शनिवार, 24 जनवरी 2015

सावित्री काला का संस्मरण - नारी ही नारी की...

नारी ही नारी की ---------------

मैं अभी अभी कन्या जीवन दायिनी संस्था की कार्यशाला से आई ,वहां की प्रतिक्रिया अभी तक मेरे मन मस्तिष्क पर छाई हुई है |बड़ी बड़ी बातें की गयी किसी ने भ्रूण हत्या से सम्बंधित विचार रखे ,किसी ने आप बीती सुनाई |

किसी ने भावनात्मक पक्ष जाहिर किया ,किसी ने सामाजिक उत्तरदायित्वों पर जोर दिया | किसी ने कहा की बार बार गर्भ पात से नारी के मन शरीर व आत्मा तीनों पर प्रभाव पड़ता है |मैं जागरुक श्रोता बन कर उन महिलाओं के विचार सुनती रही|घर आकर मैंने माँ की तबियत के विषय में पूछा ,उन्हें दवाई दी ,थोड़ी देर उनके पास बैठी बातें की |फिर अपने कमरे में आकर सोचने लगी कि कन्या जीवनदायिनी का यह प्रयास किस लिए था | वहां पर करीब सभी महिलाएं चालीस कि उम्र से ऊपर ही रही होंगी |वे अब क्या बच्चे पैदा करेंगी |यदि आज की गोष्ठी का विषय सास बहु के संबंधों पर होता तो अधिक कारगर सिद्ध होता |बहु को बेटी के सामान मानने पर विचार विमर्श होता तो अधिक जागरुकता दिखाई देती | कन्या भ्रूण की हत्या तो ब्रह्म हत्या मानी गयी है |हमारे वेद शास्त्रों में भी कन्या को पूजनीय माना गया है |वह सर्व शक्ति शाली है तो जीवन में इतनी अशक्त क्यों हो जाती है |

"यत्र नरियस्तु पूजयंते रमन्ते तत्र देवता "शलोक से हम सभी परिचित हैं |फिर यह भ्रूण हत्या कब से शुरू हुई इस विषय पर एक विदुषी महिला ने अपने विचार रखे |उनका कहना था यह जघन्य कार्य इतिहास में मध्य काल से शुरू हुआ ,ख़ैर जब से भी शुरू हुआ हो आज हमारी बेटियां न घर में सुरक्षित हैं न बाहर |हमें सामाजिक सोच बदलनी होगी तभी हम इस भयंकर व्याधि से मुक्ति पा सकेँगे |कुछ महिलाओं ने कन्याओं के घटते अंकों पर तथा सामाजिक असंतुलन की विभीषिका पर जनता का ध्यान दिलाया |वास्तव में यह कार्यशाला कुछ हद तक तो सार्थक सारगर्भित व महत्व पूर्ण रही |फिर भी मैं क्यों चिंतित हुई |इस चिंता से मै क्यों परेशान होती रही |

यद्यपि मैने भी अपने विचार रखे ,तथा लोगों के प्रश्नों का भी अपनी बुद्धि के अनुसार उत्तर भी दिए |जिसका सभी ने खुले मन ने समर्थन भी किया |फिर भी मै घर आकर क्यों सोचती रही कि ,भ्रूण हत्या क्यों होती है ,दो दो मात्राओं की स्वामिनी नारी नर पर सदा से भारी रही है |ऐसा बड़े बड़े ऋषि मुनियों कवियों साहित्यकारों ने कहा है |क्या आज इस युग में उनका कथन असत्य सिद्ध हो रहा है |प्रतिदिन समाचारों में कन्याओं पर होने वाले बलात्कार अपहरण हत्या तथा तेजाब कांड के साथ साथ नर पिशाचों द्वारा अगवा करके कोठों में बिठाई जा रही हैं हमारी मासूम निरपराध बच्चियां |क्या इसका कोई निराकरण नहीं हो सकता |वे भी तो नारी के ही जाये होते हैं |उनके घरों में भी तो माँ बहिनें पत्नी व बेटी होती ही होंगी |फिर वे ऐसा जघन्य पाप क्यों करते हैं |उनकी आत्मा उन्हें ऐसा करने से रोकती क्यों नहीं ,मैं उस दिन बहुत देर तक इसी विषय पर ही सोचती रही |कभी तो पुत्र प्राप्ति के लिए भी महिलाएं भ्रूण हत्या के लिए मजबूर कर दी जातीं हैं |

मुझे याद है जब मेरा प्रसव समीप था ,मेरी सासु माँ ने जिसकी अपनी छै बेटियां थी ,मुझे कहलवाया कि अगर लड़की होगी तो मुझे मत सुनाना |मेरा सौभाग्य था कि मैने उनके घर में बेटे को जन्म दिया था |गोष्ठी में यह भी कहा गया कि नारी ही नारी की दुश्मन होती है |इस विषय पर काफी बहस भी हुई ,सभी ने पक्ष विपक्ष में अपने अपने विचारों से अवगत कराया |

में गोष्ठी में बैठे बैठे सोचती भी रही कि मेरे पूज्य पिताजी गुरुकुल के प्रकांड पंडित थे ,शाश्त्रार्थ में उनकी कोई भी बराबरी नहीं कर सकता था ,बड़े बड़े विद्वानों से वे निर्भीकता पूर्वक शाश्त्रार्थ किया करते थे | जब हिंदुस्तान व पाकिस्तान का विभाजन हुआ ,उससे कुछ दिन पहिले हम अपने ताऊजी के लड़के कि शादी में लाहौर से गढ़वाल अपने गांव नौटियाल गांव आगये थे |तभी विभाजन का दंश पूरे देश को झेलना पड़ा |हम भी उस दौर से गुजर चुके हैं ,हमारा सब कुछ वहीँ लाहौर ही छूट गया था ,काफी दिनों तक हम सब लाहौर को याद करते रहे |

हमारे पिताजी तो काफी दिनों तक वहां की आर्य समाज में रहे ,उनके जीवित रहने की खबर हमें बहुत दिनों के बाद मिली थी |हम दोनों बहिनों को पास के सरकारी स्कूल में दाखिल करा दिया गया था |हमारी दादी जी हमेशा हमारी माँ को बेटा भी होना चाहिए कहती रहती थीं |पुत्र प्राप्ति के लिए माँ से बैकुंठ चतुर्दशी का कठिन व्रत भी बड़े विधि विधान से गढ़वाल के प्रसिद्ध मंदिर में कराया गया |माँ कहती थीं कि भगवान शिव का व्रत तो फलीभूत हुआ ही था ,हमारे दो भाई भी हुए थे पर वे जीवित नहीं रह पाये |काफी दिनों तक जब दादी जी कि इच्छा कि पूर्ति नहीं हो पाई तो गांव कि महिलाओं ने दादी से कहना शुरू किया कि अपने कमाऊ बेटे का दूसरा विवाह करो तभी वंश आगे बढ़ेगा |मेरी भोली भाली दादी के दिमाग में उनकी बात आ गई |वे मेरे पिताजी के दूसरे विवाह कि तैयारी करने लगीं |मेरे पिताजी को जब इस बात कि सूचना मिली तो उन्होंने रातों ही रात हम दोनों बहनों तथा माँ को लेकर देहरा दून आर्यसमाज में आ गये |वे आर्य धर्म व एक पत्नी व्रत के पक्ष धर थे |उन्होंने दादी जी को भी बहुत समझाया ,जब वे नहीं मानी तब पिताजी ने यह कदम उठाया |

माँ को हमारे भविष्य की चिंता थी |वे विदुषी महिला थीं ,उन्होंने गढ़वाल में सब कुछ जोड़ दिया था |पिताजी ने कुछ खेत भी खरीदे थे ,काफी उपज होती थी ,हम वहां सम्पन्न थे |पर अपनी दो बेटियों के भविष्य की चिंता के कारण वे दादीजी की बात से सहमत नहीं थीं |तथा पिताजी के दूसरे विवाह के लिए भी राजी नहीं हुईं |पिताजी तो विवाह की बात सुनकर ही बहुत बिगड़े ,उसी रात हम पौड़ी आ गये |माँ ने भी सबकुछ गांव में ही छोड़ा तथा दो दिन पौड़ी में रह कर हम देहरादून आ गये |

यहाँ आकर माँ ने अपने आप भी पढ़ा और हम दोनों बहिनों को भी शिक्षित किया |दीदी की बी .ऐ .बी एड .करके शादी हो गयी ,मेरी बी ,ऐ .करके ही शादी कर दी ,मैने विवाह के बाद भी माँ की तरह अपनी पढ़ाई जारी रखी |दीदी को लैंसडौन में सरकारी स्कूल में नौकरी मिली | मैने भी बी.एड करके ऋषिकेश के सरकारी स्कूल में नौकरी शुरू की ,तथा नौकरी ,गृहस्थी व बच्चों के साथ इतिहास में एम ,ऐ , किया एम एड किया तथा एल .एल .बी ,भी किया |जब भी जीवन में समय मिला परीक्षा दे डाली निरंतर विद्याध्यन में ही लगी रही |आज सोचती हूँ क्यों कहते है लोग कि नारी ही नारी की दुश्मन होती है | यदि सकारात्मक सोच हो तो कभी कभी अभिशाप भी जीवन में वरदान बन जाता है ,और किसी के भी जीवन में परिवर्तन ला सकता है |अगर दादीजी पिताजी के दूसरे विवाह की जिद न करती तो हम तो गढ़वाल में ही रम गए थे |

हम दोनों बहिनें पढ़ तो वहां भी रहे थे |साथ साथ गांव में और बच्चों की तरह ,पानी दूर से लाते थे ,गांव के ढोरडंगर चराने जंगल जाते थे ,घास का गट्ठर सिर में रख कर जंगल से लाते थे |पर हम वहां पांच या आठ दर्जा से अधिक नहीं पढ़ पाते |आज हम दोनों बहिनें पोस्ट ग्रेजुएट हैं |तथा प्रशासनिक सेवा से निवृत होकर ,अपने अपने घरों में पेंशन भोगी हैं |कोई किसी तरह की कठनाई नहीं है |माँ व पिताजी की हमने ही पूरी देखभाल की है |

हमारे बच्चे भी खूब बड़ी बड़ी पोस्टों पर हैं ,माँ हमारे साथ ही हैं |बच्चे आते जाते रहते हैं ,नाना नानी को बहुत मानते हैं |हम भी दो बहिनें हैं ,मेरे बेटे की भी दो बेटियां हैं |जब हमारी छुटकी हुई थी तो चण्डीग़ढ के उस विशाल अस्पताल में नर्स जब बच्ची को लेकर मेरे पास आई तो मैंने मेरी जेब में जितने रुपये थे सब अपनी पोती पर न्योछावर कर दिए |उस नर्स की मुस्कान मेरे मानस पटल आज तक अंकित है |मानव को सदा सकारात्मक पहलू देखना चाहिए ,यही जीवन की सार्थकता है |यह बात मैं सुधि पाठकों पर छोड़ती हूँ ,कि क्या वास्तव में नारी ही नारी कि ........हमारे लिए तो हमारी दादी श्री हमारे जीवन में वरदान बनी हम उनके आशीर्वाद से ही आज हमारे परिवार सुखी समृद्ध तथा फल फूल रहें हैं |

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