सोमवार, 19 जनवरी 2015

रिपोर्ट : भारतीय इतिहास को गांव से जोड़कर देखने की जरूरत है

रिपोर्ट

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भारतीय इतिहास को गांव से जोड़कर देखने की जरूरत है

1764 के बक्सर-युद्ध के 250 वर्ष पूरा होने के संदर्भ में ग्रामीण इतिहास पर सम्मेलन आयोजित

बक्सर : ''ग्रामीण इतिहास को समझने के लिए गांव की अर्थव्यवस्था को समझना ज्यादा जरूरी है। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने बड़ी ही बेरहमी से ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था को नष्ट किया जिसके कारण किसान तबाह हुए।'' ये विचार विशिष्ट अतिथि के रूप में व्यक्त करते हुए चिंतक एवं पूर्व सांसद नागेंद्र नाथ ओझा ने पिछले दिनों बक्सर में रंगश्री, प्रतिश्रुति, सर्जनात्मक इतिहास और साहित्य न्यास एवं विद्यादान संस्थान की तरफ से 1764 के बक्सर-युद्ध के 250 वर्ष पूरा होने के संदर्भ में ग्रामीण इतिहास पर आयोजित सम्मेलन में कही। अध्यक्षता करते हुए चर्चित लेखक एवं जेएनयू के देवेंद्र चौबे ने कहा कि ''कोई भी इतिहास पूरा नहीं होता है। अबतक भारत का जो इतिहास लिखा गया, उसमें नगरीय दृष्टिकोण का वर्चस्व रहा है। इसीलिए ग्रामीण नायकों को इतिहास में कभी जगह नहीं मिल पायी । लोक समाज में मौजूद स्मृतियां इस बात की साक्षी है कि इन ग्रामीण नायकों ने अतीत में हुए संघर्ष में बड़ी भूमिका निभाई हैं तथा अनेकों बार इतिहास की धारा को बदला हैं। तत्कालीन बंगाल एवं अब के पश्चिम बिहार में 1764 में हुए बक्सर-युद्ध में कथकौली गॉव के सैयद अब्दुल गुलाम और अब्दुल कादिर रहमतुल्लाह ने भारी संघर्ष किया तथा अंग्रेजी फौज को रोके रखा। अंत में ये दोनों मारे गये, पर इतिहास में इनका नाम कहीं दर्ज़ नहीं है।'' आगे उन्होंने कहा कि ''गॉव का जब भी इतिहास लिखा जाएगा उसमें गॉव का किसान समाज, किसानों की संस्कृति, अन्नोत्पादन का इतिहास एवं पद्धतियां, उनका संघर्ष आदि उसके केंद्र होगा।'' इस अवसर पर सातवां कुंवर सिंह स्मृति व्याख्यान देते हुए इतिहासकार सीमा पटेल ने कहा कि '' अलिखित घटनाओं को इतिहास का हिस्सा बनाने की जरूरत है। उन व्यक्तियों एवं घटनाओं को इतिहास का हिस्सा बनाने की जरूरत है जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास उपेक्षा की हैं।'' कथाकार सुरेश कांटक ने दूसरा रामायण चौबे स्मृति ग्रामीण लोक व्याख्यान देते हुए कहा कि '' 1764 में हुआ बक्सर का युद्ध कोई सामान्य युद्ध नहीं था और न ही उस समय का आम आदमी तटस्थ था। जनता ने हमेशा इस प्रकार के युद्धों का आकलन किया है, यह अलग बात है कि वे कभी इतिहास का हिस्सा नहीं बन पाये।'' सामाजिक आंदोलनकर्मी कवि कुमार नयन ने कहा कि ''1764 के ग्रामीण योद्धा इतिहास के प्रमुख नायक थे। आज उनके इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत है।'' पटना से आये पत्रकार अजय कुमार ने कहा कि '' इतिहास लेखन में गांव के बुद्धिजीवियों की भागीदारी जरूरी है। '' कार्यक्रम में विषय प्रवर्तन करते हुए इतिहासकार दीपक राय ने 1764 के इतिहास की चर्चा करते हुए कहा कि '' इतिहास सिर्फ विजय का नहीं होता, बल्कि हार से सबक लेकर जीत की ओर मुखातिब होना बतलाता है कि आम जनता अंग्रेजों की लूट और गुलामी को समझ रही थी।'' बक्सर के जिलाधिकारी रमण कुमार ने ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित कार्यक्रम की तारीफ करते हुए कहा कि ''इस प्रकार के प्रयास वृहत्त भारत को समझने में मदद करते हैं।'' इस अवसर पर फौदार मॉझी, परवेज आलम, लक्ष्मीकांत मुकुल, शशांक शेखर, कृष्ण मुरारी राय, संजीव कुमार अग्रवाल, मो. फहीमुद्दीन, वैदेही शरण श्रीवास्तव, विनोधर ओझा, यतींद्र चौबे, कामेश्वर पाण्डेय आदि जैसे वक्ताओं ने इतिहास की मुख्यधारा में गांव के इतिहास एवं ग्रामीण योद्धाओं के योगदानों की उचित रूप से लेखन की वकालत की। ग्रामीण इतिहास पर केंद्रित इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी ग्रामीण नागरिकों की बड़े पैमाने पर भागीदारी। कथकौली गॉव में स्थित 1764 के स्मारक स्थल से बक्सर के किला मैदान तक निकला लेखकों, इतिहाकारों एवं ग्रामीणों के मार्च ने उस सांझी संस्कृति ओर विरासत की याद दिला दी जिसपर यह इलाका गर्व करते आया है। बक्सर एवं अहिरौली गांव में गंगातट पर क्रमशः 10 और 12 नवंबर 2014 को हुए इस कार्यक्रम का स्थानीय स्तर पर संयोजन डॉ. दीपक राय एवं कृष्णा नंद चौबे ने किया, स्वागत ग्राम प्रधान मोहन जी उपाध्याय ने और धन्यवाद विद्यादान संस्थान के निदेशक डॉ. सूर्य कुमार सिंह ने किया।

-दीपक राय, रश्मि चौधरी, महेंद्र प्रसाद सिंह, रंगश्री, दिल्ली।

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