बुधवार, 28 जनवरी 2015

अशोक गौतम का व्यंग्य - ये जो पायजामे में हूं मैं


मैं लालकिले के पास बस का इंतजार करता फटे पोस्टर में से निकलने वाले हीरो के बारे में सोच रहा था कि तभी भीड़ में से अचानक चार जने मेरी ओर लपके।  झक्क कुरते पायजामे में। सच कहूं,  मैंने ऐसे साफ सुथरे लागे कुरते- पायजामों में चुनाव के दिनों को छोड़कर आजतक नहीं देखे। क्या मजाल जो उनके कपड़ों पर एक भी दाग खुर्दबीन तक से दिख जाए।
गौर से देखा तो चुनावी सीजन के मित्र के साथ तीन  में से दो जने जो काफी मोटे तगड़े थे  तथा उन्हें देखकर ऐसा ही लग रहा था मानो मित्र ने उन्हें पाला ही चुनाव के दिनों के लिए हो।  तीसरे सिर पर भारी गांठ थी। जब ध्यान से देखा तो उसमें से कुरते- पायजामें  बाहर निकलने को बेताब!  सोचा, मित्र ने देश सेवा करने के धंधे के बदले कुरते- पायजामे बेचने का धंधा कबसे शुरू कर दिया होगा!


चुनावी मित्र ने  गले मिलने, हाय- हैलो करने के बदले उन दो मुस्टंडा वर्करों को  मेरी ओर नजरें घुमा टेढ़ी नजर से तिल भर इशारा किया कि चेहरे से ध्याड़ी पर लगने वालों  ने मुझे एक पल भी दिए बिना मेरी पैंट खींचनी शुरू कर दी तो मैं न चिल्लाने लायक न हंसने लायक।  चिल्लाऊं तो  किस पर? हंसू तो किस पर? 


बिन कोई पल गवांए इससे पहले कि मेरी पैंट का लालकिले के पास हरण हो जाता,  मैं जितनी अपनी पैंट को उनसे खींचने से बचाने की कोशिश कर रहा था, वे दोनों उससे भी अधिक कोशिश से मेरी पैंट उतारने पर उतारू थे।  लगा, आज लालकिले के पास महाभारत अपने को दोहराकर रहेगा। हे प्रभु! पहले आपने भरी सभा में द्रोपदी की लाज बचाई थी, अबके मेरी बचा दो तो समझूं कि भगवान कलियुग में भी  जनता की लाज बचाने आते हैं। हे प्रभु! इससे पहले की लालकिले के पास एक मर्द की पैंट खिंच जाए, कुछ करो प्लीज!  जीव तो आखिर जीव होता है। स्त्री -पुरूष तो बस सब माया का हेर- फेर है।


वहां पर सब खड़े - खड़े तमाशा देखते रहे, मुंह पर हाथ धरे हसंते रहे। वे मेरी पैंट खींचते रहे और मैं अपनी पैंट खींचने से बचाता रहा। पर कोई मेरी सहायता के लिए नहीं आया तो नहीं आया। आखिर जब  मेरे विरोध की तारें तड़कने को हुईं तो मेरे चुनावी मित्र आगे मुस्कराते बोले,'  थक गए??  पर यार! कैसे बंदे हो तुम भी ? हम चाहते हैं कि... और तुम हो कि....'
' मित्र! ये कैसी मित्रता है? अपने मुस्टंडों से मेरी पैंट खिंचवा रहे हो और वह भी .....'


' ये तुम्हारी पैंट नहीं खींच रह,े तुम्हारा सत्रहवां सस्ंकार कर रहे हैं,' मित्र ने मुस्कराते कहा और आंखों ही आंखों में मुझे और बेकार का विरोध न करने की सलाह दी,' बेकार में आपनी अनर्जी बरबाद क्यों कर रहे हो! चलो,अब इसे देश हित में लगाओ तो बात बने!'
' मतलब???'
' हम तो चाहते हैं कि तुम हमारी पार्टी का पायजामा पहनो और...... परे करो ये जनता वाली पैंट! पैंट वालों पर राज करो। हम तो तुम्हारे भले के लिए तुम्हारा कल्याण करना चाहते हैं  और एक तुम हो कि.... लालकिले से सामने भी विरोध जता रहे हो!.'
' पर देश सेवा तो पैंट पहने भी हो सकती है न मित्र? पैंट और पायजामे से देश सेवा का क्या संबंध?'


' है। ड्रेसकोड भी कोई चीज होती है कि नहीं? अब अगर पुलिसवाला खाकी नहीं पहनेगा तो  रहेड़ी- पटड़ी वालों को कैसे पता चलेगा कि हफ्ता वसूली वाला बंदा सही है? ऐसे ही जो  हम पैंट में देश सेवा करने उतर गए तो जनता को कैसे पता चलेगा कि बंदा देश चलाने वाला है या... दूसरे पैंट का साइज जितना हो  उसमें उतना ही पेट आता है। सिचुएशन के हिसाब से बड़ा छोटा पेट नहीं किया जा सकता। उसे मौके के हिसाब से  ढीला- तंग नहीं किया जा सकता। अगर उसमें साइज से बड़ा पेट रखने की कोशिश करो तो जनता को दिखने के  हंडरड परसेंट चांस होते हैं। बदनामी  का एकदम खतरा!  और पायजामे में नाड़े की सहूलियत होने से पेट जितना बढ़ा लो, बढ़ा लो पता ही नहीं चलता!
' मतलब???'
' मतलब यही कि आज हम तुम्हें तुम्हारी पैंट उतार अपनी पार्टी का पायजामा पहना कर रहेंगे,' कह उन्होंने अपने मुस्टंडों से जबरदस्ती करने की हिदायत दी तो मैंने  लालकिले की ओर दुहाई देते दोनों हाथ जोड़े। पर उस वक्त वहां था ही कौन जो मुझे बचाता?


सामने तीसरा अपने हाथ में पायजामा लिए मेरे आगे ऐसा लहरा रहा था जैसे कोई मरियल सांड के आगे लाल कपड़ा लहरा रहा हो।
मैंने एकबार फिर उनके आगे दोनों  हाथ जोड़ते कहा,' मित्र!  अगर तुम करना ही चाहते हो तो ऐसा करो कि मुझे अपनी पार्टी का पायजामा दे दो। मैं इसे  पैंट के ऊपर से पहन लेता हूं,' तो वे गुर्राते बोले,' नहीं! डुप्लीकेसी कतई नहीं। हमारी पार्टी में ये हरगिज नहीं चलता कि बंदा बाहर से कुछ और  हो और भीतर से कुछ और.... चलो, यार! जल्दी करो! घर जाने से पहले दस जनों की पैंट खींच उन्हें भी पायजामे पहनाने हैं।  हमारा आजका टारगेट है कि डिनर करने से पहले....'


' मतलब??'


'अरे यार! पार्टी सदस्यता अभियान है, और क्या?? अगर चुनाव न होते तो तुम्हें तो क्या, हम खुद पायजामा नहीं पहनते। चुनाव के बाद तुमने हमें देखा कभी पायजामे में? नहीं न!  खींचने को तो हम किसी और की पैंट खींच उसे पार्टी का  पायजामा पहना सकते थे , पर तुम दूर से दिख गए तो सोचा, अपने दोस्त की पैंट खींच उसे ही क्यों न पायजामा पहना स्वर्ग जाने का मौका दें... बहुत हुआ सौ -सौ के लिए जनता की फाइलें ऊपर की नीचे- नीचे की ऊपर करना। चलो शान से सत्र में कुर्सियां चलाओ और हीरो हो जाओ।  पर एक तुम हो कि.... इस देश में अगर किसीका भला करने की सोचो भी तो वह .... कैसे उद्धार होगा इस देश का ? '


और मैंने न चाहते हुए भी जमाने की आंखों पर पट्टी बांध  उनकी सहायता कर उनसे अपनी पैंट खींचवा दी


अशोक गौतम,
गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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