बुधवार, 7 जनवरी 2015

अशोक गुजराती की लघुकथाएँ

।।लघुकथाएँ।


अपना-अपना सच

   वे हमेशा के चाक़-चौबंद. सिग्नल मिलते ही अपनी स्कूटी बढ़ा ले गये. अचानक मोड़ लेकर एक ऑटो उनके सामने आ गया. उन्होंने बमुश्किल ब्रेक लगाये और बोले, 'सिग्नल तो देख लिया करो !'


   उस ऑटो वाले ने उन्हें गंदी-सी गाली दी और निकल पड़ा. उनके मुंह से अनचाहे उससे भी भयंकर ग़लीज़ गाली फिसल पड़ी, जो ऑटो वाले ने निश्चित ही सुन ली होगी.
   ऑटो वाला तो अपना काम निपटा कर- और शायद दारू पीकर -निश्चिंत घर जाकर सो गया होगा.
   लेकिन वे... देर तक अचम्भा करते रहे कि मैंने गाली दी... ऐसी अश्लील गाली... ऐसा कैसे हो गया ?...
   वे रात भर विकल बने करवटें बदलते रहे...
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माचो'

     बाज़ार में उस युवक को देख वे उसकी ओर लपके. उसने एक बड़े नेता की जान बचायी थी, पुरस्कृत हुआ था.
     तभी अचानक गुंडों ने बाज़ार में हमला बोल दिया. अफ़रातफ़री मच गयी. बेतरतीब भागदौड़. वे भी भागे लेकिन उम्र साथ नहीं दे रही थी. एक बदमाश ने उन्हें आ दबोचा. कालर पकड़ ज़मीन से ऊपर उठाते हुए दहाड़ा- 'जो भी जेब में है, निकाल!'
     सहमे-से वे कुछ समझ पाते कि उनकी दृष्टि ज़रा दूरी पर पेड़ के पीछे छिपे उस जांबाज़ जवान पर पड़ी. वह उनका ही अवलोकन कर रहा था- बड़े मज़े से, माचो!
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एक रात की बात

   हिन्दुओं के मोहल्ले से होकर वह रास्ता गुज़रता था. मोड़ पर पीपल का पेड़ पिछले सालों में इतना आड़ा-टेढ़ा बढ़ गया था कि मोहर्रम के वक़्त ऊंचे-ऊंचे ताज़ियों का वहां से निकलना मुश्किल होने लगा.  चन्द मुस्लिम मज़हबी नेताओं ने हिन्दू भाइयों से इस पेड़ को काट देने की गुज़ारिश की. उन्होंने यह माना कि यह वृक्ष हिन्दू धर्म के मुताबिक़ पूजनीय है लेकिन साथ ही यह तर्क भी दिया कि इस वृक्ष की कोई पूजा तो करता नहीं है...  जो हो, हिन्दुओं ने उनकी अपील सिरे से नकार दी.
   वे ज़िले के कलेक्टर के पास गये. उन्होंने साम्प्रदायिक फ़साद के इमकान के डर के तहत कोई कार्रवायी करने से इन्कार कर दिया. इत्तफ़ाक़ कुछ ऐसा हुआ कि इस कलेक्टर का तबादला होने पर अगला कलेक्टर मुसलमान था. इसका फ़ायदा उठाते हुए मुस्लिमों का एक प्रतिनिधि दल उनसे मिलने गया. स्वाभाविक था कि नये कलेक्टर ने उनसे इस मसले का हल फ़ौरन निकालने का वादा कर लिया. उन्होंने उस मोहल्ले के कुछ प्रतिष्ठित हिन्दुओं को शाम को बुलाया और इसरार किया कि यदि उस पीपल के पेड़ की कोई पूजादि नहीं करता तो सलीक़े से उसकी थोड़ी काट-छांट कर देने में आपको क्या आपत्ति है...


   हिन्दुओं के वास्ते पीपल का पेड़ अलग मान्यता का प्रतीक है. वे क्योंकर इस सुझाव का समर्थन करते... फिर अब यह आत्म-सम्मान का मुद्दा बन गया था. उनके एक बुजुर्ग ने साफ़ कह दिया, 'हम उस पेड़ की नित्य पूजा करते हैं, आपको ग़लत बताया गया है...' कलेक्टर ने भी उसी रौ में उनको आगाह कर दिया, 'ठीक है, मैं कल सवेरे-सवेरे आकर मौक़ा-मुआयना करूंगा...'
   बाहर आते ही सभी ने उस बुजुर्ग को घेर लिया- 'यह आपने क्या कह दिया... वहां तो किसीने कोई पूजा कभी की ही नहीं...'
   बुजुर्ग हौले से मुस्काये- 'मैं कहता हूं, वैसा करो. तुम सब अभी तुरंत निकलो. दौड़-दौड़कर सारे मन्दिरों से टूटे-फूटे दीये, सूखे फूल-हार, चावल के बिखरे दाने, जली-अधजली अगरबत्तियों के टुकड़े, कुमकुम इत्यादि पूजा की सामग्री पीपल के तने के पास लाकर बराबर सजाओ. और हां, पुराने धूसर पीले रंग के धागे लाना न भूलना. उनको पीपल के इर्द-गिर्द लपेटना है...'


   कहना न होगा कि अगली सुबह कलेक्टर को सब कुछ सही नज़र आया. मुस्लिम नेता चिल्लाते रह गये कि यह धोखा है, कल तक यहां ऐसा कुछ भी नहीं था. कलेक्टर की भले ही उनके विलाप के प्रति आंतरिक सहमति थी पर वे दिखाई देते सत्य से कैसे मुंह मोड़ लेते ?...
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प्रा. डा. अशोक गुजराती, बी-40, एफ़-1, दिलशाद कालोनी, दिल्ली- 110 095. .

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