शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

राजीव आनंद का आलेख - स्मृतिशेष : आर के लक्ष्मण के कार्टून बोलते थे

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(कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण और आम आदमी का कार्टून)


आर के लक्ष्मण का नाम कार्टून का पर्याय बन गया था, सोमवार 26 जनवरी को उनकी कलम हमेशा के लिए रूक गई लेकिन पांच दशकों लंबी फैली उनकी कार्टून स्ट्रिप हमारी बहुमूल्य धरोहर है। आम आदमी के सुख-दुख, सपनों और इच्छाओं को उनके बनाए चरित्र 'कॉमन मैन' ने दुनिया के सामने रखा। लक्ष्मण की खासियत यह थी कि उन्होंने हमेशा ताकतवर पर तंज किया और आम आदमी के साथ खड़े दिखे। लक्ष्मण का 'आम आदमी' राजसता को हर रोज आईना दिखाता रहा। चेक का कॉलरदार जैकेट, धोती व गोल ऐनक पहने सिर पर थोड़े से सफेद बालों वाला बूढ़ा इंसान एक वाक्य में ही सब कुछ कह जाता था, जिसे कहने में अखबार की खबर भी कभी-कभी कम पड़ जाती थी। पांच दशकों से अधिक समय से अपने कार्टून 'कॉन मैन' के जरिए लक्ष्मण ने भारतीय समाज और राजनीति के तमाम पहलुओं को उकेरा। सही मायने में वे आम आदमी के प्रखर प्रवक्ता थे


    अखबारों में विचारों को कार्टून के माघ्यम से एक धारदार हथियार बनाने वाले लक्ष्मण ने किसी को नहीं बख्शा, उनके कार्टून बोलते थे। शब्द कैसे तलवार से भी तेज हो सकते हैं, यह उनके कार्टूनों में देखा जा सकता है। लक्ष्मण के कार्टून की लोकप्रियता इतनी थी कि उनकी बीमारी के दौरान उनके पुराने कार्टूनों को प्रकाशित किया जाता था। उनकी जगह खाली नहीं छोड़ी जा सकती थी। लक्ष्मण की कला और कार्टून के प्रति प्रतिबद्धता से आज के कार्टूनिस्टों को बहुत कुछ सीखना चाहिए। उनके लिए कार्टून ही जीवन था, वह हमेशा कार्टून में ही डूबे रहे। यह समर्पण कार्टूनिस्टों की आज की पीढ़ी में न के बराबर है, आज कमाई मुख्य लक्ष्य बन गया है। लक्ष्मण की लगन और प्रतिबद्धता का ही नतीजा था कि वे पांच दशकों तक कार्टून बनाते रहे और लोगों द्वारा सराहे भी जाते रहे।


    लक्ष्मण के कार्टूनों की दुनिया इतनी विस्तृत है कि उसमें समाज, साहित्य, राजनीति, धर्म, अर्थ सभी समाए हुए हैं। लक्ष्मण रचित 'आम आदमी' भारतीय आम आदमी का सुख-दुख, मायूसी, सपनों, इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करता नजर आता है। लक्ष्मण के 'कॉमन मैन' की लोकप्रियता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2007 में वोरली में कॉमन मैन की प्रतिमा लगायी गयी थी तथा 2011 में कॉमन मैन की आठ फीट की एक प्रतिमा पुणे में लगायी गई थी।


    24 अक्टूबर 1921 को जन्मे रासीपुरम लक्ष्मण अपने छह भाईयों में सबसे छोटे थे तथा 'मालगुडी डेज' के रचियता आर के नारायण के छोटे भाई थे। स्कूली शिक्षा के बाद मुम्बई के प्रसिद्ध जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में दाखिले के लिए आवेदन किया तो स्कूल के डीन ने उन्हें स्कूल में दाखिल होने की योग्यता न होने के कारण उनका आवेदन खारिज कर दिया। उसके बाद उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल की। शिक्षा खत्म होने के बाद मुबंई के 'द फ्री प्रेस जर्नल' में राजनीतिक कार्टूनिस्ट के रूप में नौकरी शुरू की, बाद में 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से जुड़े। इसी अखबार में रहते हुए उन्होंने अपना प्रसिद्ध 'द कॉमन मैन' का चरित्र गढ़ा, जो देश की समस्याओं, लोकतंत्र के विकसित होते रूप, भ्रष्टाचार समेत जीवन के विविध पहलुओं को रेखांकित करता तकरीबन पांच दशकों तक तीक्ष्ण कटाक्ष करता रहा। लक्ष्मण ने 1954 में एशियन पेंटस ग्रुप के शुभंकर 'गट्टू' की रचना की, वहीं गुरूदत कृत हिन्दी फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज 55' में उनके कार्टून प्रदर्शित हुए तथा अपने बड़े भाई आर के नारायण की पुस्तक 'मालगुडी डेज' पर आधारित टेलीविजन धारावाहिक के स्केच भी उन्होंने तैयार किए। 1984 में जर्नलिज्म के लिए रेमन मैगसेसे पुरूस्कार तथा 2005 में पद्य विभूषण से सम्मानित किए गए।


    आर के लक्ष्मण भले ही आज हमारे बीच नहीं रहें लेकिन उनका गढ़ा 'आम आदमी' आज भी हमलोंगो के बीच अपना वजूद बनाए हुए है और भविष्य में भी बनाए रहेगा। उनकी स्मृति को विनम्र श्रदांजलि।

 

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंडा
गिरिडीह-815301, झारखंड

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