शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

मुकेश कुमार की कविताएँ--- क्यों याद आ रहे हैं गुजरे जमाने

 

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1.

इक जिद थी बड़े होने की लाखों कोशिशों के बाद
जब बड़े होने लगे अहसास हुआ की कुछ पीछे छूट रहा है।
बीते लम्हे याद आने लगे जब देखता हूँ खुद को पीछे मुड़कर इक कहानी नजर आती है।

कुछ पलों को बाँटना चाहा कहाँ अब वो साथ ना रहा।
कुछ बिछड़ गए कुछ साथ रहें हमेशा जिन्दा रहेंगे मेरे साथ ,
भूलकर भी भूलना चाहूँ फिर ज्यादा याद आते है
वो बीते लम्हें
वो गुजरा कल
वो याद आता पल
अनजाने सफर के हमजोली मेरे यार मेरे दोस्त
वो जमाना गुजर गया तुम्हें देखें.....

2.

चला जाऊँगा इक दिन मैं भी इस दुनिया से
खुद को लेकर अपने, और मैं को इस दुनिया से

ख्वाहिशें कुछ ऐसी है मरने के बाद इस दुनिया से
हमारी, आगे हम होंगे , पीछे दुनिया लाखों होंगी।

चाहते भी होगी चाहतों का दौर भी होगा पर
हम साथ तुम्हारे नहीं होंगे।
मोहब्बतें भी बेजुबां होंगी पर इंसा हमारे जैसे नहीं होंगे।

चलो फिर लौट चलें उन हसीन लम्हों की महफ़िलों को।
अब ठुकरा कर भी क्या चलें ज़िन्दगी को, फिर क्या मुहब्बत करने को ज़िन्दगी ना मिले।।

3.

इश्क़ समन्दर की तरह ठहरा है
शांत लहरें भी खामोश है इसलिये
चलती है लहर दर लहर खामोश राहों से
कोई ना कोई भीग जाता है इस आसमाँ के नीचे
प्यार मुहब्बत की ठंडी लहरों से
जम जाती है ठंडी बर्फ की तरह
जब पिघलती है तो धीरे धीरे गुल जाती है
इक दूजे के दिल में
लगता है इश्क समन्दर की तरह ठहरा है
आज ख़ामोश लहरों में कुछ हलचल है

4.

तलाश है खुद की इन भीड़ में खोज रहा हूँ कहीं
यहीँ थमा था यही गुमा था। ढूंढ रहा हूँ कहीँ।
ख़ामोश राहों के इर्द गिर्द ठहरे मुसाफिरों को पूछ रहा हूँ।।
बता दो मेरी मंजिल लौटना है खुद को
चलते चलते ठहरना है घर को

5.

वक़्त खाली सा है पास मेरे
यूँही बैठे रहने को...
आईना सा साफ़ नजर आता है पास मेरे
स्मृतियों को बटोरने को....
धुंधली तस्वीरों ने कैद कर रखा है।
जकड़े सलाखों सी जंजीरों में 'मैं' को

6.

इस शहर में कोई जगह है जहाँ दो पल ठहर सकूँ।
हर बात अपने दिल को कह सकूँ।।
कोई है तो मुझे बतला दो बड़ा अहसान होगा
मुझ पर तुम्हारा...
जहाँ दो पल सांस ले सकूँ इस घुटन भरी दुनिया से निकल सकूँ।
कोई अल्फाज दबा सीने में उसे कागज़ पर उतार सकूँ।।

इस शहर में कोई जगह है जहाँ दो पल ठहर सकूँ।।।
कहीं अपने दिल को आवाज दे सकूँ

7.

तलाश है खुद की इन भीड़ में खोज रहा हूँ कहीं
यहीँ थमा था यही गुमा था। ढूंढ रहा हूँ कहीँ।
ख़ामोश राहों के इर्द गिर्द ठहरे मुसाफिरों को पूछ रहा हूँ।।
बता दो मेरी मंजिल लौटना है खुद को
चलते चलते ठहरना है घर को

8.

हर लम्हा तेरे साथ गुजारना चाहता हूँ ।
तुम्हें यूँही देखना चाहता हूँ।।
हँसते हँसाते जब तुम बोलती हो,
खुद को खोया सा महसूस होता है।
तुझमें ...बस तेरे साथ जीने का मन करता है।।
इक फलक चाँद तारों को पाता हूँ तो
दूजा कहीं गहरे समंदर में पाता हूँ।

जीना चाहता हूँ तेरे साथ...

9.

अहसास है तेरे छूने का खुद को।
खुद को तुझ में, तुझ को मुझ में कोई उतरन है।।
लबों पे आवाज़ नहीं तो अहसास की गहराई है।
आँखों में कोई नमकीन मस्ती सी तीर आई है।।

बालों की लटों को सुलझाने में भी या तेरे कोई पास तहजीब है।
लगता है की अहसास की लहरों पे कोई उतर आया है।।

10.

पास जो तुम बुलाओगे मैं चला आऊंगा।
जब सांस लोगी तो रूह में समा जाऊंगा।।

उन रास्तों को चलूं जो तेरे दर तक आये।
हर शाम को इंतज़ार करूं तू जो फलक तक आये।।

जहॉ रात चाँद सितारों को देख कर गुजर जाती है।
वहाँ जुल्फों के नरम साँसों में उमर सारी गुज़र जाती है।।

mukeshkumarmku@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. पिछले बिताये हुए लम्हों की अजीब कश्मकश है

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