सोमवार, 19 जनवरी 2015

शशांक मिश्र भारती का आलेख - लोक साहित्य : अतीत की आवाज

 

मानव को अनुरंजित व आनंदित करने वाले लोक साहित्य की परम्परायें प्रत्येक देश व समाज में पायी जाती हैं। लोक साहित्य द्वारा ही युग-युग की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिचय हमें मिलता है।

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक तथा एक समुदाय से दूसरे समुदाय तक पहुंचने वाले लोक साहित्य की परम्परायें आज हम तक पहुंची हैं। यही वह कड़ियां हैं, जिन्होंने हमें इतिहास की लुप्त होती हुई कड़ियों को जोड़ने में सहायता पहुंचायी है। अतीत को वर्तमान से जोड़कर उसमें परस्पर समन्वय स्थापित करना इस साहित्य की एक अलग विशेषता रही है, जिसके परिणाम स्वरूप ही यह केवल सांस्कृतिक धरोहर एवं बीते हुए कल की आवाज मात्र न होकर आज भी जीवन्त सर्जना है। आज लोक साहित्य, वाणी है, इसी कारण लोक साहित्य का महत्व शैक्षणिक एवं ऐतिहासिक क्षेत्रों में भी स्वीकार कर उपयोग किया जाता है।

लोक साहित्य शब्द अंग्रेजी के फोकलोर शब्द का अनुवाद है, जिसका सर्वप्रथम प्रयोग अंग्रेजी के विद्वान विलियम टाम्स ने किया था। इसी फोकलोर के समकक्ष हिन्दी में लोकसाहित्य शब्द का प्रयोग किया जाता है। भारतीय लोक साहित्य जनता के व्यापक जनसमूह की सभी मौलिक सर्जनाओं का परिणाम है। यह केवल लोक काव्य या गीतों तक ही न सीमित न होकर जनता के जीवन धर्म, संस्कृति तथा परम्पराओं से भी जुड़ा हुआ है। फिर भारतीय लोक साहित्य की विशालता के समक्ष शिक्षितों का साहित्य दाल में नमक के बराबर भी नहीं है। आवश्यकता है तो बस इसके संग्रह की। लोक साहित्य जनता के कंठों में देश के सभी राज्यों, भाषाओं और छोटी-छोटी बोलियों के रूप में भरा हुआ है।

आज का लोक साहित्य कल के लोक मानस की मौखिक सर्जना का परिणाम है। इसमें मानवता के विकास की उस समय की संस्कृति निहित एवं सुरक्षित है, जिस समय समाज में लेखन पद्धति का प्रादर्भाव भी न हुआ था और मनुष्य अपनी सर्जनाओं को मौखिक ही कण्ठस्थ कर लेता था, इसीलिए लोक साहित्य एक ऐसा पालना है कि जिसमें लेखन प्रणाली से पूर्व की मानव संस्कृति की अमूल्य निधि, धर्म, दर्शन, संस्कृति, परम्परायें, रीति -रिवाज, लोकाचार, संस्कार, कर्मकाण्ड, नृत्यगान काव्य -कथायें, नाटक आदि झूलते और खेलते रहे हैं।

लोक साहित्य में काव्य कला संस्कृति और दर्शन सभी कुछ एक साथ है।यह शब्द विनिमय का प्रथम कला पूर्ण प्रारम्भ भी है, जिसके द्वारा यंत्र -मंत्र, जंत्र -तंत्र, पहेली, मुहावरे, लोकोक्तियों, लोककथाओं, गीतों आदि के रूप में प्रत्येक जाति अपनी जीवन पद्धति और उसकी प्रणालियों को आगे आने वाली पीढ़ी को सौंपती रही है यही कारण है कि इसमें प्राचीन युग का साहित्य, धर्म दर्शन, विश्वास, संस्कार, कर्मकाण्ड तथा काल आदि सभी कुछ एक साथ प्राप्त होता है और इसी के द्वारा किसी भी देश, समाज व जाति की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक तथा बौद्धिक उन्नति को समझा जा सकता है।

लोक साहित्य एक ओर जनता की भावनाओं की अभिव्यक्ति है, तो दूसरी ओर सामूहिक जन -जीवन की रचना भी है। जोकि जनमानस के दैनिक जीवन में फैली हुई है। यह सामूहिक कार्यक्रमों, पुत्र जन्मोत्सव, अन्नप्राशन, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाह के गीतों में स्पष्ट हो जाती है। विभिन्न प्रकार के गीतों के साथ भिन्न -भिन्न संस्कार, कर्मकाण्ड, अकारण नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कहीं न कहीं और कुछ न कुछ महत्वपूर्ण कारण अवश्य छिपे हैं।

लोक साहित्य एक ओर जनता की भावनाओं की अभिव्यक्ति है, तो दूसरी ओर सामूहिक जन -जीवन की रचना भी है; जोकि जनमानस के दैनिक जीवन में फैली हुई है। यह सामूहिक कार्यक्रमों, पुत्र -जन्मोत्सव, अन्नप्राशन, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाह के गीतों में स्पष्ट हो जाती है। विभिन्न प्रकार के गीतों के साथ भिन्न -भिन्न संस्कार कर्मकाण्ड अकारण नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कहीं न कहीं और कुछ न कुछ महत्वपूर्ण कारण अवश्य छिपे हैं।

लोक साहित्य की समस्त सामूहिकता इन्हीं गीतों में बिखरी है जिसमें जनता का काफी बड़ा भाग अपनी रचनात्मक प्रतिभा के लिए उपयोग हेतु सुअवसर पाता है, जिसके परिणामस्वरूप ही इन गीतों का वस्तु -विषय, कथ्यशिल्प आदि लोक मानस में प्रवेश कर जाता है।

यही कारण है कि लोक साहित्य में इतिहास को इतिहास के ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जाता जैसा कि इतिहासकार करते हैं। वास्तव में लोक साहित्य कला काव्य संस्कृति और दर्शन का एक सुन्दर, स्वरूप है, जिसमें रचनाकारों की कल्पना और उनके आदर्शों का समावेश रहता है ।जो सिर्फ प्राचीनता को ही प्रकट करता है।

लोक साहित्य इतिहास को एक प्रतिबिंब की भांति प्रस्तुत करता है। जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन इतिहास की भांति न कर सामान्य जनता के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया जाता है। फिर लोक साहित्य की रचना जनता के ही कुशल शिल्पियों ने की है जो जनता की स्मृति में खो गये, लेकिन अपनी पहचान समाज में फैली हुई लोक कृतियों में छोड़ गये तथा जो जनता के मध्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरन्तर चलती और विकसित होती रही।

लेकिन आज की शिक्षा प्रणाली के प्रसार के कारण हम अपने ही देश, समाज व संस्कृति की प्राचीन परम्पराओं से दूर हो गये हैं और थोड़े से शब्दों की कोठरी में कैद हैं। उन शब्दों की परिधि हमें अपने ही देश में विदेशियों सा बनाये हुए है। इसीलिए यह प्रश्न उठता है कि वह देश कहां है जहां वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, बाणभट्ट, भवभूति जैसी महान विभूतियों की आत्माएं निवास करती हैं। कहां गयीं वे संस्कृति की परम्परायें जिन पर देश व समाज आज भी गर्व करता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भौतिकवादी रहन -सहन से अपने देश की परम्पराओं, संस्कृति, सभ्यता से दूर हो गये हैं अथवा हमारे अल्पज्ञान का विशाल अभिमान देश को शान्ति प्रदान करने वाली उस हवा का आनन्द लेने नहीं देता अथवा हमारे बीच विदेशी संस्कृति -संस्कार और भाषा लोहे की दीवार बने खड़े हैं यही वह प्रश्न हैं जोकि विवश करते हैं कुछ सोचने के लिये जिनके कारण हम काफी दूर खड़े हैं अपनी भाषा, संस्कृति और सभ्यता से।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोक साहित्य अतीत की आवाज मात्र ही न होकर ऐसी कड़ी भी है जिसके अध्ययन के बिना किसी भी देश, समाज व संस्कृति से परिचित नहीं हुआ जा सकता है।

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शशांक मिश्र भारती हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 उ.प्र.

shashank.misra73@rediffmail.com

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