शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

गीता दुबे की लघुकथा - एक नई शुरुआत

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   आज वसंत पंचमी का दिन है लेकिन उसके भीतर कोई उमंग नहीं है, उल्लास नहीं है| जब से दोनों बच्चों ने अमेरिका की नागरिकता ले ली है, एक रिक्तता उसके जीवन में घर कर गई है, वह जिन्दगी के प्रति उदासीन हो चली है, कहीं भी उसका जी नहीं लगता| वह सुबह से ही घर के सामने वाले मैदान में बने पंडाल को निहार रही है, देख रही है छोटी-छोटी बच्चियां अपने आप को साड़ी में लपेटे पंडाल के पास आ-जा रहीं हैं उन्हें देख वह भी अपने बचपन में लौट आती है जब उसे सरस्वती पूजा का इन्तजार रहता था, कितना उत्साह था उन दिनों, वह भी सुबह से साड़ी में लिपटी अपनी सहेलियों के साथ घुमा करती थी| ससुराल आने पर उसने देखा कि हर वर्ष वसंत पंचमी के दिन मोहल्ले के बच्चे घर के सामने वाले मैदान में माँ सरस्वती की पूजा करते आये हैं उन्हें किसी भी चीज की जरुरत होती जैसे दरी, कोई पूजन सामग्री, माचिस इत्यादि तो वे उसके यहाँ से मांग ले जाते| वह फिर अपने अतीत में खो जाती है| पच्चीस वर्ष पूर्व जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी| उसने बी. ए. आनर्स फर्स्ट क्लास किया था, वह आगे पढ़ना चाहती थी, पढ़कर कुछ बनना चाहती थी, यही उसका सपना था लेकिन जब यह बात उसने अपने पति को बताई तो जवाब सुन वह धराशाई हो गई थी| पति ने जवाब में कहा था—‘देखो मेरे लिए तुम्हारी पढ़ाई का मतलब बस इतना ही है कि तुम मेरे बीमार माता-पिता और मेरे छोटे भाई- बहनों की देखभाल अच्छे से कर सको| पति के खिलाफ बोलना उसने न देखा था और न ही सुना था| वह खामोश रह गई थी| उस दिन से उसने  अपने पति की खुशी के लिए अपने- आप को उस घर को सुपुर्द कर दिया और धीरे- धीरे उसे भी उसी में  खुशी मिलने लगी| और कुछ समय बाद जब उसकी अपनी बगिया में दो फूल खिले तो वह अपने आप को सबसे खुशनसीब समझने लगी| मातृत्व सुख ने उसे सारे जहाँ से अलग कर दिया, वह अपनी दुनिया में उलझी अपने आप को बहुत खुश पाती| उसका सपना कब, कहाँ छूमंतर हो गया उसे खबर ही न रही| वह माँ, बहू, भाभी, चाची इसी सब से पहचानी जाने लगी| माता- पिता ने जो नाम दिए थे वह तो बहुत पहले मिट चुका था जिसका उसे आभास तक नहीं हुआ|

   अब आज पच्चीस वर्षों बाद उसे यही बात सताए जा रही है कि उसे क्या मिला, बच्चे भी तो अपने नहीं रहे| इस बार जब रिंकू आया था तो वह अमेरिका से एक लैपटॉप उसके लिए ले आया था| जाते समय कह कर गया कि मम्मी अब हम आपसे इसी पर चैट करेंगे लेकिन वह चैट कैसे करेगी उसे तो लैपटॉप चलाना आता ही नहीं? वह लैपटॉप आज भी उसी मेज पर यूँ ही रखी हुई है| उसके लिए एक बक्से से ज्यादा वह कुछ भी नहीं था| अपने आप को वह बिलकुल अकेली पा रही थी| घर वही था लेकिन उसे लगा जैसे उसकी जिन्दगी ठहर गई हो| वह उस घर में अब अपने आप को तलाश रही थी, इन्ही सब ख्यालों में खोई वह घर के बाहर चुपचाप खड़ी थी| तभी एक बच्ची जिसकी उम्र बारह या तेरह रही होगी उसके पास आकर कहती है—

“आंटी-आंटी क्या आपके पास सुनहले रंग की साड़ी है?”

‘हाँ है एक नहीं बल्कि दो-दो साड़ियाँ हैं मेरे पास सुनहले रंग की|’

‘आंटी प्लीज मुझे एक साड़ी पहना दीजिये न’

वह न सिर्फ उस बच्ची को अपनी साड़ी पहनाती है बल्कि उसे सजाती संवारती भी है| बच्ची खुश हो जाती है और उससे जिद करती है कि दूसरी सुनहले रंग की साड़ी वह पहन ले| बच्ची के जिद के सामने उसकी नहीं चलती है और वह भी साड़ी पहन, सज-संवर कर तैयार हो जाती है| बच्ची उसे देख कहती है –

‘आंटी अब आप बहुत खुबसूरत लग रहीं हैं’, उसे यह सुनकर अच्छा लगता है और फिर वह बच्ची  उससे पंडाल में चलने की जिद करने लगती है| वह उसके साथ माँ सरस्वती के पंडाल में आती है, माँ के सामने नतमस्तक होती है फिर न जाने कहाँ से उसमें इतनी ऊर्जा आ जाती है, इतना उत्साह आ जाता है कि वह अपने को रोक नहीं पाती है वह अपने हाथों से कागज के झालर बनाती है, फूल लाती है और पंडाल को सजाती है| पंडाल देख बच्चे बहुत खुश होते हैं| वह बच्ची उसके पास आती है और कहती है—

‘थैंक यू आंटी, आप बहुत अच्छी आंटी हैं| मेरा नाम सोनल है मैं आप से दोस्ती करना चाहती हूँ| आपका नाम क्या है? आपको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजूंगी|

मेरा नाम..... मेरा नाम अनामिका है लेकिन मुझे कंप्यूटर नहीं आता, मुझे सिखा दोगी?

हाँ आंटी...

वह सोनल का हाथ थाम लेती है| आज वह बहुत खुश है, अब वह अपने सारे सपने पूरे करेगी-अपने आप से वादा किया है आज उसने| उसके अन्दर से आवाज आती है- जहाँ सब कुछ ख़त्म होता है वहां से एक नई शुरुआत होती है| आज उसने एक नई शुरुआत की है|

                                                          गीता दुबे

                                                         जमशेदपुर, झारखण्ड  

2 blogger-facebook:

  1. प्रेरणा दायक एक अच्छी कहानी है. गीता जी बधाई

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  2. निराश मन में आशाका संचार करने वाली प्रेरक लघुकथा |

    उत्तर देंहटाएं

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