बुधवार, 21 जनवरी 2015

अशोक बाबू माहौर की कहानी - चरित्र बेटी का

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चरित्र बेटी का 

शकुंतला ,उमा को परेशान किया करती,खाने-पीने पर बोल उठती ,कभी पढ़ाई पर आँखें दिखाती.उमा नादान सी हिचकियाँ भरकर रह जाती .सौतेली माँ की तरफ देखकर .

         उमा पढ़ाई में होशियार थी सारे शिक्षक तारीफें किया करते .

         शकुंतला जिद्दी थी घूमने फिरने की शौक़ीन .पति विनय के हजारों रुपये खर्च करवा देती .विनय तनाव से घिरे लोगों से उधार लेकर खर्च करते .सिर पर कर्ज बोझ बनकर लद गया जिसे चुकाना मुश्किल था .

         सुबह का समय हल्की-फुल्की बारिश ,हवा कभी तेज कभी मंद हो जाती .खिड़की पर रखी तस्वीर अचानक नीचे गिरी कई टुकड़ों में विखर गई .उमा फफकते रोने लगी .शकुंतला ने झाड़ू से सारे टुकड़ों को झाड़कर कूड़े में फैंक दिए .

          "तुमने मेरी माँ की तस्वीर क्यों फैंक दी ?"उमा बोली ,

          "तो क्या करती ?फिर से सजाकर दीवाल पर चिपका देती.प्राडी मर गए उसकी याद नहीं गई .तस्वीर रखने से क्या फ़ायदा ."शकुंतला इठलाते बोली,

           उमा सिमटकर कौने में जा बैठी ,खाना भी नहीं खाया .बैठी रोने लगी अपनी मरी हुई माँ की याद में .

          "अजी सुनते हो तुम्हारी लाडली ने खाना नहीं खाया .बैठी रो रही है ."शकुंतला विनय से बोली ,

          "तो उसे चुप कराले ,खाना खिला दे तूने कुछ कहा होगा ."विनय ने जवाब दिया ,

          "मैं क्यों चुप कराऊँ ,मेरी बेटी थोड़ी है ."विनय से इतराते बोली ,

            विनय खामोश ठगे से रह गए जुबान पर लगाम कसकर .

           शाम का समय था विनय जरूरी काम से बाहर गए थे .शकुंतला उमा पर बौखलाई ,चिल्लाई "जा यहाँ से आज के बाद अपना मुँह मत दिखाना ."कई खरी खोटी सुना डाली ,हाथ पकड़कर झकझोरा भी .

           उमा रोती हुई घर से चल पड़ी अनजानी सूमसाम रास्तों पर पैरों में चप्पलें नहीं तन पर फटे हुए कपडे पेट भी भूख से परेशान .दोनों हाथों की मुठ्ठियाँ बनाकर आँखों पर घुमाती आँसू पौंछती ,जोर-जोर से हिचकियाँ लेती रोती ,कभी माँ ..माँ ...कहती .

            एक किसान रास्ते में टकराया वह खेतों में पानी देकर लौट रहा था "अरे बेटी तू अकेली सूमसाम जगह पर .तेरे माता-पिता कहाँ है ,कहाँ है तेरा घर ."

            उमा जोर-जोर से रोने लगी ,अपनी सारी कहानी तोतली आवाज में बता दी .किसान समझ गया उसे घर ले आया .अपनी पत्नी को समझा दिया .किसान के कोई संतान नहीं थी सारी ममता अमृत की तरह बरस पड़ी .अपनी सगी संतान की तरह पालने लगे .उमा उन्हें ही अपना माता-पिता मानने लगी .उमा पढ़ाई में बहुत तेज थी पल में सवाल हल कर देती .किसान बहुत खुश थे .

             शहर के अच्छे विद्द्यालय में उमा को एडमिशन दिला दिया.उमा मन लगाकर पढ़ती अच्छे नंबरों से पास हो जाती .

             दिन महीने साल गुजरते गए एक दिन उमा को सरकारी नौकरी मिल गई .

             उमा घर की तरफ आ रही थी देखा दो भिखारी मदद माँग रहे है किन्तु कोई नहीं सुन रहा .उमा दौड़कर पास गई सिर पर हाथ रखा तेज बुखार था .आदमी की लम्बी-लम्बी दाढ़ी.उमा हॉस्पिटल ले गई इलाज कराया .विनय ने उमा को पहचान लिया "बेटी उमा ."उमा ने मुड़कर  देखा कोई नहीं .

             पैरों में पड़ा भिखारी रो रहा अपना परिचय देने लगा .उमा ने मुँह बना लिया "बेटी मैंने तुझे कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा,इस बेशर्म औरत की बजह से आज हमारी यह दशा हो गयी ,मर जाने दे मुझे .घर जमीन पैसे सब बर्बाद कर दिए .उमा तुझे घर से भगा दिया ,मुझसे कहती है वह चली गई ."विनय आँसुओं में डूब गए .

             उमा के अंदर दया जगी दोनों को घर ले आई किसान को सब बता दिया .किसान बहुत खुश हुए गर्व महसूस करने लगे उमा पर "आखिर बेटी होतो ऐसी जो मुसीबतों में भी खुशियाँ जगाये ."

              किन्तु विनय शकुंतला शर्म से चूर चूर हो गए ,अपने आप पर थूकने लगे .

                                                                                 अशोक बाबू माहौर 

                                                                ग्राम-कदमन का पूरा ,तहसील-अम्बाह 

                                                                जिला -मुरैना (म.प्र.)476111 

                                                                ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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