बुधवार, 21 जनवरी 2015

हनुमान सहाय मीना का आलेख - आदिवासी अस्मिता और समकालीन हिन्दी कविता

आदिवासी अस्मिता और समकालीन हिन्दी कविता

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हनुमान सहाय मीना

शोधार्थी

हैदराबाद विश्वविधालय ,हैदराबाद

ईमेल-hanumanjnu09@gmai.com

मोबाइल- 09542859974

समकालीन साहित्य में आदिवासी, स्त्री, दलित और अल्पसंख्यक समाज की स्थिति पर पुनर्विचार होने लगा है  साहित्य और समाज में ये तबके लम्बे समय तक हाशिए पर रहे। संवैधानिक प्रावधानों के कारण इन वंचित वर्गों के लोगों में अपने संघर्ष के खिलाफ बड़े स्तर पर संघर्ष करने की चेतना विकासित हुई। जिसे उत्तर आधुनिक शब्दावली में विमर्श के नाम से जाना जाता है। हिन्दी साहित्य भी इस बदलते हुए परिवेश से अछूता नहीं है, स्त्री, दलित और आदिवासी लेखन इसका प्रमाण है। आदिवासी लेखन हिंदी के अस्मितावादी विमर्शों में सबसे नवीन है। लेकिन आज हर विधा में आदिवासियों की शोषणपूर्ण स्थिति का चित्रण किया जा रहा है, जैसे- कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि। वर्षों से आदिवासी साहित्य को हाशिए पर रखा गया लेकिन आज आदिवासी साहित्य नए रूप में उभरकर सामने आ रहा है। भारतीय साहित्य में आदिवासी की छवि को गलत रूप में पेश करने की कोशिश की गई है। इस दृष्टि से समकालीन हिन्दी कविता में जीवन स्थितियों ,संघर्षों, उनकी आकांक्षाओ और उनके सपनों को कविता में समकालीन कवि अभिव्यक्त कर रहे हैं। इस तरह हिन्दी कविता की चिन्तन परंपरा में आदिवासी जीवन की उपस्थिति धीरे-धीरे दर्ज होने लगती है।

समकालीन हिन्दी कविता में आदिवासी जीवन को व्यक्त करने वाले प्रमुख कवियों में हैं- महादेव टोप्पो, हरीराम मीणा, रामदयाल मुंडा, ग्रेस कुजूर, निर्मला पुतुल, रणेन्द्र, अनुज लुगुन, विनोद कुमार शुक्ल, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, एकांत श्रीवास्तव आदि। इन कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से आदिवासी अस्मिता को पहचाने की बात कही है। और आदिवासी कविता के खिलाफ हो रहे इस सारे षड्यंत्र को समकालीन कविता अपना विषय ही नहीं बनाती बल्कि उनके खिलाफ प्रतिरोध की एक जमीन तैयार करने का काम करती है-

“ओ रे

मानवता के आदिम नुमाइंदों,

तुम जंगली ढ़ोर, गँवार हो

एक सलाह है तुम्हें सभ्य बनाने की

रोपना होगा, मुख्यधारा की उर्वरा भूमि पर।”[1]

इस तरह आज विकास के नाम पर आदिवासियों को उजाड़कर पलायन पर मजबूर कर दिया...क्या इस तरह हमारे आदिवासियों के नए भारत का निर्माण हो सकता है ? जिस तरह आज आज नए कारपोरेट और कंपनियों के द्वारा आदिवासी की संस्कृति और पैतृक सम्पति को बाज़ार के भाव बेचेने की कोशिश लगातार हो रही है...क्या यही आज के सौदागर आदिवासियों का अस्तित्व मिटाने का काम कर रहे हैं? यही ठेकेदार आदिवासी को जमीन पर अपना अधिकार जताने की कोशिश लगातार करते है और सत्ता और औधोगिक तंत्र की व्यवस्था के द्वारा आदिवासी को विस्थापित कर शहरों में पलायन के लिए मजबूर कर रहे हैं।

इस तरह आदिवासी जनजीवन का चित्रण करने वाले कवियों ने जो आदिवासी नायक इतिहास से बेदखल हैं उन नायकों को महत्व देकर नवीन इतिहास सृजन के लिए नयी जमीन के आधारभूमि की खोज करते हैं। इसमें बिरसा मुंडा इनके लिए आदर्श का प्रतीक था। लेकिन उनके मूल आदर्श आज धूमिल हो गए है। बिरसा का मुख्य संघर्ष जमीन, जंगल, और अस्मिता के लिए था। बिरसा का आंदोलन आदिवासी समाज के लिए ‘मील का पत्थर’ साबित हुआ। बिरसा के योगदान को आदिवासी समाज कभी भी नहीं भुला पायेगा। इस तरह आदिवासी आंदोलन के रूप में रानी गाड़िन्ल्यू ने ‘हरका संप्रदाय’ की स्थापना करके मणिपुर के आदिवासियों की अस्मिता के लिए संघर्ष किया। इन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और आदिवासियों के लिए आंदोलन का बीड़ा उठाया। इस तरह इतिहास में अनेकों उदाहरण मिल जाते है जिनका पुख्ता सबूत हमारे आदिवासी समाज के पास देखने को मिल सकता है , इस तरह का एक बड़ा उदाहरण राजस्थान के मानगढ़ की घटना पर आधारित है जिसमे लगभग 1500 आदिवासियों को अंग्रेजों ने बेकसूर ही मार दिया। लेकिन दुर्भाग्य की सबसे बड़ी बात है यह है की इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद भी इसका जिक्र इतिहास में भी नही है।

आज के भूमंडलीकरण के दौर में आदिवासी समाज दुष्चक्र में फंस गया है। आज के समय में आदिवासी समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती संस्कृति और भाषा को बचाने की जद्दोजहद जारी है। आज के इस भूमंडलीकरण के दौर में आदिवासी भाषाएँ संकटग्रस्त स्थिति में हैं। कोरपरेट और भूमंडलीकरण के इस दौर में आदिवासी समुदाय विस्थापन की समस्याओं से जूझ रहा है। इस तरह आदिवासी क्षेत्रों में विकास के नाम पर टाटा, बिड़ला, पोस्को , वेदांता जैसी कंपनियां अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगी है ,वही दूसरी ओर आदिवासी समुदाय विस्थापन की समस्या से जूझ रहा हैं। मैं अपने लेख में उपरोक्त लेखकों की कविताओं में व्यक्त आदिवासी जीवन का यथार्थ स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा।

मैं यहाँ पर आदिवासी साहित्य की बात करते समय कुछ पहलुओं को उठाना चाहता हूँ पहली बात यह है कि आदिवासी साहित्य पर लिखने से पहले उसकी विचारधारा को समझना जरूरी है कि आप उनके साथ कितना न्याय कर पाते है इन चीजों पर अमल करना जरूरी है, तब ही हम आदिवासी की समस्या का समाधान कर सकते है। दूसरी बात यह है कि गैर आदिवासी द्वारा जो कुछ लिखा जा रहा है वे आदिवासी लेखन के साथ ठीक तरह से न्याय नही कर पा रहे हैं। आज आदिवासी साहित्य को तोड़-मरोड़कर पेश करनी की कोशिश की जा रही है। आज जब कविता पर लिखने का सवाल जब खड़ा होता है तो हम कविता मे निहित भाव को व्यक्त कर उसका सौंदर्य चित्रण करते है लेकिन कविता में वे आदिवासी के दु:ख को समझ नहीं पाते है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है या तो वे आदिवासी के पहलुओं को ठीक तरह से नहीं समझ पाये। आदिवासी कविता में स्त्री का चित्रण किस रूप मेँ हुआ और उसकी वेदना आदिवासी कविता में किस रूप में प्रकट हुई है। इस तरह निर्मला पुतुल की कविता ‘अपने घर की तलाश’ में ‘तुम कहाँ हो माया’ शीर्षक कविता में स्त्री की अस्मिता का सवाल उठाया है-

“दिल्ली के किस कोने में हो हो तुम?

मयूर विहार,पंजाबी बाग या शाहदरा में?

कनाट प्लेस की किसी दुकान में

सेल्सगर्ल हो या

किसी हर्बल कंपनी में पैकर ?

कहाँ हो तुम माया? कहाँ हो?

कहीं हो भी सही सलामत या

दिल्ली निगल गयी तुम्हें?”[2]

निर्मला पुतुल ने इस कविता के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है एक आदिवासी लड़की रोजगार के लिए जब दिल्ली आ जाती है तो उसके साथ किस तरह का बर्ताव किया जाता है उसे रोजगार दिलाने के नाम पर उसका दैहिक शोषण किया जाता है। इनकी कविता में शोषण के खिलाफ एक तीखा प्रतिरोध का स्वर सुनाई पड़ता है। निर्मला पुतुल की कविता में आदिवासी स्त्री के जीवन का चित्रण बखूबी ढंग से किया गया है। इन्होंने अपनी कविता में स्त्री की अस्मिता का सवाल उठाया है। अपनी कविता में आदिवासी समाज के साथ स्त्री के विविध पहलू पर भी टिप्पणी करती है।

वर्तमान में आदिवासियों का अस्तित्व संकट के साथ पहचान की भी समस्या लगातार गहराती जा रही है। लोग उन्हे सामान्य मनुष्य के तौर पर नहीं बल्कि जंगली, वनवासी, असभ्य और संविधान में आरक्षित मनुष्य के रूप मे परिभाषित करते हैं। आदिवासी समाज की इस विडम्बना पूर्ण स्थिति को महादेव टोप्पो की कविता ‘त्रासदी’ अभिव्यक्त करती है..

“इस देश में पैदा होने का

मतलब है-

आदमी का जातियों में बंट जाना

और गलती से तुम अगर हो गए पैदा

जंगल में

तो तुम कहलाओगे

आदिवासी-वनवासी-गिरिजन

वगैरह-वगैरह

आदमी तो कम से कम

कहलाओगे नहीं ही।”[3]

आज के इस पूजीवाँदी दौर में आदिवासी की अस्मिता खतरे में पड़ गयी है। यह व्यवस्था केवल विकास के नाम पर आदिवासी का शोषण कर रही है। लेकिन इस व्यवस्था से कैसे लड़ा जा सकता है इसका मानदंड साहित्य नही करता इसके लिए हमें उनकी विचारधारा को साथ लेकर एक नया आंदोलन खड़ा करना होगा तब ही आदिवासी संस्कृति को एक नया आयाम दे सकते है।

आज का आदिवासी विस्थापन की समस्या से जूझ रहा है क्योंकि अब उसके पास पेट भरने के लिए कोई कमाने का साधन नही बचा है ऐसे में इन आदिवासी को हाथ में बंदूक थमाकर नक्सलवादी घोषित कर उनको खत्म करने का एक बहाना मिल जाता है अर्थात आदिवासी को सरकार क्रीमनल घोषित करती है और उनको जंगल से हटाने के लिए ‘ग्रीन हंट’ अभियान चलाती है। सरकार आदिवासी के नाम पर नयी-नयी योजनाएँ बनाती है लेकिन वह सभी योजनाएँ आदिवासियों के हित में कभी उपयोग में नहीं लाया जाता। बल्कि मुख्यधारा के दिकु लोग उनकी योजनाओं को छल से अपने नाम कर लेते हैं और आदिवासी के हमदर्द बनने का नाटक करते हैं।

इस भूमंडलीकरण के दौर में आदिवासी समाज और साहित्य का रूप विकृत होता जा रहा है। परंपरागत आदिवासी समाज में विभिन्न तरह के खेल मौजूद थे जैसे-गुल्ली डंडा, गुलाब काकड़ी, सटटोलिए आदि खेल बजारवाद के इस दौर में पिस गये है। क्योंकि आज बाजारवाद इतना हावी हो चुका है कि जो परंपरागत खेल आदिवासी समाज में मौजूद थे वे सब आज विलुप्त हो गये है। आदिवासी की लोक कला भी लगभग खत्म होने के कगार पर है।

चूंकि आदिवासी कविता में प्रतीक,बिम्ब और मिथक का प्रयोग उनकी संस्कृति के साथ जुड़ा हुआ रहता हैं। आदिवासी कविता में मिथक लोक परंपरा के साथ जुड़ता है और प्रकृति के साथ गहरा संबंध रहता है। उनके मिथक समाज और संस्कृति के साथ जुडते है जो कि प्रचलित मिथकों से बिल्कुल अलग ही रहते है तथा उनका मिथक प्राचीनतम ग्रन्थों से संपृक्त रहता है। इस तरह इनकी कविता में प्रसंग अनायास ही जुडते चले आते है यही इनकी कविता की पहलकदमी है। आदिवासी कविता एक जमीन तैयार करने का काम करती है जो कि आदिवासी समाज और साहित्य के पहलुओं को समझने में मददगार साबित होती है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आदिवासी साहित्य का विकल्प क्या होना चाहिए? हिन्दी में वाचिक साहित्य और मौखिक साहित्य का रूप किस प्रकार का होना चाहिए। आदिवासी साहित्य की दृष्टि कैसी होनी चाहिए? क्या आदिवासी साहित्य का संबंध जन आंदोलन से होना चाहिए या नहीं? आज सवाल उठाया जा रहा है कि आदिवासी साहित्य की भाषा कौन सी होनी चाहिए? आज जो भी कुछ लिखा जा रहा है क्या वह आदिवासी के हित में है या नहीं? यह सवाल ही नही है बल्कि आदिवासी विमर्श में एक नया पैगाम खड़ा करता है। आज सवाल यह उठता है कि आदिवासी की मौखिक परंपरा को कैसे बचा जाये इन सब बातों पर हमें गौर करने की जरूरत है।

आदिवासी की मूल पहचान उसकी संस्कृति से जुड़ी हुई है क्योंकि जो भी परंपरा बनती है वह किसी भी समुदाय की मूल पहचान के साथ कायम रहती है। आज आदिवासी की अस्मिता बची है तो वह है अपनी संस्कृति से ही। आज उड़ीसा में पास्को जैसी कंपनी सरकार के साथ साठ-गाँठ करके आदिवासी को अपनी जमीन से बे –दखल कर रही है ताकि वो अपना प्रोजेक्ट पूरा कर सके।

आदिवासी कविताओं में प्रतिरोध की भावना है जो समाज के दक़ियानूसी मानसिकता वाले लोगों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष करने की प्रेरणा देती है।। वाहरु सोनवने की ‘स्टेज’ कविता से इसे समझा जा सकता है जिसमें आदिवासियों का शोषण करने वाली शक्तियों की अवास्तविक सहानुभूति का नंगा वर्णन है -

“और ‘वे’ मंच पर खड़े होकर

हमारा दुख हमसे कहते रहे।

हमारा दुख हमारा ही रहा।

कभी उनका नहीं हो पाया”[4]


संदर्भ सूची

[1] हरिराम मीणा- ‘ अंडमान आदिवासियों को सभ्य बनाने की सलाह’(‘ सुबह के इंतजार’ काव्य संग्रह” ) पृष्ठ सं. 41-42

[2] निर्मला पुतुल- ‘अपने घर की तलाश में ‘पृष्ठ सं. 31

[3] रमणिका गुप्ता –‘आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी’ पृष्ठ सं. 49

[4] रमणिका गुप्ता –‘आदिवासी स्वर और नयी शताब्दी’ पृष्ठ सं. 101

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