंजन राणा, विक्टर तिग्गा जैसे शोषकों के चेहरे भी सामने आते हैं जो बदलती हुई परिस्थितियों का लाभ उठाते हैं और निरंतर ताकतवर होते चलते हैं। राजनीति के अपराधीकरण का लाभ उठाकर पहले खनिज माफ़िया और फिर बिल्डर माफ़िया के सामने आदिवासी निरंतर अकेले पड़ते चले जाते हैं पर संघर्ष करते रहते हैं। उपन्यास में अंत तक आते-आते कई अपराधी और उनसे नाभिनालबद्ध पूँजीपति एक-दूसरे को मरवा देते हैं। कथा का अंत अत्यंत नाटकीय तरीके से होता है जहाँ आदिवासी अपने आदिम हथियारों से लैस होकर शोषकों का अंत कर देते हैं। इसे ही उलगुलान कहा गया है, जिसे क्रांति कहा जा सकता है।

यह उपन्यास निजीकरण, उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में बहुमूल्य खनिजों, अयस्कों, कोयले और रियल एस्टेट के लिए आदिवासियों की ज़मीनों की बड़े कॉरपोरेटों द्वारा की गयी खुली लूट का सवाल उठाता है। यह सवाल उठाता है कि देश के तथाकथित विकास के लिए आदिवासियों को उनकी कुर्बानियों के एवज में क्या दिया गया है? यह सवाल उठाता है कि अपनी ज़मीन से बेदखल आदिवासी क्यों शहर किनारे बहते नालों के पास स्लम्स में रहने के लिए मजबूर हैं? ऐसे स्लम्स में जहाँ बजबजाती गंदगी के बीच भूख, बीमारी, बेराज़गारी और अपराध ही पनपते हैं। उपन्यास में किशन विद्रोही की डायरियाँ और उनके पत्रकार शिष्य राजेश की खोजी पत्रकारिता यथार्थ को उसके कठोर और बर्बर रूप में हमारे सामने रख देती है। यह उपन्यास मुख्यधारा के इतिहास को चुनौती देता है। यह उपन्यास उन बंद तहखानों के दरवाज़े सरकाता है जिनके पीछे निवेश-विकास-प्रगति के बड़े रथ के पहियों के नीचे दबे लोगों की दास्तान बंद है। किशन विद्रोही अपनी डायरी में लिखते हैं,‘‘हमने सदियों से बंद तहखानों के ढक्कन को सरका दिया है। घुप्प अंधेरे में सीढ़ियों से नीचे उतरते ही रोने, कलपने, चीखने-कराहने की आवाज़ों से दीवारें हिलती सी जान पड़ती थीं। यह रोना, कराहना दर्द से चीखना तो युगों से जारी था बस हमी थे जिन तक ये आवाज़ें अब तक नहीं पहुँच पायी थीं।’’ कौन है जो इन चीखों को दबा देना चाहता है? कौन है जिसे इन चीखोें के दबे रहने में लाभ है? दरअसल स्वाधीनता संग्राम के समय में जिस पत्रकारिता ने भारतीय जनता के संघर्ष और मुक्ति की आकांक्षा के परचम को सहारा दिया, भारतीय जनता की दुर्दशा और ब्रिटिश शासन के शोषण को देश के सामने उजागर किया, आज़ादी के बाद उस पत्रकारिता का वही हश्र हुआ; जैसा कि राजनीति का हुआ। जहाँ मूल्यों का स्थान मुनाफ़े ने ले लिया। एक ऐसा समय, जहाँ सब कुछ बाज़ार के अनुसार चलता है। जहाँ सहमति-असहमति, संघर्ष और उसका दमन, बर्बरता और मानवता, हिंसा और शांति सभी कुछ अख़बार को चलाये रखने के लिए और अपने ख़रीददार मध्यवर्ग की क्षणिक क्रांतिकारिता तथा तथाकथित ‘सच’ का साथ देने की भावना का लाभ उठाने के लिये किये जाने वाले प्रयास भर हैं। शायद उनका वास्तविक मूल्य मात्र इतना ही है। ‘किशनपुर एक्सप्रेस’ भी तभी तक उन चीखों, कराहटों को सुनता है जब तक बाज़ार में उसका ‘सच’ बिकता है। आदिवासियों का संघर्ष जब तक अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ाता है, तब तक अख़बार उसके साथ होता है मगर जैसे ही प्रबंधन को यह लगता है कि अब आदिवासियों का संघर्ष सर्कुलेशन नहीं बढ़ा रहा, वैसे ही सब कुछ अख़बार के पिछले पन्नों पर धकेल दिया जाता है। किशन विद्रोही को ‘किशनपुर एक्सप्रेस’ से बाहर का रास्ता तथा माफ़िया की मदद कर सफल होने का मंत्र सिखा दिया जाता है। जहाँ यह उपन्यास पत्रकारिता के अँधेरे हिस्सों को रोशनी में लाता है, वही मध्यवर्गीय सुविधाजीविता को भी कटघरे में खड़ा करता है। उपन्यास में जहाँ एक ओर भ्रष्ट तंत्र और अपराधी पूँजी के गठबंधन का लाभ उठाने वाले निरंजन राणा, नवल पांडे, नरेश शर्मा और पोद्दार जैसे पात्र हैं जो भले ही लूट के व्यवसाय में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हों पर भीतर से एक हैं। वही आम आदिवासी के लिए संघर्ष करते सोनामनी पाहन, सोमेश्वर सर, अनुजा पाहन, नीरज पाहन, एतवा मुंडा जैसे पात्र हैं, जो किसी भी कीमत पर संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ना चाहते। ‘गायब होता देश’ दमन और शोषण के अनगिनत रूपों से परिचय कराता है। राजनीतिक या सांस्कृतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक पूर्वाग्रहों के अनेक चित्र उपन्यास में दिखाई देते हैं। जैसे आरक्षण को लेकर पूर्वाग्रह के विषय में एतवा ठीक ही कहता है,‘‘ बाकी उ वक्त मिडिल इस्कूल में एगो मिसिर मास्टर थे। भारी मरखंड। जान-बूझकर गरीब घर के होशियार बच्चा सब को डेंगाते रहता। ई कोल लोग आठो क्लास पढ़ जाएगा तो रिजर्वेशन से मास्टर बन जाएगा। हमरे कुर्सिया पर बैठने लगेगा। ये ही बात रहे-रहे सुनाता। खजूर छड़ी से धुनते समय अऊर जोर से चिल्लाता, देखो ई कोल-बकलोल को, मास्टर बनेगा, अयं! मास्टर बनेगा रे?’’ शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार के पूर्वाग्रहों के कारण ही अनेक आदिवासी-दलित बच्चे पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर कर दिये जाते हैं।

रणेंद्र इस उपन्यास में मुंडाओं के आदिम इतिहास, संस्कृति, रीति-रिवाज़, लोक आस्थाओं और मिथकों को अत्यंत रोचकता के साथ वर्णित करते हैं। जहाँ प्राचीन भूमि लेमुरिया को आदिवासी अपनी स्मृतियों में अत्यंत स्नेह से याद करते हैं। लेमुरिया की साझा संस्कृति, भाषा और लोक विश्वास के कारण अफ्रीका, भारत, ऑस्ट्रेलिया के एबोरिजिन एक ही बड़े परिवार का हिस्सा थे। प्रकृति और उसके प्रत्येक कण में अपने ईश्वर सिंगबोंगा के स्वरूप को देखने वाले आदिवासी समुदाय के मानवीय लोक विश्वास रणेंद्र के वर्णन में जीवित हो उठते हैं। परंतु रणेंद्र कहीं भी आदिवासी समाज में आयी विकृतियों का महिमामंडन नहीं करते। आदिवासी समाज के विषय में यह माना जाता है कि वहाँ स्त्रियाँ अन्य मध्यवर्गीय स्त्रियों की अपेक्षा कहीं अधिक स्वतंत्र हैं परंतु आदिवासी समाज में भी पुरुष मुख्यधारा के समाज के पुरुषों से कम शक्तिशाली नहीं हैं। औरत वहाँ भी उपेक्षित और शोषित है। उपन्यास में अनुजा कहती है, ‘‘अरे रमा क्या कहें? मुंडा मर्दों पर बहुत ही गुस्सा आता है। अब चूँकि खतियान में मर्दों का नाम है, सो वारिस भी अपना खांटी खून होना चाहिए। लेकिन मर्द कुछ भी करने को आज़ाद। उसके लिए हरम बनाने की परम्परा ख़त्म थोड़े हुई है।.... खूब ज़मीन-जायदाद वाले मुंडा-मानकी साहब लोग भी घर में गोमकाइन (पत्नी) के रहते एक नचनी भी रखते हैं... हमारे मालिकों ने तय कर दिया कि औरतें हल नहीं चला सकतीं, पाटा नहीं दे सकतीं, छप्पर नहीं छा सकतीं, तीर-धनुष, कुल्हाड़ी नहीं चला सकतीं, कपड़ा-खटिया नहीं बुन सकतीं।

ससन मसान में नहीं जा सकतीं।’’ यही नहीं, मुख्यधारा की संस्कृति के शुद्धतावाद ने मुंडाओं को भी नहीं छोड़ा। रही-सही कसर संचार माध्यमों के प्रभाव ने पूरी कर दी है। बॉलीवुड सिनेमा और टीवी धारावाहिक ने आदिवासियों को अपने इतिहास तक से काट दिया है। रणेंद्र इस उपन्यास में परिवेश की सत्यता के लिए कहीं भी बोली, भाषा और आंचलिकता का छौंक नहीं लगाते बल्कि उनके यहाँ अंचल पूरे अपने जैविक या ऑर्गेनिक रूप में उपस्थित हुआ है।

उपन्यास में एक कथा किशन विद्रोही और अनुजा के प्रेम की भी है। यह पूरा प्रसंग प्रेम के बैंगनी रंग में रंगा हुआ है और एक खुशबू की तरह किशन विद्रोही की डायरियों में जहाँ-तहाँ बिखरा हुआ है। इन प्रंसगों में रणेंद्र का कवि उपन्यासकार पर हावी हो जाता है। वैसे तो उपन्यास का लगभग हर अध्याय एक कवितांश से शुरू होता है, पर इन प्रसंगों के वर्णन तक में कविता ही कविता दिखाई देती है। एक प्रसंग में रणेंद्र लिखते हैं, ‘‘मैं यूँ ही बैंजनी फूलों का गुच्छा थामे खड़ा रहा। गीले रंग के कारण मेरे जूते फर्श से चिपक गये थे...। धीरे-धीरे आवाज़ें प्रकट हुईं...धीरे-धीरे दीवारों से रंग उड़ने लगा...फर्श-सीढ़ियों और दरवाज़ों से भी बैंजनी रंग उतर गया। हथेलियों के बीच दबा फूलों का गुच्छा न जाने कब चुपके से काग़ज़ के पन्नों में बदल गया, लेकिन हाथों का रंग बदस्तूर कायम था।’’ इस उपन्यास में रणेंद्र ने आदिवासी गीतों, मजाज़, परवीन शाकिर, फज़ल ताबिश, भवानी प्रसाद मिश्र, नागार्जुन, दिनेश कुमार शुक्ल जैसे शायरों, कवियों के बेहतरीन कवितांशों से अध्यायों की शुरुआत करते हैं। यही नहीं अध्यायों शीर्षक भी बड़े ही मानीखेज़ हैं। जैसे ‘ख़ामोश क़दमों की आहट’, ‘बोलती तसवीर और तारों भरी डायरियाँ’, ‘सांवरी बदरी और अँधेरी घाटी’, ‘जलावतनी और सिसकती रूहें’... आदि ये शीर्षक लगभग पूरे अध्याय की तासीर बयान करते से दिखायी देते हैं।

रणेंद्र इस उपन्यास में हिंसा के अनेक रूप दिखाते हैं। आदिवासी संस्कृति के दूषण की हिंसा, विकास के लिए ज़मीन बेदख़ली की हिंसा, भाषा की हिंसा, बलात्कार और अपमान की हिंसा, राजनीति के विकृत रूप की हिंसा, दवाओं के ट्रायल के लिए आदिवासियों के प्रयोग की हिंसा, सपनों, आकांक्षाओं, और आज़ादी को कुचलने की हिंसा, पत्रकारिता के आदर्शों और मूल्यों के क्षरण की हिंसा। इतनी हिंसा के बाद यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या रणेंद्र हिंसा का समर्थन करते हैं? क्या वे नक्सलियों की तरह हिंसा को ही हिंसा से मुक्ति का साधन मानते हैं? नहीं, ऐसा नहीं है। रणेंद्र वास्तव में हिंसा का विकल्प निरंतर दिखाते चलते हैं। वह है समानता और स्वतंत्रता के विचारों का आदर करने का विकल्प। देश के संसाधनों के समान वितरण का विकल्प, भ्रष्ट राजनीति के बरक़्स मूल्याधारित जनसेवा का विकल्प, प्रकृति के अंधाधुंध दोहन के विपरीत प्रकृति के साथ सामंजस्य का विकल्प। रणेंद्र उपन्यास में एक ऐसे भारत का विचार सामने रखते हैं जहाँ किसी भी भारतवासी को यह न लगे कि वह भारत माता का सौतेला बच्चा है। पर सवाल यह है कि नक्सलवाद के आंतक का तिरस्कार करने बाद भी क्या देश नई धरती सबकी धरती के विचार को स्वीकार करेगा?

गायब होता देश (उपन्यास), लेखक : रणेंद्र, प्रकाशक- पेंगुइन, दिल्ली

ई-112, आस्था कुंज अपार्टमेंट्स, सेक्टर-18 रोहिणी, दिल्ली-110089

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  1. अति सुन्दर सामग्री एवं प्रस्तुतीकरण , ऐसी रचनाये रचनाकार में प्रकाशित करने के लिए श्री रवि श्रीवास्तव जी धन्यवाद के पात्र हैं

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