बुधवार, 21 जनवरी 2015

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - गणतंत्र का स्वाभिमान ही हमारी आत्मा

गणतंत्र का स्वाभिमान ही हमारी आत्मा
० कमजोरियों और खामियों की ओर देना होगा ध्यान
भारतीय गणतंत्र के 66 वर्ष पूर्ण होते होते अब यह जरूरी लगने लगा है कि हम उन परिस्थितियों पर गहन चिंतन करें, जिनके अधीन हमने देश को गणराज्य बनाया था। इस बात की भी बारीकी से परीक्षा की जानी चाहिये कि बीते 62 वर्षों में हमने अपने देश के विकास में संविधान के अनुरूप क्या किया है! हम अपने दैनिक जीवन को नियमों और कानूनों की धाराओं और संविधान के अनुच्छेदों से कितना जोड़ पाये है? आज हम महसूस कर रहे है कि अब वह वक्त आ चुका है जब हम अपने विकास की योजनाओं को वास्तविकता के तराजू पर तौले और इस निश्चय पर पहुंचने का प्रयास करें कि हमारी योजनाओं ने हमें सफलता के किस सोपान पर पहुंचाया है। हमारी विकास की सोच और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कितना खरा और कितना खोटा रहा है। क्या इस बात की जरूरत है कि हम उन विकासात्मक कार्यक्रम की रूपरेखा को नया अमलीजामा पहनाने नई पहल के साथ आगे बढ़ें? वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के लिए हम क्या कर सकते है? क्या 66 वर्षों की बदली परिस्थितियों ने हमारी नयी जरूरतों को जन्म दिया है? विकासशील से विकसित राष्ट्र का दर्जा पाने कौन सी और किस प्रकार की परिवर्तन की लहर हमारे लिए सकारात्मक परिणाम के द्वार खोल सकती है। इन सभी विषयों पर हमें गंभीर होने की जरूरत है।


लोकतंत्र के अधीन जब एक राष्ट्र समाज कल्याण को लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ता है, और अपने संकल्प को ठोस मजबूती प्रदान करता है तो यह निश्चय है कि स्वतंत्रता और सामानता और न्याय के सिद्धांत आपस में मिलकर राष्ट्रीय आत्मा की रचना करने में सफलता पाकर ही रहते है। आज से छः दशक पूर्व हमारे भारत वर्ष ने भी कुछ ऐसा ही संकल्प लिया था, कि जब हम विकास की राह पर आगे बढ़े, प्रगति के नये सोपान तय करें, समृद्धि के साथ समावेशी विकास की दशा और दिशा पर विचार करें, तो हमारे देश के गणतंत्रात्मक सिद्धांत हमारा पथ प्रदर्शन करें। हमें इस बात केा भी स्वीकारना होगा कि हमने बीते 66 वर्षों में विकास के अनेक अनछुये सोपानों को राष्ट्र विकास में योगदान स्वरूप प्राप्त किया है। विकास की बढ़ती राहों के बावजूद हमें अपनी कमजोरियों और खामियों की ओर ध्यान देने की जरूरत है। बेहतर और स्वर्णिम भविष्य के निर्माण के लिए हमें संगठित विचारधारा को अपनाने जागरूकता लानी होगी। समर्पण की भावना के साथ आगे बढ़ने की इच्छा शक्ति हमें वह संबल प्रदान कर सकेगी। जिससे एक राष्ट्र के रूप में अपनी विशेषताओं और कमियों का आत्मविश्लेषण करते हुए देश की समृद्धि और अमन चैन बनाये रखने में हम सफलता पा सकेंगे। सन 1950 में देश के गणराज्य और अपने संविधान को अंगीकार कर हमने अपने टूटे बिखरे भारतवर्ष को जोड़ने में कामयाबी पायी। भाषा, संस्कृति, इतिहास और स्थानीय अस्मिताओं को लेकर अलग अलग चल रही विचारधारायें गणतंत्र के साथ एक होगी और विविधता को अपने में समेटते हुए हमारा देश इस मामले में सबसे बड़ी ताकत बन गया।


हमारे देश को गणराज्य का दर्जा देने के बाद लगातार उपलब्धियां यदि हमें गौरवान्वित करती रही है, तो हमारे नये गणतंत्र के समक्ष चुनौतियां भी सुरसा की तरह मुंह फाड़े खड़ी रही है। निरक्षरता, भूख, सामाजिक भेदभाव और गरीबी की समस्या ने लगातार हमें विचलित किया है। इन सारी मुसीबतों को महसूस करते हुए देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद जी ने कहा था ‘मुझे लगता है कि भारत वर्ष में आज जो कार्य हमें करने है वे स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों के हमारे कार्यों से कहीं अधिक मुश्किल है। उस समय हमारे सामने ऐसे विरोधाभाषी दावे नहीं थे, जिनका निपटारा करना हो, लोगों में बांटने के लिए रोटियां और मछलियां नहीं थी और न ही बांटने के लिए शक्तियां और अधिकार थे। अब हमारे पास ये सारी परेशानियां है।’ तात्पर्य यह कि उस समय की सहजता से दूर अब झंझटों का अंबार हमें कहीं न कहीं हमें बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। यह हमारा सौभाग्य था कि उस समय हमारे पास समर्पित नेता थे, जिन्होंने कठिनाईयों के बीच उत्पन्न चुनौतियों पर विजय पायी। वर्तमान में हमें अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होना है, वरन चुनौतियों पर काबू पाने से लेकर तरक्की और विकास को पक्के तौर पर सुनिश्चित करने ठोस योजनाओं को अमल में लाने की जरूरत है। हमारे मानवीय समाज में कुछ ऐसे विषय है, जिन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास आज भी आधी अधूरी संकल्प शक्ति के कारण जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। विकास के फलीभूत परिणाम अभी भी सभी वर्गों तक नहीं पहुंच पाये है।


26 जनवरी 1950 के दिन देश केा समर्पित संविधान और भारत वर्ष को गणराज्य का दर्जा दिलाये जाने की कानूनी सोच आज 63 वर्ष बाद लगभग छिन्न भिन्न दिखाई पड़ रही है। इसी संविधान में देश के नागरिकों को ऐसे मौलिक अधिकार प्रदान किये है, जिनके सहारे वे स्वतंत्रता से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य एवं अपनी बातें कहने की ताकत से सीधे सीधे जोड़ दिये गये। आज इन अधिकारों के बीच हम कहीं न कहीं उच्छृंखलता को स्पष्ट रूप से देख पा रहे है। जिस संविधान ने हमें ईमानदारी एवं कर्तव्य परायण होने का पाठ पढ़ाया था, उसी संविधान को हम घोटाले और काम के घंटों के बीच जवाबदारी से भागते हुये अंगूठा दिखाते आ रहे है। साथ ही न्याय और कानून की डंडा चलने पर हड़ताल और तोड़फोड़ का सहारा लेते हुये देश की विधायी शक्तियों का अपमान भी कर रहे है। इतना ही नहीं एक ओर जहां हम भ्रष्टाचार से सराबोर आपाद मस्तक डुबान पर है, वहीं दूसरी ओर अपराधों की दुनिया दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही है। हत्या और व्यभिचार के साथ डकैती, लूट, दूसरों के अधिकारों का हनन आदि हमारे के लिये भयमुक्त हो चुका है। आज प्रत्येक ऐसा नागरिक जो देश की कानून व्यवस्था और शांतिपूर्ण जीवन का पक्षधर है, वह पूर्ण रूप से असहाय और हताशा महसूस कर रहा है। अपने इस सांस्कृतिक और सद्भाव वाले देश में उस गणतंत्र की तलाश में व्यक्ति थक और हार चुका है, जो हमें एक अच्छी सोच के साथ प्रदान किया गया था।


गणराज्य अथवा गणतंत्र जिसका तात्पर्य ही है गण अथवा लोग और तंत्र अथवा नियम अर्थात लोगों का नियम एवं कानून। क्या हम उक्त नियम और कानून को अपने जीवन में स्थान दे पा रहे है? इस पर व्यापक विचार मंथन जरूरी हो चला है। हमारे देश में अपराधों की संख्या का ग्राफ लगातार ऊंचाई प्राप्त कर रहा है और सांस्कृतिक तथा मानवीय मूल्य में गिरावट हमारे मनुष्यत्व को तार-तार कर रही है। जिन प्राणियों को भगवान ने इस मृत्यु लोक में भेजकर उसके जीवन और मृत्यु को अपने हाथों में रखा है। उस ईश्वर को भी हम चुनौती देते हुये उसके सृजन के प्रतीक नर-नारियों को अपनी क्षणिक आवेश का शिकार बनाते हुये मौत के घाट उतार रहे है। हत्या के बढ़ रहे आंकड़े इस बात का प्रतीक है कि हमारे कानून की लोचता ने उन्हें ताकतवर बना दिया है। हत्या के लिये आजीवन कारावास अथवा मृत्यु दंड का भय अब कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है। कारण यह कि लंबी कानूनी लड़ाई और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के साथ उप धाराओं में प्रदान किये गये बचाव के उपाय अपराधियों को उच्छृंखल बना रहे है। दूसरी बात यह भी मुझे गलत दिखाई पड़ रही है कि हमारे देश के कानून के जानकार यह जानते हुये भी की उनके पास आया व्यक्ति अपने हाथ खून से लथपथ कर बैठा है, उसे महज कुछ रूपयों के लिये बचाने पूरी कानूनी प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाने से बाज नहीं आ रहे है। कानूनी व्यवस्था में दिये गये वाक्यांश ‘सौ अपराधी छूट जायें, किंतु एक निरपराध को सजा नहीं मिलनी चाहिये।’ ने भी बचाव पक्ष के कानूनविदों को वास्तविकता को तोड़ने मरोड़ने की शक्ति प्रदान की है। सीधे शब्दों में कहूं तो अब स्वतंत्रता के तुरंत बाद बनाये गये संविधान में संशोधन की प्रबल जरूरत है। कारण यह कि उस समय की जीवनशैली और मानवता की सोच में आये परिवर्तन के चलते कानूनी प्रक्रिया का पुराना पड़ जाना और अपराधों की प्रक्रिया ने उसे चिढ़ाना शुरू कर दिया है। यदि समय रहते उसे नहीं बदला गया तो हमारा देश अपराधों और अपराधियों की दुनिया का बेताज बादशाह बनकर विश्व में अपना परचम फहराता दिखाई पड़ेगा।


संपूर्ण विश्व में भारत वर्ष एक राष्ट्र के रूप में अपनी भूमिका मानवीय संवेदनाओं के प्रति अपनी जवाबदारी के विषय में सचेत है। हमारे देश में अपने शैशवकाल से ही यह माना है कि समूचा विश्व एक है, और मानवता एकल परिवार, वसुधैव कुटुम्बकम हमारा मूल मंत्र रहा है। भारतवर्ष ने वैश्विक स्तर पर मैत्री और सहयोग को अहम स्थान प्रदान किया है। देश की प्रगति और विकास को नई दिशा देने की जिम्मेदारी अब हमारे देश के युवाओं केा उठानी होगी। अभी विकास की अनछुई यात्रा काफी लंबी है, किंतु हमने योजनाओं के माध्यम से उन्हें अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या के रूप में हमारा देश नक्सलवाद से जूझ रहा है। जो विकास के मार्ग में बड़ा रोड़ा है। बातचीत के जरीये इस समस्या को समाप्त करना ही हमारा प्रथम लक्ष्य होना चाहिये


उपलब्धियों केा पीछे छोड़ते हुए निरंतर आगे बढ़ने की प्रक्रिया को ही प्रत्येक देश में विकास का नाम दिया है। इस कथन से भारत वर्ष भी पीछे नहीं रहा है। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाईल मेन के नाम से ख्याति प्राप्त ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विजन 2020 की अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए भविष्य के भारत की कल्पना को लक्ष्य कर कहा था कि 2020 तक भारत एक विकसित राष्ट्र के रूप में उभरेगा और उस समय तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2140.50 बिलियन डॉलर होगा। इसी प्रकार कृषि विकास की दर को 4 प्रतिशत तक बढ़ाना तथा रोजगार के 7 करोड़ नये अवसर पैदा करना तथा शैक्षिक बेरोजगारी को 5 प्रतिशत तक नीचे लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हमें इन्हीं लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
                                        
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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