सोमवार, 19 जनवरी 2015

यशवंत कोठारी का व्यंग्य - सरकार और सेंसर

ताज़ा व्यंग्य

सरकार और सेंसर

सरकार है  और सरकार का   सेंसर बोर्ड  है. जो सरकार के हिसाब से चलता है. नहीं  तो इस्तीफे की गंगा में बह जाता है. मेरा सवाल है कि केवल फिल्मों के लिए ही सेंसर बोर्ड क्यों. जब दुनिया भर के चैनलों पर  बिना सेंसर के अश्लील धारावाहिक प्रसारित हो रहे हैं, तो फिर फिल्मों को सेंसर करने का क्या मतलब रह जाता है, समाचारों के चैनलों को छोड़ कर सभी चैनलों को सेंसर के दायरे में नहीं लाया जा सकता तो फिल्मों पर से  भी सेंसर के प्रमाणीकरण की   क्या जरूरत है. लेकिन सरकार जानती है कि सेंसर बोर्ड में काम अटकने से बहुत से काम   सधते हैं। बोर्ड  को स्वायत्तता है, लेकिन नियुक्ति सरकार के हाथ में है। बोर्ड की साख खत्म है, भ्रष्टाचार का  बोलबाला है, अक्सर सवाल उठते  हैं, लीकेज   सिपेज की ख़बरें आती रहती हैं और सरकार का बोर्ड कछुए की गति से चलता रहता है.

 

सेंसर  के करता धर्ता  क्या करते हैं, कैसे करते   हैं यह किसी से छिपा नहीं है. सेंसर के नाम पर  दलीलें होती हैं, दलाल होते हैं., दलाली होती है, वहां वो सब है जो ऐसे कामों में होता है.

सामाजिक जिम्मेदारी के नाम पर  क्या क्या नहीं होता, ए  को यू  में बदलना,   यू  को ए  में बदलना , और अपना उल्लू सीधा करना

 

१९१८ में बना यह बोर्ड प्रासंगिकता खो चुका है.  इसे भी योजना आयोग के रास्ते पर भेज दिया जाना चाहिए. भारतीय सिनेमा के भी अच्छे दिन आने चाहिए. सेंसर के काटे गए सीन तक बाद में जोड़ दिए जाते हैं , फिर सेंसर का क्या औचित्य है , वैसे फिल्मों से ज्यादा बोल्ड तो सीरियल्स हो गए हैं, वो कल्चर खत्म हो गया है जिसमें पूरा परिवार एक साथ फिल्म देखता था, फिर महीनों फिल्म की चर्चा होती थी.  अब फ़िल्में शुक्रवार से शुक्रवार  तक चलती हैं , करोडो अरबों का व्यापार है, और सेंसर बोर्ड की पांचों उँगलियाँ घी में व् सर कड़ाही में।

 

पकडे जाते हैं, फिर बोर्ड में घुस जाते हैं नीति आयोग की तरह ही सेंसर बोर्ड के स्थान  पर एक फिल्म नीति आयोग की जरूरत है. वैसे भी सरकार करे तो संपादन, जनता करे तो सेंसर। एक बार एक सरकार ने सेंसरशिप लगाई थी, जनता ने सरकार को ही नकार दिया. बोर्ड को विचार और राजनीति दूर रखा  जाना चाहिए.  सरकारों को विचार    की राज नीति    के स्थान पर जन समस्याओं की , विकास की राजनीति करनी चाहिए.

 

सेंसर और संपादन की बहस पुरानी हैं , आगे भी चलती रहेगी मगर क्या सेंसर बोर्ड की कोई जरूरत है. जब जरूरत ही नहीं हैं तो जनता के पैसे की बर्बादी क्यों।

अक्सर फिल्म देखने का कारण  ही सेंसर बोर्ड होता हे, यदि सेंसर का  हल्ला न हो तो आदमी फिल्म देखने क्यों जाये, क्या देखे, क्या चर्चा करे?

सेंसर बोर्ड के कारण  ही डाइरेक्टर, हीरो, होरोइन फिनेन्सर सब की किस्मत खुलती है, या फिर फिल्म डब्बे में बंद रह जाती है.  दोस्तों फिल्म देखने का एक मात्र कारण  सेंसर बोर्ड हैं इसे मार दिया जाये या छोड़ दिया जाये.

फिल्मों में मारधाड़, हिंसा, सेक्स के अलावा कुछ नहीं  होता यदि सेंसर बोर्ड चाहे तो  दफ्तर पर ही एक फिल्म बना सकता है. यह फिल्म सुपर-डुपर हिट होगी. क्या ख्याल है आपका .?

--

यशवंत कोठारी ८६ , लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बहार, जयपूर ३०२००२ मो-०९४१४४६१२०७

फोनः 9810058431 एवं 9868967552.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------