बुधवार, 14 जनवरी 2015

चन्द्रकुमार जैन का आलेख - 'मुक्तिबोध' की बहुचर्चित कविता 'अँधेरे में' पर एक ख़ास चर्चा

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में 'मुक्तिबोध' के 'अँधेरे में' पर ख़ास चर्चा

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 

नागपुर में राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्व विद्यालय के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिवस मुझे मुक्तिबोध की 'अँधेरे में' कविता पर एकाग्र शोध-पत्र वाचन और सम्बोधन का सुअवसर मिला। वैश्वीकरण की चुनौतियाँ और साहित्य विषय के तहत प्रस्तुत इस शोध पत्र में स्वाभाविक है कि मैंने मुक्तिबोध और उनकी कविता अँधेरे में के गहरे नाते की पड़ताल करते हुए राजनांदगांव की चर्चा की खुलकर की लिहाज़ा,संगोष्ठी के पूरे सत्र में मुक्तिबोध और राजनांदगांव की अनुगूंज सुनाई देती रही। बहरहाल आज शोध-पत्र का सारांश आपसे साझा कर रहा हूँ।

हिन्दी कविता के महानतम सर्जकों में से एक गजानन माधव मुक्तिबोध के निधन के पचास साल इसी सितंबर में पूरे हो गए हैं। सितंबर उन्नीस सौ पैंसठ के नया ज्ञानोदय में कवि श्रीकांत वर्मा का एक लेख छपा था जिसमें उन्होंने कहा था ‘अप्रिय’ सत्य की रक्षा का काव्य रचने वाले कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन में कोई लोकप्रियता नहीं मिली और आगे भी, कभी भी, शायद नहीं मिलेगी। कालांतर में श्रीकांत वर्मा की आशंका गलत साबित हुई और मुक्तिबोध निराला के बाद हिन्दी के सबसे बड़े कवि के तौर पर न केवल स्थापित हुए बल्कि आलोचकों ने उनकी कविताओं की नई-नई व्याख्याएं कर उनको हिंदी कविता की दुनिया में शीर्ष पर बैठा दिया। मुक्तिबोध की बहुचर्चित कविता 'अँधेरे में' ने भी अपनी अर्धशती पूरी कर ली है। कहना न होगा कि अँधेरे की शब्दावली में अपने आस-पास पसरे अँधेरे के अनगिन सवालों की शिनाख्त करने वाले मुक्तिबोध की बेकली को बकलम मुक्तिबोध ही समझने का इस से बेहतर अवसर संभव नहीं है। लिहाज़ा, समय आ गया है कि इस बात की ईमानदार पड़ताल की जाए कि मुक्तिबोध की रचनाओं में संघर्ष दिखाई देता है वह उनका अपना संघर्ष है या फिर पूरे मध्य वर्ग का, समूची मानवता का,हमारे मौजूदा समय का भी संघर्ष है। 

प्रसिद्ध कवि आशोक वाजपेयी ठीक कहते हैं कि बड़ा लेखक वह है जिसमें हम हर बार नये अर्थ को ढूंढते हैं। जो कुछ मुक्तिबोध के जमाने में अंधेरे में था, आज वही उजाले में है। वो सच आज सबके सामने है जिसको मुक्तिबोध अपने समय में महसूस करके लिख चुके थे। बात साफ़ है कि मुक्तिबोध के रचना कर्म की परिधि और उसके केंद्र दोनों में हमारे आज के दौर के सवालों की समझ और उनके ज़वाब हासिल किए जा सकते हैं। वहीं, मुक्तिबोध के सम्बन्ध में डॉ. नामवर सिंह ने स्पष्ट कहा है, ‘‘नई कविता में मुक्तिबोध ने अपने युग के सामान्य काव्य-मूल्यों को प्रतिफलित करने के साथ ही उसकी सीमा को चुनौती देकर उस सृजनात्मक विशिष्टता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन सम्भव हो सका।’’ कुल मिलाकर मुक्तिबोध को लक्षित-मूल्यांकित करने का क्रम अभी जारी है। छायावादी काव्यधारा में ‘निराला’ और नयी कविता में मुक्तिबोध का व्यक्तित्व अपवाद की सीमा तक विशिष्ट था, इसमें दो मत नहीं है। 

स्मरण रहे कि ‘अंधंरे में’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविता है। यह कविता परम अभिव्यक्ति की खोज में जिस तरह की फैंटेसी बुनती है लेकिन अपने मूल में यह कविता ऐसे अंधेरे की पड़ताल करती है जो देश की आजादी के बाद की व्यवस्था का अंधेरा है, इस लोकतंत्र का अंधेरा है। ‘अंधेरे में’ पूंजी की दुनिया व रक्तपाई वर्ग द्वारा पैदा की गई क्रूर, अमानवीय व शोषण की हाहाकारी स्थितियों से साक्षात्कार करती है। यह हिन्दी कविता में ‘मील का पत्थर’ है जिसमें ‘अंधेरा’ मिथ नहीं, ऐसा यथार्थ है जिससे जूझते हुए हिन्दी कविता आगे बढ़ी है। 

मुक्तिबोध की कविता जिस अंधेरे से रू ब रू है, वह इन पचास सालों में सच्चाई बनकर उभरा है। उसका विस्तार ही नहीं हुआ, वह सघन भी हुआ है। मुक्तिबोध ने मठ व गढ़ को तोड़ने की बात की है। इसलिए कि उन्होंने इन मठों व गढ़ों को बनते और इनके अन्दर पनपते खतरनाक भविष्य को देखा। कैसे हैं ये मठ व गढ़ ? आज ये पूंजी, धर्म, वर्ण, जाति के मठ व गढ में रूपांतरित हो गये है। राजनीति सेवा नहीं, मेवा पाने का माध्यम बन गई है। बड़ी बड़ी बातें की जा रही हैं। प्रगति व विकास के दावे किये जा रहे हैं। कोई गौरवान्वित हो सकता है कि हमारी संसद अरबपतियों से रौशन है। पर हमने ईमानदारी, नैतिकता, आदर्श, भाईचारा सहित जो जीवन मूल्य निर्मित किये थे, उसमें कहां तक प्रगति की है ? अब तो इस पर बात करना भी पिछड़ापन है। 

‘अंधेरे में’ मुक्तिबोध कहते हैं ‘पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता’। गांधी जी पूंजीपतियों को देश का ट्रस्टी मानते थे। उनका दर्शन ‘हृदय परिवर्तन’ पर आधारित था। उनकी समझ थी कि समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों तथा वर्चस्ववादी जातियों व शक्तियों के हृदय परिवर्तन से समाज में समता आयेगी। गांधी जी के इन विचारों के विपरीत मुक्तिबोध का चिंतन था। वे इस ‘उजली दुनिया’ के पीछे फैले काले संसार को, इसकी हृदयहीनता व मनुष्य विरोधी चरित्र को बखूबी समझते थे जिसकी प्रवृति छलना व लूटना है। पूंजीवाद की यह अमानवीयता आज के समय में कही ज्यादा आक्रामक होकर हमारे सामने आई है। आज जिस ‘महान लोकतंत्र’ की दुहाई दी जा रही है, वह मूलतः लूट और झूठ की बुनियाद पर टिका है। यह अपनी लूट को छिपाने तथा उसे बदस्तूर जारी रखने के लिए झूठ की रचना करता है। कौन नहीं जानता कि आज कॉरपोरेट हित सर्वोपरि है लेकिन इसे अर्थशास्त्रीय शब्दावली की भूल भुलैया में ले जाकर 'समावेशी' कहा जा रहा है। इस पूंजी से हमारे देश की प्राकृतिक संपदा, खनिज, जंगल, जल व जमीन की लूट जारी है। लेकिन इसे ‘विकास’ की संज्ञा दी जा रही है। 

ऐसे अनेक आज के सवाल हैं जिनका सही चेहरा दिखाने में मुक्तिबोध का रचना संसार, विशेषतः की कविता 'अँधेरे में' पूरी तरह समर्थ है। 

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लेखक छत्तीसगढ़ राज्य शिखर सम्मान से अलंकृत हैं।

संपर्क - दुर्गा चौक, दिग्विजय पथ,

राजनांदगांव

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