बुधवार, 14 जनवरी 2015

देवेन्द्र सुथार का आलेख - पुण्य और परिर्वतन का पर्व : मकर संक्रांति

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शरद ऋतु के शीत आंचल के कुहासे से अस्त-व्यस्त हुए जन जीवन  और निष्प्राण सी दिखाई देने वाली सूर्य की निस्तेज किरणों में मंद गति से बढ़ते ताप से समूची धरती के प्राणियों को मकर संक्रांति की आहट से जहां राहत मिलती है, वहीं प्रकृति में बदलाव आने लगता है। प्रकृति में पूर्णतया परिवर्तन लाने वाला ऋतुराज बसंत भी दस्तक देने लगता है ऐसे ही बदलाव में भारतीय संस्कृति में रचे-बसे पुण्य कार्यों में यहां का जनजीवन सहभागी बनने के लिए सदैव आतुर रहता है


मकर-संक्रांति जैसे पुनीत पर्व पर देशभर में स्थित तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थान व धर्म कर्म की भी परम्परा सदियों पुरानी हैं। मकर संक्रांति पर्व समूचे देश में किसी न किसी रूप में अवश्य मनाया जाता है। मकर संक्रांति सूर्य के संक्रमण काल का त्यौहार भी माना जाता है। इस दिन समूचे भारत में बहने वाली नदियों तालाबों सरोवरों तथा पानी के कुंड़ों में स्नान पर्व आयोजित होते देखे जाते हैं। संक्रांति के दिन किया गया स्नान धार्मिक दृष्टि से श्रद्धालुओं के लिए अति पुण्य कमाने वाला होता है। धर्म व संस्कृति की मजबूत डोर से बंधे यहां के श्रद्धालु ऐसे अवसरों पर खुलकर दान भी करते हैं। धार्मिक स्थलों व नदियों के किनारे उमड़ती जनमानस की भीड इस बात का प्रतीक हैं कि जनआस्था अभी कम नहीं हुई हैं । मकर संक्रांति के अवसर पर यूं तो लाखों लोग स्नान पर्व से पुण्य अर्जित करते है, लेकिन तो लाखों लोग स्थान करना सर्वथा महत्वपूर्ण माना जाता है।


उत्तर प्रदेश में इस दिन हजारों तीर्थ स्थलों पर बड़े सवेरे से ही स्थान पर्व शुरू हो जाता है ऐसा माना जाता है। इलाहाबाद में आठ किमी. दूर स्थित तीर्थराज प्रयाग पर लाखों श्रद्धालु दूर-दूर से आकर स्नानादि कर पुण्य कमाते हैं। यह तीर्थराज इतना प्रसिद्ध है कि यहां गंगा, यमुना व सरस्वती नदियों का पावन संगम होने से इस तीर्थ का नाम त्रिवेणी पड़ गया। हिंदू धर्म में हर वयक्ति अपने जीवन में एक बार यहां स्थान कर अपने को धन्य मानता है। नदियों के इस संगम पर कई घाट हैं जो विभिन्न नामों से जाने जाते हैं। गऊघाट पर स्थान करने से गोदान के बराबर पुण्य मिलता है।


हरियाणा के कुरूक्षेत्र नगर में स्नान के लिए मकर संक्रांति के दिन लाखों श्रद्धालु देशभर से आते हैं। गीता की जन्म स्थली के रूप में विख्यात इस क्षेत्र में ब्रह्म सरोवर, आदि कई स्थान स्थल है। ब्रह्म सरोवर से लगभग पांच किलोमीटर दूर बाणगंणा के बारे में कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के दौरान शर-शैय्या पर घायल पड़े भीष्म पितामह को जब प्यास लगी थी तो अर्जुन से उन्होंने पानी मांगा, तो अर्जुन ने यहीं अपने गांडीव से धरती में तीर मार कर गंगा की जलधारा निकाल कर भीष्म के सूखे कंठ की प्यास बुझाई थी। बाद में यही जलधारा सरोवर में बदल गई, तभी से श्रद्धालु सूर्य  ग्रहण हो या फिर मकर संक्रांति, पर्व पर स्थान करने अवश्य ही आते हैं।


भारत के एक मात्र पड़ोसी हिन्दू राष्ट्र नेपाल के लोगों में भी भारत की प्राचीन नदियों के प्रति गहरी आस्था है। इसी वजह से नेपाली श्रद्धालु पिथौरागढ़ स्थित पंच नदियों के संगम पंचमेश्वर  महादेव तीर्थ में मकर संक्रांति के दिन डुबकी लगाने आते हैं। मध्य प्रदेश में निखाराघाट पर पूरे माह स्नान पर्व होता है व यहां विशाल मेला लगता है। जो ओंकारेश्वर संक्रांति के नाम से विख्यात है। दक्षिण भारत में भी लाखों श्रद्धालु आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल, तथा तमिलनाडु में यह पर्व पोंगल के नाम से मनाते हैं व कावेरी नदी के के अलावा सागरों में भी स्नान करते हैं।


राजस्थान में ब्रह्माजी की यज्ञस्थली के रूप में विख्यात पुष्करराज में भी श्रद्धालु स्नान हेतु संक्रांति के दिन दूर-दराज क्षेत्रों से आते हैं। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर पूजा-अर्चना का जो विधान है ही, संक्रांति पर खिचड़ी चढ़ाने के तिल से बने विभिन्न मीठे व्यंजन बनाने का भी रिवाज है। पर्व के दिन श्रद्धालु जल्दी उठकर तिल के उबटन से स्थान करने के पश्चात तांबे के बर्तन से सूर्य को मंत्रों के उच्चारण के साथ जल चढ़ाते हैं। इस दिन तिल दान भी किया जाता है व अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग ढंग से इस पर्व को मनाया जाता है व इसमें रूई, गन्ना तथा चांदी के सिक्के रखे जाते हैं।

-देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालौर (राज.)।
devendrasuthar196@gmail.com

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