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February 2015
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व्यंग्य/ कॉफी विद कृष्ण

रात बड़ी देर तक मल्लिका का मस्ती भरे गानों पर नाच देख ऐसी नींद आई कि मत पूछो। सारी रात जागे रहने पर भी सपने में मल्लिका ही दिखाई देती रही। बड़ी मुश्किल से मल्लिका से पीछा छुड़ाया। वह तो पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं थी। आखिर मैंने दोनों हाथ जोड़ उससे कहा,' हे हुस्न की मलिका मल्लिका! अब मरे सपनों से चली जाओ प्लीज! बहुत हो गया मुझपर तुम्हारा राज। मेरी बीवी को इस बात का पता चल गया कि उसके मायके जाते ही उसके बदले तुम आ रही हो तो..... कोई और भी मेरी तरह तुम्हारा इंतजार कर रहा होगा। अब उस सोते सोते को जगाओ और अपना हुस्न धर्म निभाओ!'

तब कहीं जाकर वह गर्ई कि तभी अचानक सपने में कृष्ण ने आकर मेरे ऊपर की रजाई खींचते कहा,' मियां उठो। कब तक चार बार आंखों को आप्रेशन करवाने के बाद भी भोग विलास के सपने लेते रहोगे?'

'कृष्ण! कौन कृष्ण? इंश्योरेंस वाला?? मैंने तो पिछली किश्त इनटाइम जमा करवा दी थी। अब क्यों सपने में आकर भी मुझे तंग कर रहे हो,' कह मैंने अपने ऊपर ली रजाई जोर से पकड़ी तो वे मुझसे मेरी रजाई छुड़ाते से बोले,' नहीं! मैं इंश्योरेंस वाला कृष्ण नहीं। मथुरा वाला कृष्ण हूं!'

'तो मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? जाकर गोपियों के बीच रास रचाओ , बेरका वालों का घी - मक्खन खाओ,' मैंने बिस्तर पर पासा पलटा।

'उनके साथ तो रास करते युगों हो गए नास्तिक। आज मैं तुम्हें नास्तिक से आस्तिक बनाने आया हूं। रही बात दूध- मक्खन की! अब मैंने भी फैट लेना बंद कर दिया है। मैंने तुम्हारे सिर के बालों में अभी- अभी एक सफेद बाल देखा तो सोचा कि तुम्हें आने वाले खतरे के प्रति आगाह करता चलूं!'

'हद हो गई यार! सफेद बाल मेरे सिर पर आया और परेशान तुम हो रहे हो?'

' इस देश के हर जीव का ख्याल रखना सरकार का दायित्व हो या न पर मैं अभी भी इसे अपना मेरा दायित्व समझता हूं, सो...'

'क्या हो गया जो मेरे सिर पर सफेद बाल उग आया! यहां तो अब जीव पैदा ही सफेद बालों के साथ हो रहा है! दूसरे ये सफेद बाल तुम्हारे सिर पर तो नहीं उगा है न? मेरे सिर पर उगा है तो ये मेरी सिरदर्दी है। तुम मेरी चिंता में घुलने वाले कौन होते हो? तुम अपने सिर के बालों की चिंता करो और मेरे बालों को मेरे भरोसे छोड़ दो। मेरी गली में हर दस कदम के बाद बाल डाई करने की दुकानें खुली हैं।'

'अरे बाल डाई करने से क्या होता है? उम्र तो छुपाई नहीं जाती न? मैं तो तुम्हें कहने आया था कि अब तीर्थ व्रत कर लो । मेरे मथुरा- वृंदावन आना चाहते हो तो.... असल में नास्तिक से नास्तिक भी जब तक तीथरें पर जाकर अपने को पंडों से ठगवाता नहीं, उसे स्वर्ग नहीं मिलता। इसलिए तुम चाहो तो.... मथुरा -वृंदावन आने का मैं तुम्हें .... मैं साथ रहूंगा तो पंडों से ठगने की संभावनाएं जरा कम हो जाएंगी और.... इतने भोगविलास के बाद भी तुम स्वर्ग के शर्तिया अधिकारी हो जाओगे!'

' मतलब??'

'मेरे पास तुम्हारे लिए एक पैकेज है। ऐसा पैकेज कि इसमें नराधम से नराधम जीव भी स्वर्ग प्राप्त कर सकता है। वहां तुम्हारा गाइड खुद मैं रहूंगा......' उन्होंने कहा तो मेरी उनमें इतनी जिज्ञासा जागी कि मैंने अब तक जो वे मेरे मुंह पर से रजाई खींच रहे थे, अब मैंने ही अपने मुंह पर से रजाई उठा दी,' मतलब??'

' अगले सोमवार यानि दो दिन बाद मेरी एसी बसें लाल किले के पास से मथुरा -वृंदावन धाम हेतु भक्तों के लेकर निकलेंगी। दो दिन का कार्यक्रम है और खर्चा प्रति श्रद्धालु मात्र दो हजार! उसमें रहना -सोना, खाना -पीना सब!' तुम्हारे सिरहाने के नीचे अपना विजिटिंग कार्ड छोड़े जा रहा हूं.....' मैं उनसे कुछ और संवाद बनाता कह वे गायब हो गए।

मैंने भी सोचा कि चलो नास्तिक होने के बाद भी दो हजार में स्वर्ग की बुकिंग ही करवा ली जाए। यहां तो दो हजार में सरकारी फ्लैट के लिए आवदेन करने वाला आवेदन पत्र तक नहीं आता।

और दो रोज बाद मैं अपनी बीवी को बिन बताए कृष्ण की टूरिस्ट बसों में लाल किले से मथुरा वृंदावन की यात्रा पर हो लिया। बीवी को मैंने अपने साथ इसलिए नहीं लिया कि उसे साथ ले गया तो स्वर्ग में भी मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी। हर चौथे दिन मायके भागी रहा करेगी।

वृंदावन हमारी बस पहुंची तो कृष्ण ने मुझे बस से उतारा और अपने साथ यमुना किनारे ले गए। यमुना में काला सा कुछ देखा तो मैं डरा। मुझे डरा देख कृष्ण ने पूछा,' क्यों ठिठक रहे हो? कोई पंडा दिख गया क्या??'

' नहीं! यमुना में कालिया दिख रहा है,' तुमने तो इसे अपने वश में कर लिया था न?'

' हां! बहुत पहले कर लिया था!'

' तो ये क्या है?' मैंने कृष्ण से पूछा तो वे हंसते बोले,' अरे पागल, ये कालिया नहीं , ये तो आस- पास के गुजरों की भैंसे यमुना में तैर रही हैं। उस बेचारे को अब यमुना में जगह ही कहां बची है? तुम लोगों की भूख तो एक दिन......'

' और ये यमुना में जो काला जल दिख रहा है, ये कालिया के विष से ही हुआ होगा? कितना भयंकर था वह? आज तक जल साफ नहीं हुआ,' मैंने आश्चर्य से पूछा तो कृष्ण हंसते हुए बोले,' हद है यार! मजाक की भी हद होती है! तुम्हारा सामयिक ज्ञान तो जीरो है। ये कालिया के विष से काला हुआ जल नहीं, ये तो आसपास के गंदे नालों से तुम्हारा आने वाला गंदा जल है। तुम लोगों ने सच कहूं गंगा -यमुना का बेड़ा गर्क करके रख दिया है और अपने को इतने साफ बनते हो कि.......' कृष्ण ने कहा तो मैं पता नहीं क्यों महाबेशर्म होने के बाद भी लज्जा गया।

' और ये.......'

' ये ब्रजभूमि है!'

' सुना है तुम यहां गाएं चराया करते थे ,पर यहां तो एक भी गाय नहीं दिख रही। कहां चली गईं सब गाएं? अब तो चाय को बहुत मन कर रहा है । तुम्हारे ब्रज आकर आज शुद्ध दूध की चाय पी अमर होने को बहुत मन कर रहा है हे कृष्ण!' पर सामने जब चाय में पैकेट का दूध डालते रेहड़ी वाले को देखा तो मैं दंग रह गया,' ये क्या प्रभु?'

' मैंने चाय छोड़ दी है। कॉफी लेते हैं। जबसे मेरे ग्वालों ने नकली दूध बनाने का फार्मूला ईजाद कर लिया तबसे गायों को पूछता ही कौन है? कौन गोबर से हाथ गंदे करे, कौन घास लाए? बेचारी सड़कों पर आ गई हैं,' कह कृष्ण ने लंबी सांस भरी तो मैंने उन्हें सांत्वना देते कहा,' कोई बात नहीं प्रभु! वक्त वक्त कर फेर है.... तुम्हारे मथुरा के पेड़ों के बारे में बड़ा सुना है , कहो तो सामने वाली मिठाई की दूकान से.........'

'मत खाना इन्हें ,जिसने खाए वह पछताया ही! क्या पता इनमें ये क्या- क्या मिलावट करने लग गए हैं ये आजकल ..... बदनाम करके रख दिया मुझे इन्होंने!' उन्होंने सख्त हिदायत देते कहा।

' तो तुम इन्हें रोकते क्यों नहीं? बदनामी तो तुम्हारी ही हो रही है न कुल मिलाकर...... ऐसे में लोग नास्तिक न बनें तो और क्या करें.....'

' अच्छा, अब चलो, मेरे गेस्ट हाउस में आराम करो। कल सुबह आठ बजे मिलेंगे। फिर तुम्हें अपनी जन्मस्थली घुमाऊंगा।'

' जन्मस्थली बोले तो??'

' मैटरनिटि होम! पर हां! सुबह जल्दी जाग जाना...... अब चलता हूं ,राधा इंतजार कर रही होगी ..' कह वे हाथ हिलाते पुरजोर भजन लगे ऑटो में चढ़ गए।

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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डॉ. दीप्ति गुप्ता

      मानव-मन में स्थाई रूप से बने रहने भावो में ‘प्रेम’ सबसे उदात्त भाव है इसलिए ही इससे उद्भूत होने वाले ‘श्रृंगार रस’  को ‘रसराज’ कहा गया है !   सच्चा प्रेम इंसान को कुंदन सा निखार सकता है,चन्दन सा महका सकता है, मतलब कि उसका मोहक रूपांतरण कर सकता है !  प्रेम के इस अद्भुत  भाव और क्षमता को मेरी यह कविता   समर्पित  :


अनुप्राणित

प्यार  में  तेरे निखर गई, बन किरन सुनहरी बिखर गई

      
चाँद का उजला-उजला रूप,
सूरज की  पुखराजी धूप,            
अमिय भरे तेरे नयनो से, मुझ में आ के सिमट  गई


परस तुम्हारा पाकर प्रेयस्,
आज बनी हूँ मैं पारस            
पल भर का स्पर्श तुम्हारा, मैं कुंदन  सी हो गई

आए  जो   तुम   मधुमास   बन
दहक उठी  मैं अमलताश सम
प्रियतम ताप हरा जो तुमने, मैं चन्दन सी हो गई 


बन बहार  छाए तुम  ऐसे,
मैं पुलकित पाटल के जैसे 
ओ,अनुप्रास मेरे अर्चन के, मैं  उपमा -रूपक हो गई

 

मेरे साजन! तुम फागुन हो ,
बहुरंगी उड़ती गुलाल मैं
पूनो की जुनली रातों में, खिल चम्पा सी, महक गई


           
उमड़े जब तुम मेघा बन कर , 
पुरवाई सी चलूँ मैं तन कर  
तुम स्वाति बनकर जो बरसे, मैं मोती बन चमक गई

 

अनुरक्त हुए तुम कान्हा बनकर 
मैं बंसी बन सजूँ अधर पर 
तुम हो कूल नेह का मेरे, मैं गंगा सी पावन हो गई

           
तुम जो आए हो जीवन में , 
बनी समूची दुनिया बैरन
दूर हुए जब कभी पिया तुम, मैं निर्जीव राख सी हो गई

          
‘पियु-पियु’ टेर लगाई निस-दिन,
बौराई सी फिरती पल छिन     
तुम क्या जानो मीत मेरे,  मैं क्या से क्या-क्या हो गई


 
अनुप्राणन् तुम इन साँसों  के ,
अनुप्राणित हूँ मैं प्रिय तुमसे  
प्यार में तेरे सीझ-सीझ मैं, अमर  बेल  सम  हो  गई !

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फिर भी..............!

तुमने कहा अधिक खिलखिला के-'मैं ठीक हूँ ..बहुत खुश हूँ'
तुम मुझे उतने ही दर्द से सराबोर और उदास नज़र आए
नम आँखों के साथ मुस्कुराते हुए तुम बेज़ार नज़र आए

मैंने पूछा - सबके होते हुए भी अकेले रह रहो, कैसे रहते होगें
'मैं बहुत मज़बूत हूँ ' कहने पे,तुम बहुत कमज़ोर नज़र आए
आवाज़ के कंपन के साथ जोर देकर बोलते तुम टूटे नज़र आए

फिर भी न रहा गया और पूछ बैठी  -  नींद ठीक आती है
'बहुत गहरी आती है ' कहते ही तुम आँखें चुराते नज़र आए
स्याह घेरों से उभरती सफेद रातों में तुम जागते नज़र आए
मुझे इतना क्यूं बहकाते हो,अपना रंजो-गम क्यूं छुपाते हो
अच्छे से तुम जानते हो कि   मैं   सब भांप लूंगी
तुमसे महीन तंतुओं से जुडी मैं सब जान   लूंगी
फिर भी..............!  !  ? ?

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जीवन स्रोत


जीवन के दो छोर
एक छोर पे जन्म
दूसरे पे मृत्यु
जन्म से आकार पा कर
जीवन एक दिन मृत्यु में विलय हो जाता है
ऐसा तुम्हे लगता है,
पर मुझे तो कुछ और नज़र आता है,
"मृत्यु जन्म की नींव है "
जहाँ से जीवन फिर से पनपता है,
मृत्यु वही अन्तिम पड़ाव है,
जिस से गुज़र कर, जिसकी गहराईयों में पहुँचकर
सारे पाप मैल धो कर, स्वच्छ और उजला हो कर
जीवन पुनः आकार पाता है !
'मृत्यु' उसे सँवार कर, जन्म की ऒर सरका देती है,
और यह 'संसरण' अनवरत चलता रहता है !
फिर तुम क्यों मृत्यु से डरते हो, खौफ खाते हो ?
अन्तिम पड़ाव, अन्तिम छोर है वह,
जन्म पाना है तो सृजन बिन्दु की ऒर प्रयाण करना होगा,
इस अन्तिम पड़ाव से गुज़रना होगा,
उस पड़ाव पे पहुँचकर, तुम्हे जीवन का मार्ग दिखेगा,
तो नमन करो- जीवन के इस अन्तिम, चरम बिन्दु को
जो जीवन स्रोत है, सर्जक है !

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अवलोकन
आपकी संवेदनाएं अभी जीवित है
यदि आपकी आँखे भर आती है
आपमें भावनाएँ अभी बरक़रार है
यदि आप आहत महसूस करते हैं
आपका विवेक अभी सलामत है
यदि आप सही बात के पक्ष में खड़े होते है
आपका साहस मरा नहीं है
यदि आप अन्याय के खिलाफ़ बोलते है
आपका दिमाग सक्रिय है
यदि आपको चिंताएं सताती है
आपका दिल अभी जिन्दा है
यदि आपको अपने याद आते है
आपमें जीने की तमन्ना है
यदि आप अभी भी मुस्कुराते हैं !!

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शब्दों का वज़न

‘शब्द’ बनता अक्षर-अक्षर जोड़ के

‘अक्षर’ जो कभी क्षरित नही होते,

कभी क्षय नहीं होते…होते ‘अक्षय’

‘देव - ध्वनि’ सम होते दिव्य

कुछ तो है इनमें, तभी तो इतने वज़नी होते

कडुवे हो तो तीर बन, मन में घाव कर देते

मीठे हो तो मरहम बन,उन्हें त्वरित भर देते

ज़हर से ज़्यादा जानलेवा

दवा से ज़्यादा प्राणदायी

सुने ज़रा करते कैसा चमत्कार -

दंगों की आग से बचती एक औरत ने

मारने को उद्दत युवक को कह दिया ‘बेटा’

युवा मन झट पिघल उठा,छोड़ खंजर चरणों में 'लेटा'

इसी तरह ‘माँ’ शब्द बहा देता है दिल में ममता की नदिया

तो नफ़रत की आग उगलता शब्द सोख लेता हैं प्यार का दरिया

द्वेष के वज़न से भरे शब्दों से कितनी बार सुलगा है भारत

‘अन्धों के अंधे’ कहने से हो गया था ‘महाभारत’

वाक् - युद्ध बड़े खतरनाक,

करवा देते हादसे शर्मनाक

तो वहीं, प्रेम के वज़न से भरे शब्द

जोड़ देते हैं दिलों को, समेट लेते हैं बिखरे रिश्ते को

धो देते हैं अवसाद, देते हैं मीठा एहसास

अंधरे दूर कर, मन में भर देते है उजास

ताज़े, हरे-भरे शब्द ‘उत्साह’ से हमें भर जाते हैं

गुदगुदाते शब्द ‘हँसी’ की फुलझडी सजाते हैं

तो तीखे तंज भरे शब्द ‘आंसू’ की झड़ी बन जाते हैं

सो शब्दों को हल्का मत समझो

इनका गहरा ‘असर’ ही इनके ‘वज़न’ का माप है

और इनके ‘ब्रह्म’ होने का प्रमाण है.....!

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परिचय -

 

शिक्षा: आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी) एम.ए. (संस्कृत), पी.एच-डी (हिन्दी) 1978

कार्य अनुभव : एसोसिएट प्रोफैसर

१) हिन्दी विभाग रुहेलखंड विश्वविद्यालय,बरेली, में अध्यापन (१९७८ – १९९६)

२) हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में अध्यापन (१९९६ -१९९८)

३) हिन्दी विभाग, पुणे विश्वविद्यालय में अध्यापन (१९९९ – २००१)

४) विश्वविद्यालयी नौकरी के दौरान, भारत सरकार द्वारा, १९८९ में ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’, नई दिल्ली में ‘ शिक्षा सलाहकार’ पद पर तीन वर्ष के डेप्युटेशन पर नियुक्ति (१९८९- १९९२)

साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन :

गगनांचल, हंस,वागर्थ,साक्षात्कार, नया ज्ञानोदय, कथादेश,लमही, संबोधन, उदभावना, वर्तमान साहित्य, अक्षर-पर्व, नई धारा, प्रेरणा, अनुवाद-पत्रिका, अभिनव इमरोज़, काल-निर्णय,हिन्दी फेमिना, नव्या, विश्वगाथा, कुतुबनुमा, उदंती, उत्तरा, संचेतना, अहिल्या आदि पत्रिकाओं, एवं हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला, पंजाब केसरी, विश्वमानव, सन्मार्ग, जनसंदेश, नई दुनिया, जनसत्ता, जनवाणी, संडेवाणी (मारीशस), आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं, कहानियों, समीक्षाओं एवं सामाजिक सरोकारों के आलेखों का प्रकाशन. Indian Express, Maharashtra Herald, Pune Times, Women’s Era, Alive, (Delhi Press) पत्रिकाओं में अंग्रेज़ी आलेखों एवं कहानियों का प्रकाशन.

नैट की ‘काव्यालय’ (डा. विनोद तिवारी, न्यूयॉर्क)), साहित्य-कुञ्ज(सुमन घई टोरंटो), लेखनी(शैल अग्रवाल, लन्दन), शब्दांकन,कथा-व्यथा (कोलकाता), अनुभूति-अभिव्यक्ति(पूर्णिमा बर्मन), हिंदी नेस्ट, अर्गला, सृजनगाथा, ArticleBase.com, Fanstory.com, Muse.com आदि हिन्दी एवं अंग्रेजी की इ-पत्रिकाओं में विविध रचनाओं का प्रकाशन ! हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार हेतु, नैट पर याहू के दो साहित्यिक समूहों -‘काव्यधारा’ और ‘विचार-विमर्श’ का संस्थापन और संचालन !

उपलब्धियाँ :

१) Fanstory.com – American Literary site पर English Poems ‘’All Time Best’ ’से सम्मानित.

२) ‘शेष प्रसंग’ कहानी संग्रह (2007) की ‘हरिया काका’ तथा ‘पातकनाशनम्’ कहानियाँ पुणे विश्वविद्यालय के क्रमश: 2008 और 2009 से हिन्दी स्नातक पाठ्य क्रम में शामिल

३) ‘अन्तर्यात्रा’ काव्य संग्रह (2005) की ‘निश्छल भाव’ व ‘काला चाँद’ कविताएं भारत के समस्त राज्यों के विभिन्न स्कूलों के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढाई जा रही है ! भारत से बाहर, दुबई, शारजा, आबू धबी, आदि विभिन्न स्थानों में स्थापित मॉडर्न स्कूल की शाखाओँ मे भी 2008 से हिन्दी पाठ्यक्रम का हिस्सा ।

४) The Sunday Indian (नई दिल्ली) पत्रिका द्वारा २०११ में आयोजित भारत और भारत से बाहर बसी हिन्दी की लेखिकाओं के लेखन के ‘आकलन’ के तहत हिन्दी साहित्य में बहुमूल्य योगदान हेतु सर्वोत्तम लेखिका वर्ग में चयनित और सम्मानित !

५) अमृतलाल नागर पर लिखा संस्मरण ‘बूँद-बूँद अमृत’ पाठकों द्वारा इतना सराहा गया कि अमेरिका की ‘अमेज़न लाइब्रेरी’ ने उसे प्रकाशित कर, अपने पुस्तकालय में संग्रहीत किया. !

हिन्दी साहित्य के उत्थान और विकास में छात्र जीवन से अब तक निरंतर योगदान ! आज तक जो भी थोड़ा बहुत सृजन किया है, वह इस प्रकार है -

प्रकाशित कृतियाँ :

1) महाकाल से मानस का हंस – सामाजिक मूल्यों और आदर्शों की एक यात्रा, (शोधपरक - 2000)

2) महाकाल से मानस का हंस – तत्कालीन इतिहास और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में, (शोधपरक -2001) 3) महाकाल से मानस का हंस – जीवन दर्शन, (शोधपरक 200३)

4) अन्तर्यात्रा ( काव्य संग्रह - 2005),

5) Ocean In The Eyes ( Collection of Poems - 2005)

6) शेष प्रसंग (कहानी संग्रह -2007),

7) समाज और सँस्कृति के चितेरे - अमृतलाल नागर, (शोधपरक - 2007)

8) सरहद से घर तक (कहानी संग्रह, 2011)

9) लेखक के आईने में लेखक - संस्मरण संग्रह शीघ्र ही ‘बोधि प्रकाशन’,जयपुर से प्रकाश्य

10) विभिन्न पत्रिकाओं में प्रख्यात लेखकों की कृतियों पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षाओं

का संकलन, ‘अमन प्रकाशन’, कानपुर से शीघ्र प्रकाश्य.

अंग्रेज़ी-हिन्दी अनुवाद कार्य :

राजभाषा विभाग, हिन्दी संस्थान, शिक्षा निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली, McGrow Hill Publications, New Delhi, ICSSR, New Delhi, अनुवाद संस्थान, नई दिल्ली, CASP Pune, MIT Pune, Multiversity Software Company Pune, Knowledge Corporation Pune, Unicef, Airlines, Schlumberger (Oil based) Company, Pune के लिए अंग्रज़ी-हिन्दी अनुवाद कार्य ! हाल ही मे Multiversity Software Company Pune से प्रकाशित पुस्तक ‘Education Today In India’ का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद. अप्रैल,२०१४ मे चुनाव से पूर्व, दो राजनीतिक पार्टियों द्वारा दिल्ली और मुम्बई से भेजे गए Manifestos का हिन्दी में अनुवाद !

डा. दीप्ति गुप्ता, 2/ ए, आकाशदूत, 12 -ए, नॉर्थ ऐवेन्यू, कल्याणी नगर , पुणे - 411006 , Email: drdepti25@yahoo.co.in

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अलगाव से लगाव तक

डॉ. दीप्ति गुप्ता

 

‘ मुझे पता था तुम यही कहोगी’

‘पता था तो आपने पूछा ही क्यूँ ‘

‘क्यूँ का क्या सवाल, पति हूँ तुम्हारा, पूछना मेरा हक़ है ‘

‘हक़ तो आप ख़ूब जानते हैं कभी कर्तव्यों पे भी नज़र डाली है ‘

‘ओफ़्फो, तुमसे तो कुछ भी कहना बेकार है, ठीक है एक कप चाय दो जल्दी से ‘

‘ये घर है कि धरमशाला ? जब देखो कभी ताई, कभी मौसी, कभी चाचा-चाची चले आते हैं और दो दिन नहीं बल्कि दो-दो हफ़्तों तक जाना भूल जाते हैं ‘

‘चाय के साथ कुछ लोगे क्या ‘

‘पूछ क्या रही हो, अपने आप से कुछ नहीं ला सकती क्या ‘

‘अरे, अजीब बात करते है, आप अक्सर ही खाली चाय पीते हैं दफ़्तर से आकर ‘

‘तो फिर पूछा ही क्यों ‘

‘यूँ ही कभी-कभी आपका चाय के साथ कुछ हल्का फुल्का खाने का मन कर आता है, सो...’

‘तुम या तो समझदार ही हो जाओ या नासमझ ‘

‘मैं तो समझदार ही हूँ, अब तुम्हें नज़र नहीं आती – वो अलग बात है ‘

ये कपड़ों का ढेर बिस्तर पे क्यों पड़ा है, देखो सारा कमरा कैसा बेतरतीब है ‘

‘क्या करूँ सारे दिन चक्की की तरह पिसती रहती हूँ – सफ़ाई, झाड़ू, खाना,बर्तन. कपड़े धोने – सुखाने – सारा दिन ऐसा निकल जाता है कि साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती, फिर भी काम नहीं निबटते ‘

‘हुँह काम नहीं निबटते......तुम हो ही फूहड़ ’

‘चलो फूहड़ ही सही, पर घर तो सम्भाल ही रही हूँ। महीनों भर ढेरों मेहमानों की आवभगत, सेवा टहल ये फूहड़ ही कर रही है ‘

‘बबली को एडमीशन के लिए कल स्कूल लेकर गई ? ’

‘गई थी, हो गया दाखिला, उसकी स्कूल ड्रेस और कॉपी – किताब आनी हैं ‘

‘ठीक है, शाम को ले आऊँगा। और कुछ ?’

‘मेरठ वाली ताई जी परसों जाने वाली हैं। उनके लिए चौड़े किनारे वाली हैन्डलूम की एक साड़ी लानी है ‘

‘हे भगवान, अगर मैं इसी तरह लेन- देन की साड़ियाँ लाता रहा तो महीने का खर्च कैसे चलेगा ‘

‘मैं क्या जानूँ, अम्मा जी नाराज़ हो जायेगी। दस बात मुझे सुननी पड़ेगी। कुछ भेंट तो ताई जी को देनी ही है, अम्मा जी चाहती हैं कि हैन्डलूम की एक साड़ी दी जाए‘

‘घड़ी ने 8 बजाए। बाबू जी कमरे से बोले – ‘बहू खाना बन गया क्या ?’

कला ने झटपट थाली लगाकर बबली के हाथ बाबू जी के कमरे में भिजवाई। फिर बारी-बारी से ताई जी, अम्मा जी, कपिल,बबली, ननद और देवर को गरम-गरम खाना खिलाया। अंत में बचा खुचा खाना किसी तरह जल्दी-जल्दी निगल कर, चौके की सफाई की और ग्यारह बजते-बजते दिन भर की थकी हारी बिस्तर पे पड़ते ही सो गई।

सुबह चार बजे कला जगह-जगह से दुखते बदन को किसी तरह समेटती हुई उठी। दिल और शरीर साथ नहीं दे रहे थे। तभी दिमाग ने कला के निढाल शरार में कर्तव्यनिष्ठता की चाबी भरी और वह एकाएक उर्जा से भर कर घर की झाड़ू, साज-सफाई में लग गई। रोज़मर्रा की तरह मशीनी रफ़्तार से नहा धोकर, रसोई में घुस गई। सबके उठने से पहले, सुब्ह की गरम-गरम अदरक और तुलसी की चाय बनाई और सबको कमरों में दे आई। फिर पूजाघर में धूप बत्ती जलाकर ‘रामरक्षा स्त्रोत’ का जाप किया। इसके बाद खुद ने रसोई में चलते फिरते, सब्ज़ी बिनारते, दाल-चावल बीनते-धोते, गरम से गुनगुनी हुई अपनी चाय टुकड़ा-टुकड़ा पी। नौ बजे कपिल को लंच बॉक्स तैयार करके दिया और बबली को भी स्कूल बैग, लंच बॉक्स, वाटर बॉटल देकर कपिल के हवाले किया जिससे वह रास्ते में उसे स्कूल में छोड़ सके। इसके बाद सारे दिन इस काम, उस काम में रोबोट की तरह लगातार लगी रही।

‘अरे कला,गुसलख़ाने में अभी तक मेरे धुले कपड़े ऐसे ही रखे हैं....फैलाए नहीं तुमने।‘ आजकल की बहुएँ भी न बस.....अम्मा जी उलाहना देती गुसलख़ाने के पास से गुजरी तो चावल पकाती कला अपने दिलोदिमाग़ को साधती मृदुता के साथ बोली – ‘अभी फैलाए देती हूँ अम्माजी। रसोई के काम में भूल गई।‘

कला रोनी-रोनी सी कपड़े झटकती, सन्न सी सोचती रही कि सबकी ज़रूरत पूरी करती हूँ। बहू, पत्नी, भाभी और माँ के सारे कर्तव्य कभी भी उफ़ किए बिना निबाहती हूँ, पर कोई मेरी ज़रूरत, एक मुठ्ठी ख़ुशी, एक पल के आराम का ज़रा भी ख़्याल करता है ? बड़ी कठिन है ज़िन्दगी...!

तीन बजे ऑफ़िस से कपिल का फ़ोन आया कि आज शाम को वह साथ चलने को तैयार रहे, एक साथी के घर बच्चे के जन्मदिन पे ज़रूरी जाना है। कला कुछ कह पाती, इससे पहले कपिल ने फोन काट दिया। कला को बहुत बुरा लगा। सोचने लगी इतनी बेइज़्ज़ती तो किसी मातहत की भी नहीं होती, फिर वह तो पत्नी है। उसकी स्थिति तो एक मातहत से भी गई गुज़री हो गई.... ? वह दासी है, या ख़रीदी हुई गुलाम, क्या है वह.... ? उसका दिल कसैला हो उठा। वितृष्णा की तीखी लहर सिर से पाँव तक उसे कड़ुवाहट से भर गई। विवाह प्रेम-बंधन है या गुलामी का अनुबंध ?

शाम को कपिल ने आते ही चाय बाद में पी, पहले कला को ताना मारा – ‘अभी ऐसे ही उधड़ी-उधड़ी फिर रही हो! कब तैयार होओगी जाने के लिए,जब दोस्त के घर पार्टी ख़त्म हो जाएगी ? सबके आदेश का पालन करती हो, बस मेरा ही कहना मानने में ज़ोर पड़ता है...! पति का साथ देना आता है तुम्हें.....घर के काम तो कभी ख़त्म होंगे नहीं...कुछ अक्ल से काम लेना सीखो।‘

कला रुआं सी हो गई। किसी बहस में न पड़कर, किसी तरह ताक़त बटोरती सी बोली –

‘बस अभी तैयार होती हूँ।‘

गति से तार पे फैले कपड़ों को समेटती, उन्हें कमरे के कोने में रखे मूढ़े पे रख कर वह बामुश्किल तैयार हो पाई। इस दौरान अम्मा, बाबू जी, ताई जी सभी की एक बाद एक मांगें तीर की तरह उस पे पड़ती रहीं। कपिल घर वालों पे मन में घुमड़ते नपुंसक क्रोध को दबाता हुआ, कुढ़ता बैठा रहा। छ: बजते-बजते दोनों किसी तरह घर से निकले। रास्ते भर वह स्कूटर चलाता कला से जली भुनी बातें करता रहा। दोस्त के घर पहुँचने तक उसका दिल कला पे अपनी खीझ निकाल कर काफ़ी हल्का हो चुका था और कला का दिल पनैले बादल की मानिन्द भारी जो कहीं भी, कभी भी फट सकता था। लेकिन समझदार और साहसी कला ने उपने मन को सहेज समेट कर व्यवहारिकता का चेहरा ओढ़ा और कपिल के पीछे-पीछे जन्मदिन के हर्षोल्लास से भरे घर में दाख़िल हुई। दोनों बड़ी नम्रता और मुस्कुराहट के साथ सबसे मिले। बातें, चाय-नाश्ता, बच्चों के नाच-गाने, इन सबके बीच भी होकर भी कला दिलो-दिमाग से अपनी ससुराल में ही थी। उसका ध्यान घर के अधूरे पड़े कामों में ही अटका था। वे उसके जीवन का न चाहते हुए भी ऐसा हिस्सा बन चुके थे कि वह मानसिक और शारीरिक रूप से उन्हें ही समेटने में लगी रहती थी। आठ बजे तक सबसे विदा लेकर दोनों घर के लिए रवाना हुए। कपिल रास्ते भर मेजबान मिसेज़ सेठी की आवभगत, व्यवहार कुशलता, रूप-गुण की तारीफ़ों के पुल बाँधता रहा।

उस रात कपिल पहली बार कला की ओर रूखेपन से करवट लेकर सोया। कामों के बोझ से थकी हारी कला ने उस पल सच में अपनी हार को मानो कपिल की पीठ से अपने पर बेदर्दी से हावी होते हुए देखा। कोमा में अवचेतन पड़े इंसान की तरह वह सुन्न पड़ी रही। इससे पूर्व आज तक कपिल ने कितनी भी कड़वी बातें उसे कही, पर कभी इस तरह करवट लेकर सारी रात अजनबी बनकर नहीं सोया। कितना भी थका,खीझा या कड़वाहट से भरा हो वह, किन्तु सोने से पहले कला को आगोश में ज़रूर लेता था। इन दस सालों में कपिल की कड़वी से कड़वी बातों ने उसे ऐसा आहत नहीं किया जैसा कि आज उसकी करवट ने तोड़ डाला। कला किसी अप्रिय अनहोनी की आहट से भयभीत न जाने कब कैसे सो पाई।

अगले दिन कला को कुछ याद न था सिवाय के कपिल का चेतावनी देता रूखापन। पिछले दस सालों में उसकी सारी उर्जा, ताकत इस कदर चुक गई थी कि उसमें प्रतिरोध करने की क्षमता शून्य हो चुकी थी। कल रात की घटना से तो जैसे उसकी जिजीविषा ही मर गई थी। कपिल उसका पति, उसका जीवन, जीने का सहारा था, पर आज वह उसके होते हुए भी कितनी बेसहारा और मृतप्राय: थी.....! उसने अपने को इतना तिरस्कृत, इतना एकाकी कभी नहीं पाया था। कला का मन भयावह आशंका से बोझिल था।

कई दिनों तक कपिल का वही रवैया रहा, जैसे कला से कोई मतलब नहीं। कुछ दिनों तक तो वह उखड़ा सा तनावग्रस्त रहा, लेकिन लगभग एक सप्ताह से कला महसूस कर रही है कि वह अपने में बड़ा सन्तुष्ट और शान्त दिख रहा है जैसे वह किसी उलझन से निकलकर, एक समाधान पे पहुँच गया हो। हर बीतते दिन के साथ कला शीत युध्द के भँवर में गहरे धंसती जा रही है। जैसे-जैसे कपिल एक निशब्द उलझन से निकलता नज़र आ रहा है, वैसे-वैसे कला मानो उस निशब्द उलझन में उलझती जा रही है। उन दोनो के बीच वैवाहिक संबंध की आत्मीयता और भावनात्मक एकात्मता मुठ्ठी से रेत की भाँति फिसलती जा रही है। वह अपनी आँखों के सामने कपिल और अपने बीच तैरते हर भाव को पल-पल डूबते देख रही है और कुछ भी नहीं कर पा रही है। ये कपिल को अचानक क्या हो गया…?? वह उसकी दयनीय स्थिति और विवशता को सहानुभूतिपूर्वक क्यों नहीं समझ रहा है। वह कौन सी जादू की छड़ी घुमा दे कि सब कुछ कपिल का मन चाहा हो जाए। पति की इच्छानुसार चले या घरवालों के आदेशों का पालन करे ?

इस शीत युध्द में डूबते उतराते एक दिन कपिल ने रात को कला को अपना कठोर फैसला सुनाते हुए कहा – ‘मेरे लिए तुम्हारे साथ इस तरह निबाह करना अब और सम्भव नहीं। मैंने फैसला कर लिया है कि हमें अलग हो जाना चाहिए। तुम तो कभी बदलोगी नहीं। तुम चाहती तो मेरे मन चाहे अनुसार अपने को ढाल सकती थीं, पर तुम मेरी भावनाओं, मेरी चाहत, मेरी पसन्द को इस क़दर नज़रअन्दाज़ करती रही हो कि तुम्हारे इस बेपरवाह रवैये से मेरी हर भावना, हर संवेदना ख़ुद-ब-ख़ुद इतनी कुचल गई कि अब मैं तुम्हारे साथ अजनबी महसूस करने लगा हूँ। तुम्हारी निकटता में असहज हो जाता हूँ। न जाने मेरे सारे दोस्तों की बीवियाँ कैसे गृहस्थी भी और ख़ुद को भी इस ख़ूबसूरती से सम्भालती है कि मेरे दोस्त उनके गुण गाते नहीं थकते। सो मैं तो उस दिन का इन्तज़ार करते-करते थक गया जब तुम घर की बहू ही नहीं, मेरी सुघड़-सलोनी पत्नी भी बन सको। बहुत सोच-समझ के मैंने यह निर्णय लिया है कि हमें तलाक़ ले लेना चाहिए। कोर्ट के नियमानुसार तलाक़ से पहले तुम्हें कम से कम छ: महीने मुझसे दूर रहना होगा। इसलिए तुम जल्द से जल्द अपने मायके चली जाओ। फिलहाल बबली को ले जा सकती हो, पर बाद में उसकी कस्टडी मुझे मिलेगी।

ये सब सुनकर कला सकते में आ गई। उसे लगा कि वह किसी अँधेरी गुफा में चलती जा रही है। कोई ओर-छोर नज़र नहीं आ रहा है। आँखें खुली हैं पर वह कुछ भी देख पाने में असमर्थ है। वह निपट अँधेरे में भटक गई है। टूट के बिखरने को है, फिर भी न जाने कैसे अपने को सम्भाले है। तभी वह एक झटके से चेतना में आई और करुणा से भरे डूबते स्वर में कपिल से बोली –

‘कपिल प्लीज़ ऐसा मत करना। मैं जीते जी मर जाऊँगी।भले ही मैं तुमसे ज्यादा तुम्हारे घरवालों के कामों को समर्पित हूँ, लेकिन मेरे दिल में हर क्षण तुम और सिर्फ़ तुम ही समाए हो। मुझे ऐसा निरीह मत बनाओ प्लीज़। मुझे तलाक मत देना कपिल....’

‘क्यों न दूँ ? आज तक कभी सोचा तुमने इस बारे में ? धीरे-धीरे पनपती भावनात्मक एकरसता पे कभी गौर किया तुमने ? अब रोने गिड़गिड़ाने से क्या फ़ायदा कला। तुम सिर्फ़ नाम की ही कला हो। तुम्हें जीने की, जीवन को प्यार से भरने की कला आती है ? आती होती तो वैवाहिक जीवन को इस तरह बंजर न होने देती। सिर्फ मेरे अकेले के कोशिश करने से कुछ नहीं हो सकता। तुमने तो मेरी भी सारी उर्जा राख करके रख दी। तुम्हारे साथ तुम्हारी तरह मेरा जीवन भी फूहड़ और उबाऊ हो गया है। इससे तो मैं अकेला भला।‘

कला फफक उठी। सिवाय बार-बार अनुरोध करने के वह कुछ भी नहीं कर पा रही थी। वह बारम्बार अपनी मजबूरी, अपनी स्थिति, घरवालों के लिए अपना सेवाभाव, कपिल के लिए दिल में अथाह प्यार – इस सब को समझाने की वह नाकामयाब कोशिश करती रही। पर कपिल जैसे चट्टान बन चुका था – एकदम संवेदनाशून्य। वह अपनी ही बात पे अड़ा रहा।

अगली सुब्ह आई। दोनों ख़ामोशी ओढ़े अपनी-अपनी दिनचर्या में रोज़ की तरह लग गए। कामों में लगी कला अपने मन को ढाढस बँधाने में लगी रही, दिल में रखे भारी बोझ से जूझती रही।शाम तक वह काफ़ी तटस्थ हो चुकी थी। कपिल की इच्छानुसार, इस मामले में वह उसके निर्णय की बलि चढ़ने को मजबूर थी। उसने सब किस्मत पे छोड़ दिया था। इतना सब करने पे भी यदि पति से अलगाव लिखा है तो न चाहते हुए भी उसे वह स्वीकारना होगा। सारे दिन वह घर के आंगन, कमरों, दीवारों को नज़र भर-भर के देखती, मन ही मन उनसे दूर होने की जंग लड़ती और जब भी, जहाँ भी उसे एकान्त मिलता, रो लेती। उसे जी भर के रोने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती थी। ताई जी चली गई और जाते-जाते उस पर तानों की बौछार कर गई।

अगले दो दिनों में कपिल की नागपुर वाली बुआ और फूफा जी आने वाले हैं। कला सोच रही थी कि वह उनके स्वागत की तैयारी करे या इस घर से अपनी विदाई की.....!!

‘बहू परसों निम्मो बहनजी आ रही हो। तुम्हे पता है न उनका तेज़ स्वभाव...ज़रा उनके लिए कमरा वगैरा ठीक से साफ कर लो। भाईसाहब तो फिर भी शान्त है,पर निम्मो बहनजी को एक एक चीज़ टिप-टॉप चाहिए’ – अम्मा जी ने अपने कमरे से कला को आदेश दिया।

‘जी अम्मा जी आज शाम तक सब तैयारी कर दूँगी’ – कला मरी सी आवाज़ में बोली।

शाम को कपिल के ऑफ़िस लौटने पर अम्मा जी कला की शिकायत करती बोली –

‘आजकल बहू का ध्यान न जाने कहाँ रहता है, आज उसने दाल में इतना नमक भर दिया कि मेरे तो हलक के नीचे ही नहीं उतरी और मुझे सूखी सब्ज़ी सो रोटी खानी पड़ी। तेरे बाबू जी की किताबों की शैल्फ़ दस दिन से बिना सफाई के धूल से भरी पड़ी है। दोपहर के खाने के बाद ये चाहे तो क्या साफ नहीं कर सकती ? पर चाहेगी, तभी तो करेगी न...। अपने मथन में रहती है।‘

कपिल चुपचाप सुनता रहा, फिर उठ कर कमरे में चला गया।

आज सलिल खीझता हुआ सबेरे माँ से बोला –

‘माँ तीन दिनों से लगातार भाभी से शर्ट के बटन लगाने को कह रहा हूँ, पर अभी तक बटन नहीं लगे। अब कौन सी शर्ट पहन कर कॉलिज जाऊँ? वही दो दिन की मैली शर्ट पहन कर जाऊँ क्या ?’

दूसरे कमरे में जाते कपिल ने छोटे भाई की कला के ख़िलाफ़ शिकायत सुनी तो न जाने क्यों उसे अच्छा नहीं लगा।

कल दोपहर शीला बराम्दे में बाबू जी से कपिल की चुगली करती कहने लगी –

‘ बाबू जी, मैंने पिछले महीने भय्या से भाई-दूज पे एक सलवार सूट बनवाने को कहा था लेकिन भय्या टाले जा रहे हैं। दुनिया भर के खर्चे करते हैं पर मेरे लिए सूट नहीं बनवा सकते ?’

उधर से गुज़रती कला के कानों में जब ननद की यह उलाहना पड़ी तो वह एक पल को ठिठकी, फिर एक कटीले क्रोध से भरी तेज़ कदमों से रसोई घर में चली गई। उसका मन बड़बड़ाने लगा – ‘यहाँ सबको अपनी ज़रूरतों की पड़ी है। महीना मुश्किल से खिंच पाता है, ऊपर से सलिल, शीला और बबली की फीस, बेवक्त टपक पड़ने वाले मेहमानों के खर्चे....। कपिल रात-दिन ऑफिस में कमर तोड़ मेहनत और ओवर टाइम करता है, तब कहीं जा के इतने बड़े परिवार की ज़रूरते पूरी कर पाता है। उसकी मेहनत और सेहत की किसी को परवाह नहीं, बस किसी की ज़रूरत पूरी नहीं हुई कि लगे सब शिकायत करने।‘ फिर उसने तर्क किया कि वह क्यों कपिल के ख्याल में इस तरह घुल रही है ? उधर ऑफिस के काम में व्यस्त होने पर भी कपिल को बीच-बीच में अपने घर वालों के दोगले रूप और “बहू” नाम के प्राणी के प्रति अन्यायपूर्ण नीति का ख्याल विचलित कर जाता था। तड़के चार बजे से उठकर रात ग्यारह बजे तक कला मशीन की तरह सबकी सेवा में खपी रहती है, यहाँ तक कि इन सबको खुश रखने के चक्कर में मेरा और उसका रिश्ता भी बलि चढ़ गया, लेकिन ये हैं कि उसके प्रति सराहना और सहानुभूति का भाव रखने के बजाय निरन्तर कमियाँ बीनते हैं और कठोरता भरा अन्यायपूर्ण रवैया रखते हैं। हद है..!

दो दिन बाद नागपुर वाली बुआ जी और फूफा जी आ गए। कला ही नहीं, सारा घर उनके नाज़-नखरे उठाने में लग गया। एक दिन बाद ही और सब तो वापिस अपनी-अपनी रूटीन में चले गए, लेकिन कला, बुआ जी और फूफा जी की सेवा की स्थायी ज़िम्मेदारी ओढ़े, बिना थके उनके सत्कार में जुटी रही। हर दिन उनकी ख़ातिर में कुछ खास पकाती। उनके नहाने के गरम पानी से लेकर कपड़े धोने, सुखाने और तह बनाकर रखने तक के सारे काम सचेत होकर करती। फिर भी छिद्रान्वेषी बुआ जी अक्सर खासतौर से कपिल के ऑफिस लौटने पर ही, अम्मा जी से कला के काम में मीन-मेख निकालती हुई, ज़ोर-ज़ोर से कपिल को सुनाती। कपिल को कला के प्रति सबका तानाशाही रूप इतना नागवार लग रहा था कि कई बार तो वह भड़कते-भड़कते रह गया। बड़ों के सामने ज़ुबान न खोलने और ग़म खाने के मध्यम वर्गीय सँस्कार उसके विद्रोह के आड़े आ जाते थे, वरना मन तो करता कि सबके अन्याय का करारा जवाब दे।

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रविवार का दिन था। सभी के घर में होने से घऱ में खूब चहलपहल थी। नाश्ते में कला ने सूजी का हलुवा और गरम-गरम पकौड़ियाँ बनाई थी। सब साथ बैठे खा रहे थे और बबली व शीला रसोई से गरमागरम चाय और पकौड़ियाँ लाकर सबको खिली रहीं थीं। तभी फूफा जी ने शोशा छोड़ा – ‘कला, पकौड़ियाँ कुछ ज़्यादा तेज़ जली-जली सी तल रही है। मिर्च भी कुछ चटक है।‘ इस पर अम्मा भला कैसे चुप रहती। उन्होंने भी तुर्रा छोड़ा –

‘हलुवा कुछ कच्चा सा लग रहा है। सूजी थोड़ी और भुननी चाहिए थी।‘

जब कि कपिल को हलुवा गुलाबी भुना हुआ, सोंधी खुशबू से भरा बेहद स्वादिष्ट लगा। इलायची, बादाम और नारियल ने उसके स्वाद को और भी दुगुना कर दिया था। पकौड़ी भी खस्ता और करारी बनी थी। मिर्च तो ज़रा भी तेज़ नहीं थी कपिल पकौड़ी और हलुवे के साथ-साथ सबकी तीखी और जली भुनी बातों का स्वाद भी लेता जा रहा था। उसे लगा कला की कड़क ड्यूटी के आगे तो उसकी ऑफिस ड्यूटी कुछ भी नहीं। दूसरे उसे अच्छा काम करने पर बॉस से सराहना और प्रमोशन तो मिलता है, लेकिन कला को तो सिर्फ तानों और फटकार के कुछ भी नहीं मिलता। इससे तो उसके ऑफिस का चपरासी बेहतर स्थिति में है। पुराना होने के कारण कभी-कभी तो बॉस पर भी रौब जमा लेता है। कला घर में दस साल पुरानी होने पर भी डरी, मरी, खामोश रहती है।

इस सबके बावजूद भी कपिल कला के प्रति अपने दिल में पहले जैसे प्यार और अपनेपन की कमी पाता था। परन्तु घर का कोई प्राणी कला की ग़लत आलोचना करता तो, कपिल को तनिक भी बर्दाश्त न होता। इसी तरह कपिल से उपेक्षित होकर भी कला को कपिल के ख़िलाफ़ दूसरों द्वारा कही गई बातें बड़ी चुभती। कला यह भी सोचती कि अब तो वह इस घर में कुछ ही दिनों मेहमान है। कपिल तो उससे रुष्ट रहता ही है, तो वह और सबसे उसकी बुराई सुनकर मन ही मन ख़ुश होता होगा।

पिछले आठ दिनों से रात को अपने कमरे में, कला से दूर एक तरफ पड़े सोफे पे सोता, कपिल अक्सर सोने से पहले सोचता कि उसे ख़ुद को कला ख़ामियों का भंडार नज़र आती है तो घर के दूसरे लोगों से कला की बुराई क्यों नहीं सुन पाता....! उसे इतना बुरा क्यों लगता है ? इसी उधेड़ बुन में वह न जाने कब सो जाता।

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आज तलाक की अर्ज़ी देने उसे वकील के पास जाना था। हांलाकि उसने कला को अपना फैसला सुना दिया था। फिर भी अन्दर उसे कुछ कचोटता रहता था। कला निर्जीव हुई, ढेर ज़िम्मेदारियों के बोझ से दबी, किसी तरह दिन काट रही थी। मन में एक धुंधली आशा कभी-कभी चटक हो उठती थी कि शायद कपिल उसे जाने से रोक ले, शायद कपिल का मन पिघल जाए। पर ऐसा न हुआ।

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एक दिन मौका देख कर कपिल ने घर में सबको बता दिया कि वह और कला अब साथ नहीं रह सकते और तलाक ले रहे हैं। कपिल के मुँह से ये अप्रत्याशित घोषणा सुनकर सब अवाक् उसका मुँह देखते रह गए। सास-ससुर को बेटे-बहू के अलगाव का दुख कम, घर के काम करती आज्ञाकारी नौकरानी के जाने की चिन्ता अधिक सताने लगी। सबके अपने-अपने स्वार्थ उन पे हावी थे। सबने उसे अपने-अपने ढंग से कारण पूछा, बेदिली से थोड़ा समझाने का भी प्रयास किया, लेकिन कपिल अपने निर्णय पे अटल रहा।

वो दिन भी आ ही गया जब कला अपना सूटकेस लेकर मायके चली गई। कोर्ट ऑर्डर के अनुसार दोनों को तलाक से पूर्व छ: माह तक अलग रहना था।

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इधर कला के घर में भी सबका वही हाल था। सब जी भर कर कपिल की बुराई करते। जो अवगुण उसमें नहीं थे, वे भी कला के घर वाले कपिल पे थोपते। कला की माँ तो कपिल को बदचलन तक कहने से नहीं चूकती। भय्या उसे नकारा और दब्बू कहते। यह सुनकर कला दिल मसोस कर रह जाती। वह जानती थी कि कपिल ऐसा बिल्कुल नहीं है। ठीक है, वह उससे तलाक चाहता है पर वह उसके लिए उल्टे सीधे आरोप स्वीकार नहीं कर सकती थी। कपिल के घर में उसकी माँ, बहन, कला को फूहड़, औघड़, मूर्ख और न जाने क्या-क्या कहती न अघाती। शीला ने तो एक दिन यह भी कह दिया कि भाभी को तो भय्या से प्यार ही नहीं था। नाटक करती थी उनके ख्याल का। उन्हें शादी तोड़नी थी तो कैसी चुपचाप बिना विरोध के अलग होने को तैयार हो गई। यह बात कपिल के कानों में पड़ी तो वह आग बबूला हो उठा। उसने शीला को जमकर डाँटा। ये तक चेतावनी दी कि वह देखेगा कि अपनी ससुराल में जाकर शीला कैसे और कितने प्रेम से निबाह करती है। शीला अपने भाई का वह रौद्र रूप देखकर भौंचक रह गई। उसे लगा कि भाभी से अलग होने को तैयार भय्या, भाभी के ख़िलाफ़ उसकी बातें सुनकर खुश होंगे, पर वहाँ तो उल्टी गंगा बहने लगी.....!? उसकी तो समझ से परे था कपिल का यह रूप और प्रतिक्रिया...।

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कला को घर से गए हुए चार महीने बीत गए थे। उसकी अनुपस्थिति में सबको अपने-अपने काम करने पड़ रहे थे। सारा घर कला के बिना बिखरा सा हो गया था। अम्मा जी, बाबू जी, सलिल, शीला सबको कला याद आती थी, उससे किसी भावनात्मक संबंध के कारण नहीं अपितु अनगिनत कामों के कारण। अनगिनत काम और कला मानो एक दूसरे के पर्यायवाची थे। उन ढेर कामों को सहेजने वाली अब वहाँ नहीं थी। वे काम भी उसके बिना बेतरतीब मुँह बाए पड़े रहते थे और सबको तरह-तरह तंग करते व चिढ़ाते थे। घर के नियत ढर्रे के मुताबिक आजकल इन्दौर से कपिल के चाचा-चाची आए हुए थे। कल रात सोने से पहले उन्होंने कपिल को अपने कमरे में बुलाया। अम्मा-बाबूजी वहीं बैठे हुए थे। चाचा-चाची ने बिना सोचे समझे कपिल को बिन माँगी राय दी कि वह कला के वे जेवर रोक ले, जो शादी के समय उसे ससुराल से दिए गए थे। इतना ही नहीं, सबने मिलकर कला के घर वालों की कोर्ट से खर्चा-पानी लेने के बहाने चालाकी भरी लालची नीयत के ख़िलाफ़ भी कपिल को सावधान किया। अपने इस महाभारती व्याख्यान को विराम देने से पहले उन सबने कला को जाहिल, फूहड़ और न जाने क्या-क्या कह डाला। सँस्कारों का मारा कपिल सिर झुकाए क्रोध पीता ख़ामोशी से उन सब समझदार बुज़ुर्गों की दुनियावी बातें सुनता रहा। वे सब अपने विचारों, सोचों और ज़ुबान की कुरूपता से अन्जाने ही उसे कला से दूर नहीं वरन् कला के निकट ले जा रहे थे। जितनी वे कला की आलोचना करते उतना ही कपिल कला के प्रति अपनेपन से भरता जाता। ठीक यही कला के घर में उसके साथ घट रहा था। खैर, वह तो कपिल से अलग होना ही नहीं चाहती थी किन्तु कपिल के रूखे और अन्याय भरे रवैये से उसके प्रति भावना शून्य सी हो गई थी। लेकिन अपने घर वालों की कपिल के लिए जली कटी बातें सुन-सुनकर वह पुन: उसके प्रति सघन प्यार और ख्याल से भरने लगी थी।

कला और कपिल एक दूसरे से दूर, अपने-अपने घरों में आत्मविश्लेषण करते हुए रह रहे थे। घर से लेकर बाहर तक का हर इंसान कला की बुराई कपिल से और कपिल की बुराई कला से करता नज़र आता था। दुनिया के इस तिक्त बर्ताव ने दोनों को अधिक परिपक्व, संवेदनशील और एक दूसरे के लिए भावुक बना दिया था। तलाक होने तक बबली कला के ही पास थी। कला और बच्ची की कमी कपिल को रह-रह के खलती थी।

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एक दिन जब कपिल से नहीं रहा गया तो उसने कला से मिलने की ठानी। उसने ऑफ़िस से कला के घर फोन किया और उसे इन्दिरा पार्क में शाम 5 बजे मिलने के लिए बुलाया। कला तो ख़ुद उससे मिलने को बेचैन थी। उस दिन कपिल को लगा कि समय बहुत धीरे-धीरे खिसक रहा है। जैसे ही शाम के चार बजे कपिल झटपट ऑफिस से 20 कि.मी. दूर पार्क की ओर रवाना हो गया जिससे ठीक पाँच बजे वह पार्क पहुँच सके। वह पाँच से पंद्रह मिनट पहले ही पार्क में पहुँच गया और यह देख कर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा कि कला भी समय से पहले वहाँ पहुँच चुकी थी। कपिल ने इतने समय बाद कला को देखा तो वह उसे बड़ी अपनी लगी। पहले से काफ़ी कमज़ोर भी दिख रही थी, पर एक कमनीयता उसे आवृत किए थी जो कपिल को मोहित कर गई। कला कपिल को देखकर न जाने क्यों लजा गयी और उसके स्वागत में बेंच से उठकर खड़ी हो गई। कपिल को उसका यह तकल्लुफ़ प्यारा लगा। बोला –

‘ अरे बैठो-बैठो ‘

कला सकुचाई सी बेंच के कोने में सिमट कर बैठ गई। कपिल उसके पास ही बैठा, पर थोड़ी सी भद्र दूरी बनाकर। मन तो चाह रहा था कि उससे सट कर बैठे। कला को कपिल नया-नया प्यार भरा लगा। कहाँ तो ‘रूठी राधा’ यह सोचकर आई थी कि वह कपिल से एक भी बात नहीं करेगी, बस ख़ामोशी से उसकी ही सुनेगी, क्योंकि उसे कपिल से कुछ कहना ही नहीं है। उसे जो कहना था वह कपिल से रो-रोकर पहले ही कह चुकी थी, और कपिल ने उसकी प्रार्थना, अनुरोध सब बेदर्दी से ठुकरा दिया था। सो अब कहने को बचा ही क्या था उसके पास। आज तो वह कपिल की निकटता को साँसों में भर लेना चाहती थी जिससे आगे आने वाले दिनों में वह उस निकटता के एहसास के साथ जी सके। धीरे-धीरे वह अकेले जीने का भी साहस जुटा लेगी। ख़ामोश, विनम्र, सिर झुकाए बैठी कला पे कपिल को बड़ा प्यार आया। आज दोनों को लग रहा था कि वे एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। वे एक दूसरे के जितना करीब हैं उतना घर में किसी के भी नहीं। अपने-अपने घरवालों के रौद्र और तीखे हावभाव, बेग़ैरत रवैये से आहत वे दोनों एक दूसरे को इतने अपने लगे कि उन्होंने – ख़ासतौर से कपिल ने तलाक का इरादा बदल दिया। कपिल और कला एक जैसी भावनात्मक स्थिति में थे। दोनों की समरसता भरी कोमल तरंगे ख़ामोशी से एक दूसरे तक पहुँच रही थीं। दोनों की प्यार भरी नज़रे एक दूसरे से मिलती और मीठा-मीठा बहुत कुछ कह जाती। आँखों ने आँखों की भाषा पढ़ी और कपिल ने कला का हाथ अपने हाथ में थाम कर, निशब्द ही न जाने क्या-क्या कह डाला कि भावुक हो आई कला की आँखें झर-झर बरसने लगीं। उसकी सारी पीड़ा, वेदना, असुरक्षा मानो आँखों से बह चली थी। ये आँसू एक ओर दर्द और पीड़ा को मन से बाहर बहा रहे थे, तो दूसरी ओर पति के प्रति सघन प्रेम और आश्वासन को दिल की गहराईयों में समो रहे थे। उसने हौले से कपिल के कंधे पे अपना सिर टिका कर कपिल के साथ फिर से एक हो जाने की अपनी इच्छा की तीव्रता जताई। दोनों हाथ थामे पार्क से बाहर निकलकर घर की ओर चलते गए – पीछे छूटे वैवाहिक जीवन की बागडोर सम्हालने....।

 

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नाम : डॉ. दीप्ति गुप्ता

मातृभाषा : हिन्दी

शिक्षा: आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी) एम.ए. (संस्कृत), पी.एच-डी (हिन्दी) 1978

कार्य अनुभव : एसोसिएट प्रोफैसर

१) हिन्दी विभाग रुहेलखंड विश्वविद्यालय,बरेली, में अध्यापन (१९७८ – १९९६)

२) हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में अध्यापन (१९९६ -१९९८)

३) हिन्दी विभाग, पुणे विश्वविद्यालय में अध्यापन (१९९९ – २००१)

४) विश्वविद्यालयी नौकरी के दौरान, भारत सरकार द्वारा, १९८९ में ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’, नई दिल्ली में ‘ शिक्षा सलाहकार’ पद पर तीन वर्ष के डेप्युटेशन पर नियुक्ति (१९८९- १९९२)

साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन :

गगनांचल, हंस,वागर्थ,साक्षात्कार, नया ज्ञानोदय, कथादेश,लमही, संबोधन, उदभावना, वर्तमान साहित्य, अक्षर-पर्व, नई धारा, प्रेरणा, अनुवाद-पत्रिका, अभिनव इमरोज़, काल-निर्णय,हिन्दी फेमिना, नव्या, विश्वगाथा, कुतुबनुमा, उदंती, उत्तरा, संचेतना, अहिल्या आदि पत्रिकाओं, एवं हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला, पंजाब केसरी, विश्वमानव, सन्मार्ग, जनसंदेश, नई दुनिया, जनसत्ता, जनवाणी, संडेवाणी (मारीशस), आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं, कहानियों, समीक्षाओं एवं सामाजिक सरोकारों के आलेखों का प्रकाशन. Indian Express, Maharashtra Herald, Pune Times, Women’s Era, Alive, (Delhi Press) पत्रिकाओं में अंग्रेज़ी आलेखों एवं कहानियों का प्रकाशन.

नैट की ‘काव्यालय’ (डा. विनोद तिवारी, न्यूयॉर्क)), साहित्य-कुञ्ज(सुमन घई टोरंटो), लेखनी(शैल अग्रवाल, लन्दन), शब्दांकन,कथा-व्यथा (कोलकाता), अनुभूति-अभिव्यक्ति(पूर्णिमा बर्मन), हिंदी नेस्ट, अर्गला, सृजनगाथा, ArticleBase.com, Fanstory.com, Muse.com आदि हिन्दी एवं अंग्रेजी की इ-पत्रिकाओं में विविध रचनाओं का प्रकाशन ! हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार हेतु, नैट पर याहू के दो साहित्यिक समूहों -‘काव्यधारा’ और ‘विचार-विमर्श’ का संस्थापन और संचालन !

उपलब्धियाँ :

१) Fanstory.com – American Literary site पर English Poems ‘’All Time Best’ ’से सम्मानित.

२) ‘शेष प्रसंग’ कहानी संग्रह (2007) की ‘हरिया काका’ तथा ‘पातकनाशनम्’ कहानियाँ पुणे विश्वविद्यालय के क्रमश: 2008 और 2009 से हिन्दी स्नातक पाठ्य क्रम में शामिल

३) ‘अन्तर्यात्रा’ काव्य संग्रह (2005) की ‘निश्छल भाव’ व ‘काला चाँद’ कविताएं भारत के समस्त राज्यों के विभिन्न स्कूलों के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढाई जा रही है ! भारत से बाहर, दुबई, शारजा, आबू धबी, आदि विभिन्न स्थानों में स्थापित मॉडर्न स्कूल की शाखाओँ मे भी 2008 से हिन्दी पाठ्यक्रम का हिस्सा ।

४) The Sunday Indian (नई दिल्ली) पत्रिका द्वारा २०११ में आयोजित भारत और भारत से बाहर बसी हिन्दी की लेखिकाओं के लेखन के ‘आकलन’ के तहत हिन्दी साहित्य में बहुमूल्य योगदान हेतु सर्वोत्तम लेखिका वर्ग में चयनित और सम्मानित !

५) अमृतलाल नागर पर लिखा संस्मरण ‘बूँद-बूँद अमृत’ पाठकों द्वारा इतना सराहा गया कि अमेरिका की ‘अमेज़न लाइब्रेरी’ ने उसे प्रकाशित कर, अपने पुस्तकालय में संग्रहीत किया. !

हिन्दी साहित्य के उत्थान और विकास में छात्र जीवन से अब तक निरंतर योगदान ! आज तक जो भी थोड़ा बहुत सृजन किया है, वह इस प्रकार है -

प्रकाशित कृतियाँ :

1) महाकाल से मानस का हंस – सामाजिक मूल्यों और आदर्शों की एक यात्रा, (शोधपरक - 2000)

2) महाकाल से मानस का हंस – तत्कालीन इतिहास और परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में, (शोधपरक -2001) 3) महाकाल से मानस का हंस – जीवन दर्शन, (शोधपरक 200३)

4) अन्तर्यात्रा ( काव्य संग्रह - 2005),

5) Ocean In The Eyes ( Collection of Poems - 2005)

6) शेष प्रसंग (कहानी संग्रह -2007),

7) समाज और सँस्कृति के चितेरे - अमृतलाल नागर, (शोधपरक - 2007)

8) सरहद से घर तक (कहानी संग्रह, 2011)

9) लेखक के आईने में लेखक - संस्मरण संग्रह शीघ्र ही ‘बोधि प्रकाशन’,जयपुर से प्रकाश्य

10) विभिन्न पत्रिकाओं में प्रख्यात लेखकों की कृतियों पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षाओं

का संकलन, ‘अमन प्रकाशन’, कानपुर से शीघ्र प्रकाश्य.

अंग्रेज़ी-हिन्दी अनुवाद कार्य :

राजभाषा विभाग, हिन्दी संस्थान, शिक्षा निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली, McGrow Hill Publications, New Delhi, ICSSR, New Delhi, अनुवाद संस्थान, नई दिल्ली, CASP Pune, MIT Pune, Multiversity Software Company Pune, Knowledge Corporation Pune, Unicef, Airlines, Schlumberger (Oil based) Company, Pune के लिए अंग्रज़ी-हिन्दी अनुवाद कार्य ! हाल ही मे Multiversity Software Company Pune से प्रकाशित पुस्तक ‘Education Today In India’ का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद. अप्रैल,२०१४ मे चुनाव से पूर्व, दो राजनीतिक पार्टियों द्वारा दिल्ली और मुम्बई से भेजे गए Manifestos का हिन्दी में अनुवाद !

डा. दीप्ति गुप्ता, 2/ ए, आकाशदूत, 12 -ए, नॉर्थ ऐवेन्यू, कल्याणी नगर , पुणे - 411006 , Email: drdepti25@yahoo.co.in

ध्वस्त होनी ही है

झूठ की बुनियाद

dr.deepakaacharya@gmail.com

जीवन की सफलता अपने आप को बड़ा दिखाने या वैभवशाली बनाने में नहीं है बल्कि अपने आप को उस स्थिति में पहुंचाने में हैं जहां हर कोई हृदय से हमें स्वीकार करे, चाहे हमारा उनसे किसी भी प्रकार का संबंध या परिचय हो या न हो।

जिनसे हमारा संपर्क रहा है उन लोगों की बजाय वे लोग ज्यादा नीर-क्षीर विवेक भरा निर्णय रखते हैं जो हमसे किसी न किसी अपेक्षा या उपेक्षा से बंधे या शिकार नहीं हैं।

अपने परिचितों की बजाय एक आम आदमी हमारे जीवन और व्यवहार का फैसला ज्यादा ठीक ढंग से कर सकता है क्योंकि उसे हमसे कोई काम नहीं पड़ता।

बहुसंख्य लोग फैशनी संसार और पूंजीवादियों के अनुरूप अपने आपको ढालने और दिखाने की कोशिश करते हैं और इस चक्कर में उन सभी रास्तों का सहारा लेते हैं जहाँ से पैसों और प्रतिष्ठा की आवक बनी रहती है।

धन-सम्पत्ति, भोग-विलास और उन्मुक्त आनंद की चाह में लोग सारी मर्यादाओं को भुला डालते हैं और उन रास्तों पर चल पड़ते हैं जहाँ से लौटने पर सिवाय पश्चाताप और लुट जाने के अहसास के और कुछ नहीं होता।

और यह वह स्थिति होती है कि जिसमें ज्ञान शून्यता और विवेकहीनता का मलाल हमेशा बना रहता है। भौतिक संपदाओं से परिपूर्ण वैभव और भोग-विलासिता पाने के लिए आजकल लोग क्या कुछ नहीं कर रहे हैं, यह किसी को समझाने की जरूरत नहीं है क्योंकि हमारे आस-पास खूब सारे लोग हैं जिनका उदाहरण के तौर पर बेफिक्र होकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

ये लोग झूठ की प्रतिमूर्ति या झूठ सम्प्रदाय के मठाधीश कहे जा सकते हैं क्योंकि इनके लिए झूठ बोलना न कोई पाप है, न गलत बल्कि झूठ इन लोगों के जीवन व्यवहार का वह अहम हिस्सा है जो दिन ब दिन और अधिक प्रगाढ़ होता हुआ इनकी जिन्दगी में प्रतिष्ठित हो चुका है।

आरंभ में एक गलती या अपराध को छिपाने के लिए आदमी झूठ बोलता है लेकिन बाद में एक सच को छिपाने के लिए हमेशा झूठ का सहारा लेना मजबूरी हो जाता है। अनचाहे भी झूठ का आश्रय ग्रहण करना ही पड़ता है।

जो लोग कुछेक बार झूठ का सहारा ले लिया करते हैं उनके लिए फिर हर बार झूठ का दामन थामना अपरिहार्य जरूरत ही हो जाती है। इन लोगों के लिए सत्य, धर्म और न्याय का कोई वजूद नहीं होता बल्कि अपने काम निकालना और स्वार्थ पूरे करना, अपने भोग-विलास के साधन तलाशना और मौज-मस्ती में रमे रहकर आनंद पाना ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होकर रह जाता है।

अति भोगवादी और भौतिक चकाचौंध में खोकर व अपने आपको डुबो कर आनंद पाने के इच्छुक लोगों के लिए झूठ अपने आपमें वह ब्रह्मास्त्र है जिसका सहारा पाकर वे समय, श्रम और धन आदि किसी पर भी डाका डाल सकते हैं।

झूठ के बूते प्राप्त धन, संसाधन और भोग के आनंद कुछ समय तक उन्मुक्त भोग और मौज-शौक देकर मदमस्त होने का आभास करा सकते हैं लेकिन इनका इससे अधिक कोई भविष्य नहीं होता।

झूठ की नींव पर जिसका जीवन निर्माण होता है वह निर्माण न होकर विध्वंस की भूमिका कही जा सकती है क्योंकि झूठ की बुनियाद पर टिका कोई महल कभी स्थायी नहीं हो सकता है, उसे कभी न कभी तो खण्डहर होना ही है और जब दीवारें गिरने लगती हैं तब  सब कुछ पराया हो जाता है, न भोग-विलास के संसाधन अपने साथ होते हैं न वे व्यक्ति जो हमारा उपयोग करते रहे हैं या हम जिनका उपयोग करते रहे हैं।

झूठ की नींव पर आज तक न कोई टिका है, न टिकने वाला है। बावजूद इसके अंधकार और आसुरी आनंद पाने की तीव्र इच्छाओं के वशीभूत होकर हम सारे के सारे लोग उस दिशा में भाग रहे हैं जिधर किसी न किसी मोड़ पर जाकर भुलभुलैया में भटक कर औंधे मुँह गिरना ही है या फिर पत्थरों से टकरा कर अपनी कपाल रेखाओं को मिटाना ही।

झूठ का जब पर्दाफाश होता है तब अच्छे-अच्छे मजबूत संबंधों की नींव डगमगा जाती है, दिल के दरवाजे खुल जाते हैं ओर तब जो सच सामने आता है वह हमें भी लज्जित कर देने वाला होता है और जमाने भर को भी। झूठ के सहारे कुछ वर्ष जीने का आनंद पा सकते हैं लेकिन कलई खुल जाने के बाद सब कुछ कई गुना विपरीत होने लगता है और जितना आनंद झूठ बोल बोलकर प्राप्त किया होता है। 

जीवन में अंतिम क्षण तक आनंद में रहना चाहें तो झूठ का परित्याग करें। जिन लोगों ने झूठ की बादत ही डाल ली है वे भी प्रायश्चित कर लें और आगे से झूठ और झूठे कर्मों का परित्याग कर दें तो उनका भी समय ताजिन्दगी सुनहरा बना रह सकता है वरना झूठ के सहारे जीने वाले सभी लोगों के रास्ते अंधेरी गलियों और भटकाव की मंजिल तक ही पहुंचते हैं।

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आदिवासियों के अनूठे त्योहार बनाम जंगल में मंगल

मनुष्य के धर्म की तरह ही इस विराट रचना का भी एक धर्म है, और वह है प्रकृति के साथ तालमेल रखने का काम. सच माने में धर्म तो वही है जो प्रकृति के अनुकूल हो और पाप वही है जो प्रकृति के विरूद्ध हो. नियम सिर्फ़ मनुष्य भर के लिए नहीं, वरन पूरे ब्रहमाण्ड के लिए भी यही नियम लागू होता है. सृष्टि के पांचों चक्र इन्हीं सनातन धर्म (नियम ) का पालन करते हैं. न तो धरती अपनी धूरी से हटती है और न ही चन्द्रमा अपनी शीतलता बिखेरने में पीछॆ हटता है और न ही सूरज अपनी ऊष्मा का दान करने में कंजूसी करता है. ऋतु चक्र भी अपनी सनातन गति पर चलता है, बीज में वृक्ष और वृक्ष में बीज समाये रहता है. वेदों में इसकी व्याख्या है इसलिए वैदिक धर्म भी यही है.

प्रकृति के माध्यम से जीवन की मंगलकामना करना वेदों की विशेषता रही है. यह कामना है शुद्धि की, पवित्रता की और पर्यावरण के संरक्षण की. जल शुद्ध बना रहे, अन्न-जल विषाक्त न हो, हिरण्य़गर्भा धरती धन की खान और कृषि कर्म की सम्पादिनी बनी रहे, पशु-धन की विपुलता रहे, संताने सुन्दर-स्वस्थ और दीर्घजीवी बनी रहे. प्रकृति का यह नाद जीवन के संगीत में समाया हुआ है. कुदरत का जीवन से हटने का मतलब है फ़ेफ़डॊं से प्राणवायु का निकल जाना, इसे हम जितनी जल्दी समझ जाएं, उतना ही अच्छा है.

भारत विभिन्न जातियों और उप-जातियों का एक अजायबघर है, जिसमें लगभग 3,000 जातियां निवास करती है. इनका रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज और परम्पराएं की अपनी-अपनी विशेषताएँ है. भारत की प्राचीनतम जाति को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने “आदिवासी नाम से संबोधित किया था. यह नाम उन जातियों को प्रदान किया जो अनादि काल से वनों में निवास कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति वनों से किया करती थी. इनकी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और कुटुम्ब व्यवस्था की अपनी एक विशिष्ठ पहचान रही है. इन लोगों में वन-संरक्षण करने की प्रबल वृत्ति रही है. ये वन्य जीवों व वन से उतना ही प्राप्त करते रहे हैं, जिससे उनका जीवन सुलभता से चल सके. और आने वाली पीढी को वन-स्थल धरोहर के रूप में सौंप सकें. वन-संवर्धन, वन्य-जीवो, एवं पालतू पशुओं का संरक्षण करने की प्रवृति परम्परागत रही है. इसी कौशल और दक्षता और प्रखरता के साथ इन्होने पहाडॊं, घाटियों एवं प्राकृतिक वातावरण को सन्तुलित बनाए रखा. जब तक आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक वातावरण में सेंध नहीं लगी थी तब तक हमारी आरण्य-संस्कृति बची रही. आधुनिक भौतिकतावादी समाज की जब इन क्षेत्रों में प्रविष्टि हुई तब वहाँ की परम्परागत सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास होने लगा और उनके खुली हवा में विचरण करते हुए आमोद-प्रमोद का आनन्द समाप्त सा होता चला गया. यह भी एक अजीब संयोग है कि देखते ही देखते धरती-पुत्र अपनी ही धरती से विलग कर दिया गया. शायद उन्होंने इस बात की कल्पना तक नहीं की थी कि पीढी-दर –पीढी जिन वनों में वे रह रहे थे, अधिकारों से ही वंचित कर दिए जाएंगे. इन सब के बावजूद वे अपना रोना लेकर किसी के पास नहीं जाते और न ही अपना दुखडा किसी और को सुनाते हैं. जो कुछ भी है, जैसा भी है, बस उसी में संतुष्ट रहते हुए वे अब भी अपनी परम्पराओं को जीवित रखते हुए आमोद-प्रमोद में निमग्न रहते हैं,.

शहरी सभ्यता से कोसों दूर, गहन जंगलों के अन्धेरे कोनों में, पर्वतों की गगनचुम्बी चोटियों पर, पाताल को छूती गहरी पथरीली खाइयों में, दिन में अनमने से ऊंघते और रात में खौंफ़नाक/ हिंसक हो उठते जंगल में रात बिताते आदिवासीजनों की एक अनोखी दुनिया है. एक ऎसी दुनिया जो आधुनिक संसार की सांस्कृतिक जगमगाहट से कोसों दूर—बेखबर--,अनजान है.

आदिवासियों के मेले तथा त्योहारों का अपना आनन्द है. ये मेले उनके कठोर जीवन में रस का संचार करते हैं. उनके लिए यही तो एक मात्र ऎसा आकर्षण है, जिसे आदिवासी वर्ष भर अपने हृदय में संजोए रखता हैं. त्योहार के आते ही उनके पैरों में थिरकनों का संचार होने लगता है. बात-बात में उनके होंठॊं पर गीत मुखरित होने लगते हैं. माहौल मदमस्त होने लगता है. वे एक जगह इकठ्ठा होने लगते हैं. स्त्री हो या फ़िर पुरुष एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, मुस्कुराते, घेरा बना कर नाच उठते हैं. ढोल, टिमकी, मांदल की गूंज पर समूचा वातायण झूम उठता है. प्रकृति भी भला कहाँ पीछे रहती है. वह इनका भरपूर साथ देती है. पकते हुए महुए की मादक गंध, मंजरियों से झरता पराग, उसकी भीनी-भीनी खुशबू, लाल-लाल दगदगाता खिलता सेमल का फ़ूल, उस पर नकचढा टेसू इनकी नृत्य नाटिका के लिए एक अनोखा रंगमंच तैयार करते हैं. सल्फ़ी कहें या महुए की शराब, हलक से नीचे उतरते ही उन्हें एक अनोखे संसार में ले जाती है. यह वही महुआ है जिसके आसरे आदिवासीजन जंगल में ठहर पाने का जज्बा बनाए रखता हैं.

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गोंडॊं का त्योहार मेघनाथ

फ़ाल्गुन मास के प्रारम्भ होते ही अलग-अलग स्थानों में, अलग-अलग तिथियों को “मेघनाथ पर्व” मनाया जाता है, जिसमें विभिन्न गाँवों के लोग उसमे सम्मिलित हो सकें. गोंडॊं द्वारा मेघनाथ कॊ अपना सबसे बडा देवता माना जाता है. इस पर्व के लिए खुले मैदान में चार खम्बे गाडॆ जाते हैं. इनके बीचोंबीच सबसे ऊँचा खम्बा गाडा जाता है और उसके ऊपर एक खाम्बा इस तरह बाँधा जाता है कि वह चारों ओर घूम सके. चारों खम्बों में से दोके बीच लकडियाँ बाँधकर सीढियाँ बना दी जाती है. इसे मुर्गी के पंखों, रंगीन कपडॊं के टुकडॊं आदि से सजाया जाता है. इस अवसर पर खण्डारा देव का आव्हान किया जाता है और उनकी पूजा की जाती है. जब इन लोगों पर कोई विपत्ति आती है या ये बीमार होते हैं तो खण्डारा देव की मान्यता करते हैं. यदि कोई भारी मुसिबत में होता है तो मेघनाथ के चक्कर लगाने का व्रत करते हैं. इसमें मान्यता मानने वाले व्यक्ति को मेघनाथ के ऊपर बँधी लकडी पर पीठ के सहारे बाँध दिया जाता है. ऊपर खडा एक व्यक्ति घूमने वाले खम्बे को सँभालता है और ऊपर बँधे हुए आदमी को जोर-जोर से घुमाता है. इस अवसर पर खूब ढोल-मंजीरे बजते हैं और गीत गाए जाते है. मध्यप्रदेश के अलावा छत्तीसगढ में इस पर्व को बडी धूमधाम से मनाया जाता है.

भीलों का त्योहार

राजस्थान के भील-आदिवासियों के अधिकांश रीति-रिवाज, उत्सव एवं त्योहार बडॆ ही रोचक और विचित्र होते हैं. ये लोग त्योहारों और उत्सवों के दिन को शगुन मानकर अपने जीविकोपार्जन के लिए धन्धा प्रारम्भ करते हैं. अन्य हिन्दुओं की भाँति ये गणगौर, रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली एवं होली आदि त्योहार मनाते हैं, लेकिन इनके मनाने का ढंग निराला-अनूठा होता है.

आव्लयाँ ग्यारस

फ़ाल्गुन शुक्ल एकादशी को भील समाज “आवल्याँ ग्यारस” त्योहार के रूप में मनाते हैं. सल्फ़ी की मस्ती में मदमस्त होकर ये आँवलें के पीले फ़ूल अपने पगडियों में तुर्रे के रूप में लगाकर, जंगली फ़ूलों की मालाएँ पहनकर तथा मण्डलियाँ बनाकर नृत्य और गान करते हुए ये लोग आस-पास के गाँवों में मेले के रूप में एकत्र होते हैं. इस दिन को शुभ दिन मानकर ये जंगलों से लकडियाँ काटकर बेचने का धन्धा प्रारम्भ करते हैं.

होली पर्व

होली के पर्व को ये बडॆ विचित्र ढंग से मनाते हैं. भील महिलाएँ नाचती-गाती आगन्तुकों का रास्ता रोक लेती हैं और जब तक इन आगन्तुकों से इन्हें नारियल या गुड नहीं मिल जाता, ये रास्ते से नहीं हटतीं. होलिकादहन के पश्चात हाथ में छडियाँ लिए रंग-बिरंगी पोशाकें पहने ये लोग “गैर”(एक प्रकार का नृत्य) खेलना प्रारम्भ कर देते हैं. छडियों और ढोल-ढमाकों, मांदल और थाली की लय के साथ पाँवों में घुँघरुओं की ध्वनि का तालमेल आकाश को एक अनोखी एवं मधुर ध्वनि से ध्वनित कर देता है. इस नृत्य में महिलाएं भाग नहीं लेतीं. होली के तीसरे दिन “नेजा” नामक नृत्य बडॆ ही कलात्मक एवं अनूठे ढंग से किया जाता है. एक खम्बे पर नारियल लटकाकर आदिवासी महिलाएँ उसके चारों ओर हाथ में छडियाँ तथा बटदार कोडॆ लिए नृत्य करती हैं और जैसे ही पुरुष नाचते-कूदते उस नारियल को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, महिलाएँ उन्हें छडियों एवं कोडॊं से मारती हुई भगा देती हैं. इस नृत्य में ब्रज-मण्डल की होली की झलक कुछ अंश तक दिखलायी पडती है.

चैत्रमास में गणगौर का मुख्य त्योहार अन्य लोगों की भाँति ही आदिवासी भी मनाते हैं, लेकिन आबू एवं सिरोही के पहाडॊं और जंगलों के बीच रह रहे आदिवासी गिरासिये नृत्य और गान करते हुए गणगौर की काष्ट प्रतिमा को लेकर आस-पास के गाँवों में घूमते हैं. सावन-भादों के महिने में ये भील लोग अपने घरों को छॊडकर गाँवों से बाहर चले जाते हैं और जगह-जगह नृत्य करते हुए अपने इष्टदेव की पूजा करते हैं. इस तरह गौरीनृत्य का शुभारम्भ होता है. यह नृत्य :श्रीशिवजी” के जीवन पर आधारित होता है. भैरव के प्रति धार्मिक कर्त्तव्य सम्पन्न करने के लिए इस नृत्य में सैंकडॊं आदिवासी भाग लेते हैं.

कार्तिक मास में दीपपर्व को ये अत्यन्त उल्लास और उमंग से मनाते हैं. पशु-धन को लक्ष्मी मानकर उनके ललाट पर कुंकुम से तिलक कर आरती उतारते हैं. इस उत्सव का प्रारम्भ ये “खेतरपाल”(खेत के प्रहरी देवता) की पूजा से करते हैं. खेत के किनारे विराजे खेतरपाल देवता पर सिंदूर चढाकर, नींबू काटकर एवं नारियल फ़ोडकर रात्रि को दीप जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं..दीपावली के दिन किसी विशिष्ठ स्मारक की पूजा करते हैं. किसी सत-चरित्र एवं लोकप्रिय आदिवासी की असामयिक मृत्यु होने पर उसका प्रस्तर-स्मारक बनाकार पूजा करते हैं, जिसे “गाता-पूजा” कहते हैं. इसी दिन ये स्नेह-मिलन का भीआयोजन करते हैं, जिसे “मेर-मेरिया” कहा जाता है.

डूंगरपुर जिले की असपुर तहसील के नवातपुरा ग्राम से करीब देढ किमी. दूर माही एवं सोम नदी के बीच स्थित “बाणेश्वर महादेव” का मन्दिर अवस्थित है. यहाँ पर माघ शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चलने वाले मेले में बडी संख्या में आदिवासियों का यहाँ जमावडा होता है. महिलाएं बडी सुरीली आवाज में गीत गाती हुई दूर-दूर से पदयात्रा करती हुई मेले में भाग लेती हैं. पुरुष अपने पुरखों की अस्थियाँ इसी अवसर पर माही नदी के जल में प्रवाहित करते हैं.

बिहार, मध्यप्रदेश तथा उडीसा के सुदूर जंगलों में संथाल आदिवासी की अपनी एक अजीबोगरीब दुनिया है. इनका लोकप्रिय ग्योहार “सोहाराय” है. यह त्योहार प्रायः जनवरी माह में पाँच दिन तक चलता है. घरों की सफ़ाई के बाद सभी ग्रामीण एक जगह इकठ्ठे होते हैं और जहेर तथा गोधन का आव्हान करते हैं. गौठानों के विभिन्न स्थानों में अण्डॆ रखे जाते हैं. चरवाहों का विश्वास है कि यदि उनकी गाय अण्डॆ कॊ सूँघ ले या उस पर उसका पाँव पड जाय तो यह अत्यधिक भाग्य का सूचक है. इसके पश्चात गायों के पैर धुलाने का भी रिवाज है.

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दूसरे दिन दोपहर के वक्त सरभोज का कार्यक्रम होता है. इसमें गाँव की कुँवारी बालिकाएँ सज-धाज के मुखिया के घर जाती हैं वे वहाँ नाचती-गाती और गोपूजन करती हैं. वे पशुओं के सींगॊं में सिन्दूर और तेल लगाती हैं..इस दिन गाँव की सभी बहुएँ अपने मायके चली जाती हैं.

जुलाई माह में मनाए जाने वाले त्योहार “हरियर सिम” और अगस्त में “दूरी शुण्डली ननवानी” त्योहार दरअसल में दोनों ही त्योहार फ़सलों का त्योहार है. फ़सल के फ़ूलते-फ़लते तथा उसे काटते समय आदिवासी संथाल का प्रसन्न होना स्वाभाविक है.

सितम्बर और अक्टूबर में “करम परव” पर्व मनाया जाता है. गाँव के लोग रात में करम पेड की डाली काटकर लाते हैं और गाँव की गली में गाडकर उसके चारों ओर नाचते-गाते हैं. हिन्दुओं की मकर-संक्रान्ति के दिन मनाए जाने वाले त्योहार की तरह ही “मोकोर त्योहार” मकर संक्रान्ति के दिन मनाया जाता है. इस दिन संथाल अपने पूर्वजों के नाम चूडा मौर शक्कर चढाते हैं. जनवरी के अन्त और फ़रवरी के शुरु में “माघा सीम” त्योहार मनाया जाता है. इस पर्व से संथालों का नया वर्ष आरम्भ होता है.

फ़रवरी के अन्त में मनाया जाने वाला त्योहार “वाहा या वसन्त” है. संथाल इसे अपना वसन्तोत्सव मानते हैं. ये लोग वसन्त के नये फ़ूल एवं पत्तों का उपयोग वाहा मनाने के बाद ही करते हैं. इस त्योहार को बडॆ बडॆ पवित्र ढंग से मनाया जाता है. देवी-देवताओं को धूप, दीप, सिन्दूर एवं घास के अतिरिक्त हँडिया, महुए तथा सरकुए के फ़ूलों की भेंट चढाई जाती है. जहेर स्थान पर खिचडी पकायी जाती है, जो प्रसाद की तरह वितरित की जाती है. इस अवसर पर जल उछालकर हृदय की हिलोरें प्रकट की जाती है. सारे वैरभाव छॊडकर ये आपस में गले मिलते है, गाते बजाते हैं, नृत्य करते हैं.

“सरहुल” जिसे फ़ूलों का पर्व भी कहते हैं, वसन्तोत्सव की तरह मनाया जाता है

मुण्डा आदिवासी चैत्र मास में “वा” पर्व मनाते हैं. “ वा” का अर्थ फ़ूल होता है. इस अवसर पर वे वनदेवी को प्रसन्न करने के लिए सिन्दूर, फ़ूल, जल, अक्षत आदि चढाते हैं. उराँवों में यह पर्व चैत्र शुक्ल की पंचमी को मनाते हैं. इस अवसर पर विवाहिता लडकियाँ भी अपने मायके से बुला ली जाती हैं. इनकी मान्यता है कि खेती सर्वप्रथम इसी पर्व को मनाकर शुरु की गयी थी. आज भी ये लोग उस पर्व को मनाये बिना अपने खेतों में खाद तक नहीं डालते. सूरज और धरती की खुशहाली भी इस त्योहार का प्रतीक है.

मध्यप्रदेश और बिहार में निवास कर रही उराँव जाति में “करम” पर्व का विशेष महत्व है. इस अवसर पर गाए जाने वाले गीत को “करमा” कहा जाता है. करम वृक्ष को लेकर यहाँ एक लोककथा प्रचलित है. इस कथा के अनुसार करमा और धरमा दो भाई थे. एक बार व्यापार आदि के लिए करमा गाँव छॊडकर बाहर गया. एक निर्धारित समय बाद तक जब वह नहीं लौटा तो उसके भाई धरमा ने करमवृक्ष की डाल काट कर आँगन में गाड दी. उसने उस डाक की पूजा की और अपने भाई के समान ही आदर दिया. किंतु जब करमा लौटकर आया तो उसने उस डाल को झाड-झंखाड समझकर कूडॆ में फ़ेंक दिया. इस कारण दोनो भाइयों को भारी कष्ट उठाना पडा, क्योंकि यह करमवृक्ष का अपमान था. कष्टॊं से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने फ़िर से उस डाल को उठाया, आँगन में गाडकर उसकी पूजा की. पूजा करने से उनका खोया सुख पुनः प्राप्त हो गया. आज भी उराँव जाति के लोग “करमवृक्ष” की देवता के समान पूजा-अर्चना करते हैं.

मध्यप्रदेश के मण्डला जिले की बैगा जाति द्वारा शहद पीने का त्योहार मनाया जाता है. यह त्योहार नौ वर्षों में एक बार आता है और इसे वे अपने पूर्वज “नंगा बैगा” के नाम पर मनाते हैं.

बोडॊ आदिवासी बडॆ बिहड इलाके में रहते हैं. वे इतने उग्र, भयंकर तथा प्रचण्ड होते हैं कि उनके पर्वों पर बाहरी व्यक्ति का गाँव के भीतर प्रवेश वर्जित रहता है. वे गाँव की सीमा पर कंटिली झाडियाँ लगाकर लोगों का रास्ता बंद कर देते हैं. उनका अपना मानना है कि गाँव के भीतर आने पर दूसरे गाँव का दैवी संक्रमण हो जाता है और बाहर जाने पर गाँव की उर्वरा शक्ति दूसरे गाँव की भूमि में चली जाती है.

“जियाग-जिगे” आम की फ़सल का पर्व है. पूजा-समारोह में शाखाएँ तथा पत्ते जलाए जाते हैं. जौनसार-बाबर (उत्तरप्रदेश) इलाके में माघमास में जगह-जगह मेले आदि लगते हैं. इस दिन आदिवासी रंग-बिरंगी पोशाकें पहनते हैं. इन्हें देखकर ऎसा लगता है मानो रंग-बिरंगे पुष्प किसी गुलदस्ते में लाकर सजा दिये गये हों. इसी तरह जौनपुर में माघ का त्योहर “खाँई” मनाया जाता है. यहाँ वैशाख तथा आषाढ में पृथक-पृथक पर्व मनाये जाते हैं. “दखन्यौड पर्व” में पशु-पूजा की जाती है. भाद्रपद में जन्माष्टमी, माघ में माघी, और फ़ाल्गुन में शिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है. “दुर्योधन की जूतेमार” पूजा भी इसी इलाके में होती है. मध्यप्रदेश के कूरकू आदिवासी कार्तिक मास में पडने वाली दीपावली बडॆ हर्षोल्लास से मनाते हैं. वे “बाल्दया”( पशुगृह) की सफ़ाई आदि करते हैं तथा पशुओं को लोहे के गर्म औजार से दागते हैं. उनका मानना है कि दागे जाने के बाद पशु बीमार नहीं पडते.

शहरों की चकाचौंध और शहरी सभ्यता से कोसों दूर निवास कर रहे इन आदिवासियों को यदि ऋषियों की संज्ञा से विभूषित किया जाए तो शायद यह अतिश्योक्ति नहीं होगी. ये कभी भी अपना इलाका छॊडकर शहरी वातावरण में न तो प्रवेश करने की चाह रखते हैं और न ही कभी हानि पहुँचाने के चेष्टा करते हैं. घोर अभाव के बावजूद ये प्रसन्न रहते हैं. ये अपना रोना-धोना लेकर किसी के पास नहीं जाते. और वे यह भी नहीं चाहते कि कोई उनकी अमन-चैन की जिन्दगी में जहर घोले. अपना जीवन यापन करने के लिए ये पूरी तरह से जंगलों पर निर्भर रहते हैं और आवश्यक्ता के अनुसार ही प्रकृति का दोहन करते हैं.

आज स्थिति एकदम विपरीत है. नए-नए कानून बनने से इनको अनेक कठिनाइयों के बीच से होकर गुजरना पड रहा है. जंगल का राजकुमार कहलाने वाला आदिवासी आज चोरों की श्रेणी में गिना जाने लगा है. जंगलों की निर्बाध कटाई का सारा दोष इन गरीब आदिवासी के सिर बांध दिया जाता है,जबकि ये प्रकृति के सच्चे आराधक रहे हैं. जंगलों के उजड जाने की कल्पना मात्र से सिहर उठते हैं. आज इन्हीं को जंगल से निष्कासित किया जा रहा है. इन वनवासियों का मालिकाना हक केन्द्रीय एवं राज्य शासन के पास चला जाएगा तो क्या ये आदिवासी बेघर नहीं हो जाएंगे ?. किसी सजग पहरेदार की तरह दिन और रात जंगलों की रक्षा करने वाले इन भोले भाले आदिवासियों के जंगल में न रहने से पारिस्थितिक सन्तुलन रखने वाले घटक लुप्त नहीं हो जाएंगे ? क्या हिंसक जीव-जंतु जीवित रह पाएंगे? विकास के नाम पर बंधने वाले बडॆ-बडॆ बांधों से क्या वहाँ की भूमि दलदली नहीं होगी? क्या वहाँ की भूमि की उर्वरा शक्ति कम नहीं होगी?. क्या हम आने वाली पीढी को आदिवासियों के विस्थापन की समस्या एवं वन सम्पदा का पूर्ण विनाश देने जा रहे है?. संस्कृति एवं पर्यावरण को नष्ट कर आर्थिक लाभ की कल्पना, निश्चित रूप से कालान्तर में अवश्यमेव विनाशकारी सिद्ध होगी.

हमारा संविधान वचनबद्ध है कि आदिवासी परम्परागत विशिष्ट पहचान को बनाए रखते हुए ही राष्ट्र की विकास धारा में इच्छानुसार जुड सकते हैं. अतः हमें त्वरित गति से ऎसे निर्णय लेने होंगे जिससे उनकी प्राकृतिक संस्कृति पर कोई असर न पडॆ. वे अमन-चैन से रह सकें और इसी तरह उत्सव मनाते रहे.

 

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१

सामुदायिक बहुलता का पर्व है होली


प्रमोद भार्गव
    होली शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा त्यौहार है,जो सामुदायिक बहुलता की समरसता से जुड़ा है। इस पर्व में मेल-मिलाप का जो आत्मीय भाव अंतर्मन से उमड़ता है,वह सांप्रदायिक अतिवाद और जातीय जड़ता को भी घ्वस्त करता है। फलस्वरूप किसी भी जाति का व्यक्ति उच्च जाति के व्यक्ति के चेहरे पर पर गुलाल मल सकता है और आर्थिक रूप से विपन्न व्यक्ति भी धनकुबेर के भाल पर गुलाल का टीका लगा सकता है। यही एक ऐसा पर्व है,जब दफ्तर का चपरासी भी उच्चाधिकारी के सिर पर रंग उड़ेलने का अधिकार अनायास पा लेता है। वाकई रंग छिड़कने का यह होली पर्व उन तमाम जाति व वर्गीय वर्जनाओं को तोड़ता है,जो मानव समुदायों के बीच असमानता बढ़ाती है। गोया,इस त्यौहार की उपादेयता को और व्यापक बनाने की जरूरत है


    होली का पर्व हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के दहन की घटना से जुड़ा है। ऐसा लोक-प्रचलन में है कि होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। अलबत्ता उसके पास ऐसी कोई वैज्ञानिक तकनीक थी,जिसे प्रयोग में लाकर वह अग्नि में प्रवेश करने के बावजूद नहीं जलती थी। चूंकि होली को बुराई पर अच्छाई के पर्व के रूप में माना जाता है,इसलिए जब वह अपने भतीजे प्रहलाद को विकृत व क्रूर मानसिकता के चलते गोद में लेकर प्रज्वलित आग में प्रविष्ट हुई तो खुद तो जलकर खाक हो गई,किंतु प्रहलाद बच गए। उसे मिला वरदान सार्थक सिद्ध नहीं हुआ,क्योंकि वह असत्य और अनाचार की आसुरी शक्ति में बदल गई थी।


    ऐतिहासिक व पौराणिक साक्ष्यों से पता चलता है कि होली की इस गाथा के उत्सर्जन के स्रोत पाकिस्तान के मुल्तान से जुड़े हैं। यानी आविभाजित भारत से। अभी भी यहां भक्त प्रहलाद से जुड़े मंदिर के भग्नावशेष मौजूद हैं। वह खंबा भी मौजूद है,जिससे प्रहलाद को बांधा गया था। भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में हिंदू धर्म से जुड़े मंदिरों को नेस्तनाबूद करने का जो सिलसिला चला,उसके थपेड़ों से यह मंदिर भी लगभग नष्टप्रायः हो गया,लेकिन चंद अवशेष अब भी मुलतान में मौजूद हैं और यहां भी अल्पसंख्यक हिंदू होली के उत्सव को मानते हैं। वसंत पंचमी भी यह वासंती वास्त्रों में सुसज्जित महिलाएं मनाती हैं और हिंदु पुरूष पतंगें उड़ाकर अपनी खुशी प्रगट करते हैं। जाहिर है,यह पर्व पाकिस्तान जैसे आतिवादियों के देश में सांप्रदायिक सद्भाव के वातावरण का निर्माण करता है। गोया,होली व्यक्ति की मनोवृत्ति को लचीली बनाने का काम करती है।


    वैदिक युग में होली को 'नवान्नेष्टि यज्ञ' कहा गया है। क्योंकि यह वह समय होता है,जब खेतों से पका अनाज काटकर घरों में लाया जाता है। जलती होली में जौ और गेहूं की बालियां तथा चने के बूटे भूनकर प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। होली में भी बालियां होम की जाती हैं। यह लोक-विधान अन्न परिपक्व और आहार के योग्य हो जाने का प्रमाण है। इसलिए वेदों में इसे 'नवान्नेष्टि यज्ञ'कहा गया है। मसलन अनाज के नए आस्वाद का आगमन। यह नवोन्मेष खेती-किसानी की संपन्नता का घोतक है। जो ग्रामीण परिवेश में अभी भी विद्यमान है। गोया यह उत्सवधर्मिता आहार और पोषण का भी प्रतिक है,जो धरती और अन्न के सनातन मूल्यों को एकमेव करता है।


    होली का सांस्कृतिक महत्व 'मधु' अर्थात 'मदन' से भी जुड़ा है। संस्कृत और हिंदी साहित्य में इस मदनोत्सव को वसंत ॠतु का प्रेमाख्यान माना गया है। वसंत यानी शीत और ग्रीष्म ॠतुओं की संधि-वेला। अर्थात एक ॠतु का प्रस्थान और दूसरी ॠतु का आगमन। यह वेला एक ऐसे प्राकृतिक परिवेश को रचती है,जो मधुमय होता है,रसमय होता है। मधु का ॠगवेद में खूब उल्लेख है। क्योंकि इसका अर्थ है,संचय से जुटाई गई मिठास। मधु मक्खियां अनेक प्रकार के पुष्पों से मधु जुटाकर एक स्थान पर संग्रह करने का काम करती हैं। जीवन का मधु संचय का यही संधर्ष जीवन को मधुमयी बनाने का काम करता है।

होली को 'मदनोत्सव' भी कहा गया है। क्योंकि इस रात चंद्र्रमा अपने पूर्ण आकार में होता है। इसी शीतल आलोक में भारतीय स्त्रियां अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना करती हैं। लिंग पुरण में होली को 'फाल्गुनिका'की संज्ञा देकर इसे बाल-क्रीड़ा से जोड़ा गया है। मनु का जन्म फाल्गुनी को हुआ था,इसलिए इसे 'मन्वादि तिथि'भी कहते हैं। भविष्य पुराण में भूपतियों से आवाह्न किया गया है कि वे इस दिन अपनी प्रजा को भय मुक्त रहने की घोषणा करें। क्योंकि यह ऐसा अनूठा दिन है,जिस दिन लोग अपनी पूरे एक साल की कठिनाइयों को प्रतीकात्मक रूप से होली में फूंक देते हैं। इन कष्टों को भस्मीभूत करके उन्हें जो शांति मिलती है,उस शांति को पूरे साल अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ही भाविष्य पुराण में राजाओं से प्रजा को अभयदान देने की बात कही गई है। भारतीय कुटुंब की भावना इस दर्शन में अंतर्निहित है। अर्थात होली के सांस्कृतिक महत्व का दर्शन नैतिक,धार्मिक और सामाजिक आदर्शों को मिलाकर एकरूपता गढ़ने का काम करता है। तय है,होली के पर्व की विलक्षण्ता में कृषि,समाज,अर्थ और सद्भाव के आयाम एकरूप हैं। इसलिए यही एक ऐसा अद्वितीय पर्व है,जो सृजन के बहुआयामों से जुड़ा होने के साथ-साथ सामुदायिक बहुलता के आयाम से भी जुड़ा है।


प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.

   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

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पिछड़ापन

बच्चा स्कूल से आकर हर दिन अपने पिता से कहता कि उसके मास्टर जी उसे हर रोज़ सिर्फ इसलिए डांटते हैं कि घर में कोई भी उसकी पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता .इस वजह से वह अपने मास्टर जी द्वारा दिया गया होम वर्क पूरा नहीं कर पाता . पिता को यह बात अच्छी नहीं लगती थी और कभी - कभी आत्म ग्लानि भी होती कि वह अपने बच्चे को , अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण समय नहीं दे पाता . पर जब बच्चा पढ़ाई में लगातार पिछड़ता चला गया तो पिता को लगा कि अब पानी सर से ऊपर निकल रहा है . उसने तय किया कि अब कुछ भी हो वह कैसे भी करके कुछ न कुछ समय अपने बेटे की पढ़ाई के लिए जरूर निकालेगा . उसने ऐसा करने से पहले एक बार स्कूल जाकर मास्टर जी से मिलना ठीक समझा . वह दूकान मालिक से आधी छुट्टी लेकर स्कूल जा धमका .

चपरासी से अपने बच्चे की कक्षा का पता पूछकर वह उस कमरे तक जा पहुंचा जहां उसका बेटा बैठता था . कक्षा का दृश्य उसकी कल्पना से बिलकुल अलग था . वहाँ तीस - पैंतीस की उम्र के एक सज्जन बच्चों के सामने वाली कुर्सी पर बैठ कर अपने मोबाइल में किसी खेल का अभ्यास बड़ी तन्मयता से कर रहे थे और बच्चे अपनी बाल - सुलभ कारस्तानियों में मस्त होकर छुट्टी के इन्तजार में मशगूल थे .

वह कक्ष के गेट से ही वापस आ गया और वापसी में इस उधेड़ बुन से बाहर निकलने के रास्ते ढूंढ़ता रहा कि मेरे बच्चे की पढ़ाई में पिछड़ने का कारण क्या सचमुच वह स्वयं ही है . दूकान पर वापस पहुंचा तो टी. वी. पर चल रहे समाचारों में घोषणा हो रही थी कि अबसे उसके शहर में गरीब लोगों को बिजली आधे दामों में मिलेगी और पानी मुफ्त मिलेगा .

 

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किताब

जब भी पुस्तक मेला लगता है तब सब बुद्धिजीवी लोग पुस्तक मेले में जरूर जातें हैं और पुस्तक मेले से वापस आकर सब बुद्धिजीविओं को बताते भी हैं . वो कई साल से इस दर्द को झेल रहा था कि वह कभी पुस्तक मेले में नहीं गया जबकि पुस्तके तो वह भी पढ़ता है . इस बार जब पुस्तक मेला लगा तो वह उसकी रौनक देखने से स्वयं को रोक नहीं पाया और तैयार होकर मेले के पंडाल के बाहर जाकर खड़ा हो गया .वहां आज के जमाने का संत्री खड़ा था उसने संत्री से बड़े सभ्य अंदाज में बड़ी आत्मीयता से कहा , " भइया हमको भी किताबों का यह मेला देखना है , हमें अंदर जाने दो ." संत्री ने उपेक्षा भरी उड़ती सी नजर उस पर डाली और बोला . " जाकर उस खिड़की से बीस रूपये की टिकट ले आओ और चले जाओ अंदर , कोई मना थोड़े ही कर रहा है ."

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कैसा जमाना आ गया है कि किताबें देखने के लिए भी टिकट , पर जब आया है तो किताबों का यह मेला तो देख कर ही जाएगा . उसने टिकट लिया और पंडाल के अंदर प्रवेश कर गया . अंदर जाकर उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गयीं . मेला क्या था , वो तो किताबों का समुंदर था . वह बहुत देर तक वहां एक स्टाल से दुसरे स्टाल तक घूमता रहा . किताबों को देखता , छूता , किसी - किसी को खोलता भी . फिर कीमत देखता और रख देता . पर आखिर कब तक खुद को रोकता . उसकी नजर एक किताब पर टिकी , तो टिकी की टिकी ही रह गयी . प्रेम - कहानी पर आधारित उस उपन्यास को खरीदने के लिए उसने खुद को राजी कर लिया . " सर ! इस उपन्यास के लिए क्या मूल्य दूँ ."

" जी केवल सौ रूपये ." उसने जेब में हाथ डाला परन्तु दूसरे ही क्षण उसका हाथ वहीं रूक गया . दिमाग में विचारों का सिलसिला चल पड़ा , " यार ! पचहत्तर पन्ने की किताब के लिए सौ का पूरा नोट , हट ऐसे थोड़े ही होता है ." फिर वह वहां नहीं रुका और उसने सीधे घर का रुख कर लिया .

जाने और आने में शाम हो ही गयी थी . वह थक भी गया था . पत्नी से बोला ," एक कप चाय दे दो ." पत्नी ने चाय दे दी . चाय पी चुकने के बाद थोड़ी देर के लिए बेड पर कमर सीधी करता रहा और साथ - साथ टी. वी.पर खबरें भी देखता रहा . " राधा यार , इधर आओ आज खाना मत बनाना , चल कर ढाबे में भटूरे खायेगें . उसकी जेब में पड़ा सौ का नोट उसके दिमाग में कुलबुला रहा था .

 

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( सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा ) ( 15/07/2014)

डी - 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन साहिबाबाद  - 201005 ( ऊ . प्र . )

मो. न.09911127277 (arorask1951@yahoo.com)

होलीःराक्षसी शक्तियों के दहन का पर्व


प्रमोद भार्गव
    होली एक प्राचीन त्योहार है। पौराणिक कथाओं के अनुसार मुख्य रुप से यह बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है। भारत और चीन में इसे, इसी परिप्रेख्य में मनाने की परंपरा है। आज इस पर्व को मूल-अर्थों में मनाना ज्यादा प्रासंगिक है। क्योंकि नैतिकता-अनैतिकता के सभी मापदण्ड खोटे होते जा रहे हैं। समाज में जिसकी लाठी, उसकी भैंस का कानून प्रभावी होता जा रहा है। साधन और साध्य का अंतर खत्म हो रहा है। गलत साधनों से कमाई संपत्ति और बाहुबल का बोलबाला हर जगह बढ़ रहा है। ऐसी राक्षसी शक्तियों के समक्ष नियंत्रक मसलन कानूनी ताकतें बौनी साबित हो रही हैं। हिंसा और आतंक के भयभीत वातावरण में हम भयमुक्त होकर नहीं जी पा रहे हैं। दुविधा के इसी संक्रमण काल में होलिका को मिले वरदान आग में न जलने की कथा की प्रासंगिकता है। क्योंकि अंततः बुराई का जलना और अत्याचारी व दुराचारी ताकतों का ढहना तय है।
    सम्राट हिरण्यकश्यप की बहन बोलकर को आग में न जलने का वरदान था अथवा हम कह सकते हैं, उसके पास कोई ऐसी वैज्ञानिक तकनीक थी, जिसे प्रयोग में लाकर वह अग्नि में प्रवेश करने के बावजूद नहीं जलती थी। लेकिन जब वह अपने भतीजे प्रहलाद का अंत करने की क्रूर मानसिकता के साथ उसे गोद में लेकर प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हुई तो प्रहलाद तो बच गए, किंतु होलिका जल कर मर गई। उसे मिला वरदान काम नहीं आया। क्योंकि वह असत्य और अनाचार की आसुरी शक्ति में बदल गई थी। वह अंहकारी भाई के दुराचारों में भागीदार हो गई थी। इस लिहाज से कोई स्त्री नहीं बल्कि दुष्ट और दानवी प्रवृत्तियों का साथ देने वाली एक बुराई जलकर खाक हुई थी। लेकिन इस बुराई का नाश तब हुआ, जब नैतिक साहस का परिचय देते हुए एक अबोध बालक अन्याय और उत्पीड़न के विरोध में दृढ़ता से खड़ा हुआ।
    इसी कथा से मिलती - जुलती चीन में एक कथा प्रचलित है, जो होली पर्व मनाने का कारण बना है। चीन में भी इस दिन पानी में रंग घोलकर लोगों को बहुरंगों से भिगोया जाता है। चीनी कथा भारतीय कथा से भिन्न जरुर है, लेकिन आखिर में वह भी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। चीन में होली का नाम है, 'फोश्वेई च्ये' अर्थात् रंग और पानी से सराबोर होने का पर्व है। यह त्योहार चीन के युतांन जाति की अल्पसंख्यक'ताएं' नामक जाति का मुख्य त्योहार माना जाता है। इसे वे नए वर्ष की शुरुआत के रुप में भी मनाते हैं।
    इस पर्व से जुड़ी कहानी है कि प्राचीन समय में एक दुर्दांत अग्नि-राक्षस ने 'चिंग हुग' नाम के गांव की उपजाउ कृषि भूमि पर कब्जा कर लिया। राक्षस विलासी और भोगी प्रवृत्ति का था। उसकी छह सुंदर पत्नियां थीं। इसके बाद भी उसने चिंग हुग गांव की ही एक खूबसूरत युवती का अपहरण करके उसे सातवीं पत्नी बना लिया। यह लड़की सुंदर होने के साथ वाक्पटु और बुद्धिमति थी। उसने अपने रुप-जाल के मोहपाश में राक्षस को ऐसा बांधा कि उससे उसी की मृत्यु का रहस्य जान लिया। राज यह था कि यदि राक्षस की गर्दन से उसके लंबे-लेबे बाल लपेट दिए जाएं तो वह मृत्यु का शिकार हो जाएगा। एक दिन अनुकूल अवसर पाकर युवती ने ऐसा ही किया। राक्षस की गर्दन उसी के बालों से सोते में बांध दी और बाल से ही उसकी गर्दन काटकर धड़ से अलग कर दी। लेकिन वह अग्नि-राक्षस था, इसलिए गर्दन कटते ही उसके सिर में आग  प्रज्वलित हो उठी और  सिर धरती पर लुढ़कने लगा। यह सिर लुढ़कता हुआ जहां-जहां से गुजरता वहां-वहां आग प्रज्वलित हो उठती। इस साहसी और बुद्धिमान लड़की ने हिम्मत से काम लिया और ग्रामीणों की मदद लेकर पानी से आग बुझाने में जुट गई। आखिरकार बार-बार प्रज्वलित हो जाने वाली अग्नि का क्षरण हुआ और धरती पर लगने वाल आग भी बुझ गई। इस राक्षसी आतंक के अंत की खुशी में ताएं जाति के लोग आग बुझाने के लिए जिस पानी का उपयोग कर रहे थे, उसे एक-दूसरे पर उड़ेल कर झूमने लगे। और फिर हर साल इस दिन होली मनाने का सिलसिला चल निकला।
    ये दोनों प्राचीन कथाएं हमें राक्षसी ताकतों से लड़ने की प्रेरणा देती हैं। हालांकि आज प्रतीक बदल गए हैं। मानदंड बदल गए हैं। पूंजीवादी शोषण का चक्र भूमण्डलीय हो गया है। आज समाज में सत्ता की कमान संभालने वाले संपत्ति और प्राकृतिक संपदा का अमर्यादित क्रेंद्रीयकरण करने में लगे हैं। यह पक्षपात केवल राजनीतिक व आर्थिक क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रह गया है, इसका विस्तार धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी है। नतीजतन हम सरकारी कार्यालय में हों, किसी औद्योगिक कंपनी की चमचमाती बहुमंजिला इमारत में हों अथवा किसी भी धर्म-परिसर में हों, ऐसा आभास जरुर होता है कि हम अंततः लूट-तंत्र के षड्यंत्रों के बीच खड़े हैं। जाहिर है, शासक वर्ग लोकहित के दावे चाहे जितने करें, अंततः उनका सामंती चरित्र ही उभरकर समाज में विस्तारित हो रहा है। आम आदमी पर शोषण का शिकंजा कस रहा है। आर्थिक उदारीकरण न तो समावेशी विकास का आधार बन पाया और न ही अन्याय से मुक्ति का उपाय साबित हुआ। इसके उलट उसे अंतरराष्टीय पूंजीवाद से जो्रड़कर व्यक्ति को अपनी सनातन ज्ञान परंपराओं से काटने का कुचक्र रचा और जो ग्रामीण समाज लघु उद्योगों में स्वयं के उत्पादन की प्रक्रिया से जुड़ा था, उसे नगरीय व्यवस्था का घरेलू नौकर बना दिया। जाहिर है, शाषक दल लोक को हाशिये पर डालकर लोकहित का प्रपंच - गान करने में लगे हैं। लोक का विश्वास तोड़ कर लोकवादी या जनवादी कैसे हुआ जा सकता है ?
    हकीकत तो यह है कि कथनी और करनी के भेद सार्वजनिक होने लगे हैं। जिस शासन-प्रशासन तंत्र को राष्टीय व संवैधानिक आदशरें के अनुरुप ढलने की जरुरत थी, वे संहिताओं और आदर्शों को खंडित करके उनकी परिभाषाएं अपनी राजनीतिक व अर्थ लिप्साओं के अनुरुप गढ़ने लगे हैं। बाजार को मजबूत बनाने के लिए विधेयक लाए जा रहे हैं। परिवार को बुजुर्वा इकाई मानकर और स्त्री  शरीर को केवल देह मानकर कौटुम्बिक व्यवस्था को खंडित और स्त्री-देह को भोग का उपाय बनाने के प्रपंच किए जा रहे हैं। आखिर संसर्ग की उम्र घटाने और अविवाहित रहते हुए साथ रहने की अनुमति देने की क्या तुकें हैं ? क्या इसमें प्रच्छन्न भाव गर्भ निरोधकों का नया बाजार पूंजीपतियों को देने का नहीं है ?
    दरअसल बाजारवादी ताकतें शोषण के जिस दुष्चक्र को लेकर आ रही हैं, उससे केवल नैतिक साहस से ही निपटा जा सकता है। इन शक्तियों की मंशा है, भारतीयों को संजीवनी देने वाली नैतिकता के तकाजे को भ्रष्ट और नष्ट कर दिया जाए। इसीलिए निजी नैतिकता को अनैतिकता में बदलने के उपाय किए जा रहे हैं। जब कि नैतिक मूल्यों का वास्तविक उद्देश्य मानव जीवन को पतन के मार्ग से दूर रखते हुए उसे उदात्त बनाना है। यही कारण रहा कि जब होलिका सत्य, न्याय और नैतिक बल के प्रतीक प्रहलाद को भस्मीभूत करने के लिए आगे आई तो वह खुद जलकर राख हो गई। उसकी वरदान रुपी तकनीक उसके काम नहीं आई। क्योंकि उसने वरदान की पवित्रता को नष्ट किया था। वह शासक दल के शोषण चक्र में साझीदार हो गई थी। चीनी राक्षस का भी यही हश्र युवती के एकांगी साहस ने किया। जाहिर है, पूंजीवादी अत्याचार के दमन के लिए कदम तो देशवासियों को ही उठाना होगा ?

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224   
फोन 07492 232007
   
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

होली (6 मार्च, 2015) के अवसर पर विशेष

होली है असत्‍य पर सत्‍य की विजय का पर्व

-ललित गर्ग -

भारत संस्‍कृति में त्‍योहारों एवं उत्‍सवों का आदि काल से ही काफी महत्‍व रहा है। होली भी एक ऐसा ही त्‍योहार है, जिसका धार्मिक ही नहीं बल्‍कि सांस्‍कृतिक दृष्‍टि से विशेष महत्‍व है। पौराणिक मान्‍यताओं की रोशनी में होली के त्‍योहार का विराट्‌ समायोजन बदलते परिवेश में विविधताओं का संगम बन गया है। इस अवसर पर रंग, गुलाल डालकर अपने इष्‍ट मित्रों, प्रियजनों को रंगीन माहौल से सराबोर करने की परम्‍परा है, जो वर्षों से चली आ रही है। एक तरह से देखा जाए तो यह उत्‍सव प्रसन्‍नता को मिल-बांटने का एक अपूर्व अवसर होता है। हमारी संस्‍कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ पर मनाये जाने वाले सभी त्‍यौहार समाज में मानवीय गुणों को स्‍थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्‌भावना को बढ़ाते हैं। यहाँ मनाये जाने वाले सभी त्‍योहारों के पीछे की भावना मानवीय गरिमा को समृद्धि प्रदान करना होता है। यही कारण है कि भारत में मनाये जाने वाले त्‍योहारों एवं उत्‍सवों में सभी धमोंर् के लोग आदर के साथ मिलजुल कर मनाते हैं।

होली के त्‍यौहार में विभिन्‍न प्रकार की क्रीड़ाएँ होती हैं, बालक गाँव के बाहर से लकड़ी तथा कंडे लाकर ढेर लगाते हैं। होलिका का पूर्ण सामग्री सहित विधिवत्‌ पूजन किया जाता है, अट्टहास, किलकारियों तथा मंत्रोच्‍चारण से पापात्‍मा राक्षसों का नाश हो जाता है। होलिका-दहन से सारे अनिष्‍ट दूर हो जाते हैं। वस्‍तुतः होली आनंदोल्‍लास का पर्व है। इस पर्व के विषय में सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा प्रह्‌लाद तथा होलिका के संबंध में भी है। नारदपुराण में बताया गया है कि हिरण्‍यकशिपु नामक राक्षस का पुत्र प्रह्‌लाद अनन्‍य हरि-भक्‍त था, जबकि स्‍वयं हिरण्‍यकशिपु नारायण को अपना परम-शत्रु मानता था। उसके राज्‍य में नारायण अथवा श्रीहरि नाम के उच्‍चारण पर भी कठोर दंड की व्‍यवस्‍था थी। अपने पुत्र को ही हरि-भक्‍त देखकर उसने कई बार चेतावनी दी, किंतु प्रह्‌लाद जैसा परम भक्‍त नित्‍य प्रभु-भक्‍ति में लीन रहता था। हारकर उसके पिता ने कई बार विभिन्‍न प्रकार के उपाय करके उसे मार डालना चाहा। किंतु, हर बार नारायण की कृपा से वह जीवित बच गया। हिरण्‍यकशिपु की बहिन होलिका को अग्‍नि में न जलने का वरदान प्राप्‍त था। अतः वह अपने भतीजे प्रह्‌लाद को गोद में लेकर अग्‍नि में प्रवेश कर गई। किंतु प्रभु-कृपा से प्रह्‌लाद सकुशल जीवित निकल आया और होलिका जलकर भस्‍म हो गई। होली का त्‍योहार ‘असत्‍य पर सत्‍य की विजय' और ‘दुराचार पर सदाचार की विजय' का प्रतीक है। इस प्रकार होली का पर्व सत्‍य, न्‍याय, भक्‍ति और विश्‍वास की विजय तथा अन्‍याय, पाप तथा राक्षसी वृत्तियों के विनाश का भी प्रतीक है।

होली के पर्व को मनाने के लिये और भी बहुत ही पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। उत्तर पूर्व भारत में होलिकादहन को भगवान कृष्‍ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध दिवस के रुप में जोड़कर, पूतना दहने के रूप में मनाया जाता है तो दक्षिण भारत में मान्‍यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल भस्‍म कर दिया था ओर उनकी राख को अपने शरीर पर मल कर नृत्‍य किया था। तत्‍पश्‍चात्‌ कामदेव की पत्‍नी रति के दुख से द्रवित होकर भगवान शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे प्रसन्‍न होकर देवताओं ने रंगों की वर्षा की। इसी कारण होली की पूर्व संध्‍या पर दक्षिण भारत में अग्‍नि प्रज्‍ज्‍वलित कर उसमें गन्‍ना, आम की बौर और चन्‍दन डाला जाता है। यहाँ गन्‍ना कामदेव के धनुष, आम की बौर कामदेव के बाण, प्रज्‍ज्‍वलित अग्‍नि शिव द्वारा कामदेव का दहन एवं चन्‍दन की आहुति कामदेव को आग से हुई जलन हेतु शांत करने का प्रतीक है।

होली के उपलक्ष्‍य में अनेक सांस्‍कृतिक एवं लोक चेतना से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। महानगरीय संस्‍कृति में होली मिलन के आयोजनों ने होली को एक नया उल्‍लास एवं उमंग का रूप दिया है। इन आयोजनों में बहुत शालीन तरीके से गाने बजाने के सांस्‍कृतिक कार्यक्रम होते हैं। घूमर जो होली से जुड़ा एक राजस्‍थानी कार्यक्रम है उसमें लोग मस्‍त हो जाते हैं। चंदन का तिलक और ठंडाई के साथ सामूहिक भोज इस त्‍यौहार को गरिमामय छबि प्रदान करते हैं। देर रात तक चंग की धुंकार, घूमर, डांडिया नृत्‍य और विभिन्‍न क्षेत्रों की गायन मंडलियाँ अपने प्रदर्शन से रात बढ़ने के साथ-साथ अपनी मस्‍ती और खुशी को बढ़ाते हैं। आज का सारा माहौल प्रदूषित हो चुका है, जीवन के सारे रंग फिके पड़ गए हैं। न कहीं आपसी विश्‍वास रहा, न किसी का परस्‍पर प्‍यार, न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में एकता का स्‍वर उठा। बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी। यूँ लगता है सब कुछ खोकर विभक्‍त मन अकेला खड़ा है फिर से सब कुछ पाने की आशा में। कितनी झूठी है यह प्रतीक्षा, कितनी अर्थ शून्‍य है यह अगवानी। हम भी भविष्‍य की अनगिनत संभावनाओं को साथ लिए आओ फिर से एक सचेतन माहौल बनाएँ। उसमें सच्‍चाई का रंग भरने का प्राणवान संकल्‍प करें। होली के लिए माहौल भी चाहिए और मन भी चाहिए, ऐसा मन जहाँ हम सब एक हों और मन की गंदी परतों को उखाड़ फेकें ताकि अविभक्‍त मन के आइने में प्रतिबिम्‍बित सभी चेहरे हमें अपने लगें।

होली का आगमन बसंत ऋतु की शुरुआत के करीब-करीब आस-पास होता है। लगभग यह वक्‍त है, जब शरद ऋतु को अलविदा कहा जाता है और उसका स्‍थान वसंत ऋतु ले लेती है। इन दिनों हल्‍की-हल्‍की बयारें चलने लगती हैं, जिसे लोक भाषा में फागुन चलने लगा है, ऐसा भी कह दिया जाता है। यह मौसमी बदलाव व्‍यक्‍ति-व्‍यक्‍ति के मन में सहज प्रसन्‍नता, स्‍फूर्ति पैदा करता है और साथ ही कुछ नया करने की तमन्‍ना के साथ-साथ समाज का हर सदस्‍य अपनी प्रसन्‍नता का इज़्‍ाहार होली उत्‍सव के माध्‍यम से प्रकट करता है। इससे सामाजिक समरसता के भाव भी वर्धमान बनते हैं। भारतीय लोक जीवन में होली की जड़ें काफी गहरी जम चुकी हैं।

होली शब्‍द का अंग्रेजी भाषा में अर्थ होता है पवित्रता। पवित्रता प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को काम्‍य होती है और इस त्‍योहार के साथ यदि पवित्रता की विरासत का जुड़ाव होता है तो इस पर्व की महत्ता शतगुणित हो जाती है। प्रश्‍न है कि प्रसन्‍नता का यह आलम जो होली के दिनों में जुनून बन जाता है, कितना स्‍थायी है? डफली की धुन एवं डांडिया रास की झंकार में मदमस्‍त मानसिकता ने होली जैसे त्‍योहार की उपादेयता को मात्र इसी दायरे तक सीमित कर दिया, जिसे तात्‍कालिक खुशी कह सकते हैं, जबकि अपेक्षा है कि रंगों की इस परम्‍परा को दीर्घजीविता प्रदान की जाए। स्‍नेह और सम्‍मान का, प्‍यार और मुहब्‍बत का, मैत्री और समरसता का ऐसा शमां बांधना चाहिए कि जिसकी बिसात पर मानव कुछ नया भी करने को प्रेरित हो सके।

पवित्रता को मुख्‍य रूप से तीन कोणों से देखा जा सकता है। इसका प्रथम बिन्‍दु है-मानसिक पवित्रता। जब तक व्‍यक्‍ति स्‍वयं के भीतर से पवित्रता को उद्‌घाटित करने की मानसिक तैयारी में नहीं होगा, उसके अगले पड़ाव बेमानी होंगे। यदि ध्‍येय के प्रति मन ईमानदार है, सोच समर्पित है तो मानना पड़ेगा कि यात्रा का प्रस्‍थान सही है।

दूसरा बिन्‍दु है वाणी की पवित्रता। अनेक बार देखा गया है कि कड़वी-कसैली वाणी समूचे तंत्र को ध्‍वस्‍त कर देती है। भले ही वाक्‌पटुता एवं ऊपरी मुलम्‍मे के शब्‍द समूह से दुष्‍प्रभाव को रोकने की कोशिश हो, पर वाणी की मधुरता एवं विवेकशीलता ही ऐसे आधार हैं जिससे व्‍यक्‍ति पारस्‍परिकता के सूत्र में आबद्ध रहता है।

पवित्रता का एक बिन्‍दु है- व्‍यवहार की पवित्रता। जब तक हमारे व्‍यवहार एवं आचरण पवित्र नहीं होंगे, संभव है सब कुछ प्राप्‍त करके भी हम कुछ नहीं पाने की स्‍थिति में आ जाएं। उस केलकुलेटर की तरह, जिसने प्‍लस-माइनस की लम्‍बी कसरत की, पर अचानक हाथ जीरो पर दब गया और स्‍क्रीन पर सब कुछ साफ हो गया। पवित्रता को विस्‍तृत परिवेश में देखें तो बदलते परिप्रेक्ष्‍य में इसके कई अन्‍य रूप भी हैं। व्‍यक्‍ति का रहन-सहन, खान-पान, क्रिया-कलाप, व्‍यापार-व्‍यवसाय किसी भी क्षेत्र में जाए, पवित्रता की आवश्‍यकता नितांत रूप से प्रकट होती है।

होली के पावन प्रसंग पर हमें इस बात के लिए दृढ़ संकल्‍पित होना होगा कि अपने मन, वाणी और व्‍यवहारों में अंतर्निहित आसुरी प्रवृत्तियों का परिष्‍कार करें एवं उसके स्‍थान पर पवित्रता की देवी को प्रतिष्‍ठित करें, जोड़-घटाव घटित हुए हैं, जिन्‍होंने व्‍यक्‍ति को कहीं राजमार्ग, तो कहीं अंधी गलियों में जाने को विवश किया है। राजनैतिक दृष्‍टि से भी इस शताब्‍दी का पहला दशक अनेक परिदृश्‍य उपस्‍थित कर चुका है। जापान का भूकम्‍प और सुनामी इस सदी के नाम ही लिखे जा चुके हैं।

होली जैसे त्‍यौहार में जब अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, ब्राह्मण-शूद्र आदि सब का भेद मिट जाता है, तब ऐसी भावना करनी चाहिए कि होली की अग्‍नि में हमारी समस्‍त पीड़ाएँ दुःख, चिंताएँ, द्वेष-भाव आदि जल जाएँ तथा जीवन में प्रसन्‍नता, हर्षोल्‍लास तथा आनंद का रंग बिखर जाए। होली का कोई-न-कोई संकल्‍प हो और यह संकल्‍प हो सकता है कि हम स्‍वयं शांतिपूर्ण जीवन जीये और सभी के लिये शांतिपूर्ण जीवन की कामना करें। ऐसा संकल्‍प और ऐसा जीवन सचमुच होली को सार्थक बना सकते हैं।

संपर्क:

(ललित गर्ग)

ई-253, सरस्‍वती कुंज अपार्टमेंट

25, आई0पी0 एक्‍सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्‍ली-92

फोन ः 22727486

वर्तन परिवर्तन

४. रंग बरसे...

यह सत्य घटना है.

मरीज दो, कमरा एक. दोनों के रोग असाध्य. एक मरीज के बिस्तर के पास खिड़की थी और दूसरे के बिस्तर के पास दीवार. दीवारवाला मरीज अपने बिस्तर से उठ कर बैठ भी नहीं पाता था. मजबूरी थी. परन्तु खिड़कीवाला मरीज खिड़की से बाहर के दृश्य देख पाता था. दूसरा उसे बार बार पूछा करता था: ‘बाहर क्या दिखता है?’

‘यहां से सुन्दर सा पार्क दिखता है. वहां छोटे छोटे बच्चे खेल रहे हैं.’ खिड़कीवाला मरीज बताता. कभी वह खिड़की से नजर आते दूर के तालाब के बारे में कहता था. कभी बेटे के साथ खेलते पिता की बात करता था तो कभी पुत्री को चलना सिखाती माँ के बारे में या फिर कभी उड़ते हुए पंखी, पानी में तैरते बतख, लहराते वृक्ष, गीली सड़कें, स्कूल जाते हुए छात्रों के बारे में बड़े चाव से बताता था.

बिस्तर में पडा बीमार यह सब सुनकर खुश हो जाता था. कभी उसके मन में ख़याल आता कि काश! मैं भी ये नज़ारे देख पाता. मुझे खिड़की से ये सब देखने का मौक़ा कब मिलेगा? उसकी यह मंशा तब पूरी हुई जब खिड़कीवाला मरीज अचानक चल बसा. अस्पतालवालों ने उसकी इच्छा के अनुसार बचे हुए मरीज का बिस्तर खिड़की के पास लगा दिया. बस, अब तो उसे खिड़की से बाहर देखने का बेशुमार आनंद लेना था...उसने अपनी पूरी ताकत लगाकर गर्दन ऊपर उठाई और खिड़की के बाहर देखा तो वह सन्न रह गया.

खिड़की के बहार सिर्फ सफ़ेद सी दीवार ही दिखाई दे रही थी!

यदि ईश्वर ने हमारी जिंदगी में कुछ कम रंग भरे हो तो यह कमी हम अपने आत्मविश्वास के सहारे पूरी कर सकते हैं. हमारी सकारात्मक सोच से हम अपनी जिंदगी को अधिक रंगीन बना ही सकते हैं. हमने देखा कि अपनी प्रबल कल्पनाशक्ति से पहला मरीज खुद की और साथवाले मरीज की जिंदगी में रंग भरता था ठीक वैसे ही हमें अपनी कठिनाइयों को अनदेखा करते हुए जैसी भी जिंदगी हमें मिली है, हमें उस में ही रंग भरने होते हैं. अपने दुखड़े रोने के बजाय मुश्किलों में भी खुश रहा जा सकता है. हमारे जीवन में इन्द्रधनुष के सारे रंग न होते हुए भी उसे कुछ तो रोचक बनाया ही जा सकता है. हमें अपनी भूमिका अच्छे से निभानी चाहिए. ईश्वर भी यही चाहता है! यक़ीनन! आप अपनी जिंदगी में पसंदीदा रंग भरने से प्रारंभ कर सकते हैं.

आज से ही अपनी जिंदगी में नए रंग भरने का प्रारंभ करें...

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प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में न जाने कितनी घटनाएं घटती हैं, लेकिन प्रत्येक घटना अविस्मरणीय नहीं होती। जीवन की कुछेक घटनाएं ही ऐसी होती हें, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। मेरे जीवन में भी कुछ ऐसा ही घटा है कि आपके साथ बांटने को मन करता है। घटना... होली के रंगीले त्यौहार से जुड़ी है। जब भी होली की बात चलती है या होली नज़दीक आती है तो यादें हरी हो जाती हैं।


    कुछ वर्ष पहले की होली की ही बात है। होली के दिन ही मामाजी के लड़के की शादी थी। मैं असमंजस में था कि दोस्तों के साथ होली खेलूं या भाई की शादी में जाऊं। होली में जब दस दिन शेष रहे तो मैंने सोचा कि दोस्तों के साथ होली तो हर साल ही खेलते हैं। भाई की शादी कोई रोज-रोज थोड़े ही होती है और अंत में यही निर्णय किया कि इस बार होली नहीं खेलूंगा। जब यह तय हो गया तो मैं शादी में जाने की तैयारी करने लगा और एक कोट-पेण्ट का कपड़ा लेकर टेलर के पास पहुंचा। टेलर अपने काम में बहुत ही ज्यादा व्यस्त था, इस कारण उसने कपड़े शादी वाले दिन ही देने का वादा किया। मैंने उसे बहुत कहा कि शादी से एक दिन पहले कपड़े तैयार कर दो, लेकिन टेलर नहीं माना और उसने विश्वास दिलाते हुए मुझे आश्वस्त किया। मुझे भी कपड़े वहीं से सिलवाने थे। अतः मैं आश्वस्त होकर घर आ गया।

इंतजार करते-करते दसवां दिन आ गया। उस दिन दोपहर बारह बजे भाई की बारात रवाना होनी थी। इसी दिन होली और इसी दिन बारात रवानगी। मुझे डर था कि मेरे दोस्त मुझे होली खेलने के लिए अपनी टोली में जबरदस्ती न शामिल कर लेवें। मैंने देखा कि मेरे हम उम्र लड़कों की टोलियां, रंग से सराबोर चेहरे, चंग बजाते, नाचते-गाते झुण्ड इधर-उधर गलियों से गुजर रहे थे। मेरा दिल धड़क रहा था कि दोस्तों का हुजूम आ गया तो मैं क्या करूंगा। टेलर मास्टर को फोन किया तो उसने आश्वस्त किया कि सूट तैयार है बस, सिर्फ प्रेस करनी बाकि है। सूट यहीं दुकान से पहन कर सीधे बारात में शामिल हो जाना। टेलर की दुकान नज़दीक ही थी। मैं दुकान की ओर चल पड़ा। जाते-जाते मैंने घर पर मां से कह दिया कि मेरे बारे में पूछे तो कह देना कि वह भाई की शादी में चला गया है और कल वापस आएगा।


    मैंने देखा कि लाल, पीले, हरे, काले रंग से पुते बच्चे और बड़े... सब उधम मचा रहे थे। होली की रंग और गुलाल से गलियां भरी पड़ी थी। मैं डरते-डरते टेलर की दुकान की ओर बढ़ा कि कोई रंग ना डाल दे या फिर दोस्तों की टोली ना आ जाए। दोस्तों का तो इतना भय था कि कहीं भाई की शादी में जाना कैन्सिल न हो जाए। टेलर की दुकान पहुंच कर मैंने राहत की सांस ली। टेलर मास्टर ने बताया कि देख लीजिए सूट तैयार है। सिर्फ प्रेस ही बाकि है। बस बिजली आते ही दो मिनट में सूट तैयार। इतना कह कर उसने बिजली वालों को भद्दी सी गाली दी। इसी बीच दूल्हे का फोन आया। उसने मुझे बताया कि अपने दोस्तों से सचेत रहना।


    मैंने भैया से कहा कि मैं टेलर की दुकान में हूं और यहीं से बारात में शामिल हो जाऊंगा। आप गाड़ी दुकान पर ही भिजवा देना। इतना कह कर मैंने फोन काट दिया और फिर कभी टेलर मास्टर की ओर देखते तो कभी बुझी हुई ट्यूब लाइट की ओर। उस दिन मुझे भी बिजली वालों पर बहुत गुस्सा आ रहा था। बारह बजने वाले थे और बिजली अब भी नहीं आई थी। टेलर मास्टर ने बिजली वालों को एक-दो और भद्दी गालियां निकाली। मैं बैठा-बैठा अख़बार की एकाध न्यूज़ पढ़कर समय काटना चाह रहा था। लेकिन मन उचाट सा हो रहा था। इन्तज़ार करते-करते अब एक बज गए थे। इसी बीच मोबाइल पर दूल्हे भैया के चार बार फोन आ चुके थे। आखिरी फोन में भैया ने बताया कि वे अब रवाना हो चुके हैं। तुम्हारी गाड़ी बस स्टैण्ड के पास खड़ी है। ट्रैफिक व्यवस्था के कारण गाड़ी टेलर मास्टर की दुकान तक नहीं आ सकती। तभी गाड़ी के ड्राइवर का फोन आया। बोला- डीडी भैया, भगतसिंह चौक पर ट्रेफिक पुलिस वाले खड़े हैं। आप बस स्टैण्ड पर पहुंच जाओ। गाड़ी में तीन लोग और भी हैं। जल्दी करो, बारात रवाना हो चुकी है। बस, अपने ही बचे हैं।


    बिजली अब भी नहीं आई थी। टेलर मास्टर ने मेरी मजबूरी समझी। आखिर मैंने दबाव बनाते हुए उससे रिक्वेस्ट की तो उसने कोयले वाली प्रेस से जैसे-तैसे सूट के प्रेस मार दी। मैंने कोट-पेण्ट पहने और अपने आपको आदमकद शीशे में निहारा। सूट वास्तव में जम रहा था। टेलर मास्टर ने भी सूट की भरपूर प्रशंसा की। तभी मोबाइल फोन की घण्टी बजी। मैंने जैसे ही स्विच ऑन किया तो दोस्त की आवाज़ सुनाई दी- डीडी, कहां हो भई? हम सबने घर के तीन चक्कर लगा लिए। होली के मौके पर कहीं ब्लैक एण्ड व्हाइट ही घूम रहे हो या घर में छिपे बैठे हो? मैंने कहा- मैं यहां से 50-60 किलोमीटर दूर जा चुका हूं। मामाजी के लड़के की शादी जो है। इतना कह कर मैंने फोन काट दिया और टेलर मास्टर की दुकान से बस स्टैण्ड की तरफ रवाना हुआ। होली खेलने वाले लोग अपने-अपने झुण्ड बना कर अब भी नाच-गा रहे थे। सड़क पर बिखरा रंग इस बात का गवाह था कि लोगों ने खूब जम कर होली खेली है। मन तो मेरा भी था, लेकिन उस दिन मेरे लिए भाई की शादी में जाना ज्यादा जरूरी था। मैं यही सोचते-सोचते बस स्टैण्ड की तरफ बढ़ रहा था। तभी 15-20 लड़कों का एक झुण्ड मुझे मेरी तरफ आता दिखाई दिया। मैं भाग पर बस स्टैण्ड पहुंचना चाह रहा था, लेकिन मैं दौड़ता, तब तक उन्होंने मुझे घेर लिया। सबके रंग-बिदरंग चेहरे और कपड़े लीर-लीर....।


    क्यों बेटा, तुम तो भाई की शादी में 50-60 किलोमीटर दूर जा चुके थे। यहां तुम थोड़े ही हो, ये तो तुम्हारा भूत है। मुझे काटो तो खून नहीं। तभी दूसरा बोला- सत्यवादी जी, होली नहीं खेलनी थी तो पहले बता देते। दोस्तों से झूठ बोलते हो। शर्म नहीं आई। सारे दोस्त अपनी-अपनी फब्तियां कस रहे थे। कोई रंग नहीं डालेगा। मैं साफ कह देता हूं। मैं बोला।  हां, तुम तो हमेशा साफ ही कहते हो। आज पता चला है तुम्हारी सफाई का। एक अन्य दोस्त ने फिकरा कसा।


    मैंने गुस्से से चिल्लाते हुए कहा- मुझ पर कोई भी रंग नहीं डालेगा।
    रंग कौन गधा डाल रहा है... हम तो तुझे अपने जैसा बनायेंगे। एक अन्य दोस्त ने व्यंग्य किया।
    अपने जैसा मतलब? मैं समझा नहीं।
    मतलब...कपड़े लीर-लीर....। एक अन्य ने कहा।
    ये क्या बकवास है।
    यह बकवास नहीं है। आज तुम्हारी दादागिरी नहीं चलेगी। एक अन्य ने फिर फबती कसी।
    मैं कहता हूं...मेरे नज़दीक कोई नहीं आएगा।
    क्यूं, करण्ट मारते हो क्या ? एक अन्य ने व्यंग्य किया। तभी एक दोस्त ने अपने दाहिने हाथ की मुट्ठी बंद करते हुए बहुत ही बुलंद आवाज़ में कहा- हमला।


    और वे सारे दोस्त मुझ पर टूट पड़े। मैं चीखा, चिल्लाया... गिड़गिड़ाया... पर मेरी बात का कोई असर नहीं। पांच मिनट में ही खेल खत्म। मेरे नए कोट-पेण्ट लीर-लीर हो चुके थे।


    मैं किससे क्या कहता। मैं मौन हो गया। बिल्कुल चुप्पी साध ली। दोस्तों ने रंग और गुलाल से पूरी तरह अपने जैसा ही बना दिया। मैं सोच रहा था कि ऐसे दोस्त किस काम के, जो किसी की मजबूरी नहीं समझते। तभी एक दोस्त बोला- सोच क्या रहे हो... कोट-पेण्ट तो नए बन जाएंगे... लेकिन मन के भीतर की बात जानने वाले दोस्त कहां से लाओगे? तभी दूसरा दोस्त बोला- तुम हमसे झूठ बोले थे। उसी का परिणाम है ये। तुम्हें कोट-पेण्ट चाहिए या दोस्त? बोल...... किसकी जरूरत है? यह कहते हुए उसके साथ-साथ सभी दोस्तों ने मुझे बाहों में भर लिया। दोस्तों का असीम प्यार पाकर मैं सब कुछ भूल गया था, लेकिन अब जब भी होली आती है तो यह घटना जरूर याद आती है


=दीनदयाल शर्मा, १०/२२ हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, हनुमानगढ़ जं., राजस्थान

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साहित्य समागम के साथ श्रीनाथद्वारा के दिव्य दर्शन

मेरा अपना मानना है कि जब तक आपके पुण्योदय नहीं होते, आप किसी भी तीर्थस्थल पर नहीं जा सकते. दूसरा यह कि जब तक उस तीर्थक्षेत्र के स्वामी का बुलावा नहीं होता, तब तक आपको उनके दिव्यदर्शन भी नहीं कर सकते. संभव है कि आप मेरे मत से सहम हों अथवा नहीं भी हों, पर मेरा अपना यह विश्वास अडिग है कि बगैर उनकी कृपा के कुछ भी नहीं हो सकता. मैं इसी विश्वास को लिए चलता हूँ.

निश्चित रूप से मैं अपने इसी विश्वास के बल पर यह कह सकता हूँ कि मेरे अन्दर कुछ पुण्य़ॊं का उदय हुआ और मुझे श्रीनाथजी के दर्शन प्राप्त करने का अहोभाग्य प्राप्त हुआ. यह श्रीनाथजी की कृपा का ही फ़ल था कि मुझे साहित्य मंडल नाथद्वारा के प्रधानमंत्री (स्व) श्री भगवतीप्रसादजी देवपुरा का आमंत्रण-पत्र प्राप्त हुआ . नाथद्वारा में पाटॊत्सव ब्रजभाषा समारोह 14-15 फ़रवरी 2012 को आयोजित किया गया था, पत्र में इस बात का उल्लेख था कि वे मेरे साहित्यिक अवदान को देखते हुए मुझे ”हिन्दी भाषा भूषण” सम्मान से सम्मानित करने जा रहे हैं. मुझे दोहरी खुशी प्राप्त हो रही थी कि मुझे जहाँ श्रीविग्रह के दर्शनों का पुण्य-लाभ मिलेगा, वहीं मुझे साहित्य शिरोमणि-श्री भगवतीप्रसादजी देवपुरा के हस्ते सम्मानित किया जाएगा.

इस खुशखबरी को मैंने अपनी पत्नि-पुत्रों और साहित्यकार मित्रों को सुनाया और जाने की तैयारी करने लगा. इस अवसर का लाभ उठाने के लिए मैंने पत्नि को साथ चलने को कहा. वे तैयार तो हो गईं लेकिन किसी कारणवश वे इस यात्रा से वंचित रह गईं. इस बीच मैं दो बार श्रीनाथजी के दर्शन कर चुका हूँ, लेकिन पत्नि इस बार भी साथ नहीं थीं. तीसरी बार भीलवाडा में आयोजित “बालवाटिका” के कार्यक्रम में जाने के लिए यह सोचते हुए हम उद्धत हुए कि लौटते में श्रीनाथजी के दर्शन जरुर करेंगे, लेकिन नहीं जा पाए.

साहित्यमंडल श्रीनाथद्वारा माह फ़रवरी में मनाए जाने वाले पाटॊत्सव ब्रजभाषा समारोह जो 11-12 फ़रवरी 2015 को मनाया जाना था, का आमंत्रण-पत्र संस्था के प्रधानमंत्री श्री श्यामप्रकाशजी देवपुरा, का प्राप्त हुआ. फ़िर कुछ ऎसा हुआ कि चाहकर भी हम नहीं जा पाए. उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए आप मेरे मत से जरूर सहमत होंगे कि जब तक उस सिद्ध क्षेत्र के स्वामी की जब तक कृपा नहीं होगी, आप वहाँ प्रवेश नहीं पा सकते.

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( फ़ोटो क्रमांक (१ तथा २) सम्मानित होते हुए लेखक(३) मंच का संचालन करते (स्व) भगवतीप्रसादजी देवपुरा( बतौर स्मृतियों के लिए एकमात्र चित्र.),(४-५-६-७) हल्दीघाटी (८) श्री शिवमृदुलजी के साथ(९) राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के परिसर में अकादमी के प्रबन्ध सम्पादक डा.प्रमोद भट्टजी एवं अन्य मित्रों के साथ) (१०) उदयपुर राजमहल(११) पिछोरा झील(१२)उदयपुर के साहित्यिक मित्र श्री जगदीश तिवारी तथा नवकृति संस्था के अध्यक्ष (१३) (मित्र श्री विष्णु व्यास) (१४) डा.गर्गाजी के साथ चित्तौडगढ में) (१५) विजयस्तंभ परिसर में तैनात सुरक्षाकर्मी

 

अपने साहित्यिक मित्र श्री विष्णु मंगरुलकर से मैंने इस बाबत चर्चा की. हम सभी स्नेहवश उन्हें भाऊ के नाम से पुकारते हैं. जैसा कि उनका स्वभाव है कि पहले तो वे ना-नुकुर करते हैं फ़िर सहमति दे देते हैं. हमने कार्यक्रम की रूपरेखा तय की और भीलवाडा के मेरे साहित्यकार मित्र एवं बालवाटिका के संपादक डा.श्री भैंरुलाल गर्गजी को अपने कार्यक्रम से अवगत कराया. डा.साहब ने मुझे बतलाया कि वे श्री श्री विष्णु कुमार व्यास के मकान के उद्घाटन समारोह में सपरिवार गंगरार आ रहे हैं. चुंकि गंगरार भीलवाडा-चित्तौडगढ मार्ग में स्थित है और यह स्थान चित्तौडगढ के करीब है. अतः उन्होंने हमें चित्तौडगढ रुकने के सलाह दी.

सुबह के करीब सात अथवा साढे सात बजे के करीब हमारी ट्रेन चित्तौडगढ पर आकर रुकती है. स्टेशन पर हमनें मुँह-हाथ धोया और बाहर निकलकर एक गुमठी पर चाय के घूँट भर ही रहे थे कि डा.साहब अपने बडॆ सुपुत्र वेदांत प्रभाकर के साथ अपनी गाडी में आ पहुँचे. गर्मजोशी के साथ उन्होंने हमारा स्वागत किया.

चित्तौडगढ आना और वहाँ के प्रख्यात साहित्यकार श्री शिव मृदुल, डा. रमेश मयंक, राधेश्याम मेवाडी, पण्डित नंदकिशोर निर्झर आदि से न मिलना, न तो डा.साहब को गंवारा था, न हमें. हम सीधे श्री शिव मृदुलजी के यहाँ पहुँचे. इन दिनो वे अस्वस्थ चल रहे थे. कारण यह था कि वे अपने घर के बाहर खडॆ हुए थे कि किसी तेजरफ़्तार मोटरसाईकल सवार ने उन्हें टक्कर मार दी थी. सिर में गहरी चोट लगी थी. ईश्वर की कृपा और सही वक्त पर सही इलाज से वे ठीक तो हो गए थे, लेकिन सिर पर अब भी.पट्टी चढी हुई थी.

मृदुलजी ने हम सभी का उठकर आत्मीय स्वागत किया और औपचारिक चर्चाओं के साथ-साथ चाय-पानी का दौर भी चलता रहा. मृदुलजी का अनुरोध था कि हम भोजन करने के उपरान्त ही कहीं जा सकते हैं. हम उनका अनुरोध न ठुकरा सके. समय की कोई कमी हमारे पास नहीं थी. अतः यह विचार बना कि रसोई तैयार होने तक हम चित्तौडगढ का भ्रमण कर आते हैं.

चित्तौडगढ किले का भ्रमण करने के पश्चात हम सबने मिलकर सुस्वादु भोजन का आनन्द उठाया. तत्पश्चात हम गंगवार के लिए निकले.

गंगवार में मित्र विष्णुजी से भेंट हुई. यहाँ दो विष्णुओं के बीच मुलाकात हो रही थी. हमने उनके नवनिर्मित भवन का अवलोकन किया. सभी के साथ बैठकर भोजन का आनन्द उठाया. शाम के लगभग पांच बज रहे थे. पूरा गर्ग परिवार और हम अब भीलवाडा की ओर प्रस्थान कर रहे थे. भीलवाडा से ही हमें श्रीनाथद्वारा जाने के लिए बस मिलनी थी. पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार डा.साहब भी हमारे साथ ही वहाँ चलने वाले थे, लेकिन किसी आवश्यक कार्य के चलते वे साथ न दे सके.

भीलवाडा पहुँचते ही हमें श्रीनाथद्वारा जाने वाली बस सुगमता से मिल गई और अब हम उस ओर बढ चले थे.

श्रीनाथद्वारा स्थित “बालासिनोर सदन”, बी विंग सब्जी मण्डी में अवस्थित है, जहाँ भारत के अन्य स्थानों से पहुँचने वाले साहित्यकारों के ठहरने की उत्तम व्यवस्था की गई थी.

दिनांक १४ फ़रवरी २०१२=श्रीनाथजी के बडॆ मुखिया एवं साहित्य-मण्डल श्रीनाथद्वारा के माननीय अध्यक्ष श्री नरहरि ठाकुरजी, अन्य गणमान्य नागरिकों और प्रबुद्धवर्ग की गरिमामय उपस्थिति में कार्यक्रम की शुरुआत हुई. दो दिवसीय चलने वाले इस साहित्यिक कार्यक्रम में पहले दिन “समस्या पूर्ति” कार्यक्रम आयोजित हुआ. नौ बजे सुबह से शुरु होने वाले इस प्रथम सत्र में सवैये के अन्तरगत “हलमूसल धारी” तथा कवित्त में “म्हाडॊ भ्रष्टाचार को” विषय पर श्री जमनालालजी शर्मा”जमनेश”, गिरीशजी “विद्रोही”, दुर्गाशंकर यादव “मधु” ने इस विषय पर विस्तार से अपने विचार प्रस्तुत किए. द्वितीय सत्र में श्रीनाथद्वारा के स्कुलों में अध्ययनरत विद्यार्थियों को सर्वोच्च अंक प्राप्त करने पर “विद्यार्थी रत्न” सम्मान से सम्मानित किया जाता है. इसे एक शानदार और और जानदार परम्परा का निर्वहन होना कहा जा सकता है. इस तरह सम्मानित होने वाले बच्चे न केवल प्रोत्साहित होते हैं बल्कि जीवन में उच्चपादान पर अपने आपको प्रतिष्ठित कर पाते हैं.तथा देश और समाज के लिए कुछ कर जाने की भावना से ओतप्रोत भी होते हैं. इस सत्र की जितनी भी तारीफ़ की जाए, कम ही प्रतीत होती है.

तृतीय सत्र में “ब्रज भाषा उपनिषद” के अन्तरगत ब्रज भाषा पर आधारित अनेकों विषय पर परिचर्चा होती है. जैसे भक्तिकाल में ब्रजभाषा, रीति कालीन ब्रजभाषा साहित्य आदि

चतुर्थ सत्र में “ब्रजभाषा विभूषण” सम्मान से विद्वत साहित्यकारों का सम्मान किया गया. पंचम सत्र में “हिन्दीभाषा भूषण सम्मान” से साहित्यकारों का सम्मान किया गया जिसमें मैं भी शामिल था. सत्र का संचालन बडॆ मनोयोग से करते हुए ब्रजभाषा के नामचीन साहित्यकार श्री विठ्ठल पारिख ने श्री नाथूलाल महावरजी द्वारा रचित सवैये पढते हुए साहित्यकार का परिचय देते हुए चलते हैं. मुझे सम्मानित करते हुए उन्होंने निम्नलिखित सवैया पढा, वह कुछ इस तरह से है

गोवर्धन यादव.

कथाकार हैं, श्रेष्ठ श्री लिखें बाल साहित्य सफ़ल समीक्षक सृजनरत, मगनमना श्री नित्य, “सृजन श्री” से सम्मानित पुरस्कार सम्मान, मान वर विभव विभूषित गोवर्धन श्रीमंत वाणी का गुणाकार हैं हिन्दी सेवी श्रेष्ठ, (त्रैमासिक “हरसिंगार”पृष्ठ २६ कुशल कवि कथाकार हैं.

‍षष्ठम सत्र में “शिक्षा साहित्य मनीषी सम्मान” तथा सप्तम सत्र में “ब्रजभाषा कवि सम्मेलन” का आयोजन किया गया. ब्रजभाषा में निहित सौंदर्यबोध की कविताओं को सुनने और सराहना करने का मेरे लिए यह प्रथम अवसर था.

एक दिन में लगातार सात सत्र चलते रहने के बावजूद न तो उनमें कहीं उबाऊपन था और न ही घुटन महसूस हो रही थी. ऎसा होना निश्चित ही आश्चर्य का विषय है. मैं बैठे-बैठे सोच रहा था- यदि किसी रथ में एक साथ सात घोडॆ जोड दिए जाएं, तो उन्हें साधते हुए सीधे मार्ग में चला पाना कितनी जोखिम भरा काम है. इसमे दुर्घट्ना की अनेकानेक संभावनाएं बन सकती है. यदि आप इसे चला पाए तो इसका सारा श्रेय उस साहसी सारथी को दिया जाना चाहिए. सात-सात कार्यक्रम को अंजाम देने का एवं कुशल संचालन का सारा श्रेय संस्था के प्रधानमंत्री श्री भगवतीप्रसादजी देवपुरा को दिया जाना चाहिए .लीक से हटकर उन्हें चलना कतई पसंद नहीं आता था. जिसके लिए वे तुरन्त अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर देते थे. कठोर निर्णय ही किसी काम को सही अन्जाम दे सकता है.

फ़ाल्गुन कृष्ण ८ सं.२०६८ बुधवार, १५ फ़रवरी २०१२ का दिन कार्यक्रम के समापन का दिन था. इस दिन भी दो सत्र आयोजित किए गए थे. प्रथम सत्र की शुरुआत प्रातः ८ बजे होती है, प्रथम सत्र में “अष्टछाप, काल कवलित पत्रिका, साहित्यकार, पुस्तकालय एवं प्रकाशन कक्ष” , जिसमें संस्था की गतिविधियों का अवलोकन कराना होता है. इसी सत्र में “पुरजन सम्मान” भी होता है. जो व्यक्ति किसी कारणवश पिछली साल उपस्थित नहीं हो पाए थे, के आगमन पर सम्मानित किए जाने की परम्परा विकसित की गई है. द्वितीय सत्र में “सम्पादक शिरोमणि” सम्मान “ से उन सम्पादकॊ कॊ सम्मानित किया जाता है, जिनका कार्य उल्लेखनीय होता है.

यह संस्था अपने स्थापना वर्ष १९३७ से अनेक साहित्यिक कार्यक्रमों का सफ़लतापूर्क आयोजन करती आ रही है. करीब साठ हजार पुस्तकों का विशाल पुस्तकालय आप यहाँ देख सकते हैं. संस्था द्वारा संचालित ३०० छात्राओं का माध्यमिक विद्यालय, देश की तमाम पत्र-पत्रिकाओं के साथ बालसाहित्य भी यहाँ सहजता से उपलब्ध हैं. फ़ाल्गुन सप्तमी को “पाटोत्सव ब्रजभाषा समारोह एवं १४ सितम्बर को “हिन्दी लाओ-देश बचाओ” कार्यक्रम यहाँ सम्पादित होते हैं. देश की अनेकानेक बडी संस्थाओं से सम्बद्ध इस संस्था में विभिन्न संस्थाओं द्वारा प्रदत्त ११-११ हजार रुपयों के छः पुरस्कार सहित अभिनन्दन कार्यक्रम भी यहाँ प्रतिवर्ष होते हैं.

श्रीनाथजी का मन्दिर यहाँ से कुछ ही दूरी पर अवस्थित है. सुबह नौ बजे से शाम तक चलने वाले इस दो दिवसीय व्यस्तम कार्यक्रम के पश्चात हम सीधे श्रीनाथजी के दिव्य दर्शनों के लिए निकल पडते. रास्ते में पडने वाली दूकानों में श्रीजी की भव्य तस्वीरें, रंग-बिरंगे फ़ूलों में गुंथी मालाओं का विक्रय करती अनेकानेक दूकाने, श्रीजी के महाप्रसाद विकेताओं की दूकानों आदि को पार करते हुए तंग गलियों से गुजरते हुए मन्दिर तक जाना होता है. श्रीजी राजस्थान तथा गुजरात के लोगों के इष्ट देवता हैं. अलग-अलग जगहों से वहाँ इकठ्ठा हुए भक्तगणॊं की टॊली झुमती-नाचती-गाती और वाद्ययंत्रों से पूरे वातावरण को मदमस्त करती हुई श्रीजी की देवढी पर जमा हो कर इस बात का इन्तजार करती है कि कब पट खुलेंगे और हम जी भर कर उस नटवर- नागर के दिव्य दर्शन कर सकेंगे. जैसे ही पट खुलता है,हजारों-हजार भक्तगण पूरी श्रद्धा और उल्लहास के साथ अन्दर प्रवेश करता है और उनके दर्शन कर अपने को अहोभागी मानता है.

कार्यक्रम की समाप्ति पर हमनें “हल्दीघाटी” का भ्रमण किया. यह वह स्थली है जहाँ मेवाड के वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप और अकबर के बीच युद्ध हुआ था. उनकी याद को अक्षुण्य बनाने के लिए यहाँ मेवाड के किले की अनुकृति बनाई गई है, जिसमें महाराणा के वशंजों तक की पूरी जानकारी उपलब्ध है. यहाँ डाक्यूमेंटरी फ़िल्म भी दिखायी जाती है,जो उन कठिन दिनों की पृष्ठभूमि पर आधारित है.

दूसरे दिन हम झीलों की नगरी उदयपुर जा पहुँचे. मित्र जगदीश तिवारी, “नवकृति” संस्था के अध्यक्ष माननीय श्री इकबाल हुसैन “इकबाल” ने न सिर्फ़ हमारा स्वागत किया बल्कि राजस्थान साहित्य अकादमी भी साथ ले गए, तथा अकादमी के प्रबंध संपादक डा. प्रमोद भट्टजी से परिचय करवाया और शाम को एक काव्य-गोष्ठी का भी आयोजन करते हुए हमारा सम्मान भी किया. मित्र द्वय की मिलनसारिता, साहित्य के प्रति गहरी आस्था.और अनुराग आज भी स्मृति-पटल पर ज्यों की त्यों अंकित है.

मन तो यहीं रम गया है श्रीचरणॊं में. ऎसे सुरम्य माहौल और वातावरण को छॊड़कर भला कौन लौटकर आना चाहेगा.? लेकिन लौटना ही पडता है. भारी मन लिए हम लौट पडते हैं, इस आशा और विश्वास के साथ कि कब कृपानिधान अपनी दया का पात्र हमें बनाते हैं और अपने दिव्य-दर्शनॊं के लिए अपनी कृपा बरसाते हैं.?

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