मंगलवार, 13 जनवरी 2015

हरीश कुमार की लघुकथाएँ

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1. बेशर्मी (लघु कथा)

"भाई साब ,ये बड़े बड़े टैंक आर्मी वालों ने गेट पर क्यों सजाये हैं ।"

नेशनल हाइवे पर बनी छावनी के पास से गुजरते हुए ड्राईवर ने गाडी चलाते हुए पूछा ।

"ऐसा है कि युद्ध के समय यह टैंक दुश्मन देश से छीन लिए थे हमारे वीर सैनिकों ने ,कुछ टैंक वो है जो हमारी तरफ से पीठ दिखाकर भागते हुए वो यहीं छोड़ गए ।" मैंने समझाया ।

"अच्छा,तो क्या दुश्मन देश में हमारे छूट गए हथियार भी ऐसे ही पड़े होंगे "।

उसकी जिज्ञासा अभी बाकी थी ।

"नहीं उन्हें ऐसा करने के लिए कोई छूटा हथियार या टैंक नहीं मिला। हमने हर बार उन्हें अपनी जमीन से खदेड़ा ,उनकी सरहद तक । आगे नहीं गए । हमने हर बार घुसपैठियों को निकाला, खुद घुसपैठ नहीं की ।"

मैंने स्पष्ट किया ।

"अच्छा तो उन्होंने दुबारा हमला नहीं किया होगा फिर"।

"बहुत बार किया"।

"बड़े बेशर्म हैं फिर तो"।

"कौन, उस तरफ वाले या अपने वाले"। मेरा प्रश्न अंतिम था ।

अब गाडी शांति से चलायी जा रही थी। आशा भोंसले का गाना बज उठा "पर्दा में रहने दो,पर्दा न उठाओ "।

 

2. चमत्कार (लघु कथा )

मेन रोड से गाव जाने वाली सड़क पर गड्ढे लगातार बड़े हो रहे थे। विकास की लहर चलने से सड़क के ठेके दार ने नयी सड़क बनाने के नाम पर केवल गड्ढों को नया तारकोल और कंकर डालकर पैबंद से लगा दिए थे पर सड़क पानी खड़ा रहने की वजह से दुबारा खराब हो गयी थी। चुनाव समाप्त हो चुके थे तो किसी बड़े नेता के वह से गुजरने की कोई सम्भावना भी नहीं थी। इस कारण सड़क दिन ब दिन शैया पर मरते हुए किसी रोगी जैसी हो गयी थी। गाँव वाले रोज उस पर से गुजरा करते। कभी बैलगाड़ी का पहिया गड्ढे में धंस जाता तो कभी कोई मुंह के बल गिर जाता। रोजाना घटने वाली घटनाओं से प्रतीत होता कि सड़क चीख चीख कर अपने इलाज़ के लिए पुकार रही है। पर सब सरकार ,ठेकेदार और अपनी किस्मत को कोसते आगे बढ़ जाते।

अचानक एक दिन सुबह गाँव में किसी पहुंचे हुए बाबा के आने के पोस्टर दीवार पर चिपकाए जाने लगे। अब ये तो नहीं लिखा था कही की वो कहा पहुँच कर लौट आये है पर उनकी पहुँच का पता तब चला जब सरकार ,ठेकेदार और अपनी किस्मत को कोसने वाले गाँव वासी उस टूटी हुई सड़क की मरम्मत करने के लिए बढ़ चढ़ कर अपनी बैलगाड़ी ,ट्रेक्टर और फावड़े लेकर उस और बढ़ चले। बाबा जी के आने में अभी दो दिन का वक्त बाकी था पर गाँव वालों ने सड़क पर न जाने कहां कहां से पुरानी ईंटों ,मिटटी और कंक्रीट लाकर सड़क का नक्शा ही बदल दिया।

सरपंच के चेहरे की ख़ुशी संभाले न संभालती थी। और वो एक बात ही बार बार दुहरा रहे थे "सब बाबा जी की कृपा है ,ऐसा चमत्कार उनके आने की सूचना भर से ही हो गया ,वरना कितने दिनों से लोग इतना संकट भोग रहे थे।

3. फैसले होने तक

शहर को जाने वाले रास्तों पर हड्डा रोड़ी बढ़ गयी है

और उनपर कुत्तों का जमावड़ा। अब वे मात्र वफादार और आवारा नहीं हैं।

खूंखार ,नरभक्षी में बदल गए हैं बच्चों से लेकर बड़े बूढ़े उनकी रेंज में आ गए है। खून से सने उनके दांत और मुंह भयभीत करते है। बहुत से लोगों के विरोध के कारण सरकार ने हड्डा रोड़ी को मार्गों के आस पास से हटवाना शुरू कर दिया है। कुत्ते खत्म किये जा रहे हैं। कहीं दवा देकर कही गोली मारकर। उन्हें मारना समाज के हित में घोषित किया गया है.

पर लोग अब भी भयभीत हैं। अब कुत्तों की जगह आदमी आ गए है। वे उनसे ज्यादा खूंखार है। वे छीनते हैं ,लूटते हैं और नोच लेते हैं अस्मिता ,इज्जत। वे भूख से नहीं हवस और लालच से कुंठित हैं। शहर के अखबार उनकी घटनाओं से भरे रहते हैं। सरकार और लोग दोनों उनके साथ कुत्तों जैसे व्यवहार करने से कतराते हैं। उन्हें सरे आम मारने की बात करना जीवन मूल्यों और क़ानून के खिलाफ है। इसलिए लोग उनके खिलाफ मोमबत्तियां जलाते हैं ,वकील केस लड़ते हैं और तारीख पर तारीख मिलती है। मानवाधिकार, बुद्धिजीवी और महिला आयोग उनके लिए चिंतित हैं। मीडिया में वे और उनके कृत्य बार बार दुहराये जाते हैं। उनके लिए खाप पंचायतें नहीं हैं उनके लिए सभ्य समाज की अदालते हैं। यहाँ फैसले देर से सुनाये जाते हैं।

इसी देरी के बीच लोग अब भी इनसे भयभीत हैं। वे नयी घटना का इन्तेजार करते हैं। मोमबत्तियों की बिक्री में बहुत इजाफा हो रहा है और अखबारों में घटनाओं का।

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डॉ. हरीश कुमार
गोबिंद कालोनी
गली न -२, नजदीक राजीव होम्यो
बरनाला ,पंजाब

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  1. सुन्दर रचनायें। बधाई स्वीकार करें।

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