शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की 2 लघुकथाएँ - पिछड़ापन, किताब

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पिछड़ापन

बच्चा स्कूल से आकर हर दिन अपने पिता से कहता कि उसके मास्टर जी उसे हर रोज़ सिर्फ इसलिए डांटते हैं कि घर में कोई भी उसकी पढ़ाई पर ध्यान नहीं देता .इस वजह से वह अपने मास्टर जी द्वारा दिया गया होम वर्क पूरा नहीं कर पाता . पिता को यह बात अच्छी नहीं लगती थी और कभी - कभी आत्म ग्लानि भी होती कि वह अपने बच्चे को , अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण समय नहीं दे पाता . पर जब बच्चा पढ़ाई में लगातार पिछड़ता चला गया तो पिता को लगा कि अब पानी सर से ऊपर निकल रहा है . उसने तय किया कि अब कुछ भी हो वह कैसे भी करके कुछ न कुछ समय अपने बेटे की पढ़ाई के लिए जरूर निकालेगा . उसने ऐसा करने से पहले एक बार स्कूल जाकर मास्टर जी से मिलना ठीक समझा . वह दूकान मालिक से आधी छुट्टी लेकर स्कूल जा धमका .

चपरासी से अपने बच्चे की कक्षा का पता पूछकर वह उस कमरे तक जा पहुंचा जहां उसका बेटा बैठता था . कक्षा का दृश्य उसकी कल्पना से बिलकुल अलग था . वहाँ तीस - पैंतीस की उम्र के एक सज्जन बच्चों के सामने वाली कुर्सी पर बैठ कर अपने मोबाइल में किसी खेल का अभ्यास बड़ी तन्मयता से कर रहे थे और बच्चे अपनी बाल - सुलभ कारस्तानियों में मस्त होकर छुट्टी के इन्तजार में मशगूल थे .

वह कक्ष के गेट से ही वापस आ गया और वापसी में इस उधेड़ बुन से बाहर निकलने के रास्ते ढूंढ़ता रहा कि मेरे बच्चे की पढ़ाई में पिछड़ने का कारण क्या सचमुच वह स्वयं ही है . दूकान पर वापस पहुंचा तो टी. वी. पर चल रहे समाचारों में घोषणा हो रही थी कि अबसे उसके शहर में गरीब लोगों को बिजली आधे दामों में मिलेगी और पानी मुफ्त मिलेगा .

 

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किताब

जब भी पुस्तक मेला लगता है तब सब बुद्धिजीवी लोग पुस्तक मेले में जरूर जातें हैं और पुस्तक मेले से वापस आकर सब बुद्धिजीविओं को बताते भी हैं . वो कई साल से इस दर्द को झेल रहा था कि वह कभी पुस्तक मेले में नहीं गया जबकि पुस्तके तो वह भी पढ़ता है . इस बार जब पुस्तक मेला लगा तो वह उसकी रौनक देखने से स्वयं को रोक नहीं पाया और तैयार होकर मेले के पंडाल के बाहर जाकर खड़ा हो गया .वहां आज के जमाने का संत्री खड़ा था उसने संत्री से बड़े सभ्य अंदाज में बड़ी आत्मीयता से कहा , " भइया हमको भी किताबों का यह मेला देखना है , हमें अंदर जाने दो ." संत्री ने उपेक्षा भरी उड़ती सी नजर उस पर डाली और बोला . " जाकर उस खिड़की से बीस रूपये की टिकट ले आओ और चले जाओ अंदर , कोई मना थोड़े ही कर रहा है ."

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कैसा जमाना आ गया है कि किताबें देखने के लिए भी टिकट , पर जब आया है तो किताबों का यह मेला तो देख कर ही जाएगा . उसने टिकट लिया और पंडाल के अंदर प्रवेश कर गया . अंदर जाकर उसकी आँखे फ़टी की फ़टी रह गयीं . मेला क्या था , वो तो किताबों का समुंदर था . वह बहुत देर तक वहां एक स्टाल से दुसरे स्टाल तक घूमता रहा . किताबों को देखता , छूता , किसी - किसी को खोलता भी . फिर कीमत देखता और रख देता . पर आखिर कब तक खुद को रोकता . उसकी नजर एक किताब पर टिकी , तो टिकी की टिकी ही रह गयी . प्रेम - कहानी पर आधारित उस उपन्यास को खरीदने के लिए उसने खुद को राजी कर लिया . " सर ! इस उपन्यास के लिए क्या मूल्य दूँ ."

" जी केवल सौ रूपये ." उसने जेब में हाथ डाला परन्तु दूसरे ही क्षण उसका हाथ वहीं रूक गया . दिमाग में विचारों का सिलसिला चल पड़ा , " यार ! पचहत्तर पन्ने की किताब के लिए सौ का पूरा नोट , हट ऐसे थोड़े ही होता है ." फिर वह वहां नहीं रुका और उसने सीधे घर का रुख कर लिया .

जाने और आने में शाम हो ही गयी थी . वह थक भी गया था . पत्नी से बोला ," एक कप चाय दे दो ." पत्नी ने चाय दे दी . चाय पी चुकने के बाद थोड़ी देर के लिए बेड पर कमर सीधी करता रहा और साथ - साथ टी. वी.पर खबरें भी देखता रहा . " राधा यार , इधर आओ आज खाना मत बनाना , चल कर ढाबे में भटूरे खायेगें . उसकी जेब में पड़ा सौ का नोट उसके दिमाग में कुलबुला रहा था .

 

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( सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा ) ( 15/07/2014)

डी - 184 , श्याम पार्क एक्स्टेनशन साहिबाबाद  - 201005 ( ऊ . प्र . )

मो. न.09911127277 (arorask1951@yahoo.com)

3 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन रचनायें,सुरेन्द्र जी। बधाई स्वीकार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह, पिछड़ापन को किस सजीवता से उभारा है.
    मेरी बधाई.
    अयंगर

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा8:23 pm

    पसंद करने के साथ - साथ उत्साह वर्धन के लिए आभार : सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

    उत्तर देंहटाएं

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