सोमवार, 12 जनवरी 2015

प्रमोद भार्गव का आलेख - कार्टून पत्रकारिता का काला दिन

कार्टून पत्रकारिता का काला दिन


प्रमोद भार्गव
    कार्टून पत्रकारिता के इतिहास में 7 जनवरी 2015 काला दिवस के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। इस दिन पेरिस से निकलने वाली व्यंग्य-पत्रिका 'शार्ली एब्दो' के 12 पत्रकारो की दो इस्लामी उग्रवादियों ने नृशंस हत्या कर दी। इनमें पत्रिका के संपादक और व्यंग्य चित्रकार स्टीफन शाबेनियर भी शामिल थे। स्टीफन उदार वामपंथी पत्रकार थे। लिहाजा वे किसी भी मजहब से जुड़ी धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध थे। इसीलिए इस पत्रिका में जितना हमला इस्लामिक कट्टरता पर बोला जाता था,उतना ही ईसायत पर भी होता था। जबकि स्टीफन ईसाई थे। इसलिए यह हमला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ फ्रांस की सांस्कृतिक बहुलता और धर्मनिरपेक्ष शासन-व्यस्था पर था। इस क्रूरता के प्रतिक्रियास्वरूप न केवल फ्रांस में बल्कि संपूर्ण में यूरोप राष्ट्रवाद का स्वर मुखर होने की शंका बढ़ गई है। क्योंकि इस्लामिक उग्रवाद बहुसांस्कृतिक व बहुधर्मी देशों में धार्मिक एकरूपता लाने की दृष्टि से उभरता दिखाई दे रहा है


    स्टीफन अभिव्यक्ति की बैचेनी का शिकार हुए हैं। उनकी यह बेचैनी मानवता को उदार और सांस्कृतिक समावेशीकरण की दृष्टि से अह्म थी। इसी विवश्ता के चलते वे समय-समय पर अनेक धार्मों पर कार्टून के माध्यम से कटाक्ष करते रहे हैं। इस नजरिए से वे न केवल पैगंबर मोहम्मद बल्कि हर धर्म की विसगांतियों पर करारा कटाक्ष करते रहते थे। कुछ समय पहले ही स्टीफन ने केथोपिक ईसाईयों के ब्रहनचर्य से जुड़ी धारणा का कार्टून छापकर खिल्ली उड़ाई थी। इस कार्टून में ईसाई धर्मगुरू पोप डेनोडिक्ट गर्भ निरोधक हिलाते हुए दिखाया गया था।


    इस पत्रिका में फ्रेंच गणज्य के संस्थापक चार्ल्स द गॉल की कार्यशैली पर भी तीखे व्यंग्य चित्रों की श्रृखंलाएं छपी है। इस्लाम धर्म में किसी भी रूप में पैगंबर मोहम्मद की तस्वीर छापने पर प्रतिबंध है। बावजूद शार्ली एब्दों में 2006 में पैगंबर का कार्टून छापा गया। इसके अलावा अपने वामपंथी रुझान के वशीभूत स्टीफन ने इससे भी ज्यादा दुस्साहिक कार्य तब किया,जब उन्होंने 2007 में डेनमार्क के ऐ अखबार में प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद के उन विवास्पद कार्टूनों को भी छाप दिया,जिनका तल्ख विरोध मुस्लिम चरमपंथी कर चुके थे। इसके बाद से ही संपादक स्टीफन शाबोनियर को मौत के घाट उतार देने की धमकियां मिलने लगी थी। डेनमार्क में छपे कार्टूनों में से पेगंबर का एक कार्टून छापने की भूल देश के प्रसिद्ध पत्रकार आलोक तोमर ने भी की थी। तब वे सीनिया इंडिया के संपादक थे। इसे छापने के परिणामस्वरूप आलोक को जेल भी जाना पड़ा था। अभिव्यक्ति की आजादी का यह जवाब कानूनी प्रक्रिया के जरिए दिया गया था,इसलिए उचेत था। किंतु फ्रांस के पत्रकारों को बोली का उत्तर गोली से देकर चरमपंथियों ने साफ कर दिया है कि स्टीफन जो व्यक्त कर रहे थे,वह धार्मिक विसगंतियों का कटू यर्थाथ था। धमकी के बावजूद शार्ली एब्दों में आइएस आइएस के सरगना अबूबकर अल बमदादी का नए साल के उपलक्ष में कार्टून छापा था। इसमें बगदादी। शुभ कामना संदेश में कहता है,नए साल का जश्न मेरे कायदों के मुताबिक मनाओ जाहिर है,भय की काई भी लक्ष्मण रेखा उनकी अभिव्यक्ति की बेचैनी का दाबा नहीं पाई।


    फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सहिष्णुता की बुनियाद 1779 में प्रसिद्ध क्रांतिकारी वाल्टेयर ने रखी थी। विचार-स्वतंत्र के इसी आलोक में स्टीफन ने फ्रांसीसी लेखक माइकेल होलबेक के 'सबमिशन उपन्यास' का भी उपहास उड़ाया था। वह इसलिए,क्योंकि इस उपन्यास में जनता से आग्राह किया गया था कि फ्रांस 2022 तक इस्लामी कठमुल्ललाओं के मातहत हो जाएगा। क्योंकि देश में जिस रफ्तार से इनकी आबादी बढ़ रही है और ये अपनी नस्ल,धर्म,भाषा और पहनावे की पहचान को स्थापित करने के दुराग्रहों से जुड़े हैं,उसके चलते यह आशंका निर्मूल नहीं हैं। किंतु बहुसांस्कृतिका एवं बहु- धार्मिकता के पक्षधर स्टीफन ने इस गल्फ-गथा का विरोध किया। इससे फ्रांस के संविधान में दर्ज सांस्कृतिक बहलता के प्रति उदात्त आस्था की पुष्टि होती है। लेकिन फ्रांस में सक्रिय आतंकवादियों ने स्पष्ट कर दिया कि विचार स्वतंत्रता की भावनांए उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती है। प्रतिरोधी अवाज को बर्बरतापूर्वक खामोश कर देना और दूसरों पर अपनी चरम दक्षिणपंथी सोच थोपना ही,उनका एकमात्र धर्म है। ऐसा इसलिए है,क्योंकि इन चरमपंथियों ने न तो अपने धर्म से सीख ली है और न ही अन्या सहिष्तावादी धर्मों से ? यदि पैगंबर मोहम्मद के आदर्शों से ही आतंकवादियों ने कुछ सीखा होता तो अभिव्यक्ति का बदला पत्रकारों की निर्मम हत्या करके न लिया होता। एक यहूदिन स्त्री पैगंबर पर रोजाना मेला फेंका करती थी। एक दिन जब उन्होंने इस मैला फेंकने वाली स्त्री को सामने नहीं पाया तो वे बेचैन हो गए। जानकारी लेने पर मालूम हुआ कि वह स्त्री बीमार है। तुरंत पैगंबर उसके घर पहुंचे उसकी दवा-दारू दी। कबीर ने भी निंदकों को निकट रखने की बात कही है। लेकिन जो खुद जिन्हें विश्व-प्रणोता स्वयंभू होने का भ्रम हो गया है,उन्हें सेदेशों से सीख लेने की क्या जरूरत ?


    इस सब के बावजूद तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि लोकतांत्रिक व्यव्स्था में कहने,लिखने और व्यंग्य चित्र बनाने की छूट चाहे तिजनी क्यों न हो,विचार-स्वतंत्रता की स्व-नियमन से ही सही,सीमाएं तो तय करना ही होंगी। जिससे धर्म-संस्कृति के बहाने किसी व्यक्ति और समुदाय को ठेस न लगे। इस दुष्टि से शार्ली एब्दो आतिवादी अतिक्रमण का भी शिकार होती रही है। ऐसा ही हमारे यहां हाल ही में 'फॉबर्ड प्रेस'पत्रिका ने देवी दुर्गा और महिषासुर राक्षस के अशोभनीय व गैरपरंपरागत चित्र छापकर किया है,जो बिना किसी अश्लील दुर्भाव के धर्म, संस्कृति,समाज और राजनीति पर व्यंग्य कसने में दक्ष हैं। वास्तव में यही वे कार्टून होते हैं, जो देखने व पढ़ने पर तो चेहरे पर मुस्कान लाते हैं,जो देखने उसमें लक्षित वक्रोक्ति संदर्भ से जुड़ी विसंगाति का यथार्थ प्रगट करती है। बावजूद ये हमले वैश्विक समाज के लिए चेतावनी है कि  इस आतंक के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई लड़ी जाकर ही सभ्य दुनिया को सुरक्षित रखना संभव होगा। अन्यथा चरमपंथी क्रूरताएं जख्म हरे बनाए रखने में लगी ही रहेंगी।

 


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

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