शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

सुरेन्द्र कुमार पटेल की 2 लघुकथाएँ : ऊँचाई तथा सपना

 

॰ऊँचाई ॰

एक रात्रि मैं स्वप्न में उड़ता-उड़ता कॉफी ऊँचाई पर पहुँच गया। इच्छा हुई , अपना मकान देखूँ ,कैसा दिखता है। मैने खूब चेष्टा की मगर धरती में विलीन हो चुका मेरा मकान पृथक से नजर नहीं आया। पहले थोड़ी निराशा हुई। फिर उत्सुकता जागी। शहर में कई बहुमंजिला इमारतें भी हैं -गगनचुम्बी इमारतें। वे जरूर दिखेंगी। नीचे झांका। वे भी पृथक से दिखाई नहीं पड़ीं। मन में दार्शनिक भाव जागा-सब कुछ देखने का ही फर्क है। जितना निकट से देखो , उतना बड़ा फर्क। इस ऊँचाई से तृण और ताड़ में फर्क दिखाई नहीं पड़ता। मुझे लगा दिन-रात हड्डी तुड़ाकर रुपए जमा करना और उन रुपयों से अपने मकान की चोटी ऊँची करते जाना एक व्यर्थ का साध्य है। मन में संतोष हुआ। पहली बार मोक्ष गति का भान हुआ। अगले ही पल कृत्रिम पंखों के जोड़ सूर्य की तपिश से खुल गए। मैं धड़ाऽम से गिरा। खुद को टटोला। पता लगा बिस्तर पर हूँ।

उत्सुकता हुई। देखूँ ,अभी-अभी जो ऊँचाई से दिख रहा था वो यहाँ से कैसा दीखता है। मैने देखा-कल्लू की झोपड़ी मेरे मकान को सलाम कर रही थी और मेरा मकान सामने खड़ी भव्य इमारत को।

मैं सोचता रहा- ये भी सच है या मेरे देखने का फर्क।

-0-

 

सपना

घर से निकलकर खेतों की तरफ भागा गया उस रोज। दोनों बांहें आसमान की ओर कर दी। मानों वह मेरी बांहें नहीं अपितु पंख है। मन आसमान में उड़ जाने को बेताब हो रहा था। संसार की सबसे बड़ी दौलत मिल गयी थी। जीवन का लक्ष्य-सा हासिल हो गया उस रोज। मन में समाता ही नहीं था वह सब। अपने दोनों हाथों को मुख के पास ले जाकर चोंगा बनाया और क्षितिज को गुंजायमान करती ध्वनि में उसे पुकारा, ‘‘ आई लव यू नेमा...आई लव यू। ’’

अतीत में खोना कितना सुकून दे रहा था। उसका मिलना,उससे मन की बातें कहने के लिए हर रोज उसके पीछे-पीछे भागते जाना। ना-ना कहते प्यार हो जाना और फिर कल घर से भाग कर शादी के बंधन में बंधने का उसका हामी भरना रोमांच की सारी हदें पार कर गया। मैं दुनिया का सबसे अमीर,सबसे दौलत मंद इंसान था। वाऊ! प्यार इसी का नाम है।

‘‘तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं प्यारे’’

कानों को सिर्फ यही ध्वनि सुनाई दे रहे थे।

वर्तमान से अतीत में जाना और अतीत से वर्तमान में लौट आना स्वर्ग की सैर महसूस करा रहा था। परंतु भविष्य की भी कुछ हैसियत होती है।

भविष्य का नाम आते ही पंख जवाब देने लगे। माता-पिता के सपनों का क्या होगा?माता-पिता को चार लोग क्या कहेंगे? बसने वाले परिवार का भविष्य क्या होगा? यह डर नहीं था कि हम कैसे जिएंगे, परंतु मान-अपमान का भय भीतर तब झंकझोर गया था। डैने सिकुड़कर अपनी अवकात पर आ गए थे।

वो इंतजार करती बैठी होगी। वह इस इंतजार में होगी कि हमारी अगली योजना क्या होगी। हम घर छोड़कर कैसे भागेंगे। घर से कितना सामान लेकर जाएंगे। भागने के बाद घर के लोगों को बताएंगे कि नहीं। फिर कभी लौटकर घर आएंगे कि नहीं। पिछले साल का यही वह दिन था-वैलेंन्टाइन डे। वास्तव में इसी रोज से हम दोनों ने एक होना स्वीकार किया था। ....और अब उसके एक साल पूरे हुए हैं। कल्पना करके मन रोमांच से भर उठता है बार-बार।

भागने से पहले हम उसी पार्क में जाएंगे, जहां साल भर पहले मैंने अपने प्यार का इजहार किया था। और उसने किंतु -परंतु लगाते हुए इसे स्वीकार कर लिया था। उस रोज प्यार का इजहार हुआ था और आज उस प्यार में शामिल किंतु-परंतु हमेशा-हमेशा के लिए विदाई ले चुकेंगे। एकाकार होने का वक्त आ गया है।

आह, कितना खुशनसीब हूं मैं। मैंने अपना प्यार पा लिया है।

फिर वही भविष्य!

मैंने बाजार से गुलाब का एक सुंदर पुष्प लिए हुए उसके घर पहुंच गया था। उसे देखकर हैरत हुई। आज हमारे मिलने का, पार्क में मिलने की प्लैनिंग थी और ये घर में किसी और काम में उलझी हुई है। देखते ही जमीं तले पैर खिसक गयी। कहीं यह सिर्फ मेरा मन रखने के लिए तो नहीं कह रही थी। मन की सारी उड़ानें रदद हो गईं। मन के पंख एक बार फिर अपने अवकात पर आ गए थे। हौसला पस्त हो गया था।

गुलाब का फूल मुझे चिढ़ा रहा था। इसका क्या करूं?

वह सामने आयी। होठों पर मुस्कान बिखेरा और बोली, ‘‘प्यारे, आज के बाद हमारा मिलना-जुलना बंद। अब हम नहीं मिलेंगे। पार्क में तो बिल्कुल भी नहीं!’’

मुझे बेहोश हो जाना चाहिए था। परंतु मैं तब भी खड़ा था। वो मुझसे न मिलने का कह रही थी,मुस्कुराते हुए!

‘‘ कुछ ही दिनों में पिताजी तुमसे मिलने वाले हैं, समझे!अब हम तभी मिलेंगे, जब हमारी शादी हो जाएगी। मैंने भागकर शादी करने से अपने आपको मना कर दिया है। अगर घर के लोग ना भी कर दें, तब भी। समझे!!’’

मुझे गुलाब का फूल नहीं गुलदस्ता लाना चाहिए था। आखिर मैं भी तो यही कहने के लिए पार्क की बजाय सीधे घर आ गया था।

आखिर वह ही मुझसे आगे हो गयी।

‘‘आई लव यू नेमा.... आई लव यू.....’’ मैं स्वप्न में बड़बड़ाए जा रहा था।

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सुरेन्‍द्र कुमार पटेल

वार्ड क्रमांक 4, ब्‍योहारी जिला –शहडोल मध्‍यप्रदेश 484774

 

ईमेल- surendrasanju.02@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. दूसरी लघुकथा 'सपना ' में जमीं तले पैर के स्थान पर पैर तले जमीं होना चाहिए ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. लघुकथा सपना की प्रस्तुति - बहुत भाय़ी - बधाई.

    उत्तर देंहटाएं

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