मंगलवार, 13 जनवरी 2015

हरीश कुमार की कविताएं

1

मैं डरना नहीं चाहता
इसलिए खोया रहता हूँ
पुस्तकों के स्नेहिल पन्नों में
नुक्कड़ की बहसों में
एक प्याला ठहाके के साथ
राशन की आलोचक लिस्ट में
दफ्तरी आपाधापी से सरोबार
गांठ लगी फाइलों में
घर के बच्चों की जिद में लिपटी
मासूम शिकायतों में
दूध,बिजली ,इन्टरनेट के
एकतरफा हसीन प्यार में
कई दिनों से ना छप सकी
रचना की बेदर्द प्रतीक्षा में
यह सब कुछ बहुत जरुरी सा है
बस अपने आप को याद करने की
हर जिद से बचा रहना चाहता हूँ ।

2

संगीतकार साजों पर
गाने से पहले
धीरे-धीरे उन्हें जगाता है
जैसे सुबह की किरण फूलों को ।
प्यार से टुनटुनाता है
कुम्हार का हाथ जैसे चाक पर
मिट्टी को आकार तक ।
कुछ संवाद बनाता है
एक सुर में लाता है
जैसे माँ चूल्हा लीपती है
गौरैया घोंसला बुनती है ।
जिन्दगी में कविता
ऐसे ही चलती है ।

3

बगीचे की शाम

शाम अक्सर बगीचे में गुजरती है

प्रतीक्षारत कुर्सियों पर पड़ी छाया

नर्म घास का समर्पण

नए पौधों की दस्तक देती ऊंचाई

फूलो की सुगंध का अपनापन

पुकार लेता है अक्सर

सब मिलकर सहलाया करते हैं

पीठ सिर आशंकित मन

भर देते है हर सूनापन

बगीचे की ईंटों का रंग

शाम के साथ बदलता है

धूप छाया से खेलता है

पेड़ों के छाया चित्र लिए

अपनी भाषा रचता है

रात रानी छुपी रुस्तम है

सबसे अलग सबसे जुदा

अँधेरा होते ही जब बाकी

अलसाये से सोते है तब

आलिंगन सी मिलती है

पूर्ण प्रभुत्व के साथ

स्याह अँधेरे में घोल देती खुशबू

चुपचाप सी खिलती है ।

4

मेरी भाषा शरीर में खिलती
बांछों का मुहावरा हो गयी है
मैं बस उन्हें दिन रात
तलाशा करता हूँ
उदास हो जाता हूँ
वे दोनों धीरे धीरे
टूटती साँसों के साथ
जीने की पुकार लगाती है ।

5

भाषा का समाज

संवेदनाओं के मकड़जाल से
मुक्ति संघर्ष की पीड़ा सहकर
अभिव्यक्त मन की अभिलाषा को
समय के श्वासों पर रहकर
होना ही होगा उन्मुक्त
निजता को तज कर
सर्वव्यापकता का तत्व ही
समरसता का बने आधार
विवाद तभी संवाद बनेंगे
जन मन में होंगे सुविचार ।

6

कभी कभार
प्रशंसा करना
जिन्दगी का हिस्सा होता है
वरना हर पल
आलोचना का किस्सा होता है
ईर्ष्या कुतर्कों के तपते तन पर
कभी प्रेम हाथ सहलाना
शोर में कुछ साज़ बजाना
आज नहीं तो कभी
एक सुर में गाना
सुहाना होता है
कभी कभार ।

7

गड़े मुर्दे अब उखाड़ने नहीं पड़ते
वे जुनून के टुकड़े बनकर
बेचैन शरीरों में गहरे पैठ गए है

सत्ता उन्हें कुछ अन्तराल बाद
खुरच कर अपने नाख़ून नापती है
उनका पैनापन परख
सहानुभूति का स्वांग रचती
मन में मौन हंसती है
अब जनता मरने से पहले
इस अभिनय से डरती है ।

 

डॉ. हरीश कुमार 

परिचय- चंदू भाई कामरेड नहीं रहे ,(कहानी संग्रह ,२००८ ) में प्रकाशित। कहानियां, कवितायें ,टिप्पणियाँ और चलंत मामलों पर लेख समाचार पत्रों में प्रकाशित। 

संपर्क -गोबिंद कालोनी ,गली न २,बरनाला ,पंजाब


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