हर्षद दवे का लघु आलेख : महोत्सव

वर्तन परिवर्तन

३.महोत्सव -

हर्षद दवे.

क्या है यह जिंदगी? सोचा है हमने कभी? बस जिए जा रहे हैं...

खाना, पीना और कमाना यही मकसद रह गया है हमारी जिंदगी का...अगर यही जिंदगी है तो फिर बोरियत क्या है?

कवि ने बिलकुल सही फरमाया है:

‘जिंदगी का सफर...है ये कैसा सफर...कोई जाना नहीं, कोई समझा नहीं.’

फिर भी यह सच है कि हम अपनी जिंदगी से बहुत प्यार करते हैं. अरे, फिर भी हमें फिर जीने की तमन्ना रहती है. इसीलिए तो हमने ईजाद किया है ‘पुनर्जन्म’ शब्द!

दरअसल जिंदगी बेमिसाल है!

फूल खुशबू देता है. पंखी अपनी मधुर आवाज से हमको आनंद देता है. पेड़ हमें फल, फूल, छाँव, लकड़ी इ. देता है और अपना जीवन सार्थक करता है. परन्तु क्या हम अपनी जिंदगी सार्थक कर पाते है?

हमारा जीवन किसी रईस की जायदाद नहीं कि जिसे हम अपनी नासमझी से गँवा दे. मनुष्य की औसतन साठ साल की जिंदगी से बचपन और बुढापे का समय ध्यान में नहीं रखते हुए हमारे पास मुश्किल से बीस या पचीस साल की जोशीली जिंदगी शेष रह जाती है जिसे हम आनंद से जी सकते हैं. इसी दौरान हम प्रसन्नता से कुछ मनचाहा कर सकते हैं. परन्तु हम इस बेशकीमती समय का अपव्यय करते हैं और उसे प्रियजनों के साथ निरर्थक झगडे करने में या किसी की बुराई करने में या फिर बेतुके टीवी प्रोग्राम देखने में बीता देते हैं. क्या यह मुनासिब है? इसी झमेले में हमारी जिंदगी की किताब कहीं कोरी न रह जाएँ.

हमारी हर एक सांस उत्सव है और जिंदगी एक महोत्सव! आइए इसे हम त्यौहार की तरह मनाएं...क्यों न इसे हम खुशियों से भर दें? क्यों न बिखेर दें उस में मेघधनुष के सारे रंग? यदि हम सद्भाव, प्रेम, त्याग और भक्ति से पूर्ण हमारे कार्यों के रंग से हमारी जिंदगी रंगीन और संगीन बनाएँगे तो पुष्प-वाटिका में सुगंध बिखेरते फूल की तरह हमारा जीवन भी महकेगा और इसकी खुशबू हमारे जाने के बाद भी रहेगी. यही तो है जिंदगी!

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