शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

प्रमोद यादव का व्यंग्य : आप सब का वैलेंटाइन डे

“आप” का वैलेंटाइन डे / प्रमोद यादव

‘ एक बात कहूँ जी ? ’ पत्नी ने बड़ी आत्मीयता से कहा.

‘ हाँ...बोलो..क्या बात है ? ‘ टी.वी. देखते पति ने बिना सिर घुमाए पूछा.

‘ मैं सोचती हूँ..क्यों न हम दिल्ली में आपकी पार्टी के शपथ ग्रहण समारोह में शिरकत कर आयें..ऐसे समारोह मैंने कभी नहीं देखे..और मुद्दतों से रामलीला मैदान का नाम सुनते आ रही हूँ.. बड़ी इच्छा है एक बार देखने की..’ पत्नी एक सांस में बोल गई.

पति ने टी.वी. का वाल्युम कम कर मुखातिब होते कहा - ‘ अरे यार..कल तक तो तुम पार्टी का और मेरा मजाक उडाती थी...कहती थी- देखिये..आप के सारे लोग लहरिया पार्टी में घुसे चले जा रहे..यही हाल रहा तो ऐन चुनाव के वक्त पार्टी में फकत वो और आप ही रह जायेंगे..अब देखो.. फ़ूल मार्कस...सत्तर में सड़सठ...अच्छा हुआ कि मैंने औरों की तरह पार्टी नहीं छोड़ी..तुम्हारी बात नहीं मानी..’

‘ पर अब मान जाईये जी हमारी बात...हमें दिल्ली दिखा दीजिये.. रामलीला मैदान घुमा दीजिये..अरसे से ख्वाहिश है इस मैदान को देखने की.. ठीक उसी तरह जैसे क्रिकेट प्रेमियों की रहती है आस्ट्रेलिया के मैदान को देखने की...इसी बहाने आपके “ कामन मैंन “ एम.एम. ( मफलर मैन ) को भी देख लूंगी.. ’

‘ अरे रोज तो टी.वी. में देखती हो उन्हें..और क्या देखना ? ‘ पति ने टालने के अंदाज में कहा.

‘ अजी टी.वी. में तो सारी दुनिया दिखती है..अमेरिका..रूस ..चीन..जापान..तो क्या लोग वहां जाना छोड़ देते हैं ? ‘ पत्नी तमक गई.

‘ अरे भागवान..मेरा वो मतलब नहीं..मेरा कहना है कि अभी दिल्ली जाना ठीक नहीं..वहां भारी भीड़ होगी..रामलीला मैदान में पैर रखने की भी जगह नहीं होगी.. ऐसा न हो कि हमें स्टेशन से ही वापस लौटना पड़े..’

‘ क्यों ? ‘

‘ अरे..क्यों क्या..पूरे दिल्लीवासी को उन्होंने न्योता दिया है..हम दिल्ली पहुँच भी जायेंगे तो मैदान तक नहीं पहुँच पायेंगे..समारोह देखना तो दूर की बात..’ पति ने कठिनाईयां बताई.

‘ तो ? ‘

‘ तो क्या ..फिर कभी चलेंगे दिल्ली ..अभी तो कई मौके आयेंगे..’

‘ अजी और कब आयेंगे भला ? ‘ पत्नी गुस्से से बोली.

‘ अरे..देखती जाओ..अभी काले धन वाले बाबाजी फिर से लाव-लश्कर के साथ रामलीला मैदान धमकते ही हैं.. नौ महीने होने को है पर अब तक उनका काला धन सफ़ेद नहीं हुआ.. इतने समय में तो डिलवरी हो जाती है .. अब वे खुद पूछ-पूछ कर तंग आ गए हैं - क्या हुआ तेरा वादा ? ’

पत्नी बात काटते बोली- ‘ अरे.. क्या ख़ाक मैदान में धमकेंगे...वे तो इन दिनों मैदान से ही गायब हैं..देश में इस कदर शोर- शराबा मचा है.. “पांच साल..” वाला नारा लग रहा है.. और न जाने वे कहाँ छिपे बैठे हैं...लल्लू -पंजू तक बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे पर उनका कुछ अता -पता नहीं.. ऐरे-गैरे चैनल में भी नहीं दिखते वो..लगता है उन्हें भी जोर का झटका..जोरों से लगा है... लगता नहीं कि अभी रामलीला वाला प्रोगाम करेंगे ..’

‘ अरे..देखना..अभी ये मैदान काफी गुलजार होने वाला है..बाबाजी देरी किये तो लोकपाल वाले बाबा तिरंगा लिए ‘वन्दे मातरम “ चिल्लाते पहुँच जायेंगे... सबके सब कुलबुला रहे हैं.. तब हम दिल्ली चले चलेंगे..’

‘ अरे तिरंगा से याद आया जी..उन दिनों तो “तीनों” झंडा उठाये “ भारत माता की जय “ का उद्घोष करते थे फिर हिंदी फिल्मों की तरह तीनो एक-एक कर बिछुड़ गए... अब एक तो सी.एम. बनने जा रहे ..दूसरी बनते-बनते रह गई..जो रह गई वो अब क्या करेगी ? ‘

‘ करेगी क्या ? जिस पार्टी को ज्वायन की ,उसका तो कबाड़ा कर ही दिया..अब किसी और का करेगी..’

‘ लेकिन वो तो बढ़िया और सुलझी हुई महिला है जी..उससे ऐसा कैसे हो गया ? ‘ना-ना-करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे” जैसा काण्ड कैसे कर डाली ? राजनीति में घुसना ही था तो आप की ही पार्टी में घुस जाती.. जाने-पहचाने लोग थे..कम से कम मिनिस्ट्री तो मिल ही जाती ..’

‘ अरे श्रीमतीजी.. विनाश काले विपरीत बुद्धि... जिधर बम,उधर हम के चक्कर में वो “चल” गई...और फिर आफर भी काफी तगड़ा था..एकदम से ही सी.एम. की कुर्सी...संख्या-बल के गणित में भी मार खा गई..भूल गई कि कौरव सौ थे और पांडव पांच..पर जीत पांडव की हुई थी..सच्चाई और ईमान की हुई थी..’ पति ने कहानी सुनाते कहा.

‘ वो तो ठीक है जी..अब ये बताईये कि हिंदी फिल्मों के “ हैप्पी एंडिंग “ की तरह आखिर में ये तीनों आपस में मिल तो जायेंगे ना ? सब एक पार्टी में आ जायेंगे न ? ‘ पत्नी ने सवाल किया.

‘ मैं क्या बताऊँ यार..मैंने तो फ़िल्में देखना ही छोड़ दिया है..आजकल की राजनीति ही किसी फिल्म से क्या कम रोचक नहीं ? इसमें हीरो भी है हिरोईन भी..विलेन भी है और विदूषक भी..हर तरह के पात्र हैं राजनीति में और मार-धाड़ तो बला की इसमें है ही .. तो भला कोई क्योंकर फिल्म देखे ? ‘

‘ अच्छा जी छोडो इन बातों को.. अब आप टालिये मत...बाबाओं पर मुझे कतई भरोसा नहीं..ये रामलीला मैदान जब जायेंगे तब जायेंगे..हमें तो कल ही जाना है..हमें आप की ताजपोशी देखनी है.. कामन मैंन देखनी है..रामलीला का मैदान देखना है..भीड़ का बहाना नहीं सुनूंगी..आप पार्टी वाले हैं..टोपी पहनिए और चले चलिए....बाकी वहां मैं देख लूंगी..’ पत्नी आदेश के स्वर में गरजी.

‘ ठीक है..मेरी टोपी निकाल कर रखना ..टोपी पहन मैदान में तो घुस ही जाऊँगा..’ पति बोला.

‘ आगे का काम मेरा है जी.. वहां अपनी टोपी मुझे पहना देना..मैं मंच तक पहुँच जाउंगी..लोग टोपी पहन कुर्सी तक पहुँच जाते हैं तो मंच क्या चीज है..जाइए टिकट करा आईये..और हाँ एक बात और बताईये..आप के संयोजक महोदय कुछ आशिकी मिजाज के हैं क्या ? ‘

‘ क्यों ? ‘

‘ अरे भई..शपथ-समारोह के लिए वैलेंटाइन डे जो चुना है ..’ पत्नी बोली.

‘ नहीं मालूम यार..पर तुमने अच्छा याद दिलाया..दिल्ली में कालेज के दिनों की मेरी एक गर्ल फ्रैंड रहती है..ऐसे मुबारक डे पर उससे मिलना भी हो जाएगा..तो चलता हूँ..टिकट करवा आता हूँ..’ पति ने उठते हुए कहा.

‘ सुनोजी..रहने दो..इस बार टी.वी. में ही देख लेंगे ताजपोशी...वैसे भी चुन्नू के एक्जाम का समय है..उसकी पढ़ाई खराब होगी..आप आराम कीजिये..मैं भी सोती हूँ..’ इतना कह पत्नी एकाएक बिस्तर में एक तरफ मुंह मोड़ धम्म से लेट गई. पति ने उसके कान के पास फुसफुसाते कहा - ‘ कल के लिए आज ही कह देता हूँ यार - हैप्पी वैलेंटाइन डे ..’

पत्नी गुस्से से एक नजर पलट कर देखी और बोली-‘ कल का कल देना और दिल्लीवाली को ही देना..’

पति ने नाईट-सूट के ऊपरी जेब से एयर टिकट निकाल उसे दिखाते कहा- ‘ अरे भई..मजाक कर रहा था..कल सुबह की फ्लाईट है.. जरा जल्दी उठना.. पार्टी ने टिकट भेजी है.. मैंने जानबूझकर तुम्हें नहीं बताया था ..वैसे तुम्हें नहीं जाना तो कैंसिल करा देता हूँ..’

पत्नी लपककर उठी और टिकट छीनकर पति को चूमते बोली- ‘ हैप्पी वेलेंटाइन डे..मैं जानती हूँ..आप वैसे नहीं.. अब कल हम दिल्ली में आप के साथ वेलेंटाइन डे मनाएंगे...शपथ समारोह को और रंगीन बनायेंगे..तब तक के लिए शुभ रात्रि..’

‘ शुभ रात्रि ‘ कहते पति ने पत्नी को अपनी बाहों में भर बत्ती बुझा दी.

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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