बुधवार, 14 जनवरी 2015

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - अहिंसा में सुशासन और सशक्त लोकतंत्र का संगीत

 

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

श्रमण सस्कृति के विश्व वैभव के प्रतीक जैन धर्म को किसी एक मतावलम्बी का धर्म नहीं कहा जा सकता। इसमें अखिल विश्व की मानवता का संगीत है। जो इसे मानता है यह उसी का है। इसलिए जरूरी है कि धर्म में दिखावा नहीं होना चाहिए,क्योंकि दिखावे में दुख होता है। भगवान महावीर स्वामी ने भी दुनिया को यही संदेश दिया था।

आज जब भी हिंसा का तांडव दीखता है साफ़ समझ में ये बात उत्तर जाती है कि महावीर स्वामी के संदेश, सिद्धांतों और विचारों पर चलकर ही शांति को पुनर्स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने हमेशा आपसी एकता और प्रेम की राह पर चलकर जियो और जीने दो तथा अहिंसा के भाव को सर्वोपरि रखा। धर्म का बंटवारा नहीं होना चाहिए। धर्मस्थलों और आश्रमों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है गरीबों और दीन-दुखियों की सेवा करना। 

वर्तमान समय में आतंकवाद, नस्लवाद, जातिवाद, नक्सलवाद,आपसी झगड़ों से संपूर्ण संसार ग्रसित है। चारों ओर हाहाकार मचा हो, प्राणीमात्र सुख-शांति, आनंद के लिए तरस रहा हो, ऐसे नाजुक क्षणों में सिर्फ महावीर स्वामी की अहिंसा ही विश्व शांति के लिए प्रासंगिक हो सकती है। उनकी अहिंसा केवल एक सन्देश नहीं बल्कि प्रकट जीवन मूल्य है। उसमें लोकतंत्र की ताकत और सुशासन की गरिमा निहित है। 

भगवान महावीर की वाणी को यदि हम जन-जन की वाणी बना दें एवं हमारा चिंतन व चेतना जाग्रत कर प्रेम, भाईचारा, विश्वास अर्जित कर सकें, तो भारत ही नहीं संपूर्ण विश्व में शांति स्थापित कर हम पुनः विश्व गुरु का स्थान प्राप्त कर सकते हैं। नेल्सन मंडेला से महात्मा गांधी तक ने भगवान महावीर की अहिंसा को अपनाया था।

भगवान महावीर स्वामी के बताए अहिंसा के रास्ते पर चलने से ही मानव जीवन का कल्याण संभव है। अगर मानव जीवन सार्थक करना है तो भगवान के अहिंसा रूपी शस्त्र को धारण करना होगा, सिर्फ नारे लगाने से, जय जयकार मात्र करने से फल नहीं मिलने वाला, जब तक संसारी प्राणी इसका अपने जीवन में पालन नहीं करेंगे। वर्तमान में चारों ओर अशांति की ज्वाला जीवन को प्रभावित कर रही है। ऐसे में महावीर का संदेश अपनाने से ही सुख और शांति की अनुभूति होगी। हम  संकल्प लें कि अपने मन, वचन, कर्म से किसी को दुख नहीं पहुंचाएंगे, तभी हम सुखी रह सकेंगे। धर्म दिखावे के लिए नहीं बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए है।

व्यक्ति पैसा कमाने के बाद भी आज अस्वस्थ और अशांत है। चारों ओर तनाव, चिंता और अशांति दिखाई देती है। ऐसे में धर्म विपरीत हालातों से उबार कर शांति देकर सही मार्ग पर ले जाता है। लेकिन दुःख इस बात का है कि धर्म को व्यवसाय और उद्योग का रूप दिया जा रहा है। हम इसके खिलाफ हैं। दरअसल धर्म जीवन जीने की वह विशुद्ध प्रक्रिया है जहां सुख और आत्मिक शांति का अनुभव होता है। यह मूलतः प्रभु की ओर बढ़ने का भाव है। आज के दौर में भगवान महावीर के सिद्धांतों को आत्मसात करने की जरूरत है। 

देश और प्रदेश में कई शहरों में धर्मस्थलों के नजदीक ही मांस, अंडे, शराब आदि की दुकानें नजर आती हैं। यह कृत्य किसी भी धर्म को मानने वाले की भावना के साथ खिलवाड़ है। इस मामले में सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए, क्योंकि जैसा हमारा आहार होगा वैसे ही विचार मन में आएंगे।  भगवान महावीर ने अपना पूरा जीवन परमार्थ के लिए लगा दिया। हमें भी उसी तरह विश्व कल्याण की दिशा में काम करना चाहिए। 

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लेखक यति यतनलाल अहिंसा राज्य अलंकरण से

सम्मानित और दिग्विजय कालेज के प्राध्यापक है।

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