सोमवार, 19 जनवरी 2015

प्रमोद यादव का व्यंग्य - हाय अकेला छोड़ गए..

 

‘ अब क्या होगा जी ? ‘ पति को चाय देते पत्नी एकाएक पूछी.

‘ क्या होगा से मतलब ? क्या गैस सिलिंडर ख़त्म हो गया ? ‘ पति ने उलटे पत्नी से पूछा.

‘ अरे नहीं जी..ऐसा होता तो दूसरा लगा लेती...तीसरा-चौथा भी रखा है...पर “उनके” तो एक-एक कर सब गायब हुए जा रहे..’

‘ पहेली मत बुझाओ यार...साफ-साफ बोलो- किसके क्या गायब हुए जा रहे ? ‘ पति झिड़का.

‘ आप भी ना..पूरे ट्यूबलाईट हो..बिना स्टार्टर के जलते ही नहीं..अरे बाबा मैं “आप” की बात कर रही हूँ..आपने झाडू हाथ में ले इसे देश की सबसे स्वच्छ पार्टी का सर्टिफिकेट दिया था.. अब तो दूसरी पार्टी ने उनका झाड़ू ले उन्हें ही “साफ़” कर दिया है.. ’ पत्नी जोर से बोली.

‘ तुम यार आजकल जासूसी कहानी की नायिकाओं की तरह रहस्यमयी बातें करने लगी हो..सीधे-सीधे नहीं कह सकती कि पार्टी के विषय में कह रही हूँ..’

‘ पार्टी मत कहो जी..पार्टी में तो अनगिनत लोग होते हैं..यहाँ तो गिनती के हैं.. और उनकी भी उलटी गिनती चल रही..पिछले चुनावी हार के बाद से इनका विघटन इस गति से हुआ कि “राम नाम सत्त” हो गया...किसी ने तो सीधे-सीधे “उनसे” कहा भी कि यही हाल रहा तो पार्टी में किसी दिन केवल “”आप” रह जाओगे..’ पत्नी एक सांस में धारावाहिक बोली.

‘ ऐसा नहीं है यार..अभी भी एक बड़ा जनाधार -“हम साथ-साथ हैं“ के तर्ज पर उनके साथ है..तभी तो हजारों लोग उनका “बीस हजारी” डिनर खा चंदा दे रहे..’

पत्नी बात काटते बोली- ‘ कितना भी चंदा ले लें.. मिलना तो इन्हें “अंडा” ही है..’

 

‘ तुम्हारी सोच बहुत निगेटिव है यार..कभी-कभार अंडे की जगह “आमलेट” भी सोच लिया करो..किसी के बारे में थोड़ी अच्छी सोच रखने में क्या बुराई है ? ‘ पति ने समझाया.

‘ वो तो ठीक है प्रभु..लेकिन दिल्ली के दंगल में इन दिनों जो उठा-पटक चल रहा है उससे आपको लगता नहीं कि ये चारों खाने “चित्त” हो जायेंगे..जब अन्य पार्टियां चुनावी “दांव-पेंच“ के बिगुल फूंक रहे..दंड पेल रहे..ताकत दिखा रहे तो इनकी पार्टी लंगोट के लिए चंदा इकट्ठा कर रही.. अब की बार भला कैसे और किस दांव से जीतेंगे ? अच्छे भले सी.एम.से मात्र एम.एम.( मफलर मैंन ) रह गए.. अब “ सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या हुआ..” और अकेले जीत भी गए तो क्या उखाड़ लेंगे ? वो कहावत है न- अकेला चना भाड नहीं झोक्ता..’

‘ देखो भागवान..ये अकेला-अकेला वाली बात मत करो..अभी भी उनके पाले में ( पार्टी में ) चार शूरवीर है..’

‘चार मत कहिये..एक तो कवि है जो बहुत वीक हैं.. राजनीति को उनकी कवितायेँ रास नहीं आई इसलिए पिछले चुनाव में हूट होकर हांर गए....और भगवान् जाने मतदान के दिनों तक ये चारों भी साथ बने रहेंगे या नहीं ? तब अकेले वो क्या करेंगे ? ‘ पत्नी ने संदेह व्यक्त करते कहा.

‘ अरे..फिर वही अकेले..मालूम नहीं शेर अकेला होता है लेकिन उसकी ताकत कितनी होती है ? ‘

 

‘ वो तो ठीक है प्रभु.. पर मैं जंगल की नहीं दिल्ली की बात कर रही हूँ.. लोकतंत्र की बात कर रही हूँ..यहाँ पार्टी या पार्टी-अध्यक्ष की ताकत कार्यकर्ताओं से होती है.. पार्टी नेताओं से होती है..संगठन से होती है.. लेकिन यहाँ तो केवल ठन-ठन है.. न संगठन..न नेता न कार्यकर्ता..निपट अकेले वही कर्ता-धर्ता..

‘ तुम समझती नहीं यार..एक अकेले आदमी की ताकत का तुम्हें अंदाजा नहीं...वो अभी भी अगर दिल से एक बार गुनगुना दे- “अकेले हैं...चले आओ...जहाँ हो” तो सारे के सारे साथी अभी लौट आयें..’

‘ अरे तो गुनगुनाते क्यों नहीं ?..उनके लोग दीगर पार्टियों में समाते गए..तब भी नहीं गुनगुनाये..दीगर पार्टियों की टिकिट से खड़े हो गए..तब भी नहीं गुनगुनाये.. अब क्या बर्बादी के बाद बाथरूम में बैठ गुनगुनायेंगे ? ’

‘ अरे समय मिले तो गुनगुनाये न.. यहां तो सवाल-जवाब से फुर्सत नहीं..चुनाव में विकास की बाते कोई नहीं कर रहा..बस आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा.. सब एक-दूजे की टांग खींच रहे..कोई मान-हानि के दावे ठोक रहा तो कोई दावे के साथ सबूत ठोक रहा..इस ठोका-ठोकी में मतदाता कुंठित हो ठुक रहा..ऐसे में कोई क्या गुनगुनाये ? लेकिन इनकी दरियादिली देखो..इन्होंने जानेवालों को कभी नहीं कहा कि “हो सके तो लौट के आना” बल्कि हमेशा उन्हें शुभकामनाये दी कि “ जा..तुझको सुखी संसार मिले..” ये एक नेक और साफ़-सुथरे आदमी की पहचान है..’ पति ने सफाई दी.

‘ नेक और साफ़-सुथरे इंसान की एक पहचान और है जी...वे राजनीति में नहीं होते..’

‘ मतलब ? ‘ पति ने पूछा.

 

‘ मतलब आप समझ रहे हैं..पर शायद मुझसे बुलवाना चाहते हैं... तो सुनिए- वे भी कोई दूध के धुले नहीं..तभी तो सारे साथी एक-एक कर उन्हें छोडे जा रहे..ना ये कह पा रहे कि “तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं.. तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी ” ना ही किसी से अपना दर्द साझा कर पा रहे कि “छोड़ गए बालम..हाय अकेला छोड़ गए..”

‘ अरे..तुकबंदी ही करती रहोगी या बताओगी भी कि इस बार किसने उनके साथ “दगा..दगा.. वई- वई“ कर दिया ? कौन है खलनायक ? ‘

‘ खलनायक नहीं ...नायिका है वो..’ पत्नी गुनगुनाई.

‘ तो बताओ अब ताजा स्थिति क्या है पार्टी की ? पति ने हिसाब माँगा.

‘ तीतर के दो आगे तीतर..तीतर के दो पीछे तीतर..आगे तीतर..पीछे तीतर.. केवल इतने तीतर..’

‘ मतलब कि “ कर चले हम फ़िदा..” वाली घडी आ गई पार्टी की....’ पति ने कहा.

‘ हाँ..बस इन्हें ट्वीट करना भर रह गया है- अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो..’ पत्नी बोली.

 

‘ अच्छा यार..बहुत हो गया..मेरा भारत महान.. अब वतन को छोडो..और जतन के साथ कोई तीतरनुमा डिश पेश करो.. तीतर-तीतर बोलकर तुमने दिलो-दिमाग को तीतरमय कर दिया है .. बढ़िया दिलकश मौसम है..और जोरों की भूख भी ..जल्दी करो नहीं तो तुम्हे ही चबा जाऊँगा..’

पत्नी “ ये लो मैं हारी पिया “ जैसे अंदाज में पति के सामने कोर्निश के अंदाज में झुककर गुनगुनाते हुए बोली-‘ मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ यार ...टपका ले पिया..’ और खिलखिलाते हुए पति से लिपट गई.

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प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

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