शनिवार, 24 जनवरी 2015

वीरेन्द्र सरल का व्यंग्य - ऋणं कृत्वा मद्यं पिवेत

व्यंग्य

ऋणं कृत्वा मद्यं पिवेत

वीरेन्द्र 'सरल'

वह आदमी पागल था या सिरफिरा यह मैं नहीं जानता पर उसकी अजीबोगरीब हरकत देखकर मैं ऐसा सोचने के लिए बाध्य था। अभी वह दारूभट्ठी के सामने खड़ा था। हाथ जुड़े हुये थे और सिर श्रद्धा से झुका हुआ था। वह कुछ बुदबुदा रहा था। पता नहीं किस मंत्र का जाप कर रहा था। मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की तो कुछ-कुछ बातें स्पष्ट सुनायी देने लगी। वह कह रहा था ''हे टेंशनहारी देवी, आज मैं बहुत ही टेंशन में हूँ। देवी! दया करो, मेरी टेंशन हरो। आप शहर से दूर इस सड़क के किनारे स्थापित हो, इसलिए लोग आपको 'सड़क छाप' भट्ठी कहते हैं। मगर आप यहाँ वैसे ही सुशोभित हो जैसे कार्यालयों में घूस। शहर के भीतर धार्मिक स्थलों और शैक्षणिक संस्थाओं के आस-पास स्थापित आपकी अन्य बहनें अपने आप को कुलीन मानती हैं और आपको शुद्र। वे आपके साथ ऐसा व्यवहार करती हैं जैसे आप उनकी जाति से बहिष्कृत हों। मगर आप उनकी बातों को गलत मत समझना । उन्हें माफ कर देना क्योंकि वे नहीं जानती कि वे क्या कह रही हैं। आप भले ही यहाँ झोपड़ीनुमा मकान में स्थापित हो पर आपकी छत्रछाया में महलों वाले आकर भी टेंशनफ्री होते है। दिन के उजालों में इज्जत को तमगे की तरह धारण कर इतराने वाले लोग रात के अंधेरे में यहाँ आकर अपनी इज्जत साँप की केचुली की तरह उतार फेंकते हैं और सुबह होते ही फिर धारण कर लेते हैं

आपने अच्छे-अच्छे लोगों को नंगई यहाँ देखी है। फिर भी आपने सबको टेंशन फ्री किया है। आपकी कृपा से यहाँ आने वाले सभी लोगों के आपसी भेद मिट जाते हैं। यहाँ ना कोई छोटा होता है और न बड़ा। ना कोई ऊँच ना कोई नीच। ना कोई गरीब ना अमीर, आपके दरबार में सब बराबर होतें हैं। आपकी कृपा से यहाँ समानता का ऐसा भावस्थापित होता है जो अन्यत्र शक्तिशली टार्च लेकर ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलेगा। यदि मैं चिराग वाली बात करूँ तो वह पुरानी बात होगी और आपके शान में गुस्ताखी करने के समान होगी। आप धन्य हैं देवी। आपकी कृपा हम पर हमेशा बनी रहे। मेरा प्रणाम स्वीकार कर मुझे आशीर्वाद दीजिये ताकि मैं हमेशा तनाव रहित रह सकूँ।'' दारू भट्ठी की इससे ज्यादा स्तुति सुनने की मेरी सीमा वैसे ही समाप्त हो रही थी जैसे चुनाव जीतकर किसी नेता के मंत्री बनने पर शिकायत सुनने की हो जाती है। मैं आगे बढ़ गया लेकिन पीछे लौटकर उसे कनखियों से देखने का लोभ नहीं रोक पाया। इसलिए कुछ दूर बढ़ने के बाद मैंने मुडकर उसे देखा। वह दारूभट्ठी को दण्डवत प्रणाम कर उसकी चरण धूलि माथे से लगाते हुये नजर आया। उसका चेहरा मेरी स्मृतियों के कैमरे में कैद हो गया।

 

यह बात लगभग चार-पाँच वर्ष पहले की है। मैं इसे भूल चुका था। इसी बीच हमारे मोहल्ले में एक नया मकान बना। उसमें एक सज्जन परिवार सहित रहने लगे। मोहल्ले वाले उसे फाइनेन्श मिनिस्टर कहते थे। मुझे यह नाम बड़ा ही अजीब लगता था। मैंने पड़ोस वाले काका से पूछा तो उन्होंने बतलाया कि दरअसल उसका नाम उधारी लाल है। लोग प्यार से उसे फाइनेन्श मिनिस्टर कहते हैं। काका ने मुझे समझाने की भरपूर कोशिश की मगर बात मुझे समझ में नहीं आ आई।

 

दो-चार माह बाद एक दिन वे सुबह-सबेरे मेरे घर धमक पड़े और पड़ोसी मुल्क की तरह मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। अब मेरे पास विश्वासघात मापने की कोई मशीन तो थी नहीं जो मै उसे पूरी तरह जाँच-परख लेता। पास में रहना है तो दोस्ती का हाथ थामना मेरी मजबूरी थी। उसका चेहरा मुझे जाना-पहचाना भी लग रहा था। मगर मैंने उसे कब देखा था यह मुझे ठीक से याद नहीं आ रहा था। हम आमने-सामने बैठकर कुछ औपचारिक बातचीत करने लगे। मेरे मन में उसके नाम के प्रति जो जिज्ञासा थी, मैंने वह उसके सामने प्रकट कर दी।

 

पहले वह धमाकेदार ठहाका लगाया फिर बोला-''देखिये ऐसा है। अपने यहाँ दिन, माह, मौसम, ऋतु या किसी आदर्श व्यक्ति के नाम पर किसी नवजात शिशु के नामकरण करने की बड़ी समृद्ध परम्परा रही है पर आजकल टी वी सीरियल और फिल्मों की कृपादृष्टि से शिशु के जन्म के समय चलने वाले सीरियल, फिल्म, उसके पात्र या उसमें काम करने वाले कलाकारों के नाम पर नामकरण करने का नया फैशन चल पड़ा है। प्रेम, करूणा, दया, क्षमा जैसे मानवीय मूल्यों को प्रदर्शित करने वाले भावपूर्ण नाम अब हाशिये से बाहर ढकेले जा रहे हैं। वैसे नाम और काम में साम्य हो यह कोई आवश्यक नहीं है। कहीं शेरसिंह दुम हिलाते हुये नजर आता है तो कहीं सियारसिंह दहाड़ते हुये। कहीं सत्यनारायण झूठ बोलते हुये पकड़ा जाता है तो कहीं हरिशचन्द्र 'चमड़ी जाये पर दमड़ी ना' जाये वाले सिद्धान्त को आत्मसात किये होता है। पर स्थिति तब और भी विकराल हो जाती है जब लोग अपने पालतू पशुओं के नाम भी बिना सोचे समझे रख देते हैं। किसी शेरू कुटीर के सामने आवाज लगाने पर कोई सभ्य आदमी मुस्कुराते हुये मिलता है तो मोती विला पर आवाज देने पर कुत्ता भौंकता नजर आता है। मेरे नामकरण की कथा भी बड़ी रोचक है। मेरी दादी बताती थी कि मेरा जन्म घोर गरीबी में हुआ। जब मैं पैदा हुआ था तो मेरे पिताजी को मेरे जन्मोत्सव मनाने के लिए उधार माँगना पड़ा था। इसलिए मेरा नाम उधारी लाल रखा गया। मैं आज तक अपने नाम के अनुरूप ही काम करते आ रहा हूँ। 'यथानाम तथा गुण'। मेरे नाम और काम में ऐसा अनोखा साम्य है कि कोई भी आज तक मेरी ओर ऊँगली नहीं उठा सका है। इस हिसाब से में मैं एक दुर्लभ प्राणी हूँ। सरकार को चाहिए कि मुझे राजकीय सम्पत्ति घोषित करके पुरातत्व विभाग के सग्रंहालय में रखे। मैं इस दिशा में निरन्तर प्रयास कर रहा हूँ। उम्मीद है कभी-न-कभी तो कामयाबी मिलेगी ही।'' मैंने पूछा-''मगर आपने अभी तक अपने काम के बारे में कुछ भी नहीं बताया?'' उसने कहा-''सारी बाते पहिली ही मुलाकात में जान जायेंगे क्या? पास में ही तो रहेंगे। धीरे-धीरे आपको मेरे नाम की महिमा के साथ-साथ मेरे जनहितकारी काम की सारी बाते समझ में आ जायेगी।'' इतना कहकर वह चला गया।

 

एक दिन मैं उधारी लाल के घर के सामने से गुजर रहा था। मुख्य दरवाजा बंद था पर उसके सामने लोगों की लम्बी कतार थी। मैं समझा शायद उधारी ला जी सुबह-सुबह दान-पुण्य करते होंगे। मैं गली में मुड़ गया तो देखा उधारी लाल पिछले दरवाजे पर बैठकर आराम से अखबार पढ़ रहे थे। अचानक उसकी नजर मुझ पर पड़ गई तो उन्होंने मुझे आग्रहपूर्वक बुलाया, घर में बिठाकर चाय पिलायी। मैंने पूछा-''उस दिन आपने अपने काम के बारे में कुछ नहीं बताया। क्या आज बताना पसंद करेगें? वैसे आपके पास तो काफी शान-ओ-शौकत है लगता है कुछ तगड़ा कारोबार है। सुबह-सुबह आपके दरवाजे के सामने दान-दक्षिणा लेने वाले लोगों की लम्बी कतार लगी है।'' पहले वह मुस्कुराया फिर अपना मुँह मेरे कान के पास लाकर फुसफुसाते हुये कहा-'' सामने दरवाजे पर ताला लटका हुआ है। उन लोगों की मैंने ऐसी सेवा की है कि वे आज तक मुझे नहीं भूल पाये हैं और मेरे पीछे पड़ गये हैं। ये सब तो मेरे नाम की महिमा है। मुझे कुछ समझ में नहीं आया फिर भी मैंने अंधेरे में तीर छोड़ते हुये कहा-''मतलब आप उधार माँगते हैं और लोग आपको दे देते है। अच्छा मजाक कर लेते है आप। भई! लोग दो-चार बार आपके झासें में आकर उधार दे सकते है पर बार-बार नहीं इतना तो मैं समझता हूँ। उसने मुझे समझाते हुये कहा-''भाई साहब! मैं बहाने बाजी वाली पुरानी पद्धति से उधार नहीं माँगता। नये जमाने के हिसाब से आधुनिक और कलातमक शैली से उधार माँगता हूँ। और लोगों की सेवा करता हूँ।'' समयाभाव के कारण मेरा वहाँ ज्यादा समय तक बैठना संभव नहीं था। इसलिए मैं फिर कभी के अंदाज में वहाँ से उठकर चला आया।

 

तीन-चार महीने के भीतर ही ये उधारी लाल जी बारी-बारी से मोहल्ले भर की सेवा कर चुके थे। जब मेरी बारी आई तो एक दिन फिर मेरे पास भी पहुँच गये और मुस्कुराते हुये कहने लगे-''मेरे लायक कोई सेवा है?'' मैंने पूछा-''कैसी सेवा?'' उसने कहा-''जैसे किसी की नौकरी लगवानी हो, किसी का स्थानान्तरण कराना हो, किसी को लोन दिलाना हो या किसी को बहुत जल्दी करोड़पति बनना हो।'' मैंने कहा-''मियां! अभी तक हम तो ठीक से पत्नी पति भी नहीं बन पाये, करोड़पति क्या खाक बनेंगे? यहाँ हमारे लायक ही सेवा नहीं है, आपके लायक क्या होगी। बहुत समय तक वह सेवा करने की जिद पर अडा रहा पर मैंने उसे मना कर दिया। अपना सब दाँव फेल होते देख वह अन्त में अपना असली रूप में प्रकट होते हुये हाथ जोड़कर बोला-''सर! सौ रूपये उधार ही दे दीजिये। अब आपसे क्या छिपाना मुझे शराब पीनी है। कई दिनों से इधर-उधर भटक रहा हूँ पर कोई शिकार नहीं फँस रहा है। बड़ी तलब हो रही है सर, सौ रूपये दे दीजिये वरना मैं अपना सिर पटक-पटक कर यहीं अपनी जान दे दूँगा।''

मैंने उसे समझाने की कोशिश की -''आप शराब नहीं अपनी जिन्दगी पी रहे हैं। समय रहते सचेत हो जाइये नहीं तो बाद में पछताना पड़ जायेगा। उसने दार्शनिक अंदाज में भाषण झाड़ते हुये कहा-''शरीर तो नश्वर है। संसार में बहुत से जीव हैं जिनके पास शरीर है। अब सबको नष्ट करने में प्रकृति को कितना समय लगता होगा आप अंदाज लगा सकते है। हम कुदरत के कार्य में सहयोग कर रहे हैं। अपने शरीर को जल्दी नष्ट करने के लिए शराब पी रहे हैं। अब आप मुझे जल्दी से दो सौ रूपये दीजिये नहीं तो मैं अपना शरीर यहीं नष्ट कर दूँगा। मैंने पहले आपसे सौ रूपये कहा था पर आपने मेरा समय बरबाद किया और मुझे भाषण देने पर मजबूर किया है। इसके सौ रूपये अतिरिक्त चार्ज मिलाकर दो सौ रूपये हुये।'' मैंने ना-नुकुर करने का की कोशिश की तो उसने फिर धमकाया देतें हैं या नष्ट करूँ अपना शरीर। मैं उसकी धमकी से डरा या पुलिस के लफड़े से ये तो मुझे पता नहीं। पर दो सौ रूपये देकर मुझे उससे अपना पीछा छुड़ाना पड़ा। वह 'ऋणं कृत्वा मद्यं पिवेत' कहते हुये चला गया। अचानक बिजली की तरह दिमाग में एक बात कौंधी और मुझे याद आया हो न हो यह उधारी लाल वही आदमी है जो मुझे लगभग पाँच वर्ष पहले दारूभट्ठी की स्तुति करते दिखा था।

वीरेन्द्र 'सरल'

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी( छत्तीसगढ़)

saralvirendra@rediffmail.com

1 blogger-facebook:

  1. dinesh chauhan10:01 pm

    वीरेन्द्र,
    'ऋण कृत्वा मद्यं पिवेत'अच्छा व्यंग्य है। लिखते रहो। बधाई!
    —दिनेश चौहान

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