मंगलवार, 27 जनवरी 2015

प्रमोद भार्गव का आलेख - बाघों की वृद्धि अच्छी खबर

बाघों की वृद्धि अच्छी खबर


प्रमोद भार्गव
    देश में लुप्त हो रहे बाघों की संख्या बढ़ रही है,यह अच्छी खबर है,वरना 2006 के आसपास तो हालात ऐसे बन गए थे कि बाघों के किताबों और फिल्मों में ही सिमटकर रह जाने की उम्मीद जताई जाने लगी थी। क्योंकि सारिस्का और पन्ना बाघ आरक्षित क्षेत्रों में एक भी बाघ शेष नहीं रह गया था। प्रत्येक 4 साल में बाघों की गिनती होती है। पिछले दो मर्तबा से यह गणना खुश-खबरी दे रही है। गोया,2006 और 2010 के बीच जो गिनती हुई,उसके अनुसार बाघ 1411 से बढ़कर 1706 हुए और फिर 2010 से 2014 के गिनती के परिणामों ने बाघों की संख्या 2226 तक पहुंचा दी। मसलन बीते 4 सालों में बाघों की वृद्धि में 30 प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि यह गिनती भी अभी संपूर्ण और विश्वसनीय नहीं है,क्योंकि एक तो इसमें पूर्वोत्तर के राज्यों और मध्यप्रदेश के सतपुड़ा बाघ आरक्षित वनों की गिनती दर्ज नहीं है। दरअसल यह गिनती अभी की ही नहीं की गई है। दूसरे,नक्सल प्रभावित राज्य ओडीसा और झारखंड की गिनती भरोसे लायक नहीं है,क्योंकि इन क्षेत्रों के बाघ रहवास वाले सभी वन-खंडों में न तो कैमरे लगाए जा सके हैं और न ही वन-कर्मचारी दुर्गम इलाकों में नक्सलियों के भय के चलते पहुंच पा रहे है। जाहिर है,यदि जारी की गई गिनती सटीक है तो बाघों की संख्या इस गिनती से कहीं और ज्यादा है ?


    इस बार बाघों की गणना के आंकड़े वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जारी किए। इस अवसर पर खुशी जाहिर करते हुए उनका कहना था, ''दुनियाभर में बाघों की संख्या घट रही है,जबकि भारत में बढ़ रही है। यह हमारी बाघ सरंक्षण की दिशा में सफलता की कहानी है। इस पर हम गर्व कर सकते हैं।' इस बार कर्नाटक,उत्तराखंड,मध्यप्रदेश,तमिलनाडू और केरल में बाघों की संख्या बढ़ी है। सबसे ज्यादा 406 बाघ कर्नाटक में,फिर उत्तराखंड में 346,मध्यप्रदेश में 308 और तमिलनाडू में 229 बाघ हो गए हैं। इन राज्यों में क्रमशः 35.33,52.42,44.43 और 40.49 फीसदी की दर बढ़त दर्ज की गई है। बावजूद ओडीसा और झारखंड में बाघ घटे है। बाघों की गिनती बेहद जटिल और जोखिम भरी है। क्योंकि बाघों का आवासीय क्षेत्रफल 3 लाख 78 हजार वर्ग किमी में फैला हुआ है। हालांकि इस बार की गिनती के नतीजे बाघ आरक्षित राज्यों के वन-प्रांतरों में लगाए गए 9,735 कैमरों के द्वारा खींचे गए छायाचित्रों के आधार पर आए हैं। राष्ट्रीय बाघ सरंक्षण प्राधिकरण ने दावा किया है कि भारत के पास 80 प्रतिशत बाघों की विलक्षण तस्वीरें हैं। दुनिया में कहीं भी इतने स्वचालित कैमरे लगाकर बाघों की न तो गिनती कर पाना संभव हुआ है और न ही फोटो खींचना। वाकई यदि ऐसा है तो यह काम अद्वितीय है,इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होना चाहिए।


    यदि गणना से छूट गए इलाकों में रह रहे बाघ भी गिनती में शामिल हो जाएं तो भारत में उम्मीद से कहीं ज्यादा बाघों की संख्या हो जाएगी। फिलहाल नक्सल प्रभावित ओडीसा एवं झारखंड में संपूर्ण बाघों की गिनती नहीं हो पाई है। 2010 की गिनती के मुताबिक ओडीसा में 32 और झारखंड में 10 बाघ थे। जबकि 2014 के मुताबिक इनकी संख्या घटकर ओडीसा में 28 और झारखंड में 3 रह गई है। 2010 की गिनती इन क्षेत्रों में पंरपरागत पद्धतियों से की गई थी। तब 2006 की तुलना में नक्सली क्षेत्रों में बाघों संख्या बढ़त में दर्ज की गई थी। लेकिन तब इस गिनती पर यह सवाल भी उठा था कि जब इन दुर्गम जंगलों में नक्सलियों के भय से वनकर्मी प्रवेश ही नहीं कर पा रहे हैं तो गिनती कैसे संभव हो गई ? इसलिए वन्य जीव प्रेमियों व पर्यावरणविदों ने अंदाज लगाया था कि यह गिनती अनुमान आधारित है। हालांकि नक्सली भय का दूसरा पहलू यह भी है कि इन इलाकों में शिकारियों का भी प्रवेश वार्जित है,इसलिए निसंदेह इन जंगलों में वास्तविक गणना हो जाए तो बाघों की आशातीत वंशवृद्धि देखने में आएगी


    पूर्वोत्तर के राज्यों में भी गिनती नहीं हो पाई है। जबकि यहां अकेले सुदंरवन में 80 बाघों के होने का अनुमान हैं। सुदंरवन का बड़ा इलाका दलदली क्षेत्र होने के कारण पहुंच से बाहर है। इस अभयारण्य में पतवार से चलने वाली छोटी नावों से ही चलना संभव हो पाता है। दलदली और उथला क्षेत्र होने के कारण मोटर वोंटे यहां चल नहीं पाती। नरभक्षी बाध भी इसी सुदंरवन में सबसे ज्यादा हैं। क्योंकि इस इलाके के जो मूल निवासी है,उनकी आजीविका इस दलदली पानी से मछली बटोर कर चलती है। ऐसे में बाघ इन लोगों का आसानी से भक्षण कर लेते हैं। इसलिए यह इलाका नरभक्षी बाघों के लिए वरदान बना हुआ है। और इसी वजह से यहां कभी भी बाघों की गणना विश्वसनीय नहीं रही।

 

मध्यप्रदेश में नौकरशाही की मनमानी के चलते सतपुड़ा बाघ सरंक्षण क्षेत्र में बाघों की गिनती का काम ही शुरू नहीं हो पाया है। होशंगाबाद,छिंदवाड़ा और बैतूल जिलों के 2200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में यह अभयाण्य फैला हुआ है। वनाधिकारियों को ऐसा अनुमान है कि इस क्षेत्र में 50 बाघ हो सकते हैं। बाघों के आवास,आहार और प्रजनन के लिए इस वनखंड को एनटीसीए ने देश के 10 प्रमुख बाघ संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों में से तीसरे स्थान का दर्जा दिया हुआ है। इस गिनती के पहले बाघों की गणना और सर्वक्षणों से जुड़े जो प्रतिवेदन आते रहे हैं,उनको यदि प्रामाणिक मानें तो 90 प्रतिशत बाघ आरक्षित बाघ अभयारणयों के बाहर रहते हैं। इन बाघों के संरक्षण में न वनकर्मियों का कोई योगदान होता है और न ही बाघों के लिए मुहैया कराई गई धनराशि बाघ सरंक्षण के उपायों में खर्च होती है। इस तथ्य की पुष्टि 2010 की बाघ गणना जारी करते हुए तात्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने भी की थी। उन्होंने कहा था,'नक्सल प्रभावित जो जंगल हैं,जिनमें वन अमले की पहुंच मुमकिन नहीं हैं,वहां और ऐसे अन्य जंगलों में बाघों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि हुई है। लेकिन इनमें से ज्यादातर क्षेत्रों में गिनती संभव नहीं हो सकी है। यह हकीकत इसलिए भी उचित लगती है क्योंकि कि श्योपूर के कूनो-पालपूर अभयारण्य,शिवपुरी के माधव राष्ट्रीय उद्यान और मुरैना के जंगलों में हर साल बाघ की आमद दर्ज की जाती है,पदचिंह लिए जाते हैं,किंतु गिनती में इस क्षेत्र में मस्ती मार रहे बाघों को शामिल नहीं किया जाता। दरअसल एक बार गिनती में आने के बाद जंगलों में स्वछंद मटरगस्ती कर रहे बाघ पर निरंतर नजर रखना मुश्किल काम होता है,इसीलिए वनाधिकारी अपने कार्यक्षेत्रों में बाघ की उपस्थिति को टालते हैं,जिससे जिम्मेबारी से बचा जाए।


    2010 की बाघ गणना का सबसे शर्मनाक पहलू यह था कि सारिस्का और पन्ना अभयारण्यों में एक भी बाघ की आमद दर्ज नहीं की गई थी। इसके उलट 2006 से 2010 के बीच सारिस्का में 24 बाघों के मारे जाने और पन्ना में 16 से 32 बाघों के अवैघ शिकार कि पुख्ता खबरें आई थीं। इनकी पुलिस रिपोर्टें भी हुई थी। किंतु अब देश के सर्वाधिक सुरक्षित इन दोनों ही उद्यानों में बाघ की आमद दर्ज कर ली गई है। इससे उम्मीद जगी है कि कालांतर में मध्यप्रदेश का 'टाइगर स्टेट' का दर्जा बहाल हो जाएगा। फिलहाल कर्नाटक ने यह दर्जा मध्यप्रदेश से हासिल कर लिया है।


    बाघों की भविष्य में संख्या इसलिए और बढ़ सकती है,क्योंकि बाघ के अवैध शिकार और इसके अंगों की तस्करी के अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े तस्कर संसारचंद्र और ठोकिया का अंत हो गया है। पारदी जैसी जनजातियां जो वन्य-जीवों के शिकार से ही आजीविका चलती थी,उन्होंने कानून के भय के चलते अपना धंधा जड़ी-बूटियों तक सीमित कर लिया है। साथ ही बाघ सरंक्षण की दिशा में न्यायालय,स्वंय सेवी संस्थाएं और आरटीआई कार्यकर्ता भी सजग हुए हैं। जनहित याचिकाएं लगाकर बाघ जैसे दुर्लभ प्राणियों के सरंक्षण की दिशा में अह्म पहलें की है। बावजूद 2013 में 63 और 2014 में 66 बाघ मारे गए हैं। इनमें से 10 फीसदी बाघों की ही आपसी झगड़े में अथवा स्वाभाविक मौतें हुई हैं, बांकि तो शिकारियों के हत्थे ही चढ़े है।
पर्यटन के लिए अभयारणय क्षेत्रों में होटल,मोटल,रिजॉर्ट व मनोरंजन पार्क बनाए जाने के विस्तार पर प्रतिबंध जनहित याचिकाओं के माध्यम से ही लगा है। इसी तर्ज पर इन अभयराण्ओं में चल रही खनन परियोजनाओं को नियंत्रित किया गया है।

इस लिहाज में उधानों में बाघों की जो संख्या बढ़ी है,उसके लिए वन अमले के इतर उच्च और सर्वोच्च न्यायालय,स्वंय सेवी संगठन और आरटीआई कार्यकताओं की भूमिका भी सराहनीय रही है। केंद्र व राज्य सरकारें यदि पर्यटन से होने वाली आय को थोड़ा सीमित कर लें और बाघ के अंदरूनी अवास स्थालों तक पर्यटकों की पहुंच प्रतिबंधित कर दें तो अगली बाघ गणना में यह संख्या और बढ़ सकती है।

 

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

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