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प्रमोद यादव का व्यंग्य - घुड़चढ़ी के दिन आये

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घुड़चढी के दिन आये / प्रमोद यादव जब कभी भी अपने शहर के व्यस्ततम इलाके ‘ग्रीन चौक’ के एक किनारे ढेर सारी काली-सफ़ेद,लाल-भूरी,कार की तरह चमचमा...

घुड़चढी के दिन आये / प्रमोद यादव

जब कभी भी अपने शहर के व्यस्ततम इलाके ‘ग्रीन चौक’ के एक किनारे ढेर सारी काली-सफ़ेद,लाल-भूरी,कार की तरह चमचमाती घोड़ियों को उनके मालिकों द्वारा मालिश करते, साफ़-सफाई और पॉलिश करते, भरतनाट्यम करते देखता हूँ, समझ जाता हूँ कि शहर के कई जवान गधों की ( दूल्हों की ) शामत आने वाली है..जान जाता हूँ कि अब दो-तीन महीने शहर में शहनाई-संगीत का शोर और डी.जे.-ढोल-ताशे का धारावाहिक धमाल तीन-चौथाई आबादी को “हुदहुद” की तरह अपनी चपेट में लेने वाला....किसी को भी चैन से नहीं सोने देने वाला.. लोगबाग तो बाबूलाल चतुर्वेदी के कैलेण्डर को देख शादी के दिन मालूम करते हैं...पर मुझे हमेशा इन घोड़ियों को देखकर ही पता चलता है कि शादी के दिन आ गए..शादी-ब्याह का जिक्र होते ही मुझे घोड़ी पहले दिखती है बाद में दुल्हन..तो पहले, पहले क्रम की ही बात करते हैं..

बचपन में कभी न जान पाया कि तांगे को घोडा खीच रहा है या घोड़ी..खींचने वाले को हम घोडा ही समझते रहे...घोड़े और गधे का अंतर तो जानते थे किन्तु घोडा और घोड़ी का नहीं..थोड़े जवान हुए और नर-मादा का भेद समझा तब घोड़ी और गधी को जाना..थोड़े और जवान हुए तो जाना कि शादी-ब्याह में दूल्हा घोड़े पर बैठता है ( और फिर कई सालों बाद जाना कि दूल्हा घोड़े पर नहीं बल्कि घोड़ी पर बैठता है..) हमारे दिनों ये सब चोचला नहीं हुआ करता था..बचपन में बाबूजी के साथ रिश्तेदारी में कई बारात बैलगाड़ी से गया..तब यही एक साधन हुआ करता.. वहां दुल्हे को दुल्हन के घर तक सायकल में बिठाकर पैदल ले जाते देखा.. सामने-सामने सायकल की सीट पर दूल्हा..सायकल का हैंडल थामे उसका ‘बेस्ट फ्रेंड’.. और पीछे-पीछे पैदल सारे बाराती..कई बार तो सायकल भी नहीं होता तो रिश्तेदार दूल्हे को गोदी उठाके दुल्हन के द्वार तक यूँ छोड़ जाते जैसे कह रहे हों-“लो भई.. ये रहा तुम्हारा गधा..अब करो जिंदगी भर सवारी“

घोड़े-घोड़ियों का ज़माना तो शहर आकर और अपनी जवानी के दिनों ही देखा.. होश सम्हालने के बाद पहले-पहल घुड़चढ़ी का चलन सेठ-मारवाड़ियों में देखा...झक सफ़ेद या स्याह काली सजी-धजी छः फीटी घोड़ी की पीठ पर सजा-धजा-डरा-डरा,सेहरा बांधे बैठा बन्ना ..और निकासी में टीका करती रंग-बिरंगी साड़ियों में सजी-धजी ,सोने के गहनों से लदी-फदी घर-परिवार की अनगिनत सुन्दर-सुन्दर महिलायें.. फिर यही दृश्य बारात में दीखता.. दुल्हन के घर द्वार-चार के समय... वैसे ही उधर की सजी-धजी महिलायें बन्ने का टीका करती . गीत गाती...और दोनों ही दृश्यों में घोड़ी के मुंह के नीचे ताजे काबुली चने का थाल लिए खड़ा उसका दुबला-पतला सांवला - सा मालिक कामन हुआ करता ..जब तक कार्यक्रम चलता तब तक घोड़ी चने चुगती रहती ..कार्यक्रम के निपटते ही थाल हटा दी जाती..पहले हटा दी तो घोड़ी दूल्हे को पीठ से हटा देगी. (पटक देगी ) यह लगभग तय होता...शायद इसीलिए उसे चने खिलाये जाते..फिर भी जानवर तो जानवर है ..कभी-कभी बिना किसी बात के भी बिदक जाती और वर को पटक दो-चार को चोटिल कर जाती.. मेरे एक मित्र एक बार ऐसे ही हादसे का शिकार हुआ..आज तलक फिर वह किसी के बारात नहीं जा सका ..अब बैशाखी लेके भला कोई क्या बारात जाए..?

आज के दौर में तो घुड़चढ़ी हर पुरुष का जन्म-सिद्ध अधिकार है,, क्या अमीर क्या गरीब..सबको इसकी चाहत होती है..शादी तय होते ही सबसे पहले गधा ( दूल्हा )घोड़ी तय करने निकलता है..अपनी पसंद की ऊँची-पूरी हेल्दी और खूबसूरत घोड़ी खोजने में पसीने छूट जाते हैं तब जाकर समझ में आता है कि दुल्हन ढूँढना आसान है , घोड़ी नहीं.. तब दूसरे जिलों से घोड़ी आयात किये जाते हैं .. मुंहमांगे दामों में लाये जाते हैं ...घोड़ियाँ घंटों के हिसाब से आती हैं ..पांच हजार रूपये घंटा से लेकर दस हजार घंटा तक ..आजकल तो नाचने वाली घोड़ी का दौर है..सबसे पहले दूल्हा यही पूछता है कि घोड़ी नाचती है कि नहीं ? अब घोड़ी का मालिक कैसे बताये कि “आनेवाली” से तो बेहतर ही नाचेगी..

सौभाग्य कहिये या दुर्भाग्य घोड़ी चढ़ने का एक अवसर मुझे भी एक बार मिला.. एक बार इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कई लोग दो-तीन बार भी चढ़ने का दुस्साहस कर लेते हैं..पर एक आम आदमी एक ही बार में पस्त हो जाता है..दूसरे बार की सोचता ही नहीं..मैं जब बारात लेकर गया तो ससुराल वालों ने मेरे रंग से मैचिंग खाती एक काली घोड़ी तय की थी...मेरा कोई अनुभव नहीं था घुड़चढ़ी का ..दोस्त-यारों ने बल दिया कि चढ़ जा..( सूली में ) तो मैं चढ़ गया..जब बैंड-बाजे बजने लगे और घोड़ी के पैर थिरकने लगे तब लगने लगा कि मैं तो गिरा..मैं तो गिरा..हाय अल्ला.. जब भी वो एक ओर का पैर नाचने को उठाती तो मैं दूसरी ओर फिसलने लगता..दूसरी ओर का उठाती तो फिर विपरीत दिशा में फिसलने लगता.. घोड़ी की पीठ क्या थी,चिकनी चमेली जैसी फिसलपट्टी थी..मैं बार-बार उसके मालिक को कातर नज़रों से निहारता कि बचा ले यार !..वह आँखों ही आँखों में कहता- ‘ मैं हूँ ना “ पर उसके इस “ हूँ ना “ पर मुझे कतई एतबार न था..जब सारे दोस्त-यार हू-हू- हां-हां करते बैंड के साथ उछल-कूद रहे थे... नागिन डांस करते नाच रहे थे..आतिश बाजी का लुत्फ़ उठा रहे थे,मैं पसीना-पसीना होकर डर से कंपा जा रहा था..सोच रहा था कि कब दुल्हन का घर आये और मैं इस घोड़ी से निजात पाऊं.. खैर किसी तरह उस दिन तो पा गया पर उसके बाद जो सात फेरे ले के बंधी उससे अब तक नहीं पाया..

घोड़ी को लेकर एक बात अक्सर मेरे जेहन में घुमड़ता रहा कि दूल्हे को घोड़ी में ही क्यों बिठाते है ? घोड़ों पर क्यों नहीं ? कईयों से पूछा और कई तरह के जवाब पाया..पर कोई जवाब मुझे संतुष्ट न कर सका..फिर कहीं पढ़ा कि स्वभाव से घोड़ी बड़ी चंचल होती है ..पुराने जमाने में गावों में ऐसी घोड़ियाँ पाली जाती थी जिन्हें हमेशा अंधकारमय वातावरण में रखा जाता..केवल विवाह के समय वर की परीक्षा के लिए ही उस चंचल घोड़ी का प्रयोग होता था.. ढोल-नगाड़ों के बीच घोड़ी और मदमस्त हो उठती थी..दूल्हा उस घोड़ी के वेग को अपने नियंत्रण में कर पाता है या नहीं यह देखने के लिए ही कदाचित घुड़चढ़ी प्रथा प्रारम्भ हुई.. इसलिए दुल्हे को बतौर टेस्टिंग घोड़ी पर बिठाया जाता है.. किसी तरह शादी के समय मदमस्त होकर नाचती घोड़ी को तो वह येन-केन-प्रकारेन कंट्रोल कर लेता है पर उसके बाद घर में जो आती है वह ताउम्र आउट आफ कंट्रोल रहती है..उस पर उसका नियंत्रण नहीं होता

मजे की बात- बारात , दूल्हा , घोड़ी...सब एक दूजे के पर्यायवाची जैसे लगते हैं..बारात कहो तो दूल्हा दीखता है..दूल्हा कहो तो घोड़ी दिखती है..और घोड़ी कहो तो क्या दिखता या दिखती है मुझे नहीं मालूम.. कुल मिलाकर कहें तो घुड़चढ़ी एक दांव है- ‘ आर या पार ‘ और जनरली पुरुष चढ़ कर ‘ पार’ ही होते हैं जैसे पतंग कटकर ‘पार’ होता है..अविवाहितों के लिए एक एडवेंचर-रहस्य-रोमांच तो विवाहितों के लिए एक टीस भरा घाव जो जीवन भर हरा रहता है और जिसके चलते पूरी जिंदगी वह लाल-पीले होते रहता है..

एक बार एक सजी-धजी,ऊंची-पूरी गोरी घोड़ी को देख मैं हतप्रभ रह गया..एकदम “कैट” जैसी दिख़ रही थी..मन किया कि उस खूबसूरत घोड़ी का इंटरव्यू कर लूं सो उसके नजदीक चला गया..घोड़ी समझदार थी..समझ गई कि ‘कस्टमर’ है..वो बड़े प्यार से मध्यम सुर में हिनहिनाई..पास के पानठेले से फटे बांस सी जोर की आवाज आई- ‘ अरे आ रहा हूँ धन्नो....’ मैंने बाईं ओर देखा तो एक पियक्कड़ टाईप का व्यक्ति झोल खाते-लहराते घोड़ी की ओर आ रहा..आते ही बोला -‘ तारीख बताओ ? ’ मैंने कहा- ‘अट्ठारह..’ वो बोला-‘ नहीं हो सकता जी.. आज बुक है..’ तब समझा कि ये घोड़ी की बुकिंग की बात कर रहा है. वह सचमुच थोडा पिया था.. मैंने कहा-‘ चचा..मुझे घोड़ी नहीं चाहिए.. घोड़ी के बारे में जानकारी चाहिए....’

‘क्या जानकारी ? ‘ उसने दीदे फाड़ थोड़े गुस्से से पूछा.

‘यही कि शादी के महीनों के बाद ये घोड़ी करती क्या है ? ‘

‘ अरे करेगी क्या.. तांगे में चलती है मेरे साथ..वैसे तो दो ही महीने में इतना कमाकर दे देती है कि पूरे साल दोनों बैठकर आराम से खा-पी लें पर मैं इसे बीजी रखना चाहता हूँ.. सयानी है न..खाली-पीली बैठेगी तो किसी दिन किसी घोड़े के साथ भाग जायेगी..…’ इतना कह वह “अच्छा जोक मारा” जैसे अंदाज में खी-खी करते हंसने लगा.

‘ अच्छा चचा..ये बताईये इसे कितने में खरीदी ? ‘ मैंने पूछा.

‘ हम खरीदते नहीं केवल बेचते हैं....’ उसने जवाब दिया.

‘ अच्छा वही बता दीजिये..कितने में बेचेंगे ? ‘

‘ तेईस लाख...’ उसने एक लम्बी हिचकी लेते कहा.

‘ क्या ? तेईस लाख ? अरे चचा घोड़ी बेच रहे हो कि “ऑडी” ? इतने में तो ऑडी” आ जाएगी..’ भाब सुनकर मैं हिचकने लगा.

‘ भैयाजी.. पहले तो आप तय कर लो कि आपको क्या चाहिये ? घोड़ी कि ऑडी ? ’

‘ अरे चचा.. बुरा मत मानिए..मैं तो सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि एक घोडा या घोड़ी अमूमन कितने में मिल जाता है..’ मैंने समझाया.

‘ अरे भई.. कभी खरीदें हों तो जाने ना ..हमने तो सालों पहले इसे पुष्कर मेले से चुराकर लाया था..पसंद आ गई तो हाँक लाया.. कितने की होगी हम नहीं जानते..पर इतना जरुर जानते हैं कुछ घोड़ियाँ करोड़ों की भी होती है...’

‘ क्या ? करोड़ों की ? आपको कैसे पता ? ‘ मैं चकित हुआ.

‘ अरे दूसरी बार जब पुष्कर गया और जिस घोड़ी को उड़ाया उससे पता चला.. उस घोड़ी ने मुझे खूब छकाया, रुलाया और ठुकवाया भी..’

‘ वो कैसे ? ’

‘ अरे जैसे ही उसे ले के मेले से निकला ..मेरी जान ही निकल गई..यूँ सरपट और तेज दौड़ी जैसे हवाई जहाज.. और सीधे पास के एक कोतवाली में मुझे एमरजेंसी लैंडिंग करा दी.. रात भर पुलिसवाले घोड़ी को छोड़ मेरी मालिश करते रहे....सुबह एक सिपाही ने अखबार पढ़ते बताया कि वो घोड़ी तीन करोड़ की थी..’

‘ फिर ? ’

‘ फिर क्या ?..तीन करोड़ी चुराने के जुर्म में मुझे तीन साल की सजा हो गई..अभी-अभी ही तो छूटकर आया हूँ.. खैर..छोड़ो इन बातों को..और कुछ पूछना है तो जल्दी पूछो ..घोड़ी की डांस-प्रेक्टिस का समय हो रहा है.. उसे बारात अटेण्ड करना है.. ’

‘ हाँ चचा..बस एक सवाल....क्या ये घोड़ी “मैं झंडू बाम हुई..” गाने पर डांस कर लेगी ? ‘

‘ क्यों नहीं भतीजे... मलाइका से तो सुपर ही नाचेगी..पर उस पर सलमान सवार होगा तभी ..और कुछ ? ‘

‘ नहीं चचा.. बस..धन्यवाद..चलता हूँ.. ‘ इतना कहते उस खूबसूरत घोड़ी की ओर देखा तो वो भी प्यार से कनखियों से देखती “ बाय-बाय” जैसे अंदाज में सिर हिलाकर धीरे से हिनहिनाई ..

फिर एकाएक वो हिनहिनाहट एकदम से इतनी तेज , उग्र और वक्र हो गई कि कान के परदे फटने लगे और आँख खुल गई..देखा –पलंग के सिरहाने श्रीमती खडी हो हिनहिना ( बडबडा) रही थी- ‘ न मालूम सारी रात क्या अनाप-शनाप लिखते हैं और फिर दिन-चढ़े तक घोड़े बेच सोते रहते हैं.. तंग आ गई इनके रवैये से..’

तुरंत उठकर मैंने इधर-उधर बिखरे, देर रात तक लिखे पन्नों को उठा कर जमाया....देखा..रचना आधी-अधूरी ही थी..”आर-पार” तक ही मैं घोड़ी के साथ था..उसके बाद की घटनाओं का न मुझे इल्म है.. न ही उसका मैं जिम्मेवार ( लेखक ) हूँ ...

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

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रचनाकार: प्रमोद यादव का व्यंग्य - घुड़चढ़ी के दिन आये
प्रमोद यादव का व्यंग्य - घुड़चढ़ी के दिन आये
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