रविवार, 22 फ़रवरी 2015

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - वनों से ही सहेजी जा सकती है भारतीय संस्कृति

वनों से ही सहेजी जा सकती है भारतीय संस्कृति

आज से लगभग 64 वर्ष पूर्व सन् 1952 में वनों की महत्ता को स्वीकार करते हुए उनकी सुरक्षा तथा पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय वन नीति का निर्माण किया गया। नीति में इस बात पर जोर दिया गया कि किसी भी देश की भौगोलिक सीमा के कम से कम 33 प्रतिशत भू-भाग पर आच्छादित वन अवश्य होना चाहिये। यह भी स्पष्ट किया गया कि 33 प्रतिशत वनों में से 60 प्रतिशत पर्वतीय वन और 25 प्रतिशत समतल भूमि पर वन होना चाहिए। यह बड़े दुख की बात है कि अंतराष्ट्रीय वन नीति के 33 प्रतिशत क्षेत्र के नियम विरू द्ध हमारे अपने देश में कुल भूमि के महज 19.39 प्रतिशत भू-भाग पर ही वनों का अधिकार है। इसे इसलिए भी विडंबना माना जा सकता है क्योंकि पूरे विश्व में भारत वर्ष ही एक ऐसा देश है जहां कि धार्मिक विचारधारा के तहत विभिन्न पर्व त्यौहारों में नीम से लेकर पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला आदि के वृक्षों की पूजा-अर्चना की जाती है। इतना ही नहीं हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी वृक्षों को देवताओं का निवास स्थान माना गया है। यहां तक कि भगवान शिव को प्रिय लगने वाले बेल के वृक्ष की पत्तियां तो पूरे वर्ष शिवालयों में पूजा सामग्री में शामिल की गयी है। आंकड़ों के आईने में देखा जाये तो प्रायद्वीप भारत के 57 प्रतिशत क्षेत्र में पर्वत और पठार फैल हुए हैं। 18 प्रतिशत भाग में हिमालय पर्वत श्रृंखला, 10 प्रतिशत पश्चिम घाट, 10 प्रतिशत समुद्री तटवर्तीय समतल भूमि इसके अलावा 5 प्रतिशत क्षेत्र गंगा और सतलुज जैसी बड़ी नदियों का पाठ क्षेत्र है। कुल मिलाकर भारतीय भूमि में जो भी वनभूमि है वह विषम अनुपात में फै ली हुई है।

मौसम और वृक्षों की प्रजातियों के आधार पर भारत वर्ष में विभिन्न प्रकार के वन पाये जाते हैं, जिनमें कुछ वन विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी हरियाली को बरकरार रखते हुए आगंतुको को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ऐसे ही वनों में उष्णकटीबंधीय अथवा आर्द्र तथा वर्षभर हरे रहने वाले वन भारतवर्ष के उक्त पूर्वी क्षेत्र में पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में वर्ष भर में लगभग 250 सेमी. से भी अधिक वर्षा होती है। साथ ही तापमान भी 25 से 27 डिग्री सेल्सियस बना रहता है। यही कारण है कि आद्रता विद्यमान रहने से पेड़ों की हरियाली बनी रहती है। उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र के वनों में पाये जाने वाले वृक्षों के तनों के हर हिस्से से निकली शाखाओं पर छतरियों की तरह आकृति बनी होती है। अन्य वृक्षों की तरह इन वनों में उगने वाले वृक्षों पर पतझड़ नहीं आता है, यही कारण है कि जंगल घने होते जाते हैं। ऐसी वनांच्छादित भूमि पर घास नहीं उग पाती है कारण यह कि वृक्षों और जंगल के घने होने के कारण सूर्य की किरणें धरती तक नहीं पहुंच पाती है। ऐसे जंगलों में बहुमूल्य वृक्षों की प्रजातियां पायी जाती है, जिनमें सफेद देवदार के वृक्ष प्रमुख है। इसी प्रकार पश्चिमी समुद्री तट, असम के ऊपरी क्षेत्र, हिमालय के ढालानों पर, उड़ीसा के समुद्री तट और आस-पास की पहाड़ियों पर अर्ध-हरित वन पाये जाते हैं। ऐसे वनों में वर्ष भर 200 से 250 सेमी. वर्षा होती है। तापमान 24 से 27 डिग्री सेल्सियस रहता है। ऐसे जंगलों में पाये जाने वाले वृक्ष कम घने और कम उपजाऊ होने के साथ अर्ध-हरित होते हैं। कल्पवृक्ष और शीशम जैसे वृक्ष ऐसे वनों में बहुतायत में पाये जाते हैं। ऐसे वनों को कम घने होने के कारण आसानी से नष्ट किया जा सकता है।

पर्यावरण के संबंध में विचार करते हुए जंगल में रहने वाले प्राणियों के संबंध में चर्चा न की जाये तो यह विषय पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पायेगा। मानवीय समाज इस बात को तो सहर्ष स्वीकार करता है कि जंगल हमारे जीवन के अभिन्न अंग है, पर्यावरण के रक्षक हैं, औषधि दाता है, अर्थव्यवस्था में वनोपजों के माध्यम से योगदान करने वाले हैं, बावजूद इसके न तो मनुष्य तस्करों से ईमारती लकड़ियों की रक्षा में आगे आ रहे हैं, और न ही वन्य प्राणियों की रक्षा के प्रति अपना कर्तव्य पूरा कर पा रहे हैं। पूरे भारत वर्ष सहित छ.ग. प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से वन्य प्राणियों का शिकार अथवा हत्या के मामलों में जिस प्रकार से वृद्धि देखी जा रही है, उसे देखते हुए हमारी अपनी गैर-जिम्मेदारी स्वमेव उजागर हो रही है। जंगलों का वातावरण इस कदर प्राणियों के विपरीत हो चुका है कि उन्हें गांवों और शहरों की ओर रूख करना पड़ रहा है, और यही ंसे शुरू हो रहा है जंगली पशुओं की हत्या का अनवरत सिलसिला। क्या वन्य प्राणियों के लिए बनाया गया हमारा कानून मर चुका है? सन् 1973 में बाघों की सुरक्षा के लिए बनायी गयी टाइगर प्रोजेक्ट योजना भी हर क्षेत्र में विफल दिखाई दे रही है। बाघों की घट रही संख्या और उनके विलुप्त होने की शंका ने ही प्रोजेक्ट टाईगर परियोजना को अंजाम देते हुए देश के प्रधानमंत्री को योजना का अध्यक्ष बनाया है। छ.ग. प्रदेश के राजनांदगांव जिले के अंतर्गत छुरिया विकासखंड में ग्रामीणों द्वारा मारी गयी बाघिन का मामला देश की संसद तक गूंजने के बाद क्यों और कैसे ठंडा पड़ गया यह अहम् सवाल वन्य प्राणियों के जीवन से खिलवाड़ करने वालों के लिए हल्का-पुल्का हो सकता है, किन्तु वन मंत्रालय और वन अधिकारियों के लिए ज्वलंत और चुनौतिपूर्ण कार्य माना जाना चाहिए।

वनों से प्राप्त होने वाली औषधियों ने हमारे देश के बड़े-बड़े आयुर्वेदाचायरें को चिकित्सा जगत में स्थापित ही नहीं किया है वरन् कुछ विशिष्ट रोगों में कारगर चिकित्सा को सिद्ध कर दिखाया है। हमारे वनों से प्राप्त होने वाले हर्रा-बहेड़ा और आँवले की सामान मात्रा का चूर्ण आज भी अमृत तुल्य प्रभाव दिखाने में सफल हो रहा है। छत्तीसगढ़ का बस्तर प्रदेश वनोपज के मामले में अपनी अलग पहचान कायम कर चुका है। चार की चिरौंजी के लिए बस्तर के जंगलों का नाम पूरी दुनिया में पहचाना जाने लगा है। जंगल से प्राप्त जड़ी-बूटियों के माध्यम से तैयार की गयी औषधियों के सेवन में लाभदायक शहद (मधुरस) का उत्पादन भी जंगलों के माध्यम से ही हो पा रहा है। मधु उत्पादन में मधुमक्खी पालन से लेकर उन्हें उनके छत्तों से उड़ाने के बाद शहद निकालने में हमारे वनवासी ही सबसे आगे देखे जा रहे हैं।

जंगल मनुष्यों के जीवन का आधार माने जा सकते हैं। वातावरण में शुद्धता का निर्माण करने के साथ ही बरसाती बादलों को आकर्षित कर वर्षा करवाने में भी जंगलों का ही महत्वपूर्ण स्थान रहा है। हमारे पर्यावरण के सच्चे साथी के रूप में वनों की स्वीकारोक्ति न तो किसी से छुपी है और न ही भविष्य में छुप सकेगी। वनों के सुरम्य वातावरण में ही हमारे ऋषि मुनियों ने तपस्याएं करते हुए अनेक युगों को जिया है। इन्हीं वन शालाओं में रामायण और महाभारत कालीन युग के राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा पूरी हुई है। पूरे विश्व को संस्कृति सिखाने वाले हमारे देश भारतवर्ष ने इन्हीं वनों से संस्कृति की शिक्षा पायी है और सारे विश्व को प्राणियों सहित वृक्षों से प्रेम करने की शिक्षा प्रदान की है।

प्रस्तुतकर्ता

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

 

जूनी हटरी राजनांदगांव

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