शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

प्रमोद यादव का व्यंग्य - झाड़ू बनाम ए.के.49

 

झाड़ू सर्वव्यापी है... हर आम से लेकर ख़ास आदमी के घर पाया जाता है..पर इन दिनों यह केवल आम आदमी के पास ही रह गया है..ख़ास लोग बदलते जमाने और आधुनिकीकरण के चलते ‘वैक्क्युम क्लीनर’ का इस्तेमाल करने लगे हैं..पर इसमें वो बात नहीं जो झाड़ू में है..वो एक गाना है न- “ जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं “ वैसा ही कुछ है.. वैक्क्युम क्लीनर केवल झाड़ू की तस्वीर (कापी मात्र ) ही तो है.. यह एक ही कार्य करता है- सफाई.. पर झाड़ू टू-इन वन है..यह सफाई के साथ-साथ ‘सफाया’ भी करता है..दिल्ली के नतीजे देख लीजिये..बहुमत वाली सत्तारूढ़ पार्टी और सौ साल से अधिक पुरानी ऐतिहासिक पार्टी का सफाया ( और कबाड़ा ) कर गया.. “ एंग्रीमैन” को झाड़ू मार “ ट्रेजडी किंग” बना दिया..नसीबवाले को बदनसीब कर गया.. झाड़ू के बैनर में जब इतना दम-ख़म तो सोचिये कि साक्षात झाड़ू में कितना दम ?..अब इसकी असल ताकत तो वही बता सकता है जो इसे वापरता या वापरती है..

वैसे हमारे देश में.. आम घरों में झाड़ू पर एकाधिकार घर की बहु-बेटियों और पत्नियों का होता है..पुरुष वर्ग इनसे दूर रहते हैं..और हमेशा दूर रहने में ही भलाई समझते हैं..फिर भी कभी-कभी झाड़ू उनके मत्थे पड़ ही जाता है...झाड़ू औजार भी है और अस्त्र भी..अबला नारी का सबसे बड़ा शस्त्र भी – समझिये ए.के. 47... दिल्ली दंगल में इसका नया नामकरण हुआ – ए.के. 49..

एक बार एक संभ्रांत घर की लड़की से झाड़ू पर मिनी इंटरव्यू किया.. पूछा कि कब से लगा रही हो ? तो उसने बताया - ‘ बचपन से..’

‘ किसने सिखाया ? ‘

‘ मम्मी ने..वो भी रोज बिलानागा एक टाईम लगाती है..’

‘ पिताजी कभी झाड़ू मारते हैं ? ‘

‘ हाँ..पर घर या आँगन को नहीं ..’

‘ तो किसे ? ‘

‘ मम्मी को ..’

एक हाउस-वाइफ से पूछा कि रोज-रोज झाड़ू लगाते बोर नहीं लगता ? तो उसका जवाब ही प्रश्न जैसा था- ‘ रोज-रोज सिगरेट पीते आप बोर होते हैं क्या ? ‘ तब सिगरेट बुझाते मैंने कहा - ‘ ये तो शौक है..इससे कैसी बोरियत ? ‘

‘ तो बस यूं समझिये ये संस्कार हैं..इससे भला क्योंकर बोरियत ? ‘

‘ झाड़ू लगाने के क्या फायदे हैं ? ‘ मैंने पूछा.

‘ कई फायदे हैं..साफ़-सफाई के साथ-साथ पूरे शरीर का व्यायाम होता है..हाथ-पैर ,कमर सब दुरुस्त रहते हैं..’

‘ इसके अलावा ? ‘

‘ चोर-उचक्कों..भूत-प्रेतों को मारने-भगाने के काम आता है...क्योंकि सबसे पास में यही हथियार हमेशा उपलब्ध रहता है..’

‘ क्या कभी “किसी अपने” पर इसे आजमाया है ? ‘

वह केवल मुस्कराकर रह गई. मैं समझ गया.

एक हाई-फाई पढ़ी-लिखी जींस पहनी लड़की से पूछा तो कहने लगी- ‘ झाड़ू ?...नो.. नो...कभी नहीं..हमने तो आज तक देखा भी नहीं.. हम जब सोकर उठती हैं तो पूरा घर साफ़-सुथरा मिलता है..’

‘ कितने बजे उठती हैं आप ? ‘

‘ बारह बजे..’

मैंने घडी देखी-एक बज रहे थे..उसे “गुड मार्निंग” कर मैं चलता बना.

और भी कईयों से छोटे-छोटे सवाल किये जैसे दिन में किंतने बार झाड़ू लगाने का नियम है ? झाड़ू के कितने प्रकार हैं ? झाड़ू के टोटके..झाड़ू के मुहावरे आदि-आदि. कुछ का जवाब मिला तो कुछ का नहीं मिला. मेरी सामान्य जानकारी झाड़ू के विषय में जो है उसके अनुसार तो यही कहूँगा कि घर के बाहर जो झाड़ू लगाते हैं या लगाती है उसे क्रमशः जमादार या जमादारिन कहते है..यह बड़ा ही निरीह जीव होता है और अलसुबह ही सड़कों में झाड़ू लिए धूल के गुबार के बीच अस्पष्ट से दीखते हैं.. जोगिंग करने वाले से ही जमादारों की भेंट होती है.. आम आदमी उसे कम ही देख पाते हैं..पौ-फटते ही ये प्राणी “ जाने चले जाते हैं कहाँ “ की तर्ज पर लुप्त हो जाते हैं.. समझ नहीं आता-कहाँ चले जाते हैं ? ये सरकारी मुलाजिम होते हैं..एक घंटा काम कर आठ घंटे का वेतन डकारते हैं.. पर घर-आँगन में जो नित्य झाड़ू-कर्म होता है ,वह अवैतनिक होता है..हाँ..अगर इसे कामवाली बाई करती है तो वह वेतन तो लेती ही है.. साफ़-सफाई के नाम पर घर का और बहुत कुछ भी साफ़ कर जाती है.. बर्तन-भाड़ा,रूपये-पैसे आदि..कई घरों में तो घर-मालिक को ही ये साफ़ कर देती हैं..इसलिए समझदार स्त्रियाँ घर में बाई नहीं रखती..खुद झाड़ू-पोंछा कर बाई की तरह जीवन-यापन करना पसंद करती हैं..

झाड़ू निश्चित ही उपयोगी चीज तो है ही पर उतना ही बेचारा और उपेक्छित भी... हर सुबह आधा-एक घंटा चलने के बाद घर के किसी कोने में बेदर्दी से फेंक दिया जाता है.. शाम को फिर एक बार चलकर पुनः उसी कोने में....कोई उसे फ्लावर-पॉट की तरह सजा कर नहीं रखता..न आलमारी में न टेबल में..पर दिल्लीवासियों की जय हो जिसने झाड़ू को इतना मान दिया..सम्मान दिया कि उसे सी.एम.की कुर्सी में सजा दिया..सी.एम.साहब को कुर्सी के नीचे बैठ अब रोज धूप-बत्ती कर उसकी आरती उतार काम करना चाहिए..सदियों से झाड़ू उपेक्षा की त्रासदी झेलते रहा है..बस काम..काम और काम करते रहा है.. बिना किसी अपराध के सजा भोगता रहा है..अब तो सजा के बदले उसे मजा मिलना ही चाहिए..उसे कुर्सी पर सजाकर रखना ही चाहिए..आज सी.एम. की कुर्सी पर है तो आने वाले दिनों में पी.एम. की कुर्सी में सजे-यही कामना करनी चाहिए..अब सचमुच अच्छे दिन आने वाले हैं..खासकर महिलाओं के..झाड़ू के झंझट से उन्हें मुक्ति मिलने वाली है....सारे झाड़ू –कर्म अब देश के पुरुष-वर्ग करेंगे..दिल्लीवासियों के हर हाथ में झाड़ू देख देश की महिलायें गदगद है..मेरी पत्नी भी बहुत आल्हादित है..और झाड़ू को मेरे बिस्तर के सिरहाने रख गुनगुना रही है- “ वो सुबह कभी तो आएगी..”

XXXXXXXXXXXXXXXXX

प्रमोद यादव

गया नगर, दुर्ग , छत्तीसगढ़

1 blogger-facebook:

  1. मजेदार और जोरदार
    सतसइया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर----------

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------