शनिवार, 24 जनवरी 2015

सुशील यादव का व्यंग्य - मेहमान बुलाने की परंपरा

व्यंग्य````

मेहमान बुलाने की परंपरा

अपनी ‘बेटर हाफ’ को टी व्ही में सास-बहू जैसा सीरियल, आम महिलाओं की तरह, बहुत आनन्द देता है |

कभी-कभी जब इनके वाद-विवाद का समाधान ,मुझसे पूछ बैठती तो टाल-मटोल करने के अलावा मेरे पास कोई और रास्ता नहीं रह जाता |

मैं कहता ,रिपीट टेलीकास्ट जब आए तो बताना |

बात टल जाती |

उनका ये सीरियल देखना मुझे खलता नहीं |

 

वहीं ,जब वे ‘टेली-शापिंग’टाइप टेलीकास्ट में आंखें गडा लेती हैं ,और अनाप-शनाप बेमतलब की चीजों को ,आन लाइन मंगवाने की जिद करती हैं तो मैं उसी शिद्दत से, उन प्रोडक्ट का विरोध करता हूँ, जिस शिद्दत से ,वे खूबियाँ गिनाये होते हैं |

प्रोडक्ट की खामियां गिनाने में अडौस- पडौस में लिए हुए, या आफिस के काल्पनिक लोगों द्वारा ,खरीदे चीजों का ‘दुखद’ अनुभव बताता हूँ |

कभी कह देता हूँ, भले महंगा मिले , बाजार चल के ले लेंगे |वे मान जाती हैं |

पिछले दिनों टी वी के ब्रेकिंग न्यूज पर वो अटक गई |

‘मिस्टर प्रेसीडेंट’ को अपने पी एम् ने गणतंत्र दिवस का ख़ास मेहमान बनाने का न्योता भेज दिया है |उधर से न्योता स्वीकार किये जाने की पुष्टि भी हो गई ;जानकार वे अति उत्साहित हुई |

 

यों कि, ख़ास मौकों पर मेहमान बुलवाने की परंपरा अपने हिन्दुस्तानी रिवाज,रहन- सहन और कायदे का एक जरूरी हिस्सा बन गया है,अत; इस मौलिक परंपरा का निर्वाह गाहे-बगाहे, आम और ख़ास को, अपने-अपने तरीके से करना जरुरी हो जाता है |

वो मुझसे,‘ख़ास-मन्त्रणा’ के तौर पर 'डाइनिंग टेबल कांफ्रेस' कर डाली |हमारी केबिनेट मीटिंग की एकमात्र मुखिया के तौर पर उसने कहा ऐ जी .....सुनते हो .....|

मेरे नहीं सुनने का कभी सवाल ही नहीं होता !

मगर, ऐ जी के साथ ये दुमछल्ला सुनते हो जरुर चिपका होता है |जिसमे अक्सर उनके द्वारा दी जाने वाली जानकारी का रोल बखूबी होता है|

मैंने कहा सुन रहा हूँ ....

 

वो बोली क्यों न हम इस गणतन्त्र के मौके पर, उत्तरायण के आसपास ,अपने अमेरिका वाले फूफा बुआ को बुलावा लें ...?

वे जब-तब, फोन में कहते रहती हैं छह- सात बरस हो गए, इंडिया छोड़े ,तुम लोगों की बहुत याद आती है |

उन लोगों का घूमना-घुमाना हो जाएगा |इधर अपनी कालोनी में खूब धाक जम जायेगी |

सब को लगता है मैं उनके अमेरिका वासी होने के , किस्से बताने में, कुछ ज्यादा ही फेंकती हूँ ..,..?

जैसे ‘बराक ओबामा’ .वैसे अपने फूफा......... दोनों ब्रिलिएंट हैं .....?आपको कैसा लगता है ....?

मैंने कहा पहिले के बारे में तो मुझे खूब पता है |आये दिन अखबारों में पढ़ता हूँ |

दूसरे वाले मीडिया के कभी सामने नहीं आये सो.....कहते हुए, एक तिरछी नजर , कटाक्ष की परीक्षा में,प्रश्नकर्ता की ओर फेंकता हूँ |उस तरफ से बमुश्किल , बस एक फीकी हंसी उभर पाती है |

 

मैंने पूछा ,तुम्हें मालूम है ,बुआ -फूफा को इन दिनों बुलाने का अपना खर्चा कितना हो जाएगा ....?बुलान्ने चली .....|

देखो मोटे मोटे हिसाब मैं गिनाये देता हूँ |आगे कुछ कह पाता वे फट पड़ी......

आप तो रिश्तेदारी में भी अपना हिसाब- किताबी दिमाग दौड़ा देते हैं |

ऐसा थोड़े न होता है ....?

मैंने कहा ...भागवान् ज़रा सुन लो, फिर बोलना .....|वो बेमन से जुम्हाई लेते हुए कहती हैं ....सुनाओ .....

मैंने कहा ,देखो ....ये घर की हालत देख रहीं हो, कहीं प्लास्टर उधड़े हैं कहीं दाग धब्बे नजर आ रहे हैं ...?ठीक करना पड़ेगा कि नइ......?

सो तो करवाना ही पड़ेगा ,इस भूतिया हवेली के ‘भाग इसी बहाने जग जायेंगे’,आप तो सर पटक लो कुछ करवाने से रहे |

मालूम है इसके ‘भाग जगाने’ के चक्कर में कितना लग जाएगा ......?फिर आगे एक बाथ रूम में कामोड बिठाना पडेगा ,जब कामोड लगेगे तो साथ में टाइल्स की भी फरमाइश होगी ,फिनिश करते कराते दो लाख घुस जायेंगे |

 

आगे लान में झाड़ - झंखार उग आये हैं |करीने से सजाने ,और घास लगवाने में पच्चीस –पच्चास हजार की चपत यहाँ भी पड़ेगी |

ये सब न किया तो आते ही भुक्कड़ समझने में, वे लोग कतई गलती नहीं करेंगे |

हमें अमेरिकन सीख दे जायेंगे ,मेहनत नहीं करने की बात कहेंगे सो अलग |

ये तो चलो प्रोडकटिव खर्चे हैं,मान भी ले, घी अपनी ही खिचड़ी में घुसेगी, |हमें भी अच्छा लगेगा....|.है कि नइ.....?

अब आगे देखो ,बाम्बे उतरेंगे यहाँ से टेक्सी लेके रिसीव करने जाना उनको वापसी में फिर वैसे ही भेजना ,टैक्सी टैक्सी में पच्चास लग जायेंगे |

वे बाहर से आयेंगे ,ओबामा तो हैं नहीं जो उलटे पाँव लौटा –बाटी कर लें |तीन से छह महीने जान लो, रुक के ही रहेंगे |

ऐ.सी. के बिना वे रहने वाले नहीं |

 

चौबीस घंटे जब ऐ.सी. चले ,तो जानो बिजली -मीटर किस रफ्तार से घूमे .....?अपने पिछले बिल पर तुम हिदायतें दे रही थी दिन-रात कंप्यूटर लिए रहते हो ,बिजली खिंचता है |

उनको तीव्र गति का ब्राड- बेंड चौबीस घंटे वाला लगवाना होगा |अपने जैसे नहीं कि, साईट खुल गई तो वाह -वाह नहीं तो कम्पूटर -लेपटाप बंद |

और हाँ ,वे नान- वेज हफ्ते में चार से पांच दिन जरुर खाते हैं |तुम घर में बनाने दोगी नहीं| बाहर,पर डे हजार से कम में आयेगा नहीं |हप्ते का पांच- सात हजार अलग लगेगा ....?मैं ज्यादा बोल रहा हूँ तो थोड़ा बहुत कम कर लो, ये तो बस अंदाजा है ....|

 

अब इंडिया सात साल बाद आ रहे हैं तो तुम्हें जगह- जगह घुमाने ले जाना पड़ेगा |

वैसे वे द्वारिका सोमनाथ की कभी कह रहे थे....., देखना है |घुमाना -फिराना मेरे बस की बात नहीं |ये सब तुम ही निपटाना मुझे आफिस से इतनी रियायत तो मिलने से रही .....|

बेटर हाफ की आंखें, जो जुम्हाई -ग्रस्त थी, विस्फारित हो के अब बाकायदा खुलने की सी हो गई थी |

वे कहने लगी इतना सारा खर्चा ..?.मैंने तो सोचा भी नहीं था .....?

उनका क्या...? वे मुंह उठाये चले आते |दो एक पैकेट चाकलेट ,इयररिंग ,एकाध पेन ड्राइव,टी शर्ट और क्या होता ...?इससे ज्यादा तो, जाते वक्त मसाला, मिठाई, अचार, पापड में अपना निकल जाता |

मिस्टर प्रसीडेंट के आने पर कौन निपटता है इन सब चीजों से जी ....?

मैंने कहा उधर की सोचो ही मत ....|

 

सरकारी बंदोबस्त में सिर्फ सेक्युरिटी के ,और दीगर बाहरी तामझाम की सुनोगी तो होश उड़ जायेंगे |

फिर आप क्या कहते हैं.......?

अपनी मति भी इतनी फिरेली नहीं है मिस्टर .........|

हाँ मगर.......

एक बार सोच लिया तो मुकरना भी जमता नहीं ....|चलो कुछ घर में ही इन्वेस्ट कर लो .....सोच लेंगे किसी कारणवश वे लोग नहीं आ सके |

एक दूसरी बात कहे..... ?

 

अपनी प्रश्नवाचक जुमले को उन्होंने आगे यूँ पूरा किया

.......अपनी छोटी बुआ फूफा ,वो....जो ..आलामपुर गाव वाले......

दिल के बहुत सीधे सच्चे हैं| क्यों न उन्ही लोगों को उत्तरायण में बुलावा लें |यहाँ की पतंगबाजी देख लेंगे |अपनी गाड़ी से आसपास घुमवा देंगे |बड़ों का आशीष समय समय पर लेते रहना चाहिए |ऐसा बुजुर्गों ने कहा है...... शुभ होता है .......|

बिना किसी बुजुर्ग की कैफियत लिए, मै खामोश रहा ,मुझे पहली बार बिना बहस के ,बड़ा मुद्दा चुटकियों में हल होते दिखा |

मुझे अपनी ‘हाफ’ पहले से ‘बेटर’ लगने लगी |

 

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ ग )

susyadav7@gmail.com

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