शनिवार, 24 जनवरी 2015

राजेश कुमार पाठक की कहानी - रिक्शावाला

               

                रिक्शावाला
    बी.ए. की परीक्षा पास कर रवि घर में बरसों से बेरोजगार बैठे रहकर जिंदगी गुजारना मुनासिब नहीं समझा। अपने पिता के गुजर जाने के बाद घर की देखरेख की जिम्मेवारी स्वतः उस पर आ गयी थी। घर में एक छोटा भाई था जो नवमी क्लास में एक सरकारी स्कूल में पढ़ रहा था। एक माँ थी जो थेड़ी बहुत सिलाई-कढ़ाई का काम घर पर रहकर ही कर लिया करती थी। रवि भी कुछ घरों में टयूशन पकड़ रखा था जिससे काम भर रूपये-पैसे का जुगाड़ हो जा रहा था। परंतु इन सब से दिन-ब-दिन बढ़ रही मंहगाई से निजात पाना संभव नहीं दिख रहा था।
    रवि के मन में एक विचार आया कि वह क्यों नहीं बगल के शहर में जाकर जहाँ कि उसके पहचानने वाले नहीं हो टयूशन के साथ-साथ खाली समय में रिक्शा पर यात्रियों को ढोया जाय। टयूशन तो अहले सुबह और फिर शाम ढ़लने पर ही चला करता है। थोड़ी बहुत मेहनत करने से अगर कुछ रूपये घर आ जाते है तो इसमें बुराई क्या है ? फिर घर के खर्च भी तो बढ़ रहे हैं।
    फिर क्या था रवि अपनी योजनानुसार भगवान का नाम लेकर सुबह नौ बजे से लेकर दोपहर के दो बजे तक अपने किराये के रिक्शे से यात्रियों को ढ़ोना शुरू कर दिया। हर रोज उसे इतने समय में आसानी से पांच-छः पैसेन्जर मिल ही जाते थे जिससे वह बिना ज्यादा थके 100 रूपये तक की कमाई कर लिया करता था। रवि मानसिक रूप से जितना सशक्त था उतना ही शरीरिक रूप से सुगठित। उसे शारीरिक और मानसिक कार्यों के साथ-साथ करने में ज्यादा असहज महसूस नहीं हो रहा था। वह उच्च मनोबल और दृढ़ इच्छाशक्ति वाला एक नेकदिल इंसान था। वह जीवन की सच्चाई को भलीभांति जानता था।
    इस तरह महीनों बीत गए, सबकुछ मोटामोटी ठीक-ठाक चल रहा था। एक दिन वह चौराहे के बगल में अपनी रिक्शा के साथ किसी यात्री के आने का इंतजार कर रहा था। तभी दो आधुनिक युवतियां जल्दीबाजी करती हुई उसके रिक्शे पर बैठ गई। इससे पहले कि रवि पूछता कि उन्हें कहाँ जाना है, उनलोगों ने ही कहना शुरू कर दिया-जल्दी करो, सूर्या नर्सिंग होम चलना है। क्विक, एकदम जल्दी।
    सूर्या नर्सिंग होम उस चौराहे से चार किलोमीटर की दूरी पर था। रवि उन दोनों को अपने रिक्शे पर बिठा नर्सिंग होम की तरफ धीरे-धीरे अभी चलना ही शुरू किया था कि उसके रिक्शे की चैन उतर गई। वह रिक्शे पर से नीचे उतरा चैन को ठीक कर गंतव्य दिशा की ओर उन्हें लेकर चल पड़ा। अभी आधा किमी चला ही था कि पुनः उसके रिक्शे की चैन नीचे उतर गई। दोनों बैठी युवतियों में से एक ने गुस्से में आकर रवि से कहा-रिक्शा ठीक नही ंतो पैसेंजरों को धोखा नहीं दिया करते। तुम्हें पता है हम कितनी जल्दबाजी में हैं। किसी के जीवन और मौत का सवाल है। कुछ समय बाद अगर हम दोनों वहाँ नहीं पहुंचे तो किसी की जान तक जा सकती है। मेरी माँ नर्सिंग होम में भर्ती है। उसे खून की जरूरत है, वह भी 'एबीप्लस', जल्दी मिलता भी नहीं है। अगर वह आधे घंटे के अंदर उसे नहीं मिला तो मैं अपनी माँ को खो दूंगी। अपनी गाड़ी थी वह भी धोखा दे गयी। आज बाजार में भी बंदी का असर है। वरना तुम जैसे रिकशे वालों को तो मैं पूछती तक नहीं-एक ही सांस में रिक्शे पर बैठी एक युवती कह गई।
    इसी बीच दूसरी युवती जो उस युवती की सहेली थी ने कहना शुरू कर दिया-लगता है आज अपशकुन होकर रहेगा। बंद का होना, गाड़ी का खराब होना, फिर अंतिम सहारा यह रिक्शा वह भी बार-बार उसकी चैन का उतरना। अब की बार रिक्शे की चैन मनाओ की नहीं उतरे वरना तेरी तो ऐसी की तैसी मैं कर दूंगी-पहली युवती ने कहा।
    रवि को लगने लगा कि आखिर किसका मुँह देखकर मैं उठा था जो लोगों की खरीखोटी सुननी पड़ रही है। इससे पहले तो रिक्शे की चैन उतरने की बीमारी नहीं थी। आखिर रिक्शा भी तो छोटी-मोटी मशीन ही है। इस पर तो हमारा उतना भी जोर नहीं। हे भगवान, यह कैसा धर्मसंकट, क्यों मेरी गरीबी और मजबूरी का इम्तिहान ले रहा है। यह सब सोच वह मन ही मन घबरा रहा था। वह अपने चलते रिक्शे को अचानक रोका। विपरीत दिशा से आ रहे खली रिक्शे के चालक को हाथ देना शुरू कर दिया। युवतियों से नहीं रहा गया, एक युवती आपा खोकर बोल बैठी-अब क्या हुआ ? चैन तो ठीक है। फिर क्यों रोकी अपनी रिक्शा को ? बहुत हो गया, नॉनसेंस, इडियट, बिगडैल कहीं के।
    रवि उनकी बातों को अनसुनी करते हुए एक दूसरे रिक्शे को रोक उसपर उन दोनों को सवार कराया और थोड़ी देर तक उनके रिक्शे को नजरों से ओझल होने देने का इंतजार करने लगा। ओझल होते ही वह मन में ढ़ेर सारी बातों को अपने अपने मन में संजोए वह उसी नर्सिंग होम की तरफ जाने वाली सड़क की ओर अकेले ही खाली रिक्शे को ले आगे बढ़ना शुरू कर दिया। उसके खाली रिक्शे को देख बहुत लोग हाथ देते पर वह था कि उनके इशारे को नजरअंदाज कर अपनी ही धुन में रिक्शे के पैंडल को और भी गतिमान करता जाता। मन ही मन मनाता कि उसके रिक्शे की चैन न फिर उतर जाय। मॉजिला टॉवर के ठीक बगल से दायीं ओर जाने वाली सड़क में सूर्या नर्सिंग होम था। उस ओर जाने वाली सड़क की ओर रवि अभी अपने रिक्शे को मोड़ा ही था कि उस रिक्शेवाले से उसकी भेंट हो गयी जो अभी-अभी उन दोनों युवतियों को नर्सिंग होम छोड़कर लौट रहा था। रवि उस रिक्शे वाले को रोक उनके बारे में कुछ जानना चाहा पर उसने साफ-साफ कह उससे कह दिया-उन्हें उतार अपनी सवारी के पैसे लिए और मैं चलता बना। पर तुम्हें उनकी इतनी खास चिंता क्यों ? उसकी बातों पर रवि उससे झूठ बोल गया कि उसके रिक्शे पर उनलोंगो ने कुछ अपना सामान छोड़ दिया था। इतना कुछ होने के बाद रवि जल्दी-जल्दी नर्सिंग होम पहुंचा। अपने रिक्शे को एक किनारे लगा उस नर्सिंग होम के 'इनक्वायरी काउंटर' पर जा पहुंचा। वहाँ पता करने पर उसे यह जानकारी मिली कि अभी-अभी जो दो युवतियां आयीं थीं उनमें से एक जिसका नाम सुनीता था, की माँ को 'एबीप्लस' खून की सख्त जरूरत है। सचमुच अगर इस ग्रुप का खून उन्हें कुछ मिनटों में नहीं मिल पाया तो उसकी जान चली जाएगी। शहर बहुत बड़ा नहीं था। उस शहर में ब्लड बैंक भी नहीं था जहां से कोई व्यक्ति अपने रोगी के लिए मैंचिंग वाला ब्लड खरीद कर ला सकता था।
    रवि दौड़ा-दौड़ा उस नर्सिंग होम के कमरा न. 13 के नजदीक जा पहुंचा। कमरे से धीरे से दस्तक दी तो वही युवती दरवाजा खोल बाहर निकली। रवि की खुशी का ठिकाना ना था। पर उस युवती ने उसे देख आग बबूला हो उसे अपनी औकात में रहने की धमकी तक दे डाली। रवि निश्छल हो उसकी धमकियां को असरहीन हो सुनता रहा और बीच में ही उसे टोककर बोल पड़ा-दीदी ! अभी वक्त बहस या गुस्सा करने का नहीं हैं। अभी वक्त है माँ को खून चढ़ाने का। मेरा ब्लडग्रुप 'एबीप्लस' है। आप मेरे रिक्शे पर गुस्से में ही सही पर माँ की जरूरत वाला खून का ग्रुप बोल गई थीं और यह भी बोल गई थी कि वह ब्लडग्रुप आसानी से नहीं मिलते। मैं उसी वक्त से अपना मन बना लिया था कि मैं भले ही रिक्शावाला सही, मजबूर सही, पर आज खून के चलते माँ को जिंदगी से दूर नहीं होने दूंगा और मैं ढूंढ़ता-ढूंढ़ता आपके सामने खड़ा हूँ।
    तू खून देगा। एक रिक्शावाला। तुम्हारी हिम्मत कि तुम मेरी मजबूरी को भुनाकर मुझे एक रिक्शेवाला का एहसानमंद बनाना चाहता है। चला जा। अभी चला जा वरना मुझे इतनी समझ है कि ऐसे लोगों के साथ क्या किया जाता है ?
    बहनजी यह आप नहीं आपका गुरूर बोलता है। वरना इन मौंकों पर कोई भला किसी को कहां तौलता है। बहनजी, मेरे तन से जब तक खून निकलकर माँ के खून में नहीं जा मिलता है तबतक जो चाहो बोल लो वरना इसी रिक्शेवाने का वह खून जब माँ के खून में जा मिले तो आप क्या डाक्टर भी यह बोल पाने में सक्षम न हो कि कौन सा खून रिक्शेवाले का है और कौन सा माँ का।
    दोनों के बीच बहस जारी ही थी कि नर्सिंग होम की सिस्टर ने रवि...रवि कह कर बुलाना शुरू किया। रवि दौड़ा-दौड़ा उसके पास गया। आपरेशन थियेटर में रवि के ब्लड ग्रुप का तेजी से मिलान कर लेने के बाद उधर सुनीता की माँ को रवि का खून चढ़ाया जा रहा था। कुछ क्षण बाद सुनीता की माँ आराम महसूस कर रही थी। उसे गहरी नींद आने लगी थी। इधर सुनीता माँ के चेहरे पर लौटती आ रही नयी जिंदगी जैसी खुशी से सराबोर हो फूले नहीं समा रही थी। मन ही मन उस रिक्शेवाले के प्रति उपजी दुर्भावना को लेकर प्रायश्चित करने का ठान रही थी और अपने गाल को कुछ देर तक माँ के ंिसर पर रख नये पुराने ख्यालों में खो गई।
    कुछ पल बाद सुनीता अपने में हीन भाव लिए रवि को अपनी गलती का अहसास जताने के लिए ज्योंही उस ओर मुड़ी तो उसने रवि को नहीं पाया। वह वेचैन हो उठी। उसे उसका पता मालूम ना था। वह कम से कम उसे थैंक्स देना चाहती थी। वह रो रोकर, अपनी गलतियों के कारण उपजे दाग को धो देना चाहती थी। पर उस शहर में उस अजनबी अनजान रिक्शावाले को खोजना उतना भी आसान ना था।
    रवि खून देने के बाद उस माँ को मृत्यु के मुँह से छीनने की खुशी में अंदर ही अंदर र्स्व्गिक आनंद महसूस करते हुए बिना सुनीता से उसके बारे में कुछ आगे पूछे तेजी से नर्सिंग होम छोड़ चुका था। उसे अपनी औकात पता थी। उसे शहर से बाहर अपने गाँव जाकर लोगों के यहां टयूशन जो पढ़ाना था। वह भी तब तो और भी जरूरी हो गया था जबकि प्राय सभी स्कूल में परीक्षां का समय था।

 

राजेश कुमार पाठक
पॉवर हॉउस के नजदीक
गिरिडीह-815301, झारखंड
संपर्क-07091574338

7 blogger-facebook:

  1. इस कहानी को पढ़ कर मुझे मुंशी प्रेमचंद की मन्त्र कहानी याद आ गई | गरीब आदमी का kअ मन बहुत विशाल होता है |

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  2. ऐसा तो नहीं लगता कि यह केवल एक कहानी है...

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  3. Ravi ji,namaskar. Main apki bhi pratikriya chahta hoon. //rajesh kr pathak

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