शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

राहुल देव के कविता संग्रह ‘उधेड़बुन’ पर दिनेश सोनी की समीक्षा

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युवा कवि राहुल देव द्वारा विरचित काव्य संग्रह ‘उधेड़बुन’ जो जीव व आत्मा, जगजंगमों की उलझनों को कल्पना यथार्थ के भावों से सुलझाने का प्रयास है | जैसा कि स्वयं कवि की स्वीकारोक्ति है ‘वास्तव में मैं कविता लिखता नहीं स्वयमेव लिख जाती है’ वास्तव में कविता ऐसे ही बनती है | न बनाने से बनती है, न मिटाने से बनती है |

मुक्तछन्द में रचित इस काव्य संग्रह की ‘अपने अंतर में ढालो’ नामक रचना एक मुक्त मंगलाचरण का स्वरुप है | परम्परागत न होते हुए भी देखें- ‘मैं बलाक्रांत भ्रांत जड़मति/ विमुक्ति, नव्यता, ओज मिले |’ कवि का अभीष्ट पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है | ‘छद्मावरण’ एक लम्बी रचना है किन्तु यदि देखें तो एक दो नहीं वरन समस्त कवियों को यह कविता अपनी किसी न किसी पंक्ति से अवश्य जोड़ती है यह रचना | इसे हम छद्मावरण नहीं वरन कवि का पर्यावरण कहें तो ज्यादा उचित होगा | इस कविता की अंतिम चार पंक्तियों को उदृत करना चाहूँगा जो अति सहज व अति दुरूह है | यथा- ‘बच्चे अभी भी सो रहे थे/ सूरज निकल आया है/ चिड़ियाँ चहचहाने लगीं थीं/ सुबह हो गयी थी |’ यहाँ पर बच्चे वे हैं जिन्हें वास्तव में ज्ञान नहीं अतः वे सो रहे हैं | सूरज का निकलना व्यापक रूप से आशा का प्राकट्य है तो चिड़ियों का चहचहाना यशोगान तथा सुबह का होना निरंतर विकास जो उलझन को सुलझाने की वेला भी हो सकती है | ‘सपने की बात’ में मनोभावों को कल्पना और यथार्थ, आशा और निराशा, जीवन की विविधताएँ एवं विडम्बनाएँ जैसा कि कवि कहता है – ‘सपनों ही सपनों में समय कैसे बीत गया/ पता ही न चला/ और मैं दो बच्चों का बाप बन गया |’ निश्चित रूप से बात कहाँ से उठती है और कहाँ होती हुई कहाँ समाप्त होती है इसका कुछ पता नहीं चलता किन्तु घटनाक्रम, भावतरंगों का निरंतर बदलते रहना कहीं कड़वा सच है तो कहीं सुखद कल्पना | कुल मिलाकर सपना देखने में बुराई क्या है | स्वप्न तो भारतेंदु हरिश्चंद ने भी देखा था और राहुल भी देख रहे हैं |

‘मौन व्यथा’ वह सबकुछ कहती है जिससे कवि व्यथित है | क्रूर नियति के हाथों के खेलते हुए साहसपूर्ण ढंग से जो फक्कड़ है उसे भूख, प्यास, अभावों से लड़ना ही पड़ता है यह अलग बात है कि किसी से शिकवा शिकायत की बजाय स्वपथ पर चलता रहता है – ‘लौट पड़ता/ प्रत्यूष दिवस की आस में/ खो जाता/ घर आकर देखता/ सभी सोये हैं/ वह भी नीरव एक ओर पसर जाता/ और सो जाता |’ वस्तुतः यही ‘उधेड़बुन’ है | जो सोये हैं क्या भूखे ही | वह भी बिना कुछ कहे क्या भूखा ही सो जाता है | यही व्यथा जो मौन होकर भी मुखर है | ओह कामना वह्नि, चिंतन, कविता, नायक, विश्वनर से कवितायेँ अच्छी लगीं तभी कर्म या यूँ कहें निष्काम कर्म की परिभाषा बड़ी ही सहज किन्तु जीवन से जुडी नियति की निर्ममता को नकार देने का जीवट ‘रूखा सूखा खाय के ठंडा पानी पीव’ रहीम की पंक्तियाँ साकार होती हैं |

‘नवजीवन’ में नई आशा की डोर पकड़े हुए कवि गिरते मूल्यों की झंझावात में नवसृजन की जुगत लगाता दिखता है – ‘नित नव नवल मानव/ हाँ हाँ मैं बनूँ वही मानव/ केवल मानव/ आये सुप्रभात |’ अंतर्द्वंध, प्रतीक, सेज मन को झकझोरती हैं | इतनी सहजता से कोई कह जाता है वह जो अनकहा सा लगता है | ‘ओस की वह बूँद’ में नवशक्ति, जीवन और नवआशा समेटे ओस आशावादियों को संबल अवश्य देती है | ‘परख’ की व्यापकता, बदलते मानक और प्रतीक, परम्पराएँ सभी कुछ कवि अपनी कसौटी पर परखना चाहता है | ‘पाप’ की इच्छित किन्तु अच्छी परिभाषा है यह कविता जिसे अंत में प्रायश्चित कर मुक्त होने का समाधान देता हुआ कवि ‘रहस्य’ की ओर मुड़ता है | प्रश्नों का इंद्रजाल जो अनुत्तरित रह जाता है पाठक को सोचने पर विवश करता है उन सभी प्रश्नचिन्हों पर |

पथिक भ्रमित न होना, बच्चे और दुनिया, सिर्फ कविता के लिए, सौन्दर्य बनाम शेर में कवि ने अपनी भावधारा चंचल अवश्य रखी है किन्तु वह भटकती नहीं | वह सजग है तभी तो वह ‘आधा सच’ के मुन्ना भाई की परत दर परत खोलता है और स्वयं जस का तस रह पाता है और अबाध गति से अपना काम (कविता) कर पाता है | भ्रष्टाचार में कवि ने अनूठे कटाक्ष किये हैं सम्पूर्ण तंत्र पर सवालिया निशान लगाया है | यथा- ‘मैंने सच्चाई के हाथ से समय की प्लेट छीनकर/ बरबादी की पार्टी में/ अपनी जीत का जश्न मनाया/ मेरी इस जीत में तुम्हारी नैतिक कमज़ोरी का बड़ा योगदान रहा |’ इस तरह स्वयं पर इतराता हुआ भ्रष्टाचार सभी को ठेंगा दिखाकर कहता है- ‘आज के युग में मैं सदाबहार हूँ/ जी हाँ, मैं भ्रष्टाचार हूँ |’

अक्स में मैं और मेरा शहर, कविता और कविता, हारा हुआ आदमी, अनिश्चित जीवन-एक दशा दर्शन, जहाँ समाज को पैनी दृष्टि से देखती है | नैतिक पतन, धर्म, शांति और मानवता के खोखले स्वरुप तथा जिन पर कर्णधार होने का भार है वे वास्तविकता से दूर विलासिता का जीवन बेपरवाही से जी रहे हैं | श्रम का मूल्य है न सार्थकता | कविता निश्चित रूप से मात्र कल्पना की विषयवस्तु नहीं हो सकती | वह यथार्थ और मनोभावों का युग्म है यही कारण है कि अब कवि हृदय के साथ साथ मस्तिष्क का प्रयोग करते दिखते हैं |

मेरे मन, प्रेमपथ का पथिक, अंतिम इच्छा में कवि ने प्रेम के उगते अंकुरों को कविता में समाहित किया है तभी तो शलभ और दीप की व्याकुलता में अपना बिम्ब देख सकता है वह | अंतिम इच्छा में कुछ अधिक मुखर हुआ है | वह प्रियतम के प्रति अपनी वेदना बेधड़क व्यक्त करता है | जीवन की कटु सच्चाई का वह चितेरा लगता है | अंतिम इच्छा बताकर भावधारा को करुणा से सराबोर कर देता है और चुप इसलिए हो जाता है कि इससे आगे भी विश्व रहेगा किन्तु कहने वाला कौन ? यह प्रश्न छोड़कर जाता है सभी के लिए – ‘बस तुम्हारी गोद में सर रख / में भी चिर निद्रा में सोना चाहता हूँ/ तुमने तो अपनी कोई इच्छा बताई ही नहीं/ लेकिन इसे तुम मेरी/ अंतिम इच्छा समझ सकती हो/ शब्दों से हीन हो गया हूँ मैं/ भाव-धारा तुमको समर्पित/ और मैं चुप होता हूँ !’

नशा, अपराधी, सज्जनों के लिए, कौन तुम, मेरे सृजक तू बता, ये दुनिया ये जिंदगानी, जैसी कविताओं में कवि ने कुछ अलग ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास किया है | हालांकि तेवर वही है जो बिम्बों को बहुकोणीय दर्पण में निहारता है तभी तो उसे समस्त संसार टुकड़ों में दिखता है लेकिन जब स्थिति स्पष्ट नहीं दिखती तो वह जोड़ने की बात करता है तथा मुस्कुराना, यह लाजिमी है क्योंकि स्थिति ज्यों की त्यों रह जाती है |

‘गाँव से शहर तक’ में गाँव का शहरीकरण तो हुआ है किन्तु गांवों की मौलिकता खो गयी है | यही दर्द जो मैंने कभी लिखा था ‘यहीं-कहीं पर था रे ! साथी ढूंढों मेरा गाँव’ | कवि कैसा होता है यह बात कवि ने ‘कवि ऐसा होता है’ विषयक रचना में कहीं है, सीधे ढंग से पर पूरे खुले मन से | ‘परिवर्तन’ की बयार चला कर ‘दलदल’ में भाव विवेचना को उतर जाता है | चलचित्र की तरह दृश्य बदलते रहते हैं | भय, चिंता अनायास रहस्य की ओर मुड़ती है | वह स्वयं से पूछता है- ‘प्राणों का संचार हुआ/ उसी के कारण यह स्थिति है/ सब सहने की आदत पड़ती जा रही है | ‘एक आस्तिक की स्वीकारोक्ति’ पूरी रचना अपेक्षाकृत लम्बी अवश्य है किन्तु विचारों की श्रृंखला नास्तिकता से ही प्रारंभ हुई है ऐसा प्रतीत होता है | जबकि ऐसा है नहीं क्योंकि प्रकृति से कुछ जानने का यह तरीका भी हो सकता है | कुछ लोग ऊँगली अवश्य उठा सकते हैं क्योंकि उन्हें नास्तिकता ही यहाँ दिखेगी | कवि आस्तिक है यह बाद में उसने कहा किन्तु प्रश्न उसने आस्तिक की ही भांति किये हैं | आवागमन से मुक्ति की चर्चा एक सच्चा आस्तिक ईश्वर में आस्था रखते हुए ही करता है | स्त्री-पुरुष के संबंधों की मृदुता व कटुता दोनों ही दशा में मनुष्य इन्द्रिय जनित हो यह कितना आवश्यक है और कितना नहीं इसकी विवेचना समय और स्थिति के अनुसार ही होती आई है और आगे भी होगी |

‘उधेड़बुन’ नामक यह ग्रन्थ राहुल देव ने बड़े ही मनोयोग से लिखा है | इसकी सफलता की कामना और श्रम के लिए साधुवाद | प्रथम संकलन की दृष्टि से यह सुन्दर बन पड़ी है | कवि कविता करता है और कविता जीता है तो निश्चित रूप से अगले सोपान चढ़ता है जो कालांतर में देखने को अवश्य मिलेगा ऐसा मेरा दृढ़ मान्य मत है | राहुल जी इसी प्रकार निरंतर लेखन में प्रवृत्त रहें और साहित्य जगत उनकी कृतियों से लाभान्वित हो इसी शुभाशा के साथ पुनश्च शुभकामनायें !

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संपर्क- 538 II/702 आलोक नगर, त्रिवेणी नगर, सीतापुर रोड, लखनऊ (उ.प्र.)

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